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Class 11 Hindi Antra Chapter 12

NCERT Solutions for Class 11 Hindi Antra Chapter 12: संध्या के बाद

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XI

Hindi

Antra (NCERT)

12 – संध्या के बाद

2026-27

10 of 10

बिंदु

विवरण

कवि

सुमित्रानंदन पंत (1900–1977), छायावाद के प्रमुख कवि; प्रकृति के सुकुमार कवि

कविता

‘संध्या के बाद’ (संग्रह ग्राम्या)

पूर्वार्ध

गंगा-तट पर सूर्यास्त, साँझ की लाली, मंदिर की आरती, जप में मग्न विधवाएँ, लौटते पक्षी, गायें, किसान, व्यापारी – ग्रामीण संध्या का चित्र

उत्तरार्ध

जाड़े की रात में कस्बे का छोटा बनिया (लाला) अपनी गरीबी, विवशता और असफल जीवन पर सोचता है; समाजवादी व्यवस्था का स्वप्न – कर्म और गुण के अनुसार आय-व्यय का वितरण; बुढ़िया के आने पर फिर डंडी मार देना

विशेषताएँ

प्रकृति-चित्रण, ग्राम्य यथार्थ, मार्क्सवादी चेतना; उपमा, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण, अनुप्रास; तत्सम-प्रधान खड़ी बोली

Q1

संध्या के समय प्रकृति में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं, कविता के आधार पर लिखिए।

Answer

उत्तर

  1. साँझ की लाली अपने पंख समेटकर पेड़ों की चोटियों पर जा बैठती है।
  2. ताँबे जैसे लाल पत्तों वाले पीपल से सुनहरी किरणें ऐसे झरती हैं मानो सौ-सौ मुखों से चंचल स्वर्णिम झरने बह रहे हों।
  3. सूर्य ज्योति-स्तंभ की तरह नदी में धँसता हुआ क्षितिज पर ओझल हो जाता है।
  4. गंगाजल साँप की धीमी, थकी, उतरी हुई केंचुल-सा चितकबरा दिखता है; रेत पर हवा की लहरों से साँप जैसी रेखाएँ बन जाती हैं; नीली लहरों में पीला जल और उसमें चाँदी जैसे बादलों का प्रतिबिंब।
  5. रेत, जल और हवा मानो स्नेह-बंधन में बँधे हैं; हवा पिघलकर जल और जल जमकर ओले जैसा लगता है।
  6. पक्षी (सोन खग) पंक्तिबद्ध होकर लौटते हैं; गायों के खुरों से उड़ती गोधूलि सुनहरे चूर्ण-सी लगती है।
  7. पक्षी, गायें, किसान, व्यापारी – सब घर लौटते हैं; चराचर घरों में छिप जाते हैं, छाया भी अदृश्य हो जाती है।
  8. जाड़े की धुँधली संध्या में रात की गहरी छाया झूलने लगती है; खेत, बाग, घर, पेड़, तट, लहरें – सब उदासी में डूब जाते हैं।

साँझ की लाली पेड़ों की चोटियों पर सिमट जाती है, पीपल से स्वर्णिम किरणें झरती हैं, सूर्य नदी में धँसता-सा ओझल होता है, गंगाजल चितकबरी केंचुल-सा दिखता है, पक्षी-गायें-किसान घर लौटते हैं, गोधूलि उड़ती है, छाया अदृश्य हो जाती है और सब कुछ रात की उदासी में डूब जाता है।

Q2

पंत जी ने नदी के तट का जो वर्णन किया है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।

Answer

उत्तर

संध्या के समय गंगा का तट बहुत मोहक दिखता है। डूबता सूरज नदी में ऐसा लगता है मानो प्रकाश का खंभा जल में धँस रहा हो। गंगा की धारा धूप-छाँह के कारण साँप की उतरी हुई चितकबरी केंचुल जैसी लगती है। किनारे की रेत धूप-छाँह के रंग की है और हवा की लहरों ने उस पर साँप जैसी टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ बना दी हैं। नीली लहरों में मथा हुआ पीला जल है, जिसमें चाँदी जैसे सफ़ेद बादलों की परछाईं झलकती है। रेत, जल और हवा मानो सदा से प्रेम-बंधन में बँधे हैं।

