Circle of Learning • नई NCERT पाठ्यपुस्तक "गंगा" (2026-27) • पाठ के सभी प्रश्नों के उत्तर
कवि परिचय: गोस्वामी तुलसीदास का जन्म आज के उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका जीवन-काल 16वीं–17वीं शताब्दी (सन् 1532–1623) के मध्य माना गया है। ‘रामचरितमानस’ उनका प्रसिद्ध महाकाव्य है। कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, विनयपत्रिका और हनुमान बाहुक उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं। उनका अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था; रामचरितमानस अवधी में और विनयपत्रिका तथा कवितावली ब्रजभाषा में रची गई हैं। काशी में उनका देहावसान हुआ। प्रस्तुत अंश रामचरितमानस के ‘बालकांड’ से लिया गया है।
काव्यांश की व्याख्या / भावार्थ
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥
सरल भावार्थ: परशुराम का भयानक वेश देखते ही सभा में बैठे सभी राजा भय से व्याकुल होकर उठ खड़े हुए। वे अपने पिता के नाम सहित अपना-अपना नाम बताकर उन्हें दंडवत प्रणाम करने लगे। परशुराम जिसे सहज भाव से, उसका हितैषी मानकर भी देख लेते, वह समझता कि अब उसकी आयु पूरी हो गई। फिर राजा जनक ने आकर सिर झुकाया और सीता को बुलाकर उनसे प्रणाम करवाया।
अंश 2
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।
पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥
सरल भावार्थ: परशुराम ने सीता को आशीर्वाद दिया, जिससे सखियाँ प्रसन्न हुईं और वे चतुर सखियाँ सीता को अपनी मंडली में ले गईं। फिर विश्वामित्र आकर मिले और उन्होंने दोनों भाइयों को परशुराम के कमल जैसे चरणों में डाल दिया (प्रणाम करवाया)। विश्वामित्र ने बताया कि ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथ के पुत्र हैं। सुंदर जोड़ी देखकर परशुराम ने आशीर्वाद दिया। कामदेव के भी गर्व को हरने वाले राम के अपार रूप को देखकर उनकी आँखें ठहर गईं। फिर उन्होंने चारों ओर देखकर जनक से पूछा— कहो, यह इतनी भीड़ क्यों है? वे जानते हुए भी अनजान की तरह पूछ रहे थे और उनके शरीर में क्रोध व्याप्त हो गया।
अंश 3
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥
सरल भावार्थ: जनक ने वह सारा समाचार सुनाया, जिस कारण सब राजा आए थे। यह सुनकर परशुराम ने दूसरी ओर देखा तो धरती पर पड़े धनुष के टुकड़े दिखाई दिए। वे अत्यंत क्रोध में कठोर वचन बोले— अरे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा? उसे जल्दी दिखा, नहीं तो आज जहाँ तक तेरा राज्य है, वहाँ तक की धरती उलट दूँगा।
अंश 4
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥
सरल भावार्थ: अत्यधिक भय के कारण राजा जनक उत्तर नहीं दे पा रहे थे। यह देखकर कुटिल राजा मन ही मन प्रसन्न हुए। देवता, मुनि, नाग और नगर के सभी स्त्री-पुरुष चिंतित थे; सबके हृदय में भारी भय था। सीता की माता मन में पछता रही थीं कि विधाता ने अब बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। परशुराम का स्वभाव सुनकर सीता के लिए आधा पल भी एक कल्प के समान बीत रहा था। जब श्रीराम ने देखा कि सब लोग भयभीत हैं और सीता डरी हुई हैं, तब वे बोले; उनके हृदय में न कोई हर्ष था, न विषाद।
अंश 5
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सरल भावार्थ: राम ने विनम्रता से कहा— हे नाथ! शिवजी का धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा। आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर क्रोधी मुनि और भी क्रोधित होकर बोले— सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे; शत्रु जैसा काम करके तो लड़ाई ही करनी चाहिए। हे राम! सुनो, जिसने शिवजी का धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है। वह इस समाज को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे।
अंश 6
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥
सरल भावार्थ: मुनि के वचन सुनकर लक्ष्मण मुस्कराए और परशुराम का उपहास करते हुए बोले— हे गोसाईं! बचपन में हमने बहुत-सी धनुहियाँ (छोटे धनुष) तोड़ डालीं, पर आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। इसी धनुष पर इतनी ममता किस कारण है? यह सुनकर भृगुवंश के ध्वजा-स्वरूप परशुराम क्रोधित होकर बोले— अरे राजपुत्र! काल के वश होकर तुझे बोलने का होश नहीं है। सारे संसार में प्रसिद्ध शिवजी का धनुष क्या छोटी धनुही के समान है?
