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Class 11 Hindi Vitan Chapter 3

NCERT Solutions for Class 11 Hindi Vitan Chapter 3: आलो-आँधारि

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XI

Hindi

Vitan (NCERT)

3 – आलो-आँधारि

2026-27

8 of 8

बिंदु

विवरण

लेखिका

बेबी हालदार; बांग्ला से हिंदी अनुवाद – प्रबोध कुमार (‘तातुश’)

विधा

आत्मकथा-अंश (आलो-आँधारि – उजाला-अँधेरा)

कथा

पति से अलग होकर तीन बच्चों के साथ गुड़गाँव में रहती बेबी घरों में काम करती है; अकेली स्त्री होने के ताने और छेड़छाड़ सहती है; झुग्गी टूटने पर बेघर होती है; तातुश के घर काम पाती है, जहाँ उसे सम्मान, सहारा और पढ़ने-लिखने की प्रेरणा मिलती है

प्रमुख पात्र

बेबी, तातुश (प्रबोध कुमार), उनके बेटे, जेठू (तातुश के मित्र, जो पत्रों से उत्साह बढ़ाते हैं), भोला दा

संदेश

स्त्री की आत्मनिर्भरता, घरेलू कामगारों का संघर्ष, शिक्षा और लेखन से अँधेरे से उजाले की ओर यात्रा

Q1

पाठ के किन अंशों से समाज की यह सच्चाई उजागर होती है कि पुरुष के बिना स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं है। क्या वर्तमान समय में स्त्रियों की इस सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन आया है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

Answer

उत्तर

पाठ के अंश

  1. बेबी को बच्चों के साथ अकेले रहते देख पड़ोसी बार-बार पूछते – “तुम यहाँ अकेली रहती हो? तुम्हारा स्वामी कहाँ रहता है? स्वामी क्यों नहीं आता?” ऐसी बातें सुनकर उसका किसी से बात करने का मन नहीं करता।
  2. मकान-मालकिन बूढ़ी कहती – “कहाँ जाती है रोज़-रोज़? तेरा स्वामी है नहीं, तू तो अकेली ही है! तुझे इतना घूमने-घामने की क्या दरकार?”
  3. काम से लौटने में देर होने पर सब उसे ऐसे देखते जैसे वह कोई अपराध करके आ रही हो।
  4. लोग एक-दूसरे को बताते कि इसका स्वामी नहीं रहता; फिर पुरुष छेड़खानी करने और पानी पीने के बहाने घर आने की कोशिश करते।
  5. झुग्गियाँ टूटने पर दूसरों के घर कोई-न-कोई मर्द (बड़ा लड़का, स्वामी) था, जो सामान समेटकर नया घर खोजने निकल गया, पर बेबी का सामान बिखरा पड़ा रहा।

वर्तमान स्थिति: काफ़ी परिवर्तन आया है, पर पूरा नहीं।

  • परिवर्तन: शिक्षा और रोज़गार से स्त्रियाँ आत्मनिर्भर हो रही हैं; अकेली रहकर नौकरी करने वाली, एकल माताएँ, उद्यमी स्त्रियाँ बढ़ी हैं; कानून (घरेलू हिंसा अधिनियम, कार्यस्थल पर उत्पीड़न विरोधी कानून, संपत्ति में अधिकार) उन्हें सुरक्षा देते हैं; स्त्रियाँ सेना, अंतरिक्ष, राजनीति तक में नेतृत्व कर रही हैं।
  • अभी भी चुनौतियाँ: विशेषकर गाँवों और निम्न वर्ग में अकेली, परित्यक्ता या विधवा स्त्री को आज भी संदेह, ताने और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है; किराये का घर मिलने में कठिनाई; पितृसत्तात्मक सोच बनी हुई है।
प्रश्न 1

पड़ोसियों के “तुम्हारा स्वामी कहाँ है?” जैसे प्रश्न, मकान-मालकिन के ताने, देर से लौटने पर संदेह, पुरुषों की छेड़खानी और घर टूटने पर बिना मर्द के बेबी की असहायता – ये अंश यह सच्चाई दिखाते हैं; आज शिक्षा, रोज़गार और कानून से स्थिति काफ़ी बदली है, पर अकेली स्त्री के प्रति संदेह और असुरक्षा अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

उत्तर

Q2

अपने परिवार से तातुश के घर तक के सफ़र में बेबी के सामने रिश्तों की कौन-सी सच्चाई उजागर होती है?

