Circle of Learning Logo CIRCLE OF LEARNING Excellence in Education
Class 11 Hindi Antra Chapter 6

NCERT Solutions for Class 11 Hindi Antra Chapter 6: खानाबदोश

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XI

Hindi

Antra (NCERT)

6 – खानाबदोश

2026-27

14 of 14

बिंदु

विवरण

लेखक

ओमप्रकाश वाल्मीकि (1950–2013), दलित साहित्य के प्रमुख रचनाकार

विधा

कहानी

पात्र

सुकिया और मानो (गाँव छोड़कर आए मज़दूर दंपति), जसदेव (युवा ब्राह्मण मज़दूर), सूबेसिंह (भट्ठा-मालिक मुखतार सिंह का बेटा), असगर ठेकेदार, किसनी और महेश, बूढ़ा बिलसिया

कथा

भट्ठे पर अपनी पकी ईंटें देखकर मानो पक्की ईंटों का घर बनाने का सपना देखती है; सूबेसिंह की बुरी नज़र से उसे बचाने गया जसदेव पिटता है; मानो के न झुकने पर सूबेसिंह उन्हें तंग करता है; मानो की पाथी ईंटें रात में रौंद दी जाती हैं और सुकिया-मानो भट्ठा छोड़कर फिर खानाबदोश बन जाते हैं

संदेश

मज़दूरों का शोषण, स्त्री की असुरक्षा, जातिगत भेदभाव, और सम्मानजनक जीवन के सपनों का टूटना

Q1

जसदेव की पिटाई के बाद मज़दूरों का समूचा दिन कैसा बीता?

Answer

उत्तर

जसदेव की पिटाई के बाद भट्ठे का समूचा दिन अदृश्य भय और दहशत में बीता।

  1. सब मज़दूर डर गए थे कि सूबेसिंह किसी भी समय लौटकर आ सकता है।
  2. जसदेव को हल्का बुखार हो गया; वह झोंपड़ी में पड़ा कराहता रहा और सुकिया उसके पास बैठा रहा। मानो ने उसकी चोटों पर हल्दी लगाई।
  3. शाम होते ही भट्ठे पर सन्नाटा छा गया; सब अपने-अपने खोल में सिमट गए।
  4. बूढ़ा बिलसिया, जो रोज़ देर रात तक पेड़ के नीचे बैठता था, शाम होते ही झोंपड़ी में जाकर लेट गया; उसकी खाँसी भी धीमी हो गई।
  5. किसनी की झोंपड़ी से ट्रांज़िस्टर की आवाज़ भी नहीं आ रही थी; केवल हैंडपंप की खंच-खंच ख़ामोशी तोड़ रही थी।
  6. सुकिया और मानो ने अनिच्छा से एक-एक रोटी खाई; भूख जैसे मर गई थी।

पूरा दिन भय और दहशत में बीता – मज़दूर सूबेसिंह के लौटने से डरे रहे, शाम होते ही सन्नाटा छा गया, बिलसिया जल्दी लेट गया, ट्रांज़िस्टर बंद रहा और जसदेव बुखार में पड़ा रहा।

Q2

मानो अभी तक भट्ठे की ज़िंदगी से तालमेल क्यों नहीं बैठा पाई थी?

Answer

उत्तर

  1. गाँव का मोह: मानो का मन अपने गाँव-देस में बसा था; वह कहती थी – “अपने देस की सूखी रोटी भी परदेस के पकवानों से अच्छी होती है।” वह केवल सुकिया की ज़िद के आगे कमज़ोर पड़कर भट्ठे पर आई थी।
  2. भयावह वातावरण: शाम होते ही भट्ठा अँधेरे में डूब जाता, चारों ओर भाँय-भाँय होने लगती; साँप-बिच्छू का डर रहता – मानो पूरा जंगल झोंपड़ी के दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ हो। ऐसे में उसका जी घबराता था।
  3. कष्टमय जीवन: दड़बेनुमा झोंपड़ियाँ, जिनमें झुककर घुसना पड़ता था; ईंटों का चूल्हा; रोटी के साथ गुड़ या मिर्च की चटनी; दवा-दारू का कोई प्रबंध नहीं।
  4. अनिश्चितता: वहाँ सब कुछ अनिश्चित था – चूल्हे की चिट-पिट जैसे मन की दुश्चिंताओं की प्रतिध्वनि थी।

