Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XI | Hindi | Antra (NCERT) | 11 – देव | 2026-27 | 11 of 11 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवि | देव (देवदत्त द्विवेदी, 1673–1767), रीतिकाल के प्रमुख कवि, इटावा |
हँसी की चोट (सवैया) | कृष्ण के मुँह फेरकर हँसने से गोपी का हृदय हर लिया गया; वियोग में उसके शरीर के पंच तत्व – वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी – चले गए, केवल आकाश (मिलन की आशा) शेष है |
सपना (कवित्त) | सपने में कृष्ण झूला झूलने बुलाते हैं; गोपी उठने को होती है कि नींद टूट जाती है – न बादल, न घनश्याम, केवल आँखों में आँसू |
दरबार (सवैया) | अंधे राजा, गूँगे दरबारी, बहरी सभा – कला और गुण की कद्र न करने वाली पतनशील सामंती व्यवस्था पर व्यंग्य |
भाषा | ब्रजभाषा; अनुप्रास, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, पुनरुक्ति प्रकाश; सवैया और कवित्त छंद |
हँसी की चोट
साँसनि ही सौं समीर गयो अरु, आँसुन ही सब नीर गयो ढरि।
तेज गयो गुन लै अपनो, अरु भूमि गई तन की तनुता करि।।
‘देव’ जियै मिलिबेही की आस कि, आसहू पास अकास रह्यो भरि,
जा दिन तै मुख फेरि हरै हँसि, हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि।।
सपना
झहरि-झहरि झीनी बूँद हैं परति मानो, घहरि-घहरि घटा घेरी है गगन में।
आनि कह्यो स्याम मो सौं ‘चलौ झूलिबे को आज’ फूली न समानी भई ऐसी हौं मगन मैं।।
चाहत उठ्योई उठि गई सो निगोड़ी नींद, सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में।
आँख खोलि देखौं तौ न घन हैं, न घनश्याम, वेई छाई बूँदैं मेरे आँसु ह्वै दृगन में।।
दरबार
साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी, रंग रीझ को माच्यो।
भूल्यो तहाँ भटक्यो घट औघट बूढ़िबे को काहू कर्म न बाच्यो।।
भेष न सूझ्यो, कह्यो समझ्यो न, बतायो सुन्यो न, कहा रुचि राच्यो।
‘देव’ तहाँ निबरे नट की बिगरी मति को सगरी निसि नाच्यो।।
प्रश्न-अभ्यास
‘हँसी की चोट’ सवैये में कवि ने किन पंच तत्वों का वर्णन किया है तथा वियोग में वे किस प्रकार विदा होते हैं?
Answer
उत्तर
शरीर पाँच तत्वों – वायु, जल, अग्नि (तेज), पृथ्वी (भूमि) और आकाश – से बना है। कृष्ण के वियोग में गोपी के शरीर से ये तत्व एक-एक कर विदा हो रहे हैं:
- वायु (समीर): लंबी-लंबी आहों (साँसों) के साथ शरीर की सारी वायु निकल गई।
- जल (नीर): लगातार आँसू बहने से शरीर का सारा जल बह गया।
- अग्नि (तेज): शरीर की कांति और गर्मी अपना गुण (तेज) लेकर चली गई – शरीर निस्तेज हो गया।
- पृथ्वी (भूमि): शरीर दुबला-पतला (तनुता) होकर पृथ्वी तत्व भी समाप्त हो गया।
- आकाश: केवल आकाश तत्व शेष है – गोपी मिलने की आशा पर ही जीवित है; आशा के कारण ही आकाश तत्व भरा हुआ है।
पंच तत्व – वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश; वियोग में वायु आहों के साथ, जल आँसुओं के साथ, अग्नि शरीर का तेज लेकर और पृथ्वी शरीर की दुर्बलता से चली गई; केवल आकाश तत्व मिलन की आशा के रूप में शेष है।
नायिका सपने में क्यों प्रसन्न थी और वह सपना कैसे टूट गया?
