Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
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XII | Hindi | Antra (NCERT) | 1 – देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत | 2026-27 | 13 of 13 |
बिंदु | विवरण |
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कवि | जयशंकर प्रसाद (1889–1937), काशी; छायावाद के प्रमुख कवि, नाटककार |
प्रमुख रचनाएँ | कामायनी, आँसू, लहर, झरना (काव्य); स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी (नाटक); कंकाल, तितली (उपन्यास); आकाशदीप, आँधी (कहानी) |
देवसेना का गीत | ‘स्कंदगुप्त’ नाटक से; मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन देवसेना जीवन-संध्या में स्कंदगुप्त का प्रणय-निवेदन ठुकराकर अपने जीवन की वेदना और भूलों को याद करती है — “आह! वेदना मिली विदाई!” |
कार्नेलिया का गीत | ‘चंद्रगुप्त’ नाटक से; सिल्यूकस की बेटी कार्नेलिया सिंधु तट पर भारत के सौंदर्य और गौरव का गान करती है — “अरुण यह मधुमय देश हमारा!” |
शिल्प | गीति-शैली, तत्सम-प्रधान भाषा, मानवीकरण, रूपक, छायावादी बिंब |
अभ्यास – देवसेना का गीत
“मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई”—पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
देवसेना जीवन की संध्या में अपने अतीत पर दृष्टि डालते हुए कहती है कि उसने भ्रम के कारण (स्कंदगुप्त के प्रेम को पाने की आशा में) अपने जीवन भर की संचित पूँजी— यौवन, प्रेम, भावनाएँ और आकांक्षाएँ— ऐसे लुटा दी, जैसे कोई भिक्षा में मिले अन्न (मधुकरी) को लुटा देता है।
भाव: देवसेना को पछतावा है कि उसने स्कंदगुप्त से प्रेम किया, जबकि स्कंदगुप्त विजया के स्वप्न देखते थे। वह प्रेम भ्रम था; उसने अपना सर्वस्व एक ऐसी आशा पर न्योछावर कर दिया जो कभी पूरी नहीं हुई। अब जीवन के अंत में उसके पास केवल वेदना शेष है। ‘भीख लुटाना’ में उसकी दयनीयता और असहायता भी झलकती है— अब वह आश्रम में गाना गाकर भीख माँगती है।
देवसेना कहती है कि उसने भ्रमवश (स्कंदगुप्त के प्रेम की झूठी आशा में) अपने जीवन भर की संचित पूँजी — यौवन, प्रेम, भावनाएँ — भिक्षा के अन्न की तरह व्यर्थ लुटा दी; अब उसे इसका पश्चाताप है और जीवन में केवल वेदना शेष है।
कवि ने आशा को बावली क्यों कहा है?
Answer
उत्तर
देवसेना कहती है— “मेरी आशा आह! बावली, / तूने खो दी सकल कमाई।” आशा को बावली (पगली) इसलिए कहा गया है क्योंकि— 1. आशा ने बिना सोचे-समझे देवसेना को स्कंदगुप्त के प्रेम के सपने दिखाए, जो कभी पूरे नहीं हो सकते थे। 2. इसी आशा के भरोसे देवसेना ने अपना सब कुछ (जीवन की सारी कमाई— प्रेम, यौवन, सम्मान) गँवा दिया। 3. आशा विवेकहीन होती है; वह यथार्थ को नहीं देखती, केवल कल्पना में उड़ान भरती है। 4. जीवन के अंत में जब स्कंदगुप्त स्वयं प्रणय-निवेदन करते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है— आशा का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
क्योंकि आशा ने विवेकहीन होकर देवसेना को स्कंदगुप्त के प्रेम के ऐसे सपने दिखाए जो पूरे नहीं हो सकते थे; उस पागल आशा के भरोसे देवसेना ने अपने जीवन की सारी कमाई (प्रेम, यौवन) गँवा दी।
“मैंने निज दुर्बल …. होड़ लगाई” इन पंक्तियों में ‘दुर्बल पद बल’ और ‘हारी होड़’ में निहित व्यंजना स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
पूरी पंक्ति है— “चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर, / प्रलय चल रहा अपने पथ पर। / मैंने निज दुर्बल पद-बल पर, / उससे हारी-होड़ लगाई।”