मानो का मन गाँव में बसा था और वह केवल सुकिया की ज़िद से आई थी; भट्ठे का अँधेरा, साँप-बिच्छू का डर, दड़बेनुमा झोंपड़ियाँ, अभावग्रस्त जीवन और अनिश्चितता के कारण वह वहाँ तालमेल नहीं बैठा पाई थी।

Q3

असगर ठेकेदार के साथ जसदेव को आता देखकर सूबेसिंह क्यों बिफर पड़ा और जसदेव को मारने का क्या कारण था?

Answer

उत्तर

सूबेसिंह ने किसनी की तबीयत ख़राब होने का बहाना बनाकर असगर ठेकेदार से मानो को दफ़्तर में बुलवाया था – उसकी नीयत ख़राब थी; वह मानो को भी किसनी की तरह फँसाना चाहता था। सुकिया और जसदेव समझ गए कि ‘मछली को फँसाने के लिए जाल फेंका जा रहा है’। इसलिए मानो की जगह जसदेव असगर के साथ चला गया।

बिफरने का कारण: मानो के स्थान पर जसदेव को आते देखकर सूबेसिंह की योजना असफल हो गई। उसे लगा कि एक मामूली मज़दूर ने उसके इरादे में बाधा डाली है और उसकी अवज्ञा की है।

मारने का कारण: जसदेव ने विनम्रता से कहा कि जो भी काम हो, वह कर देगा। सूबेसिंह ने अपशब्द कहे। जसदेव ने आपत्ति की – “बाबू जी, आप किस तरह बोल रहे हैं…” – तो सूबेसिंह ने उसे थप्पड़ मारा, धक्का देकर गिराया और लात-घूँसों से अधमरा कर दिया, साथ ही भट्ठे की आग में झोंक देने की धमकी दी। अपनी इच्छा पूरी न होने की खीझ, मालिकाना अहंकार और मज़दूर द्वारा टोके जाने को अपना अपमान समझना – यही मारने के कारण थे।

सूबेसिंह बुरी नीयत से मानो को दफ़्तर बुलवाना चाहता था; उसकी जगह जसदेव को देखकर उसकी योजना विफल हुई, इसलिए वह बिफर पड़ा; जसदेव का बीच में आना और उसके अपशब्दों पर आपत्ति करना उसे अपने मालिकाना अहं का अपमान लगा, इसलिए उसने जसदेव को मारा।

Q4

जसदेव ने मानो के हाथ का खाना क्यों नहीं खाया?

Answer

उत्तर

जसदेव ब्राह्मण था और मानो निम्न जाति की थी। भूख लगी होने के बावजूद उसके मन में जातिगत संस्कारों की हिचक थी – घर-परिवार से निकले उसे अधिक समय नहीं हुआ था और छुआछूत की भावना अभी उसके मन से गई नहीं थी। इसलिए उसने “भूख नहीं है” का बहाना बनाया।

सुकिया ने भी पहले ही कहा था – “बामन तेरे हाथ की रोटी खावेगा?” मानो ने जसदेव को रंगे हाथों पकड़ लिया और दुखी होकर कहा कि जो दिन-रात साथ काम करता है, जो मेरी ख़ातिर पिटा, उसके और हमारे बीच यह ‘बामन’ कहाँ से आ गया? – और रोटी लेकर लौट आई।

जसदेव ब्राह्मण था; भूखा होते हुए भी उसके मन में जातिगत छुआछूत के संस्कारों की हिचक थी, इसलिए उसने ‘भूख नहीं है’ का बहाना बनाकर निम्न जाति की मानो के हाथ की रोटी नहीं खाई।

Q5

लोगों को क्यों लग रहा था कि किसी ने जानबूझकर मानो की ईंटें गिराकर रौंदा है?