रचना से संवाद – मेरे उत्तर मेरे तर्क
“पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?
उत्तर
(क) आदर और सम्मान (ख) भक्ति और श्रद्धा (ग) भय और शिष्टाचार (घ) प्रेम और सहिष्णुता
उत्तर: (ग) भय और शिष्टाचार।
तर्क: इससे पहले की पंक्ति में ही कहा गया है— “उठे सकल भय बिकल भुआला।” राजा परशुराम का भयानक वेश देखकर डर गए थे और अपने क्रोध से बचने के लिए शिष्टाचारवश पिता के नाम सहित अपना परिचय देकर दंडवत प्रणाम करने लगे।
“जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?
उत्तर
(क) संवेदनशीलता (ख) शिष्टता (ग) सहनशीलता (घ) उदासीनता
उत्तर: (ख) शिष्टता।
तर्क: जनक स्वयं आकर परशुराम को सिर झुकाते हैं और सीता को बुलाकर उनसे भी प्रणाम करवाते हैं। यह आए हुए ऋषि का आदर करने वाला शिष्ट और मर्यादित व्यवहार है।
“अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था—
उत्तर
(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना (ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना (ग) शिव-धनुष का खंडित होना (घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
उत्तर: (ग) शिव-धनुष का खंडित होना।
तर्क: परशुराम ने “देखे चापखंड महि डारे”, अर्थात धरती पर धनुष के टुकड़े देखे, और तभी अत्यंत क्रोधित होकर पूछा— “कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।”
राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
उत्तर
(क) कूटनीति और चतुराई (ख) विनम्रता और मर्यादा (ग) त्याग और समर्पण (घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
उत्तर: (ख) विनम्रता और मर्यादा।
तर्क: धनुष स्वयं राम ने तोड़ा था, फिर भी वे परशुराम को ‘नाथ’ कहकर स्वयं को उनका दास बताते हैं और आज्ञा माँगते हैं। यह बड़ों के प्रति विनम्रता और मर्यादित आचरण है।
“सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?
उत्तर
(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे। (ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था। (ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे। (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
उत्तर: (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
तर्क: परशुराम ने धनुष तोड़ने वाले को सहस्रबाहु के समान शत्रु बताकर सब राजाओं को मारने की धमकी दी थी। लक्ष्मण इस अहंकार भरी धमकी से डरे नहीं, बल्कि “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं” कहकर व्यंग्य से उनके क्रोध को चुनौती दी।
रचना से संवाद – मेरी समझ मेरे विचार
“अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
उत्तर
इस पंक्ति का भाव है कि आधा पल भी एक कल्प (युगों जितने लंबे समय) के समान बीत रहा था। यह सीता के संदर्भ में कहा गया है। परशुराम का क्रोधी स्वभाव सुनकर सीता डर गई थीं कि कहीं उनका क्रोध राम पर न टूट पड़े और उनका विवाह संकट में न पड़ जाए। चिंता और भय की स्थिति में समय काटे नहीं कटता, इसलिए उन्हें एक-एक क्षण बहुत लंबा लग रहा था।
“सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर
इस चेतावनी से सभा के राजा और भी भयभीत हो गए होंगे, क्योंकि वे पहले ही परशुराम का कराल वेश देखकर “भय बिकल” थे और परशुराम के क्रोध से सारा क्षत्रिय समाज परिचित था। अब बिना दोष के सबके प्राणों पर संकट आ गया था। कई राजा चाहते होंगे कि धनुष तोड़ने वाला जल्दी सामने आ जाए ताकि उनकी जान बचे। वहीं, ईर्ष्यालु और कुटिल राजा मन ही मन प्रसन्न भी हुए होंगे कि अब राम संकट में पड़ेंगे। सभा में तनाव, सन्नाटा और घबराहट का वातावरण बन गया होगा।
तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
मेरी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का विनय का मार्ग अधिक उचित है। क्रोधी व्यक्ति के सामने तर्क और व्यंग्य करने से उसका क्रोध और भड़कता है; पाठ में भी लक्ष्मण के व्यंग्य से परशुराम और “रिसाइ” गए। इसके विपरीत, राम के शांत, विनम्र वचन सामने वाले के अहं को चोट नहीं पहुँचाते और बातचीत का रास्ता खोलते हैं। पाठ की टिप्पणी बताती है कि अंततः राम के विनय और विश्वामित्र के समझाने से ही परशुराम शांत हुए। फिर भी लक्ष्मण का तर्क यह दिखाता है कि अन्याय या अहंकार के सामने चुप रहना भी ठीक नहीं; पर उसे कहने का ढंग संयमित होना चाहिए। (नमूना उत्तर)