- ‘दुर्बल पद-बल’: देवसेना की सीमित, कमज़ोर शक्ति। एक अकेली स्त्री, जिसका परिवार (भाई बंधुवर्मा सहित) हूणों से लड़ते हुए वीरगति पा चुका है; वह संसाधनहीन और असहाय है। फिर भी वह अपने कमज़ोर पैरों के बल पर संघर्ष करती रही।
- ‘हारी-होड़’: ऐसी प्रतियोगिता, जिसमें हार पहले से निश्चित हो। प्रलय (विनाश, विपत्तियाँ, नियति) उसके जीवन-रथ पर सवार है; उससे जीतना असंभव था, फिर भी देवसेना ने उससे होड़ ली।
व्यंजना: इसमें देवसेना के साहस, स्वाभिमान और संघर्षशीलता की व्यंजना है— वह जानती थी कि हारेगी, फिर भी उसने हार नहीं मानी और नियति से लोहा लेती रही। साथ ही उसकी विवशता और करुणा भी प्रकट होती है।
‘दुर्बल पद-बल’ — देवसेना की सीमित, असहाय शक्ति (अकेली, परिवार-विहीन स्त्री); ‘हारी होड़’ — ऐसी प्रतियोगिता जिसमें हार निश्चित हो (प्रलय/नियति से संघर्ष)। व्यंजना — हार निश्चित जानकर भी अपनी कमज़ोर शक्ति से विपत्तियों से लड़ते रहने का साहस, स्वाभिमान और साथ ही विवशता-करुणा।
काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए- (क) श्रमित स्वप्न की मधुमाया ……………. तान उठाई। (ख) लौटा लो ………………………….. लाज गँवाई।
Answer
उत्तर
(क) “श्रमित स्वप्न की मधुमाया में, / गहन-विपिन की तरु-छाया में, / पथिक उनींदी श्रुति में किसने— / यह विहाग की तान उठाई।”
भाव-सौंदर्य: थका हुआ पथिक (देवसेना) घने जंगल की पेड़ों की छाया में सपनों की मधुर माया में खोया हुआ था, नींद से भरे उसके कानों में किसी ने विहाग (अर्धरात्रि में गाया जाने वाला वियोग का राग) की तान छेड़ दी। अर्थात जीवन के संघर्षों से थकी देवसेना जब विश्राम के सपने देख रही थी, तब स्कंदगुप्त के प्रणय-निवेदन ने उसके मन में पुरानी वेदना जगा दी।
शिल्प-सौंदर्य: 1. तत्सम-प्रधान खड़ी बोली; कोमलकांत पदावली। 2. ‘श्रमित स्वप्न’, ‘मधुमाया’, ‘उनींदी श्रुति’— सुंदर बिंब। 3. अनुप्रास— ‘तरु-छाया’, ‘विहाग की तान’। 4. ‘विहाग’ राग का प्रयोग वेदना और विरह को तीव्र बनाता है; प्रश्न शैली। 5. गेयता; करुण/विप्रलंभ श्रृंगार।
(ख) “लौटा लो यह अपनी थाती / मेरी करुणा हा-हा खाती / विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे / इससे मन की लाज गँवाई।”
भाव-सौंदर्य: देवसेना संसार से कहती है कि अपनी यह धरोहर (थाती)— प्रेम, जीवन, या स्कंदगुप्त का प्रेम-प्रस्ताव— वापस ले लो। मेरी करुणा (दुख) अब हाहाकार कर रही है; अब यह मुझसे नहीं सँभलेगी। इसी के कारण मैंने मन की लाज (मर्यादा) भी गँवा दी। इसमें देवसेना की गहरी निराशा, वेदना और जीवन से विरक्ति प्रकट होती है।
शिल्प-सौंदर्य: 1. ‘विश्व!’ में संबोधन; ‘हा-हा खाती’ में करुणा का मानवीकरण। 2. ‘थाती’ (धरोहर) शब्द का लाक्षणिक प्रयोग। 3. करुण रस; तत्सम शब्दावली के साथ ‘हा-हा खाती’ जैसा लोक-प्रयोग। 4. गीति-शैली, लयात्मकता।
(क) भाव: संघर्ष से थकी देवसेना जब मधुर सपनों में विश्राम कर रही थी, तब स्कंदगुप्त के प्रणय-निवेदन ने विहाग राग की तरह उसकी पुरानी वेदना जगा दी। शिल्प: तत्सम-प्रधान कोमल भाषा, ‘श्रमित स्वप्न’, ‘उनींदी श्रुति’ जैसे बिंब, अनुप्रास, प्रश्न शैली, विप्रलंभ श्रृंगार, गेयता। (ख) भाव: देवसेना संसार से अपनी धरोहर (प्रेम/जीवन) वापस लेने को कहती है, क्योंकि उसकी करुणा हाहाकार कर रही है और इसी में उसने मन की लाज गँवाई — गहरी निराशा और विरक्ति। शिल्प: संबोधन, करुणा का मानवीकरण, ‘थाती’ का लाक्षणिक प्रयोग, करुण रस, गेयता।
देवसेना की हार या निराशा के क्या कारण हैं?
