Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
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XI | Hindi | Antra (NCERT) | 10 – सूरदास | 2026-27 | 11 of 11 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवि | सूरदास (लगभग 1478–1583), कृष्ण-भक्ति शाखा, अष्टछाप के प्रमुख कवि |
पद 1 | “खेलन में को काको गुसैयाँ” – खेल में हारकर रूठे कृष्ण को सखा फटकारते हैं; कृष्ण नंद बाबा की दुहाई देकर दाँव देते हैं – बाल-मनोविज्ञान |
पद 2 | “मुरली तऊ गुपालहिं भावति” – गोपियों का मुरली के प्रति सौतिया डाह (ईर्ष्या) |
रस | पद 1 – वात्सल्य/सख्य भाव; पद 2 – शृंगार (ईर्ष्या, उपालंभ) |
भाषा | ब्रजभाषा; गेय पद; अनुप्रास, रूपक, मानवीकरण |
1. खेलन में को काको गुसैयाँ।
हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस हीं कत करत रिसैयाँ।
जाति-पाँति हमतैं बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ।
अति अधिकार जनावत यातै जातैं अधिक तुम्हारै गैयाँ।
रूठहि करै तासौं को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ ग्वैयाँ।
सूरदास प्रभु खेल्यौइ चाहत, दाऊँ दियौ करि नंद-दुहैयाँ।।
2. मुरली तऊ गुपालहिं भावति।
सुनि री सखी जदपि नंदलालहिं, नाना भाँति नचावति।
राखति एक पाइ ठाढ़ौ करि, अति अधिकार जनावति।
कोमल तन आज्ञा करवावति, कटि टेढ़ौ ह्वै आवति।
अति आधीन सुजान कनौड़े, गिरिधर नार नवावति।
आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर, कर पल्लव पलुटावति।
भुकुटी कुटिल, नैन नासा-पुट, हम पर कोप करावति।
सूर प्रसन्न जानि एकौ छिन, धर तैं सीस डुलावति।।
प्रश्न-अभ्यास
‘खेलन में को काको गुसैयाँ’ पद में कृष्ण और सुदामा के बीच किस बात पर तकरार हुई?
Answer
उत्तर
(पद में कृष्ण के सखा का नाम श्रीदामा है।) खेल में कृष्ण हार गए और श्रीदामा जीत गया। नियम के अनुसार हारने वाले को दाँव देना था, पर कृष्ण हार मानने और दाँव देने को तैयार नहीं थे; उलटे वे व्यर्थ ही क्रोध करने और रूठने लगे। इसी बात पर तकरार हुई – सखाओं ने कहा कि खेल में कौन किसका स्वामी है? हारकर भी रूठना ठीक नहीं।
खेल में कृष्ण हार गए और श्रीदामा जीत गया, पर कृष्ण दाँव देने के बजाय व्यर्थ ही रूठकर क्रोध करने लगे – इसी पर तकरार हुई।
खेल में रूठनेवाले साथी के साथ सब क्यों नहीं खेलना चाहते?
Answer
उत्तर
- खेल बराबरी और नियमों से खेला जाता है – कोई किसी का स्वामी नहीं। जो हारकर हार न माने और रूठ जाए, वह नियम तोड़ता है।
- रूठने वाला साथी खेल का आनंद बिगाड़ देता है; बार-बार मनाना पड़ता है।
- वह अपनी बात मनवाने के लिए अधिकार जताता है, जो दूसरों को अच्छा नहीं लगता।
- इसलिए सखा कहते हैं – “रूठहि करै तासौं को खेलै” – और खेल छोड़कर जहाँ-तहाँ बैठ जाते हैं।
खेल बराबरी और नियमों से होता है; हारकर भी रूठने वाला नियम तोड़ता, अधिकार जताता और खेल का आनंद बिगाड़ता है – इसलिए सब उसके साथ खेलना नहीं चाहते।
खेल में कृष्ण के रूठने पर उनके साथियों ने उन्हें डाँटते हुए क्या-क्या तर्क दिए?
Answer
उत्तर
- खेल में सब बराबर: “खेलन में को काको गुसैयाँ” – खेल में कोई किसी का मालिक नहीं।
- हार स्वीकार करो: तुम (हरि) हारे हो और श्रीदामा जीता है, फिर व्यर्थ में क्यों क्रोध करते हो?