‘हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥’ श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
उत्तर
यह पंक्ति राम के धैर्य, संयम, स्थिरबुद्धि, गंभीरता और आत्मविश्वास को दर्शाती है। धनुष तोड़ने की सफलता पर उन्हें घमंड नहीं है और परशुराम के क्रोध से वे घबराते भी नहीं। पूरे पाठ में अन्य पात्र किसी न किसी भाव में बहे हुए हैं— राजा भय से व्याकुल हैं, जनक डर से मौन हैं, कुटिल राजा ईर्ष्या से प्रसन्न हैं, सुनयना चिंतित हैं, सीता व्याकुल हैं, परशुराम क्रोध में हैं और लक्ष्मण व्यंग्य कर रहे हैं। केवल राम ही संतुलित रहकर सबके भय को समझते हैं और आगे बढ़कर विनम्रता से स्थिति सँभालते हैं। यही संतुलन उन्हें आदर्श नायक और मर्यादा पुरुषोत्तम बनाता है।
रचना से संवाद – मेरी कल्पना मेरे अनुमान
कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
(नमूना उत्तर) मैं अंगदेश का राजा हूँ और सीता-स्वयंवर में आया था। राम ने जैसे ही शिव-धनुष तोड़ा, सभा में जय-जयकार होने लगी। तभी अचानक कंधे पर फरसा लिए, जटाधारी परशुराम सभा में आ पहुँचे। उनका भयानक रूप देखकर हम सब काँप उठे और पिता का नाम लेकर उन्हें प्रणाम करने लगे। जनक जी ने सीता से प्रणाम करवाया और विश्वामित्र जी ने राम-लक्ष्मण का परिचय दिया। फिर परशुराम की दृष्टि टूटे धनुष पर पड़ी और वे गरज उठे कि धनुष तोड़ने वाला सामने आए, नहीं तो सब राजा मारे जाएँगे। मेरा तो दिल बैठ गया! राम ने अत्यंत विनम्रता से स्वयं को उनका दास बताया, पर लक्ष्मण ने व्यंग्य करके उनके क्रोध को और भड़का दिया। देर तक कहा-सुनी चलती रही। अंत में राम के विनय, विश्वामित्र के समझाने और राम की शक्ति की परीक्षा के बाद परशुराम का क्रोध शांत हुआ और वे राम को आशीर्वाद देकर तप के लिए वन को लौट गए। तब जाकर हमारी साँस में साँस आई।
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे? (संकेत– सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)
उत्तर
जो राजा स्वयं धनुष नहीं तोड़ पाए थे, वे राम की सफलता और सीता से उनके विवाह से ईर्ष्या कर रहे थे। जनक को चुप और परशुराम को क्रोधित देखकर उन्हें लगा कि अब राम संकट में पड़ेंगे, विवाह टल सकता है और उनका अपमान भी धुल जाएगा। यह मनुष्य के व्यवहार की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि ईर्ष्यालु लोग अपनी असफलता पर दुखी होने के बजाय दूसरों की परेशानी में सुख ढूँढ़ते हैं।
विधा से संवाद – कविता का सौंदर्य
कविता के संवादों की विशेषताओं को दर्शाने वाली पंक्तियों के उदाहरण कविता से ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर
संवादों की विशेषता | उदाहरण |
राम की विनम्रता | “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ आयसु काह कहिअ किन मोही।” |
परशुराम का रौद्र रूप | “अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥ बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥” |
लक्ष्मण का प्रत्युत्तर | “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥ एहि धनु पर ममता केहि हेतू।” |
पौराणिक संदर्भ | “सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥” / “धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥” |
नाटकीयता | “बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर। पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥” / “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने।” |
विधा से संवाद – भाव-पहचान एवं विश्लेषण
दिए गए भावों/मनःस्थिति (चिंता, क्रोध, व्यग्रता, भय, संयम/विनम्रता, ईर्ष्या/कुटिलता) को दर्शाने वाली पंक्तियों को कविता से चिह्नित कीजिए और बताइए कि यह भाव किस पात्र से संबंधित है और उसकी इस मनःस्थिति का कारण क्या है?