Answer
उत्तर
- अधूरा प्रेम: देवसेना ने स्कंदगुप्त से प्रेम किया, पर स्कंदगुप्त मालवा के धनकुबेर की कन्या विजया के सपने देखते थे; उसका प्रेम एकतरफ़ा रहा।
- परिवार का विनाश: हूणों के आक्रमण में उसके भाई बंधुवर्मा सहित पूरा परिवार वीरगति को प्राप्त हुआ; वह अकेली रह गई।
- विलंब से प्रस्ताव: जीवन के अंतिम मोड़ पर जब स्कंदगुप्त ने प्रणय-निवेदन किया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी; उसने स्वाभिमानवश उसे ठुकरा दिया।
- आर्थिक दुर्दशा: वह वृद्ध पर्णदत्त के साथ आश्रम में गाना गाकर भीख माँगती है।
- समाज की लोलुप दृष्टि: “लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी”— लोगों की प्यासी निगाहों से स्वयं को बचाते-बचाते वह थक गई।
- नियति से संघर्ष: प्रलय उसके जीवन-रथ पर सवार है; अपने दुर्बल बल से उसने हारी-होड़ लगाई।
- भ्रम: उसने भ्रमवश जीवन की संचित पूँजी लुटा दी— अपने ही निर्णयों पर पश्चाताप।
स्कंदगुप्त से एकतरफ़ा प्रेम (वे विजया को चाहते थे), हूणों से युद्ध में भाई सहित परिवार का विनाश, स्कंदगुप्त का बहुत देर से प्रेम-प्रस्ताव जिसे उसने स्वाभिमानवश ठुकराया, भीख माँगने की दुर्दशा, समाज की लोलुप दृष्टियाँ, नियति (प्रलय) से असमान संघर्ष और भ्रमवश जीवन लुटा देने का पश्चाताप।
अभ्यास – कार्नेलिया का गीत
कार्नेलिया का गीत कविता में प्रसाद ने भारत की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है?
Answer
उत्तर
- मधुर, सुंदर देश: “अरुण यह मधुमय देश हमारा!”— भारत लालिमा और मिठास से भरा देश है।
- शरणदाता: “जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा”— यहाँ अनजान और अपरिचित लोगों को भी आश्रय मिलता है; भारत की उदारता और आतिथ्य।
- प्राकृतिक सौंदर्य: कमलों पर नाचती सूर्य-किरणें, हरियाली पर बिखरा मंगल कुंकुम, शीतल मलय समीर।
- पक्षियों का प्रिय नीड़: पक्षी इसी देश को अपना घर समझकर उड़कर आते हैं।
- करुणा और संवेदनशीलता: यहाँ के लोगों की आँखें दूसरों के दुख में करुणा-जल से भरे बादलों जैसी बरसती हैं।
- सबको किनारा देने वाला: अनंत समुद्र की लहरें भी यहाँ आकर किनारा पाती हैं— यह विश्राम और शांति का स्थान है।
- मनोरम भोर: उषा सुनहरे घड़े में सुख भरकर ढुलकाती है।
भारत मधुर, सुंदर और लालिमा-भरा देश है; यहाँ अनजान को भी सहारा मिलता है (उदारता, आतिथ्य); प्राकृतिक सौंदर्य (कमल, सूर्य-किरणें, हरियाली, मलय समीर); पक्षी इसे अपना घर समझते हैं; लोग करुणामय और संवेदनशील हैं; अनंत लहरों को भी यहाँ किनारा मिलता है; और यहाँ की भोर सुख बरसाती है।
‘उड़ते खग’ और ‘बरसाती आँखों के बादल’ में क्या विशेष अर्थ व्यंजित होता है?
