Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
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XII | Hindi | Antral (NCERT) | 3 – अपना मालवा—खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में | 2026-27 | 10 of 10 |
बिंदु | विवरण |
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लेखक | प्रभाष जोशी (1937–2009), इंदौर (मालवा); पत्रकार, ‘जनसत्ता’ के संस्थापक संपादक |
स्रोत | ‘जनसत्ता’ (1 अक्टूबर 2006) का ‘कागद कारे’ स्तंभ |
विधा | रिपोर्ताज/यात्रा-वृत्त |
विषय | नवरात्रि के समय मालवा की यात्रा — भरपूर वर्षा से भरी नदियाँ (नर्मदा, शिप्रा, चंबल, गंभीर, पार्वती, कालीसिंध, चोरल) और तालाब; पुरानी कहावत “मालव धरती गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर” |
चिंता | तालाबों का गाद से भरना, भूजल का अंधाधुंध दोहन, नदियों का गंदे नालों में बदलना; “विकास की औद्योगिक सभ्यता… उजाड़ की अपसभ्यता है”; अमेरिका-यूरोप की कार्बन-उत्सर्जक “खाऊ-उजाड़ू जीवन पद्धति” और ग्लोबल वार्मिंग |
परंपरा | विक्रमादित्य, भोज, मुंज ने तालाब-बावड़ियाँ बनवाकर पानी रोकने का प्रबंध किया था |
मालवा में जब सब जगह बरसात की झड़ी लगी रहती है तब मालवा के जनजीवन पर इसका क्या असर पड़ता है?
Answer
उत्तर
सकारात्मक प्रभाव: 1. नदी-नाले, कुएँ-बावड़ियाँ, तालाब-तलैया लबालब भर जाते हैं; भूजल स्तर बढ़ता है। 2. फसलें लहलहा उठती हैं; पूरा मालवा हरा-भरा हो जाता है— “विपुलता की आश्वस्ति” मिलती है। 3. सोयाबीन की फसल भले गल जाए, पर गेहूँ-चने की अच्छी फसल की आशा बढ़ जाती है। 4. लोगों में उत्सव का उल्लास रहता है— “खूब मनाओ दसेरा-दिवाली। अबकी मालवो खूब पाक्यो हे।” 5. पुरानी कहावत “डग-डग रोटी, पग-पग नीर” सच होती लगती है; लोगों को पुराने दिन याद आते हैं।
नकारात्मक प्रभाव: 1. नवरात्रि में घर-आँगन लीपने, रंगोली सजाने, त्योहार की तैयारी में बाधा आती है। 2. नदियों में बाढ़ आ जाती है— उज्जैन में शिप्रा का पानी घरों में घुस गया; पार्वती और कालीसिंध के पुलों पर से पानी बहता रहा, रास्ते रुक गए। 3. सोयाबीन जैसी फसलें गल जाती हैं। 4. बाँधों के फाटक खोलने पड़ते हैं (गाँधी सागर, यशवंत सागर)।
भरपूर वर्षा से नदी-नाले, कुएँ-तालाब लबालब भर जाते हैं, फसलें लहलहाती हैं, गेहूँ-चने की अच्छी फसल की आशा और त्योहारों का उल्लास बढ़ता है; पर साथ ही त्योहारों की तैयारी में बाधा, बाढ़ (शिप्रा का पानी घरों में, पुलों पर पानी), रास्ते बंद होना और सोयाबीन की फसल गलना जैसी समस्याएँ भी होती हैं।
अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता जैसा गिरा करता था। उसके क्या कारण हैं?