उत्तर
भाव/मनःस्थिति | संबंधित पंक्ति | संबंधित पात्र | मनःस्थिति का कारण |
चिंता | बिधि अब सँवरी बात बिगारी | सीता की माता सुनयना | पुत्री सीता के भविष्य (विवाह) के प्रति आशंकित और चिंतित |
क्रोध | अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥ | परशुराम | अपने आराध्य शिव का धनुष टूटा हुआ देखना |
व्यग्रता | भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥ | सीता | परशुराम के क्रोधी स्वभाव से राम पर संकट और विवाह में बाधा की आशंका |
भय | देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥ / अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। | सभा के राजा; राजा जनक | परशुराम का भयानक वेश और सबको मारने की धमकी |
संयम/विनम्रता | हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥ / होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ | राम | सबको भयभीत देखकर स्थिति सँभालना और गुरुजन का आदर करना |
ईर्ष्या/कुटिलता | कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ | कुटिल राजा | स्वयं धनुष न तोड़ पाने की हार और राम की सफलता से जलन |
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।” परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय? संवाद की स्थिति के आधार पर विश्लेषण कीजिए।
उत्तर
संदर्भ: धनुष टूट चुका था। परशुराम ने टुकड़े देखकर जनक को “जड़” और “मूढ़” कहकर पूछा कि धनुष किसने तोड़ा, और राज्य की धरती उलट देने की धमकी दी।
कारण
⇒ भाव
⇒ परिणाम: कवि स्वयं कहते हैं “अति डरु”, अतः मौन का तात्कालिक कारण भय है। परंतु जनक यह भी जानते थे कि यदि वे राम का नाम बता दें तो परशुराम का क्रोध सीधे राम पर टूटेगा और उत्तर न दें तो राज्य पर संकट है। इस दुविधा में चुप रहना ही उन्हें सुरक्षित लगा। परिणामस्वरूप, उत्तर देने का अवसर राम को मिला, जिन्होंने विनम्रता से स्थिति सँभाल ली।
निष्कर्ष: इससे स्पष्ट होता है कि जनक का मौन मुख्यतः भयजनित था, किंतु उसमें अनजाने में विवेक भी छिपा था, क्योंकि क्रोध के क्षण में कुछ भी बोलना स्थिति को और बिगाड़ सकता था।
विधा से संवाद – काव्य-पंक्ति और भाव
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥”
उत्तर
(क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
उत्तर
इन पंक्तियों को बोलते समय चेहरे पर तीव्र क्रोध और तिरस्कार का भाव होता— भौंहें तनी हुई, आँखें लाल और फैली हुई, आवाज़ ऊँची और गरजती हुई, तथा अपमान से आहत गर्व का भाव। ‘रे नृप बालक’ कहते हुए उपेक्षा और ‘तिपुरारि धनु’ कहते हुए श्रद्धा मिश्रित रोष झलकता।
(ख) निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे— परशुराम, राजा जनक, लक्ष्मण, राम, सभा में उपस्थित अन्य राजा
पात्र | भाव |
परशुराम | क्रोध, अहंकार, रौद्रता, शिव-धनुष के प्रति ममता |
राजा जनक | भय, विनम्रता, शिष्टता, असमंजस |
लक्ष्मण | निर्भीकता, व्यंग्य, उत्साह, भाई के प्रति प्रेम |
राम | शांति, धैर्य, विनम्रता, संयम |
सभा में उपस्थित अन्य राजा | भय और घबराहट; कुटिल राजाओं में ईर्ष्या और भीतरी प्रसन्नता |
विषयों से संवाद
सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदात्त चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।
उत्तर
(नमूना उत्तर) जब कोई बड़ा व्यक्ति, जैसे शिक्षक या दादाजी, किसी गलतफहमी के कारण मुझ पर नाराज़ होते हैं, तब मैं बहस करने के बजाय शांति से अपनी बात रखता हूँ। कक्षा प्रतिनिधि के रूप में जब दो सहपाठियों में झगड़ा होता है, तो धैर्य से दोनों की बात सुनकर निष्पक्ष समाधान निकालना पड़ता है। खेल में हारने पर विरोधी टीम को बधाई देना और जीतने पर घमंड न करना भी मर्यादा का परिचय है। दुकान या बस में कोई अपमानजनक बात कह दे, तब भी संयम रखकर विनम्रता से उत्तर देना पड़ता है।
