Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XI | Hindi | Antra (NCERT) | 4 – गूँगे | 2026-27 | 13 of 13 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | रांगेय राघव (1923–1962) |
विधा | कहानी |
पात्र | गूँगा (जन्म से बहरा-गूँगा अनाथ किशोर), चमेली (कोमल हृदय गृहिणी), उसका पति, बेटा बसंता, बेटी शकुंतला, सुशीला |
कथा | माँ के छोड़ जाने और बुआ-फूफा की मार से भागा, मेहनत से पेट पालने वाला स्वाभिमानी गूँगा चमेली के घर चार रुपये पर नौकर बनता है; बार-बार भागता-लौटता है; बसंता की मार सहकर भी हाथ नहीं उठाता; चोरी के आरोप पर निकाला जाता है और सड़क के लड़कों से पिटकर खून से लथपथ लौटता है |
प्रतीक | ‘गूँगे’ – समाज के वे असंख्य असमर्थ लोग जो अन्याय देखकर भी कह नहीं पाते; करुणा भी ‘गूँगी’ है |
संदेश | दिव्यांग दया नहीं, समानता, स्नेह और अधिकार चाहते हैं |
गूँगे ने अपने स्वाभिमानी होने का परिचय किस प्रकार दिया?
Answer
उत्तर
- जब स्त्रियों ने पूछा कि वह खाता क्या है, तो उसने सीने पर हाथ मारकर इशारा किया – “हाथ फैलाकर कभी नहीं माँगा, भीख नहीं लेता”, और भुजाओं पर हाथ रखकर बताया – “मेहनत का खाता हूँ”; पेट बजाकर दिखाया कि इसी पेट के लिए।
- उसने हलवाई के यहाँ रात भर लड्डू बनाए, कड़ाही माँजी, नौकरी की, कपड़े धोए – पर भीख नहीं माँगी।
- चमेली ने नौकर रखने की बात कही तो उसने पहले पूछा – “क्या देगी?” – यानी काम के बदले मज़दूरी का अधिकार माँगा।
- भागकर लौटने पर चमेली ने ‘भिखारी’ कहकर रोटियाँ फेंकीं, तो उसने देर तक रोटियाँ छुईं तक नहीं।
- बुआ-फूफा की मार और शोषण सहने के बजाय वह घर छोड़कर भाग आया।
- सड़क के लड़कों से वह गूँगा होने के नाते दबना नहीं चाहता था, इसलिए लड़ पड़ा और पिटकर आया।
उसने इशारों से बताया कि वह भीख नहीं माँगता, मेहनत का खाता है; काम के बदले मज़दूरी माँगी; ‘भिखारी’ कहकर फेंकी रोटियाँ देर तक नहीं छुईं; शोषण करने वाले बुआ-फूफा को छोड़ दिया और गूँगा होने के कारण सड़क के लड़कों से दबने से इनकार किया।
‘मनुष्य की करुणा की भावना उसके भीतर गूँगेपन की प्रतिच्छाया है।’ कहानी के इस कथन को वर्तमान सामाजिक परिवेश के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
कहानी में अर्थ: चमेली के पति जानते हैं कि मनुष्य करुणा तो अनुभव करता है, बहुत कुछ करना चाहता है, पर कर नहीं पाता – उसकी करुणा भी गूँगी है, जो केवल भावना बनकर रह जाती है, ठोस सहायता में नहीं बदलती। चमेली की करुणा भी अंत में गूँगे को घर से निकाल देने पर समाप्त हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ
- आज हम सड़क पर भीख माँगते बच्चे, दुर्घटना में घायल व्यक्ति या भूखे लोगों को देखकर दुखी होते हैं, सोशल मीडिया पर सहानुभूति जताते हैं – पर अधिकतर लोग ठोस मदद नहीं करते।
- दिव्यांगों, अनाथों और गरीबों के प्रति दया तो दिखाई जाती है, पर उन्हें समान अवसर, रोज़गार और सम्मान देने में समाज पीछे है।
- अन्याय, भ्रष्टाचार या हिंसा देखकर हम भीतर से व्याकुल होते हैं, पर डर, स्वार्थ या असमर्थता के कारण आवाज़ नहीं उठाते – यही करुणा का गूँगापन है।
- दया अक्सर अपने को श्रेष्ठ मानने के भाव से जुड़ी होती है; ज़रूरत है दया से आगे बढ़कर अधिकार और समानता की।
मनुष्य करुणा अनुभव करता है, पर उसे कर्म में नहीं बदल पाता – उसकी करुणा भी गूँगी रह जाती है; आज भी लोग भिखारी, घायल या दिव्यांग को देखकर दुखी तो होते हैं, सोशल मीडिया पर सहानुभूति जताते हैं, पर ठोस मदद, समान अवसर देने या अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने से कतराते हैं।
‘नाली का कीड़ा! ’एक छत उठाकर सिर पर रख दी’ फिर भी मन नहीं भरा।’ – चमेली का यह कथन किस संदर्भ में कहा गया है और इसके माध्यम से उसके किन मनोभावों का पता चलता है?
