Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XI | Hindi | Antral (NCERT) | 1 – हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी | 2026-27 | 7 of 7 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | मक़बूल फ़िदा हुसैन (प्रसिद्ध चित्रकार) |
विधा | आत्मकथा अंश |
मुख्य विषय | बड़ौदा के बोर्डिंग स्कूल की मित्रता, रानीपुर बाज़ार की दुकान, कला की ओर झुकाव, बेंद्रे और पिता का सहयोग |
पात्र | मक़बूल (हुसैन), उनके पाँच मित्र, चाचा मुरादअली, अब्बा, चित्रकार बेंद्रे |
संदेश | सच्ची प्रतिभा छुपती नहीं; परिवार और गुरु का प्रोत्साहन कलाकार को बनाता है |
लेखक ने अपने पाँच मित्रों के जो शब्द-चित्र प्रस्तुत किए हैं, उनसे उनके अलग-अलग व्यक्तित्व की झलक मिलती है। फिर भी वे घनिष्ठ मित्र हैं, कैसे?
Answer
उत्तर
मित्रों के अलग-अलग व्यक्तित्व
मित्र | झलक |
|---|---|
मोहम्मद इब्राहीम गोहर अली | डभोई के अत्तार; छोटा कद, ठहरी नज़रें; अंबर और मुश्क के अत्तर में डूबे, गुणों के भंडार |
अरशद | डॉक्टर मनव्वरी का बेटा; हमेशा हँसता चेहरा, गाने और खाने का शौकीन, कसा हुआ पहलवानी जिस्म |
हामिद कंबर हुसैन | कुश्ती और दंड-बैठक का शौक, खुशमिज़ाज, गप्पी, बात में बात मिलाने में उस्ताद |
अब्बासजी अहमद | गठा हुआ जिस्म, खुला रंग, जापानी जैसी आँखें, स्वभाव से बिज़नेसमैन, दिलकश हँसी |
अब्बास अली फ़िदा | नरम लहजा, ऊँचा माथा, वक़्त का पाबंद, खामोश तबीयत, किताबें हाथ से न छूटने वाला |
फिर भी घनिष्ठ मित्रता का कारण
- वे सब बोर्डिंग स्कूल में साथ रहे, साथ पढ़े और खेले, और दो साल की नज़दीकी ने उन्हें एक-दूसरे के करीब कर दिया।
- मित्रता स्वभाव की समानता पर नहीं, आपसी स्नेह और एक-दूसरे के गुणों के सम्मान पर टिकी थी।
- आगे चलकर सब अलग-अलग दिशाओं में बँट गए (कोई व्यापारी, कोई रेडियो में, कोई कराची, कोई कुवैत, कोई कलाकार), फिर भी यह नज़दीकी तमाम उम्र कभी दिल की दूरी में नहीं बदली।
स्वभाव अलग होने पर भी साथ बिताए दिनों के स्नेह और आपसी सम्मान के कारण वे जीवन भर घनिष्ठ मित्र रहे।
‘प्रतिभा छुपाये नहीं छुपती’ कथन के आधार पर मकबूल फिदा हुसैन के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
Answer
उत्तर
मक़बूल की बहुमुखी प्रतिभा बचपन से ही दिखने लगी थी:
- चित्रकला: ड्राइंग मास्टर मोहम्मद अतहर ने ब्लैकबोर्ड पर चिड़िया बनाई तो मक़बूल की स्लेट पर वही चिड़िया हूबहू उतर आई, और उसे दस में से दस नंबर मिले।
- गांधी जी का पोर्ट्रेट: 2 अक्तूबर को कक्षा शुरू होने से पहले ही उसने ब्लैकबोर्ड पर गांधी जी का चित्र बना दिया, जिसे देखकर अब्बास तैयबजी बहुत खुश हुए।
- खेल-कूद: हाई जंप में पहला इनाम मिला।
- भाषण और अभिनय: मौलवी अकबर ने ‘इल्म’ पर दस मिनट का भाषण अभिनय के साथ याद कराया और उसने उसे बख़ूबी प्रस्तुत किया।
- चतुराई और आत्मविश्वास: समूह फ़ोटो में कोने में खड़े होकर उस्तादों के साथ अपनी तसवीरें खिंचवाईं।
इन बातों से पता चलता है कि वे जिज्ञासु, चतुर, हुनरमंद और आत्मविश्वासी थे।
मक़बूल की प्रतिभा चित्रकला, खेल, भाषण और अभिनय में बचपन से झलकने लगी थी।
‘लेखक जन्मजात कलाकार है।’ — इस आत्मकथा में सबसे पहले यह कहाँ उद्घाटित होता है?
