Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XI | Hindi | Aroh (NCERT) | 1 – नमक का दारोगा | 2026-27 | 24 of 24 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | प्रेमचंद (धनपतराय), 1880–1936 |
विधा | कहानी (आदर्शोन्मुख यथार्थवाद) |
मुख्य पात्र | वंशीधर (नमक का दारोगा), पंडित अलोपीदीन (धनी जमींदार), वंशीधर के पिता (वृद्ध मुंशी) |
कथानक | नए नमक-विभाग में दारोगा बने वंशीधर रिश्वत ठुकराकर अलोपीदीन की नमक की गाड़ियाँ पकड़ते हैं; अदालत में धन के बल से अलोपीदीन छूट जाते हैं और वंशीधर बर्खास्त होते हैं, किंतु बाद में अलोपीदीन उनकी ईमानदारी से प्रभावित होकर उन्हें अपनी जायदाद का स्थायी मैनेजर बना लेते हैं |
संदेश | धर्म (ईमानदारी) की धन पर विजय; समाज में भ्रष्टाचार की सच्चाई |
अभ्यास – पाठ के साथ
कहानी का कौन-सा पात्र आपको सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों?
Answer
उत्तर
मुझे सबसे अधिक दारोगा वंशीधर प्रभावित करते हैं।
- ईमानदारी: पिता ने ऊपरी आमदनी की सलाह दी थी, फिर भी उन्होंने रिश्वत को ठुकराया। अलोपीदीन ने बड़ी-से-बड़ी रकम का प्रलोभन दिया, पर वे नहीं डिगे।
- कर्तव्यनिष्ठा और साहस: शहर के सबसे धनी और प्रभावशाली व्यक्ति को उन्होंने कानून के सामने खड़ा कर दिया और अकेले ही उसकी गाड़ियाँ रोक लीं।
- दृढ़ता: अदालत में हारकर नौकरी खोने पर भी उन्होंने अपने सिद्धांत नहीं बदले।
उनका चरित्र हमें सिखाता है कि नैतिक मूल्य सबसे बड़ी पूँजी हैं।
वंशीधर, क्योंकि उन्होंने लालच के आगे झुके बिना ईमानदारी और कर्तव्य का पालन किया।
‘नमक का दारोगा’ कहानी में पंडित अलोपीदीन के व्यक्तित्व के कौन से दो पहलू (पक्ष) उभरकर आते हैं?
Answer
उत्तर
- पहला पक्ष (नकारात्मक): धन के बल पर अधर्म करने वाला व्यक्ति। वे नमक की चोरी-छिपे ढुलाई करते हैं और मानते हैं कि लक्ष्मी की शक्ति से हर अधिकारी को खरीदा जा सकता है। उन्होंने वंशीधर को भी रिश्वत देनी चाही, और अदालत में धन के बल से छूट गए।
- दूसरा पक्ष (सकारात्मक): सज्जन और गुणग्राही व्यक्ति। अपनी पराजय के बाद भी उन्होंने वंशीधर की ईमानदारी का सम्मान किया, उन्हें अपनी जायदाद का स्थायी मैनेजर बनाया और विनम्रता से उनके सामने झुक गए।
एक ओर वे धन के बल पर कानून खरीदने वाले हैं, दूसरी ओर ईमानदारी का सम्मान करने वाले उदार व्यक्ति।
कहानी के लगभग सभी पात्र समाज की किसी-न-किसी सच्चाई को उजागर करते हैं। निम्नलिखित पात्रों के संदर्भ में पाठ से उस अंश को उद्धृत करते हुए बताइए कि यह समाज की किस सच्चाई को उजागर करते हैं —
(क) वृद्ध मुंशी (ख) वकील (ग) शहर की भीड़
Answer
उत्तर
पात्र | पाठ का अंश | समाज की सच्चाई |
|---|---|---|
(क) वृद्ध मुंशी | “मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है… ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है…” और “खेद ऐसी समझ पर! पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया।” | समाज में रिश्वत और ऊपरी कमाई को सहज और वांछित माना जाता है। माता-पिता भी संतान को ईमानदारी के बजाय भ्रष्ट व्यावहारिकता सिखाते हैं |
(ख) वकील | “न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं…” | न्याय-व्यवस्था धन के आगे झुकती है। वकील पैसे लेकर अपराधी का पक्ष लेते हैं और सच को झूठ बना देते हैं |
(ग) शहर की भीड़ | “दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी।” | समाज तमाशबीन और निंदक है। भीड़ ने ईमानदार वंशीधर के बजाय रसूख वाले अलोपीदीन से सहानुभूति रखी, और बाद में उसकी हँसी उड़ाई |
वृद्ध मुंशी – रिश्वत की स्वीकार्यता; वकील – बिकता हुआ न्याय; भीड़ – तमाशबीन और अवसरवादी समाज।
निम्न पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए — नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मज़ार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढ़ना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृद्धि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती है, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ।
(क) यह किसकी उक्ति है?