Answer
उत्तर
संदर्भ: चमेली ने दया करके गूँगे को अपने घर में नौकर रखा, खाना-पैसे दिए। एक दिन उसने गूँगे को पुकारा, पर वह कहीं नहीं मिला – बिना बताए भाग गया था। तब चुपचाप खाना पकाते हुए चमेली ने खीझकर यह कहा।
मनोभाव
- क्रोध और खीझ: उसके उपकार के बदले गूँगा भाग गया – इससे वह आहत और क्रुद्ध है; ‘नाली का कीड़ा’ कहकर वह उसे तुच्छ बताती है।
- उपकार जताने का भाव (अहं): “एक छत उठाकर सिर पर रख दी” – अर्थात् मैंने इतना बड़ा अहसान किया, आश्रय दिया, फिर भी इसका मन नहीं भरा।
- सामाजिक अपमान की पीड़ा: “दुनिया हँसती है, हमारे घर को अब अजायबघर का नाम मिल गया है” – लोगों के ताने भी उसे चुभते हैं।
- निराशा और आहत ममता: भीतर से वह गूँगे से स्नेह करती थी, इसलिए उसका भागना उसे दुख भी देता है।
गूँगे के बिना बताए भाग जाने पर चमेली ने खीझकर यह कहा; इससे उसका क्रोध, उपकार जताने का अहं (‘छत सिर पर रख दी’), लोगों के ताने से उपजी अपमान-पीड़ा और भीतर की आहत ममता व निराशा प्रकट होती है।
यदि बसंता गूँगा होता तो आपकी दृष्टि में चमेली का व्यवहार उसके प्रति कैसा होता?
Answer
उत्तर
यदि बसंता गूँगा होता, तो चमेली का व्यवहार निश्चित ही अलग होता:
- वह उसे अपार ममता और प्यार देती; उसकी हर ज़रूरत समझने की कोशिश करती।
- उसे कभी ‘नाली का कीड़ा’, ‘भिखारी’, ‘मक्कार’ जैसे अपशब्द नहीं कहती, न घर से निकालती।
- उसका इलाज करवाती, विशेष शिक्षा (सांकेतिक भाषा) दिलवाती, उसे आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करती।
- यदि कोई उसे चिढ़ाता या मारता, तो वह उसकी रक्षा करती।
- वह उसके दुख से भीतर-ही-भीतर टूटती – कहानी में ही संकेत है: “कहीं उसका भी बेटा गूँगा होता तो वह भी ऐसे ही दुख उठाता!” – यह सोचकर उसका मन काँप जाता है।
इससे स्पष्ट होता है कि चमेली की गूँगे के प्रति करुणा पराएपन से जुड़ी थी; अपने बेटे के लिए उसका व्यवहार ममता और अधिकार से भरा होता।
तब चमेली उसे अपार ममता देती, कभी अपशब्द न कहती, न घर से निकालती; उसका इलाज और विशेष शिक्षा करवाती, उसकी रक्षा करती – यानी पराए गूँगे के प्रति दया की जगह अपने बेटे के प्रति ममता और अधिकार भरा व्यवहार होता।
‘उसकी आँखों में पानी भरा था। जैसे उनमें एक शिकायत थी, पक्षपात के प्रति तिरस्कार था।’ क्यों?
