Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Antral (NCERT) | 1 – सूरदास की झोंपड़ी | 2026-27 | 9 of 9 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | प्रेमचंद (1880–1936) |
स्रोत | उपन्यास ‘रंगभूमि’ का अंश |
पात्र | सूरदास (दृष्टिहीन भिखारी), भैरों (ताड़ीवाला), सुभागी (भैरों की पत्नी), जगधर (खोंचेवाला), नायकराम (पंडा), बजरंगी, ठाकुरदीन, मिठुआ (सूरदास का भतीजा), घीसू |
कथानक | भैरों ने बदनामी का बदला लेने के लिए सूरदास की झोंपड़ी में आग लगा दी और उसकी पाँच सौ से अधिक रुपयों की थैली चुरा ली; सूरदास पहले टूट जाता है, फिर बच्चों की बात “खेल में रोते हो!” सुनकर संभल जाता है — “तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे” |
संदेश | प्रतिशोध नहीं, पुनर्निर्माण; जीवन एक खेल है — सच्चे खिलाड़ी कभी रोते नहीं |
‘चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता?’ नायकराम के इस कथन में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
जगधर ने सूरदास से पूछा कि क्या उसने चूल्हा ठंडा नहीं किया था (अर्थात आग चूल्हे से लगी)। इस पर नायकराम ने व्यंग्य किया कि यदि चूल्हा ठंडा किया होता तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता।
निहित भाव: 1. नायकराम जानता था कि आग चूल्हे से नहीं लगी, बल्कि किसी ने जानबूझकर, द्वेषवश लगाई है। 2. सूरदास के दुश्मन (भैरों, जगधर) उससे ईर्ष्या करते थे; झोंपड़ी जलाकर उन्होंने अपने मन की जलन (क्रोध और ईर्ष्या) शांत की— उनका कलेजा ठंडा हुआ। 3. यह कथन जगधर पर भी व्यंग्य था, जिस पर नायकराम को संदेह था; इसीलिए जगधर तुरंत सफ़ाई देने लगा।
‘चूल्हा ठंडा करना’ और ‘कलेजा ठंडा होना’— दोनों मुहावरों के प्रयोग से कथन में चमत्कार आ गया है।
नायकराम का आशय था कि आग चूल्हे से नहीं लगी, बल्कि सूरदास से ईर्ष्या करने वाले दुश्मनों ने जानबूझकर लगाई है — झोंपड़ी जलाकर उन्होंने अपने मन की जलन (कलेजा) ठंडी की। इसमें जगधर पर संदेह और व्यंग्य भी है।
भैरों ने सूरदास की झोंपड़ी क्यों जलाई?
Answer
उत्तर
- भैरों की पत्नी सुभागी, भैरों की मार के डर से सूरदास की झोंपड़ी में छिप गई थी, और सूरदास ने हस्तक्षेप कर भैरों को उसे मारने से रोका।
- इस घटना से मुहल्ले में सूरदास और सुभागी के संबंधों को लेकर बदनामी हुई; भैरों को लगा कि सूरदास ने उसकी आबरू बिगाड़ दी है— “जिसने मेरी आबरू बिगाड़ दी, उसके साथ जो चाहे करूँ, मुझे पाप नहीं लग सकता।”
- जगधर ने भी भैरों को उकसाया।
- भैरों ने गाँठ बाँध ली थी कि जब तक सूरदास को रुलाएगा नहीं, उसे चैन नहीं मिलेगा।
- इसलिए बदला लेने के लिए उसने चुपके से झोंपड़ी में आग लगा दी और पहले उसकी रुपयों की थैली निकाल ली— “यह सुभागी को बहका ले जाने का जरीबाना है”; “दिल की आग तो ठंडी हो गई!”
