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Class 11 Hindi Antra Chapter 8

NCERT Solutions for Class 11 Hindi Antra Chapter 8: भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XI

Hindi

Antra (NCERT)

8 – भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?

2026-27

14 of 14

बिंदु

विवरण

लेखक

भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885), आधुनिक हिंदी गद्य के जनक

विधा

भाषण (1884, बलिया के ददरी मेले में)

विषय

आलस्य, निकम्मापन, अंधविश्वास, कुरीतियाँ, आपसी फूट और विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता को छोड़कर सब प्रकार की उन्नति का आह्वान

प्रमुख उपाय

सब क्षेत्रों में उन्नति; धर्म का वास्तविक अर्थ समझना और समाज-धर्म को देशकाल के अनुसार बदलना; बाल-विवाह, बहु-विवाह, कुलीन-प्रथा का त्याग; विधवा-विवाह, समुद्र-यात्रा, स्त्री-शिक्षा; मत-मतांतर छोड़कर हिंदू-मुसलमान सबकी एकता; स्वदेशी कारीगरी; अपनी भाषा में उन्नति

शैली

संबोधन (‘भाइयो’), दृष्टांत, कहावतें, लोकोक्तियाँ, व्यंग्य, संस्कृत श्लोक, उर्दू शेर; बोलचाल की भाषा

Q1

पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि ‘इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत कुछ है’ क्यों कहा गया है?

Answer

उत्तर

भारतेंदु बलिया के छोटे-से नगर में इतने लोगों को बड़े उत्साह से एक स्थान पर इकट्ठा देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि भारत आलसी और अभागा देश है – यहाँ के लोग निकम्मेपन में डूबे हैं, कोई सामूहिक प्रयास नहीं करते। बनारस जैसे बड़े नगरों में भी जब कुछ नहीं होता, तब बलिया जैसे छोटे नगर में लोगों का उत्साह से जुटना बहुत बड़ी बात है। ऐसे देश में जो थोड़ा-बहुत अच्छा काम हो जाए, वही बहुत है और प्रशंसा के योग्य है।

इस कथन में देश की निष्क्रियता पर व्यंग्य और बलिया के लोगों के उत्साह की सराहना दोनों हैं।

भारत के लोग आलस और निकम्मेपन में डूबे हैं – बनारस जैसे बड़े नगरों में भी कुछ नहीं होता – इसलिए बलिया जैसे छोटे नगर में लोगों का उत्साह से एकत्र होना ही बहुत बड़ी उपलब्धि है; इसमें देश की निष्क्रियता पर व्यंग्य और बलिया के उत्साह की सराहना है।

Q2

‘जहाँ रॉबर्ट साहब बहादुर जैसे कलेक्टर हों, वहाँ क्यों न ऐसा समाज हो’ वाक्य में लेखक ने किस प्रकार के समाज की कल्पना की है?

Answer

उत्तर

लेखक ने जागरूक, उत्साही, संगठित और कर्मठ समाज की कल्पना की है, जो योग्य नेतृत्व की प्रेरणा से उन्नति के लिए एकजुट होता है।

  1. बलिया के कलेक्टर रॉबर्ट साहब उत्साही और जनहितैषी थे; उनकी प्रेरणा से वहाँ लोग एकत्र होकर अच्छे कार्य कर रहे थे।
  2. लेखक तुलना करता है – जैसे अकबर के समय अबुल फ़ज़ल, बीरबल, टोडरमल जैसे योग्य लोग हुए, वैसे ही यहाँ रॉबर्ट साहब ‘अकबर’ हैं और मुंशी चतुर्भुज सहाय, मुंशी बिहारीलाल ‘अबुल फ़ज़ल और टोडरमल’ हैं।
  3. अर्थात् योग्य, कर्मठ नेतृत्व हो तो समाज भी उत्साहित होकर रचनात्मक कामों में जुट जाता है – ‘जैसा राजा, वैसी प्रजा’।

लेखक ने ऐसे जागरूक, उत्साही, संगठित और कर्मठ समाज की कल्पना की है जो रॉबर्ट साहब जैसे योग्य और जनहितैषी नेतृत्व (अकबर के दरबार की तरह योग्य सहयोगियों सहित) की प्रेरणा से उन्नति के कार्यों में जुट जाता है।

Q3

जिस प्रकार ट्रेन बिना इंजन के नहीं चल सकती ठीक उसी प्रकार ‘हिंदुस्तानी लोगों को कोई चलानेवाला हो’ से लेखक ने अपने देश की खराबियों के मूल कारण खोजने के लिए क्यों कहा है?