Answer
उत्तर
खेलते-खेलते बसंता ने गूँगे को कसकर चपत मार दी। गूँगे का हाथ उठा, पर उसने बसंता को नहीं मारा और रोने लगा। चमेली आई, तो बसंता ने उलटा आरोप लगाया कि गूँगा उसे मारना चाहता था। गूँगे ने चमेली का हाथ पकड़कर न्याय माँगा, पर चमेली ने पुत्र-मोह में घृणा से हाथ छुड़ा लिया और बसंता को कुछ नहीं कहा।
इसलिए जब चमेली ने उसे बासी रोटी देने के लिए बुलाया, तो उसकी आँखों में आँसू थे और उनमें शिकायत थी कि गलती बसंता की थी, फिर भी उसे दंड नहीं मिला; और पक्षपात के प्रति तिरस्कार था कि मालकिन ने अपने बेटे का पक्ष लिया और उसके साथ अन्याय किया। गूँगा सुन-बोल नहीं सकता था, पर न्याय-अन्याय खूब समझता था।
बसंता ने उसे बिना कारण मारा और उलटा आरोप लगाया, पर चमेली ने पुत्र-मोह में बसंता को दंड न देकर गूँगे का हाथ घृणा से झटक दिया – इस अन्याय और पक्षपात के कारण गूँगे की आँखों में शिकायत और तिरस्कार था।
‘गूँगा दया या सहानुभूति नहीं, अधिकार चाहता था’ – सिद्ध कीजिए।
Answer
उत्तर
- उसने कहा कि वह भीख नहीं लेता, मेहनत का खाता है – यानी वह अपने श्रम का उचित फल चाहता था, दया नहीं।
- नौकरी स्वीकार करने से पहले उसने पूछा – “क्या देगी?” – और चार रुपये की मज़दूरी तय होने पर ही तैयार हुआ।
- ‘भिखारी’ कहकर फेंकी गई रोटियाँ उसने देर तक नहीं छुईं – दया की रोटी उसे स्वीकार नहीं थी।
- बसंता के मारने पर उसने चमेली का हाथ पकड़कर न्याय माँगा – कि बसंता को दंड मिलना चाहिए; “शायद इसीलिए कि उसे बसंता को दंड देना ही चाहिए, यह उसका अधिकार है।”
- पक्षपात होने पर उसकी आँखों में शिकायत और तिरस्कार था, गिड़गिड़ाहट नहीं।
- सड़क के लड़कों से वह दबना नहीं चाहता था – बराबरी के अधिकार के लिए लड़ा।
- कहानी के अंत में लेखक भी कहता है – वह स्नेह चाहता है, समानता चाहता है।
वह भीख नहीं, मेहनत की कमाई चाहता था; मज़दूरी तय करके काम किया; दया की फेंकी रोटी नहीं छुई; बसंता की गलती पर न्याय माँगा; पक्षपात पर तिरस्कार जताया और सड़क के लड़कों से बराबरी के लिए लड़ा – वह समानता और अधिकार चाहता था, दया नहीं।
‘गूँगे’ कहानी पढ़कर आपके मन में कौन-से भाव उत्पन्न होते हैं और क्यों?
Answer
उत्तर
- करुणा: अनाथ, गूँगे-बहरे बालक का जीवन – माँ का छोड़ जाना, बुआ-फूफा की मार, बच्चों का चिढ़ाना, अंत में खून से लथपथ होकर दहलीज़ पर कुत्ते की तरह चिल्लाना – मन को द्रवित कर देता है।
- सम्मान: विकलांगता के बावजूद उसका स्वाभिमान, मेहनत से कमाने का संकल्प और बसंता पर हाथ न उठाने का संयम – उसके प्रति आदर जगाते हैं।
- आक्रोश: समाज और चमेली के पक्षपात, शोषण और संवेदनहीनता पर गुस्सा आता है – दिव्यांग को मज़ाक या ‘अजायबघर’ की वस्तु समझना अन्याय है।
- आत्म-चिंतन: हम भी कई बार ‘गूँगे’ बनकर अन्याय देखते रहते हैं; हमारी करुणा भी गूँगी रह जाती है।
- संकल्प: दिव्यांगों और वंचितों को दया नहीं, समान अवसर और सम्मान देने का भाव जागता है।
गूँगे की पीड़ा पर करुणा, उसके स्वाभिमान और संयम पर सम्मान, समाज के पक्षपात व शोषण पर आक्रोश, अपनी ‘गूँगी करुणा’ पर आत्म-चिंतन और दिव्यांगों को समान अवसर-सम्मान देने का संकल्प – ये भाव उत्पन्न होते हैं।
कहानी का शीर्षक ‘गूँगे’ है, जबकि कहानी में एक ही गूँगा पात्र है। इसके माध्यम से लेखक ने समाज की किस प्रवृत्ति की ओर संकेत किया है?
