Circle of Learning • नई NCERT पाठ्यपुस्तक "गंगा" (2026-27) • पाठ के सभी प्रश्नों के उत्तर
कवि परिचय: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ। वे मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश के निवासी थे। उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी का ज्ञान अर्जित किया। अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता और नए पत्ते उनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं। छायावादी रचनाकारों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उनका निधन सन् 1961 में हुआ।
काव्यांश की व्याख्या / भावार्थ
भारति, जय, विजयकरे!
कनक-शस्य-कमलधरे!
सरल भावार्थ: कवि भारतमाता को देवी के रूप में संबोधित करते हुए कहते हैं— हे भारती! तुम्हारी जय हो, तुम सदा विजय प्राप्त करने वाली बनो। हे सोने जैसी सुनहरी फसलों और कमल को धारण करने वाली माँ! तुम्हारी धरती धन-धान्य से भरपूर और सुंदर है।
पद्यांश 2
लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!
सरल भावार्थ: भारतमाता के चरणों के नीचे लंका (श्रीलंका) कमल के समान शोभित है। गरजती लहरों वाला समुद्र का जल उनके दोनों पवित्र चरणों को धोता है और मानो अनेक अर्थों से भरी स्तुतियाँ गाता हुआ उनकी वंदना करता है। यहाँ भारत की दक्षिणी सीमा का सुंदर चित्र है।
पद्यांश 3
तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन;
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।
सरल भावार्थ: पेड़, घास, वन और लताएँ भारतमाता के वस्त्र हैं और उनके आँचल में रंग-बिरंगे फूल कढ़ाई की तरह जड़े हुए हैं। प्रकाश से चमकते जल-कणों वाली गंगा की उजली धारा उनके गले में सफेद हार के समान सुशोभित है।
पद्यांश 4
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!
सरल भावार्थ: बर्फ से ढका उज्ज्वल हिमालय भारतमाता का मुकुट है। ‘ओम्’ का पवित्र नाद (प्रणव) उनका प्राण है, अर्थात भारत की आत्मा आध्यात्मिक ज्ञान में बसती है। विशाल दिशाएँ इसी नाद से गूँज रही हैं। हे भारती! तुम सैकड़ों मुखों और सैकड़ों स्वरों (अनेक भाषाओं, विचारों और परंपराओं) से मुखरित हो।
रचना से संवाद – मेरे उत्तर मेरे तर्क
उत्तर
“भारति, जय, विजयकरे” कविता में विशेष रूप से
(क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है। (ख) भारत की सांस्कृतिक विविधता बताई गई है। (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है। (घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।
उत्तर: (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
तर्क: कविता में ‘कनक-शस्य’ से संपन्नता, सागर, वन, गंगा और हिमालय से प्रकृति तथा ‘प्राण प्रणव ओंकार’ से ज्ञान-परंपरा की प्रशंसा की गई है। भौगोलिक वर्णन इसका एक अंग भर है, पूरा भाव नहीं।
उत्तर
“कनक-शस्य-कमलधरे” पंक्ति का भावार्थ है
(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता (ख) भारत की नदियों का सौंदर्य (ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता (घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास
उत्तर: (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता।
तर्क: ‘कनक-शस्य’ का अर्थ है सोने जैसी फसलें। लहलहाती सुनहरी फसलें और कमल भारत की उपजाऊ धरती और समृद्धि को प्रकट करते हैं।
उत्तर
समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं
(क) गंगा ज्योतिर्जल-कण/ धवल धार हार गले (ख) गर्जितोर्मि सागर-जल/ धोता शुचि चरण युगल (ग) भारति, जय, विजयकरे/ कनक-शस्य-कमलधरे! (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!
उत्तर: (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!
तर्क: इन पंक्तियों में कहा गया है कि भारत के ओंकार-नाद से सारी दिशाएँ गूँज रही हैं और भारत सैकड़ों मुखों से मुखरित है। अर्थात भारत की वाणी और ज्ञान की गूँज चारों दिशाओं, यानी पूरे विश्व में फैली है।
उत्तर
कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?