Answer
उत्तर
‘उड़ते खग’: “लघु सुरधनु से पंख पसारे— शीतल मलय समीर सहारे। / उड़ते खग जिस ओर मुँह किए— समझ नीड़ निज प्यारा।” पक्षी अपने इंद्रधनुषी पंख फैलाकर शीतल मलय पवन के सहारे भारत की ओर उड़ते हैं, इसे अपना प्यारा घोंसला समझकर। व्यंजना: भारत सभी प्राणियों के लिए आश्रय-स्थल है; बाहर से आए लोग (जैसे स्वयं कार्नेलिया) भी इसे अपना घर मान लेते हैं। यह भारत की उदारता, शांति और अपनत्व का प्रतीक है।
‘बरसाती आँखों के बादल’: “बरसाती आँखों के बादल— बनते जहाँ भरे करुणा जल।” यहाँ के लोगों की आँखें करुणा के जल से भरे बादलों के समान हैं, जो दूसरों के दुख में आँसू बनकर बरसती हैं। व्यंजना: भारतीयों की संवेदनशीलता, दया और परदुखकातरता; यहाँ के लोग दूसरों के दुख को अपना समझते हैं।
‘उड़ते खग’ — पक्षी भारत को अपना प्यारा घोंसला समझकर उड़ते हैं; व्यंजना: भारत सबके लिए आश्रय-स्थल है, बाहर से आए लोग भी इसे अपना घर मानते हैं। ‘बरसाती आँखों के बादल’ — यहाँ के लोगों की आँखें करुणा-जल से भरे बादलों जैसी हैं जो दूसरों के दुख में बरसती हैं; व्यंजना: भारतीयों की करुणा, संवेदनशीलता और परदुखकातरता।
काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए— हेम कुंभ ले उषा सवेरे—भरती ढुलकाती सुख मेरे / मदिर ऊँघते रहते जब—जगकर रजनी भर तारा।
Answer
उत्तर
भाव-सौंदर्य: रात भर जागकर तारे जब मस्ती में ऊँघने लगते हैं (भोर होने पर फीके पड़ने लगते हैं), तब उषा (प्रभात) रूपी सुंदरी सुनहरे घड़े (सूर्य) में सुख भरकर लाती है और उसे धरती पर ढुलका देती है। अर्थात भारत में प्रातःकाल अत्यंत मनोरम होता है; सूर्योदय के साथ सुख, आनंद और प्रकाश चारों ओर फैल जाता है।
शिल्प-सौंदर्य: 1. मानवीकरण: उषा को एक नारी के रूप में (जो सोने का घड़ा लेकर सुख ढुलकाती है) और तारों को रात भर जागकर ऊँघते व्यक्तियों के रूप में चित्रित किया गया है। 2. रूपक: ‘हेम कुंभ’— सूर्य को सोने का घड़ा कहा गया है। 3. दृश्य बिंब: भोर का सुंदर, गतिशील चित्र। 4. तत्सम-प्रधान, कोमल, संगीतात्मक भाषा; ‘मदिर ऊँघते’ में लाक्षणिकता। 5. अनुप्रास— ‘रहते… रजनी’; गेयता। 6. छायावादी प्रकृति-चित्रण।
भाव: रात भर जागकर तारे जब मस्ती में ऊँघने लगते हैं, तब उषा रूपी सुंदरी सूर्य रूपी सोने के घड़े में सुख भरकर धरती पर ढुलका देती है — भारत की मनोरम भोर का चित्र। शिल्प: उषा और तारों का मानवीकरण, ‘हेम कुंभ’ (सूर्य) में रूपक, गतिशील दृश्य बिंब, तत्सम कोमल भाषा, अनुप्रास, गेयता, छायावादी प्रकृति-चित्रण।
‘जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’—पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