Answer
उत्तर
बहुवचन शीर्षक ‘गूँगे’ प्रतीकात्मक है। लेखक संकेत करता है कि समाज में केवल वही बालक गूँगा नहीं है – असंख्य लोग अलग-अलग रूपों में गूँगे हैं:
- वे लोग जो अन्याय और अत्याचार को समझते हुए भी उसके विरुद्ध बोल नहीं पाते, क्योंकि वे असमर्थ, कमज़ोर या भयभीत हैं – “जिनके हृदय की प्रतिहिंसा न्याय और अन्याय को परखकर भी अत्याचार को चुनौती नहीं दे सकती।”
- वे जिनके पास स्वर है, पर स्वर में अर्थ (शक्ति) नहीं – गरीब, शोषित, दलित, स्त्रियाँ।
- चमेली और उसके पति जैसे लोग, जिनकी करुणा भी गूँगी है – वे बहुत कुछ करना चाहते हैं, पर कर नहीं पाते।
- चमेली सोचती है – “आज दिन ऐसा कौन है जो गूँगा नहीं है” – हर व्यक्ति समाज, राष्ट्र, धर्म के प्रति असंतोष से छटपटाता है, पर कृत्रिम सुख के जाल में फँसकर चुप रहता है।
इस प्रकार लेखक ने समाज की मौन सहनशीलता, असमर्थता और अन्याय के प्रति चुप्पी की प्रवृत्ति पर प्रहार किया है।
‘गूँगे’ बहुवचन प्रतीक है – समाज के वे असंख्य लोग जो अन्याय समझते हुए भी असमर्थता, भय या स्वार्थ के कारण बोल नहीं पाते, जिनकी करुणा भी गूँगी है; लेखक ने अन्याय के प्रति समाज की मौन सहनशीलता और असमर्थता पर प्रहार किया है।
यदि ‘स्किल इंडिया’ जैसा कोई कार्यक्रम होता तो क्या गूँगे को दया या सहानुभूति का पात्र बनना पड़ता?
Answer
उत्तर
नहीं, शायद तब गूँगे को दया या सहानुभूति का पात्र नहीं बनना पड़ता।
- गूँगा बुद्धिमान और मेहनती था – “इशारे गज़ब के करता है, अकल बहुत तेज़ है”; वह लड्डू बनाना, कड़ाही माँजना, कपड़े धोना, सौदा लाना सब कर लेता था।
- ‘स्किल इंडिया’ (कौशल भारत मिशन) और दिव्यांगजनों के लिए विशेष कौशल-प्रशिक्षण योजनाओं के माध्यम से उसे सांकेतिक भाषा, साक्षरता और कोई व्यावसायिक कौशल – जैसे हलवाई का काम, बढ़ईगीरी, सिलाई, कंप्यूटर, हस्तशिल्प, बेकरी – सिखाया जा सकता था।
- प्रशिक्षण के बाद उसे सम्मानजनक रोज़गार या स्वरोज़गार मिलता; वह किसी के घर नौकर बनकर अपमान और मार नहीं सहता।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत आरक्षण, छात्रवृत्ति और सहायता से वह आत्मनिर्भर बनता और समाज में बराबरी से जीता।
पर साथ ही समाज की सोच बदलना भी ज़रूरी है – कौशल के साथ स्वीकार्यता और सम्मान मिलने पर ही दिव्यांग दया के बजाय अधिकार से जी सकते हैं।
नहीं – बुद्धिमान और मेहनती गूँगे को स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रम से सांकेतिक भाषा, साक्षरता और व्यावसायिक कौशल मिलता, जिससे वह सम्मानजनक रोज़गार पाकर आत्मनिर्भर बनता; पर इसके साथ समाज की सोच में बदलाव भी आवश्यक है।
निम्नलिखित गद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए –
(क) करुणा ने सबको… जी-जान से लड़ रहा हो।
(ख) वह लौटकर चूल्हे पर… आदमी गुलाम हो जाता है।
(ग) और फिर कौन… ज़िंदगी बिताए।
(घ) और ये गूँगे… क्योंकि वे असमर्थ हैं?