Answer
उत्तर
प्रसन्नता का कारण: सपने में वर्षा का सुहावना दृश्य था – रिमझिम (झहरि-झहरि) महीन बूँदें गिर रही थीं और आकाश में घहराते (घहरि-घहरि) बादल छाए थे। तभी श्याम (कृष्ण) ने आकर कहा – “चलो, आज झूला झूलने चलें।” प्रियतम का यह निमंत्रण पाकर नायिका इतनी खुश हुई कि फूली न समाई, आनंद में मग्न हो गई।
सपना कैसे टूटा: जैसे ही वह कृष्ण के साथ चलने के लिए उठना चाहती थी, उसकी निगोड़ी (निर्दयी) नींद टूट गई। आँख खोलकर देखा तो न बादल थे, न घनश्याम (कृष्ण) – बस वही बूँदें उसकी आँखों में आँसू बनकर छा गईं। जागना उसके लिए भाग्य का सो जाना बन गया।
सपने में वर्षा के सुहावने वातावरण में कृष्ण ने आकर उसे झूला झूलने चलने को कहा, इसलिए वह फूली न समाई; पर उठने से पहले ही निगोड़ी नींद टूट गई – न बादल रहे, न घनश्याम, केवल आँखों में आँसू रह गए।
‘सपना’ कवित्त का भाव-सौंदर्य लिखिए।
Answer
उत्तर
- संयोग और वियोग का मार्मिक संगम: सपने में प्रियतम का मिलन (संयोग शृंगार) और जागते ही विरह (वियोग शृंगार) – एक ही कवित्त में दोनों की सुंदर अभिव्यक्ति।
- वर्षा ऋतु का उद्दीपन: रिमझिम बूँदें, घिरी घटाएँ और झूला – सावन का मादक वातावरण प्रेम-भाव को और तीव्र करता है।
- नायिका की आतुरता और मग्नता: “फूली न समानी भई ऐसी हौं मगन मैं” – प्रिय के निमंत्रण पर हृदय का उल्लास।
- विडंबना: “सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में” – जागना भाग्य का सो जाना बन गया; सपना ही सुख था।
- करुण अंत: “न घन हैं, न घनश्याम, वेई छाई बूँदैं मेरे आँसु ह्वै दृगन में” – बाहर की वर्षा की बूँदें भीतर आँसुओं में बदल गईं; विरह की वेदना चरम पर।
- नारी-मन की कोमल भावनाओं का स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक चित्रण।
सपने के संयोग-सुख और जागने पर वियोग-वेदना का मार्मिक संगम; वर्षा ऋतु का उद्दीपक वातावरण; नायिका की आतुरता और मग्नता; ‘जागने में भाग्य सो जाने’ की विडंबना; और बूँदों का आँसुओं में बदल जाने वाला करुण अंत – नारी-मन का सजीव चित्रण।
‘दरबार’ सवैये में किस प्रकार के वातावरण का वर्णन किया गया है?
Answer
उत्तर
देव ने रीतिकालीन पतनशील, विलासी और गुणहीन सामंती दरबार का वर्णन किया है:
- साहिब अंध – राजा अंधा है, अर्थात् कला और गुण को देखने-परखने की दृष्टि नहीं रखता।
- मुसाहिब मूक – दरबारी गूँगे हैं; सच कहने का साहस नहीं, केवल चाटुकारिता करते हैं।
- सभा बहिरी – पूरी सभा बहरी है; किसी की बात नहीं सुनती।
- रंग रीझ को माच्यो – केवल भोग-विलास, रंगरेलियाँ और झूठी वाहवाही का माहौल है।
- सब अपने कर्तव्य भूलकर भटक रहे हैं – कोई कर्म बचा ही नहीं; डूबने (पतन) की ओर बढ़ रहे हैं।
- ऐसे दरबार में कलाकार (नट) का वेश, कला, कथन – कुछ नहीं देखा-समझा-सुना जाता; उसकी साधना व्यर्थ जाती है।
एक पतनशील, विलासी सामंती दरबार का वातावरण, जहाँ राजा कला-गुण के प्रति अंधा, दरबारी चाटुकार और मूक, सभा बहरी है; केवल भोग-विलास का माहौल है, सब कर्तव्य भूल चुके हैं और कलाकार की प्रतिभा का कोई मूल्य नहीं।
दरबार में गुणग्राहकता और कला की परख को किस प्रकार अनदेखा किया जाता है?