प्राचीन भारतीय समाज में वर-चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। ऐसी किसी एक पौराणिक-ऐतिहासिक आदि घटना/प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।
उत्तर
द्रौपदी स्वयंवर (महाभारत): पांचाल नरेश द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी के लिए स्वयंवर का आयोजन किया। शर्त यह थी कि जो वीर ऊपर घूमती हुई मछली की आँख को नीचे रखे जल में उसका प्रतिबिंब देखकर बाण से भेद देगा, उसी से द्रौपदी का विवाह होगा। अनेक राजा धनुष पर प्रत्यंचा तक नहीं चढ़ा सके। तब ब्राह्मण वेश में आए अर्जुन ने धनुष उठाया और लक्ष्य भेद दिया। द्रौपदी ने अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी। इस प्रसंग से पता चलता है कि स्वयंवर में कन्या योग्यता की परीक्षा के आधार पर वर चुनती थी।
सृजन
परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।
उत्तर
(नमूना उत्तर)
सुनयना (आँखों से): बेटी, विधाता ने यह क्या कर दिया! अभी तो खुशी आई ही थी।
सीता (नज़रें झुकाकर): माँ, मेरा मन बहुत घबरा रहा है। मुनिवर का क्रोध कहीं उन पर न टूट पड़े।
सुनयना: धीरज रखो। देखो, राम कितने शांत खड़े हैं।
सीता: हाँ माँ, उनके मुख पर कोई भय नहीं। पर यह आधा पल भी युग जैसा लंबा लग रहा है।
सुनयना: भगवान शंकर से प्रार्थना करो, बेटी। जिसने उनका धनुष उठाया, उसकी रक्षा वे ही करेंगे।
सीता (मन ही मन): हे भवानी! यह संकट टल जाए।
सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए। (संकेत– लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)
उत्तर
(नमूना उत्तर) धनुष टूटने पर सीता के मन में आनंद था, पर परशुराम के आते ही वह आनंद भय में बदल गया। जब परशुराम ने धरती उलट देने की धमकी दी, तो उन्हें पिता की चिंता हुई। राम के शांत और विनम्र वचनों पर उनके मन में गर्व और भरोसा जागा होगा। फिर लक्ष्मण ने “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं” कहकर व्यंग्य किया, तो एक क्षण उन्हें हँसी भी आई होगी, पर तुरंत यह शंका उठी होगी कि कहीं इससे मुनि का क्रोध और न भड़क जाए। इस प्रकार सीता का मन आनंद, भय, चिंता, गर्व, हँसी और शंका के बीच झूलता रहा। सीता की दृष्टि से यह घटना उनके धैर्य की परीक्षा थी, जिसमें अंततः राम के विनय ने उनका विश्वास सही सिद्ध किया।
यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।
उत्तर
(नमूना उत्तर) मेरा नाम अनन्या है और मैं कक्षा नौ की विद्यार्थी हूँ। मैं अपने माता-पिता और छोटे भाई के साथ रहती हूँ। मुझे विज्ञान और हिंदी कविताएँ पढ़ना अच्छा लगता है। मैं विद्यालय की इको-क्लब की सदस्य हूँ और हर महीने पौधारोपण में भाग लेती हूँ। मैं समय की पाबंद हूँ, पर कभी-कभी जल्दबाज़ी कर बैठती हूँ, जिसे सुधारने का प्रयास कर रही हूँ। मेरा सपना एक अच्छी डॉक्टर बनकर गाँवों में सेवा करना है।
भाषा से संवाद – व्याकरण की बात
कविता की विशेषताओं के एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप लिखिए।
उत्तर
विशेषता | अर्थ | पुस्तक में दिया उदाहरण | अन्य उदाहरण |
अनुप्रास अलंकार | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | अरि करनी करि करिअ लराई | सुर मुनि नाग नगर नर नारी (‘न’ की आवृत्ति) |
अतिशयोक्ति अलंकार | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | अरध निमेष कलप सम बीता | उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू (राज्य भर की धरती उलट देना) |
रूपक अलंकार | रूप का आरोपण करना | पद सरोज मेले दोउ भाई | सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू (परशुराम पर भृगुकुल के ‘केतु’ अर्थात ध्वज का आरोप) |
परशुराम के लिए प्रयुक्त अन्य नाम: भृगुपति, परसुधर, भृगुकुलकेतू, मुनि कोही, गोसाईं।
भाषा से संवाद – बहुभाषिकता
