Circle of Learning • नई NCERT पाठ्यपुस्तक "गंगा" (2026-27) • पाठ के सभी प्रश्नों के उत्तर
कवि परिचय: संत रविदास, जो रैदास नाम से विख्यात हैं, का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ। उनका जीवन-काल 15वीं शताब्दी (सन् 1388–1518) माना जाता है। उन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना। उनकी भाषा सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्द भी मिलते हैं। उनकी रचनाएँ आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में शामिल हैं और ‘रैदास बानी’ में संकलित हैं।
काव्यांश की व्याख्या / भावार्थ
अब कैसे छूटै राम रट लागी।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।
सरल भावार्थ: रैदास कहते हैं कि मुझे राम-नाम जपने की ऐसी लगन लग गई है कि अब यह छूट नहीं सकती। हे प्रभु! आप चंदन हैं और मैं पानी; जैसे चंदन के संग रहने से पानी के अंग-अंग में उसकी सुगंध बस जाती है, वैसे ही आपकी भक्ति मेरे रोम-रोम में समा गई है। आप वन में घिरने वाले बादल हैं और मैं मोर, जो बादल देखकर नाच उठता है; मैं आपको वैसे ही एकटक निहारता हूँ जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा को। आप दीपक हैं और मैं बाती, जिसकी ज्योति दिन-रात जलती रहती है। आप मोती हैं और मैं धागा, जो मोती से मिलकर माला बनता है; हमारा मेल वैसा ही है जैसे सोने में सुहागा मिलकर उसकी चमक बढ़ा देता है। आप स्वामी हैं और मैं आपका दास; रैदास ऐसी ही दास्य-भाव वाली अनन्य भक्ति करता है।
पद 2
जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।
मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरौं।
सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।
सरल भावार्थ: रैदास कहते हैं— हे राम! यदि आप मुझसे नाता तोड़ भी दें, तो भी मैं आपसे नाता नहीं तोड़ूँगा, क्योंकि आपसे संबंध तोड़कर मैं और किससे जोड़ूँ? मुझे तीर्थयात्रा और व्रत न करने की कोई चिंता नहीं है; मुझे तो केवल आपके कमल जैसे चरणों का ही भरोसा है। मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ आपकी ही पूजा करता हूँ, क्योंकि आप जैसा दूसरा कोई देवता नहीं है, आप सर्वत्र हैं। मैंने अपना मन प्रभु से जोड़ लिया है और उनसे जुड़कर संसार के अन्य सभी मोह-बंधन तोड़ दिए हैं। रैदास कहते हैं कि आठों पहर मुझे केवल आपकी ही आशा है और यह बात मैं मन, कर्म और वचन से कहता हूँ।
रचना से संवाद – मेरे उत्तर मेरे तर्क
उत्तर
“अब कैसे छूटै राम रट लागी” पंक्ति का भाव है?
(क) नाम उच्चारण की कठिनाई (ख) नाम रटकर याद करना (ग) आराध्य का नाम जपना (घ) मित्रों का नाम रटना
उत्तर: (ग) आराध्य का नाम जपना।
तर्क: ‘राम रट लागी’ का अर्थ है राम-नाम जपने की लगन लग जाना। कवि कहता है कि यह लगन अब किसी भी तरह छूट नहीं सकती। यह याद करने वाला रटना नहीं, बल्कि भक्ति-भाव से नाम-स्मरण है।
“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?
उत्तर
(क) एकाकार और समरूप (ख) तरल और तीव्र सुगंध (ग) आश्रय और आश्रित (घ) द्रव और ठोस
उत्तर: (क) एकाकार और समरूप।
तर्क: चंदन को पानी में घिसने पर दोनों मिलकर एक हो जाते हैं और पानी के “अंग-अंग” में चंदन की सुगंध समा जाती है। इसी प्रकार भक्त अपने आराध्य में घुल-मिलकर एकाकार हो गया है।
उत्तर
“तुम दीपक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है?