Answer

उत्तर

लेखक कहता है कि हिंदुस्तानी लोग रेल के डिब्बों जैसे हैं – फ़र्स्ट क्लास, सेकंड क्लास, सब अच्छे डिब्बे हैं, पर बिना इंजन के नहीं चल सकते। अर्थात् भारतीयों में योग्यता और शक्ति तो है (जैसे हनुमान में बल था, बस ‘का चुप साधि रहा बलवाना’ कहकर याद दिलाने की ज़रूरत थी), पर उन्हें प्रेरित करने और दिशा देने वाला नेतृत्व नहीं है।

जो वर्ग यह काम कर सकते थे – राजे-महाराजे, नवाब, रईस, हाकिम – वे पूजा-भोजन, झूठी गप, बॉल-घुड़दौड़-थिएटर में व्यस्त हैं; उन्हें जनता की परवाह नहीं। साधारण प्रजा की दशा ‘गए हम’ वाली है।

इसलिए लेखक मूल कारण खोजने को कहता है – कि आलस्य, नेतृत्व का अभाव, धर्म और रीति-रिवाज़ की आड़ में छिपी कुरीतियाँ, अंधविश्वास और फूट ही उन्नति के ‘काँटे’ हैं; जब तक इन जड़ों को पहचानकर उखाड़ा नहीं जाएगा, देश आगे नहीं बढ़ेगा। साथ ही वह कहता है कि राजा-महाराजाओं का मुँह मत देखो – स्वयं इंजन बनो, कमर कसो।

भारतीयों में योग्यता है पर प्रेरक नेतृत्व रूपी ‘इंजन’ नहीं – राजा-रईस-हाकिम अपने भोग-विलास में व्यस्त हैं; इसलिए लेखक खराबियों की जड़ (आलस्य, नेतृत्व का अभाव, कुरीतियाँ, अंधविश्वास, फूट) खोजकर उन्हें उखाड़ने और स्वयं कमर कसकर आगे बढ़ने को कहता है।

Q4

देश की सब प्रकार से उन्नति हो, इसके लिए लेखक ने जो उपाय बताए उनमें से किन्हीं चार का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. आलस्य छोड़कर परिश्रम: इंग्लैंड का उदाहरण – वहाँ किसान खेत जोतते हुए भी सोचता है कि कौन-सी नई मशीन या खाद बनाएँ जिससे अन्न दूना हो; कोचवान भी खाली समय में अख़बार पढ़ता है। “एक छिन भी व्यर्थ न जाए।”
  2. धर्म का सही अर्थ और समाज-सुधार: वास्तविक धर्म परमेश्वर का भजन है; बाकी समाज-धर्म हैं जो देशकाल के अनुसार बदले जा सकते हैं। मेले, एकादशी, दीवाली (सफ़ाई), होली (हवा की शुद्धि) के पीछे के उद्देश्य समझें; बाल-विवाह, बहु-विवाह, कुलीन-प्रथा छोड़ें; विधवा-विवाह, समुद्र-यात्रा अपनाएँ।
  3. एकता और भाईचारा: वैष्णव-शाक्त आदि मत-मतांतर का वैर छोड़ें; हिंदू, जैन, मुसलमान सब मिलें; ऊँची-नीची जाति का भेद छोड़ सबका आदर करें – “घर में आग लगे तो जिठानी-देवरानी को डाह छोड़कर साथ आग बुझानी चाहिए।”
  4. स्वदेशी कारीगरी: अपने देश में कारीगरी बढ़ाएँ, ताकि रुपया देश में रहे – धोती अमेरिका की, अंगा इंग्लैंड का, कंघी फ़्रांस की, बत्ती जर्मनी की – ‘घर की तो मूँछें ही मूँछें’ जैसी दशा न हो।
  5. शिक्षा: लड़कियों को पढ़ाएँ; लड़कों को रोज़गार सिखाएँ, परिश्रम की आदत डालें, विलायत भेजें।
  6. अपनी भाषा में उन्नति: परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा पर भरोसा न रखें।
  1. आलस्य छोड़कर हर क्षण का उपयोग – इंग्लैंड के किसान व कोचवान का उदाहरण; (2) धर्म का सही अर्थ समझकर बाल-विवाह, बहु-विवाह छोड़ना और विधवा-विवाह अपनाना; (3) मत-मतांतर व जाति-भेद छोड़कर हिंदू-मुसलमान सबकी एकता; (4) स्वदेशी कारीगरी ताकि धन विदेश न जाए; (साथ में स्त्री-शिक्षा, रोज़गारपरक शिक्षा और अपनी भाषा में उन्नति)।
Q5

लेखक जनता से मत-मतांतर छोड़कर आपसी प्रेम बढ़ाने का आग्रह क्यों करता है?

