NCERT पाठ्यपुस्तक प्रश्न-अभ्यास (क) — निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
पहले पद में मीरा ने हरि से अपनी पीड़ा हरने की विनती किस प्रकार की है?
उत्तर
पहले पद में मीरा श्रीकृष्ण को उनके भक्त-वत्सल रूप की याद दिलाते हुए विनती करती हैं कि हे हरि! आप अपने भक्तों (जन) की पीड़ा (भीर) हरते आए हैं, अब मेरी पीड़ा भी हर लीजिए। वे तीन उदाहरण देती हैं — (1) भरी सभा में दुःशासन द्वारा चीरहरण किए जाने पर आपने द्रौपदी का चीर (वस्त्र) बढ़ाकर उसकी लाज रखी; (2) भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए आपने नरहरि (नरसिंह) का रूप धारण किया; (3) डूबते हुए गजराज (हाथी) को बचाया और मगरमच्छ को मारकर उसका कष्ट दूर किया। अंत में मीरा स्वयं को 'दासी' कहकर कहती हैं — हे गिरधर लाल! जैसे आपने इन सबकी पीड़ा हरी, वैसे ही अपनी दासी मीरा की पीड़ा भी दूर कीजिए। इस प्रकार वे अपने आराध्य को उनका कर्तव्य याद दिलाते हुए, अधिकार भरे दैन्य भाव से विनती करती हैं।
दूसरे पद में मीराबाई श्याम की चाकरी क्यों करना चाहती हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
मीरा श्याम की चाकरी (सेवा) इसलिए करना चाहती हैं ताकि वे हर समय अपने आराध्य के निकट रह सकें। वे कहती हैं कि चाकर बनकर मैं बाग लगाऊँगी और नित्य सुबह उठकर उनके दर्शन पाऊँगी, वृंदावन की कुंज-गलियों में गोविंद की लीलाओं का गान करूँगी। चाकरी के बदले उन्हें तीन चीज़ें मिलेंगी — दर्शन रूपी वेतन, स्मरण (सुमिरन) रूपी खर्ची और भाव-भक्ति रूपी जागीर। ये तीनों बातें उनके लिए अत्यंत लाभकारी (सरस) हैं। अतः दर्शन, स्मरण और भक्ति — तीनों का सुख पाने के लिए मीरा श्याम की दासी बनना चाहती हैं।
मीराबाई ने श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य का वर्णन कैसे किया है?
उत्तर
दूसरे पद में मीरा ने श्रीकृष्ण के मनमोहक रूप का वर्णन किया है। श्रीकृष्ण के सिर पर मोर-पंखों का मुकुट है, शरीर पर पीतांबर (पीला वस्त्र) सुशोभित है और गले में वैजयंती फूलों की माला है। वे वृंदावन में गायें (धेनु) चराते हैं और मुरली बजाकर सबका मन मोह लेते हैं, इसीलिए वे 'मोहन मुरली वाला' हैं। उनका साँवला रूप मीरा को अत्यंत प्रिय है, इसलिए वे उन्हें 'साँवरिया' कहकर पुकारती हैं।
प्रश्न 4. मीराबाई की भाषा शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर : मीरा के पदों की भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा है, जिसमें गुजराती का भी मेल है (जैसे — म्हाने, रहस्यूँ, पास्यूँ, घणो, हिवड़ो, री, रा)। भाषा सरल, सहज और भावपूर्ण है। उनकी शैली गेय (गाने योग्य) पद-शैली है; पद संगीतमय और लयबद्ध हैं। भावों में दैन्य और माधुर्य भाव की भक्ति प्रमुख है। अलंकारों का सहज प्रयोग मिलता है — जैसे 'लाल गिरधर', 'काटी कुण्जर' में अनुप्रास, 'ऊँचा ऊँचा', 'बिच बिच' में पुनरुक्ति प्रकाश तथा 'भाव भगती जागीरी' में रूपक। पहले पद में द्रौपदी, नरसिंह और गजराज के दृष्टांत दिए गए हैं।
वे श्रीकृष्ण को पाने के लिए क्या-क्या कार्य करने को तैयार हैं?