Answer
उत्तर
- खाऊ-उजाड़ू औद्योगिक सभ्यता: औद्योगीकरण और उपभोक्तावादी जीवन-पद्धति से पर्यावरण का विनाश हुआ है।
- ग्लोबल वार्मिंग: कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों के कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है; समुद्र गरम हो रहे हैं, ध्रुवों की बर्फ़ पिघल रही है और मौसम-चक्र बिगड़ गया है।
- तालाबों की उपेक्षा: आज के नियोजकों और इंजीनियरों ने पुराने तालाबों को गाद से भर जाने दिया; वर्षा का पानी रोका नहीं जाता।
- भूजल का अंधाधुंध दोहन: “ज़मीन के पानी को पाताल से भी निकाल लिया”, जिससे नदी-नाले सूख गए।
- वनों की कटाई और शहरीकरण: पहाड़ों और जंगलों के नष्ट होने से वर्षा और जल-स्रोतों पर असर।
- नदियों का प्रदूषण: नदियाँ गंदे नालों में बदल गई हैं।
खाऊ-उजाड़ू औद्योगिक सभ्यता से पर्यावरण-विनाश, कार्बन-उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग और बिगड़ा मौसम-चक्र, तालाबों का गाद से भरना और पानी न रोकना, भूजल का अंधाधुंध दोहन, वनों की कटाई-शहरीकरण और नदियों का प्रदूषण — इन कारणों से मालवा में अब वैसा पानी नहीं गिरता।
हमारे आज के इंजीनियर ऐसा क्यों समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले ज़माने के लोग कुछ नहीं जानते थे?
Answer
उत्तर
लेखक व्यंग्य करता है कि आज के इंजीनियर समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले के लोग कुछ नहीं जानते थे, “क्योंकि ज्ञान तो पश्चिम के रिनेसां के बाद ही आया न!”
कारण: 1. वे पश्चिमी शिक्षा और आधुनिक तकनीक को ही ज्ञान मानते हैं; भारतीय परंपरागत ज्ञान को पिछड़ा और अवैज्ञानिक समझते हैं। 2. उन्हें बड़े-बड़े बाँध, नहरें, ट्यूबवेल और सीमेंट-कंक्रीट की संरचनाएँ ही आधुनिक जल-प्रबंधन लगती हैं। 3. वे स्थानीय भूगोल, पठार की प्रकृति और परंपरागत जल-संरक्षण (तालाब, बावड़ी) के महत्व को नहीं समझते। 4. इस अहंकार के कारण उन्होंने तालाबों को गाद से भरने दिया और भूजल पाताल से भी निकाल लिया।
जबकि वास्तव में विक्रमादित्य, भोज और मुंज जैसे राजा रिनेसां से बहुत पहले जानते थे कि मालवा के पठार पर पानी रोककर रखना होगा।
क्योंकि वे पश्चिमी शिक्षा और रिनेसां के बाद के ज्ञान को ही वास्तविक ज्ञान मानते हैं, बड़े बाँध और ट्यूबवेल को ही आधुनिक जल-प्रबंधन समझते हैं और भारतीय परंपरागत जल-संरक्षण (तालाब, बावड़ी) को पिछड़ा मानते हैं — जबकि विक्रमादित्य, भोज, मुंज जैसे राजा बहुत पहले से पानी रोकने का विज्ञान जानते थे।
‘मालवा में विक्रमादित्य और भोज और मुंज रिनेसां के बहुत पहले हो गए।’ पानी के रखरखाव के लिए उन्होंने क्या प्रबंध किए?