Answer

उत्तर

  1. खून के रिश्तों का खोखलापन: बेबी के पति ने उसका साथ नहीं दिया – साथ रहकर भी उसने पड़ोसियों की बातों से उसे कभी नहीं बचाया। उसके भाई (दादा लोग) पास ही रहते थे, पर जब उसकी झुग्गी तोड़ दी गई और वह बच्चों के साथ बेघर हो गई, तब भी वे मदद को नहीं आए। माँ बचपन में ही चल बसी थीं, पिता घर पर कम रहते थे।
  2. समाज की संवेदनहीनता: पड़ोसी और मकान-मालिक सहारा देने के बजाय ताने देते, संदेह करते और शोषण की कोशिश करते।
  3. मानवीय रिश्तों की सच्चाई: जो लोग खून के रिश्ते में नहीं थे, उन्होंने सच्चा साथ दिया – भोला दा (एक मुसलमान पड़ोसी) घर टूटने की रात बच्चों के पास बैठा रहा; तातुश ने कहा, “समझो कि मैं तुम्हारा बाप, भाई, माँ, बंधु, सब कुछ हूँ”, उसके बच्चों की पढ़ाई की चिंता की, रहने को जगह दी और लिखने के लिए प्रेरित किया; तातुश के बेटे और जेठू ने भी स्नेह और सम्मान दिया।

निष्कर्ष: बेबी समझ गई कि सच्चे रिश्ते खून से नहीं, प्रेम, सहानुभूति और सम्मान से बनते हैं।

पति और भाइयों जैसे खून के रिश्ते संकट में साथ छोड़ गए और समाज ने ताने दिए, जबकि भोला दा, तातुश, उनके बेटे और जेठू जैसे पराए लोगों ने सच्चा सहारा और सम्मान दिया – बेबी ने जाना कि सच्चे रिश्ते प्रेम और मानवता से बनते हैं, खून से नहीं।

Q3

इस पाठ से घरों में काम करने वालों के जीवन की जटिलताओं का पता चलता है। घरेलू नौकरों को और किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है? इस पर विचार कीजिए।

Answer

उत्तर

पाठ में दिखी जटिलताएँ: काम की तलाश में भटकना, सुबह से दोपहर तक कई घरों में काम, बच्चों की देखभाल न कर पाना, सस्ता घर ढूँढ़ना, झुग्गी टूटने का डर, अकेली स्त्री होने पर ताने और छेड़छाड़।

घरेलू कामगारों की अन्य समस्याएँ

  1. कम वेतन और कोई निश्चित वेतन-ढाँचा नहीं; छुट्टी करने पर पैसे कटना।
  2. काम के घंटे तय नहीं – सुबह से देर रात तक काम; साप्ताहिक छुट्टी नहीं।
  3. सामाजिक सुरक्षा का अभाव – पेंशन, बीमा, चिकित्सा सुविधा, मातृत्व अवकाश नहीं।
  4. दुर्व्यवहार और अपमान – अलग बर्तन, ज़मीन पर बैठाना, चोरी का झूठा आरोप।
  5. शारीरिक और यौन शोषण का ख़तरा, विशेषकर नाबालिग और महिला कामगारों को।
  6. बाल श्रम – कम उम्र के बच्चों से घरेलू काम करवाना।
  7. अपने बच्चों की शिक्षा और देखभाल की कठिनाई।
  8. संगठन और कानूनी पहचान का अभाव – असंगठित क्षेत्र होने से अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना कठिन; किसी भी समय नौकरी से निकाल दिए जाने का डर।
  9. शहरों में आवास की समस्या – झुग्गियों में रहना, शौचालय-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव।

कम और अनिश्चित वेतन, अनिश्चित काम के घंटे, छुट्टी व सामाजिक सुरक्षा का अभाव, दुर्व्यवहार, शोषण, बाल श्रम, अपने बच्चों की देखभाल की कठिनाई, नौकरी की असुरक्षा, संगठन का अभाव और आवास-स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी।

