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Class 11 Hindi Antra Chapter 2

NCERT Solutions for Class 11 Hindi Antra Chapter 2: दोपहर का भोजन

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XI

Hindi

Antra (NCERT)

2 – दोपहर का भोजन

2026-27

12 of 12

बिंदु

विवरण

लेखक

अमरकांत (1925–2014), नई कहानी आंदोलन

विधा

कहानी

पात्र

सिद्धेश्वरी (माँ), मुंशी चंद्रिका प्रसाद (पति, डेढ़ महीने पहले नौकरी से छँटनी), रामचंद्र (21, प्रूफ़-रीडरी सीखता), मोहन (18, हाईस्कूल की तैयारी), प्रमोद (6, कुपोषित)

कथा

गरीब निम्न-मध्यवर्गीय परिवार का एक दोपहर का भोजन – दो-दो रोटियाँ, पनियाई दाल, चने की तरकारी; हर सदस्य भूखा होकर भी ‘पेट भर गया’ का बहाना करता है; सिद्धेश्वरी झूठ बोलकर परिवार को जोड़े रखती है और अंत में आधी जली रोटी खाती है, आधी प्रमोद के लिए रखती है

शिल्प

सहज बोलचाल की भाषा, संकेतों और मौन से गहरी संवेदना

Q1

सिद्धेश्वरी ने अपने बड़े बेटे रामचंद्र से मँझले बेटे मोहन के बारे में झूठ क्यों बोला?

Answer

उत्तर

रामचंद्र ने पूछा कि कड़ी धूप में मोहन कहाँ है। सिद्धेश्वरी को स्वयं पता नहीं था कि मोहन कब से घर से गायब है और कहाँ घूम रहा है। सच बताने पर रामचंद्र मोहन पर नाराज़ होता, घर में तनाव और कलह बढ़ता। इसलिए उसने झूठ कहा कि मोहन किसी लड़के के यहाँ पढ़ने गया है, उसका दिमाग बहुत तेज़ है, वह चौबीसों घंटे पढ़ाई में लगा रहता है और हमेशा भैया की बात करता है।

इस झूठ के पीछे उसकी इच्छा थी कि –

  1. घर में शांति बनी रहे; पहले से परेशान बड़ा बेटा और दुखी न हो।
  2. भाइयों के बीच प्रेम और सम्मान बना रहे।
  3. गरीबी से टूटते परिवार को भावनात्मक रूप से जोड़े रखा जाए।

उसे स्वयं पता नहीं था कि मोहन कहाँ है; सच बताने से रामचंद्र नाराज़ होता और घर में कलह बढ़ती – इसलिए भाइयों में प्रेम बनाए रखने, बड़े बेटे को चिंता से बचाने और परिवार की शांति के लिए उसने मोहन के पढ़ाई में लगे रहने और भैया की प्रशंसा करने का झूठ बोला।

Q2

कहानी के सबसे जीवंत पात्र के चरित्र की दृढ़ता का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।

Answer

उत्तर

कहानी की सबसे जीवंत पात्र सिद्धेश्वरी है। उसके चरित्र की दृढ़ता के उदाहरण:

  1. भूख-प्यास सहने की दृढ़ता: खाना बनाने के बाद भूख से बेहाल होकर वह खाली पेट लोटा भर पानी पी जाती है और ‘हाय राम’ कहकर लेट जाती है, पर किसी से शिकायत नहीं करती।
  2. परिवार को जोड़े रखने का संकल्प: वह हर सदस्य से दूसरे की प्रशंसा का झूठ बोलती है – रामचंद्र से मोहन की, मोहन से रामचंद्र की, मुंशी जी से बड़े बेटे द्वारा ‘बाबू जी देवता के समान हैं’ कहने की – ताकि परिवार में प्रेम बना रहे।
  3. गरीबी को छिपाने की दृढ़ता: वह सबको आग्रहपूर्वक, कसम देकर और रोटी लेने को कहती है, ताकि किसी को अभाव का अहसास न हो।
  4. त्याग: सबको खिलाकर अंत में बची एक जली हुई रोटी में से आधी स्वयं खाती है और आधी प्रमोद के लिए रख देती है।
  5. धैर्य: बेटों की रुखाई (“अधिक खिलाकर बीमार डालने की तबीयत है क्या?”) चुपचाप सह लेती है।