(ख) मासिक वेतन को पूर्णमासी का चाँद क्यों कहा गया है?
(ग) क्या आप एक पिता के इस वक्तव्य से सहमत हैं?
Answer
उत्तर
(क) यह उक्ति वंशीधर के पिता (वृद्ध मुंशी) की है, जो बेटे को नौकरी के बारे में सीख दे रहे हैं।
(ख) पूर्णिमा का चाँद महीने में केवल एक दिन पूरा दिखता है और फिर रोज़ घटता हुआ गायब हो जाता है। उसी तरह मासिक वेतन महीने में एक बार मिलता है और धीरे-धीरे खर्च होकर समाप्त हो जाता है। इसलिए उसे सीमित और क्षणिक बताने के लिए यह उपमा दी गई है।
(ग) मैं पिता के इस कथन से सहमत नहीं हूँ।
- पिता की चिंता (परिवार की गरीबी) समझी जा सकती है, पर रिश्वत लेना अनैतिक और अवैध है।
- बेईमानी की कमाई में स्थायी बरकत नहीं होती, जबकि ईमानदारी से कमाया धन सम्मान और संतोष देता है।
- यदि हर कोई ऊपरी आमदनी की सोचे तो समाज और देश का नुकसान होगा। शिक्षा का उद्देश्य अच्छा नागरिक बनना है।
(क) वंशीधर के पिता की (ख) वेतन सीमित और क्षणिक होता है (ग) असहमत, क्योंकि रिश्वत अनैतिक है।
‘नमक का दारोगा’ कहानी के कोई दो अन्य शीर्षक बताते हुए उसके आधार को भी स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
- ‘धर्म की विजय’ — कहानी में अंत में धन (अलोपीदीन) धर्म (ईमानदारी) के सामने झुकता है। लेखक ने भी कहा है कि “धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला।”
- ‘ईमानदार वंशीधर’ — पूरी कहानी वंशीधर की सत्यनिष्ठा, उसके संघर्ष और अंत में मिले सम्मान के इर्द-गिर्द घूमती है।
(अन्य संभावित शीर्षक: ‘अलोपीदीन का हृदय-परिवर्तन’, ‘धन और धर्म का द्वंद्व’।)
‘धर्म की विजय’ और ‘ईमानदार वंशीधर’, क्योंकि कथा का केंद्र सत्य की जीत और वंशीधर की निष्ठा है।
कहानी के अंत में अलोपीदीन के वंशीधर को मैनेजर नियुक्त करने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए। आप इस कहानी का अंत किस प्रकार करते?
Answer
उत्तर
संभावित कारण
- वंशीधर की ईमानदारी से प्रभावित होना: अलोपीदीन जानते थे कि जो व्यक्ति इतनी बड़ी रिश्वत ठुकरा सकता है, वह भरोसेमंद भी होगा।
- जायदाद की रक्षा: उन्हें अपनी सारी संपत्ति के लिए ऐसे ही कर्तव्यनिष्ठ और विश्वासी मैनेजर की ज़रूरत थी।
- धर्म के आगे धन का झुकना: वे समझ गए कि धन से सब कुछ नहीं खरीदा जा सकता, और उन्होंने वंशीधर के गुणों के सामने सिर झुकाया।
- पश्चाताप और कृतज्ञता: अपने किए पर शायद उन्हें खेद भी हुआ और वंशीधर का सम्मान करके वे प्रायश्चित करना चाहते थे।
मेरा अंत: मैं कहानी का अंत इस प्रकार करता कि वंशीधर नौकरी तो अलोपीदीन के यहाँ स्वीकार करते, पर शर्त रखते कि वे कभी कोई अनुचित काम नहीं करेंगे। अथवा उच्च अधिकारी वंशीधर की ईमानदारी का पता लगाकर उन्हें बहाल करते और अलोपीदीन को कानून के अनुसार सज़ा मिलती, ताकि संदेश यह जाता कि न्याय सबके लिए समान है।
अलोपीदीन ने वंशीधर की ईमानदारी का सम्मान करते हुए और उन पर विश्वास करके उन्हें मैनेजर बनाया।
अभ्यास – पाठ के आस-पास
दारोगा वंशीधर गैरकानूनी कार्यों की वजह से पंडित अलोपीदीन को गिरफ़्तार करता है, लेकिन कहानी के अंत में इसी पंडित अलोपीदीन की सहृदयता पर मुग्ध होकर उसके यहाँ मैनेजर की नौकरी को तैयार हो जाता है। आपके विचार से वंशीधर का ऐसा करना उचित था? आप उसकी जगह होते तो क्या करते?
