NCERT प्रश्न-अभ्यास: मौखिक (एक-दो पंक्तियों में उत्तर)
'तीसरी कसम' फ़िल्म को कौन-कौन से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?
उत्तर
'तीसरी कसम' को राष्ट्रपति स्वर्णपदक मिला, बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया तथा मास्को फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी यह फ़िल्म पुरस्कृत हुई।
प्रश्न 2. शैलेंद्र ने कितनी फ़िल्में बनाईं?
उत्तर : शैलेंद्र ने केवल एक फ़िल्म 'तीसरी कसम' बनाई। यह उनके जीवन की पहली और अंतिम फ़िल्म थी।
राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ फ़िल्मों के नाम बताइए।
उत्तर
पाठ के अनुसार राजकपूर ने 'संगम' बनाई, जिसकी सफलता के बाद उन्होंने 'मेरा नाम जोकर', 'अजन्ता', 'मैं और मेरा दोस्त' और 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' बनाने की घोषणा की। 'मेरा नाम जोकर' का निर्माण उन्होंने 1965 में आरंभ किया।
'तीसरी कसम' फ़िल्म के नायक व नायिकाओं के नाम बताइए और फ़िल्म में इन्होंने किन पात्रों का अभिनय किया है?
उत्तर
'तीसरी कसम' के नायक राजकपूर और नायिका वहीदा रहमान थीं। राजकपूर ने गाड़ीवान 'हीरामन' का और वहीदा रहमान ने नौटंकी की बाई 'हीराबाई' का अभिनय किया।
प्रश्न 5. फ़िल्म 'तीसरी कसम' का निर्माण किसने किया था?
उत्तर : फ़िल्म 'तीसरी कसम' का निर्माण कवि और गीतकार शैलेंद्र ने किया था।
राजकपूर ने 'मेरा नाम जोकर' के निर्माण के समय किस बात की कल्पना भी नहीं की थी?
उत्तर
राजकपूर ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि 'मेरा नाम जोकर' का केवल एक भाग बनाने में ही छह वर्ष का समय लग जाएगा।
प्रश्न 7. राजकपूर की किस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया?
उत्तर : कहानी सुनकर राजकपूर ने गंभीरतापूर्वक कहा कि उन्हें अपना पारिश्रमिक एडवांस देना होगा। इस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया, क्योंकि उन्हें राजकपूर से ऐसी उम्मीद नहीं थी।
फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को किस तरह का कलाकार मानते थे?
उत्तर
फ़िल्म समीक्षक और कला-मर्मज्ञ राजकपूर को आँखों से बात करने वाला कलाकार मानते थे।
NCERT प्रश्न-अभ्यास: लिखित (क) 25-30 शब्दों में उत्तर
'तीसरी कसम' फ़िल्म को 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' क्यों कहा गया है?
उत्तर
'तीसरी कसम' फणीश्वरनाथ रेणु की मार्मिक साहित्यिक कृति पर बनी है और इसे एक संवेदनशील कवि शैलेंद्र ने बनाया था। इसमें कविता जैसी भावुकता, करुणा और कोमलता है। साहित्य की उस कृति को फ़िल्म की रील (सैल्यूलाइड) पर पूरी सार्थकता से उतारा गया, इसलिए इसे 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' कहा गया।
'तीसरी कसम' फ़िल्म को खरीददार क्यों नहीं मिल रहे थे?
उत्तर
'तीसरी कसम' की संवेदना उन वितरकों की समझ से परे थी जो 'दो से चार बनाने' यानी केवल मुनाफ़े का गणित जानते थे। फ़िल्म में रची-बसी करुणा तराज़ू पर तौली जा सकने वाली चीज़ नहीं थी। उन्हें इसमें व्यावसायिक लाभ नहीं दिखा, इसलिए बड़े सितारों और लोकप्रिय संगीत के बावजूद इसे खरीददार नहीं मिले।
प्रश्न 3. शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य क्या है?
उत्तर : शैलेंद्र के अनुसार कलाकार को दर्शकों की रुचि की आड़ में उन पर उथलापन नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का कर्तव्य है कि वह उपभोक्ता (दर्शकों) की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।
फ़िल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरीफ़ाई क्यों कर दिया जाता है?