- जाति में बड़े नहीं: “जाति-पाँति हमतैं बड़ नाहीं” – तुम जाति में हमसे बड़े नहीं हो (सब ग्वाले हैं)।
- हम तुम्हारे आश्रित नहीं: “नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ” – हम तुम्हारी छाया (शरण) में नहीं रहते।
- अधिक गायों का घमंड: तुम इसलिए अधिकार जताते हो क्योंकि तुम्हारे पास हमसे अधिक गायें हैं – यानी धन का अहंकार ठीक नहीं।
- रूठने वाले से कौन खेले: जो रूठे, उसके साथ कोई नहीं खेलेगा – और सब जहाँ-तहाँ बैठ गए।
खेल में कोई किसी का स्वामी नहीं; तुम हारे हो फिर क्यों रूठते हो; तुम जाति में हमसे बड़े नहीं; हम तुम्हारी शरण में नहीं रहते; अधिक गायें होने से अधिकार मत जताओ; रूठने वाले के साथ कोई नहीं खेलेगा।
कृष्ण ने नंद बाबा की दुहाई देकर दाँव क्यों दिया?
Answer
उत्तर
सखाओं की फटकार सुनकर और सबको खेल छोड़कर बैठा देखकर कृष्ण समझ गए कि यदि वे नहीं माने तो कोई उनके साथ नहीं खेलेगा। कृष्ण का मन खेलने का था – “सूरदास प्रभु खेल्यौइ चाहत”। इसलिए उन्होंने अपनी गलती मानकर दाँव दे दिया। साथ ही अपनी बात की सच्चाई और ईमानदारी जताने के लिए, या अपनी हार की झेंप मिटाने के लिए, उन्होंने नंद बाबा की कसम (दुहाई) खाई – जैसे बच्चे अक्सर बड़ों की कसम खाकर अपनी बात पर बल देते हैं।
कृष्ण खेलना चाहते थे और समझ गए कि रूठने पर कोई उनके साथ नहीं खेलेगा; इसलिए उन्होंने हार मानकर दाँव दिया और अपनी बात की सच्चाई जताने (और झेंप मिटाने) के लिए नंद बाबा की दुहाई दी।
इस पद से बाल-मनोविज्ञान पर क्या प्रकाश पड़ता है?
Answer
उत्तर
- हार स्वीकार न करना: बच्चे खेल में हारना पसंद नहीं करते; हारने पर रूठ जाते हैं, बहाने बनाते हैं।
- समानता की भावना: बच्चों के खेल में कोई बड़ा-छोटा नहीं होता; वे किसी का अनुचित अधिकार स्वीकार नहीं करते और खुलकर विरोध करते हैं।
- स्पष्टवादिता: बच्चे बिना संकोच सच कह देते हैं – “जाति-पाँति हमतैं बड़ नाहीं”, “अधिक तुम्हारै गैयाँ”।
- सामूहिक दबाव: समूह के बहिष्कार के डर से बच्चा अपनी ज़िद छोड़ देता है।
- खेल का मोह: खेलने की इच्छा अहंकार से बड़ी होती है – कृष्ण भी अंत में मान जाते हैं।
- कसम खाना: बच्चे अपनी बात पर बल देने के लिए बड़ों (माता-पिता) की कसम खाते हैं।
- जल्दी रूठना, जल्दी मानना: बच्चों का क्रोध क्षणिक होता है।
बच्चे हार स्वीकार नहीं करना चाहते और रूठ जाते हैं; खेल में समानता चाहते हैं और अनुचित अधिकार का खुला विरोध करते हैं; स्पष्टवादी होते हैं; समूह के बहिष्कार के डर से ज़िद छोड़ देते हैं; खेल का मोह अहं से बड़ा होता है; बड़ों की कसम खाते हैं और जल्दी रूठकर जल्दी मान जाते हैं।
‘गिरिधर नार नवावति’ से सखी का क्या आशय है?