Answer
उत्तर
विक्रमादित्य, भोज, मुंज और मालवा के सभी राजा जानते थे कि इस पठार पर पानी को रोककर रखना होगा। इसलिए उन्होंने— 1. बड़े-बड़े तालाब बनवाए, ताकि बरसात का पानी रुका रहे (राजा भोज द्वारा बनवाया भोपाल का विशाल ताल प्रसिद्ध है)। 2. बड़ी-बड़ी बावड़ियाँ बनवाईं। 3. इनसे वर्षा का जल संचित होता और धरती के गर्भ का पानी (भूजल) जीवंत बना रहता था।
इसी व्यवस्था के कारण मालवा “डग-डग रोटी, पग-पग नीर” वाला प्रदेश बना; यहाँ तक कि 1899 के भीषण अकाल (‘छप्पन का काल’) में भी मालवा में लोग न भूखे मरे न प्यासे।
उन्होंने बड़े-बड़े तालाब और बावड़ियाँ बनवाईं, ताकि बरसात का पानी रुका रहे और धरती के गर्भ का पानी (भूजल) जीवंत बना रहे; इसी कारण मालवा ‘पग-पग नीर’ वाला बना और अकाल में भी लोग भूखे-प्यासे नहीं मरे।
‘हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है।’ क्यों और कैसे?
Answer
उत्तर
कैसे: 1. इंदौर की खान और सरस्वती नदियाँ, जिनमें कभी लेखक नहाया और नाव से सैर की, आज “सड़े नालों में बदल दी गई हैं”। 2. शिप्रा, चंबल, गंभीर, पार्वती, कालीसिंध, चोरल— सबका यही हाल हो रहा है; वे केवल चौमासे में चलती हैं, “बाकी के महीनों में बस्तियों के नालों का पानी ढोती हैं।” 3. शहरों और उद्योगों का गंदा पानी, सीवेज और कचरा सीधे नदियों में छोड़ा जाता है।
क्यों: 1. तेज़ शहरीकरण और औद्योगीकरण, पर गंदे पानी के शोधन (ट्रीटमेंट) की उचित व्यवस्था नहीं। 2. उपभोक्तावादी ‘खाऊ-उजाड़ू’ जीवन-पद्धति, जिसमें प्रकृति का केवल दोहन होता है, संरक्षण नहीं। 3. भूजल का अत्यधिक दोहन और तालाबों की उपेक्षा से नदियों का स्वाभाविक जल-प्रवाह घट गया, इसलिए उनमें केवल गंदा पानी बचता है। 4. नदियों को माँ मानने की परंपरा भूलकर उन्हें केवल संसाधन समझना।
विडंबना यह है कि “नदियों ने सभ्यताओं को जन्म दिया” और आज की सभ्यता उन्हीं को नष्ट कर रही है।
कैसे: इंदौर की खान-सरस्वती जैसी नदियाँ सड़े नालों में बदल गईं; शिप्रा, चंबल आदि भी चौमासे के बाद केवल बस्तियों के नालों का पानी ढोती हैं; शहरों-उद्योगों का गंदा पानी सीधे नदियों में जाता है। क्यों: अनियोजित शहरीकरण-औद्योगीकरण, शोधन-व्यवस्था का अभाव, उपभोक्तावादी जीवन-पद्धति, भूजल-दोहन और तालाबों की उपेक्षा से स्वाभाविक प्रवाह का घटना, और नदियों के प्रति श्रद्धा का लोप।
लेखक को क्यों लगता है कि ‘हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है’? आप क्या मानते हैं?
