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Class 11 Hindi Antra Chapter 3

NCERT Solutions for Class 11 Hindi Antra Chapter 3: टार्च बेचनेवाले

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XI

Hindi

Antra (NCERT)

3 – टार्च बेचनेवाले

2026-27

13 of 13

बिंदु

विवरण

लेखक

हरिशंकर परसाई (1924–1995), हिंदी के प्रमुख व्यंग्यकार

विधा

व्यंग्य

कथा

‘पैसा कैसे पैदा करें?’ – इस सवाल से हताश दो बेरोज़गार दोस्त अलग-अलग किस्मत आज़माने निकलते हैं; पहला अँधेरे का डर दिखाकर ‘सूरज छाप’ टार्च बेचता है; पाँच साल बाद दूसरा दोस्त भव्य संत बनकर ‘अंतर के अंधकार’ का डर दिखाकर प्रवचन देता और ‘साधना मंदिर’ चलाता मिलता है; पहला दोस्त टार्च की पेटी नदी में फेंककर ‘कंपनी बदल’ लेता है

व्यंग्य का लक्ष्य

धर्म और आध्यात्मिकता के नाम पर पाखंडी गुरुओं का व्यापार; लोगों के डर और अंधविश्वास का शोषण

शिल्प

सरल, चुटीली, धारदार भाषा; प्रतीक (टार्च, अँधेरा, सूरज छाप); संवाद शैली

Q1

लेखक ने टार्च बेचनेवाली कंपनी का नाम ‘सूरज छाप’ ही क्यों रखा?

Answer

उत्तर

  1. सूरज प्रकाश का सबसे बड़ा स्रोत है; उसके सामने अँधेरा टिक नहीं सकता। ‘सूरज छाप’ नाम से टार्च की शक्ति और विश्वसनीयता का भाव पैदा होता है – मानो यह टार्च सूरज जैसा प्रकाश देकर हर अंधकार दूर कर देगी।
  2. यह नाम आकर्षक और प्रभावशाली है; ग्राहक सहज ही इससे प्रभावित हो जाते हैं – यह विज्ञापन की चतुराई है।
  3. इसमें व्यंग्य भी है – छोटी-सी टार्च की तुलना सूरज से करना अतिशयोक्ति है; जैसे पाखंडी लोग अपने छोटे-से ‘उत्पाद’ (प्रवचन) को परम प्रकाश बताकर बेचते हैं।
  4. आगे चलकर यह प्रतीक बन जाता है – बाहरी ‘सूरज छाप’ प्रकाश और भीतरी ‘आत्मा के प्रकाश’ के धंधे की तुलना।

सूरज प्रकाश का सबसे बड़ा स्रोत है, इसलिए ‘सूरज छाप’ नाम से टार्च की शक्ति, विश्वसनीयता और आकर्षण का भाव पैदा होता है; साथ ही इसमें छोटी चीज़ को बड़ा बताकर बेचने की विज्ञापनी चालाकी पर व्यंग्य भी है।

Q2

पाँच साल बाद दोनों दोस्तों की मुलाकात किन परिस्थितियों में और कहाँ होती है?

Answer

उत्तर

वादे के अनुसार पाँच साल बाद टार्च बेचने वाला दोस्त तय जगह पर पहुँचा और दिन भर इंतज़ार किया, पर दूसरा दोस्त नहीं आया। तब वह उसे ढूँढ़ने निकल पड़ा।

एक शाम एक शहर की सड़क से गुज़रते हुए उसने पास के मैदान में खूब रोशनी, सजा हुआ मंच, लाउडस्पीकर और श्रद्धा से झुके हज़ारों नर-नारी देखे। मंच पर रेशमी वस्त्रों में सजे, लंबी सँवारी दाढ़ी और लहराते केशों वाले एक भव्य पुरुष प्रवचन दे रहे थे – मनुष्य की आत्मा के अंधकार और अंतर की ज्योति जगाने का। उनकी बातें सुनकर उसे हँसी आ गई और लोगों ने उसे धक्का देकर भगा दिया। प्रवचन के बाद जब भव्य पुरुष कार में चढ़ रहे थे, तब उसने पास से देखा – वही उसका पुराना दोस्त था। दोस्त ने भी उसे पहचान लिया और हाथ पकड़कर कार में बिठाकर अपने बँगले पर ले गया, जहाँ दोनों ने खुलकर बात की।