उत्तर
हमारी फ़िल्मों में लोक-तत्त्व का अभाव होता है और वे ज़िंदगी से दूर होती हैं। फ़िल्मकार दर्शकों का भावनात्मक शोषण करके फ़िल्म को सफल बनाना चाहते हैं। इसलिए दुख और त्रासद स्थितियों को बढ़ा-चढ़ाकर (ग्लोरीफ़ाई करके) वीभत्स रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
'शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं' इस कथन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
इसका अर्थ है कि राजकपूर अपने अभिनय और फ़िल्मों में जो भावनाएँ व्यक्त करना चाहते थे, उन्हें शैलेंद्र ने अपने गीतों के माध्यम से सरल और सटीक शब्द दिए। राजकपूर की फ़िल्मों के गीत उनकी भावनाओं को सीधे दर्शकों के दिल तक पहुँचाते थे।
लेखक ने राजकपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है। शोमैन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
शोमैन वह व्यक्ति होता है जो अपने प्रदर्शन और कला से लोगों को आकर्षित करे, उनका भरपूर मनोरंजन करे और जिसका व्यक्तित्व स्वयं में आकर्षण का केंद्र हो। राजकपूर ऐसे ही अभिनेता-निर्माता थे; उनका व्यक्तित्व एक किंवदंती बन चुका था, इसलिए उन्हें एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा गया।
फ़िल्म 'श्री 420' के गीत 'रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ' पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति क्यों की?
उत्तर
जयकिशन का विचार था कि दर्शक 'चार दिशाएँ' तो समझ सकते हैं, पर 'दस दिशाएँ' नहीं समझेंगे। इसलिए उन्होंने 'दसों दिशाओं' शब्द पर आपत्ति की। शैलेंद्र यह परिवर्तन करने को तैयार नहीं हुए।
NCERT प्रश्न-अभ्यास: लिखित (ख) 50-60 शब्दों में उत्तर
राजकपूर द्वारा फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फ़िल्म क्यों बनाई?
उत्तर
शैलेंद्र एक आदर्शवादी भावुक कवि थे। उन्हें अपार संपत्ति और यश की उतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी। रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफ़ाम' की संवेदना उनके कवि-हृदय को छू गई थी और वे उसे पूरी ईमानदारी से परदे पर उतारना चाहते थे। इसलिए सच्चे मित्र राजकपूर के आगाह करने पर भी उन्होंने व्यावसायिक लाभ-हानि की परवाह किए बिना यह फ़िल्म बनाई।
'तीसरी कसम' में राजकपूर का महिमामय व्यक्तित्व किस तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जब 'तीसरी कसम' बनी, तब राजकपूर एशिया के सबसे बड़े शोमैन के रूप में स्थापित हो चुके थे। फिर भी इस फ़िल्म में वे हीरामन का अभिनय नहीं करते, बल्कि स्वयं हीरामन में ढल गए हैं। वे खालिस देहाती, भुच्च गाड़ीवान लगते हैं जो केवल दिल की ज़ुबान समझता है। हीराबाई की फेनू-गिलासी बोली पर रीझना, उसकी 'मनुआ-नटुआ' जैसी भोली सूरत पर न्योछावर होना और उसकी तनिक-सी उपेक्षा पर अपने अस्तित्व से जूझना, यह सब इतना स्वाभाविक है कि छींट की सस्ती साड़ी में लिपटी हीराबाई ने वहीदा रहमान को पीछे छोड़ दिया और हीरामन पर राजकपूर हावी नहीं हो सके।
लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि 'तीसरी कसम' ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है?
उत्तर
'तीसरी कसम' की पटकथा मूल कहानी के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने स्वयं तैयार की थी। इसलिए कहानी का रेशा-रेशा और उसकी छोटी-से-छोटी बारीकियाँ फ़िल्म में पूरी तरह उतर आईं। कहानी की करुणा, लोक-जीवन, गीत और पात्रों की सरलता फ़िल्म में ज्यों-की-त्यों दिखाई देती है। मूल रचना के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई, इसीलिए लेखक ने कहा है कि इस फ़िल्म ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया।
शैलेंद्र के गीतों की क्या विशेषताएँ हैं? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