(क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है। (ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है। (ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है। (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
उत्तर: (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
तर्क: दीपक और बाती के मेल से ही “जोति बरै दिन राती” अर्थात दिन-रात प्रकाश होता है। उसी प्रकार प्रभु से जुड़कर भक्त का जीवन ज्ञान और भक्ति के प्रकाश से भर जाता है।
“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?
उत्तर
(क) परोपकारी भक्ति भाव (ख) आराध्य से अटूट संबंध (ग) सांसारिक मोह (घ) कर्मकांड पर बल
उत्तर: (ख) आराध्य से अटूट संबंध।
तर्क: कवि कहता है कि प्रभु नाता तोड़ भी दें, तब भी वह नहीं तोड़ेगा, क्योंकि “तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ”। यह आराध्य के प्रति अटूट और एकनिष्ठ संबंध का भाव है।
उत्तर
“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” पंक्ति से आप क्या समझते हैं?
(क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं। (ख) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक हैं। (ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है। (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
उत्तर: (क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।
तर्क: ‘अंदेसा’ का अर्थ है चिंता। कवि कहता है कि उसे तीर्थ और व्रत न करने की कोई चिंता नहीं है, अर्थात सच्ची भक्ति के लिए ये बाहरी साधन आवश्यक नहीं हैं। पंक्ति के अगले अंश “तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा” में वह बताता है कि उसका सच्चा आश्रय प्रभु के चरण ही हैं।
उत्तर
सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?
(क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा” (ख) “जाकी जोति बरै दिन राती” (ग) “तुम दीपक, हम बाती” (घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”
उत्तर: (क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”।
तर्क: भक्त जहाँ-जहाँ जाता है, वहीं प्रभु की पूजा करता है। इसका अर्थ है कि ईश्वर किसी एक स्थान या मंदिर में नहीं, बल्कि हर जगह विद्यमान है।
रचना से संवाद – अर्थ और भाव
उत्तर
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए।
(क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
अर्थ: हे प्रभु! आप वन में छाए बादल हैं और मैं मोर हूँ; मैं आपको वैसे ही निहारता हूँ जैसे चकोर चंद्रमा को।
भाव: जैसे बादलों को देखकर मोर आनंद से नाच उठता है और चकोर एकटक चंद्रमा को ही देखता रहता है, वैसे ही भक्त प्रभु के दर्शन से आनंदित होता है और उसकी दृष्टि सदा प्रभु पर ही टिकी रहती है। इसमें भक्त के प्रेम, उल्लास और एकनिष्ठता का भाव है।
(ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।”
अर्थ: मुझे तीर्थयात्रा और व्रत न करने की कोई चिंता नहीं है; मुझे केवल आपके कमल जैसे चरणों का भरोसा है।
भाव: रैदास बाहरी कर्मकांडों को भक्ति का आधार नहीं मानते। उनके अनुसार प्रभु के प्रति सच्चा विश्वास और पूर्ण समर्पण ही सबसे बड़ा साधन है।
रचना से संवाद – मेरी समझ मेरे विचार
“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।
उत्तर
इस पंक्ति में रैदास की एकनिष्ठ और निःस्वार्थ भक्ति दिखाई देती है। वे कहते हैं कि यदि प्रभु उनसे संबंध तोड़ भी लें, तब भी वे प्रभु से नाता नहीं तोड़ेंगे, क्योंकि प्रभु को छोड़कर उनका कोई दूसरा सहारा नहीं है। इसका अर्थ है कि उनकी भक्ति किसी शर्त या फल की इच्छा पर टिकी नहीं है। सच्चा प्रेम बदले में कुछ नहीं माँगता, वह हर परिस्थिति में बना रहता है। इससे हम समझते हैं कि सच्ची निष्ठा वही है जो कठिन समय में भी डगमगाए नहीं, चाहे वह संबंध ईश्वर से हो, मित्र से हो या अपने देश से।
रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?