किनारे के मंदिर में शंख और घंटे बज रहे हैं, जिनकी ध्वनि से लहरें काँप रही हैं; दीपशिखा जैसा चमकता कलश मानो आकाश की आरती उतार रहा है। तट पर बगुलों जैसी सफ़ेद वस्त्र पहने वृद्ध विधवाएँ जप-ध्यान में मग्न बैठी हैं, जिनका मौन दुख नदी की धीमी धारा में बहता-सा लगता है। दूर आकाश में सुनहरे पक्षियों की पंक्ति अपनी नम ध्वनि से मौन आकाश को गुँजा रही है।

संध्या में डूबता सूर्य ज्योति-स्तंभ-सा नदी में धँसता है, गंगाजल चितकबरी केंचुल-सा, रेत पर हवा से बनी सर्पाकार रेखाएँ, नीली लहरों में पीला जल और चाँदी जैसे बादलों का प्रतिबिंब; मंदिर में शंख-घंटे और आरती करता-सा कलश; तट पर बगुलों-सी वृद्ध विधवाएँ जप में मग्न और आकाश में लौटते पक्षी – तट का सजीव, सुंदर पर उदास चित्र।

Q3

बस्ती के छोटे से गाँव के अवसाद को किन-किन उपकरणों द्वारा अभिव्यक्त किया गया है?

Answer

उत्तर

  1. प्रकृति का उदास वातावरण: जाड़े की सूनी संध्या (द्वाभा), गहरी रात की छाया; खेत, बाग, घर, पेड़, तट, लहरें ‘निष्प्रभ विषाद’ में डूबते हुए।
  2. ध्वनियाँ: गाड़ीवानों का विरह-गीत (बिरहा), भौंक-भौंककर लड़ते कुत्ते, हुआँ-हुआँ करते सियार – जो रात को उदास स्वर देते हैं; अंत में घुग्घू (उल्लू) की चीख।
  3. धुआँ: माली की झोंपड़ी से उठती धुएँ की नीली, रेशमी जाली।
  4. मंद प्रकाश: दुकानों की बत्तियाँ, टिन की ढिबरी जो धुआँ अधिक और उजाला कम देती है; कड़ाके की ठंड में ऊँघती लंबी अँधियारी।
  5. मानवीय दशा: लौटते थके किसान (श्रांत, श्लथ डग); मिट्टी-खपरे के घर; लाला की दरिद्रता, ठिठुरता तन, खिसकती गुदड़ी, लेन-देन के ‘थोथे सपने’।
  6. अंत: लोग दरवाज़े बंद कर लेते हैं और आलस्य भरी नींद का अजगर बस्ती को निगल लेता है।

जाड़े की सूनी संध्या और निष्प्रभ विषाद में डूबे खेत-घर-पेड़; बिरहा गाते गाड़ीवान, लड़ते कुत्ते, सियारों की हुआँ-हुआँ और उल्लू की चीख; धुएँ की जाली; धुआँ देती मंद ढिबरी; थके किसान, मिट्टी-खपरे के घर, लाला की दरिद्रता और नींद के अजगर का बस्ती को निगलना – इन उपकरणों से अवसाद व्यक्त हुआ है।

Q4

लाला के मन में उठनेवाली दुविधा को अपने शब्दों में लिखिए।

Answer

उत्तर

जाड़े की रात में ढिबरी की मंद रोशनी में बैठा कस्बे का छोटा बनिया (लाला) अपने जीवन पर सोचता है –

  1. उसे अपनी छोटी हस्ती का सस्तापन अनुभव होता है; दीनता, दुख, अपमान, ग्लानि, अधूरी इच्छाएँ और बिना आय की थकान उसके जीवन की परिभाषा बन गई हैं।
  2. वह दिन भर अनाज के ढेर की तरह गद्दी पर बैठा रहता है, कौड़ी-कौड़ी की होड़ में बात-बात पर झूठ बोलता है – फिर भी क्या उसका परिवार ठीक से पलता है? क्या परिजन स्वच्छ-सुघड़ रह पाते हैं? क्या वह पक्का घर बना पा रहा है? क्या उसके मन में सुख है, धन जुटता है?
  3. वह सोचता है कि शहर के बनियों की तरह वह महाजन क्यों नहीं बन पाता? किसने उसकी उन्नति के साधन रोक दिए?
  4. क्या समाज-व्यवस्था में ऐसा परिवर्तन संभव नहीं कि कर्म और गुण के अनुसार आय-व्यय का बँटवारा हो? क्या ऐसा कुछ नहीं जो सबमें सामूहिक जीवन फूँक दे, सब मिलकर निर्माण करें और जीवन का भोग करें?
  5. वह यह भी समझता है कि उसके दुख का दोषी व्यक्ति नहीं, समाज की परिपाटी है।