कविता में आए अवधी भाषा के शब्दों को पहचान कर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए। साथ ही आपकी भाषा में इनके लिए कौन-से शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन्हें भी लिखिए।
उत्तर
अवधी शब्द | खड़ी बोली का शब्द | मेरी भाषा में शब्द (नमूना – अंग्रेज़ी) |
कोही | क्रोधी | angry |
बेषु | वेष | dress, attire |
भुआला | भूपाल, राजा | king |
सीय | सीता | Sita |
ढोटा | पुत्र, बेटा | son |
बेगि | शीघ्र, जल्दी | quickly |
महतारी | माता, माँ | mother |
उतरु | उत्तर | answer |
रिस | क्रोध, गुस्सा | anger |
तोरा | तोड़ा | broke |
भाषा से संवाद – लोक में भाषा
कोष्ठक में दिए शब्दों (मन, राम, राजा, बात, सिरु) से संबंधित लोकोक्ति और उनका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर
शब्द | लोकोक्ति | अर्थ | वाक्य-प्रयोग |
मन | मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। | आत्मविश्वास, साहस और मनोबल से सफलता निश्चित है। | चोट के बाद भी धाविका ने हिम्मत नहीं हारी और पदक जीत लिया; सच है, मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। |
राम | मुँह में राम, बगल में छुरी। | ऊपर से मीठा व्यवहार, पर मन में कपट। | वह सामने तो तारीफ़ करता है पर पीछे बुराई करता है; उसका व्यवहार मुँह में राम, बगल में छुरी वाला है। |
राजा | जैसा राजा, वैसी प्रजा। | शासक या मुखिया जैसा आचरण करता है, अनुयायी भी वैसे ही बन जाते हैं। | प्रधानाचार्य स्वयं समय पर आते हैं, इसलिए सारे शिक्षक भी समय के पाबंद हैं; जैसा राजा, वैसी प्रजा। |
बात | बातन हाथी पाइए, बातन हाथी पाँव। | मधुर वाणी से सम्मान मिलता है और कटु वाणी से दंड। | मीठा बोलकर उसने सबका दिल जीत लिया; ठीक कहा गया है— बातन हाथी पाइए, बातन हाथी पाँव। |
सिरु (सिर) | सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े। | काम शुरू करते ही बाधा आ जाना। | दुकान के उद्घाटन के दिन ही बिजली चली गई; इसे कहते हैं सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े। |
भाषा से संवाद – गद्य-रूप
नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए— “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥”
उत्तर
अत्यधिक डर के कारण राजा जनक परशुराम को कोई उत्तर नहीं दे रहे थे। उन्हें चुप देखकर सभा में बैठे कुटिल राजा मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे। देवता, मुनि, नाग तथा नगर के सभी स्त्री-पुरुष चिंता में पड़ गए थे; सबके हृदय में भारी भय समाया हुआ था।
गतिविधियाँ
तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है। अपनी समझ से सही (✓) का चिह्न लगाइए।
उत्तर
कथन | राम | लक्ष्मण | परशुराम | जनक | सीता की माता (सुनयना) |
शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। | ✓ | ||||
विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। | ✓ | ||||
सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। | ✓ | ||||
इस कारण ये सब राजा आए हैं। | ✓ | ||||
बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। | ✓ | ||||
क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? | ✓ | ||||
कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? | ✓ | ||||
इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों! | ✓ |
रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
(नमूना उत्तर – मंचन की रूपरेखा)
पात्र: परशुराम, राम, लक्ष्मण, जनक, सुनयना, सीता, विश्वामित्र, सखियाँ, राजा, सूत्रधार।
वेशभूषा: परशुराम— भगवा वस्त्र, जटाएँ, कंधे पर फरसा, रुद्राक्ष; राम-लक्ष्मण— पीतांबर, धनुष-बाण; राजा— मुकुट और राजसी वस्त्र।
ध्वनि एवं संगीत: आरंभ में स्वयंवर का मंगलगान; परशुराम के आगमन पर नगाड़े और शंख की तेज़ ध्वनि; राम के संवाद पर धीमा, मधुर संगीत।