Answer
उत्तर
यह बात सबसे पहले बड़ौदा के बोर्डिंग स्कूल में उद्घाटित होती है, जब ड्राइंग मास्टर मोहम्मद अतहर ने ब्लैकबोर्ड पर सफ़ेद चाक से एक बड़ी चिड़िया बनाई और लड़कों से स्लेट पर उसकी नकल करने को कहा। तब मक़बूल की स्लेट पर हूबहू वही चिड़िया ब्लैकबोर्ड से उड़कर आ बैठी, और उसे दस में से दस नंबर मिले। (इससे पहले समूह फ़ोटो वाली घटना में भी उसका उत्साह दिखाई देता है।)
बोर्डिंग स्कूल में ब्लैकबोर्ड की चिड़िया की हूबहू नकल स्लेट पर बना देने की घटना में।
दुकान पर बैठे-बैठे भी मकबूल के भीतर का कलाकार उसके किन कार्यकलापों से अभिव्यक्त होता है?
Answer
उत्तर
चाचा की दुकान पर बैठने के बावजूद उसका ध्यान चित्रकला में ही रहता था:
- स्केच बनाना: घूँघट ताने गुज़रती स्त्री, गेहूँ की बोरी उठाए मज़दूर की पेंच वाली पगड़ी, पठान की दाढ़ी और माथे पर सिजदे के निशान, बुर्का पहने औरत और बकरी के बच्चे के चित्र वह बनाता रहता था।
- हिसाब से ज़्यादा चित्र: शाम को हिसाब की किताब में दस रुपये लिखे होते तो उसी किताब में बीस स्केच बने होते।
- ऑयल पेंटिंग की चाह: फ़िल्म ‘सिंहगढ़’ के रंगीन पोस्टर से प्रेरित होकर उसने अपनी दो स्कूली किताबें बेचकर ऑयल कलर की ट्यूबें खरीदीं और चाचा की दुकान पर बैठकर अपनी पहली ऑयल पेंटिंग बनाई।
- भीतर की लगन: उसे चीज़ों की कीमतें याद नहीं रहती थीं, पर ड्राइंग का हर ब्योरा याद रहता था।
स्केच बनाने, हिसाब की किताब में चित्र उकेरने और ऑयल पेंटिंग की धुन से कलाकार उसके भीतर प्रकट होता है।
प्रचार-प्रसार के पुराने तरीकों और वर्तमान तरीकों में क्या फ़र्क आया है? पाठ के आधार पर बताएँ।
Answer
उत्तर
आधार | पुराने तरीके (पाठ के अनुसार) | वर्तमान तरीके |
|---|---|---|
माध्यम | ताँगे पर घूमता फ़िल्मी इश्तिहार, साथ में ब्रास बैंड | टीवी, रेडियो, इंटरनेट, सोशल मीडिया, मोबाइल संदेश |
सामग्री | रंगीन पतंग के कागज़ पर हीरो-हीरोइन की तसवीरों वाले पर्चे, हाथ से बने पोस्टर | डिजिटल पोस्टर, ट्रेलर, होर्डिंग, ऑनलाइन विज्ञापन |
पहुँच | केवल शहर की गली-कूचों तक सीमित | पूरे देश और दुनिया में तुरंत |
तकनीक | हाथ की कला, साइलेंट फ़िल्मों का युग | कंप्यूटर, प्रिंटिंग और एनीमेशन की उन्नत तकनीक |
पुराने तरीके स्थानीय, धीमे और हस्तकला पर निर्भर थे, जबकि आज के तरीके तेज़, व्यापक, रंगीन और दृश्य-श्रव्य हैं।
पहले प्रचार ताँगे, बैंड और छपे पर्चों से स्थानीय स्तर पर होता था; अब मीडिया और इंटरनेट से तुरंत और व्यापक होता है।
कला के प्रति लोगों का नज़रिया पहले कैसा था? उसमें अब क्या बदलाव आया है?
