Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Antral (NCERT) | 2 – बिस्कोहर की माटी | 2026-27 | 12 of 12 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | विश्वनाथ त्रिपाठी (जन्म 1931, बिस्कोहर, सिद्धार्थनगर, उत्तर प्रदेश); आलोचक |
स्रोत | आत्मकथा ‘नंगातलाई का गाँव’ का अंश |
पात्र | ‘बिसनाथ’ — स्वयं लेखक; माँ; कसेरिन दाई; बिस्कोहर की एक स्त्री |
विषय | गाँव बिस्कोहर का प्राकृतिक परिवेश — कमल, कोइयाँ, हरसिंगार, कदंब, सरसों के फूल; साँप (डोंड़हा, मजगिदवा, धामिन, गोंहुअन, घोर कड़ाइच, भटिहा); गरमी, वर्षा, शरद; माँ की ममता; बचपन की स्मृतियाँ |
शैली | आत्मकथात्मक, आंचलिक बोली के संवाद, बिंबात्मक, संस्मरणात्मक |
कोइयाँ किसे कहते हैं? उसकी विशेषताएँ बताइए।
Answer
उत्तर
कोइयाँ एक जलपुष्प है, जिसे कुमुद और कोका-बेली भी कहते हैं।
विशेषताएँ: 1. यह शरद ऋतु में फूलती है— जहाँ भी गड्ढा हो और उसमें पानी भरा हो, वहाँ कोइयाँ खिल उठती हैं। 2. रेलवे-लाइन के दोनों ओर गड्ढों में भरे पानी में यह प्रायः दिखाई देती है; उत्तर भारत में सर्वत्र पाई जाती है— लेखक ने इसे पंजाब में भी देखा। 3. शरद की चाँदनी में सरोवरों में चाँदनी का प्रतिबिंब और खिली हुई कोइयाँ की पत्तियाँ एक हो जाती हैं। 4. इसकी विशेष गंध होती है, जिसे पसंद करने वाला ही जानता है। 5. गाँव में कमल से कहीं ज़्यादा बहार कोइयाँ की थी।
कोइयाँ जलपुष्प कुमुद (कोका-बेली) है। यह शरद में पानी भरे गड्ढों/तालाबों में खिलती है, रेलवे-लाइन के किनारे और पूरे उत्तर भारत में मिलती है, चाँदनी रात में इसकी पत्तियाँ और चाँदनी का प्रतिबिंब एक हो जाते हैं, और इसकी विशेष गंध होती है।
‘बच्चे का माँ का दूध पीना सिर्फ़ दूध पीना नहीं, माँ से बच्चे के सारे संबंधों का जीवन-चरित होता है’—टिप्पणी कीजिए।
Answer
उत्तर
लेखक के अनुसार माँ का दूध पीना केवल पोषण की क्रिया नहीं, बल्कि माँ और बच्चे के बीच के पूरे भावनात्मक संबंध की कहानी है— 1. दूध पीते समय बच्चा सुबुकता है, रोता है, माँ को मारता है; माँ भी कभी-कभी मारती है, पर बच्चा चिपटा रहता है और माँ चिपटाए रहती है— इसमें प्रेम, रूठना, मनाना सब है। 2. बच्चा माँ के पेट का स्पर्श और गंध भोगता है, मानो पेट में अपनी जगह ढूँढ़ता हो— यह जन्म से पहले के संबंध की निरंतरता है। 3. बिसनाथ ने दाँत निकलते समय माँ को काट लिया, माँ ने थप्पड़ मारा, फिर नाउन से कहा— “दाँत निकाले है, टीसत है”— इसमें माँ की समझ और ममता दोनों हैं। 4. चाँदनी रात में दूध पीता बच्चा “दूध ही नहीं, चाँदनी भी पी रहा है”। 5. “माँ के अंक से लिपटकर माँ का दूध पीना, जड़ के चेतन होने यानी मानव-जन्म लेने की सार्थकता है।”
इस प्रकार दूध पीने में ममता, सुरक्षा, स्पर्श, स्नेह, रूठना-मनाना— माँ-बच्चे के पूरे संबंध का जीवन-चरित समाया है।
दूध पीते समय बच्चे का रोना, मारना, चिपटना, माँ का मारना-पुचकारना-चिपटाए रखना, माँ के स्पर्श और गंध का अनुभव — इन सबमें माँ-बच्चे के प्रेम, सुरक्षा और ममता का पूरा संबंध समाया होता है; लेखक इसे मानव-जन्म की सार्थकता मानता है, केवल पोषण नहीं।
बिसनाथ पर क्या अत्याचार हो गया?