पर यह सपना तभी टूट जाता है जब एक बुढ़िया आध-पाव आटा लेने आती है और लाला फिर डंडी मार देता है – उसकी दुविधा सामने आती है: आदर्श की कल्पना और स्वार्थ-भरे यथार्थ के बीच वह यथार्थ में लौट आता है।

लाला अपनी दरिद्रता, झूठ और कौड़ी की होड़ भरे असफल जीवन पर दुखी होकर सोचता है कि वह शहरी महाजन क्यों नहीं बन पाता, किसने उसकी उन्नति रोकी, और क्या कर्म-गुण के अनुसार वितरण वाली समतामूलक व्यवस्था संभव नहीं; पर बुढ़िया के आते ही वह फिर डंडी मार देता है – आदर्श और स्वार्थी यथार्थ के बीच यही उसकी दुविधा है।

Q5

सामाजिक समानता की छवि की कल्पना किस तरह अभिव्यक्त हुई है?

Answer

उत्तर

लाला के मन में उठे विचारों के माध्यम से कवि ने समाजवादी, शोषण-मुक्त समाज की कल्पना की है:

  1. समान वितरण: “कर्म और गुण के समान ही सकल आय-व्यय का हो वितरण” – हर व्यक्ति को उसके परिश्रम और योग्यता के अनुसार हिस्सा मिले।
  2. सामूहिक जीवन: कुछ ऐसा हो जो सबमें सामूहिक जीवन फूँक दे; लोग अपने-अपने ‘घरौंदों’ में अकेले न सोचें।
  3. मिलकर निर्माण और भोग: “मिलकर जन निर्माण करे जग, मिलकर भोग करें जीवन का।”
  4. शोषण से मुक्ति: “जन विमुक्त हो जन-शोषण से, हो समाज अधिकारी धन का” – धन पर व्यक्ति का नहीं, समाज का अधिकार हो।
  5. दरिद्रता का अंत: दरिद्रता पापों की जननी है; उसके मिटने से पाप, ताप और भय मिटें; सबके घर, वस्त्र, शरीर सुंदर हों; पशुता पर मानवता की जीत हो।
  6. व्यवस्था में दोष: “व्यक्ति नहीं, जग की परिपाटी दोषी” – इसलिए व्यवस्था बदले; “जन का श्रम जन में बँट जाए, प्रजा सुखी हो देश-देश की।”

कर्म और गुण के अनुसार आय-व्यय का वितरण, सामूहिक जीवन, मिलकर निर्माण और भोग, शोषण से मुक्ति और धन पर समाज का अधिकार, दरिद्रता का अंत और सबके लिए सुंदर घर-वस्त्र, तथा व्यक्ति के बजाय व्यवस्था में बदलाव – इस तरह सामाजिक समानता की कल्पना व्यक्त हुई है।

Q6

‘कर्म और गुण के समान … हो वितरण’ पंक्ति के माध्यम से कवि कैसे समाज की ओर संकेत कर रहा है?

Answer

उत्तर

कवि ऐसे समतामूलक, न्यायपूर्ण और शोषण-रहित (समाजवादी) समाज की ओर संकेत कर रहा है जिसमें:

  1. व्यक्ति को उसके परिश्रम (कर्म) और योग्यता (गुण) के अनुसार आय मिले – न कम, न अधिक।
  2. धन कुछ ही लोगों (महाजनों) के हाथ में इकट्ठा न हो; संसाधनों और आय का न्यायपूर्ण वितरण हो।
  3. जन्म, जाति या पूँजी के आधार पर किसी का शोषण न हो।
  4. मेहनत करने वाला गरीब न रहे और बिना मेहनत किए कोई अमीर न बने।

यह विचार पंत की ग्राम्या काल की मार्क्सवादी चेतना से प्रभावित है – ‘प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार, प्रत्येक को उसके कर्म के अनुसार’।

ऐसे समतामूलक, शोषण-रहित, समाजवादी समाज की ओर, जहाँ हर व्यक्ति को उसके परिश्रम और योग्यता के अनुसार आय मिले, धन कुछ हाथों में न सिमटे और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण हो।

Q7

निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –
(क) तट पर बगुलों-सी वृद्धाएँ / विधवाएँ जप ध्यान में मगन, / मंथर धारा में बहता / जिनका अदृश्य, गति अंतर-रोदन!