Answer

उत्तर

  1. कोई प्राकृतिक कारण नहीं: रात में न आँधी-तूफ़ान आया था, न बारिश हुई थी, जिससे ईंटें गिर सकती थीं।
  2. जानवर का काम नहीं: किसी जंगली जानवर द्वारा इतनी ईंटों को इस तरह तोड़ना संभव नहीं लगता था।
  3. ईंटों की दशा: सारी ईंटें टूटी-फूटी पड़ी थीं, जैसे किसी ने उन्हें बेदर्दी से रौंद डाला हो।
  4. पृष्ठभूमि: सब जानते थे कि सूबेसिंह मानो के न झुकने से चिढ़ा हुआ था और सुकिया-मानो को तरह-तरह से तंग कर रहा था – साँचा छीनना, मोरी का ख़तरनाक काम देना, मज़दूरी रोकने का आदेश। इसलिए लोगों को शक था कि यह बदले की भावना से किया गया काम है।

रात में न आँधी-तूफ़ान आया था, न यह किसी जानवर का काम लगता था; ईंटें बेदर्दी से रौंदी हुई थीं, और सब जानते थे कि सूबेसिंह मानो-सुकिया को तंग कर रहा था – इसलिए लोगों को लगा कि यह जान-बूझकर किया गया।

Q6

मानो को क्यों लग रहा था कि किसी ने उसकी पक्की ईंटों के मकान को ही धराशायी कर दिया है?

Answer

उत्तर

मानो ने अपनी पकी ईंटें देखकर पक्की ईंटों का अपना घर बनाने का सपना देखा था। उस सपने को पूरा करने के लिए वह और सुकिया दिन-रात काम कर रहे थे, दुगुनी ईंटें पाथ रहे थे, सूबेसिंह की ज़्यादतियाँ भी सह रहे थे। ये पाथी हुई ईंटें उसकी मेहनत, बचत और सपने का प्रतीक थीं – इनकी मज़दूरी से ही घर के लिए पैसा जुड़ना था।

जब उसने उन ईंटों को टूटा-फूटा और रौंदा हुआ देखा, तो उसे लगा मानो केवल ईंटें नहीं, बल्कि उसका सपनों का घर ही ढहा दिया गया हो। असगर ठेकेदार ने टूटी ईंटों की मज़दूरी देने से भी मना कर दिया, जिससे घर बनाने की उम्मीद पर पानी फिर गया। इसलिए वह दहाड़ें मार-मारकर रोने लगी।

वे ईंटें मानो की मेहनत, बचत और पक्की ईंटों के घर के सपने का प्रतीक थीं; उनके रौंदे जाने और मज़दूरी न मिलने से उसे लगा कि उसका सपनों का घर ही ढहा दिया गया है।

Q7

‘चल! ये लोग म्हारा घर ना बणने देंगे।’ – सुकिया के इस कथन के आधार पर कहानी की मूल संवेदना स्पष्ट कीजिए।

Answer

उत्तर

ईंटें टूटने और मज़दूरी न मिलने पर सुकिया को लगा कि सब लोग उसके ख़िलाफ़ हैं और उसके सामने बाधाएँ खड़ी की जा रही हैं। तब उसने मानो का हाथ पकड़कर यह कहा और दोनों भट्ठा छोड़कर चल पड़े।