Answer
उत्तर
लेखक के ऐसा मानने के कारण: 1. औद्योगिक विकास ने प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया है— तालाब गाद से भर गए, भूजल पाताल से निकाल लिया गया, नदियाँ सूखकर गंदे नाले बन गईं। 2. कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों से धरती का तापमान बढ़ गया; समुद्र गरम हो रहे हैं, ध्रुवों की बर्फ़ पिघल रही है, मौसम-चक्र बिगड़ गया— लद्दाख में बर्फ़ के बजाय पानी गिरा, बाड़मेर में गाँव डूब गए। 3. “पग-पग नीर” वाला मालवा सूखा हो गया। 4. यह सभ्यता निर्माण नहीं, विनाश कर रही है; मनुष्य को उसकी जड़-ज़मीन से अलग कर रही है— इसलिए यह ‘सभ्यता’ नहीं, ‘अपसभ्यता’ (बिगड़ी हुई सभ्यता) है।
मेरा मत: मैं लेखक से काफ़ी हद तक सहमत हूँ। औद्योगिक विकास ने सुख-सुविधाएँ, रोज़गार, स्वास्थ्य-सेवाएँ और तकनीक दी हैं, इसलिए विकास आवश्यक है; परंतु प्रकृति की कीमत पर किया गया विकास टिकाऊ नहीं है। प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जल-संकट इसके प्रमाण हैं। हमें सतत (टिकाऊ) विकास का मार्ग अपनाना चाहिए— नवीकरणीय ऊर्जा, जल-संरक्षण, वृक्षारोपण, प्रदूषण-नियंत्रण और परंपरागत ज्ञान का सम्मान— ताकि विकास उजाड़ न बने।
लेखक के अनुसार यह सभ्यता प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करती है — तालाब नष्ट, भूजल समाप्त, नदियाँ नाले, ग्लोबल वार्मिंग और बिगड़ा मौसम-चक्र — यह निर्माण नहीं, विनाश है, इसलिए ‘अपसभ्यता’ है। मेरा मत: विकास आवश्यक है और उसने सुविधाएँ दी हैं, पर प्रकृति की कीमत पर किया गया विकास टिकाऊ नहीं; हमें सतत विकास (नवीकरणीय ऊर्जा, जल-संरक्षण, वृक्षारोपण, परंपरागत ज्ञान) अपनाना चाहिए।
धरती का वातावरण गरम क्यों हो रहा है? इसमें यूरोप और अमेरिका की क्या भूमिका है? टिप्पणी कीजिए।
Answer
उत्तर
वातावरण गरम होने का कारण: वातावरण को गरम करने वाली कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसें— जो कारख़ानों, वाहनों, बिजलीघरों में कोयला-पेट्रोल-डीज़ल जलाने और वनों की कटाई से निकलती हैं— सूर्य की गर्मी को धरती के वातावरण में रोक लेती हैं। लेखक के अनुसार इन गैसों ने धरती का तापमान बढ़ा दिया है, जिससे समुद्रों का पानी गरम हो रहा है, ध्रुवों की बर्फ़ पिघल रही है और मौसमों का चक्र बिगड़ रहा है।
यूरोप और अमेरिका की भूमिका: 1. ये गैसें सबसे ज़्यादा अमेरिका और फिर यूरोप के विकसित देशों से निकलती हैं; उनकी औद्योगिक, उपभोक्तावादी ‘खाऊ-उजाड़ू’ जीवन-पद्धति (अधिक बिजली, अधिक वाहन, अधिक उपभोग) इसका मुख्य कारण है। 2. अमेरिका इन गैसों को रोकने को तैयार नहीं; वह नहीं मानता कि सारी गड़बड़ी वातावरण के गरम होने से हो रही है। 3. अमेरिका की घोषणा है कि वह अपनी खाऊ-उजाड़ू जीवन-पद्धति पर कोई समझौता नहीं करेगा। 4. इन देशों की जीवन-पद्धति की नकल विकासशील देश (जैसे भारत) भी कर रहे हैं, जिससे समस्या और बढ़ रही है।