Answer
उत्तर
पक्ष में: वंशीधर ने अलोपीदीन का सम्मान उनके बदले हुए व्यवहार को देखकर किया। वे बेरोज़गार थे, परिवार की ज़रूरतें थीं और अलोपीदीन ने स्वयं उन्हें ससम्मान बुलाया था।
विपक्ष में: अलोपीदीन ने पहले उन्हें रिश्वत देने और बाद में अदालत में अपमानित कराने के लिए धन का उपयोग किया था, इसलिए उनके यहाँ नौकरी करना सिद्धांतों से समझौता भी लग सकता है।
मेरा मत: मेरे विचार से वंशीधर का फ़ैसला उचित था, क्योंकि अलोपीदीन ने उनकी ईमानदारी स्वीकार की और उन्हें अपनाया। मैं भी नौकरी स्वीकार करता, पर पहले यह शर्त रखता कि मुझसे कोई गलत या गैरकानूनी काम न कराया जाए।
वंशीधर का निर्णय उचित था, पर मैं नैतिक शर्तों पर ही नौकरी स्वीकार करता।
नमक विभाग के दारोगा पद के लिए बड़ों-बड़ों का जी ललचाता था। वर्तमान समाज में ऐसा कौन-सा पद होगा जिसे पाने के लिए लोग लालायित रहते होंगे और क्यों?
Answer
उत्तर
आज ऐसे पद हैं: पुलिस अधिकारी, कर (टैक्स) और सीमा-शुल्क अधिकारी, इंजीनियर और ठेकेदारी वाले विभाग, परिवहन और खनन विभाग तथा राजनीतिक पद (विधायक, सांसद, मंत्री)।
कारण
- इनमें अधिकार और रसूख अधिक है।
- वेतन के अलावा ऊपरी कमाई और ठेके, लाइसेंस आदि के अवसर होते हैं।
- समाज में सम्मान और ताक़त मिलती है।
- नौकरी की सुरक्षा और सुविधाएँ अच्छी होती हैं।
इसी कारण लोग ऐसे पदों के लिए रिश्वत देने या सिफ़ारिश कराने से भी नहीं हिचकते, जो चिंता की बात है।
पुलिस, कर-विभाग, इंजीनियरिंग, ठेकेदारी जैसे पद अधिकार और ऊपरी कमाई के कारण आज भी आकर्षक हैं।
अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि जब आपके तर्कों ने आपके भ्रम को पुष्ट किया हो।
Answer
उत्तर
(अनुभव-आधारित उत्तर, नमूना)
एक बार मुझे लगा कि मेरा एक दोस्त मुझसे नाराज़ है क्योंकि उसने मुझे फ़ोन नहीं किया। मैंने तर्क खोजने शुरू किए: उसने मुझे खेल में नहीं बुलाया, कक्षा में बात कम की, संदेश का देर से जवाब दिया। हर घटना से मेरा भ्रम और पक्का होता गया। बाद में उससे बात करने पर पता चला कि वह बीमार था और परेशान था। तब समझ आया कि जब हम पहले से कोई धारणा बना लेते हैं तो अपने तर्कों से उसे ही पुष्ट करते जाते हैं, और सच को खुले मन से देखना ज़रूरी है।
भ्रम बन जाने पर हम सारे तर्क उसी के पक्ष में ढूँढ़ते हैं; इसलिए सच जानने के लिए खुला संवाद ज़रूरी है।
पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया। वृद्ध मुंशी जी द्वारा यह बात एक विशिष्ट संदर्भ में कही गई थी। अपने निजी अनुभवों के आधार पर बताइए —
(क) जब आपको पढ़ना-लिखना व्यर्थ लगा हो।
(ख) जब आपको पढ़ना-लिखना सार्थक लगा हो।
(ग) ‘पढ़ना-लिखना’ को किस अर्थ में प्रयुक्त किया गया होगा : साक्षरता अथवा शिक्षा? (क्या आप इन दोनों को समान मानते हैं?)