Answer

उत्तर

  1. एकता ही शक्ति: देश उस घर जैसा है जिसमें आग लगी है (दरिद्रता, पराधीनता, पिछड़ापन); ऐसे समय में जिठानी-देवरानी को आपसी डाह छोड़कर मिलकर आग बुझानी चाहिए – “यह समय इन झगड़ों का नहीं।”
  2. फूट से कमज़ोरी: वैष्णव-शाक्त, हिंदू-मुसलमान, ऊँची-नीची जाति के झगड़े देश की ऊर्जा नष्ट करते हैं और उन्नति में बाधक हैं।
  3. राष्ट्रीय भावना: लेखक का ‘महामंत्र’ है – जो हिंदुस्तान में रहे, चाहे किसी रंग या जाति का हो, वह ‘हिंदू’ (हिंदुस्तानी) है; बंगाली, मराठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्रह्मो, मुसलमान सब एक-दूसरे का हाथ पकड़ें।
  4. उन्नति की दौड़: दुनिया में उन्नति की घुड़दौड़ चल रही है; मिलकर दौड़ेंगे तो ‘एक-एक दो होंगे’।
  5. सामाजिक न्याय: छोटी जाति के लोगों का तिरस्कार कर उनका दिल न तोड़ें; मुसलमान भाई भी हिंदुओं को नीचा न समझें।

क्योंकि देश रूपी घर में दरिद्रता और पिछड़ेपन की आग लगी है, जिसे मिलकर ही बुझाया जा सकता है; मत-मतांतर और जाति के झगड़े देश को कमज़ोर करते हैं, जबकि सब भारतवासियों की एकता (‘एक-एक दो’) से ही उन्नति की दौड़ में आगे बढ़ा जा सकता है।

Q6

आज देश की आर्थिक स्थिति के संदर्भ में नीचे दिए गए वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए – ‘जैसे हज़ार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली हैं, वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हज़ार तरह से इंग्लैंड, फरांसीस, जर्मनी, अमेरिका को जाती हैं।’

Answer

उत्तर

मूल आशय: जैसे गंगा अनेक धाराओं में बँटकर समुद्र में मिल जाती है, वैसे ही भारत का धन (लक्ष्मी) विदेशी वस्तुएँ – अमेरिका की धोती, इंग्लैंड का अंगा, फ़्रांस की कंघी, जर्मनी की बत्ती, यहाँ तक कि दियासलाई – ख़रीदने में हज़ारों रास्तों से विदेश चला जाता है। देश स्वयं अपनी ज़रूरत की चीज़ें नहीं बनाता, इसलिए गरीब होता जाता है।

आज के संदर्भ में

  1. आज भी हम इलेक्ट्रॉनिक्स (मोबाइल, चिप), कच्चा तेल, रक्षा-उपकरण, सौर पैनल, खिलौने, दवाओं का कच्चा माल आदि बड़ी मात्रा में आयात करते हैं, जिससे विदेशी मुद्रा बाहर जाती है और व्यापार घाटा बढ़ता है।
  2. विदेशी ब्रांडों का आकर्षण, ऑनलाइन विदेशी उत्पाद और ऐप भी धन बाहर ले जाते हैं।
  3. इसीलिए आज ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि देश में ही उत्पादन बढ़े, रोज़गार मिले और धन देश में रहे।
  4. भारतेंदु का स्वदेशी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है – हालाँकि वैश्वीकरण के युग में संतुलित व्यापार और निर्यात बढ़ाना भी ज़रूरी है।

भारत का धन विदेशी वस्तुएँ ख़रीदने में हज़ारों रास्तों से विदेश चला जाता है; आज भी इलेक्ट्रॉनिक्स, तेल, रक्षा-उपकरण आदि के आयात से व्यापार घाटा होता है – इसलिए ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ जैसे प्रयास भारतेंदु के स्वदेशी संदेश की प्रासंगिकता दिखाते हैं।

