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Class 11 Hindi Antra Chapter 16

NCERT Solutions for Class 11 Hindi Antra Chapter 16: घर में वापसी

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XI

Hindi

Antra (NCERT)

16 – घर में वापसी

2026-27

8 of 8

बिंदु

विवरण

कवि

धूमिल (सुदामा पांडेय, 1936–1975), वाराणसी; साठोत्तरी कविता के प्रमुख कवि

कविता

‘घर में वापसी’

विषय

गरीबी के कारण परिवार के सदस्यों के बीच खड़ी अदृश्य दीवार; रिश्ते होते हुए भी उनमें प्रेम की अभिव्यक्ति न हो पाना; ऐसे घर की आकांक्षा जहाँ गरीबी बाधा न हो

प्रतीक

माँ की आँखें – तीर्थ-यात्रा की बस के पंचर पहिए; पिता की आँखें – लोहसाँय की ठंडी शलाखें; बेटी की आँखें – मंदिर के दीवट पर जलते घी के दिए; पत्नी की आँखें – थामने वाले हाथ

शिल्प

नए, ठोस उपमान; रूपक; व्यंग्य (‘पेशेवर गरीब’); मुक्त छंद; बोलचाल की भाषा

Q1

घर एक परिवार है, परिवार में पाँच सदस्य हैं, किंतु कवि पाँच सदस्य नहीं उन्हें पाँच जोड़ी आँखें क्यों मानता है?

Answer

उत्तर

  1. आँखें मन का दर्पण हैं: आँखों से व्यक्ति की भावनाएँ, इच्छाएँ, दुख और आशाएँ झलकती हैं। गरीबी के कारण परिवार के सदस्य अपनी भावनाएँ शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, पर उनकी आँखें सब कुछ कह देती हैं।
  2. मौन संवाद: परिवार में ‘रिश्ते हैं, लेकिन खुलते नहीं’ – सदस्य आपस में खुलकर बात नहीं करते; केवल आँखों के माध्यम से एक-दूसरे को देखते और समझते हैं।
  3. प्रत्येक की अलग दशा: हर जोड़ी आँखें एक अलग कहानी कहती हैं – माँ की अधूरी इच्छाएँ (पंचर पहिए), पिता की बुझी ऊर्जा (ठंडी शलाखें), बेटी की पवित्र आशा (जलते दिए), पत्नी का सहारा (हाथ)।
  4. अपेक्षा और दबाव: ये आँखें कवि से अपेक्षाएँ भी रखती हैं; घर का मुखिया होने के नाते कवि इन आँखों का भार महसूस करता है।

इसलिए कवि सदस्यों को केवल गिनती के रूप में नहीं, बल्कि उनकी मौन भावनाओं और दशाओं के रूप में ‘आँखों’ से देखता है।

आँखें मन का दर्पण हैं; गरीबी के कारण सदस्य अपनी भावनाएँ शब्दों में नहीं कह पाते, पर उनकी आँखें अधूरी इच्छाएँ, बुझी ऊर्जा, आशा और सहारा – सब कह देती हैं; रिश्ते न खुलने से घर में मौन संवाद आँखों से ही होता है, इसलिए कवि उन्हें पाँच जोड़ी आँखें कहता है।

Q2

‘पत्नी की आँखें आँखें नहीं हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं’ से कवि का क्या अभिप्राय है?

Answer

उत्तर

कवि कहता है कि उसकी पत्नी की आँखें केवल देखने वाली आँखें नहीं, बल्कि सहारा देने वाले हाथ हैं। गरीबी, संघर्ष और निराशा के बीच जब कवि टूटने लगता है, तब पत्नी की प्रेम, विश्वास और धैर्य भरी आँखें उसे थाम लेती हैं – हिम्मत देती हैं, गिरने नहीं देतीं। पत्नी उसकी जीवन-संगिनी (हमसफ़र) है, जो हर दुख में साथ खड़ी है।

शिल्प: रूपक – आँखों को हाथ कहना; यह नया, सशक्त उपमान पत्नी के मौन सहयोग और भावनात्मक संबल को मार्मिक रूप से व्यक्त करता है।

पत्नी की आँखों में भरा प्रेम, विश्वास और धैर्य गरीबी और संघर्ष में टूटते कवि को हाथों की तरह थाम लेता है, हिम्मत देता है – वह उसकी सच्ची हमसफ़र और भावनात्मक सहारा है (आँखों का हाथ के रूप में रूपक)।

Q3

‘वैसे हम स्वजन हैं, करीब हैं … क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं’ से कवि का क्या आशय है? अगर अमीर होते तो क्या स्वजन और करीब नहीं होते?