Answer
उत्तर
बिसनाथ अभी माँ का दूध पीने ही वाले थे कि उनका छोटा भाई पैदा हो गया। “बिसनाथ दूध कटहा हो गए”— उनका दूध छूट गया और माँ के दूध पर छोटे भाई का कब्ज़ा हो गया। छोटा भाई हुमक-हुमककर माँ का दूध पीता और बिसनाथ को गाय का बेस्वाद दूध पीना पड़ता। उन्हें माँ की गोद और ममता से वंचित होना पड़ा; पड़ोस की कसेरिन दाई ने उन्हें पाला-पोसा। लेखक ने इसे अपने ऊपर हुआ “अत्याचार” कहा है।
छोटे भाई के जन्म के कारण बिसनाथ का माँ का दूध छूट गया (‘दूध कटहा’ हो गए); माँ के दूध पर छोटे भाई का अधिकार हो गया और उन्हें गाय का बेस्वाद दूध पीना पड़ा, तथा कसेरिन दाई ने उन्हें पाला।
गरमी और लू से बचने के उपायों का विवरण दीजिए। क्या आप भी उन उपायों से परिचित हैं?
Answer
उत्तर
पाठ में वर्णित उपाय: 1. माँ लू से बचाने के लिए धोती या कमीज़ में गाँठ लगाकर प्याज़ बाँध देती थीं। 2. लू लगने की दवा थी कच्चे आम का पन्ना— कच्चे आम को भूनकर गुड़ या चीनी में उसका शरबत पीना। 3. कच्चे आम का पन्ना देह पर लेपना और उससे नहाना। 4. कच्चे आम को भूनकर या उबालकर उससे सिर धोना।
हाँ, मैं इन उपायों से परिचित हूँ। हमारे घर में भी गरमियों में आम पन्ना बनता है। इसके अलावा— खूब पानी पीना, नींबू पानी, छाछ, बेल का शरबत, सत्तू का घोल, ओआरएस; दोपहर में बाहर न निकलना; सिर ढककर (गमछा, टोपी, छाता) निकलना; हलके सूती कपड़े पहनना; तरबूज़, खीरा, ककड़ी जैसे पानी वाले फल खाना।
पाठ में: धोती/कमीज़ में प्याज़ बाँधना, कच्चे आम का पन्ना पीना, उसे देह पर लेपना, उससे नहाना और सिर धोना। मैं भी परिचित हूँ — आम पन्ना के साथ खूब पानी, नींबू पानी, छाछ, बेल शरबत, सत्तू, ओआरएस, दोपहर में बाहर न निकलना, सिर ढकना, सूती कपड़े और तरबूज़-खीरा खाना।
लेखक बिसनाथ ने किन आधारों पर अपनी माँ की तुलना बत्तख से की है?