Q7

आपके विचार से देश की उन्नति किस प्रकार संभव है? कोई चार उदाहरण तर्क सहित दीजिए।

Answer

उत्तर

  1. गुणवत्तापूर्ण और कौशल-आधारित शिक्षा: हर बच्चे, विशेषकर बेटियों को अच्छी शिक्षा और व्यावसायिक कौशल मिले – शिक्षित नागरिक ही नवाचार, रोज़गार और लोकतंत्र को मज़बूत करते हैं (उदाहरण: केरल की उच्च साक्षरता से बेहतर सामाजिक संकेतक)।
  2. विज्ञान, तकनीक और स्वदेशी उत्पादन: अनुसंधान, स्टार्टअप और विनिर्माण को बढ़ावा – इसरो का चंद्रयान, डिजिटल भुगतान (UPI) और वैक्सीन-निर्माण दिखाते हैं कि आत्मनिर्भरता से देश आगे बढ़ता है।
  3. भ्रष्टाचार-मुक्त, पारदर्शी शासन: ईमानदार प्रशासन, ई-गवर्नेंस और कानून का राज – इससे योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुँचता है।
  4. सामाजिक एकता और समानता: जाति, धर्म, लिंग के भेदभाव का अंत – एकजुट समाज ही विकास की ऊर्जा देता है (भारतेंदु का भी यही संदेश)।
  5. कृषि और ग्रामीण विकास: किसानों को आधुनिक तकनीक, सिंचाई, उचित मूल्य – क्योंकि बड़ी आबादी आज भी खेती पर निर्भर है।
  6. स्वास्थ्य और पर्यावरण: स्वस्थ नागरिक और स्वच्छ पर्यावरण से ही टिकाऊ विकास संभव है।

गुणवत्तापूर्ण व कौशल-आधारित शिक्षा, विज्ञान-तकनीक और स्वदेशी उत्पादन (इसरो, UPI), भ्रष्टाचार-मुक्त पारदर्शी शासन, सामाजिक एकता-समानता, और कृषि, स्वास्थ्य व पर्यावरण पर ध्यान – इनसे देश की उन्नति संभव है।

Q8

भाषण की किन्हीं चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए कि पाठ ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?’ एक भाषण है।

Answer

उत्तर

भाषण की विशेषता

पाठ से उदाहरण

1. श्रोताओं को सीधा संबोधन

“भाइयो, राजा-महाराजों का मुँह मत देखो”, “भाई हिंदुओ!”, “यारो! वे दिन गए”

2. अवसर और स्थान का उल्लेख

“आज बड़े ही आनंद का दिन है कि इस छोटे-से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को… देखते हैं”; “मुझको मेरे मित्रों ने कहा था कि तुम इस विषय पर आज कुछ कहो”

3. सरल, बोलचाल की, प्रभावशाली भाषा

“कूँए के मेंढक, काठ के उल्लू, पिंजड़े के गंगाराम”, “घर की तो मूँछें ही मूँछें हैं”

4. दृष्टांत, कहानियाँ और कहावतें

रेलगाड़ी और इंजन, तीन मेंढक, पृथ्वीराज चौहान और चंद कवि की कथा, मँगनी के कपड़े वाला किस्सा, इंग्लैंड के कोचवान का उदाहरण

5. उद्धरण

भागवत का श्लोक, मलूकदास का दोहा, उर्दू शेर, संस्कृत सूक्ति

6. आह्वान और उत्साहवर्धन

“तुम आप ही कमर कसो, आलस छोड़ो”, “दौड़ो, इस घोड़दौड़ में…”, “भाइयो, अब तो नींद से चौंको”

7. विचारों की क्रमबद्ध प्रस्तुति और प्रश्नोत्तर शैली

“अब यह प्रश्न होगा कि… तो कुछ बातें जो… मेरे ध्यान में आती हैं, उनको मैं कहता हूँ, सुनो”

इन विशेषताओं से स्पष्ट है कि यह पाठ एक सजीव, प्रेरक भाषण है, जो भारतेंदु ने 1884 में बलिया के ददरी मेले में दिया था।

श्रोताओं को सीधा संबोधन (‘भाइयो’), अवसर-स्थान का उल्लेख (बलिया), बोलचाल की प्रभावशाली भाषा व कहावतें, दृष्टांत-कथाएँ (रेल-इंजन, पृथ्वीराज), उद्धरण, उत्साहवर्धक आह्वान (‘कमर कसो’) और प्रश्नोत्तर शैली – ये सब इसे भाषण सिद्ध करते हैं।

