Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XI | Hindi | Antral (NCERT) | 2 – आवारा मसीहा | 2026-27 | 9 of 9 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | विष्णु प्रभाकर (1912–2009) |
विधा | जीवनी (शरत्चंद्र चट्टोपाध्याय की जीवनी आवारा मसीहा का अंश; साहित्य अकादमी पुरस्कार) |
विषय | शरत् का बचपन – पिता मोतीलाल की यायावर प्रकृति, भागलपुर में नाना (गांगुली परिवार) का कठोर अनुशासन, पाठशाला, शरारतें, निषिद्ध खेल, तितली-उद्योग, मित्र राजू और सदानंद, कुसुमकामिनी से साहित्य-संस्कार |
संदेश | अभाव, अनुशासन और विद्रोह के बीच एक संवेदनशील प्रतिभा का निर्माण; बचपन के अनुभव ही आगे चलकर साहित्य बनते हैं |
“उस समय वह सोच भी नहीं सकता था कि मनुष्य को दुख पहुँचाने के अलावा भी साहित्य का कोई उद्देश्य हो सकता है।” लेखक ने ऐसा क्यों कहा? आपके विचार से साहित्य के कौन-कौन से उद्देश्य हो सकते हैं?
Answer
उत्तर
लेखक ने ऐसा क्यों कहा: देवानंदपुर में शरत् ने केवल ‘बोधोदय’ पढ़ा था। भागलपुर आने पर उसे ‘सीता-वनवास’, ‘चारु पाठ’, ‘सद्भाव-सद्गुरु’ और ‘प्रकांड व्याकरण’ जैसी कठिन पुस्तकें पढ़नी पड़ीं – और केवल पढ़ना ही नहीं, रोज़ पंडित जी के सामने खड़े होकर परीक्षा देनी पड़ती थी। घर पर पढ़ाने वाले अक्षय पंडित ‘यमराज के सहोदर’ थे, जो मानते थे कि विद्या गुरु के डंडे में बसती है; पढ़ाई के समय रुदन की करुण-ध्वनि सुनाई देती थी। इस प्रकार शरत् का साहित्य से पहला परिचय आँसुओं और दंड के माध्यम से हुआ – इसलिए उसे लगा कि साहित्य (पाठ्य-पुस्तकें) का उद्देश्य केवल दुख देना है।
साहित्य के उद्देश्य
- आनंद और मनोरंजन देना।
- ज्ञान और जीवन-मूल्यों का विकास।
- संवेदना जगाना – दूसरों के दुख-सुख को समझना।
- समाज का दर्पण बनकर बुराइयों को उजागर करना और सुधार की प्रेरणा देना।
- कल्पना और रचनात्मकता का विकास।
- संस्कृति और इतिहास का संरक्षण।
- मनुष्य को बेहतर इंसान बनाना – “साहित्य समाज का दर्पण भी है और दीपक भी।”
भागलपुर में कठिन पुस्तकों की रोज़ परीक्षा और डंडे वाले अक्षय पंडित के कारण शरत् का साहित्य से पहला परिचय आँसुओं से हुआ, इसलिए उसे साहित्य दुख देने वाला लगा; वास्तव में साहित्य के उद्देश्य हैं – आनंद, ज्ञान, संवेदना, समाज-सुधार, कल्पना का विकास, संस्कृति-संरक्षण और बेहतर मनुष्य बनाना।
पाठ के आधार पर बताइए कि उस समय के और वर्तमान समय के पढ़ने-पढ़ाने के तौर-तरीकों में क्या अंतर और समानताएँ हैं? आप पढ़ने-पढ़ाने के कौन से तौर-तरीकों के पक्ष में हैं और क्यों?