सिद्धेश्वरी सबसे जीवंत पात्र है – वह भूख-प्यास चुपचाप सहती है, झूठ बोलकर भी परिवार में प्रेम बनाए रखती है, गरीबी छिपाकर सबको आग्रह से खिलाती है, बेटों की रुखाई सहती है और अंत में आधी जली रोटी खाकर आधी प्रमोद के लिए रख देती है।

Q3

कहानी के उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे गरीबी की विवशता झाँक रही हो।

Answer

उत्तर

  1. सिद्धेश्वरी भूख से व्याकुल होकर खाली पेट पानी पीती है, जो कलेजे में लग जाता है।
  2. छह वर्ष का प्रमोद कुपोषित है – गले और छाती की हड्डियाँ दिखती हैं, हाथ-पैर बासी ककड़ियों की तरह सूखे और पेट हँडिया की तरह फूला हुआ; मुँह पर मक्खियाँ भिनभिना रही हैं।
  3. भोजन की कमी – हर सदस्य के लिए केवल दो रोटियाँ, पनियाई दाल और चने की तरकारी।
  4. रामचंद्र के फटे-पुराने जूते, अस्त-व्यस्त बाल; वह बिना वेतन के प्रूफ़-रीडरी सीख रहा है।
  5. मुंशी जी की छँटनी हो गई है; उनकी गंदी धोती और तार-तार बनियान; वे थाली के बचे-खुचे दाने बंदर की तरह बीनते हैं।
  6. तीनों पुरुष भूखे होते हुए भी रोटी लेने से इनकार करते हैं; मुंशी जी रोटी की जगह गुड़ का रस माँगते हैं।
  7. प्रमोद रेवड़ी की ज़िद में डेढ़ घंटे रोकर सोया था – छोटी-सी इच्छा भी पूरी न हो सकी।
  8. अंत में सिद्धेश्वरी के लिए केवल एक मोटी, भद्दी, जली रोटी, अधूरा कटोरा दाल और थोड़ी तरकारी बचती है; उसमें से भी आधी वह प्रमोद के लिए रखती है।
  9. घर में मक्खियाँ, अध-टूटा खटोला, फटा गंदा ब्लाउज़।

खाली पेट पानी पीना, कुपोषित प्रमोद, सबके लिए केवल दो रोटियाँ और पनियाई दाल, फटे जूते-कपड़े, मुंशी जी की छँटनी और थाली के दाने बीनना, भूखे होकर भी रोटी से इनकार, रेवड़ी की ज़िद, और अंत में माँ के लिए एक जली रोटी – ये प्रसंग गरीबी की विवशता दिखाते हैं।

Q4

‘सिद्धेश्वरी का एक से दूसरे सदस्य के विषय में झूठ बोलना परिवार को जोड़ने का अनथक प्रयास था’ – इस संबंध में आप अपने विचार लिखिए।

Answer

उत्तर

मैं इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ।

  1. गरीबी, बेरोज़गारी और भूख के कारण परिवार के सदस्य चिड़चिड़े, उदास और एक-दूसरे से कटे हुए थे – रामचंद्र रूखा था, मोहन आवारा-सा घूमता था, मुंशी जी चुप रहते थे।
  2. सिद्धेश्वरी जानती थी कि यदि ऐसे में आपस में शिकायतें और कटुता बढ़ी, तो परिवार बिखर जाएगा।
  3. इसलिए उसने हर सदस्य से दूसरे की प्रशंसा का झूठ बोला – रामचंद्र से कहा कि मोहन पढ़ाई में लगा रहता है और भैया की बात करता है; मोहन से कहा कि बड़का उसकी तारीफ़ कर रहा था; मुंशी जी से कहा कि बड़का उन्हें देवता मानता है और मोहन भैया की इज़्ज़त करता है।
  4. इन झूठों से सबके मन में एक-दूसरे के प्रति सम्मान और स्नेह बना रहा; मुंशी जी के चेहरे पर चमक आ गई।
  5. यह झूठ किसी स्वार्थ या नुकसान के लिए नहीं, बल्कि प्रेम, शांति और एकता के लिए था – इसलिए यह ‘सफ़ेद झूठ’ है।

यह सिद्धेश्वरी का निरंतर, थकाने वाला पर निस्वार्थ प्रयास था – वह स्वयं भीतर से टूटती रही, पर परिवार को टूटने नहीं दिया।