Answer
उत्तर
‘नार’ का अर्थ है गर्दन (और श्लेष से ‘नारी’ भी)। गोपी (सखी) ईर्ष्या से कहती है कि जिस गिरिधर (कृष्ण) ने अपनी उँगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत उठा लिया था, उसी शक्तिशाली कृष्ण की गर्दन यह छोटी-सी बाँसुरी झुकवा देती है – बाँसुरी बजाते समय कृष्ण को गर्दन झुकानी पड़ती है। अर्थात् चतुर (सुजान) कृष्ण भी इस मुरली के इतने अधीन और कृतज्ञ (कनौड़े) हो गए हैं कि उसके आगे सिर झुकाते हैं।
इसमें मुरली के प्रति गोपियों की सौतिया डाह और कृष्ण पर उसके ‘अधिकार’ पर व्यंग्य है। (विरोधाभास का सौंदर्य – पर्वत उठाने वाले की गर्दन एक बाँस की नली झुका देती है।)
जो गिरिधर गोवर्धन पर्वत उठा सकते हैं, वही कृष्ण मुरली बजाते समय उसके आगे गर्दन झुकाते हैं – मुरली ने चतुर कृष्ण को अपने अधीन कर लिया है; इसमें गोपियों की मुरली के प्रति ईर्ष्या और व्यंग्य है।
कृष्ण के अधरों की तुलना सेज से क्यों की गई है?
Answer
उत्तर
गोपियाँ कहती हैं कि मुरली कृष्ण के अधरों (होठों) रूपी सेज (शय्या) पर लेटी रहती है – “आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर” – और कृष्ण के कोमल हाथों (कर पल्लव) से अपने पैर दबवाती है (उँगलियाँ मुरली के छिद्रों पर चलती हैं)।
तुलना के कारण:
- कोमलता: कृष्ण के होंठ सेज की तरह कोमल और सुखद हैं।
- ईर्ष्या: जिस प्रकार रानी सेज पर लेटकर दासी से पैर दबवाती है, वैसे ही मुरली कृष्ण के अधरों पर लेटकर उनसे सेवा करवाती है – गोपियाँ स्वयं कृष्ण का यह सामीप्य चाहती हैं, इसलिए उन्हें मुरली से डाह है।
- निकटता का भाव: सेज विश्राम और अंतरंग निकटता का प्रतीक है; मुरली को कृष्ण की सबसे निकटता प्राप्त है।
शिल्प: रूपक (अधर-सज्जा, कर-पल्लव), मानवीकरण (मुरली का पौढ़ना, पैर दबवाना)।
मुरली कृष्ण के कोमल अधरों पर ऐसे लेटी रहती है जैसे रानी सेज पर लेटकर अपने पैर दबवाती है – अधरों की कोमलता और मुरली को प्राप्त कृष्ण की अंतरंग निकटता के कारण यह तुलना की गई है, जिससे गोपियों की ईर्ष्या प्रकट होती है (रूपक, मानवीकरण)।
पठित पदों के आधार पर सूरदास के काव्य की विशेषताएँ बताइए।
Answer
उत्तर
- बाल-मनोविज्ञान का सूक्ष्म चित्रण: पहले पद में बच्चों के खेल, रूठना, तर्क, समूह-दबाव और कसम खाने का स्वाभाविक, सजीव चित्रण – सूर को ‘वात्सल्य रस का सम्राट’ कहा जाता है।
- शृंगार और गोपियों के भाव: दूसरे पद में मुरली के प्रति गोपियों की सौतिया डाह, उपालंभ और प्रेम का मनोवैज्ञानिक चित्रण।
- कृष्ण की लीलाओं का वर्णन: सख्य भाव (ग्वाल-बालों के साथ खेल) और माधुर्य भाव (गोपियाँ-मुरली)।
- ब्रजभाषा का माधुर्य: सरस, कोमल, लोकजीवन से जुड़ी ब्रजभाषा – गैयाँ, ग्वैयाँ, छैयाँ, गुसैयाँ।
- गेयता: संगीतात्मक पद-शैली; टेक और तुक (–ैयाँ, –ावति) से लय।