दृश्य 1: टूटा धनुष, जय-जयकार। सूत्रधार चौपाई गाता है— “देखत भृगुपति बेषु कराला…”। राजा काँपते हुए प्रणाम करते हैं।
दृश्य 2: परशुराम (गरजकर): “कहो जनक, यह भीड़ क्यों है? किसने तोड़ा यह धनुष? जल्दी बताओ, नहीं तो तुम्हारा राज्य उलट दूँगा!” जनक काँपते हुए मौन। एक ओर कुटिल राजा मुस्कराते हैं; सुनयना चिंतित।
दृश्य 3: राम (हाथ जोड़कर, शांत स्वर में): “नाथ, धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। आज्ञा दीजिए।” परशुराम: “सेवक वह जो सेवा करे! जिसने धनुष तोड़ा, वह मेरा शत्रु है।”
दृश्य 4: लक्ष्मण (मुस्कराकर): “बचपन में हमने ऐसी बहुत धनुहियाँ तोड़ीं, तब तो आप नहीं रूठे!” परशुराम (क्रोध से): “रे बालक! तुझे बोलने का होश नहीं।” प्रकाश धीरे-धीरे मंद होता है और सूत्रधार अंत में बताता है कि राम के विनय से परशुराम शांत हुए।
‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।’ इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।
उत्तर
(नमूना उत्तर) मेरे विचार से कठिन परिस्थितियों में सत्य कहने का साहस आवश्यक है, क्योंकि झूठ और चुप्पी से अन्याय बढ़ता है। लक्ष्मण ने परशुराम जैसे शक्तिशाली मुनि के सामने भी साफ़ कहा कि एक पुराने धनुष पर इतना क्रोध उचित नहीं। इतिहास में भी गांधी जी जैसे लोगों ने अंग्रेज़ी शासन के सामने सत्य कहा और देश को दिशा दी। परंतु सत्य कहने का ढंग भी महत्त्वपूर्ण है; राम की तरह विनम्रता और संयम से कहा गया सत्य अधिक प्रभावी होता है। इसलिए साहस और शालीनता, दोनों के साथ सत्य बोलना चाहिए।
प्रश्न 4 (मेरी पहेली)
अपने समूह में मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों— समाचार, धनुष, मन, नाग, नगर
(नमूना उत्तर)
1. रोज़ सवेरे घर-घर जाऊँ, देश-विदेश की बात सुनाऊँ। अखबार, रेडियो मेरे घर, बोलो मेरा नाम तो फिर? — समाचार
2. टेढ़ी-मेढ़ी देह है मेरी, डोरी से बँधी कमान। तीर चलाऊँ दूर तलक, राम ने तोड़ा मेरा मान। — धनुष
3. न आँख, न पाँव, फिर भी पल में दुनिया घूम आऊँ; जीते तो जीत, हारे तो हार, बताओ मैं कौन कहलाऊँ? — मन
4. बिना पैर के चलता हूँ, फन फैलाकर डोलता हूँ; बीन सुनूँ तो झूम उठूँ, बोलो कौन हूँ? — नाग
5. पहले अक्षर ‘न’ से शुरू, बीच में ‘ग’ का साथ; ऊँची इमारतें, भीड़-भाड़, गाँव से बड़ी है मेरी बात। — नगर
प्रश्न 5 (भाषा संगम)
यदि आप ‘धनुष’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए। “अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
(नमूना उत्तर) अंग्रेज़ी में धनुष को bow कहते हैं।
खड़ी बोली हिंदी में: अत्यंत क्रोध में (परशुराम) कठोर वचन बोले— “अरे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा?”
अंग्रेज़ी में: In great anger he spoke harsh words, “Tell me, foolish Janak, who broke the bow?”
खोजबीन
बालकांड का यह अंश और गोस्वामी तुलसीदास जी की अन्य रचनाएँ इंटरनेट की सहायता से सुनिए और देखिए।
उत्तर
(नमूना उत्तर) दिए गए लिंक पर राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद का आगे का भाग सुनने से पता चलता है कि लक्ष्मण और परशुराम के बीच देर तक व्यंग्यपूर्ण वाद-विवाद चलता है, जबकि राम लगातार शांत रहते हैं। अंत में परशुराम राम को अपना (विष्णु का) धनुष देते हैं, जो राम के हाथ में जाते ही स्वयं चढ़ जाता है; इससे वे राम की शक्ति पहचानकर शांत हो जाते हैं। कबीर, रहीम और तुलसी के दोहे सुनकर हमने तुलना की कि कबीर और रहीम की तरह तुलसी के दोहे भी नीति और जीवन-मूल्यों की सीख देते हैं।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
प्रस्तुत अंश रामचरितमानस के किस कांड से लिया गया है?
उत्तर
(क) अयोध्याकांड (ख) बालकांड (ग) सुंदरकांड (घ) लंकाकांड
उत्तर: (ख) बालकांड
परशुराम ने धनुष तोड़ने वाले को किसके समान शत्रु बताया?