सहमत हूँ – गरीबी से चिड़चिड़े और बिखरते परिवार में सिद्धेश्वरी ने हर सदस्य से दूसरे की प्रशंसा का निस्वार्थ झूठ बोलकर आपसी सम्मान, स्नेह और शांति बनाए रखी; यह परिवार को जोड़ने का उसका निरंतर, त्यागपूर्ण प्रयास था।

Q5

‘अमरकांत आम बोलचाल की ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिससे कहानी की संवेदना पूरी तरह उभरकर आ जाती है।’ कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. सहज बोलचाल के शब्द: बड़कू, मँझला, ओसारा, खटोला, पीढ़ा, चौका, गगरा, छिपुली, बटलोई, पनियाई दाल – ये शब्द निम्न-मध्यवर्गीय घर का यथार्थ जीवंत कर देते हैं।
  2. स्वाभाविक संवाद: “खाना तैयार है, यहीं लाऊँ क्या?”, “अधिक खिलाकर बीमार डालने की तबीयत है क्या?”, “दाल बड़ी अच्छी बनी है”, “गुड़ होगा क्या?” – छोटे-छोटे संवाद पात्रों की मनोदशा और विवशता बता देते हैं।
  3. सजीव उपमाएँ: प्रमोद के हाथ-पैर ‘बासी ककड़ियों की तरह’, पेट ‘हँडिया की तरह’; सिद्धेश्वरी ‘भयभीत हिरनी की भाँति’; मुंशी जी ‘बूढ़ी गाय की तरह जुगाली करते’, ‘बंदर की तरह दाने बीनते’; रोटी का टुकड़ा ‘पान के बीड़े’ की तरह मुँह में रखना – इनसे भूख और गरीबी की पीड़ा आँखों के सामने आ जाती है।
  4. मुहावरे: जी में जी आना, नाक में दम आना।
  5. मौन और संकेत: बहुत कुछ कहा नहीं जाता, बस संकेत से – जैसे सिद्धेश्वरी का गला अटक जाना, आँखें भर आना, मुंशी जी का बारिश की बात पर ‘मक्खियाँ बहुत हो गई हैं’ कहना – यह चुप्पी गरीबी के दर्द को और गहरा कर देती है।

बड़कू, ओसारा, पीढ़ा, पनियाई दाल जैसे घरेलू शब्द, छोटे स्वाभाविक संवाद, ‘बासी ककड़ियों’, ‘भयभीत हिरनी’, ‘बूढ़ी गाय’ जैसी सजीव उपमाएँ, मुहावरे और मौन-संकेत – इस सहज भाषा से गरीबी, भूख और माँ की ममता की संवेदना पूरी तरह उभर आती है।

Q6

रामचंद्र, मोहन और मुंशी जी खाते समय रोटी न लेने के लिए बहाने करते हैं, उसमें कैसी विवशता है? स्पष्ट कीजिए।

Answer

उत्तर

पात्र

बहाना

छिपी विवशता

रामचंद्र

“मेरा पेट पहले ही भर चुका है… अधिक खिलाकर बीमार डालने की तबीयत है क्या?” – पर बाद में बचा टुकड़ा चुपके से मुँह में डाल लेता है

वह भूखा है, पर जानता है कि घर में रोटियाँ कम हैं; बेरोज़गार होने की ग्लानि

मोहन

“अव्वल तो भूख नहीं… रोटियाँ ऐसी बनाई हैं कि खाई नहीं जातीं… दाल बड़ी अच्छी बनी है” – और पनियाई दाल पी जाता है

रसोई की ओर ‘रहस्यमय नेत्रों’ से देखकर समझ जाता है कि रोटी कम है; दूसरों के लिए छोड़ना चाहता है

मुंशी जी

“पेट काफ़ी भर चुका है… अन्न और नमकीन चीज़ों से तबीयत ऊब गई है… गुड़ का ठंडा रस बनाओ”

पत्नी की ओर ‘अपराधी के समान’ देखते हैं; बेरोज़गारी की ग्लानि; रोटी की जगह गुड़ के रस से भूख मिटाना

विवशता: तीनों भूखे हैं, पर घर की गरीबी और रोटियों की कमी को समझते हैं। वे एक-दूसरे के और सिद्धेश्वरी के लिए रोटी बचाना चाहते हैं। साथ ही वे अपनी भूख और विवशता को स्वीकार नहीं करना चाहते, इसलिए कभी झुँझलाकर, कभी मज़ाक में, कभी स्वाद का बहाना बनाकर इनकार करते हैं। यह स्वाभिमान, त्याग और आपसी प्रेम से उपजी करुण विवशता है।

तीनों भूखे होते हुए भी घर में रोटियों की कमी समझकर दूसरों के लिए रोटी बचाने हेतु पेट भरने, रोटी अच्छी न बनने या तबीयत ऊबने का बहाना करते हैं – इसमें गरीबी, बेरोज़गारी की ग्लानि, स्वाभिमान और त्याग से उपजी करुण विवशता है।

Q7

सिद्धेश्वरी की जगह आप होते तो क्या करते?