तय जगह पर दोस्त न आने पर टार्च-विक्रेता उसे ढूँढ़ने निकला; एक शहर के मैदान में सजे मंच पर उसने भव्य संत के रूप में प्रवचन देते अपने दोस्त को देखा; प्रवचन के बाद कार के पास दोनों ने एक-दूसरे को पहचाना और दोस्त उसे अपने बँगले पर ले गया।

Q3

पहला दोस्त मंच पर किस रूप में था और वह किस अँधेरे को दूर करने के लिए टार्च बेच रहा था?

Answer

उत्तर

(यहाँ ‘पहला दोस्त’ से अभिप्राय उस दोस्त से है जो मंच पर था।)

रूप: वह एक भव्य संत/साधु/दार्शनिक के रूप में था – सुंदर रेशमी वस्त्र, हृष्ट-पुष्ट शरीर, सँवारी हुई लंबी दाढ़ी, पीठ पर लहराते लंबे केश, फ़िल्मी संत जैसा रूप और गुरु-गंभीर, रहस्यमय वाणी। उसके पास कार, बँगला, ड्राइवर और हज़ारों श्रद्धालु थे।

अँधेरा: वह आत्मा के भीतरी अँधेरे को दूर करने के नाम पर ‘टार्च’ बेच रहा था – वह कहता था कि मनुष्य के भीतर कुछ बुझ गया है, आत्मा में अंधकार है, अंतर की आँखें ज्योतिहीन हैं, मनुष्य भय और पीड़ा से त्रस्त है। इस अँधेरे को दूर करने के लिए वह लोगों को अपने ‘साधना मंदिर’ में आकर अंतर की ज्योति जगाने का आह्वान करता था। यानी वह आध्यात्मिकता के नाम पर लोगों के मन का डर भुनाकर धन कमा रहा था।

वह रेशमी वस्त्रों, लंबी दाढ़ी-केशों वाले भव्य संत के रूप में था और आत्मा/अंतर के अँधेरे (भय, पीड़ा, ज्योतिहीनता) को दूर करने के नाम पर लोगों को अपने ‘साधना मंदिर’ में बुलाकर आध्यात्मिक ‘टार्च’ बेच रहा था।

Q4

भव्य पुरुष ने कहा – ‘जहाँ अंधकार है वहीं प्रकाश है’। इसका क्या तात्पर्य है?

Answer

उत्तर

शाब्दिक/दार्शनिक तात्पर्य: अंधकार और प्रकाश एक-दूसरे के साथ हैं; जहाँ निराशा और दुख है, वहीं आशा और समाधान की संभावना भी है। अंधकार में भी प्रकाश की किरण छिपी रहती है – मनुष्य को डरने के बजाय अपने भीतर के प्रकाश (आत्मबल, विवेक) को जगाना चाहिए।

व्यंग्यार्थ (पाठ के संदर्भ में): भव्य पुरुष पहले लोगों को अंधकार का डर दिखाता है, फिर कहता है कि प्रकाश भी है – और वह प्रकाश उसके ‘साधना मंदिर’ में मिलेगा। यानी जहाँ लोगों के मन में डर और अंधकार है, वहीं उसके धंधे का ‘प्रकाश’ (कमाई का अवसर) है। यह ठीक वैसा ही है जैसे टार्च-विक्रेता कहता था – “अँधेरा है, मगर प्रकाश भी है, वही प्रकाश मैं आपको देने आया हूँ।”

दार्शनिक अर्थ में – अंधकार (दुख-निराशा) के साथ ही प्रकाश (आशा, आत्मबल) भी है; पर व्यंग्य यह है कि भव्य पुरुष पहले डर दिखाकर फिर स्वयं को प्रकाश का स्रोत बताता है – जहाँ लोगों का अँधेरा है, वहीं उसके धंधे का ‘प्रकाश’ है।