Answer

उत्तर

भाव-सौंदर्य: संध्या के समय गंगा-तट पर सफ़ेद वस्त्र पहने वृद्ध विधवाएँ बगुलों की तरह शांत, एकाग्र होकर जप-ध्यान में बैठी हैं। ऊपर से वे शांत दिखती हैं, पर उनके भीतर का दुख – वैधव्य और अकेलेपन की पीड़ा – एक मौन, अदृश्य रुदन बनकर नदी की धीमी धारा के साथ बहता-सा लगता है। इसमें विधवाओं की सामाजिक दशा के प्रति गहरी करुणा है।

शिल्प-सौंदर्य

  • उपमा अलंकार – “बगुलों-सी वृद्धाएँ” (सफ़ेद वस्त्र, स्थिर ध्यान-मुद्रा)।
  • मानवीकरण/लाक्षणिकता – अंतर-रोदन का धारा में बहना; मौन दुख को गति देना।
  • विरोधाभास – बाहर ध्यान की शांति, भीतर रोदन; ‘अदृश्य’ होकर भी ‘गति’।
  • अनुप्रास – “मंथर धारा”, “विधवाएँ… वृद्धाएँ”।
  • दृश्य-बिंब और करुण रस; तत्सम-प्रधान खड़ी बोली; छायावादी सूक्ष्मता।

भाव – तट पर बगुलों-सी शांत, सफ़ेद वस्त्र वाली वृद्ध विधवाएँ जप में मग्न हैं, पर उनका मौन अंतर-रोदन नदी की धीमी धारा में बहता-सा लगता है – करुणा। शिल्प – उपमा (‘बगुलों-सी’), मानवीकरण/लाक्षणिकता, विरोधाभास (शांति और रोदन), अनुप्रास, दृश्य-बिंब, तत्सम खड़ी बोली।

Q8

आशय स्पष्ट कीजिए –
(क) ताम्रपर्ण, पीपल से, शतमुख / झरते चंचल स्वर्णिम निर्झर!
(ख) दीप शिखा-सा ज्वलित कलश / नभ में उठकर करता नीराजन!
(ग) सोन खगों की पाँति / आर्द्र ध्वनि से नीरव नभ करती मुखरित!
(घ) मन से कढ़ अवसाद श्रांति / आँखों के आगे बुनती जाला!
(ङ) क्षीण ज्योति ने चुपके ज्यों / गोपन मन को दे दी हो भाषा!
(च) बिना आय की क्लांति बन रही / उसके जीवन की परिभाषा!
(छ) व्यक्ति नहीं, जग की परिपाटी / दोषी जन के दुःख क्लेश की।

Answer

उत्तर

(क) संध्या की लाल-सुनहरी किरणों में पीपल के पत्ते ताँबे जैसे लाल दिखते हैं। हिलते पत्तों से छनकर आती किरणें ऐसी लगती हैं मानो पीपल से सैकड़ों मुखों वाले चंचल, सुनहरे झरने झर रहे हों। (उत्प्रेक्षा, दृश्य-बिंब)

(ख) मंदिर का सुनहरा कलश डूबते सूर्य की रोशनी में दीपक की लौ की तरह चमक रहा है। ऊँचा उठा वह कलश ऐसा लगता है मानो आकाश की आरती (नीराजन) उतार रहा हो। (उपमा, मानवीकरण)

(ग) सुनहरी आभा में चमकते पक्षियों की पंक्ति घर लौट रही है; उनकी नम, कोमल ध्वनि से शांत आकाश गूँज उठता है। (मानवीकरण, ध्वनि-बिंब)

(घ) लाला के मन से निकली उदासी (अवसाद) और थकान (श्रांति) उसकी आँखों के आगे जाला बुन रही हैं – अर्थात् निराशा के कारण उसे भविष्य धुँधला, अंधकारमय दिखता है। (मानवीकरण, लाक्षणिकता)

(ङ) ढिबरी की मंद, काँपती लौ के साथ लोगों के कातर हृदय का रुदन और मूक निराशा भी काँप उठती है – मानो उस क्षीण ज्योति ने चुपचाप छिपे मन के दुख को भाषा (अभिव्यक्ति) दे दी हो। (उत्प्रेक्षा, मानवीकरण)

(च) लाला दिन भर मेहनत करता है, पर आय नहीं होती; बिना कमाई की यह थकान, ग्लानि और निराशा ही अब उसके जीवन की पहचान (परिभाषा) बन गई है। (गरीब के असफल जीवन का यथार्थ)