- अलंकार: अनुप्रास (‘कोमल तन’, ‘कटि टेढ़ौ’), रूपक (‘अधर सज्जा’, ‘कर पल्लव’), मानवीकरण (मुरली का आज्ञा करवाना, कोप करवाना), श्लेष (‘नार’)।
- चित्रात्मकता: मुरली बजाते कृष्ण का एक पैर पर खड़े होना, कमर टेढ़ी, भौंहें तिरछी – पूरा दृश्य आँखों के सामने।
- लोकजीवन और ग्राम्य परिवेश: गायें, ग्वाले, खेल।
बाल-मनोविज्ञान का सजीव चित्रण (वात्सल्य/सख्य), गोपियों के शृंगार-भाव और ईर्ष्या का मनोवैज्ञानिक चित्रण, कृष्ण-लीला, मधुर ब्रजभाषा, गेयता, अनुप्रास-रूपक-मानवीकरण-श्लेष जैसे अलंकार, चित्रात्मकता और ग्राम्य लोकजीवन।
निम्नलिखित पद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए –
(क) जाति-पाँति … तुम्हारै गैयाँ।
(ख) सुनि री … नवावति।
Answer
उत्तर
संदर्भ: प्रस्तुत पद्यांश अंतरा (भाग 1) में संकलित सूरदास के पदों से लिए गए हैं।
(क) “जाति-पाँति हमतैं बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ। अति अधिकार जनावत यातै जातैं अधिक तुम्हारै गैयाँ।”
प्रसंग: खेल में हारकर रूठे कृष्ण को उनके सखा फटकार रहे हैं।
व्याख्या: ग्वाल-बाल कृष्ण से कहते हैं – तुम जाति-पाँति में हमसे बड़े नहीं हो (हम सब एक ही ग्वाल जाति के हैं), और न ही हम तुम्हारी छाया (शरण, आश्रय) में रहते हैं कि तुम्हारी हर बात मानें। तुम हम पर इतना अधिकार इसलिए जताते हो क्योंकि तुम्हारे पास हमसे अधिक गायें हैं – यानी तुम धनी हो। पर खेल में धन या जाति का बड़प्पन नहीं चलता; यहाँ सब बराबर हैं।
विशेष: बाल-मनोविज्ञान और समानता की भावना; बच्चों की स्पष्टवादिता; ब्रजभाषा; अनुप्रास (‘जाति-पाँति’), तुकांत (‘छैयाँ-गैयाँ’); गेयता।
(ख) “सुनि री सखी जदपि नंदलालहिं, नाना भाँति नचावति। राखति एक पाइ ठाढ़ौ करि, अति अधिकार जनावति। कोमल तन आज्ञा करवावति, कटि टेढ़ौ ह्वै आवति। अति आधीन सुजान कनौड़े, गिरिधर नार नवावति।”
प्रसंग: एक गोपी दूसरी सखी से मुरली के प्रति अपनी ईर्ष्या प्रकट कर रही है।
व्याख्या: गोपी कहती है – हे सखी, सुन! यह मुरली नंदलाल (कृष्ण) को तरह-तरह से नचाती है, फिर भी वह गोपाल को अच्छी लगती है। यह उन्हें एक पैर पर खड़ा रखकर उन पर बहुत अधिकार जताती है; उनके कोमल शरीर से अपनी आज्ञा का पालन करवाती है, जिससे उनकी कमर टेढ़ी हो जाती है। चतुर (सुजान) कृष्ण भी इसके इतने अधीन और कृतज्ञ हो गए हैं कि यह गोवर्धन उठाने वाले गिरिधर की गर्दन तक झुकवा देती है।
विशेष: मुरली का मानवीकरण – वह स्वामिनी की तरह आज्ञा देती है; गोपियों की सौतिया डाह; त्रिभंगी मुद्रा का चित्रात्मक वर्णन; अनुप्रास (‘कोमल तन’, ‘नार नवावति’); श्लेष (‘नार’ – गर्दन/नारी); विरोधाभास (गिरिधर की गर्दन झुकाना); ब्रजभाषा, गेयता।
(क) सखा कहते हैं – तुम जाति में हमसे बड़े नहीं, हम तुम्हारी शरण में नहीं रहते; अधिक गायें होने से अधिकार जताना ठीक नहीं – खेल में सब बराबर हैं (बाल-मनोविज्ञान, अनुप्रास, तुक)। (ख) गोपी ईर्ष्या से कहती है – मुरली कृष्ण को नचाती, एक पैर पर खड़ा रखती, कमर टेढ़ी करवाती और गिरिधर की गर्दन तक झुकवा देती है, फिर भी उन्हें प्रिय है (मानवीकरण, श्लेष, विरोधाभास, चित्रात्मकता)।