Q5

भीतर के अँधेरे की टार्च बेचने और ‘सूरज छाप’ टार्च बेचने के धंधे में क्या फ़र्क है? पाठ के आधार पर बताइए।

Answer

उत्तर

‘सूरज छाप’ टार्च का धंधा

भीतर के अँधेरे की टार्च का धंधा

बाहरी, भौतिक अँधेरे (रात, साँप, शेर, काँटे) का डर दिखाया जाता है

आत्मा के भीतरी, सूक्ष्म अँधेरे (भय, पीड़ा, ज्योतिहीनता) का डर दिखाया जाता है

टार्च एक ठोस, दिखने वाली वस्तु है, जो सचमुच प्रकाश देती है

‘टार्च’ सूक्ष्म, अदृश्य है – उसकी कोई दुकान नहीं, फिर भी कीमत बहुत मिलती है

बात सीधे ढंग से कही जाती है – चौराहे पर नाटकीय भाषण

बात रहस्यमय, दार्शनिक, गुरु-गंभीर ढंग से कही जाती है – मंच, लाउडस्पीकर, प्रवचन

साधारण कमाई – ‘मज़े में ज़िंदगी’

अपार दौलत – बँगला, कार, ड्राइवर, हज़ारों अनुयायी

कंपनी नई (‘सूरज छाप’)

कंपनी ‘सनातन’ (धर्म-आध्यात्म के नाम पर पुरानी परंपरा)

ग्राहक को कुछ उपयोगी वस्तु मिलती है

ग्राहक को केवल भ्रम और अंधश्रद्धा मिलती है

समानता: दोनों ही धंधे लोगों को अँधेरे का डर दिखाकर अपना माल बेचते हैं – इसीलिए लेखक कहता है, “तुम कुछ भी कहलाओ, बेचते तुम टार्च हो।”

सूरज छाप टार्च बाहरी अँधेरे का डर दिखाकर सीधे ढंग से बेची जाने वाली ठोस, उपयोगी वस्तु है, जिससे साधारण कमाई होती है; भीतर के अँधेरे की ‘टार्च’ सूक्ष्म, अदृश्य है, जिसे रहस्यमय प्रवचनों से धर्म के नाम पर बेचा जाता है और उससे अपार दौलत मिलती है – दोनों में समानता यह है कि दोनों डर का व्यापार करते हैं।

Q6

‘सवाल के पाँव ज़मीन में गहरे गड़े हैं। यह उखड़ेगा नहीं।’ इस कथन में मनुष्य की किस प्रवृत्ति की ओर संकेत है और क्यों?

Answer

उत्तर

दोनों बेरोज़गार दोस्तों के सामने आसमान छूता सवाल था – ‘पैसा कैसे पैदा करें?’ उन्होंने उसकी टाँगें पकड़कर उसे हटाने की कोशिश की, पर वह हिला नहीं। तब दोस्त ने कहा कि इसके पाँव ज़मीन में गहरे गड़े हैं, यह उखड़ेगा नहीं, इसे टाल जाएँ।

संकेतित प्रवृत्तियाँ

  1. समस्या से भागने/टालने की प्रवृत्ति: मनुष्य कठिन समस्या का सामना करने के बजाय उसे टालना चाहता है – “इसे टाल जाएँ।” पर समस्या टलती नहीं, बार-बार सामने आ खड़ी होती है।
  2. धन की समस्या की स्थायित्व: पैसा कमाने की समस्या मानव-जीवन में गहराई से जमी हुई है; यह आसानी से हल नहीं होती।
  3. आसान रास्ते की तलाश: इसी प्रवृत्ति के कारण आगे दोनों दोस्त मेहनत के बजाय लोगों के डर का फ़ायदा उठाकर पैसा कमाने का आसान (अनैतिक) रास्ता अपनाते हैं।

इसमें मनुष्य की कठिन समस्या (पैसा कैसे कमाएँ) से भागने या उसे टालने की प्रवृत्ति और धन की समस्या की गहरी जड़ों की ओर संकेत है; यही प्रवृत्ति आगे आसान, अनैतिक रास्ते (डर का व्यापार) अपनाने तक ले जाती है।