Answer
उत्तर
(क) (नमूना) जब कोई विद्यार्थी केवल रटकर या नकल करके मुझसे अधिक अंक पा लेता है, या जब मेहनत के बाद भी कम अंक मिलते हैं, तब कुछ क्षण पढ़ाई व्यर्थ लगती है।
(ख) (नमूना) जब मैंने पढ़ी हुई प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी से अपने साथी की चोट पर सही पट्टी बाँधी और उसे आराम मिला, तब मुझे लगा कि पढ़ना-लिखना सार्थक है।
(ग) यहाँ ‘पढ़ना-लिखना’ का अर्थ शिक्षा है, केवल साक्षरता नहीं। वृद्ध मुंशी मानते थे कि शिक्षा से व्यावहारिक संसार की चतुराई (ऊपरी कमाई का तरीका) आनी चाहिए। मैं साक्षरता और शिक्षा को समान नहीं मानता: साक्षरता का अर्थ है केवल पढ़ना-लिखना जान लेना, जबकि शिक्षा में ज्ञान, विवेक, मूल्य और सोचने की क्षमता शामिल हैं।
यहाँ ‘पढ़ना-लिखना’ का अर्थ शिक्षा है; साक्षरता और शिक्षा समान नहीं हैं।
लड़कियाँ हैं, वह घास-फूस की तरह बढ़ती चली जाती हैं। वाक्य समाज में लड़कियों की स्थिति की किस वास्तविकता को प्रकट करता है?
Answer
उत्तर
यह वाक्य दर्शाता है कि समाज में लड़कियों को बोझ और उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। जिस तरह घास-फूस बिना देख-रेख के अपने आप उग आती है, उसी तरह लड़कियों के पालन-पोषण और पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया जाता।
- लड़के के मुकाबले लड़की के स्वास्थ्य, पढ़ाई और भविष्य को कम महत्व मिलता है।
- परिवारों को विवाह और दहेज की चिंता रहती है।
- यह वाक्य समाज की उस मानसिकता पर व्यंग्य है, जिसे आज भी बदलने की आवश्यकता है।
यह वाक्य लड़कियों की उपेक्षा और उन्हें बोझ मानने की सामाजिक वास्तविकता को प्रकट करता है।
इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए। ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करनेवाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए। प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था। अपने आस-पास अलोपीदीन जैसे व्यक्तियों को देखकर आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? उपर्युक्त टिप्पणी को ध्यान में रखते हुए लिखें।
Answer
उत्तर
उपर्युक्त टिप्पणी में समाज के नैतिक पतन पर व्यंग्य है: लोग अपराध के कारण नहीं, बल्कि इस बात से हैरान थे कि एक धनवान और प्रभावशाली व्यक्ति कानून की पकड़ में कैसे आ गया।
मेरी प्रतिक्रिया
- अपने आस-पास ऐसे लोगों को देखकर मुझे क्रोध और चिंता होगी, क्योंकि धन के बल पर अपराधी बच निकलते हैं और ईमानदार लोग परेशान होते हैं।
- मैं मानता हूँ कि कानून सबके लिए समान होना चाहिए, चाहे व्यक्ति कितना ही धनी हो।
- मैं सच का साथ दूँगा, गलत काम की सूचना ज़िम्मेदार अधिकारियों या मीडिया को दूँगा और दूसरों को भी जागरूक करूँगा।
- मैं यह भी सीखूँगा कि ऐसे लोगों से प्रभावित होकर अपने मूल्य न छोड़ूँ।
मैं ऐसे लोगों का समर्थन नहीं करूँगा, बल्कि कानून की समानता का पक्ष लेकर सच के साथ खड़ा रहूँगा।
अभ्यास – समझाइए तो ज़रा
नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर की मज़ार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए।
Answer
उत्तर
पीर की मज़ार पर भक्त अपनी भक्ति से चादर और चढ़ावा चढ़ाते हैं, और मज़ार का महत्व उसी चढ़ावे में होता है। इसी प्रकार पिता का आशय है कि नौकरी में पद या प्रतिष्ठा की जगह ऊपरी आमदनी (चढ़ावा) पर ध्यान देना चाहिए। यह कथन पिता की व्यावहारिक, भौतिकवादी और भ्रष्टाचार के प्रति सहज दृष्टि को दिखाता है।