सुभागी के सूरदास की झोंपड़ी में छिपने और सूरदास द्वारा उसे बचाने से मुहल्ले में हुई बदनामी का बदला लेने के लिए (जगधर के उकसाने पर); भैरों मानता था कि सूरदास ने उसकी आबरू बिगाड़ी है और उसे रुलाए बिना उसे चैन नहीं मिलेगा — इसलिए उसने रुपयों की थैली चुराकर झोंपड़ी जला दी।
‘यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।’ संदर्भ सहित विवेचन कीजिए।
Answer
उत्तर
संदर्भ: झोंपड़ी जल जाने के बाद सूरदास राख ठंडी होने पर उसमें अपनी पोटली ढूँढ़ता है, जिसमें उसकी उम्र भर की कमाई के पाँच सौ रुपये थे। उसे विश्वास था कि रुपये पिघल भी गए हों तो चाँदी तो मिलेगी। पर सारी राख छान डालने पर भी लोटा-तवा मिला, पोटली नहीं मिली। तब वह राख पर बैठकर बिलख-बिलखकर रोने लगा।
विवेचन: वह पोटली केवल रुपयों की नहीं थी— वह सूरदास के “जीवन की सारी आशाओं का आधार” थी। उन रुपयों से वह— 1. गया जाकर पितरों का पिंडदान करना चाहता था; 2. मिठुआ की सगाई करके बहू लाना चाहता था, ताकि उसे घर में बनी रोटी मिले; 3. कुआँ बनवाना चाहता था।
झोंपड़ी के साथ उसकी ये सारी इच्छाएँ और सपने भी जलकर राख हो गए। इसलिए लेखक कहता है कि यह फूस की राख नहीं, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।
झोंपड़ी जलने के बाद सूरदास ने राख में अपनी उम्र भर की कमाई (पाँच सौ रुपये) की पोटली ढूँढ़ी, पर वह नहीं मिली। उन रुपयों से वह पितरों का पिंडदान, मिठुआ का विवाह और कुआँ बनवाना चाहता था; इसलिए वह राख केवल फूस की नहीं, उसकी इन सभी अभिलाषाओं की राख थी।
जगधर के मन में किस तरह का ईर्ष्या-भाव जगा और क्यों?
Answer
उत्तर
जब भैरों ने जगधर को सूरदास की थैली दिखाई जिसमें पाँच सौ से ऊपर रुपये थे, तो जगधर के मन में भैरों के प्रति ईर्ष्या जाग उठी। 1. उसे यह असह्य था कि भैरों के हाथ एकदम इतने रुपये लग गए— “छाती पर साँप लोट रहा था— इसे दम-के-दम में इतने रुपये मिल गए, अब मौज उड़ाएगा।” 2. वह सोचता था कि वह स्वयं भी दिन-भर खोंचा लेकर घूमता है, बाट खोटे रखता है, तेल की मिठाई को घी की कहकर बेचता है— ईमान गँवाकर भी कुछ नहीं मिलता; भैरों ने ईमान खोया तो कुछ लेकर खोया। 3. उसने भैरों को रुपये लौटाने की सलाह भी नेकनीयती से नहीं, हसद (ईर्ष्या) से दी थी; यदि भैरों आधे रुपये उसे दे देता तो शायद उसे संतोष हो जाता। 4. इसी ईर्ष्या के कारण उसने सूरदास और सुभागी को भैरों की करतूत बता दी।
पहले भी उसे सूरदास से ईर्ष्या थी कि वह अंधा होकर भी चैन से रहता है।
भैरों के पास सूरदास की पाँच सौ से अधिक रुपयों की थैली देखकर जगधर को ईर्ष्या हुई कि भैरों को एकदम इतने रुपये मिल गए और वह मौज उड़ाएगा, जबकि वह स्वयं बेईमानी करके भी कुछ नहीं जोड़ पाता; इसी ईर्ष्या (हसद) से उसने रुपये लौटाने की सलाह दी और सूरदास-सुभागी को भेद बता दिया।
सूरदास जगधर से अपनी आर्थिक हानि को गुप्त क्यों रखना चाहता था?
Answer
उत्तर
- “अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है, जितना धन।” एक भिखारी के पास धन होना लोगों की दृष्टि में अपमान की बात थी— “भिखारियों के लिए धन-संचय पाप-संचय से कम अपमान की बात नहीं है।”
- लोग यह सोचते कि भीख माँगकर इतना धन कैसे जमा किया; उसकी ईमानदारी पर संदेह करते।
- वह गया जाकर पिंडदान, मिठुआ का ब्याह और कुआँ बनवाना चाहता था, पर इस ढंग से कि लोग आश्चर्य करें और समझें कि “भगवान दीनजनों की सहायता करते हैं।”
- वह भैरों से झगड़ा या बदला नहीं चाहता था; बात फैलती तो विवाद बढ़ता।
इसलिए उसने कहा— “मेरे पास थैली-वैली कहाँ? … थैली होती, तो भीख माँगता?”