Q7

‘व्यंग्य विधा में भाषा सबसे धारदार है।’ परसाई जी की इस रचना को आधार बनाकर इस कथन के पक्ष में अपने विचार प्रकट कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. सरल पर चुभने वाले वाक्य: “आदमी को डराना कितना आसान है!”, “तुम कुछ भी कहलाओ, बेचते तुम टार्च हो।”, “धंधा वही करूँगा… बस कंपनी बदल रहा हूँ।” – छोटे वाक्य गहरी चोट करते हैं।
  2. प्रतीक और रूपक: ‘टार्च’, ‘अँधेरा’, ‘सूरज छाप’, ‘सनातन कंपनी’, ‘सवाल के पाँव’ – इनके माध्यम से धर्म के व्यापार पर व्यंग्य बिना सीधे नाम लिए किया गया है।
  3. विरोधाभास और विडंबना: भर-दोपहर में अँधेरे से डराना; ‘साधु-संत’ का कार, बँगले और ड्राइवर वाला ठाठ।
  4. बोलचाल और हास्य: “साले, फिलासफ़ी मत बघार” – सहज, अनौपचारिक भाषा पाखंड की पोल खोल देती है।
  5. पैरोडी: भव्य पुरुष की गुरु-गंभीर, रहस्यमय भाषा (‘सर्वग्राही अंधकार’, ‘शाश्वत ज्योति’) की नकल करके उसका खोखलापन दिखाया गया है।

इस प्रकार परसाई की भाषा हँसाते-हँसाते समाज की बुराइयों पर तीखा प्रहार करती है – यही व्यंग्य की धार है।

परसाई की भाषा सरल पर चुभने वाले वाक्यों, टार्च-अँधेरे जैसे प्रतीकों, विरोधाभास, बोलचाल के हास्य और प्रवचन-शैली की पैरोडी से पाखंडी धर्म-व्यापार पर हँसाते-हँसाते तीखा प्रहार करती है – यही व्यंग्य की धार है।

Q8

आशय स्पष्ट कीजिए –
(क) क्या पैसा कमाने के लिए मनुष्य कुछ भी कर सकता है?
(ख) प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो। अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ।
(ग) धंधा वही करूँगा, यानी टार्च बेचूँगा। बस कंपनी बदल रहा हूँ।

Answer

उत्तर

(क) यह प्रश्न पूरी रचना का केंद्रीय विचार है। कहानी दिखाती है कि पैसा कमाने की लालसा में मनुष्य नैतिकता भूल जाता है – लोगों को झूठा डर दिखाता है, धर्म और आध्यात्मिकता तक को व्यापार बना देता है, साधु का वेश धरकर भोले लोगों को ठगता है। लेखक व्यंग्यपूर्वक यह सोचने पर विवश करता है कि क्या धन के लिए सब कुछ उचित है? उत्तर है – नहीं; पैसा ईमानदारी और मेहनत से कमाना चाहिए।

(ख) यह भव्य पुरुष के प्रवचन का अंश है। दार्शनिक रूप से इसका अर्थ है – सच्चा सुख और ज्ञान बाहरी वस्तुओं में नहीं, अपने भीतर (आत्मा में) है; अपने भीतर के विवेक, आत्मबल और अच्छाई को जगाओ। पर व्यंग्य यह है कि भव्य पुरुष इसी बात को आधार बनाकर लोगों को अपने ‘साधना मंदिर’ में बुलाता है और उनसे धन कमाता है – भीतर की ज्योति जगाने का दावा भी उसका ‘उत्पाद’ है।

(ग) यह टार्च बेचने वाले का अंतिम कथन है। दोस्त का वैभव देखकर और उसकी ‘सूक्ष्म टार्च’ का रहस्य समझकर उसने ‘सूरज छाप’ टार्च की पेटी नदी में फेंक दी और दाढ़ी बढ़ाने लगा। अब वह भी अँधेरे का डर दिखाकर ही कमाएगा (धंधा वही), पर भौतिक टार्च की जगह आत्मा के अँधेरे वाली आध्यात्मिक ‘टार्च’ बेचेगा – यानी संत/गुरु बनेगा (कंपनी बदल रहा हूँ)। यह धर्म के नाम पर बढ़ते पाखंड पर तीखा व्यंग्य है।