Q4

आलो-आँधारि रचना बेबी की व्यक्तिगत समस्याओं के साथ-साथ कई सामाजिक मुद्दों को समेटे है। किन्हीं दो मुख्य समस्याओं पर अपने विचार प्रकट कीजिए।

Answer

उत्तर

1. अकेली (परित्यक्ता) स्त्री के प्रति समाज का रवैया: बेबी पति से अलग होकर बच्चों के साथ अकेले रहती है, तो समाज उसे संदेह की दृष्टि से देखता है, ताने देता है, और पुरुष उसका शोषण करना चाहते हैं। यह हमारे समाज की पितृसत्तात्मक सोच को दिखाता है, जिसमें स्त्री की पहचान पुरुष से जोड़ी जाती है। मेरे विचार में स्त्री को स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में सम्मान मिलना चाहिए; अकेले रहकर मेहनत से बच्चों को पालने वाली स्त्री साहस और आत्मसम्मान का उदाहरण है। इसके लिए सोच में बदलाव, स्त्री-शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन और कड़े कानूनों की ज़रूरत है।

2. शहरी गरीबी, आवास और बुनियादी सुविधाओं का अभाव: बेबी को सस्ते घर के लिए भटकना पड़ता है; ऐसे घर में शौचालय नहीं, सुबह लंबी कतार और खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है; अंततः उसकी झुग्गी बिना वैकल्पिक व्यवस्था के तोड़ दी जाती है। मेरे विचार में शहरों के विकास में मेहनतकश गरीबों का बड़ा योगदान है, पर उन्हें ही बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। झुग्गियाँ हटाने से पहले पुनर्वास, सस्ते आवास, सार्वजनिक शौचालय और स्वच्छ पानी की व्यवस्था होनी चाहिए।

(अन्य मुद्दे: घरेलू कामगारों का शोषण, स्त्री-शिक्षा का अभाव, बाल-विवाह।)

  1. अकेली स्त्री के प्रति समाज का संदेह और शोषण – सोच में बदलाव, शिक्षा, स्वावलंबन और कानून की ज़रूरत; (2) शहरी गरीबी, आवास-शौचालय का अभाव और बिना पुनर्वास झुग्गियाँ तोड़ना – गरीबों के लिए सस्ते आवास और बुनियादी सुविधाएँ आवश्यक।
Q5

‘तुम दूसरी आशापूर्णा देवी बन सकती हो’ – जेठू का यह कथन रचना संसार के किस सत्य को उद्घाटित करता है?

Answer

उत्तर

जेठू ने बेबी को पत्र में बताया कि प्रसिद्ध बांग्ला लेखिका आशापूर्णा देवी ने केवल बांग्ला पढ़ी थी, वे घर से बहुत कम निकलती थीं, और घर के सारे काम-काज निपटाकर, सबके सो जाने पर चोरी-चोरी लिखती थीं – फिर भी वे महान लेखिका बनीं।

यह कथन रचना-संसार के इस सत्य को उद्घाटित करता है कि:

  1. लेखन के लिए ऊँची डिग्री या विशेष सुविधाएँ ज़रूरी नहीं – सच्चा अनुभव, संवेदना और लगन ही रचना की असली पूँजी हैं।
  2. जीवन का भोगा हुआ यथार्थ ही सबसे सशक्त साहित्य बनता है; बेबी के जीवन-संघर्ष में वह ताक़त है।
  3. परिस्थितियाँ प्रतिभा को रोक नहीं सकतीं – घरेलू काम-काज और अभावों के बीच भी महान रचना संभव है।
  4. साहित्य किसी विशेष वर्ग की बपौती नहीं; हाशिये के लोगों की आवाज़ भी साहित्य बन सकती है।
  5. प्रोत्साहन और सही मार्गदर्शन से साधारण व्यक्ति भी असाधारण रचनाकार बन सकता है – यही हुआ, बेबी हालदार की आत्मकथा अनेक भाषाओं में अनूदित हुई।

यह कथन बताता है कि रचना के लिए डिग्री या सुविधाएँ नहीं, बल्कि भोगा हुआ अनुभव, संवेदना और लगन चाहिए; घरेलू काम और अभावों के बीच भी – आशापूर्णा देवी की तरह – साधारण स्त्री महान रचनाकार बन सकती है।

Q6

बेबी की ज़िंदगी में तातुश का परिवार न आया होता तो उसका जीवन कैसा होता? कल्पना करें और लिखें।