टिप्पणी: जलवायु परिवर्तन वैश्विक समस्या है, पर इसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी विकसित देशों की है; उन्हें उत्सर्जन घटाने और विकासशील देशों को स्वच्छ तकनीक देने में आगे आना चाहिए। साथ ही हमें भी अपनी परंपरागत, प्रकृति-अनुकूल जीवन-पद्धति को नहीं छोड़ना चाहिए।
कोयला-पेट्रोल जलाने और वन-कटाई से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें गर्मी रोककर धरती का तापमान बढ़ा रही हैं — समुद्र गरम हो रहे हैं, ध्रुवों की बर्फ़ पिघल रही है, मौसम-चक्र बिगड़ रहा है। ये गैसें सबसे अधिक अमेरिका और फिर यूरोप के विकसित देशों की उपभोक्तावादी ‘खाऊ-उजाड़ू’ जीवन-पद्धति से निकलती हैं; अमेरिका न इन्हें रोकने को तैयार है, न अपनी जीवन-पद्धति पर समझौता करने को। सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी विकसित देशों की है, पर हमें भी उनकी नकल से बचना चाहिए।
योग्यता-विस्तार
क्या आपको भी पर्यावरण की चिंता है? अगर है तो किस प्रकार? अपने शब्दों में लिखिए।
Answer
उत्तर
हाँ, मुझे पर्यावरण की गहरी चिंता है। 1. मेरे शहर में गरमियों में तापमान लगातार बढ़ रहा है, लू के दिन बढ़ गए हैं और सर्दियों में वायु-प्रदूषण (धुंध/स्मॉग) से साँस लेना कठिन हो जाता है। 2. हमारे इलाके में भूजल-स्तर गिर रहा है; गरमियों में पानी के टैंकर मँगाने पड़ते हैं। 3. पास की नदी/नाले में कचरा और प्लास्टिक भरा रहता है; पेड़ कटकर इमारतें बन रही हैं। 4. समाचारों में बाढ़, बादल फटना, चक्रवात और हिमनदों के पिघलने की घटनाएँ बढ़ती दिखती हैं।
इसलिए मैं अपने स्तर पर प्रयास करता हूँ— पानी-बिजली बचाता हूँ, प्लास्टिक की थैलियों के बजाय कपड़े का थैला ले जाता हूँ, कचरा अलग-अलग (गीला-सूखा) करता हूँ, जन्मदिन पर पौधा लगाता हूँ, पास जाना हो तो साइकिल या पैदल जाता हूँ और दूसरों को भी जागरूक करता हूँ।
हाँ — बढ़ती गरमी और लू, वायु-प्रदूषण, गिरता भूजल-स्तर, नदियों में कचरा, पेड़ों की कटाई और बाढ़-चक्रवात जैसी घटनाएँ मुझे चिंतित करती हैं; इसलिए मैं पानी-बिजली बचाता, प्लास्टिक से बचता, कचरा अलग करता, पौधे लगाता, साइकिल/पैदल चलता और दूसरों को जागरूक करता हूँ।
विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्यता है। खाऊ-उजाड़ू सभ्यता के संदर्भ में हो रहे पर्यावरण के विनाश पर प्रकाश डालिए।
Answer
उत्तर
‘खाऊ-उजाड़ू सभ्यता’ वह है जो प्रकृति के संसाधनों को केवल खाती (उपभोग करती) है और उजाड़ती है, पर उनकी पूर्ति या संरक्षण नहीं करती। इसके कारण पर्यावरण का विनाश अनेक रूपों में हो रहा है—
- जल-संकट: भूजल का अंधाधुंध दोहन, तालाबों-बावड़ियों की उपेक्षा, नदियों का सूखना और प्रदूषण— मालवा जैसा “पग-पग नीर” वाला क्षेत्र भी सूखा हो गया।
- वायु-प्रदूषण: उद्योगों, वाहनों, बिजलीघरों से निकलता धुआँ; महानगरों में ज़हरीली हवा।
- जलवायु परिवर्तन: कार्बन उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग; हिमनदों और ध्रुवीय बर्फ़ का पिघलना, समुद्र-स्तर का बढ़ना, अतिवृष्टि-अनावृष्टि, लू, चक्रवात।