Q9

‘अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो’ से लेखक का क्या तात्पर्य है? वर्तमान संदर्भों में इसकी प्रासंगिकता पर अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।

Answer

उत्तर

तात्पर्य: लेखक चाहता है कि भारतवासी परदेशी वस्तुओं और परदेशी भाषा पर निर्भर न रहें। अपने देश के साधनों, कारीगरी और ज्ञान से उन्नति करें, और यह उन्नति अपनी भाषा के माध्यम से हो, क्योंकि अपनी भाषा में ही ज्ञान जन-जन तक पहुँचता है, आत्मविश्वास और स्वाभिमान जागता है। (भारतेंदु का प्रसिद्ध दोहा भी है – “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।”)

वर्तमान प्रासंगिकता

  1. शिक्षा: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा/स्थानीय भाषा में देने पर बल देती है, क्योंकि बच्चे अपनी भाषा में बेहतर सीखते हैं। अब इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई भी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में शुरू हो रही है।
  2. ज्ञान का लोकतंत्रीकरण: सरकारी सेवाएँ, न्यायालय के निर्णय, स्वास्थ्य-जानकारी और तकनीक भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हों, तभी आम आदमी लाभ उठा सकता है।
  3. डिजिटल युग: इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं में सामग्री तेज़ी से बढ़ रही है; भाषिणी जैसी पहल, अनुवाद-उपकरण इसे आसान बना रहे हैं।
  4. सांस्कृतिक स्वाभिमान: अपनी भाषा अपनी संस्कृति, साहित्य और पहचान की वाहक है।
  5. संतुलन: साथ ही वैश्विक संपर्क के लिए अंग्रेज़ी और अन्य भाषाएँ सीखना भी उपयोगी है – विरोध विदेशी भाषा का नहीं, बल्कि उस पर निर्भरता और अपनी भाषा की उपेक्षा का है।

तात्पर्य है – विदेशी वस्तुओं और भाषा पर निर्भरता छोड़कर अपने देश के साधनों से और अपनी भाषा के माध्यम से उन्नति करना (‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’); आज NEP 2020 में मातृभाषा में शिक्षा, भारतीय भाषाओं में तकनीकी पढ़ाई, डिजिटल सामग्री और सेवाएँ इसकी प्रासंगिकता दिखाते हैं – हालाँकि अन्य भाषाएँ सीखना भी उपयोगी है।

Q10

निम्नलिखित गद्यांशों की व्याख्या कीजिए –
(क) सास के अनुमोदन से … फिर परदेस चला जाएगा।
(ख) दरिद्र कुटुंबी इस तरह … वही दशा हिंदुस्तान की है।
(ग) वास्तविक धर्म तो … शोधे और बदले जा सकते हैं।

Answer

उत्तर

संदर्भ (सभी के लिए): प्रस्तुत गद्यांश अंतरा (भाग 1) में संकलित भारतेंदु हरिश्चंद्र के भाषण ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?’ से लिए गए हैं।

(क) “सास के अनुमोदन से एकांत रात में सूने रंगमहल में जाकर भी बहुत दिन से जिस प्रान से प्यारे परदेसी पति से मिलकर छाती ठंडी करने की इच्छा थी, उसका लाज से मुँह भी न देखै और बोलै भी न, तो उसका अभाग्य ही है। वह तो कल फिर परदेस चला जाएगा।”

प्रसंग: लेखक कहता है कि अंग्रेज़ी राज्य में उन्नति के सब साधन और अवसर मिलने पर भी भारतीय उन्नति न करें, तो यह उनका दुर्भाग्य है।

व्याख्या: एक नववधू का पति बहुत दिनों से परदेस में है। वह उससे मिलने के लिए तरसती रही। सास की अनुमति से एकांत रात में सूने रंगमहल में मिलने का अवसर मिला, फिर भी वह लज्जा के कारण पति का मुँह न देखे, न बात करे, तो यह उसका अभाग्य है – क्योंकि पति कल फिर परदेस चला जाएगा और यह अवसर हाथ से निकल जाएगा। इसी प्रकार भारतीयों को अंग्रेज़ी राज में शिक्षा, विज्ञान, यंत्र और उन्नति का अवसर मिला है; यदि वे संकोच, आलस और रूढ़ियों के कारण इसका लाभ न उठाएँ, तो यह अवसर हमेशा के लिए चला जाएगा।