क्योंकि भिखारी के लिए धन होना लज्जा और अपमान की बात मानी जाती थी — लोग उसकी ईमानदारी पर संदेह करते; वह अपने काम (पिंडदान, मिठुआ का ब्याह, कुआँ) इस तरह करना चाहता था कि लोग समझें भगवान ने सहायता की; और वह भैरों से विवाद नहीं बढ़ाना चाहता था।
‘सूरदास उठ खड़ा हुआ और विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।’ इस कथन के संदर्भ में सूरदास की मनोदशा का वर्णन कीजिए।
Answer
उत्तर
- पहले की मनोदशा: धन, घर और आबरू— सब खो जाने पर सूरदास “नैराश्य, ग्लानि, चिंता और क्षोभ के अपार जल में गोते खा रहा था” और अकेला बैठा रो रहा था।
- परिवर्तन: तभी घीसू ने रोते हुए मिठुआ को चिढ़ाया— “खेल में रोते हो!” यह सुनकर सूरदास को लगा मानो किसी ने उसका हाथ पकड़कर किनारे पर खड़ा कर दिया।
- नई समझ: उसने सोचा— जीवन भी एक खेल है; “सच्चे खिलाड़ी कभी रोते नहीं, बाज़ी-पर-बाज़ी हारते हैं, चोट-पर-चोट खाते हैं… पर मैदान में डटे रहते हैं”; न किसी से जलते हैं, न चिढ़ते हैं।
- विजय-गर्व: इस बोध से उसके मन से निराशा दूर हो गई और आत्मविश्वास व उत्साह भर गया। उसने दुख पर विजय पा ली थी। इसी विजय-गर्व की तरंग में वह उठा और राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा— मानो अपने दुख, निराशा और हानि को उड़ा रहा हो।
सूरदास धन, घर और आबरू खोकर निराशा और ग्लानि में रो रहा था; घीसू के “खेल में रोते हो!” कहने पर उसे बोध हुआ कि जीवन एक खेल है और सच्चे खिलाड़ी हार पर रोते नहीं, डटे रहते हैं। इस बोध से उसकी निराशा मिट गई, आत्मविश्वास और उत्साह जागा; दुख पर विजय के गर्व में वह राख उड़ाने लगा — मानो अपने दुख को उड़ा रहा हो।
‘तो हम सौ लाख बार बनाएँगे’ इस कथन के संदर्भ में सूरदास के चरित्र का विवेचन कीजिए।
Answer
उत्तर
मिठुआ के प्रश्नों— “और कोई फिर आग लगा दे?… हजार बार लगा दे?… सौ लाख बार लगा दे?”— के उत्तर में सूरदास कहता है— “तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे।” इस कथन से उसके चरित्र की ये विशेषताएँ प्रकट होती हैं—
- अदम्य जिजीविषा और आशावाद: वह हार नहीं मानता; विपत्ति के बाद फिर से जीवन शुरू करने का संकल्प रखता है— “आशा से ज़्यादा दीर्घजीवी और कोई वस्तु नहीं होती।”
- पुनर्निर्माण में विश्वास: वह प्रतिशोध नहीं, निर्माण में विश्वास रखता है।
- क्षमाशीलता और सहनशीलता: उसे भैरों पर संदेह होते हुए भी उसने न शिकायत की, न बदला लेने की सोची; उल्टे सोचा कि शायद पिछले जन्म में उसने भैरों के रुपये चुराए होंगे।
- कर्मठता और स्वावलंबन: “रुपये मैंने ही तो कमाए थे, क्या फिर नहीं कमा सकता?”
- खिलाड़ी भावना: जीवन को खेल मानकर हार-जीत को समान भाव से लेना।
- सरलता और करुणा: उसे अपनी हानि से अधिक सुभागी की चिंता थी।
- दृढ़ता: “सौ लाख बार” में उसकी अटूट संकल्प-शक्ति झलकती है।
सूरदास अंधा और गरीब होकर भी मन से अत्यंत समृद्ध, साहसी और महान है।
यह कथन सूरदास की अदम्य जिजीविषा, आशावाद, प्रतिशोध के स्थान पर पुनर्निर्माण में विश्वास, क्षमाशीलता, कर्मठता-स्वावलंबन (“क्या फिर नहीं कमा सकता?”), खिलाड़ी भावना और दृढ़ संकल्प को प्रकट करता है — वह अंधा-गरीब होकर भी मन से महान है।
उत्तर
योग्यता-विस्तार
इस पाठ का नाट्य रूपांतर कर उसकी प्रस्तुति कीजिए।
Answer
उत्तर
नाट्य रूपांतर: “सौ लाख बार” (संक्षिप्त रूपरेखा)
पात्र: सूरदास, भैरों, जगधर, सुभागी, नायकराम, बजरंगी, ठाकुरदीन, मिठुआ, घीसू, मुहल्ले के लोग।
दृश्य 1 — रात, जलती झोंपड़ी (लाल रोशनी, लोगों का शोर) बजरंगी: यह कैसे लगी सूरे, चूल्हे में तो आग नहीं छोड़ दी थी? जगधर: सूरे, क्या आज चूल्हा ठंडा नहीं किया था? नायकराम: चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता। (लोग धीरे-धीरे चले जाते हैं; सूरदास अकेला बैठा रहता है।)