- वनों का विनाश: उद्योगों, खनन, बाँधों और शहरों के लिए जंगल काटे जा रहे हैं; जैव-विविधता घट रही है, वन्य जीव लुप्त हो रहे हैं।
- कचरा और प्लास्टिक: ‘उपयोग करो और फेंको’ संस्कृति से कचरे के पहाड़, समुद्रों में प्लास्टिक।
- मिट्टी का क्षरण: रासायनिक खाद-कीटनाशकों से उर्वरता घटी।
- बड़े बाँध: नर्मदा पर “सीमेंट कंक्रीट का विशाल राक्षसी बाँध”— विस्थापन और पारिस्थितिकी पर असर।
- सांस्कृतिक क्षरण: नदियों को माँ मानने वाली संस्कृति का लोप।
यह विनाश केवल वर्तमान को नहीं, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी उजाड़ रहा है।
खाऊ-उजाड़ू सभ्यता प्रकृति का केवल उपभोग करती है, संरक्षण नहीं — परिणाम: भूजल-दोहन और नदियों का सूखना-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण, कार्बन-उत्सर्जन से जलवायु परिवर्तन (हिमनदों का पिघलना, अतिवृष्टि-अनावृष्टि), वनों और जैव-विविधता का विनाश, प्लास्टिक-कचरा, मिट्टी का क्षरण, बड़े बाँधों का दुष्प्रभाव और प्रकृति-पूजक संस्कृति का लोप — जो भावी पीढ़ियों का भविष्य भी उजाड़ रहा है।
पर्यावरण को विनाश से बचाने के लिए आप क्या कर सकते हैं? उसे कैसे बचाया जा सकता है?
Answer
उत्तर
व्यक्तिगत स्तर पर: 1. पानी बचाना— नल बंद रखना, वर्षा-जल संचयन, आर.ओ. के बचे पानी का उपयोग। 2. बिजली बचाना— एलईडी बल्ब, अनावश्यक उपकरण बंद रखना, सौर ऊर्जा। 3. प्लास्टिक का कम प्रयोग, कपड़े/जूट के थैले। 4. कचरे को गीला-सूखा अलग करना, खाद (कम्पोस्ट) बनाना, पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग)। 5. पेड़ लगाना और उनकी देखभाल करना। 6. सार्वजनिक परिवहन, साइकिल, कार-पूलिंग। 7. ज़रूरत के अनुसार उपभोग— ‘खाऊ-उजाड़ू’ न बनकर संयमित जीवन।
सामूहिक/सरकारी स्तर पर: 1. पुराने तालाबों, बावड़ियों और नदियों का पुनरुद्धार; गंदे पानी के शोधन-संयंत्र। 2. नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) को बढ़ावा, कोयले पर निर्भरता घटाना। 3. वनों का संरक्षण, वन-कटाई पर रोक। 4. प्रदूषण-नियंत्रण कानूनों का सख्ती से पालन। 5. पर्यावरण-शिक्षा और जन-जागरूकता अभियान। 6. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित देशों द्वारा कार्बन-उत्सर्जन में कमी। 7. परंपरागत जल-संरक्षण ज्ञान का सम्मान और उपयोग।
व्यक्तिगत: पानी-बिजली बचाना, वर्षा-जल संचयन, प्लास्टिक कम करना, कचरा अलग करना और कम्पोस्ट बनाना, पेड़ लगाना, सार्वजनिक परिवहन/साइकिल, संयमित उपभोग। सामूहिक: तालाबों-नदियों का पुनरुद्धार, गंदे पानी का शोधन, नवीकरणीय ऊर्जा, वन-संरक्षण, प्रदूषण-कानूनों का पालन, पर्यावरण-शिक्षा, विकसित देशों द्वारा उत्सर्जन में कमी और परंपरागत ज्ञान का सम्मान।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ बरसात का प्रभाव, कम वर्षा के कारण (प्रश्न 1–2)
- ☒ इंजीनियर और परंपरागत ज्ञान, विक्रमादित्य-भोज-मुंज (प्रश्न 3–4)
- ☒ नदियाँ नाले, उजाड़ की अपसभ्यता, ग्लोबल वार्मिंग (प्रश्न 5–7)
- ☒ पर्यावरण की चिंता, विनाश, बचाव (प्रश्न 8–10)