उत्तर
श्रीकृष्ण को पाने के लिए मीरा — (1) उनकी चाकर (सेविका) बनने को तैयार हैं; (2) उनके लिए बाग लगाने और नित्य सुबह उठकर दर्शन करने को तैयार हैं; (3) वृंदावन की कुंज-गलियों में उनकी लीलाओं का गुणगान करने को तैयार हैं; (4) ऊँचे-ऊँचे महल बनवाकर बीच-बीच में खिड़कियाँ (बारी) रखना चाहती हैं, जिनसे वे कृष्ण के दर्शन कर सकें; (5) कुसुंबी (केसरिया) साड़ी पहनकर साँवरिया के दर्शन करना चाहती हैं; (6) आधी रात को यमुना जी के किनारे उनकी प्रतीक्षा करने को तैयार हैं। वे कहती हैं कि उनका हृदय कृष्ण-दर्शन के लिए बहुत अधीर है।
प्रश्न-अभ्यास (ख) — निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए
प्रश्न 1. निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए
हरि आप हरो जन री भीर।
द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।
भगत कारण रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर।
उत्तर : भाव-सौंदर्य — मीरा श्रीकृष्ण से भक्तों की पीड़ा हरने की प्रार्थना करती हैं और उन्हें याद दिलाती हैं कि उन्होंने द्रौपदी का चीर बढ़ाकर उसकी लाज बचाई तथा भक्त प्रह्लाद के लिए नरसिंह का रूप धारण किया। इसमें ईश्वर की भक्त-वत्सलता और मीरा का अटूट विश्वास प्रकट होता है।
शिल्प-सौंदर्य — भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रज है ('री', 'बढ़ायो', 'धर्यो')। 'हरि ... हरो' और 'रूप ... नरहरि' में अनुप्रास अलंकार है। द्रौपदी और प्रह्लाद के पौराणिक दृष्टांत दिए गए हैं। पद गेय, लयबद्ध और दैन्य भाव की भक्ति से युक्त है।
प्रश्न 2. निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए
बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्जर पीर।
दासी मीराँ लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर।
उत्तर : भाव-सौंदर्य — कृष्ण ने डूबते हुए गजराज की रक्षा की और मगरमच्छ को मारकर हाथी का कष्ट दूर किया। इसी आधार पर मीरा स्वयं को 'दासी' कहकर गिरधर लाल से अपनी पीड़ा भी हरने की विनती करती हैं। यहाँ दास्य भाव की भक्ति है।
शिल्प-सौंदर्य — 'काटी कुण्जर' और 'लाल गिरधर' में अनुप्रास अलंकार है। 'बूढ़तो', 'राख्यो', 'म्हारी' जैसे राजस्थानी शब्दों से भाषा में सहजता है। गज-ग्राह की पौराणिक कथा का दृष्टांत है। पद संगीतात्मक और गेय है।
प्रश्न 3. निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए
चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची।
भाव भगती जागीरी पास्यूँ, तीनूं बाताँ सरसी।
उत्तर : भाव-सौंदर्य — मीरा कहती हैं कि कृष्ण की चाकरी करने से उन्हें वेतन के रूप में दर्शन, जेब-खर्च के रूप में स्मरण और जागीर के रूप में भाव-भक्ति मिलेगी। ये तीनों बातें उनके लिए अत्यंत सुखद और लाभकारी हैं। इसमें मीरा के सेवा-भाव और समर्पण की झलक है।
शिल्प-सौंदर्य — 'भाव भगती जागीरी' में रूपक अलंकार है (भक्ति को जागीर माना गया है)। 'पास्यूँ' शब्द की आवृत्ति से लय और प्रभाव बढ़ा है; 'भाव भगती' में अनुप्रास है। भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रज है, शैली गेय पद-शैली है।
भाषा-अध्ययन
उदाहरण के आधार पर पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप लिखिए — (उदाहरण : भीर — पीड़ा / कष्ट / दुख; री — की)
उत्तर
चीर — वस्त्र / कपड़ा
बूढ़ता — डूबता
धर्यो — धारण किया
लगास्यूँ — लगाऊँगी
कुण्जर — हाथी
घणा — बहुत / घना
बिन्दरावन — वृंदावन
सरसी — अच्छी / लाभकारी (सरस)
रहस्यूँ — रहूँगी
हिवड़ा — हृदय
राखो — रखो
कुसुम्बी — केसरिया / लाल रंग की
महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. मीराबाई का संक्षिप्त जीवन-परिचय दीजिए।