Answer

उत्तर

यदि मैं सिद्धेश्वरी की जगह होता/होती, तो:

  1. परिवार में प्रेम बनाए रखने का उसका प्रयास तो अपनाता, पर हर समय झूठ बोलने के बजाय सबको साथ बैठाकर खुलकर बात करता, ताकि सब परिस्थिति को स्वीकार करें और मिलकर समाधान खोजें।
  2. सब मिलकर एक साथ भोजन करते, ताकि भोजन बराबर बँटे और माँ को भूखा न रहना पड़े।
  3. आय बढ़ाने के उपाय सोचता – जैसे सिलाई, ट्यूशन, अचार-पापड़ बनाना या घरेलू काम; मोहन को भी पढ़ाई के साथ छोटा-मोटा काम करने को कहता।
  4. बीमार और कुपोषित प्रमोद का इलाज सरकारी अस्पताल या आँगनबाड़ी से करवाता; राशन-कार्ड और सरकारी योजनाओं का लाभ लेता।
  5. अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखता, क्योंकि माँ के बीमार पड़ने से पूरा परिवार संकट में आ जाता।
  6. बेटों और पति को हिम्मत देता कि यह कठिन समय बीत जाएगा।

मैं परिवार को जोड़े रखता, पर झूठ के बजाय खुलकर बात करता, सब मिलकर भोजन करते, आय बढ़ाने के उपाय (सिलाई, ट्यूशन) करता, प्रमोद का इलाज और सरकारी योजनाओं का लाभ लेता, अपना स्वास्थ्य भी देखता और सबको हिम्मत देता।

Q8

रसोई सँभालना बहुत ज़िम्मेदारी का काम है – सिद्ध कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. सीमित साधनों का प्रबंधन: घर की आय के अनुसार राशन, सब्ज़ी, ईंधन का हिसाब रखना और कम में सबका पेट भरना – सिद्धेश्वरी कम आटे और दाल से पूरे परिवार का भोजन बनाती है।
  2. सबके स्वास्थ्य का ध्यान: परिवार के हर सदस्य की उम्र, रुचि और पोषण की ज़रूरत के अनुसार भोजन बनाना; बीमार बच्चे के लिए अलग ध्यान।
  3. समय पर भोजन: सबके आने-जाने के समय के अनुसार भोजन तैयार रखना, गरम परोसना।
  4. स्वच्छता: रसोई, बर्तन और भोजन को साफ़ रखना, ताकि बीमारी न फैले।
  5. बराबर बँटवारा और त्याग: सबको उचित हिस्सा मिले – कई बार गृहिणी को अपने हिस्से का त्याग करना पड़ता है, जैसा सिद्धेश्वरी करती है।
  6. भावनात्मक भूमिका: भोजन के समय प्रेम से परोसना, आग्रह करना, बातचीत से माहौल अच्छा रखना – रसोई परिवार को जोड़ने का केंद्र होती है।
  7. सुरक्षा: आग, गैस, चाकू आदि से सावधानी।

रसोई सँभालने में सीमित साधनों का प्रबंधन, सबके स्वास्थ्य-पोषण का ध्यान, समय पर भोजन, स्वच्छता, बराबर बँटवारा और त्याग, प्रेम से परोसकर परिवार को जोड़ना तथा सुरक्षा – ये सब ज़िम्मेदारियाँ शामिल हैं, जैसा सिद्धेश्वरी के उदाहरण से स्पष्ट है।

Q9

आपके अनुसार सिद्धेश्वरी के झूठ सौ सत्यों से भारी कैसे हैं? अपने शब्दों में उत्तर दीजिए।