Answer
उत्तर
आधार | उस समय (पाठ के अनुसार) | वर्तमान समय |
|---|---|---|
अनुशासन | कठोर – ‘विद्या का निवास गुरु के डंडे में’; मार-पीट, डाँट | शारीरिक दंड प्रतिबंधित (शिक्षा का अधिकार अधिनियम); स्नेहपूर्ण अनुशासन पर बल |
पद्धति | रटना, रोज़ पंडित के सामने खड़े होकर परीक्षा | गतिविधि-आधारित, समझ-आधारित, प्रयोगात्मक शिक्षा; सतत मूल्यांकन |
स्थान | पाठशाला, घर पर पंडित; तेल के दिये के चारों ओर बैठकर पढ़ना | सुविधायुक्त विद्यालय, स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन शिक्षा |
विषय | धार्मिक-नैतिक पुस्तकें, व्याकरण | विज्ञान, गणित, कंप्यूटर, कला, खेल – बहुविध विषय |
बच्चे की रुचि | उपेक्षित – खेल, पतंग, तैरना निषिद्ध | बच्चे की रुचि, खेल और रचनात्मकता को महत्त्व |
समानताएँ: तब भी और आज भी गृह-शिक्षक (ट्यूशन) की परंपरा है; परीक्षा और अंकों पर ज़ोर; बड़ों द्वारा बच्चों की निगरानी; अच्छे शिक्षक (जैसे कुसुमकामिनी) का प्रेरक प्रभाव; बच्चों की शरारतें।
मेरा पक्ष: मैं स्नेहपूर्ण, रुचि और समझ पर आधारित पढ़ाई के पक्ष में हूँ, क्योंकि डर से बच्चा केवल रटता है, सीखता नहीं; रुचि से पढ़ने पर ज्ञान स्थायी होता है, आत्मविश्वास और रचनात्मकता बढ़ती है। साथ ही, उचित अनुशासन और नियमित परिश्रम भी आवश्यक हैं – जैसा शरत् ने स्वयं पीछे रह जाने पर परिश्रम करके दिखाया।
तब कठोर दंड, रटना और रुचि की उपेक्षा थी; आज दंड-मुक्त, समझ और गतिविधि-आधारित, बहुविषयी और तकनीकी शिक्षा है; ट्यूशन, परीक्षा पर ज़ोर और अच्छे शिक्षक का प्रभाव – ये समानताएँ हैं। मैं स्नेहपूर्ण, रुचि-आधारित शिक्षा और उचित अनुशासन के पक्ष में हूँ, क्योंकि इससे सच्चा और स्थायी ज्ञान मिलता है।
पाठ में अनेक अंश बाल-सुलभ चंचलताओं, शरारतों को बहुत रोचक ढंग से उजागर करते हैं। आपको कौन-सा अंश अच्छा लगा और क्यों?
Answer
उत्तर
मुझे प्यारी पंडित की पाठशाला वाला अंश सबसे अच्छा लगा। पंडित जी चिलम में तंबाकू सजाकर कहीं चले गए, तो शरारती शरत् ने चुपके से चिलम का तंबाकू हटाकर उसकी जगह ईंट के छोटे-छोटे टुकड़े रख दिए और ऊपर से थोड़ा तंबाकू डाल दिया। पंडित जी के लौटने पर जब उन्होंने चिलम पी तो उसका जो हाल हुआ, उसकी कल्पना से ही हँसी आ जाती है।
अच्छा लगने का कारण
- इसमें बचपन की निश्छल शरारत और चतुराई है, जिसमें किसी का गंभीर अहित नहीं।
- लेखक ने इसे इतने सजीव और हास्यपूर्ण ढंग से लिखा है कि दृश्य आँखों के सामने आ जाता है।
- यह शरत् की प्रत्युत्पन्नमति (तुरंत सूझ) और कठोर अनुशासन के विरुद्ध बाल-मन के विद्रोह को दिखाता है।
(अन्य रोचक अंश: सदानंद के घर पर पेड़ से चढ़कर रात में शतरंज खेलना; तितलियों के युद्ध का प्रदर्शन; छोटे नाना के डर के बावजूद ताल में नहाना; पतंगबाज़ी में विरोधी की पतंग काटना।)
प्यारी पंडित की चिलम में तंबाकू की जगह ईंट के टुकड़े रखने वाला अंश – क्योंकि इसमें बचपन की निश्छल, हास्यपूर्ण शरारत, शरत् की तुरंत सूझ और कठोर अनुशासन के प्रति बाल-मन का विद्रोह सजीव रूप में दिखता है।
नाना के घर किन-किन बातों का निषेध था? शरत् को उन निषिद्ध कार्यों को करना क्यों प्रिय था?