योग्यता-विस्तार
खेल में हारकर भी हार न माननेवाले साथी के साथ आप क्या करेंगे? अपने अनुभव कक्षा में सुनाइए।
Answer
उत्तर
मैं क्या करूँगा
- पहले उसे शांति से समझाऊँगा कि खेल में हार-जीत होती रहती है; नियम सबके लिए बराबर हैं।
- खेल-भावना (स्पोर्ट्समैनशिप) की बात करूँगा – अच्छे खिलाड़ी जीतने वाले को बधाई देते हैं।
- उसकी भावना समझूँगा – कभी-कभी हार से बच्चा दुखी होता है; उसे अगली बार जीतने का हौसला दूँगा।
- यदि वह फिर भी ज़िद करे, तो सब मिलकर – कृष्ण के सखाओं की तरह – स्पष्ट कहेंगे कि नियम न मानने वाले के साथ खेल नहीं हो सकता।
- उसके मान जाने पर उसे फिर से प्यार से खेल में शामिल करेंगे; मन में कड़वाहट नहीं रखेंगे।
अनुभव: एक बार क्रिकेट में मेरा दोस्त आउट होने पर बल्ला छोड़ने को तैयार नहीं था। हम सबने खेलना बंद करके कहा, “जो नियम नहीं मानेगा, उसके साथ कोई नहीं खेलेगा।” थोड़ी देर बाद उसने हँसकर बल्ला दे दिया और कहा, “अगली बार छक्का मारूँगा!” उस दिन से वह नियम का पक्का हो गया।
पहले शांति से समझाऊँगा कि हार-जीत खेल का हिस्सा है, खेल-भावना की बात करूँगा और हौसला दूँगा; न माने तो सब मिलकर स्पष्ट करेंगे कि नियम न मानने वाले के साथ खेल नहीं होगा, और मान जाने पर प्रेम से फिर शामिल करेंगे (क्रिकेट का अनुभव ऊपर)।
पुस्तक में संकलित ‘मुरली तऊ गुपालहिं भावति’ पद में गोपियों का मुरली के प्रति ईर्ष्या-भाव व्यक्त हुआ है। गोपियाँ और किस-किस के प्रति ईर्ष्या-भाव रखती थीं, कुछ नाम गिनाइए।
Answer
उत्तर
- कुब्जा – मथुरा की कुबड़ी दासी, जिस पर कृष्ण ने कृपा की; गोपियाँ उलाहना देती हैं कि कृष्ण कुब्जा के वश में होकर उन्हें भूल गए।
- राधा – कृष्ण की सबसे प्रिय सखी; अन्य गोपियाँ कभी-कभी राधा के सौभाग्य से ईर्ष्या करती हैं।
- उद्धव – कृष्ण के संदेशवाहक, जो योग का उपदेश देने आए; गोपियाँ उन पर व्यंग्य करती हैं (भ्रमरगीत)।
- भ्रमर (भौंरा) – भ्रमरगीत में भौंरे के बहाने कृष्ण और उद्धव पर उपालंभ।
- मथुरा की नारियाँ – जिनके बीच कृष्ण जाकर बस गए।
- रुक्मिणी आदि रानियाँ (द्वारका में) – कृष्ण की पत्नियाँ।
- यमुना, कदंब वृक्ष, मोरपंख – जो कृष्ण के निकट रहते हैं; गोपियाँ इनके सौभाग्य से भी डाह करती हैं।
कुब्जा, राधा, उद्धव, भ्रमर (भ्रमरगीत), मथुरा की नारियाँ, रुक्मिणी आदि रानियाँ – और कृष्ण के निकट रहने वाले यमुना, कदंब, मोरपंख के प्रति भी गोपियाँ ईर्ष्या-भाव रखती थीं।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ खेल का प्रसंग और बाल-मनोविज्ञान (प्रश्न 1 – 5, 10)
- ☒ मुरली के प्रति ईर्ष्या (प्रश्न 6, 7, 11)
- ☒ सूर के काव्य की विशेषताएँ और व्याख्या (प्रश्न 8, 9)