(क) सरल, बोल-चाल की भाषा (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त (ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूर्ण (घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक
उत्तर: (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त।
तर्क: कविता में शस्य, शतदल, गर्जितोर्मि, शुचि, स्तव, प्रणव, शुभ्र जैसे संस्कृत शब्द और कनक-शस्य-कमलधरे, शतमुख-शतरव-मुखरे जैसे लंबे समस्त पद प्रयुक्त हुए हैं।
भारत के वस्त्रों में ‘तरु-तृण-वन-लता’ और गले में ‘गंगा-धारा’ को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?
उत्तर
(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक (ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम (ग) ऐतिहासिक और भौगोलिक (घ) सामाजिक और राजनीतिक
उत्तर: (क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक।
तर्क: पेड़, घास, वन और लताओं को भारतमाता के वस्त्र बताकर कवि प्रकृति को देश की शोभा और गरिमा मानते हैं, जिसकी रक्षा आवश्यक है। गंगा को हार बताना उसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व को दर्शाता है।
रचना से संवाद – अर्थ और भाव
उत्तर
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए
(क) “लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल!”
अर्थ: भारतमाता के चरणों के नीचे लंका कमल की तरह है और गरजती लहरों वाला सागर उनके पवित्र दोनों चरणों को धो रहा है।
भाव: कवि ने भारत को एक देवी के रूप में चित्रित किया है। जैसे भक्त देवी के चरण पखारता है, वैसे ही हिंद महासागर भारत के चरण धोता है। इसमें भारत की दक्षिणी सीमा, उसकी पवित्रता और महिमा का भव्य चित्र है।
(ख) “प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!”
अर्थ: ओंकार (प्रणव) भारत का प्राण है, जिसकी ध्वनि से विशाल दिशाएँ गूँज रही हैं; भारत सैकड़ों मुखों और सैकड़ों स्वरों से मुखरित है।
भाव: भारत की आत्मा उसकी आध्यात्मिक और ज्ञान-परंपरा में है। यहाँ अनेक भाषाएँ, विचार और परंपराएँ एक साथ बोलती हैं, फिर भी सबके मूल में एक ही चेतना है। यह भारत की विविधता में एकता का संकेत है।
रचना से संवाद – मेरी समझ मेरे विचार
उत्तर
कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
कविता में कवि की गहरी देशभक्ति और राष्ट्र-वंदना की भावना व्यक्त हुई है। वे भारत को एक जीवंत देवी के रूप में देखकर उसकी जय और विजय की कामना करते हैं। साथ ही उसकी प्राकृतिक सुंदरता, धन-धान्य, ज्ञान और सांस्कृतिक समृद्धि के प्रति श्रद्धा और गर्व का भाव भी प्रकट करते हैं।
कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?
उत्तर
कवि ने प्रकृति को भारतमाता के शृंगार के रूप में चित्रित किया है— सागर उनके चरण धोता है, लंका चरणों के नीचे कमल है, वन-लताएँ वस्त्र हैं, फूल आँचल की कढ़ाई हैं, गंगा गले का हार है और हिमालय मुकुट है। हाँ, मैं मानता हूँ कि प्रकृति का संरक्षण भी देशप्रेम है, क्योंकि यही प्रकृति देश की सुंदरता, अन्न, जल और जीवन का आधार है। यदि हम वन काटें या नदियाँ प्रदूषित करें, तो यह भारतमाता के वस्त्र और आभूषण छीनने जैसा है। देश की रक्षा केवल सीमा पर नहीं, उसकी धरती, जल और वायु को बचाकर भी होती है।
“कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?
उत्तर
यह पंक्ति भारत की उपजाऊ धरती और कृषि-परंपरा की ओर संकेत करती है, जहाँ सोने जैसी सुनहरी फसलें लहलहाती हैं। इससे भारत की धन-धान्य संपन्नता और किसानों के श्रम का सौंदर्य प्रकट होता है। ‘कमलधरे’ भारत की प्राकृतिक सुंदरता, जलाशयों की शोभा और पवित्रता का संकेत है; कमल भारतीय संस्कृति में शुभता और समृद्धि का प्रतीक भी है।
“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?