Answer
उत्तर
लेखक ने दिलशाद गार्डन के डियर पार्क में एक बत्तख को अंडे सेते देखा— 1. बत्तख अंडा देने के लिए पानी छोड़कर ज़मीन पर सुरक्षित बाड़े में आ गई। 2. वह पंख फुलाए अंडों को छिपाए थी— दुनिया से बचाए हुए। 3. कुछ अंडे डैनों से बाहर छिटक जाते तो वह अपनी सख़्त चोंच से उन्हें इतनी सतर्कता और कोमलता से फिर डैनों के अंदर छिपा लेती कि नाज़ुक खोल न टूटे। 4. उसकी निगाह ताक में बैठे कौवे पर भी थी— सजगता। 5. वह कभी-कभी अंडों को सावधानी से उलटती-पलटती भी।
इसी प्रकार लेखक की माँ भी उन्हें अपने आँचल में छिपाकर दूध पिलाती थी, उनकी रक्षा करती थी, उन्हें स्नेह और सुरक्षा देती थी। लेखक कहता है— “किसने दी बिसनाथ की माँ और बत्तख की माँ को इतनी ममता?… माँ में बच्चे की ममता-प्रकृति में ही सब कुछ है।” अतः ममता, सुरक्षा, सतर्कता और कोमलता के आधार पर उन्होंने माँ की तुलना बत्तख से की।
बत्तख जैसे अंडों को पंखों में छिपाकर दुनिया से बचाती, छिटके अंडों को सख़्त चोंच से कोमलता से वापस समेटती, कौवे पर नज़र रखती और अंडों को सावधानी से उलटती-पलटती है, वैसे ही माँ भी आँचल में छिपाकर दूध पिलाती और बच्चे की रक्षा करती है — ममता, सुरक्षा, सतर्कता और कोमलता के आधार पर तुलना की गई है।
बिस्कोहर में हुई बरसात का जो वर्णन बिसनाथ ने किया है उसे अपने शब्दों में लिखिए।
Answer
उत्तर
बिस्कोहर में वर्षा अचानक नहीं आती थी। पहले बादल घिरते, गड़गड़ाहट होती और पूरा आकाश बादलों से ऐसा ढक जाता कि दिन में ही रात हो जाती। वर्षा आती हुई दिखाई देती थी— लेखक के घर की छत से ऐसा लगता जैसे दूर से घोड़ों की कतार दौड़ी चली आ रही हो— पहले नदी पर बरसती, फिर डेगहर पर, फिर बड़की बगिया पर, फिर पड़ोस के घर पर टप-टप-टप। आँधी चलती तो टीन-छप्पर उड़ जाते; कई दिन लगातार बरसने पर दीवारें गिरतीं, घर धँस जाते, बाढ़ आ जाती।
भीषण गरमी के बाद बरसात में कुत्ते, बकरी, मुर्गे-मुर्गी प्रसन्न होकर इधर-उधर भागते-थिरकते। पहली वर्षा में नहाने से दाद-खाज, फोड़े-फुंसी ठीक हो जाते, पर मछलियाँ कभी-कभी फेन (माँजा) लगने से मर जातीं। जोंक, केंचुए, जुगनू, मच्छर आदि कीड़े-मकोड़ों की बहुतायत हो जाती; वनस्पतियों की नई हरी आभा छा जाती। साथ ही कीचड़, गंदगी और बदबू भी होती; बाढ़ में खेत-खलिहान भर जाते, शौच की भारी तकलीफ़ होती और गीली लकड़ी-कंडों से घर धुएँ से भर जाता। वर्षा के बाद धरती, आकाश, तालाब और बूढ़ी राप्ती नदी निखर उठते; धान, भुट्टे, खीरे, तोरी आदि के पौधे झूमने लगते।
बादल घिरते, गड़गड़ाहट होती, दिन में रात हो जाती; वर्षा घोड़ों की कतार की तरह दूर से आती दिखती — नदी, डेगहर, बगिया, फिर पड़ोस पर टप-टप। आँधी से छप्पर उड़ते, लगातार बारिश से दीवारें गिरतीं और बाढ़ आती। पशु-पक्षी प्रसन्न होते, पहली बारिश में नहाने से फोड़े-फुंसी ठीक होते, कीड़े-मकोड़े और हरियाली बढ़ती; पर कीचड़, बदबू, बाढ़, शौच की तकलीफ़ और गीले ईंधन का धुआँ भी होता। वर्षा के बाद धरती, तालाब, नदी निखर उठते और फसलें झूमने लगतीं।
‘फूल केवल गंध ही नहीं देते दवा भी करते हैं’, कैसे?