Answer
उत्तर
- राजा अंधा है – कलाकार का वेश और अभिनय उसे दिखाई ही नहीं देता (“भेष न सूझ्यो”)।
- दरबारी गूँगे हैं – वे कलाकार की कला की सच्ची प्रशंसा या आलोचना नहीं करते; केवल राजा की चापलूसी करते हैं।
- सभा बहरी है – कलाकार जो कहता है, वह कोई समझता नहीं (“कह्यो समझ्यो न”), जो बताता है वह कोई सुनता नहीं (“बतायो सुन्यो न”)।
- सब भोग-विलास में डूबे हैं; उनकी रुचि कला में नहीं, बस रंगरेलियों में है (“कहा रुचि राच्यो”)।
- परिणाम यह कि ‘निबरे नट’ (प्रतिभावान पर भटका हुआ कलाकार) अपनी बिगड़ी बुद्धि से रात भर व्यर्थ नाचता रहता है – उसकी कला का कोई पारखी नहीं, कोई पुरस्कार नहीं।
इस प्रकार दरबार में गुण और कला पूरी तरह उपेक्षित हैं।
अंधा राजा कलाकार का वेश-अभिनय नहीं देखता, गूँगे दरबारी सच्ची सराहना नहीं करते, बहरी सभा न उसकी बात समझती न सुनती; सब भोग-विलास में डूबे हैं – इसलिए कलाकार रात भर व्यर्थ नाचता रहता है और उसकी कला की कोई परख नहीं होती।
भाव स्पष्ट कीजिए –
(क) हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि।
(ख) सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में।
(ग) वेई छाई बूँदैं मेरे आँसु ह्वै दृगन में।
(घ) साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी।
Answer
उत्तर
(क) जिस दिन से श्रीकृष्ण (हरि) ने मुँह फेरकर, धीरे से (हरै) हँसकर, देखकर (हेरि) गोपी का हृदय (हियो) हर (हरि) लिया, उस दिन से वह विरह में व्याकुल है। कृष्ण की एक मुसकान ने उसका मन चुरा लिया – यही ‘हँसी की चोट’ है। यमक अलंकार – ‘हरि’ (कृष्ण) और ‘हरि’ (हर लेना); ‘ह’ वर्ण का अनुप्रास।
(ख) नायिका कहती है कि उस जागने में मेरे भाग्य सो गए। सपने में कृष्ण से मिलन हो रहा था, पर नींद टूटते ही वह सौभाग्य समाप्त हो गया। अर्थात् उसके लिए जागना दुर्भाग्य बन गया – विरोधाभास (जागने में सोना)।
(ग) सपने में जो वर्षा की बूँदें गिर रही थीं, जागने पर न बादल थे, न घनश्याम – वही बूँदें अब नायिका की आँखों में आँसू बनकर छा गई हैं। संयोग का सुख वियोग के आँसुओं में बदल गया। (‘घन’ – बादल, ‘घनश्याम’ – कृष्ण; यमक/श्लेष का सौंदर्य।)
(घ) दरबार का राजा (साहिब) अंधा है, दरबारी (मुसाहिब) गूँगे हैं और पूरी सभा बहरी है – अर्थात् राजा गुण-कला को देख-परख नहीं पाता, दरबारी सच नहीं बोलते, सभा किसी की बात नहीं सुनती। यह सामंती दरबार की गुणहीनता, चाटुकारिता और विलासिता पर तीखा व्यंग्य है (प्रतीकात्मक प्रयोग)।
(क) कृष्ण ने मुँह फेरकर हँसते हुए देखकर गोपी का हृदय हर लिया – यमक (‘हरि’), अनुप्रास। (ख) जागने में भाग्य सो गया – सपने का मिलन-सुख जागते ही छिन गया (विरोधाभास)। (ग) सपने की वर्षा की बूँदें जागने पर आँखों में आँसू बन गईं – संयोग वियोग में बदला। (घ) राजा कला के प्रति अंधा, दरबारी चाटुकार-मूक, सभा बहरी – सामंती दरबार पर व्यंग्य।
देव ने दरबारी चाटुकारिता और दंभपूर्ण वातावरण पर किस प्रकार व्यंग्य किया है?