उत्तर
हिमालय भारत के उत्तर में, यानी नक्शे में सबसे ऊपर, सिर के स्थान पर स्थित है, जैसे मुकुट सिर पर होता है। बर्फ से ढकी उसकी चोटियाँ मुकुट की तरह उज्ज्वल चमकती हैं। मुकुट गौरव और प्रतिष्ठा का प्रतीक है; हिमालय भी भारत का गौरव है, जो उसकी रक्षा करता है और गंगा जैसी नदियों का स्रोत है।
विधा से संवाद – कविता का सौंदर्य
कविता में से दी गई विशेषताओं वाली पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर
विशेषताएँ | कविता की पंक्तियाँ |
प्रकृति का मानवीकरण | “गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल / स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!” (सागर को स्तुति करने वाले भक्त के रूप में दिखाया गया है) |
आलंकारिक प्रयोग | “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” (रूपक); “शतमुख-शतरव-मुखरे” (अनुप्रास); “गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले” (रूपक) |
समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग | “कनक-शस्य-कमलधरे”, “तरु-तृण-वन-लता”, “ज्योतिर्जल-कण”, “बहु-अर्थ-भरे”, “शतमुख-शतरव-मुखरे” |
संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग | “प्राण प्रणव ओंकार, / ध्वनित दिशाएँ उदार”; “लंका पदतल शतदल” |
विषयों से संवाद
स्वतंत्रता-पूर्व लिखी इस कविता में भारत को ज्ञान, कृषि और संस्कृति के प्रतीक/परिचायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान संदर्भ में यदि आपको भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले तो आप भारत की किन विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करेंगे?
उत्तर
(नमूना उत्तर) मैं आज के भारत को परंपरा और आधुनिकता के सुंदर संगम के रूप में प्रस्तुत करूँगा। इसमें चंद्रयान और मंगलयान जैसी अंतरिक्ष उपलब्धियाँ, डिजिटल भुगतान और सूचना-प्रौद्योगिकी, योग और आयुर्वेद, विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनाव-प्रक्रिया, खेलों में बढ़ती सफलता, स्टार्टअप और युवा शक्ति को शामिल करूँगा। साथ ही 22 अनुसूचित भाषाएँ, विविध लोकनृत्य, व्यंजन, हस्तशिल्प, त्योहार, जैव-विविधता और सौर ऊर्जा जैसे हरित प्रयासों को भी दिखाऊँगा।
“शतमुख-शतरव-मुखरे!” पंक्ति में भारत के विविध पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज किस प्रकार ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की संकल्पना को साकार करते हैं?
उत्तर
‘शतमुख-शतरव’ का अर्थ है सैकड़ों मुख और सैकड़ों स्वर। भारत में दीवाली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व, पोंगल, ओणम, बिहू, बैसाखी, छठ, दुर्गापूजा जैसे अनेक पर्व अलग-अलग भाषाओं और रीतियों से मनाए जाते हैं, पर सबमें खुशी, भाईचारा, फसल और प्रकृति के प्रति आभार का भाव समान है। जब एक राज्य के लोग दूसरे राज्य के त्योहार में शामिल होते हैं, उसके व्यंजन चखते और गीत गाते हैं, तो आपसी समझ और जुड़ाव बढ़ता है। इस तरह अनेक स्वर मिलकर एक मधुर राष्ट्र-गीत बनाते हैं, यही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ है।
भारत को सुदृढ़ करने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के महत्व को बताते हुए संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर
(नमूना उत्तर)
सुदृढ़ भारत की तीन जड़ें