Answer
उत्तर
निषिद्ध बातें: गांगुली परिवार (नाना का घर) घोर आदर्शवादी और अनुशासनप्रिय था। वहाँ –
- पतंग उड़ाना वैसे ही वर्जित था जैसे शास्त्रों में समुद्र-यात्रा।
- लट्टू घुमाना, गोली (कंचे) और गुल्ली-डंडा खेलना निषिद्ध था।
- ताल-तालाब में नहाना/तैरना मना था।
- पाठ्य-पुस्तकों के अलावा ‘अपाठ्य’ पुस्तकें (उपन्यास, कहानियाँ) पढ़ना वर्जित था।
- बच्चों का स्वच्छंद घूमना, बाग में जाना, पशु-पक्षी पालना भी पसंद नहीं किया जाता था।
शरत् को प्रिय क्यों
- शरत् स्वभाव से चंचल, साहसी, जिज्ञासु और प्रकृति-प्रेमी था; उसका मन बंधनों को स्वीकार नहीं करता था।
- उसे पिता मोतीलाल की स्वच्छंद, यायावर प्रकृति विरासत में मिली थी।
- कठोर अनुशासन के विरुद्ध यह उसका स्वाभाविक बाल-विद्रोह था – जो चीज़ मना की जाए, उसके प्रति आकर्षण बढ़ता है।
- इन खेलों में वह कुशल था (उसका माँझा ‘विश्वजयी’ था), जिससे उसे साथियों में नेतृत्व और सम्मान मिलता था।
- इनमें उसे आनंद, स्वतंत्रता और रचनात्मकता का अनुभव होता था।
नाना के घर पतंग उड़ाना, लट्टू, कंचे, गुल्ली-डंडा, ताल में नहाना और अपाठ्य पुस्तकें पढ़ना निषिद्ध था; चंचल, साहसी, प्रकृति-प्रेमी और पिता जैसी स्वच्छंद प्रकृति के शरत् को बंधनों के प्रति विद्रोह, इन खेलों में अपनी कुशलता, नेतृत्व और स्वतंत्रता के आनंद के कारण ये काम प्रिय थे।
आपको शरत् और उसके पिता मोतीलाल के स्वभाव में क्या समानताएँ नज़र आती हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
समानता | मोतीलाल | शरत् |
|---|---|---|
यायावर (घुमक्कड़) प्रकृति | कोई धंधा उन्हें बाँधकर नहीं रख सका; नौकरी छोड़कर अचानक चल देते | बंधन तोड़कर घूमना, वन-बाग में भटकना; आगे चलकर ‘आवारा मसीहा’ कहलाए |
स्वप्नदर्शी, कलाकार मन | शिल्पी मन, कहानी-कविता लिखना, भारत का मानचित्र बनाना शुरू करना | कल्पनाशील, कहानियाँ गढ़ना, आगे महान कथाकार बने |
साहित्य-प्रेम | उनके पास पुस्तकों का भंडार था; वे लिखते थे | पिता की अधूरी रचनाएँ पढ़कर लेखन की प्रेरणा ली |
बंधन और दासता से विरोध | नौकरी की दासता और शिल्पी मन में सामंजस्य न हो पाता | घर के कठोर अनुशासन और निषेधों का विरोध |
सौंदर्य और प्रकृति-प्रेम | हिमालय की गरिमा का चिंतन, सौंदर्य की तलाश | पशु-पक्षी, तितलियाँ, उपवन, नदी-ताल से प्रेम |
अंतर: मोतीलाल कोई काम पूरा नहीं कर पाते थे, जबकि शरत् ने परिश्रम से पढ़ाई में आगे निकलकर और बाद में अपनी रचनाएँ पूरी कर पिता की अधूरी साधना को पूर्ण किया।
दोनों यायावर, स्वप्नदर्शी, कलाकार मन वाले, साहित्य-प्रेमी, बंधन-विरोधी और प्रकृति-सौंदर्य के प्रेमी थे – मोतीलाल नौकरी छोड़ भटकते और अधूरी रचनाएँ लिखते, शरत् निषेध तोड़कर घूमता और कहानियाँ गढ़ता; अंतर यह कि शरत् ने पिता की अधूरी साधना पूरी की।
क्या अभाव, अधूरापन मनुष्य के लिए प्रेरणादायी हो सकता है?