विशेष: सटीक, मार्मिक लौकिक दृष्टांत; अवसर के महत्त्व पर बल; बोलचाल की भाषा (‘देखै’, ‘बोलै’)।

(ख) “दरिद्र कुटुंबी इस तरह अपनी इज़्ज़त को बचाता फिरता है, जैसे लाजवंती कुल की बहू फटे कपड़ों में अपने अंग को छिपाए जाती है। वही दशा हिंदुस्तान की है।”

प्रसंग: लेखक बताता है कि देश में रोज़गार नहीं है, चारों ओर दरिद्रता की आग लगी है।

व्याख्या: जिस प्रकार एक गरीब परिवार वाला व्यक्ति अपनी गरीबी छिपाकर किसी तरह अपनी इज़्ज़त बचाने की कोशिश करता है, उसी प्रकार कुलीन, लज्जाशील बहू फटे-पुराने कपड़ों में अपना शरीर ढँकने का प्रयास करती है। भारत की दशा भी ऐसी ही है – वह भीतर से दरिद्र हो चुका है, पर अपनी पुरानी प्रतिष्ठा और झूठी शान की आड़ में अपनी दीनता छिपा रहा है। मर्दुमशुमारी (जनगणना) बताती है कि जनसंख्या बढ़ रही है और धन घट रहा है।

विशेष: उपमा अलंकार; देश की आर्थिक दुर्दशा का मार्मिक चित्र; व्यंग्य और करुणा।

(ग) “वास्तविक धर्म तो केवल परमेश्वर के चरण कमल का भजन है। ये सब तो समाज धर्म हैं जो देशकाल के अनुसार शोधे और बदले जा सकते हैं।”

प्रसंग: लेखक मेले, एकादशी व्रत, दीवाली, होली जैसे धार्मिक रीति-रिवाज़ों के पीछे छिपे सामाजिक और वैज्ञानिक उद्देश्यों को समझा रहा है।

व्याख्या: लेखक के अनुसार असली धर्म केवल ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति है। व्रत, त्योहार, तीर्थ, खान-पान और रीति-रिवाज़ – ये समाज-धर्म हैं, जिन्हें ऋषियों ने समाज के हित (स्वास्थ्य, स्वच्छता, मेल-मिलाप) के लिए बनाया था। लोग इनके उद्देश्य को न समझकर इन्हें ही वास्तविक धर्म मान बैठे और इनमें अंधविश्वास और कुरीतियाँ जुड़ गईं। लेखक कहता है कि ये नियम अपरिवर्तनीय नहीं हैं; देश और काल की आवश्यकता के अनुसार इनमें सुधार और परिवर्तन किया जा सकता है – जैसे बाल-विवाह छोड़ना, विधवा-विवाह और समुद्र-यात्रा अपनाना।

विशेष: धर्म और रूढ़ि का अंतर; प्रगतिशील, सुधारवादी दृष्टिकोण; तत्सम-मिश्रित भाषा।

(क) जैसे परदेसी पति से मिलने का अवसर पाकर भी लाज से न बोलने वाली वधू का अभाग्य है, वैसे ही उन्नति के अवसर पाकर भी उनका लाभ न उठाने वाले भारतीयों का दुर्भाग्य है। (ख) जैसे गरीब व्यक्ति अपनी इज़्ज़त और लाजवंती बहू फटे कपड़ों में अंग छिपाती है, वैसे ही दरिद्र भारत अपनी दीनता छिपा रहा है। (ग) असली धर्म ईश्वर-भक्ति है; व्रत-त्योहार-रीति-रिवाज़ समाज-धर्म हैं, जिन्हें देशकाल के अनुसार सुधारा और बदला जा सकता है।

योग्यता-विस्तार

Q11

देश की उन्नति के लिए भारतेंदु ने जो आह्वान किया है उसे विस्तार से लिखिए।

Answer

उत्तर

भारतेंदु ने भारतवासियों को आलस्य की नींद से जगाकर सर्वांगीण उन्नति का आह्वान किया –