भारत की शक्ति केवल सेना या धन में नहीं, उसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा में भी है। हिमालय, गंगा-यमुना जैसी नदियाँ, उपजाऊ मैदान और समुद्र-तट हमें अन्न, जल, खनिज और जीविका देते हैं; इसलिए प्रकृति हमारी आर्थिक नींव है। भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और सहिष्णुता का संदेश देती है, जिससे अनेक धर्मों, भाषाओं और जातियों के लोग एक साथ रहते हैं; यही सामाजिक एकता देश को मज़बूत बनाती है। वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, योग, शून्य और दशमलव की खोज जैसी ज्ञान-परंपरा ने भारत को विश्वगुरु बनाया था और आज यही परंपरा विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। यदि हम प्रकृति की रक्षा करें, संस्कृति का सम्मान करें और ज्ञान को आगे बढ़ाएँ, तो भारत निश्चय ही सुदृढ़ और समृद्ध बनेगा।
कविता में गंगा को भारत के स्वच्छ और श्वेत हार एवं हिमालय को मुकुट के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। वर्तमान संदर्भ में बताइए कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर
आज गंगा सहित अनेक नदियों में कारखानों का रसायनयुक्त पानी, शहरों का सीवेज, प्लास्टिक और पूजन-सामग्री डाली जा रही है, जिससे उनका जल ‘धवल’ नहीं रहा और जलीय जीवों का जीवन संकट में है। कई नदियाँ गर्मियों में सूखने लगी हैं। जलवायु परिवर्तन से तापमान बढ़ रहा है, जिससे हिमालय के हिमनद (ग्लेशियर) तेज़ी से पिघल रहे हैं; इससे भविष्य में नदियों में पानी की कमी हो सकती है। बादल फटना, अचानक बाढ़, भूस्खलन और बेमौसम बर्फबारी की घटनाएँ बढ़ी हैं। पहाड़ों पर अंधाधुंध निर्माण और वनों की कटाई ने भी हिमालय को कमज़ोर किया है। ‘नमामि गंगे’ जैसे प्रयासों के साथ हर नागरिक को भी इन्हें बचाने में योगदान देना होगा।
प्रश्न 5 (विविध रंग भारत के)
आप अपने कक्षा-समूह में मिलकर भारत की सांस्कृतिक विविधता पर आधारित एक पावरपॉइंट प्रस्तुति/पोस्टर/चार्ट/कोलाज तैयार कीजिए और इसे अपनी कक्षा में दिखाइए।
(नमूना उत्तर – प्रस्तुति की रूपरेखा) शीर्षक: ‘विविध रंग भारत के’। स्लाइड 1— भारत का नक्शा और ‘विविधता में एकता’ का नारा। स्लाइड 2— भाषाएँ (संविधान की आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं में ‘नमस्ते’)। स्लाइड 3— वेशभूषा (पगड़ी, साड़ी, फेरन, मेखेला-चादर, मुंडु)। स्लाइड 4— लोकनृत्य (भांगड़ा, गरबा, बिहू, कथकली, घूमर)। स्लाइड 5— व्यंजन (छोले-भटूरे, ढोकला, इडली-डोसा, लिट्टी-चोखा, रसगुल्ला)। स्लाइड 6— त्योहार। स्लाइड 7— निष्कर्ष: अनेक रंग, एक भारत।
सृजन
मान लीजिए आपको भारत को एक मनुष्य के रूप में कल्पित करते हुए सुसज्जित करने का अवसर मिले तो आप अपने राज्य के किन सांस्कृतिक, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, चिह्नों, पुष्पों आदि का प्रयोग कर उसकी साज-सज्जा करेंगे?
उत्तर
(नमूना उत्तर – राजस्थान के आधार पर) मैं भारतमाता को राजस्थान की रंग-बिरंगी लहरिया या बंधेज की ओढ़नी और कढ़ाईदार घाघरा पहनाऊँगा। माथे पर बोरला, गले में तिमनिया हार, हाथों में लाख की चूड़ियाँ और पैरों में चाँदी की पायल होंगी। ओढ़नी पर रोहिड़ा के फूल (राज्य पुष्प) और मोर की आकृतियाँ कढ़ी होंगी। हाथ में मेहंदी और पीछे की ओर किलों तथा रेत के टीलों का दृश्य होगा। साथ में कठपुतली और ढोलक जैसे लोक-कला के प्रतीक भी रहेंगे।
भारत पर आधारित एक डाक टिकट, पोस्टर या पुस्तक के लिए आवरण पृष्ठ बनाइए और बताइए कि आप उसमें किन-किन प्रतीकों को सम्मिलित करेंगे और क्यों?