Answer
उत्तर
हाँ, अभाव और अधूरापन मनुष्य के लिए प्रेरणादायी हो सकते हैं, यदि वह उन्हें चुनौती के रूप में स्वीकार करे।
शरत् के जीवन से उदाहरण
- पिता मोतीलाल की बेरोज़गारी और गरीबी के कारण परिवार को नाना के घर आश्रित होकर रहना पड़ा – इस अभाव ने शरत् को संवेदनशील और दुखी लोगों के प्रति करुणावान बनाया, जो उसके उपन्यासों में दिखता है।
- पिता की रचनाएँ अधूरी रह गईं – शरत् ने उन्हें पढ़कर लिखने की प्रेरणा पाई और महान कथाकार बनकर उस अधूरेपन को पूरा किया।
- कक्षा में पीछे रह जाने की कमी ने उसे परिश्रम के लिए प्रेरित किया और वह अच्छे बच्चों में गिना जाने लगा।
अन्य उदाहरण: गरीबी में पले डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मिसाइल-मैन और राष्ट्रपति बने; दृष्टि खो चुकी हेलेन केलर ने लेखन और समाज-सेवा से दुनिया को प्रेरित किया; अभावों में पढ़कर डॉ. आंबेडकर संविधान-निर्माता बने।
सावधानी: यदि व्यक्ति अभाव से निराश होकर हार मान ले, तो वही अभाव उसे तोड़ भी सकता है। इसलिए दृष्टिकोण, परिश्रम और सही मार्गदर्शन आवश्यक है।
हाँ – अभाव और अधूरापन व्यक्ति में संघर्ष, परिश्रम और संवेदनशीलता जगाते हैं; शरत् ने गरीबी, पिता की अधूरी रचनाओं और कक्षा में पिछड़ने से प्रेरणा लेकर स्वयं को महान कथाकार बनाया (कलाम, हेलेन केलर, आंबेडकर भी उदाहरण हैं), बशर्ते व्यक्ति निराश होकर हार न माने।
“जो रुदन के विभिन्न रूपों को पहचानता है वह साधारण बालक नहीं है। बड़ा होकर वह निश्चय ही मनस्तत्व के व्यापार में प्रसिद्ध होगा।” अघोर बाबू के मित्र की इस टिप्पणी पर अपनी टिप्पणी कीजिए।
Answer
उत्तर
प्रसंग: एक बार शरत् ने बाहर से आती रोने की आवाज़ सुनकर बताया कि यह सचमुच का रोना है – दुखी लोग बड़े आदमियों की तरह दिखावे के लिए ज़ोर-ज़ोर से नहीं रोते, उनका रोना दुख से विदीर्ण प्राणों का क्रंदन होता है। छोटी उम्र के बालक से रोने का इतना सूक्ष्म विवेचन सुनकर अघोर बाबू चकित हुए और उन्होंने कलकत्ता में अपने मित्र को यह बताया, तब मित्र ने यह टिप्पणी की।
मेरी टिप्पणी
- यह टिप्पणी पूरी तरह सत्य सिद्ध हुई। रुदन के विभिन्न रूप पहचानना असाधारण संवेदनशीलता, सूक्ष्म निरीक्षण और मानव-मन की गहरी समझ का प्रमाण है।
- ‘मनस्तत्व के व्यापार’ का अर्थ है – मानव-मन और भावनाओं से जुड़ा क्षेत्र (मनोविज्ञान/साहित्य)। शरत् आगे चलकर ऐसे कथाकार बने जिन्होंने स्त्रियों, गरीबों और दुखी लोगों की मनोदशा का अद्भुत, मार्मिक चित्रण किया – देवदास, श्रीकांत, परिणीता, चरित्रहीन इसके उदाहरण हैं।
- यह टिप्पणी यह भी बताती है कि बच्चों की प्रतिभा उनकी छोटी-छोटी बातों में झलकती है; उसे पहचानकर प्रोत्साहन देना चाहिए। दुर्भाग्य से गांगुली परिवार में उसकी इस सहज प्रतिभा को पहचानने वाला कोई नहीं था।