उत्तर
रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर प्रभु के चरणों में अटूट विश्वास, नाम-स्मरण और मन-कर्म-वचन से पूर्ण समर्पण को भक्ति का प्रमुख आधार माना है। मेरे विचार से भक्ति के आधार हैं— मन की शुद्धता, सच्चा प्रेम और श्रद्धा, सभी प्राणियों के प्रति दया, ईमानदारी से अपना कर्तव्य करना, अहंकार का त्याग और दूसरों की सेवा। (नमूना उत्तर)
दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों/उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।
उत्तर
आराध्य (प्रभु) | भक्त (रैदास) |
चंदन | पानी |
घन (बादल) | मोर |
चंद्रमा | चकोर |
दीपक | बाती |
मोती | धागा |
सोना | सुहागा |
स्वामी | दास |
चरन कमल (कमल जैसे चरण) | उन पर भरोसा रखने वाला भक्त |
दूसरे पद में ‘जोड़ना-तोड़ना’ के माध्यम से भी अटूट नाते का भाव व्यक्त हुआ है— “मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरौं।”
विधा से संवाद – कविता का सौंदर्य
अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर
अलंकार | पंक्ति | पाठ |
अनुप्रास | “सुर मुनि नाग नगर नर नारी” (‘न’ की आवृत्ति) | राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद |
अनुप्रास | “कनक-शस्य-कमलधरे” (‘क’ की आवृत्ति); “प्राण प्रणव ओंकार” (‘प’ की आवृत्ति) | भारति, जय, विजयकरे! |
अनुप्रास | “प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती” (‘ज’ की आवृत्ति) | पद (रैदास) |
उपमा | “पूछत जानि अजान जिमि” (जानते हुए भी अनजान की तरह पूछना) | राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद |
उपमा | “सहसबाहु सम सो रिपु मोरा”; “धनुही सम तिपुरारि धनु” | राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद |
रूपक | “पद सरोज मेले दोउ भाई” (चरणों पर कमल का आरोप) | राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद |
रूपक | “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” (हिमालय पर मुकुट का आरोप); “तरु-तृण-वन-लता वसन” | भारति, जय, विजयकरे! |
विधा से संवाद – कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ
पदों में से चुनकर दी गई विशेषताओं को दर्शाती पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर
विशेषताएँ | उदाहरण |
अनन्य भक्ति भाव | “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” |
सरल और लोकधर्मी भाषा | “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।” |
उपमा और तुलना | “प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।” / “जैसे चितवत चंद चकोरा।” |
लयात्मकता और गेयता/ध्वन्यात्मकता | “प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।” (मोरा-चकोरा, बाती-राती, धागा-सुहागा की तुक) |
दृढ़ निष्ठा और आस्था | “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।” / “सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।” |
विषयों से संवाद
तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर
उस समय समाज में जाति-पाँति, ऊँच-नीच और छुआछूत का भेदभाव गहरा था। निम्न समझी जाने वाली जातियों को मंदिरों में प्रवेश, शास्त्रों के अध्ययन और कई धार्मिक अनुष्ठानों से वंचित रखा जाता था। धर्म पर कर्मकांड, तीर्थ, व्रत और आडंबर हावी थे, जो खर्चीले भी थे और कुछ वर्गों तक सीमित भी। हिंदू-मुसलमान के बीच धार्मिक टकराव भी था। ऐसे में संत कवियों ने निराकार ईश्वर की भक्ति का मार्ग दिखाया, जिसके लिए न मंदिर चाहिए, न पुरोहित, न धन। यह मार्ग सबके लिए समान रूप से खुला था और मन की शुद्धता, प्रेम और समानता पर आधारित था। इससे सामाजिक समरसता और भाईचारे को बल मिला।
“सोने मिलत सुहागा” — ‘सुहागा’ का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।