  1. आलस्य त्यागो, कमर कसो: राजा-महाराजों या पंडितों के भरोसे मत रहो; स्वयं उठो – “कब तक अपने को जंगली, हूस, मूर्ख, बोदे, डरपोक पुकरवाओगे।”
  2. अवसर को पहचानो: उन्नति की घुड़दौड़ चल रही है; अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस, जापान दौड़ रहे हैं – जो अब पीछे रह गया, वह फिर कभी आगे न बढ़ सकेगा (“अबकी चढ़ी कमान…”)।
  3. सब क्षेत्रों में उन्नति: धर्म, घर-बाहर के काम, रोज़गार, शिष्टाचार, चाल-चलन, शरीर-बल, मन-बल, समाज, बालक-युवा-वृद्ध, स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब – सबकी उन्नति।
  4. बाधाओं को उखाड़ फेंको: उन्नति के मार्ग के काँटों – जो धर्म, देश की चाल या सुख की आड़ में छिपे हैं – को पकड़कर जड़ से उखाड़ दो; लोग निकम्मा, कृस्तान, भ्रष्ट कहें तो परवाह मत करो; त्याग और बलिदान के लिए तैयार रहो।
  5. धर्म का सही अर्थ, समाज-सुधार: बाल-विवाह, बहु-विवाह, कुलीन-प्रथा छोड़ो; विधवा-विवाह, समुद्र-यात्रा अपनाओ; लड़कियों को पढ़ाओ।
  6. एकता: मत-मतांतर, जाति और हिंदू-मुसलमान का भेद छोड़कर सब एक-दूसरे का हाथ पकड़ो।
  7. शिक्षा और रोज़गार: बच्चों को अच्छी शिक्षा, रोज़गार और परिश्रम की आदत दो; नौकरी-पेंशन का भरोसा छोड़ो।
  8. स्वदेशी: अपने देश में कारीगरी बढ़ाओ ताकि धन देश में रहे।
  9. अपनी भाषा: परदेशी वस्तु और भाषा पर भरोसा छोड़कर अपनी भाषा में उन्नति करो।

भारतेंदु ने आलस्य छोड़कर स्वयं कमर कसने, उन्नति के अवसर को पहचानने, सब क्षेत्रों में उन्नति, उन्नति-पथ की बाधाओं को त्याग-बलिदान से उखाड़ने, कुरीतियाँ छोड़ने, स्त्री-शिक्षा, सबकी एकता, रोज़गारपरक शिक्षा, स्वदेशी कारीगरी और अपनी भाषा में उन्नति का आह्वान किया।

Q12

पाठ में आए बोलचाल के शब्दों की सूची बनाइए और उनके अर्थ लिखिए।

Answer

उत्तर

शब्द

अर्थ

महसूल

कर, किराया, टैक्स

हाकिम

अधिकारी, शासक

गरज

मतलब, स्वार्थ, ज़रूरत

मसल

कहावत

कतवार

कचरा, कूड़ा

सरपट

बहुत तेज़ दौड़ना

टट्टू

छोटे कद का घोड़ा

कमबख्ती

दुर्भाग्य

दून की सूझना

बढ़-चढ़कर बातें सूझना, बड़ी-बड़ी बातें करना

छिन

क्षण

मुसाहबी

चापलूसी, किसी अमीर का साथी बनकर रहना

मर्दुमशुमारी

जनगणना

बोदे

कमज़ोर, डरपोक

हूस

मूर्ख, असभ्य

बेर

बार (दफ़ा)

मयस्सर

उपलब्ध, प्राप्त

पिनशिन

पेंशन

मँगनी

माँगकर लाई गई वस्तु

अंगा

अंगरखा, कुर्ता

बेफ़िकरे

लापरवाह

महसूल (कर), हाकिम (अधिकारी), गरज (मतलब), मसल (कहावत), कतवार (कचरा), सरपट (तेज़), कमबख्ती (दुर्भाग्य), छिन (क्षण), मुसाहबी (चापलूसी), मर्दुमशुमारी (जनगणना), बोदे (कमज़ोर), हूस (मूर्ख), बेर (बार), पिनशिन (पेंशन), मँगनी (माँगी हुई), अंगा (कुर्ता) आदि।

Q13

भारतेंदु उर्दू में किस उपनाम से कविताएँ लिखते थे? उनकी कुछ उर्दू कविताएँ ढूँढ़कर लिखिए।

Answer

उत्तर

भारतेंदु हरिश्चंद्र उर्दू में ‘रसा’ उपनाम (तख़ल्लुस) से कविताएँ (ग़ज़लें) लिखते थे।

उनकी ग़ज़लों के कुछ प्रसिद्ध शेर

उठा के नाज़ से दामन भला किधर को चले
इधर तो देखिए बहरे-ख़ुदा जिधर को चले

फिर आई फ़स्ले-गुल फिर ज़ख़्मे-दिल रह-रह के पकते हैं
मेरे दाग़े-जिगर पर सूरते-लाला लहकते हैं