Answer

उत्तर

आशय: कवि कहता है कि परिवार के सब लोग अपने (स्वजन) हैं, एक ही घर में पास-पास रहते हैं – पर उनके बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी है, जिसके दोनों ओर वे हैं। यह दीवार है गरीबी की। ‘पेशेवर गरीब’ का अर्थ है – ऐसे गरीब जिनकी गरीबी स्थायी हो गई है, पीढ़ियों से चली आ रही है, मानो उनका पेशा ही गरीबी हो। गरीबी की चिंता, अभाव, थकान और संघर्ष ने उनके रिश्तों में प्रेम की अभिव्यक्ति को दबा दिया है; वे पास होकर भी मन से दूर हैं।

अमीर होते तो? – अमीर होने से अपने आप रिश्ते निकट नहीं हो जाते; अमीरों में भी अहंकार, व्यस्तता, स्वार्थ के कारण दूरियाँ होती हैं। पर कवि का आशय यह है कि आर्थिक तंगी रोज़मर्रा की चिंताओं से मन को इतना बोझिल कर देती है कि प्रेम जताने, साथ बैठकर बात करने, एक-दूसरे की इच्छाएँ पूरी करने का अवसर और ऊर्जा ही नहीं बचती। यदि ये अभाव न होते, तो वे अपने स्नेह को खुलकर व्यक्त कर पाते और सच्चे अर्थों में करीब होते।

परिवार के लोग अपने और पास-पास हैं, पर स्थायी (‘पेशेवर’) गरीबी ने उनके बीच अदृश्य दीवार खड़ी कर दी है – अभाव और चिंता ने प्रेम की अभिव्यक्ति दबा दी है; अमीरी अपने आप निकटता नहीं लाती, पर आर्थिक तंगी न होती तो वे स्नेह को खुलकर व्यक्त कर पाते और सचमुच करीब होते।

Q4

‘रिश्ते हैं; लेकिन खुलते नहीं’ – कवि के सामने ऐसी कौन-सी विवशता है जिससे आपसी रिश्ते भी नहीं खुलते हैं?

Answer

उत्तर

कवि की विवशता है – गरीबी और उससे उपजी थकान, असमर्थता और हीनता।

  1. गरीबी से लड़ते-लड़ते उसके “खून में इतना भी लोहा नहीं” बचा – यानी इतनी शक्ति, साहस और ऊर्जा नहीं बची कि वह उससे एक चाबी (ताली) बनवाकर रिश्तों पर लगे जटिल (भुन्ना-से) ताले को खोल सके।
  2. वह परिवार की अपेक्षाएँ (माँ की तीर्थ-यात्रा, पिता का सम्मान, बेटी का भविष्य) पूरी नहीं कर पाता, इसलिए उनसे नज़र मिलाकर प्रेम जताने में भी संकोच होता है।
  3. रोज़मर्रा की चिंताएँ भाषा को भी जटिल बना देती हैं – वह चाहकर भी कह नहीं पाता कि “ये पिता हैं, यह प्यारी माँ है, यह मेरी बेटी है… तू मेरी हमसफ़र है… यह मेरा घर है।”
  4. घर पर अपनेपन से हाथ रखकर उसे ‘मेरा घर’ कहने के लिए भी जोखिम उठाना पड़ता है – यानी आर्थिक असुरक्षा में घर भी अपना नहीं लगता।

गरीबी से लड़ते-लड़ते कवि में इतनी शक्ति (‘खून में लोहा’) और ऊर्जा नहीं बची कि वह रिश्तों के जटिल ताले की चाबी बना सके; परिवार की अपेक्षाएँ पूरी न कर पाने का संकोच और चिंताओं का बोझ उसे प्रेम खुलकर व्यक्त करने और घर को ‘मेरा घर’ कहने से रोकता है।

Q5

निम्नलिखित का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –
(क) माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही / तीर्थ-यात्रा की बस के / दो पंचर पहिए हैं।
(ख) पिता की आँखें – / लोहसाँय की ठंडी शलाखें हैं।

Answer

उत्तर

(क) भाव-सौंदर्य: माँ की आँखों में जीवन के अंतिम चरण में तीर्थ-यात्रा करने की इच्छा थी, पर गरीबी के कारण वह इच्छा पड़ाव (लक्ष्य) तक पहुँचने से पहले ही अधूरी रह गई – जैसे तीर्थ-यात्रा की बस के पहिए रास्ते में ही पंचर हो जाएँ और यात्रा रुक जाए। माँ की आँखों में निराशा, थकान और अधूरी आकांक्षाएँ हैं।

शिल्प-सौंदर्य: नया, मौलिक उपमान/रूपक – आँखें = पंचर पहिए; आधुनिक जीवन से लिया गया ठोस बिंब; ‘दो आँखें – दो पहिए’ का सुंदर साम्य; व्यंग्य और करुणा का मेल; मुक्त छंद, बोलचाल की भाषा।