पद से अधिक महत्व ऊपरी कमाई का है — पिता की व्यावहारिक पर अनैतिक सीख।
इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुद्धि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलंबन ही अपना सहायक था।
Answer
उत्तर
यह वंशीधर के बारे में कहा गया है। नमक के दारोगा के रूप में रात में गाड़ियाँ पकड़ते समय वे बिलकुल अकेले थे और संसार में उनका कोई सहायक नहीं था। ऐसे में उनके साथी थे — धैर्य (मित्र), बुद्धि (मार्गदर्शक) और आत्मनिर्भरता (सहायक)। इन्हीं गुणों के बल पर उन्होंने दृढ़ता से अपना कर्तव्य निभाया।
अकेले संघर्ष करते वंशीधर का सहारा केवल उनका धैर्य, बुद्धि और आत्मबल था।
तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया।
Answer
उत्तर
अलोपीदीन को अपने धन पर पूरा विश्वास था। उन्होंने तर्क किया कि यदि संसार में हर चीज़ (अधिकारी, कानून, अदालत) धन से खरीदी जा सकती है तो वंशीधर भी बिक जाएगा। यह तर्क उनके इस भ्रम को पक्का करता गया कि धन सर्वशक्तिमान है। अब तक की सफलताएँ भी इसी धारणा की पुष्टि करती रहीं, इसलिए वे वंशीधर के सामने भी यही सोचकर गए थे।
धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है, इस भ्रम को अलोपीदीन के तर्कों और पिछली सफलताओं ने और दृढ़ किया।
न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं, नचाती हैं।
Answer
उत्तर
लक्ष्मी (धन) की शक्ति इतनी अधिक है कि न्याय और नीति भी उसके हाथ के खिलौने बन जाते हैं। जैसे बच्चा खिलौनों को अपनी मर्ज़ी से नचाता है, वैसे ही धनी लोग अदालत, कानून और सिद्धांतों को अपनी इच्छानुसार प्रयोग करते हैं। इस कथन में समाज की उस सच्चाई पर व्यंग्य है जहाँ पैसे के बल पर निर्दोष दोषी और दोषी निर्दोष सिद्ध हो जाते हैं।
धन के आगे न्याय और नीति असहाय हो जाते हैं और धनी की इच्छा से चलते हैं।
दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी।
Answer
उत्तर
रात के समय सारी दुनिया सोई हुई थी, पर अलोपीदीन की गिरफ़्तारी की खबर सुबह होते ही हवा की तरह फैल गई। लोगों की जीभ यानी बातचीत और निंदा करने की प्रवृत्ति कभी नहीं सोती। इस वाक्य में समाज की अफ़वाह फैलाने और दूसरों की चर्चा करने की आदत पर व्यंग्य है।
लोग सोए थे, पर चर्चा और निंदा तुरंत हर जगह फैल गई; समाज की गपशप-प्रवृत्ति पर व्यंग्य।
खेद ऐसी समझ पर! पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया।
Answer
उत्तर
जब वंशीधर ने रिश्वत ठुकराई और नौकरी से निकाले गए, तब पिता ने क्रोध और निराशा में यह कथन कहा। उनके अनुसार शिक्षा का फ़ायदा संसार की चतुराई सीखने में है। वंशीधर की ईमानदारी उन्हें नासमझी लगी, इसलिए उन्होंने पुत्र की पढ़ाई को व्यर्थ कहा। यह कथन पिता की स्वार्थपूर्ण और व्यावहारिक सोच को दिखाता है।
पिता की नज़र में ईमानदारी नासमझी है, इसलिए वे बेटे की शिक्षा को व्यर्थ मानते हैं।
धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला।
Answer
उत्तर
जब वंशीधर ने अलोपीदीन को पकड़ा, तब यह प्रसंग है कि धर्म (ईमानदारी, कर्तव्य) ने धन (अलोपीदीन की धन-शक्ति) को पराजित कर दिया। अलोपीदीन ने हज़ारों रुपयों का लालच दिया, पर वंशीधर नहीं डिगे, और धन को ठुकराकर धर्म विजयी रहा।
वंशीधर की ईमानदारी (धर्म) ने अलोपीदीन के धन-बल को पराजित कर दिया।
न्याय के मैदान में धर्म और धन में युद्ध ठन गया।