उत्तर
(नमूना उत्तर) मैं ‘भारति, जय, विजयकरे!’ शीर्षक से एक डाक टिकट बनाऊँगा। ऊपर बर्फीला हिमालय (देश का मुकुट और रक्षक), बीच में बहती गंगा (जीवनदायिनी और संस्कृति की प्रतीक), नीचे सुनहरी गेहूँ की बालियाँ (कृषि और समृद्धि), एक ओर खिला कमल (राष्ट्रीय पुष्प, पवित्रता), दूसरी ओर चंद्रयान (विज्ञान की प्रगति) और किनारे पर अशोक चक्र (धर्म और प्रगति) होगा। पृष्ठभूमि में तिरंगे के तीन रंग होंगे, जो साहस, शांति और समृद्धि दर्शाते हैं।
प्रश्न 3 (नदी की यात्रा)
गंगा नदी की अपने उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी में विलीन होने तक की पूरी यात्रा के बीच में आने वाली प्राकृतिक, सांस्कृतिक, भाषिक आदि विशेषताओं का वर्णन करते हुए एक रोचक यात्रा-वृत्तांत लिखिए।
(नमूना उत्तर)
गोमुख से गंगासागर तक
हमारी यात्रा उत्तराखंड में गंगोत्री हिमनद के गोमुख से शुरू हुई, जहाँ बर्फीली चट्टानों से भागीरथी की निर्मल धारा फूटती है। चारों ओर देवदार के वन और गढ़वाली बोली की मिठास थी। देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा का संगम देखा, जहाँ से यह ‘गंगा’ कहलाती है। ऋषिकेश के लक्ष्मण झूले और हरिद्वार की हर की पौड़ी पर संध्या-आरती के दीपों ने मन मोह लिया। मैदानों में उतरते ही गंगा चौड़ी और शांत हो गई; किनारे गेहूँ-धान के लहलहाते खेत थे। प्रयागराज में गंगा-यमुना का संगम और कुंभ की परंपरा, फिर वाराणसी के प्राचीन घाट, बनारसी साड़ियाँ और भोजपुरी लोकगीत मिले। पटना में बिहार की छठ पूजा की झलक दिखी। बंगाल पहुँचकर गंगा हुगली बनी; कोलकाता में रवींद्र संगीत, रसगुल्ले और दुर्गापूजा की रौनक थी। अंत में सुंदरबन के मैंग्रोव वनों और रॉयल बंगाल टाइगर के प्रदेश से होते हुए गंगासागर में गंगा बंगाल की खाड़ी में समा गई। इस यात्रा ने सिखाया कि गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि अनेक भाषाओं और संस्कृतियों को जोड़ने वाली जीवनरेखा है।
भाषा से संवाद – व्याकरण की बात
प्रश्न 1 (बहुभाषी देश हमारा)
यदि आपको एक सचेत नागरिक के रूप में भारत से अपनी मातृभाषा में संवाद का अवसर मिले तो आप किन विषयों पर और क्या-क्या संवाद करना चाहेंगे? इन संवादों को अपनी मातृभाषा और हिंदी में लिखिए। (संकेत– समाज, पर्यावरण, संस्कृति आदि।)
उत्तर
(नमूना उत्तर – हिंदी में; विद्यार्थी इन्हें अपनी मातृभाषा में भी लिखें)
मैं: माँ भारती, तुम्हारी नदियाँ मैली क्यों होती जा रही हैं?
भारत: क्योंकि मेरे बच्चे उनमें कचरा डालते हैं। तुम उन्हें बचाने में मदद करोगे?
मैं: हाँ, मैं प्लास्टिक का कम प्रयोग करूँगा और दूसरों को भी समझाऊँगा।
भारत: और समाज में बेटा-बेटी के भेदभाव के बारे में क्या सोचते हो?