उत्तर
सुहागे को अंग्रेज़ी में बोरेक्स (Borax) कहते हैं। इसका रासायनिक नाम सोडियम टेट्राबोरेट (डेकाहाइड्रेट) है और सूत्र Na2B4O7·10H2O है।
विशेषताएँ: (1) यह सफेद, क्रिस्टलीय (रवेदार) पदार्थ है जो पानी में घुल जाता है। (2) गरम करने पर यह पिघलकर काँच जैसा पदार्थ बनाता है। (3) सुनार इसे ‘फ्लक्स’ के रूप में प्रयोग करते हैं; यह धातु की सतह से ऑक्साइड और अशुद्धियाँ हटाता है, जिससे सोना साफ होकर चमकता है और जोड़ (टाँका) अच्छा लगता है। (4) इसका उपयोग काँच, साबुन-डिटर्जेंट और कुछ कीटाणुनाशक पदार्थ बनाने में भी होता है।
भाषा से संवाद – व्याकरण की बात (शब्दों की बात)
पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर
संज्ञा | सर्वनाम |
राम, चंदन, पानी (अन्य: दीपक, बाती, मोती, धागा, रैदास) | तुम, हम, मैं (अन्य: जाकी) |
नीचे सूची में दिए गए शब्दों के लिए आप या आपके आस-पास के लोग किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए— मोरा, चकोरा, बाती, राती, सोने, तीरथ, बरत
उत्तर
पद में प्रयुक्त शब्द | प्रचलित/मानक शब्द |
मोरा | मोर, मयूर |
चकोरा | चकोर |
बाती | बत्ती, वर्तिका |
राती | रात, रात्रि |
सोने | सोना, स्वर्ण |
तीरथ | तीर्थ, तीर्थस्थान |
बरत | व्रत, उपवास |
सृजन
कक्षा में समूह बनाकर इन दोनों पदों को गाकर/पाठ करके प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
(नमूना उत्तर) कक्षा को चार-पाँच के समूहों में बाँटें। पहले पदों का शुद्ध उच्चारण और अर्थ समझें। फिर ढोलक या ताली से ताल देते हुए एक विद्यार्थी पहली पंक्ति गाए और बाकी समूह टेक “अब कैसे छूटै राम रट लागी” दोहराए। अंत में हर समूह एक-एक पद का भाव भी संक्षेप में बताए।
कल्पना कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।
उत्तर
(नमूना उत्तर)
भक्त: प्रभु, आप चंदन हैं और मैं पानी। आपके संग रहकर मेरे अंग-अंग में सुगंध बस गई है।
आराध्य: पर पानी के बिना चंदन घिसा भी तो नहीं जा सकता, भक्त।
भक्त: आप बादल हैं, प्रभु! आपको देखते ही मेरा मन मोर की तरह नाच उठता है।
आराध्य: और तुम्हारी आँखें चकोर की तरह मुझ पर ही टिकी रहती हैं।
भक्त: आप दीपक हैं और मैं बाती। आपके साथ ही मेरी ज्योति दिन-रात जलती है।
आराध्य: बाती न हो तो दीपक भी कहाँ उजाला कर पाता है!
भक्त: आप मोती हैं, मैं धागा। आपसे जुड़कर ही मैं माला बन पाया।
आराध्य: तुम्हारा प्रेम सोने में सुहागे जैसा है, जो मुझे और चमका देता है।
भक्त: आप स्वामी हैं, मैं दास। बस यही विनती है कि यह नाता कभी न टूटे।
आराध्य: जो मन, कर्म और वचन से जुड़ा हो, वह नाता कभी नहीं टूटता।
“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।
उत्तर
(नमूना उत्तर)
लघुकथा: टूटी पेंसिल
अमन और रोहित बचपन के मित्र थे। एक दिन परीक्षा से पहले किसी ने अमन से कह दिया कि रोहित ने उसकी कॉपी शिक्षक को दिखाकर उसकी शिकायत की है। गुस्से में अमन ने रोहित से बात करना बंद कर दिया। रोहित को बहुत दुख हुआ, पर उसने हार नहीं मानी। परीक्षा के दिन अमन की पेंसिल टूट गई और उसके पास दूसरी नहीं थी। रोहित ने चुपचाप अपनी नई पेंसिल उसकी मेज पर रख दी। बाद में अमन को पता चला कि शिकायत तो किसी और ने की थी। उसने लज्जित होकर रोहित से क्षमा माँगी। रोहित मुस्कराकर बोला, “तुमने नाता तोड़ा था, मैंने तो नहीं तोड़ा। तुम्हें छोड़कर मैं किससे दोस्ती जोड़ता?” उस दिन अमन ने समझा कि सच्ची मित्रता वही है जो रूठने पर भी साथ न छोड़े।
झरोखे से
संत कवि नामदेव के पद पढ़कर अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और बताइए कि रैदास तथा नामदेव के पदों में क्या-क्या अंतर है और क्या-क्या समानताएँ हैं?