कहानी की मूल संवेदना

  1. शोषित वर्ग के सपनों का टूटना: मेहनतकश, दलित मज़दूर एक छोटे-से पक्के घर और सम्मानजनक जीवन का सपना देखते हैं, पर शोषक व्यवस्था (मालिक, ठेकेदार) उनका यह सपना पूरा नहीं होने देती।
  2. शोषण की निरंतरता: सुकिया ने जिन हालात (गरीबों का अपमान, शोषण) के कारण गाँव छोड़ा था, वही भट्ठे पर भी मिले – शोषण हर जगह है।
  3. स्त्री की असुरक्षा और सम्मान का संघर्ष: मानो इज़्ज़त की ज़िंदगी चाहती है; किसनी नहीं बनना चाहती – इसकी कीमत उसे अपना सपना खोकर चुकानी पड़ती है।
  4. जातिगत भेदभाव: जसदेव जैसे साथी भी जाति और स्वार्थ के कारण साथ छोड़ देते हैं।
  5. खानाबदोश जीवन: ऐसे लोगों को कहीं स्थायी ठिकाना नहीं मिलता; वे एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक दिशाहीन भटकते रहते हैं।

यह कथन कहानी की मूल संवेदना बताता है – शोषक व्यवस्था मेहनतकश, दलित मज़दूरों के छोटे-से घर और सम्मानजनक जीवन के सपने को पूरा नहीं होने देती; शोषण हर जगह है, स्त्री की इज़्ज़त असुरक्षित है, जाति-भेद साथियों को अलग करता है और ऐसे लोग खानाबदोश बनकर भटकने को विवश हैं।

Q8

‘खानाबदोश’ कहानी में आज के समाज की किन समस्याओं को रेखांकित किया गया है? इन समस्याओं के प्रति कहानीकार के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए।

Answer

उत्तर

समस्याएँ

  1. मज़दूरों का आर्थिक शोषण: कम मज़दूरी, असुरक्षित और ख़तरनाक काम (मोरी), मनमाने ढंग से मज़दूरी रोकना, कोई स्वास्थ्य-सुविधा नहीं।
  2. स्त्रियों का यौन शोषण और असुरक्षा: सूबेसिंह जैसे लोग गरीब मज़दूर स्त्रियों (किसनी, मानो) को अपनी हवस का शिकार बनाना चाहते हैं।
  3. जातिगत भेदभाव और छुआछूत: जसदेव का ब्राह्मण होने के कारण मानो के हाथ की रोटी न खाना।
  4. सत्ता और धन का अहंकार: मालिक-पुत्र का मज़दूरों पर अत्याचार, मारपीट और धमकी।
  5. पलायन और विस्थापन: गाँव में अपमान और गरीबी से भागकर शहर/भट्ठों पर आना और फिर भी स्थायी ठिकाना न मिलना।
  6. नशाखोरी: महेश को नशे की लत डालना।
  7. आवास की समस्या: गरीबों के लिए अपना पक्का घर एक सपना।

कहानीकार का दृष्टिकोण: ओमप्रकाश वाल्मीकि इन समस्याओं को यथार्थवादी, संवेदनशील और प्रतिरोधी दृष्टि से देखते हैं। वे शोषितों के प्रति गहरी सहानुभूति रखते हैं और शोषक व्यवस्था की अमानवीयता को उजागर करते हैं। मानो के माध्यम से वे स्त्री के आत्मसम्मान और साहस को दिखाते हैं; जसदेव के माध्यम से जाति की जकड़न और अवसरवाद पर प्रहार करते हैं। कहानी का अंत समाधान नहीं देता, बल्कि पाठक को इस अन्याय पर सोचने के लिए विवश करता है।

मज़दूरों का आर्थिक शोषण, स्त्रियों का यौन शोषण, जातिगत भेदभाव, सत्ता-धन का अहंकार, पलायन, नशाखोरी और आवास का अभाव – लेखक इन्हें यथार्थवादी, संवेदनशील और प्रतिरोधी दृष्टि से दिखाकर शोषितों के प्रति सहानुभूति और शोषक व्यवस्था की अमानवीयता उजागर करते हैं।

Q9

सुकिया ने जिन समस्याओं के कारण गाँव छोड़ा वही समस्या शहर में भट्ठे पर उसे झेलनी पड़ी – मूलतः वह समस्या क्या थी?