मैं: सबको पढ़ने और आगे बढ़ने का समान अवसर मिलना चाहिए।
भारत: अपनी भाषा और लोककलाओं को मत भूलना, यही मेरी पहचान हैं।
मैं: वचन देता हूँ माँ, मैं अपनी संस्कृति पर गर्व करूँगा।
प्रश्न 2 (मातृभाषा और भाव)
आप भी अपनी मातृभाषा में भारत की स्तुति के लिए एक कविता की रचना कीजिए और उसका भावार्थ हिंदी में भी लिखिए।
(नमूना उत्तर – हिंदी में)
हिम का मुकुट, सागर पग धोए,
खेतों में सोना, नदियाँ मोती पिरोए।
भाषा अनेक, पर एक है गान,
जय हो, जय हो, मेरा हिंदुस्तान!
भावार्थ: हिमालय भारत का मुकुट है और सागर उसके चरण धोता है। खेतों में सुनहरी फसलें हैं और नदियाँ मानो मोती पिरोती हैं। यहाँ अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, पर सबका स्वर एक ही है— भारत की जय।
प्रश्न 3 (समास— समस्त पद एवं विग्रह)
कविता में से चुनकर दिए गए सामासिक पदों (शब्दों) के समास-विग्रह लिखिए— शतदल, ज्योतिर्जल, शतमुख, सागरजल
समस्त पद | समास-विग्रह | समास |
शतदल | शत (सौ) हैं दल (पंखुड़ियाँ) जिसके, अर्थात कमल | बहुव्रीहि समास |
ज्योतिर्जल | ज्योति के समान (उज्ज्वल) जल / ज्योति से युक्त जल | कर्मधारय समास |
शतमुख | शत (सौ) मुखों का समूह | द्विगु समास |
सागरजल | सागर का जल | तत्पुरुष समास (संबंध तत्पुरुष) |
(टिप्पणी: ‘ज्योतिर्जल’ में ‘ज्योतिः + जल’ की विसर्ग संधि भी है। यदि ‘शतमुख’ को ‘सौ मुखों वाली (भारती)’ अर्थ में लें, तो वह बहुव्रीहि होगा।)
प्रश्न 4 (अलंकार— समझ और प्रयोग)
(क) कविता में जहाँ-जहाँ अनुप्रास अलंकार आया है, उन पंक्तियों को खोजकर लिखिए।
1. “कनक-शस्य-कमलधरे!” — ‘क’ वर्ण की आवृत्ति।
2. “लंका पदतल शतदल” — ‘ल’ वर्ण की आवृत्ति।
3. “तरु-तृण-वन-लता वसन” — ‘त’ वर्ण की आवृत्ति।
4. “धवल धार हार गले” — ‘ध’ और ‘र’ वर्ण की आवृत्ति।
5. “प्राण प्रणव ओंकार” — ‘प’ और ‘र’ वर्ण की आवृत्ति।
6. “शतमुख-शतरव-मुखरे!” — ‘श’ और ‘म’ वर्ण की आवृत्ति।
(ख) कविता की उन पंक्तियों को खोजिए जहाँ रूपक अलंकार है। साथ ही यह भी बताइए कि कवि ने किस प्राकृतिक दृश्य या वस्तु को भारत का रूप मानकर चित्रित किया है?