शैलेंद्र के गीत सरल, सहज और भाव-प्रवण थे, दुरूह नहीं। उनमें शांत नदी का प्रवाह और समुद्र की गहराई थी। उन्होंने कभी झूठे अभिजात्य को नहीं अपनाया और दर्शकों पर उथलापन नहीं थोपा। उनके गीतों में केवल करुणा नहीं, जूझने का संकेत भी था; व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, आगे बढ़ने का संदेश देती है। 'मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिस्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी' जैसे गीत इसके उदाहरण हैं।
फ़िल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
निर्माता के रूप में शैलेंद्र व्यावसायिक सूझबूझ वाले नहीं, बल्कि आदर्शवादी और भावुक कवि थे। उन्होंने धन और यश के लिए नहीं, आत्म-संतुष्टि के लिए फ़िल्म बनाई। उन्होंने एक श्रेष्ठ साहित्यिक कृति को चुना, उसकी पटकथा मूल लेखक रेणु से लिखवाई और उसकी संवेदना से कोई समझौता नहीं किया। उन्होंने दुख को ग्लोरीफ़ाई किए बिना सहज, जीवन-सापेक्ष रूप में प्रस्तुत किया। उनकी संवेदनशीलता के कारण ही यह फ़िल्म कलात्मक दृष्टि से अमर बन गई।
शैलेंद्र के निजी जीवन की छाप उनकी फ़िल्म में झलकती है, कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
शैलेंद्र स्वयं सरल, भावुक और आदर्शवादी व्यक्ति थे, जो सिनेमा की चकाचौंध में रहकर भी यश और धन-लिप्सा से दूर रहे। लेखक के अनुसार शैलेंद्र की ज़िंदगी शांत नदी के प्रवाह और समुद्र की गहराई लिए हुए थी और यही उन्होंने अपनी फ़िल्म में साबित किया। फ़िल्म का नायक हीरामन भी सीधा-सादा, निश्छल और केवल दिल की ज़ुबान समझने वाला है। फ़िल्म में दुख को सहज रूप में दिखाया गया है, जैसे शैलेंद्र स्वयं व्यथा से पराजित न होकर आगे बढ़ने में विश्वास रखते थे।
लेखक के इस कथन से कि 'तीसरी कसम' फ़िल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था, आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
हम इस कथन से पूरी तरह सहमत हैं। 'तीसरी कसम' में करुणा, कोमलता और लोक-जीवन की सूक्ष्म भावनाएँ हैं, जिन्हें दुनिया-भर के शब्द भी व्यक्त नहीं कर सकते। ऐसी संवेदना को समझकर बिना किसी व्यावसायिक समझौते के परदे पर उतारना किसी लाभ-हानि का हिसाब रखने वाले निर्माता के बस की बात नहीं थी। एक सच्चा कवि ही, जिसे आत्म-संतुष्टि धन से अधिक प्रिय हो, ऐसी फ़िल्म बना सकता था। शैलेंद्र ऐसे ही कवि थे।
NCERT प्रश्न-अभ्यास: लिखित (ग) आशय स्पष्ट कीजिए
...वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।
उत्तर
आशय यह है कि शैलेंद्र व्यावसायिक निर्माता नहीं, आदर्शों पर चलने वाले भावुक कवि थे। उन्होंने 'तीसरी कसम' धन या प्रसिद्धि पाने के लिए नहीं, बल्कि अपने मन की संतुष्टि के लिए बनाई, इसलिए असफलता के खतरों की उन्होंने परवाह नहीं की।
उनका यह दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कर्तव्य भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।
उत्तर
आशय यह है कि 'दर्शक यही चाहते हैं' कहकर सस्ती और हल्की चीज़ें परोसना गलत है। कलाकार को दर्शकों की रुचि को सुधारना और ऊँचा उठाना चाहिए। इसी कारण शैलेंद्र ने 'दसों दिशाओं' शब्द को बदलने से मना कर दिया था।
व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।
उत्तर
आशय यह है कि दुख मनुष्य को हराता नहीं, बल्कि उसे संघर्ष करने और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। शैलेंद्र के गीतों में करुणा के साथ जूझने का यही संकेत मिलता है।
दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने वाले की समझ से परे है।
उत्तर
'दो से चार बनाना' यानी पैसे को दुगना करना। आशय यह है कि केवल मुनाफ़े का गणित जानने वाले वितरक और व्यापारी इस फ़िल्म की गहरी करुणा और संवेदना को नहीं समझ सकते थे, इसलिए उन्होंने इसे खरीदने में रुचि नहीं दिखाई।
प्रश्न 5. उनके गीत भाव-प्रवण थे, दुरूह नहीं।
उत्तर : आशय यह है कि शैलेंद्र के गीत भावनाओं से भरे थे, पर उनकी भाषा कठिन नहीं थी। सरल शब्दों में गहरी बात कहने के कारण वे सीधे आम आदमी के दिल तक पहुँचते थे।
NCERT प्रश्न-अभ्यास: भाषा अध्ययन (चयनित)
पाठ में आए निम्नलिखित मुहावरों से वाक्य बनाइए: चेहरा मुरझाना, चक्कर खा जाना, दो से चार बनाना, आँखों से बोलना
उत्तर