Answer
उत्तर
- प्रतीकात्मक व्यंग्य: “साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी” – तीन शारीरिक दोषों के प्रतीक से राजा की गुणहीनता, दरबारियों की चाटुकारिता (सच न बोलना) और सभा की संवेदनहीनता पर करारा प्रहार।
- विलासिता पर चोट: “रंग रीझ को माच्यो” – दरबार में केवल रंगरेलियाँ और झूठी वाहवाही; गंभीर काम कोई नहीं।
- कर्तव्यहीनता: “भूल्यो तहाँ भटक्यो घट औघट बूढ़िबे को काहू कर्म न बाच्यो” – सब अपने कर्तव्य भूलकर कुमार्ग पर भटक रहे हैं, पतन की ओर जा रहे हैं।
- कला की उपेक्षा: कलाकार का वेश, कथन, बताना – कुछ भी नहीं देखा-समझा-सुना जाता।
- आत्म-व्यंग्य: “निबरे नट की बिगरी मति को सगरी निसि नाच्यो” – स्वयं को (या कलाकार को) भटका हुआ नट कहकर बताते हैं कि ऐसे दरबार में कला दिखाना बुद्धि बिगड़ने जैसा, रात भर व्यर्थ नाचना है।
इस प्रकार देव ने रीतिकालीन दरबारों की दंभपूर्ण, विलासी और गुणहीन संस्कृति पर तीखा व्यंग्य किया है।
अंधे राजा, गूँगे दरबारी, बहरी सभा के प्रतीकों से गुणहीनता और चाटुकारिता पर; ‘रंग रीझ को माच्यो’ से विलासिता पर; ‘काहू कर्म न बाच्यो’ से कर्तव्यहीनता पर; और रात भर व्यर्थ नाचते ‘निबरे नट’ के आत्म-व्यंग्य से कला की उपेक्षा पर देव ने तीखा व्यंग्य किया है।
निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या करिए –
(क) साँसनि ही … तनुता करि।
(ख) झहरि … गगन में।
(ग) साहिब अंध … बाच्यो।
Answer
उत्तर
संदर्भ: प्रस्तुत पद्यांश अंतरा (भाग 1) में संकलित रीतिकालीन कवि देव की रचनाओं से लिए गए हैं।
(क) “साँसनि ही सौं समीर गयो अरु, आँसुन ही सब नीर गयो ढरि। तेज गयो गुन लै अपनो, अरु भूमि गई तन की तनुता करि।।”
प्रसंग: ‘हँसी की चोट’ सवैये में कृष्ण के वियोग में व्याकुल गोपी की दशा का वर्णन है।
व्याख्या: कृष्ण के वियोग में गोपी लगातार लंबी साँसें (आहें) भरती है, जिससे उसके शरीर की सारी वायु निकल गई। निरंतर आँसू बहाने से शरीर का सारा जल बह गया। शरीर का तेज (अग्नि तत्व) अपना गुण – कांति और गर्मी – लेकर चला गया, और दुबलेपन के कारण पृथ्वी तत्व भी समाप्त हो गया। अर्थात् विरह में गोपी का शरीर क्षीण हो गया है; उसके पंच तत्वों में से चार चले गए हैं।
विशेष: वियोग शृंगार की चरम दशा; पंच तत्वों का अनूठा प्रयोग; अतिशयोक्ति; अनुप्रास (‘तेज गयो गुन’, ‘तन की तनुता’); सवैया छंद, ब्रजभाषा।
(ख) “झहरि-झहरि झीनी बूँद हैं परति मानो, घहरि-घहरि घटा घेरी है गगन में।”
प्रसंग: ‘सपना’ कवित्त में नायिका सपने में देखे वर्षा के दृश्य का वर्णन कर रही है।
व्याख्या: नायिका कहती है कि झर-झर करती महीन बूँदें बरस रही हैं, मानो वर्षा की झड़ी लगी हो, और आकाश में घहराती (गरजती) हुई काली घटाएँ छाई हैं। यह सावन का मनोहर, उद्दीपक वातावरण है, जिसमें प्रियतम के साथ झूला झूलने की इच्छा जागती है।
विशेष: पुनरुक्ति प्रकाश (‘झहरि-झहरि’, ‘घहरि-घहरि’); अनुप्रास (‘घहरि-घहरि घटा घेरी’, ‘झीनी’); उत्प्रेक्षा (‘मानो’); ध्वन्यात्मकता – वर्षा की आवाज़ सुनाई देती है; दृश्य-बिंब; कवित्त छंद।