इस पंक्ति का आशय है कि भारत ऐसा देश है जहाँ अनजान, अपरिचित और दूर देश से आए लोगों को भी सहारा (आश्रय) मिलता है। 1. ‘अनजान क्षितिज’ का अर्थ है— दूर देश, अपरिचित स्थान या वहाँ से आए लोग। क्षितिज वह स्थान है जहाँ धरती-आकाश मिलते प्रतीत होते हैं; भारत में आकर मानो वह क्षितिज भी ठहराव पा जाता है। 2. भारत की संस्कृति “अतिथि देवो भव” और “वसुधैव कुटुंबकम्” की है; यहाँ विभिन्न देशों से आए लोगों— यूनानी, शक, हूण, पारसी आदि— को आश्रय मिला और वे यहीं के होकर रह गए। 3. स्वयं कार्नेलिया, जो यूनानी (ग्रीक) है, भारत में आकर इसे “हमारा” देश कहती है— यही इस पंक्ति का प्रमाण है।
भारत ऐसा उदार देश है जहाँ दूर देश से आए अनजान, अपरिचित लोगों को भी आश्रय और अपनापन मिलता है (“अतिथि देवो भव”, “वसुधैव कुटुंबकम्”); स्वयं यूनानी कार्नेलिया भारत को “हमारा” देश कहती है।
कविता में व्यक्त प्रकृति-चित्रों को अपने शब्दों में लिखिए।
Answer
उत्तर
- सूर्योदय की लालिमा: भारत भोर की लालिमा (अरुणिमा) और मिठास से भरा है।
- कमल पर नाचती किरणें: सुंदर लाल कमलों के भीतर की आभा पर सूर्य की किरणें मनोहर ढंग से नाचती हैं।
- हरियाली पर कुंकुम: हरी-भरी धरती पर सूर्य की लाल किरणें ऐसे बिखरी हैं जैसे किसी ने मंगल-सूचक कुमकुम छिड़क दिया हो।
- उड़ते पक्षी: छोटे इंद्रधनुष जैसे रंग-बिरंगे पंख फैलाए पक्षी शीतल, सुगंधित मलय पवन के सहारे भारत को अपना घोंसला समझकर उड़ते आते हैं।
- करुणा-जल के बादल: लोगों की आँखें करुणा-जल से भरे बरसाती बादलों जैसी हैं।
- समुद्र की लहरें: अनंत समुद्र की लहरें भारत के तट से टकराकर किनारा पाती हैं।
- भोर का दृश्य: रात भर जागे तारे ऊँघने लगते हैं और उषा सोने के घड़े (सूर्य) से सुख ढुलकाती है।
भोर की लालिमा; लाल कमलों पर नाचती सूर्य-किरणें; हरियाली पर बिखरा मंगल कुमकुम-सा प्रकाश; इंद्रधनुषी पंख फैलाए मलय पवन के सहारे उड़ते पक्षी; करुणा-जल से भरे बादल; किनारा पाती अनंत समुद्र की लहरें; ऊँघते तारे और सोने के घड़े (सूर्य) से सुख ढुलकाती उषा।
अभ्यास – योग्यता-विस्तार
भोर के दृश्य को देखकर अपने अनुभव काव्यात्मक शैली में लिखिए।
Answer
उत्तर
भोर
पूरब के आँगन में किसने, केसर का थाल सजाया है, रात की काली चादर हटाकर, उजियारा मुस्काया है। ओस के मोती दूब पे चमके, जैसे बिखरे तारे हों, चिड़ियों की चहचह में गूँजें, जीवन के जयकारे हों।
मंदिर की घंटी, अज़ान की धुन, मिलकर गीत सुनाती है, मंद पवन फूलों को छूकर, सौरभ बाँट के जाती है। सूरज ने सोने की किरणें, धरती पर बिखराई हैं, सोए सपनों को जगने की, नई उमंगें लाई हैं।
(भाव: भोर का दृश्य नई ऊर्जा, आशा और उल्लास का संचार करता है; प्रकृति जाग उठती है और मन भी नए संकल्पों से भर जाता है।)
अपने अनुभव पर आधारित भोर का काव्यात्मक वर्णन — पूरब में केसरिया आभा, ओस के मोती, चिड़ियों की चहचहाहट, मंदिर-अज़ान की ध्वनि, मंद सुगंधित पवन, सुनहरी किरणें और मन में नई उमंग।