Answer

उत्तर

यदि तातुश का परिवार बेबी के जीवन में न आता, तो संभवतः:

  1. बेबी को स्थायी काम और आश्रय न मिलता; वह कई घरों में कम मज़दूरी पर काम करते हुए दिन-रात भटकती रहती।
  2. झुग्गी टूटने के बाद वह बेघर होकर बच्चों के साथ सड़क या किसी और झुग्गी में रहने को मजबूर होती।
  3. पड़ोसियों के ताने, संदेह और शोषण झेलती रहती; असुरक्षा में जीती।
  4. उसके बच्चों की पढ़ाई छूट जाती; शायद बड़े बेटे की तरह छोटे बच्चे भी कम उम्र में काम पर लग जाते।
  5. उसके भीतर छिपी लेखन-प्रतिभा कभी सामने न आती; उसका जीवन गुमनामी में बीत जाता।
  6. आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की जगह निराशा और हीनता बनी रहती।
  7. उसका जीवन ‘आलो-आँधारि’ का केवल ‘आँधारि’ (अँधेरा) बनकर रह जाता।

तातुश के परिवार ने उसे घर, सम्मान, अपनापन और कलम दी – जिससे वह अँधेरे से उजाले की ओर बढ़ सकी।

तातुश का परिवार न आता तो बेबी स्थायी काम और घर के बिना भटकती, ताने व शोषण सहती, बच्चों की पढ़ाई छूट जाती और उसकी लेखन-प्रतिभा कभी सामने न आती – उसका जीवन गुमनामी और निराशा के अँधेरे में बीत जाता।

Q7

‘सबेरे कोई पेशाब के लिए उसमें घुसता तो दूसरा उसमें घुसने के लिए बाहर खड़ा रहता… मुझे तो यह देख-सुनकर बहुत खराब लगता’ – अनुवाद के नाम पर मात्र अंग्रेज़ी से होने वाले अनुवादों के बीच भारतीय भाषाओं में रची-बसी हिंदी का यह एक अनुकरणीय नमूना है – उपर्युक्त पंक्तियों को ध्यान में रखते हुए बताइए कि इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं।

Answer

उत्तर

मैं इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ।

  1. भारतीय भाषा से सीधा अनुवाद: यह रचना बांग्ला से हिंदी में अनूदित है, अंग्रेज़ी के माध्यम से नहीं। इसलिए इसमें बांग्ला की सहजता और भारतीय जीवन की गंध बनी रहती है। अंग्रेज़ी से हुए अनुवादों में अक्सर भाषा कृत्रिम, किताबी और भावहीन हो जाती है।
  2. बोलचाल की सहज भाषा: उद्धृत पंक्तियों में आम आदमी की बोलचाल वाली हिंदी है – “बोतल सँभालें या सुअर भगाएँ!” जैसे वाक्य दृश्य को जीवंत कर देते हैं।
  3. बांग्ला शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग: पाठ में ‘स्वामी’ (पति), ‘दादा’ (बड़ा भाई), ‘मा’, ‘दरकार’, ‘पाड़ा’ (मोहल्ला), ‘भाड़ा’ जैसे शब्द भाषा को स्थानीय रंग देते हैं, फिर भी हिंदी पाठक को अर्थ समझने में कठिनाई नहीं होती।
  4. यथार्थ का सजीव चित्रण: शौचालय की कमी, लंबी कतार, खुले में शौच और सुअरों की परेशानी – गरीबों की वास्तविक कठिनाई का मार्मिक, ईमानदार और बिना लाग-लपेट का चित्रण है।
  5. लेखिका की आवाज़ बची रही: अनुवादक ने बेबी की सरल, भोली और सीधी आवाज़ को बनाए रखा है।

अतः यह अनुवाद दिखाता है कि भारतीय भाषाओं के बीच सीधा अनुवाद अधिक जीवंत, प्रामाणिक और आत्मीय होता है।

पूरी तरह सहमत – बांग्ला से सीधे हुए इस अनुवाद में बोलचाल की सहज हिंदी, बांग्ला शब्दों का स्वाभाविक मेल, यथार्थ का सजीव चित्रण और लेखिका की सरल आवाज़ बची है, जो अंग्रेज़ी के माध्यम से हुए कृत्रिम अनुवादों में प्रायः नहीं मिलती।