उत्तर
पंक्ति | प्राकृतिक वस्तु | भारतमाता का कौन-सा रूप |
“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” | बर्फ से ढका हिमालय | मुकुट |
“तरु-तृण-वन-लता वसन” | पेड़, घास, वन, लताएँ | वस्त्र |
“अंचल में खचित सुमन” | फूल | आँचल में जड़ी कढ़ाई |
“गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले” | गंगा की उजली धारा | गले का हार |
“लंका पदतल शतदल” | लंका (द्वीप) | चरणों के नीचे का कमल |
“प्राण प्रणव ओंकार” | ओंकार का नाद | प्राण |
गतिविधियाँ – मिलकर लें शपथ
वन, लता, पुष्प आदि भारत के अमूल्य प्राकृतिक संसाधन हैं। इनके संरक्षण के लिए सरकार द्वारा बनाए गए अधिनियमों के बारे में सूचना एकत्रित कीजिए और वन संरक्षण के लिए बनाए नियमों पर विचार कीजिए।
उत्तर
प्रमुख अधिनियम: (1) वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 — वन्य जीवों के शिकार पर रोक, राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य। (2) वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 — वन भूमि को गैर-वन कार्यों में लगाने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति आवश्यक। (3) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 — पर्यावरण की रक्षा के लिए व्यापक नियम। (4) जैव विविधता अधिनियम, 2002 — जैव संसाधनों का संरक्षण और उचित उपयोग। (5) अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 — वनवासियों के अधिकार और वनों की देखभाल में उनकी भागीदारी।
विचार: ये नियम तभी सफल होंगे जब लोग स्वयं जागरूक हों। (नमूना शपथ) “हम शपथ लेते हैं कि पेड़ नहीं काटेंगे, हर वर्ष कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करेंगे, वनों में आग और कचरा नहीं फैलाएँगे तथा वन्य जीवों को कष्ट नहीं पहुँचाएँगे।”
प्रश्न 2 (भाषा संगम)
यदि आप ‘शस्य’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए। “कनक-शस्य-कमलधरे” को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
(नमूना उत्तर) अंग्रेज़ी में ‘शस्य’ को crop या harvest कहते हैं।
सरल हिंदी में: “हे सोने जैसी फसलों और कमल को धारण करने वाली (भारतमाता)!”
अंग्रेज़ी में: “O (Mother India), bearer of golden crops and lotuses!”
झरोखे से
मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘जय जय भारतमाता’ का अंश पढ़िए। (इस कविता को पुस्तकालय से ढूँढ़कर पूरा पढ़िए।)
उत्तर
(नमूना उत्तर – तुलना) निराला की तरह मैथिलीशरण गुप्त ने भी भारत को माता मानकर उसकी जय-जयकार की है और हिमालय का वर्णन किया है। निराला ने हिमालय को भारत का उज्ज्वल ‘मुकुट’ कहा, जबकि गुप्त जी ने उसे भारत का ‘ऊँचा हिया’ (हृदय) बताया है, जो अपने भीतर आग और दर्द दबाकर भी हमें हरा-भरा रखता है और सैकड़ों सोतों से पानी बहाता है। निराला की भाषा संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त है, जबकि गुप्त जी की भाषा अपेक्षाकृत सरल है।
खोजबीन
देशप्रेम से संबंधित अन्य कविताएँ पुस्तकालय, इंटरनेट से खोजकर पढ़िए और किसी एक कविता का कक्षा में वाचन भी कीजिए। निराला की एक अन्य कविता ‘वर दे, वीणावादिनि वर दे!’ ढूँढ़कर पढ़िए।
उत्तर
(नमूना उत्तर) देशप्रेम की कुछ प्रसिद्ध कविताएँ हैं— माखनलाल चतुर्वेदी की ‘पुष्प की अभिलाषा’, सुभद्रा कुमारी चौहान की ‘झाँसी की रानी’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ‘कलम, आज उनकी जय बोल’ और जयशंकर प्रसाद की ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’। मैंने कक्षा में ‘पुष्प की अभिलाषा’ का वाचन किया। निराला की ‘वर दे, वीणावादिनि वर दे!’ में कवि सरस्वती से भारत में नई स्वतंत्रता, नए ज्ञान और नई चेतना का वरदान माँगते हैं; इसकी भाषा भी ‘भारति, जय, विजयकरे!’ की तरह संस्कृतनिष्ठ है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
कविता में भारतमाता के चरण कौन धोता है?
उत्तर
(क) गंगा (ख) सागर-जल (ग) वर्षा (घ) हिमालय
उत्तर: (ख) सागर-जल
2. ‘शतदल’ का अर्थ है
(क) सौ सेनाएँ (ख) कमल (ग) सौ दल (राजनीतिक) (घ) बादल
उत्तर: (ख) कमल
कविता में भारतमाता के गले का हार किसे कहा गया है?