(छ) लोगों के दुख और कष्ट के लिए कोई एक व्यक्ति दोषी नहीं है, बल्कि समाज की रीति (व्यवस्था) – पूँजीवादी, शोषणकारी ढाँचा – दोषी है। इसलिए व्यवस्था बदलनी होगी। (मार्क्सवादी चेतना)

(क) लाल पीपल से छनती किरणें सैकड़ों स्वर्णिम झरनों-सी लगती हैं। (ख) दीपशिखा-सा चमकता कलश मानो आकाश की आरती उतार रहा है। (ग) सुनहरे पक्षियों की पंक्ति अपनी नम ध्वनि से शांत आकाश गुँजा देती है। (घ) मन की उदासी और थकान आँखों के आगे निराशा का जाला बुनती है। (ङ) काँपती क्षीण लौ ने मानो छिपे मन के दुख को भाषा दे दी। (च) बिना आय की थकान ही लाला के जीवन की पहचान बन गई। (छ) दुखों का दोषी व्यक्ति नहीं, समाज की शोषणकारी व्यवस्था है।

योग्यता-विस्तार

Q9

ग्राम्य जीवन से संबंधित कविताओं का संकलन कीजिए।

Answer

उत्तर

कविता

कवि

विषय

‘ग्राम श्री’

सुमित्रानंदन पंत

गाँव की हरियाली, फ़सलों और प्रकृति का सौंदर्य – “फैली खेतों में दूर तलक मख़मल की कोमल हरियाली”

‘भारत माता ग्रामवासिनी’

सुमित्रानंदन पंत

गाँवों में बसी गरीब, दुखी भारत माता

‘वह तोड़ती पत्थर’

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

श्रमिक स्त्री का संघर्ष

‘बादल को घिरते देखा है’

नागार्जुन

प्रकृति और लोक-जीवन

‘अकाल और उसके बाद’

नागार्जुन

गाँव में अकाल की विभीषिका – “कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास”

‘ग्राम्य जीवन’

मैथिलीशरण गुप्त

“अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका मन चाहे”

‘चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती’

त्रिलोचन

ग्रामीण बालिका और पलायन

‘किसान’

मैथिलीशरण गुप्त

किसान का कठोर जीवन

(विद्यार्थी ‘कविता कोश’ से इन कविताओं के अंश जोड़ सकते हैं।)

‘ग्राम श्री’, ‘भारत माता ग्रामवासिनी’ (पंत), ‘वह तोड़ती पत्थर’ (निराला), ‘अकाल और उसके बाद’ (नागार्जुन), ‘अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है’ (मैथिलीशरण गुप्त), ‘चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती’ (त्रिलोचन) आदि।

Q10

कविता में निम्नलिखित उपमान किसके लिए आए हैं, लिखिए – (क) ज्योति स्तंभ-सा (ख) केंचुल-सा (ग) दीपशिखा-सा (घ) बगुलों-सी (ङ) स्वर्ण चूर्ण-सी (च) सनन् तीर-सा

Answer

उत्तर

उपमान

किसके लिए (उपमेय)

(क) ज्योति स्तंभ-सा

नदी में धँसता-सा, क्षितिज पर ओझल होता सूर्य (उसका जल में पड़ता प्रतिबिंब)

(ख) केंचुल-सा

धूप-छाँह से चितकबरा दिखता गंगाजल

(ग) दीपशिखा-सा

मंदिर का चमकता हुआ कलश

(घ) बगुलों-सी

तट पर सफ़ेद वस्त्रों में जप-ध्यान में मग्न वृद्ध विधवाएँ

(ङ) स्वर्ण चूर्ण-सी

सूर्य की किरणों में सुनहरी चमकती, उड़ती गोधूलि (गोरज)

(च) सनन् तीर-सा

आकाश में तेज़ी से जाता लौटते पक्षियों के पंखों और कंठों का स्वर

(क) सूर्य (ख) गंगाजल (ग) मंदिर का कलश (घ) वृद्ध विधवाएँ (ङ) गोधूलि (च) पक्षियों के पंखों और कंठों का स्वर।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ संध्या का प्रकृति-चित्रण और नदी-तट (प्रश्न 1, 2, 7, 8क-ग, 10)
  • ☒ बस्ती का अवसाद (प्रश्न 3, 8घ-ङ)
  • ☒ लाला की दुविधा और सामाजिक समानता (प्रश्न 4, 5, 6, 8च-छ)
  • ☒ ग्राम्य कविताएँ (प्रश्न 9)

Total questions answered: 10 of 10

Frequently Asked Questions

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