(ग) “साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी, रंग रीझ को माच्यो। भूल्यो तहाँ भटक्यो घट औघट बूढ़िबे को काहू कर्म न बाच्यो।।”
प्रसंग: ‘दरबार’ सवैये में देव ने रीतिकालीन सामंती दरबार पर व्यंग्य किया है।
व्याख्या: दरबार का राजा अंधा है (गुण-कला को नहीं पहचानता), दरबारी गूँगे हैं (सच नहीं बोलते, केवल चाटुकारिता करते हैं) और सभा बहरी है (किसी की बात नहीं सुनती)। वहाँ केवल भोग-विलास और रंगरेलियों का माहौल है। सब अपना कर्तव्य भूलकर कठिन, बुरे मार्गों पर भटक रहे हैं; डूबने (पतन) से बचाने वाला कोई कर्म शेष नहीं रहा।
विशेष: प्रतीकात्मक व्यंग्य; अनुप्रास (‘मुसाहिब मूक’, ‘भूल्यो… भटक्यो’); रीतिकालीन दरबारी संस्कृति का यथार्थ चित्रण; सवैया छंद, ब्रजभाषा।
(क) कृष्ण-वियोग में गोपी की आहों से वायु, आँसुओं से जल, निस्तेज होने से अग्नि और दुबलेपन से पृथ्वी तत्व चला गया – वियोग शृंगार, अतिशयोक्ति, अनुप्रास। (ख) सपने में रिमझिम बूँदें और गरजती घटाएँ – पुनरुक्ति प्रकाश, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, ध्वन्यात्मकता। (ग) अंधा राजा, मूक दरबारी, बहरी सभा, विलासिता और कर्तव्यहीनता – सामंती दरबार पर प्रतीकात्मक व्यंग्य।
देव के अलंकार प्रयोग और भाषा प्रयोग के कुछ उदाहरण पठित पदों से लिखिए।
Answer
उत्तर
अलंकार-प्रयोग
अलंकार | उदाहरण |
|---|---|
यमक | “हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि” (‘हरि’ – कृष्ण / हर लेना); “न घन हैं, न घनश्याम” |
अनुप्रास | “तेज गयो गुन लै अपनो”, “घहरि-घहरि घटा घेरी”, “मुसाहिब मूक” |
पुनरुक्ति प्रकाश | “झहरि-झहरि”, “घहरि-घहरि” |
उत्प्रेक्षा | “झीनी बूँद हैं परति मानो” |
विरोधाभास | “सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में” (जागने में भाग्य सो जाना) |
अतिशयोक्ति | पंच तत्वों का एक-एक कर शरीर से चले जाना |
प्रतीक/व्यंग्य | “साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी” |
मुहावरा | “फूली न समानी” |
भाषा-प्रयोग
- ब्रजभाषा का मधुर, कोमल और परिष्कृत रूप – साँसनि, आँसुन, मिलिबेही, झूलिबे, उठ्योई, हौं, मो सौं।
- तत्सम और तद्भव शब्दों का मेल – समीर, नीर, तेज, आकाश / आँसु, नींद, भाग।
- ध्वन्यात्मक शब्द – झहरि, घहरि।
- लोक-शब्द – निगोड़ी (नींद), मुसाहिब (फ़ारसी)।
- छंद: सवैया (‘हँसी की चोट’, ‘दरबार’) और कवित्त (‘सपना’); संगीतात्मकता और लय।
- चित्रात्मकता – वर्षा, झूला, दरबार के सजीव बिंब।
अलंकार – यमक (हरि जू हरि; घन-घनश्याम), अनुप्रास (घहरि-घहरि घटा घेरी), पुनरुक्ति प्रकाश (झहरि-झहरि), उत्प्रेक्षा (मानो), विरोधाभास (जागने में भाग सोना), अतिशयोक्ति, प्रतीक; भाषा – मधुर ब्रजभाषा, तत्सम-तद्भव मेल, ध्वन्यात्मक शब्द, सवैया-कवित्त छंद और चित्रात्मकता।
योग्यता-विस्तार
‘दरबार’ सवैये को भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक ‘अंधेर नगरी’ के समकक्ष रखकर विवेचना कीजिए।
Answer
उत्तर
बिंदु | देव का ‘दरबार’ | भारतेंदु का ‘अंधेर नगरी’ |
|---|---|---|
विषय | गुणहीन, विलासी सामंती दरबार | मूर्ख, विवेकहीन राजा ‘चौपट राजा’ का राज्य |