(क) धन की लालसा में मनुष्य झूठ, भय और धर्म तक का व्यापार कर बैठता है – लेखक इस अनैतिकता पर प्रश्न उठाता है। (ख) दार्शनिक अर्थ – सच्चा प्रकाश भीतर है; व्यंग्यार्थ – भव्य पुरुष इसी बात से लोगों को ‘साधना मंदिर’ में बुलाकर कमाता है। (ग) टार्च-विक्रेता अब भी डर का धंधा करेगा, पर भौतिक टार्च छोड़कर आध्यात्मिक ‘टार्च’ बेचने वाला गुरु बनेगा।

Q9

लेखक ने ‘सूरज छाप’ टार्च की पेटी को नदी में क्यों फेंक दिया? क्या आप भी वही करते?

Answer

उत्तर

क्यों फेंका: (कथा में यह काम टार्च बेचने वाले ने किया, जिसकी आपबीती लेखक सुनाता है।) दोस्त के बँगले पर दो दिन रहकर उसने समझ लिया कि भौतिक टार्च बेचने में साधारण कमाई है, जबकि आत्मा के अँधेरे की ‘सूक्ष्म टार्च’ बेचने में – बिना किसी दुकान या माल के – अपार धन, बँगला, कार और सम्मान मिलता है। इसलिए उसने ‘सूरज छाप’ टार्च की पेटी नदी में फेंक दी और दोस्त की तरह साधु बनकर आध्यात्मिक प्रवचन का ‘धंधा’ शुरू करने के लिए दाढ़ी बढ़ाने लगा।

क्या मैं भी वही करता? नहीं। ‘सूरज छाप’ टार्च का धंधा कम से कम लोगों को एक उपयोगी वस्तु तो देता था। धर्म और आध्यात्मिकता के नाम पर लोगों की आस्था और डर का फ़ायदा उठाकर उन्हें ठगना अनैतिक और समाज के लिए हानिकारक है। मैं ईमानदारी से मेहनत करके कमाना पसंद करता, भले कमाई कम हो – क्योंकि सम्मान और आत्म-संतोष धन से बड़े हैं। (हाँ, यदि टार्च बेचने में भी झूठा डर दिखाया जा रहा हो, तो मैं विज्ञापन का ईमानदार तरीका अपनाता।)

दोस्त के वैभव से उसने समझ लिया कि आध्यात्मिक ‘सूक्ष्म टार्च’ (प्रवचन) बेचने में कहीं अधिक धन है, इसलिए उसने पेटी फेंककर गुरु बनने की राह पकड़ी; मैं ऐसा नहीं करता, क्योंकि आस्था और डर का शोषण अनैतिक है – ईमानदार मेहनत की कम कमाई भी बेहतर है।

Q10

टार्च बेचने वाले किस प्रकार की स्किल का प्रयोग करते हैं? क्या इसका ‘स्किल इंडिया’ प्रोग्राम से कोई संबंध है?

Answer

उत्तर

टार्च बेचने वालों की स्किल

  1. संचार और भाषण-कला: भीड़ इकट्ठा करना, नाटकीय और प्रभावशाली ढंग से बोलना।
  2. मनोविज्ञान की समझ: लोगों के डर और ज़रूरत को पहचानकर उन्हें भुनाना।
  3. विपणन (मार्केटिंग) और विज्ञापन: उत्पाद को आकर्षक नाम (‘सूरज छाप’) देना, समस्या दिखाकर समाधान बेचना।
  4. प्रस्तुति-कला: भव्य पुरुष का वेश-भूषा, मंच-सज्जा, लाउडस्पीकर और रहस्यमय वाणी।

‘स्किल इंडिया’ से संबंध: ‘स्किल इंडिया’ (कौशल भारत मिशन, 2015) का उद्देश्य युवाओं को रोज़गारपरक कौशल – जैसे संचार, बिक्री, विपणन, तकनीकी और उद्यमिता – सिखाकर आत्मनिर्भर बनाना है। टार्च बेचने वालों की संचार और विपणन स्किल इस अर्थ में जुड़ती है कि ये कौशल बिक्री और व्यवसाय के लिए उपयोगी हैं।