दिल मेरा तीर-ए-सितमगर का निशाना हो गया
आफ़तों का मेरे सर पर आशियाना हो गया

(विद्यार्थी पुस्तकालय में भारतेंदु ग्रंथावली या ‘कविता कोश’ जैसे स्रोतों से ‘रसा’ के नाम से उनकी और ग़ज़लें ढूँढ़ सकते हैं।)

भारतेंदु उर्दू में ‘रसा’ उपनाम से लिखते थे; उनकी ग़ज़लों के कुछ शेर ऊपर दिए गए हैं (भारतेंदु ग्रंथावली/कविता कोश में और भी मिलती हैं)।

Q14

पृथ्वीराज चौहान की कथा अपने शब्दों में लिखिए।

Answer

उत्तर

पृथ्वीराज चौहान की कथा

पृथ्वीराज चौहान (बारहवीं शताब्दी) अजमेर और दिल्ली के वीर, पराक्रमी राजपूत राजा थे। वे घुड़सवारी और धनुर्विद्या में अद्वितीय थे; कहा जाता है कि वे शब्दभेदी बाण चलाने में निपुण थे – केवल आवाज़ सुनकर लक्ष्य भेद देते थे। कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता से उनका प्रेम और स्वयंवर से उसे ले आना प्रसिद्ध प्रसंग है। उनके राजकवि और मित्र चंदबरदाई ने ‘पृथ्वीराज रासो’ में उनकी वीरता का वर्णन किया।

ग़ोर के सुल्तान मुहम्मद (शहाबुद्दीन) ग़ोरी ने भारत पर कई बार आक्रमण किया। 1191 में तराइन के पहले युद्ध में पृथ्वीराज ने उसे हराया और उदारतापूर्वक छोड़ दिया। पर 1192 में तराइन के दूसरे युद्ध में ग़ोरी ने छल से पृथ्वीराज को पराजित कर बंदी बना लिया और अपने साथ ले गया। उसकी आँखें फोड़ दी गईं।

कथा (भारतेंदु के भाषण में वर्णित) के अनुसार, किसी ने ग़ोरी के भाई ग़ियासुद्दीन को बताया कि पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण चलाता है। उसकी परीक्षा के लिए सभा हुई और सात लोहे के तवे रखे गए। तय हुआ कि ग़ियासुद्दीन के ‘हूँ’ कहने पर अंधा पृथ्वीराज बाण चलाएगा। बंदी चंदबरदाई भी साथ था। उसने संकेत में दोहा पढ़ा –

“अबकी चढ़ी कमान, को जानै फिर कब चढ़ै।
जिनि चुक्के चौहान, इक्के मारय इक्क सर।।”

अर्थात् कमान अब चढ़ी है, फिर कब चढ़े कौन जाने; हे चौहान, चूकना मत, एक ही बाण से (शत्रु को) मार दो। संकेत समझकर जैसे ही ग़ियासुद्दीन ने ‘हूँ’ कहा, पृथ्वीराज ने आवाज़ की दिशा में बाण चलाकर उसी को मार डाला।

भारतेंदु इस कथा से सीख देते हैं कि अवसर बार-बार नहीं आता – “अबकी चढ़ी कमान” – इसलिए भारतीयों को उन्नति के इस अवसर को चूकना नहीं चाहिए।

पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण में निपुण वीर राजा थे; तराइन के दूसरे युद्ध (1192) में ग़ोरी ने उन्हें बंदी बनाकर अंधा कर दिया; परीक्षा-सभा में चंदबरदाई के दोहे “अबकी चढ़ी कमान…” का संकेत समझकर उन्होंने ‘हूँ’ की आवाज़ पर बाण चलाकर शत्रु (ग़ियासुद्दीन) को मार दिया – भारतेंदु इससे अवसर न चूकने की सीख देते हैं।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ आलसी देश, नेतृत्व और समाज (प्रश्न 1, 2, 3)
  • ☒ उन्नति के उपाय, एकता और स्वदेशी (प्रश्न 4, 5, 6, 7, 11)
  • ☒ भाषण की विशेषताएँ और भाषा (प्रश्न 8, 9, 12, 13)
  • ☒ व्याख्या और पृथ्वीराज की कथा (प्रश्न 10, 14)

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Frequently Asked Questions

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