दृश्य 2 — भोर, राख का ढेर (सूरदास राख टटोलता है, लोटा-तवा मिलते हैं, पोटली नहीं।) सूरदास (स्वगत): हाय! पूरे पाँच सौ रुपये थे… क्या इसी दिन के लिए पैसे-पैसे बटोर रहा था? (रोता है)
दृश्य 3 — भैरों का घर भैरों (थैली दिखाते हुए): चुपके से एक दियासलाई लगा दी… दिल की आग तो ठंडी हो गई! जगधर: मेरी तो सलाह है कि रुपये उसे लौटा दो… गरीब की हाय बड़ी जानलेवा होती है।
दृश्य 4 — राख के पास: जगधर, सुभागी, सूरदास जगधर: और वह थैली किसकी है, जो भैरों के पास है? सूरदास: मेरे पास थैली-वैली कहाँ? थैली होती, तो भीख माँगता? सुभागी: मैंने ही उजाड़ा है, मैं ही बसाऊँगी।
दृश्य 5 — सूरदास अकेला; बच्चे आते हैं घीसू (मिठुआ से): खेल में रोते हो! सूरदास (उठकर, उत्साह से): सच्चे खिलाड़ी कभी रोते नहीं! (राख उड़ाता है; बच्चे भी साथ में राख उड़ाते हैं।) मिठुआ: दादा, अब हम रहेंगे कहाँ?… और जो कोई सौ लाख बार लगा दे? सूरदास: तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे! (पर्दा गिरता है)
प्रस्तुति-सुझाव: लाल-नारंगी रोशनी से आग का प्रभाव, पृष्ठभूमि में करुण संगीत, अंत में उत्साहपूर्ण संगीत; सूरदास की भूमिका में अंधेपन का सहज अभिनय (लाठी, टटोलना)।
पाँच दृश्यों का नाट्य रूपांतर — जलती झोंपड़ी (नायकराम का व्यंग्य), राख में पोटली की खोज, भैरों का स्वीकार और जगधर की सलाह, जगधर-सुभागी-सूरदास संवाद, और “खेल में रोते हो!” से सूरदास का उठना और “सौ लाख बार बनाएँगे” — प्रकाश, संगीत और अभिनय-सुझावों सहित।
प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ का संक्षिप्त संस्करण पढ़िए।
Answer
उत्तर
(पठन-गतिविधि)
‘रंगभूमि’ (1925) का संक्षिप्त परिचय: यह प्रेमचंद का विशाल उपन्यास है, जिसका नायक सूरदास है— बनारस के पास पाँडेपुर गाँव का एक दृष्टिहीन भिखारी। उसकी पुश्तैनी ज़मीन पर, जहाँ गाँव के पशु चरते हैं, ईसाई उद्योगपति जॉन सेवक सिगरेट का कारख़ाना लगाना चाहता है। सूरदास गाँव के हित के लिए ज़मीन बेचने से इनकार करता है और अंत तक अहिंसक ढंग से अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करता है। प्रशासन और पूँजीपति मिलकर ज़मीन छीन लेते हैं, गाँव उजड़ जाता है, और सूरदास गोली लगने से मारा जाता है; फिर भी वह हार नहीं मानता। उपन्यास में सोफ़िया और विनय की प्रेम-कथा, राजा महेंद्र कुमार, कुँवर भरत सिंह, रानी जाह्नवी आदि पात्र भी हैं।
मुख्य विषय: औद्योगीकरण बनाम ग्रामीण जीवन, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद का शोषण, गांधीवादी अहिंसक संघर्ष, धर्म और प्रेम। सूरदास का प्रसिद्ध कथन है कि जीवन एक खेल है— “तुम जीते, मैं हारा… हम हारे तो क्या, मैदान से भागे तो नहीं।”
विद्यार्थी पुस्तकालय से ‘रंगभूमि’ का संक्षिप्त संस्करण लेकर पढ़ें और सूरदास के चरित्र पर कक्षा में चर्चा करें।
पठन-गतिविधि: ‘रंगभूमि’ में अंधा सूरदास अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर जॉन सेवक का सिगरेट कारख़ाना लगने का अहिंसक विरोध करता है; पूँजीपति-प्रशासन के गठजोड़ से गाँव उजड़ता है और सूरदास मारा जाता है, पर हार नहीं मानता। उपन्यास औद्योगीकरण, शोषण और गांधीवादी संघर्ष को दर्शाता है; इसका संक्षिप्त संस्करण पढ़कर चर्चा करें।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ नायकराम का व्यंग्य, भैरों का प्रतिशोध, अभिलाषाओं की राख (प्रश्न 1–3)
- ☒ जगधर की ईर्ष्या, हानि को गुप्त रखना (प्रश्न 4–5)
- ☒ सूरदास की मनोदशा और चरित्र (प्रश्न 6–7)
- ☒ नाट्य रूपांतर, रंगभूमि (प्रश्न 8–9)