Answer
उत्तर
पाठ में फूलों के औषधीय उपयोग बताए गए हैं— 1. भरभंडा (सत्यानाशी): आँखें आने (आँख दुखने) पर माँ उसका दूध आँख में लगाती थीं। 2. नीम के फूल और पत्ते: चेचक में रोगी के पास रख दिए जाते थे। 3. बेर के फूल: बेर का फूल सूँघकर बर्रे-ततैया का डंक झड़ जाता है। 4. गुड़हल: देवी का फूल माना जाता था; फूलों की गंध से महामारी आदि का संबंध जोड़ा जाता था।
इस प्रकार गाँवों में शहरी दवाइयों के स्थान पर फूल-पत्तियाँ ही औषधि का काम करती थीं। (आयुर्वेद में भी गुलाब, हरसिंगार, गेंदा, तुलसी आदि के फूल-पत्तियों के औषधीय गुण बताए गए हैं।)
भरभंडा (सत्यानाशी) का दूध आँख आने पर लगाया जाता, नीम के फूल-पत्ते चेचक के रोगी के पास रखे जाते, बेर का फूल सूँघने से बर्रे-ततैया का डंक झड़ जाता — गाँवों में फूल गंध के साथ औषधि का भी काम करते थे।
‘प्रकृति सजीव नारी बन गई’—इस कथन के संदर्भ में लेखक की प्रकृति, नारी और सौंदर्य संबंधी मान्यताएँ स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
दस वर्ष की आयु में बिसनाथ ने बढ़नी में एक स्त्री को देखा, जो उनसे लगभग दस वर्ष बड़ी थी। उसे देखकर उन्हें लगा “चाँदनी रात में, बरसात की चाँदनी रात में जूही की खुशबू आ रही है”। वह उन्हें स्त्री के रूप में नहीं, “जूही की लता बन गई चाँदनी के रूप में” लगी— “प्रकृति सजीव नारी बन गई थी और बिसनाथ उसमें आकाश, चाँदनी, सुगंधि सब देख रहे थे।”
लेखक की मान्यताएँ: 1. प्रकृति और नारी की एकता: लेखक के लिए नारी प्रकृति का ही सजीव रूप है; चाँदनी, फूल, खुशबू— सब प्रकृति हैं और नारी उन सबका समन्वित रूप। 2. सौंदर्य = प्रकृति से जुड़ाव: सौंदर्य कृत्रिम श्रृंगार में नहीं, प्रकृति के सहज रूपों में है। नारी शरीर से उन्हें बिस्कोहर की फसलों, वनस्पतियों, तालाब की मिट्टी, गेहूँ, भुट्टे, पुआल की गंध आती है। 3. पवित्र, अलौकिक सौंदर्य: उनका प्रेम-भाव वासनामय नहीं, बल्कि पवित्र और आध्यात्मिक है— “सौंदर्य क्या होता है, तदाकार परिणति क्या होती है? जीवन की सार्थकता क्या होती है”— यह सब उन्होंने उसी के संदर्भ में समझा। 4. सौंदर्य कला का स्रोत: वह नारी संगीत, नृत्य, मूर्ति, कविता, चित्र— हर कला के आस्वाद में उपस्थित है; “अप्राप्ति की कितनी और कैसी प्राप्तियाँ होती हैं!” 5. सौंदर्य में करुणा: उस स्मृति के साथ मृत्यु का बोध जुड़ा है— सौंदर्य के साथ वेदना और क्षणभंगुरता भी।
बचपन में देखी स्त्री लेखक को जूही की लता बनी चाँदनी जैसी लगी — “प्रकृति सजीव नारी बन गई”। लेखक के अनुसार नारी प्रकृति का सजीव रूप है; सौंदर्य कृत्रिमता में नहीं, प्रकृति के सहज रूपों (चाँदनी, फूल, फसलों की गंध) में है; यह सौंदर्य-बोध पवित्र, अलौकिक है, हर कला के आस्वाद का स्रोत है, और उसमें अप्राप्ति की वेदना तथा मृत्यु-बोध भी जुड़ा है।
ऐसी कौन सी स्मृति है जिसके साथ लेखक को मृत्यु का बोध अजीब तौर से जुड़ा मिलता है?