Answer
उत्तर
संदर्भ (सभी के लिए): प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक अंतरा (भाग 1) में संकलित रांगेय राघव की कहानी ‘गूँगे’ से लिए गए हैं।
(क) “करुणा ने सबको घेर लिया। वह बोलने की कितनी ज़बर्दस्त कोशिश करता है। लेकिन नतीजा कुछ नहीं, केवल कर्कश काँय-काँय का ढेर! अस्फुट ध्वनियों का वमन, जैसे आदिम मानव अभी भाषा बनाने में जी-जान से लड़ रहा हो।”
प्रसंग: स्त्रियाँ गूँगे से उसके बारे में पूछ रही थीं और वह इशारों से अपनी कहानी बता रहा था।
व्याख्या: गूँगे की दशा देखकर वहाँ बैठी सब स्त्रियों का मन करुणा से भर गया। वह बोलने के लिए बहुत ज़ोर लगाता था, पर उसके गले से केवल कर्कश, अस्पष्ट ‘काँय-काँय’ निकलती थी। उसकी अस्फुट ध्वनियाँ ऐसी लगती थीं मानो वह उन्हें उगल रहा हो। लेखक उपमा देता है कि वह ऐसा प्रतीत होता था जैसे आदिम युग का मनुष्य भाषा के जन्म से पहले अपनी बात कहने के लिए पूरी ताक़त से संघर्ष कर रहा हो।
विशेष: उपमा अलंकार (‘जैसे आदिम मानव…’); ‘ध्वनियों का वमन’ – सजीव, लाक्षणिक प्रयोग; करुण रस।
(ख) “वह लौटकर चूल्हे पर जा बैठी, जिसमें अंदर आग थी, लेकिन उसी आग से वह सब पक रहा था जिससे सबसे भयानक आग बुझती है – पेट की आग, जिसके कारण आदमी गुलाम हो जाता है।”
प्रसंग: बसंता ने गूँगे को मारा था; गूँगे ने न्याय के लिए चमेली का हाथ पकड़ा, पर चमेली पुत्र-मोह में हाथ छुड़ाकर रसोई में लौट आई।
व्याख्या: चमेली लौटकर चूल्हे पर बैठ गई। चूल्हे में आग जल रही थी और उसी आग पर वह भोजन पक रहा था जो सबसे भयानक आग – पेट की आग (भूख) – को बुझाता है। लेखक कहता है कि यह भूख ही वह कारण है जिसके चलते मनुष्य दूसरों का गुलाम बन जाता है। गूँगा भी इसी पेट की आग के कारण चमेली के घर नौकर बना, मार और अपमान सहता है और मालिक के बेटे पर हाथ नहीं उठा सकता।
विशेष: ‘आग’ शब्द के दो अर्थ – चूल्हे की आग और भूख की आग (श्लेष/यमक का सौंदर्य); गहरा सामाजिक-आर्थिक यथार्थ।
(ग) “और फिर कौन मेरा अपना है। रहना हो तो ठीक से रहे, नहीं तो फिर जाकर सड़क पर कुत्तों की तरह जूठन पर ज़िंदगी बिताए, दर-दर अपमानित और लांछित…”
प्रसंग: चमेली ने गूँगे पर चोरी का आरोप लगाया; उसने सिर झुका लिया। चमेली सोच रही थी कि उसे क्या दंड दे।
व्याख्या: चमेली सोचती है कि मारने से गूँगा नहीं सुधरेगा; अपराध स्वीकार कराकर दंड न देना शायद असर करे। फिर वह मन ही मन कहती है कि यह मेरा अपना कौन है? रहना है तो ढंग से रहे, नहीं तो जाए और सड़क पर कुत्तों की तरह जूठन खाकर, हर जगह अपमान और लांछन सहकर जिए। यहाँ चमेली की करुणा के भीतर छिपा पराएपन का भाव और मालकिन का अहं प्रकट होता है – उसकी दया की एक सीमा है।
विशेष: मनोवैज्ञानिक चित्रण; ‘कुत्तों की तरह’ – उपमा; चमेली के आंतरिक द्वंद्व और संवेदना की सीमा का उद्घाटन।
(घ) “और ये गूँगे… अनेक-अनेक हो संसार में भिन्न-भिन्न रूपों में छा गए हैं – जो कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते। जिनके हृदय की प्रतिहिंसा न्याय और अन्याय को परखकर भी अत्याचार को चुनौती नहीं दे सकती, क्योंकि बोलने के लिए स्वर होकर भी स्वर में अर्थ नहीं है… क्योंकि वे असमर्थ हैं।”