Q8

चर्चा करें – पाठ में आए इन व्यक्तियों का देश के लिए विशेष रचनात्मक महत्त्व है। इनके बारे में जानकारी प्राप्त करें और कक्षा में चर्चा करें: श्री रामकृष्ण, रवींद्रनाथ ठाकुर, काज़ी नज़रुल इस्लाम, शरत्चंद्र, सत्येंद्रनाथ दत्त, सुकुमार राय, ऐनी फ्रैंक।

Answer

उत्तर

व्यक्ति

परिचय और महत्त्व

श्री रामकृष्ण परमहंस (1836–1886)

बंगाल के महान संत, दक्षिणेश्वर काली मंदिर के पुजारी; सर्वधर्म समभाव का संदेश – “जितने मत, उतने पथ”; स्वामी विवेकानंद के गुरु।

रवींद्रनाथ ठाकुर (1861–1941)

‘गुरुदेव’; गीतांजलि के लिए 1913 में साहित्य का नोबेल पाने वाले पहले एशियाई; भारत (‘जन गण मन’) और बांग्लादेश (‘आमार सोनार बांग्ला’) के राष्ट्रगानों के रचयिता; शांतिनिकेतन/विश्वभारती के संस्थापक।

काज़ी नज़रुल इस्लाम (1899–1976)

‘विद्रोही कवि’; अंग्रेज़ी शासन, अन्याय और सांप्रदायिकता के विरुद्ध ओजस्वी कविताएँ (‘विद्रोही’); हज़ारों गीत (नज़रुल गीति); बांग्लादेश के राष्ट्रकवि।

शरत्चंद्र चट्टोपाध्याय (1876–1938)

लोकप्रिय बांग्ला उपन्यासकार – देवदास, परिणीता, श्रीकांत, चरित्रहीन; स्त्रियों और साधारण लोगों के दुख का मार्मिक चित्रण; ‘आवारा मसीहा’ उन्हीं की जीवनी है।

सत्येंद्रनाथ दत्त (1882–1922)

बांग्ला कवि, ‘छंद के जादूगर’; छंदों के नए प्रयोग, अनुवाद-कविताएँ और देशभक्ति की रचनाएँ।

सुकुमार राय (1887–1923)

बांग्ला बाल-साहित्य के अग्रणी; हास्य और बेतुकी कविताएँ (आबोल ताबोल), हजबरल; फ़िल्मकार सत्यजित राय के पिता।

ऐनी फ्रैंक (1929–1945)

यहूदी किशोरी, जिसने नाज़ी अत्याचार के समय एम्स्टर्डम में छिपकर रहते हुए डायरी लिखी; द डायरी ऑफ़ ए यंग गर्ल युद्ध की क्रूरता और मानवीय आशा का अमर दस्तावेज़; यातना-शिविर में मृत्यु।

चर्चा का निष्कर्ष: इन सभी ने अपनी रचनाओं और विचारों से समाज को मानवता, साहस, स्वतंत्रता और सृजन की प्रेरणा दी। बेबी के लिए ये प्रेरणा के स्रोत बने – विशेषकर ऐनी फ्रैंक, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी लिखना नहीं छोड़ा।

रामकृष्ण (सर्वधर्म समभाव के संत), रवींद्रनाथ (नोबेल विजेता, राष्ट्रगान-रचयिता), नज़रुल (विद्रोही कवि), शरत्चंद्र (देवदास के उपन्यासकार), सत्येंद्रनाथ दत्त (छंदों के जादूगर), सुकुमार राय (बाल-साहित्यकार) और ऐनी फ्रैंक (युद्धकालीन डायरी-लेखिका) – सभी ने रचना से समाज को प्रेरणा दी।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ अकेली स्त्री और समाज (प्रश्न 1, 4)
  • ☒ रिश्तों की सच्चाई और तातुश का परिवार (प्रश्न 2, 6)
  • ☒ घरेलू कामगारों का जीवन (प्रश्न 3)
  • ☒ लेखन, अनुवाद और प्रेरक व्यक्तित्व (प्रश्न 5, 7, 8)

Total questions answered: 8 of 8

Frequently Asked Questions

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All 9 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step.

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How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

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Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.