Answer
उत्तर
लेखक को बिस्कोहर की उस स्त्री की स्मृति के साथ मृत्यु का बोध जुड़ा मिलता है, जिसे उन्होंने दस वर्ष की आयु में देखा था और जो उन्हें प्रकृति का सजीव रूप लगी थी। वह स्मृति उनके लिए हर दुख-सुख से जुड़ने का सेतु है। जब वे बड़े गुलाम अली खाँ की पहाड़ी ठुमरी “अब तो आओ साजन” सुनते हैं, तो वही स्त्री उसमें व्याकुल दिखाई देती है— सफ़ेद साड़ी पहने, घने काले केश सँवारे, आँखों में आर्द्र व्यथा लिए, सिर्फ़ इंतज़ार करती हुई। सफ़ेद साड़ी (वैधव्य/शोक), इंतज़ार, व्यथा और अप्राप्ति की यह छवि उनके मन में मृत्यु और वियोग के बोध से जुड़ जाती है— “इस स्मृति के साथ मृत्यु का बोध अजीब तौर पर जुड़ा हुआ है।”
बचपन में देखी बिस्कोहर की उस स्त्री की स्मृति, जो उन्हें प्रकृति का सजीव रूप लगी थी; ठुमरी “अब तो आओ साजन” सुनते समय वह सफ़ेद साड़ी में, आँखों में व्यथा लिए इंतज़ार करती दिखती है — इस अप्राप्ति, वियोग और व्यथा की छवि के साथ लेखक को मृत्यु का बोध जुड़ा मिलता है।
योग्यता-विस्तार
पाठ में आए फूलों के नाम, साँपों के नाम छाँटिए और उनके रूप, रंग, विशेषताओं के बारे में लिखिए।
Answer
उत्तर
फूल
फूल | रूप, रंग, विशेषता |
|---|---|
कमल | गुलाबी/सफ़ेद जलपुष्प; पत्ते (पुरइन) पर भोज परोसा जाता; नाल (भसीण) अकाल में खाई जाती |
कोइयाँ (कुमुद) | सफ़ेद जलपुष्प; शरद में खिलती; विशिष्ट गंध |
सिंघाड़े के फूल | उजले, गंधयुक्त |
हरसिंगार | सफ़ेद पंखुड़ियाँ, नारंगी डंठल; शरद में रात को खिलकर झड़ता; पितृपक्ष में |
कदंब | गोल, पीले-नारंगी; श्रीकृष्ण से जुड़ा |
सरसों | पीले; खेतों में “पीला सागर” |
भरभंडा (सत्यानाशी) | पीली तितली जैसा; दूध आँख की दवा |
जूही | छोटे सफ़ेद, सुगंधित |
गुड़हल | लाल; देवी का फूल |
नीम | छोटे सफ़ेद; मादक, गंभीर गंध; चेचक में प्रयोग |
बेर | वन्य, मादक गंध |
तोरी, लौकी, भिंडी, कोंहड़ा, बैंगन | सब्ज़ियों के पीले/सफ़ेद/बैंगनी फूल |
आम के बौर, सेमल, धान-गेहूँ-जौ-भुट्टे के फूल | — |
साँप
साँप | विशेषता |
|---|---|
डोंड़हा | विषहीन; मारा नहीं जाता; “साँपों में वामन जाति” का माना जाता |
मजगिदवा | विषहीन |
धामिन | विषहीन, लंबी; मुँह से कुश पकड़कर पूँछ से मारे तो अंग सड़ जाए (लोक-विश्वास) |
गोंहुअन (फेंटारा) | सबसे खतरनाक, विषैला (नाग) |
घोर कड़ाइच | उतना ही खतरनाक; काटने पर आदमी घोड़े की तरह हिनहिनाकर मरे |
भटिहा | दो मुँह वाला |
फूल: कमल, कोइयाँ, सिंघाड़े के फूल, हरसिंगार, कदंब, सरसों, भरभंडा, जूही, गुड़हल, नीम, बेर तथा सब्ज़ियों-अनाजों के फूल (रूप-रंग-विशेषता सहित)। साँप: डोंड़हा और मजगिदवा (विषहीन), धामिन (विषहीन, लंबी), गोंहुअन/फेंटारा और घोर कड़ाइच (अत्यंत विषैले), भटिहा (दो मुँह वाला)।
इस पाठ से गाँव के बारे में आपको क्या-क्या जानकारियाँ मिलीं? लिखिए।
Answer
उत्तर
- प्रकृति से निकटता: गाँव का जीवन प्रकृति पर निर्भर है; तालाब, पोखर, नदी (बूढ़ी राप्ती), खेत, पेड़-पौधे, फूल— सब जीवन का अंग हैं; बच्चे प्रकृति को छूते, पहचानते, उससे बतियाते हैं।