उत्तर
(क) रावण (ख) सहस्रबाहु (ग) बाणासुर (घ) कंस
उत्तर: (ख) सहस्रबाहु
‘तिपुरारि’ शब्द किसके लिए आया है?
उत्तर
(क) विष्णु (ख) ब्रह्मा (ग) शिव (घ) इंद्र
उत्तर: (ग) शिव
राम-लक्ष्मण का परशुराम से परिचय किसने कराया?
उत्तर
(क) जनक (ख) विश्वामित्र (ग) सीता (घ) सुनयना
उत्तर: (ख) विश्वामित्र
5. रामचरितमानस की भाषा है
(क) ब्रज (ख) अवधी (ग) खड़ी बोली (घ) मैथिली
उत्तर: (ख) अवधी
लघु उत्तरीय प्रश्न
परशुराम ने राजा जनक से भीड़ का कारण किस भाव से पूछा?
उत्तर
परशुराम ने “पूछत जानि अजान जिमि” अर्थात सब जानते हुए भी अनजान की तरह भीड़ का कारण पूछा। उनके मन में पहले से क्रोध भरा था और वे जनक से स्वयं धनुष टूटने की बात कहलवाना चाहते थे।
लक्ष्मण ने परशुराम के क्रोध पर क्या व्यंग्य किया?
उत्तर
लक्ष्मण ने मुस्कराकर कहा कि बचपन में हमने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ीं, तब आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। फिर इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों है? इस व्यंग्य से वे परशुराम के क्रोध को अनुचित ठहराते हैं।
परशुराम को देखकर सभा के राजाओं ने क्या किया?
उत्तर
परशुराम का भयानक वेश देखकर सभी राजा भय से व्याकुल होकर उठ खड़े हुए। वे पिता के नाम सहित अपना नाम बताकर उन्हें दंडवत प्रणाम करने लगे। जिसे परशुराम सहज भाव से देख भी लेते, वह समझता कि उसकी आयु पूरी हो गई।
परशुराम ने ‘सेवक’ की क्या परिभाषा दी?
उत्तर
परशुराम ने कहा— “सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥” अर्थात सेवक वह है जो सेवा का काम करे; जो शत्रु जैसा काम करे, उससे तो लड़ाई ही करनी चाहिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. पाठ के आधार पर परशुराम के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
परशुराम भृगुवंश के तेजस्वी मुनि हैं। उनका वेश कराल है, जिसे देखकर बड़े-बड़े राजा भी काँप उठते हैं। वे अत्यंत क्रोधी हैं; टूटा धनुष देखते ही जनक को “जड़” और “मूढ़” कहते हैं और राज्य की धरती उलट देने की धमकी देते हैं। वे शिवजी के अनन्य भक्त हैं, इसलिए शिव-धनुष के प्रति उनके मन में गहरी ममता है। उन्हें अपनी शक्ति पर गर्व है, इसलिए धनुष तोड़ने वाले को सहस्रबाहु के समान शत्रु बताते हैं। फिर भी उनमें मुनि-सुलभ स्नेह भी है; वे सीता और राम-लक्ष्मण को आशीर्वाद देते हैं और राम के रूप को देखकर उनकी आँखें ठहर जाती हैं। अंततः राम के विनय से उनका क्रोध शांत होता है।
‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ में राम और लक्ष्मण के स्वभाव की तुलना कीजिए।
उत्तर
एक ही स्थिति में राम और लक्ष्मण बिलकुल भिन्न ढंग से व्यवहार करते हैं। राम धीर, गंभीर और विनम्र हैं। सबको भयभीत देखकर वे बिना हर्ष-विषाद के आगे आते हैं और परशुराम को ‘नाथ’ कहकर स्वयं को उनका दास बताते हैं। वे बड़ों की मर्यादा का पालन करते हैं और क्रोध को विनय से शांत करना चाहते हैं। लक्ष्मण निर्भीक, उग्र और वाक्पटु हैं। परशुराम की धमकी सुनकर वे मुस्कराते हैं और व्यंग्य से कहते हैं कि बचपन में ऐसी बहुत धनुहियाँ तोड़ीं, तब क्रोध क्यों नहीं किया। उनमें भाई के प्रति प्रेम और अन्याय के विरुद्ध बोलने का साहस है, पर संयम की कमी है। इस प्रकार राम शांति और विवेक के, तथा लक्ष्मण साहस और जोश के प्रतीक हैं।