प्रसंग: कहानी का अंत – गूँगा सड़क के लड़कों से पिटकर, खून से लथपथ होकर दहलीज़ पर सिर रखकर कुत्ते की तरह चिल्ला रहा था और चमेली चुपचाप देख रही थी।
व्याख्या: गूँगे के मूक दुख में चमेली को युगों का हाहाकार सुनाई देता है। वह सोचती है कि संसार में ऐसे अनेक ‘गूँगे’ अलग-अलग रूपों में फैले हैं – वे लोग जो अपनी बात कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते। वे न्याय और अन्याय को पहचानते हैं, उनके भीतर अत्याचार के विरुद्ध प्रतिशोध की आग भी है, पर वे उसका विरोध नहीं कर पाते, क्योंकि उनकी आवाज़ में शक्ति नहीं है – वे सामाजिक, आर्थिक रूप से असमर्थ हैं। यहाँ ‘गूँगा’ शोषित, कमज़ोर और वंचित वर्ग का प्रतीक बन जाता है।
विशेष: प्रतीकात्मकता; कहानी के शीर्षक की सार्थकता; सामाजिक व्यंग्य और करुणा; तत्सम-प्रधान गंभीर भाषा।
(क) गूँगे की बोलने की असफल, कर्कश कोशिश से सबके मन में करुणा – आदिम मानव की उपमा। (ख) चूल्हे की आग से पेट की आग बुझती है, जो मनुष्य को गुलाम बनाती है – गूँगे की विवशता का संकेत। (ग) चमेली की करुणा में छिपा पराएपन और मालकिन का अहं – “कौन मेरा अपना है”। (घ) गूँगे शोषित, असमर्थ लोगों के प्रतीक हैं जो अन्याय समझकर भी विरोध नहीं कर पाते – शीर्षक की सार्थकता।
निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए –
(क) कैसी यातना है कि वह अपने हृदय को उगल देना चाहता है, किंतु उगल नहीं पाता।
(ख) जैसे मंदिर की मूर्ति कोई उत्तर नहीं देती, वैसे ही उसने भी कुछ नहीं कहा।
Answer
उत्तर
(क) गूँगा अपने मन की सारी पीड़ा, भावनाएँ और बातें दूसरों से कहना चाहता है – मानो अपना पूरा हृदय बाहर निकालकर रख देना चाहता है – पर गूँगेपन के कारण वह कुछ कह नहीं पाता। मन की बात न कह पाने की यह विवशता उसके लिए असहनीय यातना है। चमेली ने पहली बार अनुभव किया कि गले में काकल थोड़ा भी ठीक न हो, तो मनुष्य कितना असहाय हो जाता है।
(ख) चमेली गुस्से में गूँगे को डाँटती रही – ‘मक्कार, बदमाश, निकल जा’ – पर गूँगा मंदिर की मूर्ति की तरह शांत और मौन खड़ा रहा। वह बहरा था, इसलिए चमेली की बातें सुन ही नहीं सकता था; केवल इतना समझ पाया कि मालकिन नाराज़ हैं और निकल जाने को कह रही हैं। जैसे मूर्ति भक्त की बातों का उत्तर नहीं देती, वैसे ही वह भी निरुत्तर रहा। इससे चमेली का सारा क्रोध निष्फल हो गया और उसे अपनी मूर्खता पर लज्जा आई।
(क) गूँगा अपने मन की सारी बात कहना चाहता है पर कह नहीं पाता – यह विवशता उसके लिए असहनीय यातना है। (ख) चमेली की डाँट सुन न पाने के कारण गूँगा मूर्ति की तरह मौन और निरुत्तर रहा, जिससे चमेली का क्रोध निष्फल हो गया और उसे लज्जा आई।
योग्यता-विस्तार
समाज में दिव्यांगों के लिए होने वाले प्रयासों में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं?