उत्तर : मीराबाई का जन्म 1503 में जोधपुर के चोकड़ी (कुड़की) गाँव में हुआ माना जाता है। 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के कुँवर भोजराज से हुआ। उनका जीवन दुखों की छाया में बीता — बचपन में ही माँ का देहांत हो गया था और विवाह के कुछ ही वर्षों बाद पहले पति, फिर पिता और एक युद्ध के दौरान श्वसुर का भी देहांत हो गया। भौतिक जीवन से निराश होकर मीरा ने घर-परिवार त्याग दिया और वृंदावन में डेरा डालकर पूरी तरह गिरधर गोपाल कृष्ण के प्रति समर्पित हो गईं। वे संत रैदास की शिष्या मानी जाती हैं। उनकी कुल सात-आठ कृतियाँ ही उपलब्ध हैं। मीरा हिंदी और गुजराती दोनों की कवयित्री मानी जाती हैं। उनका समय 1503-1546 माना जाता है।
प्रश्न 2. मीरा के काव्य की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर : मीरा के पदों की भाषा में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का मिश्रण पाया जाता है; कहीं-कहीं पंजाबी, खड़ी बोली और पूर्वी के प्रयोग भी मिल जाते हैं। उनकी शैली गेय पद-शैली है — पद संगीतमय हैं और उत्तर भारत सहित गुजरात, बिहार और बंगाल तक गाए जाते हैं। भाषा सरल, भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी है। अनुप्रास, रूपक, पुनरुक्ति प्रकाश जैसे अलंकारों का सहज प्रयोग मिलता है। उनकी भक्ति दैन्य और माधुर्य भाव की है।
मीरा अपने आराध्य से किस-किस प्रकार का व्यवहार करती हैं? पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर
मीरा अपने आराध्य श्रीकृष्ण से अत्यंत आत्मीय संबंध रखती हैं। वे उनसे मनुहार (विनती) करती हैं, लाड़ भी लड़ाती हैं और अवसर आने पर उलाहना देने से भी नहीं चूकतीं। उनकी क्षमताओं का गुणगान और स्मरण करते हुए वे उन्हें उनका कर्तव्य याद दिलाने में भी देर नहीं लगातीं। पहले पद में वे द्रौपदी, प्रह्लाद और गजराज की रक्षा का स्मरण कराकर कहती हैं कि अब मेरी पीड़ा भी हरो। दूसरे पद में वे विनम्र दासी बनकर चाकरी माँगती हैं।
"मीराँ रा प्रभु गिरधर नागर, हिवड़ो घणो अधीराँ" — इस पंक्ति में मीरा की किस मनोदशा का पता चलता है?
उत्तर
इस पंक्ति से मीरा की विरह-व्याकुलता और दर्शन की तीव्र लालसा का पता चलता है। वे कहती हैं कि हे गिरधर नागर! मेरा हृदय आपके दर्शन के लिए बहुत अधीर (व्याकुल) है। इसीलिए वे प्रार्थना करती हैं कि आधी रात को ही सही, यमुना जी के किनारे मुझे दर्शन दीजिए। इससे उनके प्रेम की गहराई और अपने आराध्य से मिलने की बेचैनी प्रकट होती है।
मीरा की रचनाओं में उनके आराध्य किन-किन रूपों में दिखाई देते हैं?
उत्तर
मीरा की रचनाओं में उनके आराध्य कहीं निर्गुण निराकार ब्रह्म के रूप में, कहीं सगुण साकार गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण के रूप में और कहीं निर्मोही परदेशी जोगी के रूप में चित्रित हुए हैं। पाठ में संकलित दोनों पदों में वे सगुण रूप वाले गिरधर गोपाल — मोर-मुकुट, पीतांबर और वैजयंती माला धारण करने वाले, गायें चराने वाले मुरलीधर — को संबोधित करती हैं। मीरा पर योगियों, संतों और वैष्णव भक्तों का सम्मिलित प्रभाव पड़ा था।
प्रश्न 6. रिक्त स्थान भरिए
(i) मीरा अपने आराध्य को __________ कहकर संबोधित करती हैं। — गिरधर नागर / लाल गिरधर
(ii) मीरा संत __________ की शिष्या थीं। — रैदास
(iii) मीरा का विवाह महाराणा सांगा के कुँवर __________ से हुआ था। — भोजराज
(iv) मीरा के पदों की भाषा में राजस्थानी, ब्रज और __________ का मिश्रण है। — गुजराती
प्रश्न 7. सत्य/असत्य बताइए
(i) मीरा की भक्ति दैन्य और माधुर्य भाव की है। — सत्य
(ii) पहले पद में मीरा ने द्रौपदी, प्रह्लाद (नरसिंह अवतार) और गजराज के उदाहरण दिए हैं। — सत्य
(iii) मीरा श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए ऊँचे महल बनवाकर बीच-बीच में खिड़कियाँ रखना चाहती हैं। — सत्य
(iv) घर-परिवार त्यागने के बाद मीरा ने काशी में डेरा डाला। — असत्य (वृंदावन में)