Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XI | Hindi | Vitan (NCERT) | 2 – राजस्थान की रजत बूँदें | 2026-27 | 5 of 5 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | अनुपम मिश्र (1948–2016), पर्यावरणविद् |
विधा | निबंध/वृत्तांत (राजस्थान की रजत बूँदें) |
विषय | राजस्थान की मरुभूमि में वर्षा-जल को सहेजने वाली कुंई – उसकी बनावट, निर्माण-कला और सामाजिक व्यवस्था |
मुख्य बातें | चेजारो (चेलवांजी) द्वारा कुंई की खुदाई और चिनाई; खड़िया पत्थर की पट्टी; पानी के तीन रूप – पालरपानी, पातालपानी, रेजाणीपानी; ग्राम-समाज का अंकुश |
संदेश | पारंपरिक जल-संरक्षण ज्ञान का महत्त्व; सामुदायिक व्यवस्था और प्रकृति के साथ संतुलन |
राजस्थान में कुंई किसे कहते हैं? इसकी गहराई और व्यास तथा सामान्य कुओं की गहराई और व्यास में क्या अंतर होता है?
Answer
उत्तर
कुंई: राजस्थान की मरुभूमि में वर्षा के जल को इकट्ठा करने के लिए बनाया जाने वाला बहुत छोटे व्यास का, पर गहरा कुआँ ‘कुंई’ कहलाता है (‘कुआँ’ पुल्लिंग, ‘कुंई’ स्त्रीलिंग)। कुंई भूजल से नहीं जुड़ती; यह रेत के नीचे खड़िया पत्थर की पट्टी के ऊपर रेत में समाई वर्षा की नमी – रेजाणीपानी – को बूँद-बूँद इकट्ठा करती है।
आधार | कुंई | सामान्य कुआँ |
|---|---|---|
व्यास | बहुत संकरा – लगभग चार-पाँच हाथ; खुदाई करने वाले की पीठ और छाती से एक-एक हाथ की दूरी पर मिट्टी रहती है | काफ़ी चौड़ा – प्रायः पंद्रह-बीस हाथ |
गहराई | तीस से साठ-पैंसठ हाथ (खड़िया पट्टी की गहराई के अनुसार) | बहुत अधिक – भूजल तक, कई बार सौ-दो सौ हाथ तक |
पानी का स्रोत | रेजाणीपानी (वर्षा की रिसी हुई नमी), मीठा | पातालपानी (भूजल), मरुभूमि में प्रायः खारा |
पानी की मात्रा | दिन भर में केवल दो-तीन घड़े | अधिक |
कुंई मरुभूमि में रेजाणीपानी (वर्षा की रिसी नमी) इकट्ठा करने वाला छोटे व्यास का गहरा कुआँ है; इसका व्यास केवल चार-पाँच हाथ और गहराई तीस से साठ-पैंसठ हाथ होती है, जबकि सामान्य कुआँ चौड़ा (पंद्रह-बीस हाथ) और भूजल तक बहुत गहरा होता है।
दिनोंदिन बढ़ती पानी की समस्या से निपटने में यह पाठ आपकी कैसे मदद कर सकता है तथा देश के अन्य राज्यों में इसके लिए क्या उपाय हो रहे हैं? जानें और लिखें।
Answer
उत्तर
पाठ से सीख
- पानी की एक-एक बूँद का महत्त्व – मरुभूमि के लोग वर्षा के जल को अमृत मानकर सहेजते हैं।
- वर्षा-जल संचयन (रेन वॉटर हार्वेस्टिंग) – बरसात का पानी बहने न देकर ज़मीन में रोकना और उपयोग करना।
- पारंपरिक ज्ञान का सम्मान – कुंई, तालाब, बावड़ी जैसे स्थानीय उपाय सस्ते और टिकाऊ हैं।
- संयमित उपयोग – कुंई से रोज़ केवल दो-तीन घड़े पानी निकालना और उसे ‘आराम’ देना – यानी उतना ही उपयोग, जितना पुनर्भरण हो सके।
- सामुदायिक नियंत्रण – साझा जल-स्रोतों पर समाज का अंकुश, ताकि कोई अति-दोहन न करे।
अन्य राज्यों के उपाय
राज्य/क्षेत्र | उपाय |
|---|---|
तमिलनाडु | हर भवन में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य (2001 से) |
महाराष्ट्र | ‘जलयुक्त शिवार’ अभियान; रालेगण सिद्धि (अन्ना हज़ारे) में चेक-डैम और जल-संरक्षण |
राजस्थान (अलवर) | तरुण भारत संघ (राजेंद्र सिंह) द्वारा जोहड़ बनाकर अरवरी जैसी नदियों को पुनर्जीवित करना |
गुजरात | चेक-डैम, खेत-तालाब, सरदार सरोवर नहर |
कर्नाटक/केरल | कल्याणी (सीढ़ीदार कुंड), सुरंगम (पहाड़ी सुरंगें) |
बिहार | आहर-पाइन प्रणाली |
राष्ट्रीय स्तर | जल शक्ति अभियान – ‘कैच द रेन’, अमृत सरोवर योजना, अटल भूजल योजना, जल जीवन मिशन |
पाठ वर्षा-जल संचयन, बूँद-बूँद पानी के महत्त्व, पारंपरिक ज्ञान, संयमित उपयोग और सामुदायिक नियंत्रण की सीख देता है; अन्य राज्यों में तमिलनाडु का अनिवार्य रेन वॉटर हार्वेस्टिंग, अलवर के जोहड़, महाराष्ट्र का जलयुक्त शिवार, अमृत सरोवर और ‘कैच द रेन’ जैसे उपाय हो रहे हैं।