राजा | ‘साहिब अंध’ – गुण-कला को न पहचानने वाला | चौपट राजा – न्याय-अन्याय की समझ नहीं; बकरी के मरने पर फाँसी के फंदे के नाप पर निर्दोष गोवर्धनदास को फाँसी |
दरबारी | ‘मुसाहिब मूक’ – चाटुकार, सच न बोलने वाले | मंत्री और दरबारी भी राजा की हाँ में हाँ मिलाने वाले |
व्यवस्था | ‘रंग रीझ को माच्यो’ – भोग-विलास, कर्तव्यहीनता | “टके सेर भाजी, टके सेर खाजा” – हर चीज़ एक भाव, विवेक का अभाव, अराजकता |
गुण की उपेक्षा | कलाकार (नट) की कला व्यर्थ | योग्य-अयोग्य, अच्छा-बुरा सब एक बराबर |
शैली | सवैये में सांकेतिक, प्रतीकात्मक व्यंग्य | प्रहसन (हास्य-नाटक) में खुला, हास्यपूर्ण व्यंग्य |
संदेश | कला और गुण के पारखी के बिना समाज का पतन | विवेकहीन शासन में निर्दोष पिसते हैं; ऐसे राज्य से दूर रहना चाहिए |
निष्कर्ष: दोनों रचनाएँ विवेकहीन, विलासी और गुणहीन शासन-व्यवस्था पर व्यंग्य करती हैं। देव रीतिकालीन दरबार की कला-उपेक्षा पर केंद्रित हैं, जबकि भारतेंदु अपने समय की अराजक, अन्यायपूर्ण शासन-व्यवस्था (और अंग्रेज़ी राज) पर। दोनों आज भी प्रासंगिक हैं, जहाँ चाटुकारिता और योग्यता की उपेक्षा दिखाई देती है।
दोनों विवेकहीन, विलासी शासन पर व्यंग्य हैं – देव का अंधा राजा, मूक दरबारी और बहरी सभा कला-गुण की उपेक्षा दिखाते हैं; भारतेंदु के चौपट राजा का ‘टके सेर भाजी, टके सेर खाजा’ वाला राज्य विवेक और न्याय के अभाव को; देव का व्यंग्य सांकेतिक है, भारतेंदु का प्रहसन रूप में खुला।
देव के समान भाषा प्रयोग करने वाले किसी अन्य कवि की रचनाओं का संकलन कीजिए।
Answer
उत्तर
देव के समान ब्रजभाषा, अलंकार-प्रधान, सवैया-कवित्त शैली में लिखने वाले रीतिकालीन कवि घनानंद, बिहारी, पद्माकर, मतिराम, भूषण आदि हैं। कुछ उदाहरण:
घनानंद
अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।
तहाँ साँचे चलैं तजि आपनपौ झझकैं कपटी जे निसाँक नहीं।।
‘घनआनँद’ प्यारे सुजान सुनौ यहाँ एक तें दूसरो आँक नहीं।
तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ लला मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं।।
बिहारी
कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैननु ही सब बात।।
कनक कनक तें सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
उहिं खाएँ बौराय जग, इहिं पाएँ बौराय।।
पद्माकर
फागु की भीर, अभीरिन में गहि गोविंदै लै गई भीतर गोरी।
भाई करी मन की पदमाकर, ऊपर नाई अबीर की झोरी।।
(विद्यार्थी ‘कविता कोश’ या रीतिकाल के संकलनों से और रचनाएँ जोड़ सकते हैं।)
घनानंद (‘अति सूधो सनेह को मारग है…’), बिहारी (‘कहत, नटत, रीझत, खिझत…’, ‘कनक कनक तें सौ गुनी…’) और पद्माकर जैसे रीतिकालीन कवियों की ब्रजभाषा, अलंकार-प्रधान रचनाएँ देव के समान हैं – संकलन ऊपर दिया गया है।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ हँसी की चोट – विरह और पंच तत्व (प्रश्न 1, 6क, 8क)
- ☒ सपना – संयोग-वियोग (प्रश्न 2, 3, 6ख-ग, 8ख)
- ☒ दरबार – सामंती व्यवस्था पर व्यंग्य (प्रश्न 4, 5, 6घ, 7, 8ग, 10)
- ☒ भाषा-अलंकार और रीतिकालीन कवि (प्रश्न 9, 11)