Answer

उत्तर

  1. उद्देश्य की पवित्रता: सिद्धेश्वरी का झूठ किसी को धोखा देने, नुकसान पहुँचाने या अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि परिवार में प्रेम, शांति और एकता बनाए रखने के लिए है।
  2. दुख से बचाव: यदि वह सच बोलती – कि मोहन आवारा घूम रहा है, प्रमोद रेवड़ी के लिए रोया, बड़े बेटे को नौकरी नहीं मिल रही – तो सबके मन में निराशा, कटुता और कलह बढ़ती। उसके झूठ से सबको सांत्वना और आत्मसम्मान मिला।
  3. आपसी सम्मान: झूठी प्रशंसा से भाइयों और पिता-पुत्र के बीच स्नेह बढ़ा; मुंशी जी के चेहरे पर चमक आई।
  4. त्याग से जुड़ा: ये झूठ एक भूखी, त्यागमयी माँ के प्रेम से निकले हैं, जो स्वयं दुख सहकर दूसरों को सुख देना चाहती है।
  5. ऐसे सत्य, जो केवल चोट पहुँचाएँ और परिवार तोड़ें, उनसे वह झूठ कहीं श्रेष्ठ है जो मानवता, प्रेम और कल्याण की रक्षा करे – शास्त्रों में भी कहा गया है कि जो प्राणियों के लिए हितकर हो, वही सत्य है।

इसलिए सिद्धेश्वरी के झूठ सौ सत्यों से भारी हैं।

सिद्धेश्वरी के झूठ स्वार्थ या धोखे के लिए नहीं, बल्कि परिवार में प्रेम, शांति और सम्मान बनाए रखने और सबको निराशा से बचाने के लिए त्यागमयी ममता से निकले हैं; परिवार को तोड़ने वाले कड़वे सत्यों से ऐसे कल्याणकारी झूठ कहीं श्रेष्ठ हैं।

Q10

आशय स्पष्ट कीजिए –
(क) वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा भर पानी लेकर गट-गट चढ़ा गई।
(ख) यह कहकर उसने अपने मँझले लड़के की ओर इस तरह देखा, जैसे उसने कोई चोरी की हो।

Answer

उत्तर

(क) खाना बनाकर सिद्धेश्वरी चूल्हे के पास बैठी थी। वह भूख और प्यास से इतनी बेहाल थी कि अचानक प्यास का अहसास होते ही होश खोए हुए व्यक्ति (मतवाले) की तरह उठी और लोटा भर पानी एक साँस में पी गई। घर में खाना कम था – वह सबको खिलाने से पहले खुद नहीं खा सकती थी, इसलिए पानी से ही भूख मिटाने की कोशिश करती है। खाली पेट पानी कलेजे में लग गया और वह ‘हाय राम’ कहकर लेट गई। यह पंक्ति गरीबी और माँ के त्याग का मार्मिक चित्र है।

(ख) सिद्धेश्वरी ने मोहन से झूठ कहा कि बड़का उसकी बड़ी तारीफ़ कर रहा था – “मोहन बड़ा दिमागी होगा, उसकी तबीयत चौबीसों घंटे पढ़ने में लगी रहती है।” झूठ बोलने के बाद उसके मन में अपराध-बोध और डर था कि कहीं मोहन उसका झूठ पकड़ न ले। इसलिए उसने मोहन की ओर ऐसे देखा, जैसे कोई चोरी करके पकड़े जाने से डरता हो। इससे स्पष्ट है कि सिद्धेश्वरी स्वभाव से झूठी नहीं है; परिस्थितियाँ उसे परिवार की भलाई के लिए झूठ बोलने को विवश करती हैं।

(क) भूख-प्यास से बेहाल सिद्धेश्वरी ने होश खोए व्यक्ति की तरह खाली पेट पानी पीकर भूख मिटाने की कोशिश की – गरीबी और त्याग का चित्र। (ख) मोहन से बड़के की झूठी प्रशंसा करने के बाद उसे अपराध-बोध और झूठ पकड़े जाने का डर था, इसलिए उसने चोर की तरह देखा – वह स्वभाव से नहीं, विवशता से झूठ बोल रही थी।

योग्यता-विस्तार

Q11

अपने आस-पास मौजूद समान परिस्थितियों वाले किसी विवश व्यक्ति अथवा विवशतापूर्ण घटना का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