- खान-पान और रीति-रिवाज: भोज में कमल-पत्र (पुरइन) पर भोजन परोसना; अकाल में कमल-ककड़ी खाना; पितृपक्ष में मालिन का हरसिंगार रख जाना।
- लोक-चिकित्सा: फूल-पत्तियों से इलाज— आम पन्ना, प्याज़, नीम, भरभंडा।
- लोक-विश्वास: साँपों, फूलों और देवी-देवताओं से जुड़ी मान्यताएँ; चंदा मामा में बुढ़िया।
- ऋतुओं का प्रभाव: गरमी में लू, वर्षा में बाढ़-कीचड़-कीड़े, शरद में निखरी प्रकृति।
- कठिनाइयाँ: बाढ़, घर गिरना, शौच की समस्या, गीला ईंधन, साँप-बिच्छू का डर।
- सामाजिक जीवन: पड़ोसियों का अपनापन (कसेरिन दाई ने बिसनाथ को पाला), नाउन, मालिन आदि की भूमिका।
- आंचलिक भाषा: “कुरइ जात रहीं”, “दाँत निकाले है, टीसत है”, “जे तुम्हैं पाइ जाइ…”।
गाँव का प्रकृति पर निर्भर और उससे जुड़ा जीवन; कमल-पत्र पर भोज, अकाल में कमल-ककड़ी; फूल-पत्तियों से लोक-चिकित्सा; साँपों-देवी-देवताओं से जुड़े लोक-विश्वास; ऋतुओं का प्रभाव; बाढ़, साँप-बिच्छू, शौच, ईंधन की कठिनाइयाँ; पड़ोसियों का अपनापन (कसेरिन दाई); और आंचलिक बोली।
वर्तमान समय-समाज में माताएँ नवजात शिशु को दूध नहीं पिलाना चाहतीं। आपके विचार से माँ और बच्चे पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है?
Answer
उत्तर
कारण: कामकाजी जीवन की व्यस्तता, कार्यस्थल पर सुविधाओं का अभाव, सौंदर्य/शारीरिक बनावट की चिंता, डिब्बाबंद दूध (फ़ॉर्मूला) के विज्ञापनों का प्रभाव, जागरूकता की कमी।
बच्चे पर प्रभाव: 1. माँ का दूध (विशेषकर पहला गाढ़ा दूध— कोलोस्ट्रम) संपूर्ण पोषण और रोग-प्रतिरोधक क्षमता देता है; इसके अभाव में बच्चा दस्त, निमोनिया, संक्रमण, एलर्जी और कुपोषण का शिकार हो सकता है। 2. बोतल के दूध से पाचन-संबंधी समस्याएँ और मोटापे का ख़तरा बढ़ता है। 3. माँ के स्पर्श, गंध और ममता की कमी से भावनात्मक जुड़ाव कमज़ोर पड़ता है— लेखक के शब्दों में यह “माँ से बच्चे के सारे संबंधों का जीवन-चरित” है।
माँ पर प्रभाव: 1. स्तनपान से माँ में स्तन कैंसर, अंडाशय कैंसर का ख़तरा कम होता है और प्रसव के बाद शरीर जल्दी स्वस्थ होता है; इससे वंचित होना माँ के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। 2. माँ-बच्चे के आत्मीय संबंध और मातृत्व के सुख से वंचित होना।
सुझाव: विशेषज्ञ कम-से-कम छह माह तक केवल स्तनपान की सलाह देते हैं; कार्यस्थलों पर शिशु-गृह और मातृत्व अवकाश, जागरूकता अभियान आवश्यक हैं।
माँ का दूध न मिलने से बच्चे की रोग-प्रतिरोधक क्षमता और पोषण घटता है (संक्रमण, दस्त, कुपोषण, एलर्जी), और माँ-बच्चे का भावनात्मक जुड़ाव कमज़ोर होता है; माँ भी स्तनपान के स्वास्थ्य-लाभ (कैंसर का कम ख़तरा, जल्दी स्वास्थ्य-लाभ) और मातृत्व के आत्मीय सुख से वंचित रहती है। छह माह तक स्तनपान, मातृत्व अवकाश, शिशु-गृह और जागरूकता आवश्यक हैं।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ कोइयाँ, माँ का दूध, बिसनाथ पर अत्याचार (प्रश्न 1–3)
- ☒ लू से बचाव, बत्तख और माँ, बरसात (प्रश्न 4–6)
- ☒ फूल-दवा, प्रकृति-नारी-सौंदर्य, मृत्यु-बोध (प्रश्न 7–9)
- ☒ फूल-साँप, गाँव की जानकारी, स्तनपान (प्रश्न 10–12)