चेजारो के साथ गाँव समाज के व्यवहार में पहले की तुलना में आज क्या फ़र्क आया है? पाठ के आधार पर बताइए।
Answer
उत्तर
पहले का व्यवहार
- कुंई की खुदाई और चिनाई करने वाले चेजारो (चेलवांजी) का पहले दिन से विशेष ध्यान रखा जाता था।
- काम पूरा होने (कुंई में पानी आने) पर उत्सव मनाया जाता और विशेष भोज का आयोजन होता था।
- विदाई के समय उन्हें तरह-तरह की भेंट दी जाती थी।
- संबंध उसी दिन नहीं टूटता था – ‘आच प्रथा’ के अंतर्गत वर्ष भर तीज-त्योहारों, विवाह जैसे मंगल अवसरों पर उन्हें नेग और भेंट दी जाती थी और फ़सल आने पर खलिहान में उनके नाम से अनाज का अलग ढेर लगाया जाता था। यानी वे वर्ष भर सम्मानित होते थे।
आज का व्यवहार
अब केवल मज़दूरी देकर काम करवाने का रिवाज आ गया है। चेजारो के प्रति वह सम्मान, अपनापन और स्थायी संबंध समाप्त हो गया है; उनका काम एक साधारण व्यावसायिक लेन-देन बनकर रह गया है।
पहले चेजारो का विशेष ध्यान रखा जाता, काम पूरा होने पर भोज और भेंट दी जाती और आच प्रथा से वर्ष भर त्योहारों पर नेग व फ़सल में अनाज का हिस्सा मिलता था; अब केवल मज़दूरी देकर काम करवाया जाता है – सम्मान और स्थायी संबंध खत्म हो गए हैं।
निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में कुंइयों पर ग्राम समाज का अंकुश लगा रहता है। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा?
Answer
उत्तर
- निजी: हर परिवार की अपनी कुंई होती है; उसे बनाने और उससे पानी लेने का हक उसी परिवार का होता है।
- सार्वजनिक क्षेत्र: पर कुंई जिस ज़मीन पर बनती है, वह गाँव-समाज की सार्वजनिक ज़मीन होती है। उस क्षेत्र में बरसा पानी ही रेत में नमी बनकर साल भर सुरक्षित रहता है और उसी नमी से सब कुंइयों में पानी रिसता है।
- सीमित नमी: उस क्षेत्र में नमी की कुल मात्रा तो उस वर्ष हुई वर्षा से पहले ही तय हो चुकी है। हर नई कुंई का अर्थ है – पहले से तय नमी का और बँटवारा, जिससे बाकी कुंइयों का पानी घट जाएगा।
- इसलिए समाज का अंकुश: साझा जल-स्रोत के अति-दोहन को रोकने और सबको न्यायपूर्ण पानी मिलता रहे, इसके लिए बहुत ज़रूरत पड़ने पर ही ग्राम-समाज नई कुंई बनाने की स्वीकृति देता है।
इस प्रकार कुंई के मामले में निजी और सार्वजनिक संपत्ति की रेखा विचित्र ढंग से मिट जाती है – यह सामुदायिक संसाधन-प्रबंधन का सुंदर उदाहरण है।
कुंई निजी है पर सार्वजनिक ज़मीन पर बनती है, जहाँ की सीमित नमी (वर्षा से तय) से सब कुंइयों में पानी आता है; हर नई कुंई उस नमी का और बँटवारा है, इसलिए अति-दोहन रोकने और सबके हित के लिए ग्राम-समाज ज़रूरत पड़ने पर ही नई कुंई की अनुमति देता है।
कुंई निर्माण से संबंधित निम्न शब्दों के बारे में जानकारी प्राप्त करें – पालरपानी, पातालपानी, रेजाणीपानी
Answer
उत्तर
मरुभूमि के समाज ने उपलब्ध पानी को तीन रूपों में बाँटा है:
शब्द | अर्थ / जानकारी |
|---|---|
पालरपानी | सीधे बरसात से मिलने वाला पानी, जो धरातल पर बहता है। इसे नदी, तालाब आदि में रोका जाता है। |
पातालपानी | भूजल – ज़मीन के बहुत नीचे का पानी, जो कुओं से निकाला जाता है। मरुभूमि में यह प्रायः खारा होता है। |
रेजाणीपानी | पालरपानी और पातालपानी के बीच का रूप – धरातल से नीचे उतरा, पर पाताल तक न पहुँचा पानी। यह रेत के नीचे खड़िया पत्थर की पट्टी के कारण भूजल में मिल नहीं पाता और नमी के रूप में रहता है। कुंई इसी मीठे पानी को इकट्ठा करती है। (‘रेजा’ – धरातल में समाई वर्षा का माप; जैसे पाँच अंगुल रेजो।) |
पालरपानी – सीधे बरसात से मिलने वाला, धरातल पर बहने वाला पानी (तालाब, नदी); पातालपानी – कुओं से निकलने वाला भूजल (प्रायः खारा); रेजाणीपानी – धरातल में रिसकर खड़िया पट्टी के ऊपर रुका मीठा पानी, जिसे कुंई इकट्ठा करती है।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ कुंई की बनावट और पानी के रूप (प्रश्न 1, 5)
- ☒ जल-संकट और संरक्षण के उपाय (प्रश्न 2)
- ☒ चेजारो और ग्राम-समाज (प्रश्न 3, 4)