Answer
उत्तर
पहले
- कला को केवल शौक या राजा-महाराजाओं और अमीरों की दीवारों की सजावट (लटकन) माना जाता था।
- उसे आजीविका का साधन नहीं समझा जाता था। अब्बा तो बेटे को बिज़नेसमैन बनाना चाहते थे, और काज़ी-मौलवियों के माहौल में कला को सम्मान नहीं मिलता था।
- नए रंग-रोगन का खर्च भी फ़िज़ूल माना जाता था।
अब
- कला महलों से उतरकर आम लोगों, कारखानों और दफ़्तरों की दीवारों तक पहुँच गई है।
- चित्रकला, डिज़ाइन और फ़ाइन आर्ट एक सम्मानित पेशा और करियर हैं।
- कलाकारों को सम्मान, पुरस्कार और ऊँची कीमतें मिलती हैं, और कला संस्थान तथा प्रदर्शनियाँ आम हैं।
पहले कला अमीरों का शौक मानी जाती थी; अब वह सम्मानित पेशा है और जन-जन तक पहुँची है।
मकबूल के पिता के व्यक्तित्व की तुलना अपने पिता के व्यक्तित्व से कीजिए?
Answer
उत्तर
मक़बूल के पिता: वे चाहते थे कि बेटा बिज़नेस सीखे और धार्मिक शिक्षा पाए, इसलिए उसे बोर्डिंग स्कूल भेजा और दुकान पर बैठाया। लेकिन वे रोशनख़याल भी थे। जब उन्होंने बेटे की पेंटिंग देखी तो उसे गले लगा लिया और बेंद्रे की सलाह पर उसे कला का रास्ता चुनने की इजाज़त दी, यहाँ तक कि ‘विनसर न्यूटन’ ऑयल कलर और कैनवस मँगवाए तथा कहा, “बेटा जाओ, और ज़िंदगी को रंगों से भर दो।”
मेरे पिता से तुलना (नमूना उत्तर, अपने अनुभव से लिखें)
बिंदु | मक़बूल के पिता | मेरे पिता |
|---|---|---|
अनुशासन | धार्मिक शिक्षा और अनुशासन पर बल | समय के पाबंद, पढ़ाई पर ध्यान देने वाले |
सोच | शुरू में व्यवसाय के पक्षधर, बाद में रोशनख़याल | मेरी रुचि को समझने वाले और प्रोत्साहन देने वाले |
बच्चे की रुचि | कला में बाधा नहीं बने, सहयोग दिया | मेरी रुचि (जैसे विज्ञान/खेल) में पूरा सहयोग करते हैं |
दोनों में समानता यह है कि वे बच्चे के भविष्य की चिंता करते हैं और अंत में उसकी प्रतिभा का सम्मान करते हैं।
मक़बूल के पिता पहले व्यवसाय के पक्षधर थे, पर बेटे की प्रतिभा देखकर उदारता से उसे कला के पथ पर जाने दिया; अपने पिता से तुलना अनुभव के आधार पर करें।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ मित्रता और व्यक्तित्व (प्रश्न 1)
- ☒ मक़बूल की प्रतिभा और कलाकार का उद्घाटन (प्रश्न 2, 3, 4)
- ☒ प्रचार-प्रसार और कला के प्रति नज़रिया (प्रश्न 5, 6)
- ☒ पिता का व्यक्तित्व (प्रश्न 7)