उत्तर
समानताएँ: (1) दोनों निर्गुण संत परंपरा के कवि हैं और राम-नाम की भक्ति पर बल देते हैं। (2) दोनों बाह्य आडंबरों का विरोध करते हैं; रैदास तीर्थ-व्रत को अनावश्यक मानते हैं, तो नामदेव कहते हैं कि जब शास्त्र और वेद नहीं थे, तब कर्म कहाँ से आया। (3) दोनों अपने आराध्य से अटूट संबंध दिखाने के लिए जीवन से ली गई उपमाओं का प्रयोग करते हैं। (4) दोनों की भाषा सरल, लोकभाषा है और पद गेय हैं। (5) दोनों पदों के अंत में कवि अपना नाम (रैदासा, नामा) देते हैं।
अंतर: (1) रैदास के पदों में मिलन और एकाकार होने का आनंद है (चंदन-पानी, दीपक-बाती), जबकि नामदेव के दूसरे पद में प्रभु से बिछुड़ने की व्याकुलता (‘तालाबेली’) है— जैसे बछड़े के बिना गाय और पानी के बिना मछली तड़पती है। (2) नामदेव गुरु की महिमा पर विशेष बल देते हैं— “सतगुर मोहि लखाया”, “गुर भेटत ही अलख लखाया”; रैदास के इन पदों में गुरु का उल्लेख नहीं है। (3) नामदेव के पहले पद में संसार की नश्वरता का दार्शनिक भाव है— “जैसे तरवर पंखि-बसेरा”, जबकि रैदास के पद मुख्यतः समर्पण और दास्य-भाव के हैं। (4) नामदेव की भाषा में मराठी-पंजाबी प्रभाव (छूटला, घूटला) दिखता है, जबकि रैदास की भाषा ब्रज प्रधान है।
खोजबीन
रैदास के जीवन और पदों के विषय में पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर पढ़िए।
उत्तर
(नमूना उत्तर) खोजबीन से पता चलता है कि रैदास काशी के रहने वाले थे और जूते बनाने का काम करते हुए भी भक्ति में लीन रहते थे। उनकी प्रसिद्ध उक्ति “मन चंगा तो कठौती में गंगा” बताती है कि मन की पवित्रता ही सबसे बड़ा तीर्थ है। उनके लगभग चालीस पद श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। उन्होंने ‘बेगमपुरा’ नामक ऐसे आदर्श नगर की कल्पना की, जहाँ कोई दुख, भेदभाव या कर न हो। कहा जाता है कि मीराबाई ने उन्हें अपना गुरु माना था।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
रैदास का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर
(क) मथुरा (ख) काशी (ग) प्रयाग (घ) पंढरपुर
उत्तर: (ख) काशी
पद में ‘चकोर’ किसे एकटक निहारता है?
उत्तर
(क) सूर्य (ख) बादल (ग) चंद्रमा (घ) दीपक
उत्तर: (ग) चंद्रमा
3. ‘अंदेसा’ शब्द का अर्थ है
(क) संदेश (ख) चिंता/आशंका (ग) अंधकार (घ) आनंद
उत्तर: (ख) चिंता/आशंका
रैदास की रचनाएँ किस ग्रंथ में शामिल हैं?