जयशंकर प्रसाद की काव्य रचना ‘आँसू’ पढ़िए।
Answer
उत्तर
(पठन-गतिविधि)
‘आँसू’ (1925) जयशंकर प्रसाद का प्रसिद्ध विरह-काव्य है। इसमें कवि ने अपने प्रिय के वियोग में उत्पन्न वेदना को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है। प्रारंभ में व्यक्तिगत प्रेम और विरह की पीड़ा है, जो आगे चलकर विश्व-वेदना और लोक-कल्याण की भावना में बदल जाती है। प्रसिद्ध पंक्तियाँ— “जो घनीभूत पीड़ा थी / मस्तक में स्मृति-सी छाई / दुर्दिन में आँसू बनकर / वह आज बरसने आई।”
‘आँसू’ में छायावादी कल्पना, लाक्षणिकता, कोमल भाषा, प्रकृति के बिंब और गहरी संवेदना है; इसका ‘आनंद’ छंद (14-14 मात्राओं) में संगीतात्मक प्रवाह है। देवसेना के गीत की वेदना से इसकी तुलना करते हुए विद्यार्थी इसे पुस्तकालय या ‘कविता कोश’ पर पढ़ें।
पठन-गतिविधि: ‘आँसू’ प्रसाद का विरह-काव्य है, जिसमें प्रिय-वियोग की व्यक्तिगत वेदना (“जो घनीभूत पीड़ा थी… दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई”) आगे विश्व-वेदना में बदल जाती है; छायावादी कल्पना, लाक्षणिकता और संगीतात्मकता इसकी विशेषताएँ हैं।
जयशंकर प्रसाद की कविता ‘हमारा प्यारा भारतवर्ष’ तथा रामधारी सिंह दिनकर की कविता ‘हिमालय के प्रति’ का कक्षा में वाचन कीजिए।
Answer
उत्तर
(कक्षा-गतिविधि)
- ‘हमारा प्यारा भारतवर्ष’ (प्रसाद): यह कविता ‘स्कंदगुप्त’ नाटक का गीत है— “हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार / उषा ने हँस अभिनंदन किया, और पहनाया हीरक-हार।” इसमें भारत के प्राचीन गौरव, ज्ञान, संस्कृति, त्याग और वीरता का गान है।
- ‘हिमालय के प्रति’ (दिनकर): “मेरे नगपति! मेरे विशाल! / साकार, दिव्य, गौरव विराट”— इसमें हिमालय को भारत के गौरव और पौरुष का प्रतीक मानकर उसे जगाने, देश की दुर्दशा दूर करने का आह्वान है; ओजपूर्ण राष्ट्रीय चेतना।
वाचन के सुझाव: उचित लय, भाव और उच्चारण के साथ पाठ करें; ओजपूर्ण पंक्तियों में स्वर ऊँचा और भावपूर्ण रखें। वाचन के बाद ‘कार्नेलिया का गीत’ से तुलना करें— तीनों में देशप्रेम और भारत के गौरव का भाव है; प्रसाद में सौंदर्य और संस्कृति, दिनकर में ओज और जागरण प्रधान है।
कक्षा-गतिविधि: प्रसाद की ‘हमारा प्यारा भारतवर्ष’ (भारत के प्राचीन गौरव, ज्ञान, संस्कृति का गान) और दिनकर की ‘हिमालय के प्रति’ (हिमालय को गौरव-प्रतीक मानकर राष्ट्रीय जागरण का ओजपूर्ण आह्वान) का लय-भाव सहित वाचन करें और ‘कार्नेलिया का गीत’ से तुलना करें।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ देवसेना का गीत — भ्रम, बावली आशा, हारी होड़, काव्य-सौंदर्य, निराशा के कारण (प्रश्न 1–5)
- ☒ कार्नेलिया का गीत — भारत की विशेषताएँ, खग और बादल, काव्य-सौंदर्य, आशय, प्रकृति-चित्र (प्रश्न 6–10)
- ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 11–13)