पर अंतर महत्त्वपूर्ण है: स्किल इंडिया ईमानदार, नैतिक और उत्पादक कौशल-विकास पर बल देता है, जिससे समाज और अर्थव्यवस्था को लाभ हो। पाठ के पात्र इन कौशलों का प्रयोग डर फैलाने और ठगने के लिए करते हैं, जो कौशल का दुरुपयोग है। अतः कौशल के साथ नैतिकता भी आवश्यक है।

वे संचार-भाषण कला, जन-मनोविज्ञान की समझ, मार्केटिंग-विज्ञापन और प्रस्तुति-कला का प्रयोग करते हैं; ये स्किल इंडिया में सिखाए जाने वाले बिक्री व संचार कौशल से मेल खाती हैं, पर स्किल इंडिया इनका नैतिक, उत्पादक उपयोग सिखाता है, जबकि पात्र इनका दुरुपयोग डर फैलाकर ठगने में करते हैं।

योग्यता-विस्तार

Q11

‘पैसा कमाने की लिप्सा ने आध्यात्मिकता को भी एक व्यापार बना दिया है।’ इस विषय पर कक्षा में परिचर्चा कीजिए।

Answer

उत्तर

पक्ष में तर्क

  1. कई तथाकथित बाबा और गुरु बड़े-बड़े आश्रम, महँगी गाड़ियाँ और अकूत संपत्ति के मालिक हैं; प्रवचन, दीक्षा, ताबीज़, अनुष्ठान – सबकी ‘कीमत’ तय है।
  2. लोगों के दुख, बीमारी, बेरोज़गारी और डर का फ़ायदा उठाकर चमत्कार और समाधान का झूठा वादा किया जाता है।
  3. टीवी चैनलों, विज्ञापनों और सोशल मीडिया पर आध्यात्मिकता का बाज़ार चल रहा है।
  4. कई पाखंडी गुरुओं के अपराध और धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं।

विपक्ष/संतुलन

  1. सभी आध्यात्मिक गुरु ऐसे नहीं हैं; अनेक संत और संस्थाएँ निस्वार्थ भाव से शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज-सेवा कर रही हैं (जैसे रामकृष्ण मिशन)।
  2. योग, ध्यान और सच्ची आध्यात्मिकता मानसिक शांति देते हैं।

निष्कर्ष: समस्या आध्यात्मिकता नहीं, उसका व्यापारीकरण और अंधश्रद्धा है। हमें विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर सच्ची और पाखंडी आध्यात्मिकता में अंतर करना चाहिए – जैसा परसाई ने व्यंग्य से समझाया।

परिचर्चा का निष्कर्ष: कई तथाकथित गुरु लोगों के डर-दुख का फ़ायदा उठाकर आध्यात्मिकता को धन कमाने का व्यापार बना चुके हैं, हालाँकि सच्चे संत और निस्वार्थ संस्थाएँ भी हैं; हमें विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पाखंड को पहचानना चाहिए।

Q12

समाज में फैले अंधविश्वासों का उल्लेख करते हुए एक लेख लिखिए।

Answer

उत्तर

अंधविश्वास: प्रगति की राह का रोड़ा

इक्कीसवीं सदी में, जब मनुष्य चाँद और मंगल तक पहुँच गया है, तब भी हमारे समाज में अंधविश्वास गहराई तक जमे हुए हैं। अंधविश्वास का अर्थ है – बिना तर्क और प्रमाण के किसी बात पर आँख मूँदकर विश्वास करना।

प्रचलित अंधविश्वास: बिल्ली के रास्ता काटने पर रुक जाना; छींक आने पर काम टालना; नज़र उतारने के लिए नींबू-मिर्च लटकाना; मंगलवार-शनिवार को बाल न कटवाना; बीमारी में डॉक्टर के बजाय झाड़-फूँक करवाना; ग्रहण में भोजन न करना; डायन या भूत-प्रेत का भय; संतान के लिए तांत्रिकों के चक्कर; शुभ-अशुभ मुहूर्त के नाम पर ज़रूरी काम रोकना।