Answer

उत्तर

मूल समस्या थी – गरीब और दलित होने के कारण होने वाला शोषण, अपमान और असुरक्षा।

  1. गाँव में: सुकिया कहता था कि गाँव में चौधरी लोग गरीब को आदमी भी नहीं समझते; ऊँची जाति और धनवान लोगों का दबदबा, अपमान और शोषण – ‘नर्क की ज़िंदगी’। सम्मानजनक जीवन और कमाई के लिए उसने गाँव छोड़ा।
  2. भट्ठे पर: यहाँ भी वही हुआ – मालिक-पुत्र सूबेसिंह का अत्याचार, उसकी पत्नी पर बुरी नज़र, जसदेव की पिटाई, साँचा छीनकर ख़तरनाक काम देना, मज़दूरी रोकना और अंततः ईंटें तोड़ देना। जसदेव का जातिगत व्यवहार भी वहाँ मौजूद था।

कहानी में स्पष्ट लिखा है – “इन्हीं हालात में गाँव छोड़ा था, वे ही फिर सामने खड़े थे।” अर्थात् सामंती-पूँजीवादी शोषण, जातिगत भेदभाव और स्त्री की असुरक्षा हर जगह है।

मूल समस्या थी गरीब-दलित होने के कारण ताक़तवर लोगों द्वारा होने वाला शोषण, अपमान और स्त्री की असुरक्षा – गाँव में चौधरियों का दबदबा था, भट्ठे पर मालिक-पुत्र सूबेसिंह का अत्याचार; शोषण की यह व्यवस्था हर जगह एक-सी थी।

Q10

‘स्किल इंडिया’ जैसा कार्यक्रम होता तो क्या तब भी सुकिया और मानो को खानाबदोश जीवन व्यतीत करना पड़ता?

Answer

उत्तर

आंशिक रूप से उनका जीवन बेहतर हो सकता था, पर पूरी तरह समस्या हल नहीं होती।

सकारात्मक संभावना

  1. ‘स्किल इंडिया’ जैसे कार्यक्रम से सुकिया और मानो को राजमिस्त्री, बढ़ईगीरी, सिलाई, ईंट-निर्माण की आधुनिक तकनीक जैसे कौशल और प्रमाणपत्र मिलते।
  2. इससे वे बेहतर मज़दूरी वाली नौकरी या स्वरोज़गार (जैसे अपना छोटा ईंट-उद्योग, सहकारी समिति) शुरू कर सकते और किसी एक शोषक मालिक पर निर्भर न रहते।
  3. कौशल के साथ बैंक-ऋण, प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाओं से उनका पक्के घर का सपना भी पूरा हो सकता था।

सीमाएँ: उनकी समस्या केवल कौशल की कमी नहीं थी; मूल समस्या शोषण, जातिगत भेदभाव, स्त्री की असुरक्षा और सत्ता का अहंकार थी। इनसे लड़ने के लिए श्रम-कानूनों का कड़ाई से पालन, मज़दूर संगठन, न्याय-व्यवस्था और समाज की सोच में बदलाव भी आवश्यक है।

स्किल इंडिया से उन्हें कौशल, बेहतर मज़दूरी, स्वरोज़गार और आवास-योजनाओं का लाभ मिलकर खानाबदोश जीवन से कुछ मुक्ति मिल सकती थी; पर शोषण, जाति-भेद और स्त्री-असुरक्षा जैसी मूल समस्याओं के लिए कानून, संगठन और सामाजिक सोच में बदलाव भी ज़रूरी है।

Q11

निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए –
(क) अपने देस की सूखी रोटी भी परदेस के पकवानों से अच्छी होती है।
(ख) इत्ते ढेर से नोट लगे हैं घर बणाने में। गाँठ में नहीं है पैसा, चले हाथी खरीदने।
(ग) उसे एक घर चाहिए था – पक्की ईंटों का, जहाँ वह अपनी गृहस्थी और परिवार के सपने देखती थी।