उत्तर
(क) रामचरितमानस (ख) आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी (ग) बीजक (घ) सूरसागर
उत्तर: (ख) आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी
5. “मन क्रम वचन कहै रैदासा” में ‘क्रम’ का अर्थ है
(क) क्रमशः (ख) कर्म (ग) कृपा (घ) क्रोध
उत्तर: (ख) कर्म
लघु उत्तरीय प्रश्न
‘जैसे सोने मिलत सुहागा’ उपमा द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर
सुहागा मिलने से सोना शुद्ध होकर और चमक उठता है। कवि कहना चाहता है कि भक्त और भगवान का मेल भी ऐसा ही है; प्रभु से जुड़कर भक्त का जीवन निर्मल और उज्ज्वल हो जाता है।
रैदास अपने आराध्य के सिवा किसी और से नाता क्यों नहीं जोड़ना चाहते?
उत्तर
रैदास के लिए प्रभु ही सब कुछ हैं; उनके जैसा कोई दूसरा देव नहीं है। इसलिए वे कहते हैं कि प्रभु से नाता तोड़कर वे किसी और से नहीं जोड़ सकते। प्रभु से मन जोड़कर उन्होंने संसार के सारे मोह तोड़ दिए हैं।
पहले पद में भक्ति का कौन-सा भाव प्रकट हुआ है?
उत्तर
पहले पद में अनन्य भक्ति और दास्य-भाव प्रकट हुआ है। भक्त स्वयं को प्रभु से अलग नहीं मानता, बल्कि उनसे एकाकार अनुभव करता है और अंत में कहता है— “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा।”
4. रैदास की भाषा की दो विशेषताएँ लिखिए।
रैदास की भाषा सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा है जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्द भी मिलते हैं। उनके पद गेय हैं और उनमें दैनिक जीवन से ली गई सहज उपमाएँ (चंदन-पानी, दीपक-बाती) प्रयुक्त हुई हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
रैदास के पदों के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि उन्होंने बाह्य आडंबरों की अपेक्षा आंतरिक भक्ति को महत्त्व क्यों दिया।
उत्तर
रैदास का मानना था कि ईश्वर किसी विशेष स्थान, अनुष्ठान या कर्मकांड में बँधा नहीं है। इसलिए वे कहते हैं— “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।” उनके लिए प्रभु सर्वव्यापक हैं— “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा।” उनके अनुसार सच्ची भक्ति मन, कर्म और वचन से प्रभु के प्रति समर्पण है, जो चंदन-पानी और दीपक-बाती जैसी एकात्मता में दिखाई देती है। उनके समय में कर्मकांड समाज के कुछ ही वर्गों तक सीमित थे और जाति के आधार पर भेदभाव होता था। आंतरिक भक्ति का मार्ग सबके लिए खुला था, इसलिए उन्होंने मन की शुद्धता, प्रेम और विश्वास को ही सच्चा धर्म माना।
रैदास के पहले पद में प्रयुक्त उपमाओं का सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पहले पद में रैदास ने जीवन से जुड़े सरल जोड़ों के माध्यम से भक्त और भगवान का संबंध दिखाया है। चंदन-पानी की उपमा एकाकार होने को दिखाती है, क्योंकि पानी के अंग-अंग में चंदन की सुगंध समा जाती है। बादल-मोर और चंद्र-चकोर की उपमाएँ भक्त के प्रेम, उल्लास और एकटक दर्शन की लालसा प्रकट करती हैं। दीपक-बाती से पता चलता है कि दोनों के मेल से ही जीवन में ज्योति जलती है। मोती-धागा और सोना-सुहागा बताते हैं कि यह मेल एक-दूसरे की शोभा बढ़ाता है। अंत में स्वामी-दास का संबंध पूर्ण समर्पण दिखाता है। ये उपमाएँ सहज, सुंदर और आम लोगों की समझ में आने वाली हैं, इसलिए पद अत्यंत प्रभावशाली बन गया है।