दुष्परिणाम: अंधविश्वास के कारण लोग समय पर इलाज नहीं करवाते और जान गँवा बैठते हैं; पाखंडी तांत्रिक और बाबा भोले लोगों से धन ठगते हैं; कई बार ‘डायन’ बताकर निर्दोष स्त्रियों पर अत्याचार होते हैं, यहाँ तक कि नरबलि जैसी घटनाएँ भी सामने आती हैं; समाज में भय और रूढ़िवादिता बढ़ती है।

कारण: अशिक्षा, वैज्ञानिक सोच का अभाव, परंपराओं का अंधानुकरण, डर और असुरक्षा, तथा पाखंडियों का प्रचार।

उपाय: शिक्षा का प्रसार; विद्यालयों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास (संविधान का अनुच्छेद 51-क भी यही कहता है); मीडिया द्वारा जागरूकता; अंधविश्वास-विरोधी कानूनों का पालन (जैसे महाराष्ट्र का जादू-टोना विरोधी कानून); हर बात पर ‘क्यों’ पूछने की आदत।

निष्कर्ष: अंधविश्वास मनुष्य के विवेक पर पर्दा डाल देते हैं। सच्ची आस्था विवेक के साथ चलती है। आइए, हम तर्क और विज्ञान की रोशनी में अंधविश्वास के अँधेरे को दूर करें।

‘अंधविश्वास: प्रगति की राह का रोड़ा’ शीर्षक लेख ऊपर दिया गया है – इसमें प्रचलित अंधविश्वास, उनके दुष्परिणाम, कारण और उपाय (शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, कानून, जागरूकता) बताए गए हैं।

Q13

एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा हरिशंकर परसाई पर बनाई गई फ़िल्म देखिए।

Answer

उत्तर

(यह गतिविधि है; फ़िल्म NCERT/CIET के यूट्यूब चैनल, ई-पाठशाला और दीक्षा पर उपलब्ध है।)

फ़िल्म देखकर नोट करने योग्य बिंदु

  1. जीवन: हरिशंकर परसाई का जन्म 1924 में जमानी (होशंगाबाद, मध्य प्रदेश) में हुआ; 1995 में जबलपुर में निधन। उन्होंने कुछ समय अध्यापन किया, फिर स्वतंत्र लेखन किया और ‘वसुधा’ पत्रिका निकाली।
  2. रचनाएँ: हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे (कहानी-संग्रह); रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज (उपन्यास); तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, पगडंडियों का ज़माना, सदाचार का तावीज़, शिकायत मुझे भी है, और अंत में (निबंध-संग्रह); विकलांग श्रद्धा का दौर।
  3. सम्मान: ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार।
  4. विशेषताएँ: व्यंग्य को हिंदी में स्वतंत्र और प्रतिष्ठित विधा बनाया; राजनीति, धर्म, शिक्षा, भ्रष्टाचार और पाखंड पर तीखा प्रहार; सरल, चुटीली, धारदार भाषा।

फ़िल्म देखने के बाद ‘टार्च बेचनेवाले’ और परसाई की अन्य रचनाओं पर कक्षा में चर्चा करें।

NCERT/CIET की फ़िल्म (यूट्यूब, ई-पाठशाला, दीक्षा) देखकर परसाई के जीवन, प्रमुख रचनाओं (विकलांग श्रद्धा का दौर, सदाचार का तावीज़), साहित्य अकादमी सम्मान और उनकी व्यंग्य-दृष्टि पर नोट्स बनाएँ और कक्षा में चर्चा करें।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ कथा: दोस्त, सवाल और मुलाकात (प्रश्न 1, 2, 3, 6)
  • ☒ दोनों धंधों का अंतर और व्यंग्य (प्रश्न 4, 5, 8, 9)
  • ☒ व्यंग्य की भाषा और स्किल (प्रश्न 7, 10)
  • ☒ आध्यात्मिकता का व्यापार, अंधविश्वास और लेखक-परिचय (प्रश्न 11, 12, 13)

Total questions answered: 13 of 13

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 11 Hindi Antra Chapter 3 (टार्च बेचनेवाले) cover?

All 13 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

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How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

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