Answer

उत्तर

हमारी गली के कोने पर रमेश काका की सिलाई की छोटी-सी दुकान है। लॉकडाउन के समय उनका काम पूरी तरह बंद हो गया। घर में पत्नी, दो बच्चे और बीमार माँ थीं। बचत कुछ ही दिनों में खत्म हो गई। एक दिन मैंने देखा कि काकी पड़ोस से आटा उधार माँग रही थीं और लौटकर बच्चों से कह रही थीं कि आज उपवास का दिन है, इसलिए वह कुछ नहीं खाएँगी। बच्चों के लिए वे रोटियाँ बनातीं और खुद चाय पीकर रह जातीं। रमेश काका रोज़ सुबह काम की तलाश में निकलते और शाम को थके चेहरे से लौटकर कहते, “कल तक कुछ न कुछ इंतज़ाम हो जाएगा।” उनका बड़ा बेटा पढ़ाई छोड़कर सब्ज़ी का ठेला लगाने लगा। मोहल्ले वालों ने राशन इकट्ठा करके दिया, तब कहीं जाकर हालात सुधरे। उस परिवार को देखकर मुझे सिद्धेश्वरी की याद आती है – भूख छिपाकर, मुसकराकर, परिवार को सँभालती माँ।

लॉकडाउन में काम छिनने पर सिलाई करने वाले रमेश काका के परिवार की विवशता – काकी का ‘उपवास’ के बहाने भूखा रहकर बच्चों को खिलाना और बेटे का पढ़ाई छोड़ ठेला लगाना – सिद्धेश्वरी की परिस्थिति से मेल खाती है (विवरण ऊपर)।

Q12

‘भूख और गरीबी में प्रायः धैर्य और संयम नहीं टिक पाते हैं।’ इसके आलोक में सिद्धेश्वरी के चरित्र पर कक्षा में चर्चा कीजिए।

Answer

उत्तर

चर्चा के बिंदु

  1. सामान्य सत्य: भूख और गरीबी में व्यक्ति चिड़चिड़ा, निराश और कभी-कभी स्वार्थी हो जाता है; परिवारों में कलह होती है। कहानी में भी रामचंद्र रूखा और झुँझलाया हुआ है, मोहन उदास और आवारा-सा, मुंशी जी चुप और ग्लानि से भरे।
  2. सिद्धेश्वरी अपवाद है: वह स्वयं सबसे अधिक भूखी है, फिर भी –
    • धैर्य: बेटों की कड़वी बातें चुपचाप सह लेती है; किसी पर गुस्सा नहीं करती।
    • संयम: अपनी भूख पर नियंत्रण रखकर पहले सबको खिलाती है; अंत में आधी रोटी खाकर आधी प्रमोद के लिए रख देती है।
    • विवेक: झूठ बोलकर भी परिवार में प्रेम और शांति बनाए रखती है।
  3. मानसिक संघर्ष: उसका धैर्य कमज़ोर नहीं है, पर भीतर वह टूट रही है – आँखें भर आती हैं, गला अटक जाता है, ‘उन्माद की रोगिणी की भाँति’ बड़बड़ाने लगती है। यानी गरीबी उसके मन पर भी गहरा असर डाल रही है।
  4. निष्कर्ष: सिद्धेश्वरी सिद्ध करती है कि माँ की ममता और कर्तव्य-बोध भूख और गरीबी में भी धैर्य और संयम को टिकाए रख सकते हैं; पर यह धैर्य कितना महँगा है, यह उसकी पीड़ा बताती है – इसलिए समाज और व्यवस्था की ज़िम्मेदारी है कि किसी परिवार को ऐसी स्थिति में न जीना पड़े।

सामान्यतः भूख-गरीबी धैर्य तोड़ देती है (रामचंद्र की रुखाई, मोहन की उदासी में दिखता है), पर सिद्धेश्वरी अपवाद है – सबसे भूखी होकर भी वह धैर्य से कड़वी बातें सहती, संयम से पहले सबको खिलाती और विवेक से परिवार जोड़ती है; हालाँकि उसकी भीतरी टूटन इस धैर्य की भारी कीमत भी दिखाती है।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ सिद्धेश्वरी के झूठ और परिवार की एकता (प्रश्न 1, 4, 9)
  • ☒ सिद्धेश्वरी का चरित्र और धैर्य (प्रश्न 2, 7, 12)
  • ☒ गरीबी की विवशता (प्रश्न 3, 6, 11)
  • ☒ भाषा, आशय और रसोई की ज़िम्मेदारी (प्रश्न 5, 8, 10)

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Frequently Asked Questions

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