Answer
उत्तर
अलोपीदीन को अदालत में पेश किया गया तो वहाँ एक ओर धर्म (वंशीधर की सत्यनिष्ठा) और दूसरी ओर धन (अलोपीदीन की धन-शक्ति) आमने-सामने थे। न्याय के इस मैदान में दोनों का संघर्ष हुआ, जिसमें वकीलों और अधिकारियों के बल पर धन जीता और वंशीधर को ही दोषी ठहराया गया। परंतु नैतिक रूप से अंत में धर्म विजयी हुआ।
अदालत में धन और धर्म के बीच संघर्ष हुआ; धन ने कानूनी जीत पाई, पर नैतिक जीत धर्म की हुई।
अभ्यास – भाषा की बात
भाषा की चित्रात्मकता, लोकोक्तियों और मुहावरों के जानदार उपयोग तथा हिंदी-उर्दू के साझा रूप एवं बोलचाल की भाषा के लिहाज़ से यह कहानी अद्भुत है। कहानी में से ऐसे उदाहरण छाँटकर लिखिए और यह भी बताइए कि इनके प्रयोग से किस तरह कहानी का कथ्य अधिक असरदार बना है?
Answer
उत्तर
प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
मुहावरे और लोकोक्तियाँ | पूर्णमासी का चाँद; पीर का मज़ार; बड़ों-बड़ों का जी ललचाना; ऊपरी आय बहता स्रोत; घास-फूस की तरह बढ़ना; लक्ष्मी के खिलौने; दुनिया की जीभ जागना |
उर्दू–हिंदी के साझा शब्द | ओहदा, मज़ार, चादर, चढ़ावा, दारोगा, हुक्म, इजलास, हाकिम, अमले, बरकंदाज़, तजवीज़ |
चित्रात्मक वर्णन | रात के सन्नाटे में गाड़ियों की गड़गड़ाहट और जमुना के पुल का दृश्य; अदालत में भीड़ और अलोपीदीन का हथकड़ी में आना |
बोलचाल का रंग | संवादों में सहज और जीवंत भाषा, जैसे पिता की सीख और अलोपीदीन तथा वंशीधर की बातचीत |
प्रभाव: इन प्रयोगों से भाषा सजीव, रोचक और असरदार बनी है। मुहावरे और लोकोक्तियाँ कम शब्दों में गहरा भाव प्रकट करते हैं, उर्दू-हिंदी का साझा रूप कथा को आम आदमी के निकट लाता है, और चित्रात्मक वर्णन से घटनाएँ आँखों के सामने जीवंत हो उठती हैं।
मुहावरों, उर्दू-हिंदी शब्दों और चित्रात्मक वर्णन ने कहानी को सजीव, व्यंग्यपूर्ण और असरदार बनाया है।
कहानी में मासिक वेतन के लिए किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया गया है? इसके लिए आप अपनी ओर से दो-दो विशेषण और बताइए। साथ ही विशेषणों के आधार को तर्क सहित पुष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
कहानी में प्रयुक्त विशेषण: मासिक वेतन को ‘पूर्णमासी का चाँद’ (जो एक ही दिन पूरा दिखता और फिर घटता जाता है) और वह जो ‘मनुष्य देता है’ (इसलिए उसमें वृद्धि नहीं होती) कहा गया है। अर्थात् वह सीमित, क्षणिक और घटता हुआ है।
मेरे द्वारा सुझाए विशेषण
- निश्चित (नियमित): क्योंकि हर माह तय तिथि पर, तय राशि मिलती है, जिससे परिवार योजना बना सकता है।
- सुरक्षित / ईमानदारी का: क्योंकि यह वैध है, इसमें कोई कानूनी जोखिम या अपमान नहीं है और व्यक्ति सम्मान से जी सकता है।
- (अन्य) अपर्याप्त / सीमित: क्योंकि बढ़ती महँगाई में यह कम पड़ सकता है।
इन विशेषणों का आधार यही है कि वेतन ईमानदारी की कमाई है, जिसका सम्मान है, भले वह कम हो।
कहानी में वेतन ‘पूर्णमासी का चाँद’ (सीमित, घटता) है; मेरे विशेषण – निश्चित और सुरक्षित।
दी गई विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ एक निश्चित संदर्भ में निश्चित अर्थ देती हैं। संदर्भ बदलते ही अर्थ भी परिवर्तित हो जाता है। अब आप किसी अन्य संदर्भ में इन भाषिक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते हुए समझाइए।
(क) बाबूजी आशीर्वाद! (ख) सरकारी हुक्म! (ग) दातागंज के! (घ) कानपुर!