यह टिप्पणी सत्य सिद्ध हुई – रोने के सच्चे और दिखावटी रूप पहचानना शरत् की असाधारण संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक समझ का प्रमाण था; वे मानव-मन, विशेषकर दुखी स्त्रियों और गरीबों की मनोदशा के अद्वितीय कथाकार बने; यह भी सीख है कि बच्चों की प्रतिभा पहचानकर प्रोत्साहित करनी चाहिए।
शरत्चंद्र के जीवन की घटनाओं से आपके जीवन की जो भी घटना मेल खाती है उसके बारे में लिखिए।
Answer
उत्तर
शरत् की तरह मुझे भी बचपन में पतंग उड़ाने का बहुत शौक था, पर मेरे दादाजी इसे पढ़ाई में बाधा मानकर मना करते थे। मकर संक्रांति के दिन जब मोहल्ले के सब बच्चे छतों पर पतंग उड़ा रहे थे, मैं भी चुपके से अपने दोस्त की छत पर चला गया। हमने मिलकर माँझा तैयार किया और मैंने तीन-चार पतंगें काट दीं – दोस्तों ने मुझे ‘पेंच का उस्ताद’ कहकर खूब सराहा। लौटने में देर हुई और दादाजी ने देख लिया। मुझे डाँट पड़ी, पर बाद में पिताजी ने समझाया कि खेल भी ज़रूरी है, बस पढ़ाई का समय तय रहे।
शरत् की ही तरह जब मैं गणित में कमज़ोर था और कक्षा-परीक्षा में पीछे रह गया, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने रोज़ एक घंटा अतिरिक्त अभ्यास किया और अगली परीक्षा में अच्छे अंक पाए। इन घटनाओं से मैंने सीखा कि बचपन की रुचियाँ और कमियाँ दोनों हमें बहुत कुछ सिखाती हैं।
निषेध के बावजूद पतंग उड़ाने का शौक और पेंच लड़ाना, तथा पढ़ाई में पीछे रहने पर परिश्रम से आगे निकलना – मेरे जीवन की ये घटनाएँ शरत् के बचपन से मेल खाती हैं (विवरण ऊपर)।
क्या आप अपने गाँव और परिवेश से कभी मुक्त हो सकते हैं?
Answer
उत्तर
नहीं, मनुष्य अपने गाँव और परिवेश से पूरी तरह कभी मुक्त नहीं हो सकता।
- व्यक्तित्व का निर्माण: हमारा बचपन, भाषा, संस्कार, खान-पान, सोच और आदतें उसी परिवेश में बनती हैं; वे जीवन भर हमारे साथ रहती हैं।
- स्मृतियाँ: गाँव की गलियाँ, खेत, नदी, दोस्त, त्योहार और परिवार की यादें मन में हमेशा बसी रहती हैं; दूर रहकर ये और गहरी हो जाती हैं।
- शरत् का उदाहरण: भागलपुर और देवानंदपुर का परिवेश – गंगा, ताल, बाग, मित्र राजू, सदानंद, नाना का परिवार – उनके उपन्यासों में बार-बार लौटता है। वे देश-विदेश घूमे, पर उनका साहित्य बंगाल के गाँवों से ही रचा गया।
- पहचान: हम कहीं भी जाएँ, हमारा गाँव/शहर हमारी पहचान का हिस्सा बना रहता है।
हाँ, शिक्षा और अनुभव से हम परिवेश की संकीर्णताओं (रूढ़ियों, अंधविश्वासों) से मुक्त हो सकते हैं और होना भी चाहिए, पर उसकी जड़ों, अच्छाइयों और यादों से कभी नहीं।
नहीं – हमारा व्यक्तित्व, भाषा, संस्कार, स्मृतियाँ और पहचान उसी परिवेश से बनते हैं (शरत् का साहित्य भी उनके गाँवों से रचा गया); हम परिवेश की रूढ़ियों से तो मुक्त हो सकते हैं, पर उसकी जड़ों और यादों से नहीं।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ शिक्षा, साहित्य और पढ़ने-पढ़ाने के तरीके (प्रश्न 1, 2)
- ☒ शरत् की शरारतें, निषेध और स्वभाव (प्रश्न 3, 4, 5)
- ☒ अभाव और प्रतिभा (प्रश्न 6, 7)
- ☒ व्यक्तिगत अनुभव और परिवेश (प्रश्न 8, 9)