Answer

उत्तर

(क) मानो सुकिया से बार-बार कहती थी कि अपने गाँव-देस में रूखी-सूखी रोटी खाकर रहना भी पराए स्थान के अच्छे पकवानों से बेहतर है। इसमें अपनी मिट्टी, घर और अपनों के प्रति लगाव तथा परदेस की असुरक्षा, अकेलेपन और कष्टमय जीवन से उपजी पीड़ा व्यक्त होती है। अपने घर में जो अपनापन, सुरक्षा और आत्मसम्मान है, वह कहीं और नहीं।

(ख) जब मानो ने पक्की ईंटों का घर बनाने की इच्छा जताई, तो सुकिया ने दुखी मन से कहा कि घर बनाने में बहुत पैसा लगता है – ईंटें, लोहा, सीमेंट, लकड़ी, रेत। हमारे पास पैसा है नहीं और सपना इतना बड़ा देख रही हो, जैसे जेब में पैसा न हो और हाथी ख़रीदने चल पड़े हों। यह लोकोक्ति उनकी आर्थिक विवशता और गरीब के लिए पक्का घर कितना दूर का सपना है – इसे दर्शाती है।

(ग) सूबेसिंह की बुरी नीयत और जसदेव की पिटाई के बाद मानो डर गई थी, पर वह किसनी की तरह झुकना नहीं चाहती थी। उसके भीतर इज़्ज़त की ज़िंदगी जीने की प्रबल लालसा थी। पक्की ईंटों का घर उसके लिए केवल मकान नहीं, बल्कि सुरक्षा, स्थायित्व, सम्मान और सुखी गृहस्थी का प्रतीक था, जहाँ वह अपने परिवार और भविष्य के सपने पूरे कर सके।

(क) अपने घर-गाँव का अपनापन, सुरक्षा और सम्मान परदेस के सुखों से बढ़कर है – मानो का अपनी मिट्टी से लगाव। (ख) घर बनाने में बहुत पैसा लगता है; पैसे के बिना बड़ा सपना देखना ‘गाँठ में पैसा नहीं, हाथी ख़रीदने चले’ जैसा है – आर्थिक विवशता। (ग) पक्का घर मानो के लिए सुरक्षा, सम्मान, स्थायित्व और सुखी गृहस्थी का प्रतीक था – इज़्ज़त की ज़िंदगी की लालसा।

योग्यता-विस्तार

Q12

अपने आसपास के क्षेत्र में जाकर ईंटों के भट्ठे को देखिए तथा ईंटें बनाने एवं उन्हें पकाने की प्रक्रिया का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

Answer

उत्तर

ईंट बनाने और पकाने की प्रक्रिया

  1. मिट्टी तैयार करना: उपयुक्त चिकनी (दोमट) मिट्टी खोदी जाती है; उसमें से कंकड़-पत्थर निकालकर पानी मिलाया जाता है और पैरों या मशीन से गूँधकर गारा (तगारी) बनाया जाता है।
  2. पाथना (ढलाई): लकड़ी या लोहे के साँचे में रेत छिड़ककर गीली मिट्टी भरी जाती है, ऊपर से समतल करके साँचे को ज़मीन पर उलटकर कच्ची ईंट निकाली जाती है।
  3. सुखाना: कच्ची ईंटों को धूप में कुछ दिन सुखाया जाता है; फिर उन्हें जालीदार दीवार की शक्ल में (दो खड़ी, दो आड़ी) लगाकर हवा में पूरी तरह सुखाया जाता है।
  4. भट्ठे में लगाना: सूखी ईंटों को भट्ठे के गलियारे में झरोखेदार तरीके से जमाया जाता है; बीच की खाली जगहों में पत्थर का कोयला, लकड़ी, बुरादा, गन्ने की खोई भरी जाती है।
  5. पकाना: भट्ठे में आग लगाई जाती है; मज़दूर चौबीसों घंटे ऊपर की मोरियों से ईंधन डालते रहते हैं। ईंटें कई दिनों तक लगभग 900–1000°C पर पकती हैं; चिमनी से धुआँ निकलता रहता है।
  6. ठंडा करना और निकालना: पकने के बाद भट्ठे को ठंडा होने दिया जाता है; फिर लाल पक्की ईंटें निकालकर उनकी गुणवत्ता के अनुसार छँटाई (अव्वल, दोयम) की जाती है।