(क) चेहरा मुरझाना: परीक्षा में कम अंक देखकर रोहन का चेहरा मुरझा गया। (ख) चक्कर खा जाना: शहर की भूल-भुलैया जैसी गलियों में अच्छे-अच्छे चक्कर खा जाते हैं। (ग) दो से चार बनाना: व्यापारी हर सौदे में दो से चार बनाने की सोचता है। (घ) आँखों से बोलना: मीना चुप थी, पर उसकी आँखें बोल रही थीं कि वह बहुत खुश है।
निम्नलिखित शब्दों के हिंदी पर्याय दीजिए: शिद्दत, याराना, बमुश्किल, खालिस, नावाकिफ़, यकीन, हावी, रेशा
उत्तर
शिद्दत: तीव्रता/प्रबलता; याराना: मित्रता; बमुश्किल: कठिनाई से; खालिस: शुद्ध; नावाकिफ़: अनजान/अपरिचित; यकीन: विश्वास; हावी: प्रभावी/छाया हुआ; रेशा: तंतु
निम्नलिखित का संधिविच्छेद कीजिए: चित्रांकन, सर्वोत्कृष्ट, चर्मोत्कर्ष, रूपांतरण, घनानंद
उत्तर
चित्रांकन = चित्र + अंकन; सर्वोत्कृष्ट = सर्व + उत्कृष्ट; चर्मोत्कर्ष = चरम + उत्कर्ष; रूपांतरण = रूप + अंतरण; घनानंद = घन + आनंद
निम्नलिखित का समास विग्रह कीजिए और समास का नाम लिखिए: कला-मर्मज्ञ, लोकप्रिय, राष्ट्रपति
उत्तर
कला-मर्मज्ञ: कला का मर्मज्ञ (तत्पुरुष समास); लोकप्रिय: लोक में प्रिय (तत्पुरुष समास); राष्ट्रपति: राष्ट्र का पति (तत्पुरुष समास)
महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. शैलेंद्र का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर : शैलेंद्र (1923-1966) हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध कवि और गीतकार थे, जो कई दशकों तक फ़िल्म क्षेत्र से जुड़े रहे। उनका मूल नाम शंकरदास केसरीलाल था। राजकपूर की फ़िल्मों के लिए लिखे उनके गीत बहुत लोकप्रिय हुए, जैसे 'श्री 420' का 'प्यार हुआ, इकरार हुआ है' और 'मेरा जूता है जापानी'। लेखक उन्हें गीतकार नहीं, कवि मानते हैं, जो सिनेमा की चकाचौंध में रहकर भी यश और धन-लिप्सा से दूर रहे। 'तीसरी कसम' (1966) उनके जीवन की पहली और अंतिम फ़िल्म थी।
'तीसरी कसम' फ़िल्म किस कहानी पर आधारित है? फ़िल्म के कुछ प्रसंग बताइए।
उत्तर
'तीसरी कसम' फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी 'तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम' पर आधारित है। इसमें गाड़ीवान हीरामन (राजकपूर) और नौटंकी की बाई हीराबाई (वहीदा रहमान) की कथा है। पाठ में फ़िल्म के कई प्रसंग आए हैं: कजरी नदी के किनारे बैठा हीरामन गीत गाते हुए हीराबाई से पूछता है 'मन समझती हैं न आप?' और हीराबाई ज़ुबान से नहीं, आँखों से उत्तर देती है; गाड़ीवान 'चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया' गाते हैं; टप्पर-गाड़ी में हीराबाई को देखकर बच्चे 'लाली-लाली डोलिया में लाली रे दुलहनिया' गाते हैं; और मुकेश की आवाज़ में 'सजनवा बैरी हो गए हमार' गीत अद्वितीय बन गया है।
प्रश्न 3. शैलेंद्र और राजकपूर के संबंधों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर : शैलेंद्र और राजकपूर में गहरी मित्रता थी। शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को अपने गीतों में शब्द दिए। जब शैलेंद्र 'तीसरी कसम' की कहानी लेकर पहुँचे तो राजकपूर ने उत्साह से काम करना स्वीकार किया और मज़ाक में पारिश्रमिक एडवांस माँगा। शैलेंद्र का मुरझाया चेहरा देखकर उन्होंने मुसकराते हुए कहा, 'निकालो एक रुपया, मेरा पारिश्रमिक! पूरा एडवांस।' उन्होंने बिना किसी पारिश्रमिक की अपेक्षा के पूरी तन्मयता से काम किया। एक सच्चे मित्र के रूप में उन्होंने शैलेंद्र को फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह भी किया। लेखक के अनुसार 'तीसरी कसम' में राजकपूर ने अपने फ़िल्मी जीवन की सर्वोत्कृष्ट भूमिका अदा की।
प्रश्न 4. रिक्त स्थान भरिए
(i) 'तीसरी कसम' ____________ की कहानी पर आधारित है। फणीश्वरनाथ रेणु ('मारे गए गुलफ़ाम')
(ii) फ़िल्म में हीरामन की भूमिका ____________ ने निभाई। राजकपूर
(iii) हीराबाई की भूमिका ____________ ने निभाई। वहीदा रहमान
(iv) 'तीसरी कसम' की पटकथा ____________ ने तैयार की थी। फणीश्वरनाथ रेणु
(v) 'तीसरी कसम' का संगीत ____________ का था। शंकर-जयकिशन