Answer
उत्तर
- सम्मान और समानता का व्यवहार: दिव्यांगों का मज़ाक न उड़ाना, उन्हें दया नहीं, बराबरी से देखना; दूसरों को भी ऐसा करने से रोकना।
- सांकेतिक भाषा और ब्रेल की बुनियादी जानकारी सीखना, ताकि संवाद कर सकें।
- सहायता: सड़क पार करने, पढ़ाई में नोट्स साझा करने, परीक्षा में लेखक (स्क्राइब) बनने जैसी व्यावहारिक मदद।
- स्वयंसेवा: दिव्यांगों के लिए काम करने वाली संस्थाओं में समय देना, उनके कार्यक्रमों में भाग लेना।
- जागरूकता: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016, सुगम्य भारत अभियान, छात्रवृत्ति-योजनाओं की जानकारी ज़रूरतमंदों तक पहुँचाना।
- सुगम्यता की माँग: विद्यालय और सार्वजनिक स्थानों पर रैंप, लिफ़्ट, ब्रेल संकेत, सुलभ शौचालय की व्यवस्था के लिए प्रयास करना।
- समावेशन: खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और समूह-कार्यों में दिव्यांग साथियों को शामिल करना।
- उनके द्वारा बनाए उत्पाद खरीदकर उनके स्वरोज़गार को प्रोत्साहन देना।
दिव्यांगों से सम्मान और समानता का व्यवहार, सांकेतिक भाषा/ब्रेल सीखना, व्यावहारिक सहायता, संस्थाओं में स्वयंसेवा, योजनाओं के प्रति जागरूकता, सार्वजनिक स्थानों पर सुगम्यता की माँग, गतिविधियों में समावेशन और उनके स्वरोज़गार को प्रोत्साहन।
दिव्यांगों की समस्या पर आधारित ‘स्पर्श’, ‘कोशिश’ तथा ‘इकबाल’ फ़िल्में देखिए और समीक्षा कीजिए।
Answer
उत्तर
फ़िल्म | कथा-सार | संदेश/समीक्षा |
|---|---|---|
स्पर्श (1980, निर्देशक – सई परांजपे; नसीरुद्दीन शाह, शबाना आज़मी) | दृष्टिबाधित विद्यालय के स्वाभिमानी प्रधानाचार्य अनिरुद्ध और विधवा कविता का संबंध; अनिरुद्ध दया नहीं, बराबरी चाहता है | दृष्टिबाधितों का आत्मसम्मान; दया और प्रेम के अंतर को संवेदनशीलता से दिखाती है; उत्कृष्ट अभिनय, राष्ट्रीय पुरस्कार |
कोशिश (1972, निर्देशक – गुलज़ार; संजीव कुमार, जया भादुड़ी) | मूक-बधिर दंपति हरिचरण और आरती का संघर्ष, अपने बेटे को आत्मनिर्भर बनाना | सांकेतिक भाषा में संवाद; बिना शब्दों के भावनाओं का प्रभावी चित्रण; दिव्यांगों की गरिमा और जिजीविषा |
इक़बाल (2005, निर्देशक – नागेश कुकुनूर; श्रेयस तलपड़े, नसीरुद्दीन शाह) | गाँव का मूक-बधिर लड़का इक़बाल क्रिकेटर बनने का सपना देखता है और संघर्ष करके भारतीय टीम तक पहुँचता है | प्रतिभा किसी अक्षमता की मोहताज नहीं; सही अवसर और मार्गदर्शन से दिव्यांग भी सफल होते हैं; प्रेरक, मनोरंजक |
समग्र समीक्षा: तीनों फ़िल्में दिखाती हैं कि दिव्यांग दया नहीं, सम्मान, समान अवसर और अधिकार चाहते हैं – ठीक वैसे ही जैसे ‘गूँगे’ कहानी का नायक। ये फ़िल्में दर्शकों में संवेदनशीलता और समावेशी सोच जगाती हैं।
‘स्पर्श’ (दृष्टिबाधितों का स्वाभिमान), ‘कोशिश’ (मूक-बधिर दंपति की जिजीविषा) और ‘इक़बाल’ (मूक-बधिर क्रिकेटर की सफलता) – तीनों फ़िल्में संदेश देती हैं कि दिव्यांग दया नहीं, सम्मान, समान अवसर और अधिकार चाहते हैं।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ गूँगे का स्वाभिमान और अधिकार-चेतना (प्रश्न 1, 5, 6)
- ☒ चमेली का मनोभाव और करुणा की सीमा (प्रश्न 2, 3, 4)
- ☒ शीर्षक, भाव और स्किल इंडिया (प्रश्न 7, 8, 9)
- ☒ व्याख्या और आशय (प्रश्न 10, 11)
- ☒ दिव्यांगों के लिए प्रयास और फ़िल्में (प्रश्न 12, 13)