(भट्ठे पर काम कठिन और जोखिम भरा होता है – विशेषकर मोरी पर ईंधन डालना; धूल-धुआँ स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाते हैं।)

मिट्टी खोदकर गूँधना → साँचे में पाथना → धूप-हवा में सुखाना → भट्ठे के गलियारे में ईंधन के साथ जमाना → कई दिनों तक मोरियों से ईंधन डालकर पकाना → ठंडा करके पक्की ईंटें निकालना और छाँटना।

Q13

भट्ठा-मज़दूरों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।

Answer

उत्तर

रिपोर्ट: भट्ठा-मज़दूरों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति

परिचय: भारत में लाखों मज़दूर ईंट-भट्ठों पर काम करते हैं। इनमें अधिकतर गरीब, भूमिहीन, दलित और आदिवासी परिवार हैं, जो मौसमी पलायन करके दूसरे राज्यों तक जाते हैं।

आर्थिक स्थिति

  1. टुकड़े (पीस-रेट) पर मज़दूरी – प्रति हज़ार ईंट के हिसाब से; प्रायः न्यूनतम मज़दूरी से कम।
  2. अग्रिम (पेशगी) और कर्ज़ का जाल – ठेकेदार पहले पैसा देकर पूरे सीज़न बाँध लेते हैं; कई बार यह बंधुआ मज़दूरी का रूप ले लेता है।
  3. मज़दूरी का भुगतान अनियमित; टूटी-ख़राब ईंटों के पैसे काट लिए जाते हैं।
  4. कोई बचत, बीमा, पेंशन या सामाजिक सुरक्षा नहीं।

सामाजिक स्थिति

  1. आवास: कच्ची ईंटों की छोटी, अस्थायी झोंपड़ियाँ; बिजली, शौचालय, साफ़ पानी का अभाव।
  2. स्वास्थ्य: धूल-धुआँ, गर्मी और भारी श्रम से साँस, त्वचा और हड्डियों के रोग; चिकित्सा सुविधा नहीं।
  3. शिक्षा: बार-बार पलायन से बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है; बाल श्रम आम है।
  4. स्त्रियों की स्थिति: समान काम पर कम मज़दूरी, यौन शोषण का ख़तरा, दोहरा बोझ (भट्ठा + घर)।
  5. जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार; नशाखोरी।

सुझाव: न्यूनतम मज़दूरी और समय पर भुगतान; बंधुआ मज़दूरी उन्मूलन कानून का कड़ाई से पालन; ई-श्रम/निर्माण श्रमिक बोर्ड में पंजीकरण और सामाजिक सुरक्षा; भट्ठों पर मोबाइल स्कूल, स्वास्थ्य-शिविर और आँगनबाड़ी; स्वच्छ आवास और शौचालय; मज़दूरों के संगठन और जागरूकता।

भट्ठा-मज़दूर अधिकतर गरीब, दलित-आदिवासी प्रवासी हैं; वे कम पीस-रेट मज़दूरी, पेशगी-कर्ज़ और बंधुआ मज़दूरी, अस्थायी झोंपड़ियों, बीमारियों, बच्चों की छूटती पढ़ाई, स्त्रियों के शोषण और जाति-भेद से ग्रस्त हैं; न्यूनतम मज़दूरी, कानूनों का पालन, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाएँ और संगठन आवश्यक हैं।

Q14

जाति प्रथा पर एक निबंध लिखिए।

Answer

उत्तर

जाति प्रथा: सामाजिक एकता की सबसे बड़ी बाधा

भूमिका: भारतीय समाज की सबसे पुरानी और जटिल संरचनाओं में से एक है जाति प्रथा। प्राचीन काल में कर्म के आधार पर बनी वर्ण-व्यवस्था धीरे-धीरे जन्म पर आधारित कठोर जाति-व्यवस्था में बदल गई, जिसने समाज को ऊँच-नीच के अनेक खानों में बाँट दिया।