Answer
उत्तर
अभिव्यक्ति | कहानी का संदर्भ | अन्य संदर्भ में प्रयोग |
|---|---|---|
(क) बाबूजी आशीर्वाद! | कहानी में यह पुकार सम्मान, विनय और याचना के भाव से कही गई है | त्योहार पर एक ग़रीब बच्चा राहगीर से हाथ जोड़कर कहता है “बाबूजी आशीर्वाद!”, यहाँ उसका अर्थ है ‘कुछ दान दीजिए’ |
(ख) सरकारी हुक्म! | कहानी में यह कर्तव्य और अधिकार की दृढ़ घोषणा है | विद्यालय में सूचना आती है, “सरकारी हुक्म! कल स्कूल बंद रहेगा”, यहाँ इसका अर्थ है ‘सरकार का आदेश, बदला नहीं जा सकता’ |
(ग) दातागंज के! | कहानी में यह पहचान बताने के लिए, अलोपीदीन के निवास के रूप में कहा गया है | मेले में कोई पूछे “कहाँ के हो?” तो गर्व से उत्तर मिलता है “दातागंज के!”, यानी अपनी जगह की पहचान |
(घ) कानपुर! | कहानी में यह माल की गाड़ियों का गंतव्य है | बस-कंडक्टर आवाज़ लगाता है “कानपुर!”, यहाँ इसका अर्थ है ‘बस की मंज़िल या स्टेशन का नाम’ |
इस प्रकार संदर्भ बदलने पर वही शब्द अलग अर्थ और भाव देते हैं।
संदर्भ बदलने से ये अभिव्यक्तियाँ भिन्न अर्थ (भीख, आदेश, पहचान, मंज़िल) देती हैं।
अभ्यास – चर्चा करें
इस कहानी को पढ़कर बड़ी-बड़ी डिग्रियों, न्याय और विद्वता के बारे में आपकी क्या धारणा बनती है? वर्तमान समय को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर शिक्षकों के साथ एक परिचर्चा आयोजित करें।
Answer
उत्तर
चर्चा के बिंदु:
- बड़ी डिग्रियाँ: कहानी में वकील और अधिकारी पढ़े-लिखे हैं पर उन्होंने ज्ञान का प्रयोग धन के लिए किया। इसलिए डिग्री का होना चरित्र और ईमानदारी की गारंटी नहीं है। शिक्षा के साथ नैतिक मूल्य भी चाहिए।
- न्याय: अदालत में सच पर धन भारी पड़ा। आज भी महँगे मुकदमे और प्रभावशाली लोगों का दबाव न्याय को कठिन बनाते हैं। परंतु आज न्यायपालिका, मीडिया और जनजागरूकता से पारदर्शिता बढ़ी है, और हमें न्याय को सबके लिए सुलभ बनाना चाहिए।
- विद्वता: सच्ची विद्वता सत्य, साहस और विवेक में है, न कि केवल जानकारी में। वंशीधर कम साधन वाले थे, पर नैतिक रूप से विद्वान साबित हुए।
- निष्कर्ष: समाज को केवल डिग्रियों के बजाय चरित्र, ईमानदारी और न्याय के मूल्यों को महत्व देना चाहिए।
डिग्री और विद्वता का मूल्य तभी है जब उसके साथ ईमानदारी हो; न्याय सबके लिए समान और निष्पक्ष होना चाहिए।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ पात्र और चरित्र-चित्रण (प्रश्न 1, 2, 3, 6, 7)
- ☒ पिता की सीख और वेतन-ऊपरी आय (प्रश्न 4, 8, 13, 18, 22)
- ☒ धन बनाम धर्म और न्याय (प्रश्न 15 – 20, 24)
- ☒ भाषा, मुहावरे और संदर्भ (प्रश्न 21, 23)
- ☒ व्यक्तिगत अनुभव और समाज (प्रश्न 5, 9 – 12)