उत्तर
(क) फूलों की माला (ख) गंगा की धवल धारा (ग) हिमालय (घ) लंका
उत्तर: (ख) गंगा की धवल धारा
निराला ने छायावादी कवियों में सबसे पहले किसका प्रयोग किया?
उत्तर
(क) दोहा छंद (ख) मुक्त छंद (ग) सवैया (घ) चौपाई
उत्तर: (ख) मुक्त छंद
5. ‘प्रणव’ शब्द का अर्थ है
(क) प्रणाम (ख) ओंकार (ग) प्राण (घ) प्रेम
उत्तर: (ख) ओंकार
लघु उत्तरीय प्रश्न
‘तरु-तृण-वन-लता वसन’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर
कवि कहते हैं कि भारत की धरती पर फैले पेड़, घास, वन और लताएँ भारतमाता के हरे-भरे वस्त्र हैं। इससे भारत की हरियाली और प्राकृतिक समृद्धि का सुंदर चित्र उभरता है।
‘स्तव कर बहु-अर्थ-भरे’ में कौन, किसकी स्तुति कर रहा है?
उत्तर
गरजती लहरों वाला सागर भारतमाता के चरण धोते हुए उनकी स्तुति कर रहा है। उसकी लहरों का गर्जन मानो अनेक अर्थों से भरी प्रशंसा के गीत हैं।
कविता में भारत को किस रूप में चित्रित किया गया है?
उत्तर
कविता में भारत को एक चेतन देवी, भारतमाता के रूप में चित्रित किया गया है। हिमालय उनका मुकुट, गंगा हार, वनस्पतियाँ वस्त्र, फूल आँचल की कढ़ाई और ओंकार उनका प्राण है।
4. निराला की चार प्रमुख काव्य रचनाओं के नाम लिखिए।
निराला की प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं— अनामिका, परिमल, गीतिका और कुकुरमुत्ता। ‘नए पत्ते’ भी उनकी प्रसिद्ध रचना है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
‘भारति, जय, विजयकरे!’ कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक गरिमा का चित्रण किस प्रकार हुआ है?
उत्तर
निराला ने भारत को देवी के रूप में देखकर उसके प्राकृतिक सौंदर्य को उसके शृंगार के रूप में प्रस्तुत किया है। दक्षिण में लंका उसके चरणों के नीचे कमल है और गरजता सागर उसके चरण पखारता है। पेड़, घास, वन और लताएँ उसके वस्त्र हैं, फूल आँचल में जड़े हैं, गंगा की उजली धारा गले का हार है और हिमालय उज्ज्वल मुकुट है। सुनहरी फसलें उसकी समृद्धि दिखाती हैं। सांस्कृतिक गरिमा के रूप में कवि बताते हैं कि ओंकार उसका प्राण है, जिसकी गूँज सब दिशाओं में है, और वह सैकड़ों मुखों और स्वरों से मुखरित है। इस प्रकार प्रकृति, समृद्धि, ज्ञान और विविधता मिलकर भारत का भव्य चित्र बनाते हैं।
2. कविता की भाषा-शैली की विशेषताएँ लिखिए।
कविता की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है, जिसमें शस्य, शतदल, शुचि, स्तव, प्रणव, शुभ्र जैसे तत्सम शब्द हैं। ‘कनक-शस्य-कमलधरे’, ‘तरु-तृण-वन-लता’ और ‘शतमुख-शतरव-मुखरे’ जैसे समस्त पदों ने भाषा को कसा हुआ और गंभीर बनाया है। कविता संबोधन शैली में है और ‘भारति’, ‘कमलधरे’ जैसे संबोधन इसे वंदना-गीत बनाते हैं। अनुप्रास (कनक-शस्य-कमलधरे), रूपक (मुकुट शुभ्र हिम-तुषार) और मानवीकरण (सागर द्वारा चरण धोना) का सुंदर प्रयोग है। छोटी-छोटी पंक्तियों और तुकांत (शतदल-जल-युगल) के कारण इसमें संगीतात्मकता और गेयता है।