उत्पत्ति और स्वरूप: आरंभ में समाज को चार वर्णों – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – में कार्य के आधार पर बाँटा गया था। कालांतर में यह विभाजन जन्म से जुड़ गया और हज़ारों जातियाँ-उपजातियाँ बन गईं। व्यक्ति का पेशा, विवाह, खान-पान और सामाजिक स्थिति उसकी जाति से तय होने लगी।

दुष्परिणाम

  1. छुआछूत और अपमान: कुछ जातियों को ‘अछूत’ मानकर मंदिरों, कुओं, विद्यालयों से वंचित रखा गया।
  2. शोषण: तथाकथित निम्न जातियों को शिक्षा, संपत्ति और सम्मान से दूर रखकर उनका आर्थिक-सामाजिक शोषण हुआ।
  3. सामाजिक विघटन: समाज अनेक टुकड़ों में बँटा रहा; राष्ट्रीय एकता कमज़ोर हुई।
  4. प्रतिभा का दमन: योग्यता के बजाय जन्म को महत्त्व मिलने से अनेक प्रतिभाएँ दबी रह गईं।
  5. हिंसा और भेदभाव: अंतर्जातीय विवाह पर हिंसा, ‘ऑनर किलिंग’, राजनीति में जातिवाद।

सुधार के प्रयास: कबीर, रैदास, गुरु नानक जैसे संतों ने जाति-भेद का विरोध किया। ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, स्वामी दयानंद, नारायण गुरु, महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति-उन्मूलन के लिए संघर्ष किया। भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 14–17 में समानता का अधिकार दिया और अस्पृश्यता को समाप्त कर दंडनीय अपराध घोषित किया; आरक्षण और अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम जैसे प्रावधान किए गए।

वर्तमान स्थिति: शिक्षा, शहरीकरण और कानूनों से जाति-भेद कम हुआ है, पर पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। गाँवों में आज भी भेदभाव, अंतर्जातीय विवाहों का विरोध और जातिगत हिंसा की घटनाएँ होती हैं – जैसा ‘खानाबदोश’ कहानी में जसदेव के व्यवहार से झलकता है।

उपाय: सबके लिए समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा; अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन; कानूनों का कड़ाई से पालन; राजनीति में जातिवाद का विरोध; और सबसे बढ़कर अपने व्यवहार में हर मनुष्य को बराबर समझना।

उपसंहार: मनुष्य की पहचान उसके गुणों और कर्मों से होनी चाहिए, जन्म से नहीं। जब तक जाति की दीवारें नहीं टूटेंगी, तब तक सच्चा लोकतंत्र और सशक्त राष्ट्र नहीं बन सकता। आइए, हम एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहाँ हर व्यक्ति सम्मान और समानता के साथ जी सके।

‘जाति प्रथा: सामाजिक एकता की सबसे बड़ी बाधा’ शीर्षक निबंध ऊपर दिया गया है – भूमिका, उत्पत्ति, दुष्परिणाम, सुधार-प्रयास (संत, फुले, आंबेडकर, संविधान), वर्तमान स्थिति, उपाय और उपसंहार सहित।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ भट्ठे का जीवन और मानो का सपना (प्रश्न 2, 6, 11, 12)
  • ☒ सूबेसिंह का अत्याचार और जसदेव (प्रश्न 1, 3, 4, 5)
  • ☒ मूल संवेदना और सामाजिक समस्याएँ (प्रश्न 7, 8, 9, 10)
  • ☒ भट्ठा-मज़दूर और जाति प्रथा (प्रश्न 13, 14)

Total questions answered: 14 of 14

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 11 Hindi Antra Chapter 6 (खानाबदोश) cover?

All 14 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

Yes. The answers follow the current NCERT textbook for Class 11 Hindi Antra and the latest CBSE syllabus, so the question numbers and wording match the book you use in class.

How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

Are the NCERT solutions for Class 11 Hindi Antra Chapter 6 (खानाबदोश) free?

Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.