(ख) भाव-सौंदर्य: लोहसाँय लोहे के औज़ार बनाने वाली भट्टी है, जिसमें शलाखें गरम होकर लाल और ऊर्जावान रहती हैं। पर पिता की आँखें ठंडी शलाखों जैसी हैं – अर्थात् जीवन भर कठोर परिश्रम (भट्टी की तपन) के बाद अब उनमें उत्साह, ऊर्जा और आशा बुझ चुकी है; वे थकी, निस्तेज और कठोर हो गई हैं। इसमें पिता के संघर्षपूर्ण जीवन और उनकी मौन पीड़ा का संकेत है।

शिल्प-सौंदर्य: रूपक – आँखें = ठंडी शलाखें; मेहनतकश जीवन से लिया गया ठोस, स्पर्श-बिंब (ठंडापन); ‘लोहसाँय’ जैसा देशज शब्द; विरोध का भाव (भट्टी की गर्मी – ठंडी शलाखें); सघन, सांकेतिक अभिव्यक्ति।

(क) गरीबी के कारण माँ की तीर्थ-यात्रा की इच्छा लक्ष्य से पहले ही अधूरी रह गई – आँखें पंचर पहियों जैसी निराश और थकी; नया उपमान/रूपक, आधुनिक ठोस बिंब, करुणा। (ख) जीवन भर के परिश्रम के बाद पिता की आँखों का उत्साह बुझ गया – भट्टी की ठंडी शलाखों जैसी निस्तेज; रूपक, स्पर्श-बिंब, देशज शब्द ‘लोहसाँय’, सांकेतिकता।

योग्यता-विस्तार

Q6

घर में रहनेवालों से ही घर, घर कहलाता है। पारिवारिक रिश्ते खून के रिश्ते हैं फिर भी उन रिश्तों को न खोल पाना कैसी विवशता है! अपनी राय लिखिए।

Answer

उत्तर

मेरी राय: घर ईंट-पत्थर से नहीं, उसमें रहने वाले लोगों के प्रेम, संवाद और अपनेपन से बनता है। खून के रिश्ते होते हुए भी उन्हें न खोल पाना एक गहरी भावनात्मक और सामाजिक विवशता है।

  1. आर्थिक विवशता: गरीबी में रोटी-रोज़ी की चिंता इतनी बड़ी हो जाती है कि भावनाओं के लिए समय और ऊर्जा नहीं बचती; व्यक्ति अपनी असमर्थता के कारण अपनों से नज़र भी नहीं मिला पाता।
  2. संकोच और संस्कार: हमारे समाज में, विशेषकर पुरुषों में, प्रेम खुलकर जताने का संकोच होता है – पिता-पुत्र, पति-पत्नी कई बार ‘मैं तुम्हें चाहता हूँ’ कह ही नहीं पाते।
  3. आधुनिक व्यस्तता: आज अमीर-गरीब सबके घरों में मोबाइल, टीवी और काम की व्यस्तता ने संवाद कम कर दिया है – एक छत के नीचे रहकर भी लोग अजनबी जैसे हैं।
  4. परिणाम: अकेलापन, गलतफ़हमियाँ, तनाव और रिश्तों में दूरी।

समाधान: रोज़ कुछ समय परिवार के साथ बिताना, साथ भोजन करना, खुलकर बात करना, छोटी-छोटी बातों में आभार और प्रेम जताना। धूमिल की कविता यही संदेश देती है कि थोड़ा ‘जोखिम’ उठाकर, दीवार पर हाथ रखकर कहना चाहिए – “यह मेरा घर है।”

घर अपनों के प्रेम और संवाद से बनता है; खून के रिश्ते होते हुए भी उन्हें न खोल पाना गरीबी की चिंता, असमर्थता की ग्लानि, प्रेम जताने का संकोच और आज की व्यस्तता से उपजी विवशता है – इसका उपाय साथ समय बिताना, खुलकर बात करना और प्रेम व आभार व्यक्त करना है।

Q7

आप अपने पारिवारिक रिश्तों-संबंधों के बारे में एक निबंध लिखिए।

Answer

उत्तर

मेरा परिवार: मेरी सबसे बड़ी पूँजी

परिवार समाज की सबसे छोटी, पर सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है। मेरा परिवार मेरे लिए वह छाया है, जिसके नीचे मैं हर धूप-बारिश से सुरक्षित महसूस करता/करती हूँ।

मेरे परिवार में दादी, माता-पिता, एक छोटी बहन और मैं हैं। दादी घर की जड़ हैं – उनकी कहानियाँ, उनके अनुभव और उनका आशीर्वाद हम सबको जोड़े रखते हैं। पिताजी मेहनती और अनुशासनप्रिय हैं; वे कम बोलते हैं, पर उनकी चिंता उनकी आँखों में दिखती है – परीक्षा के दिनों में देर रात तक मेरे कमरे की बत्ती देखकर वे चुपचाप चाय रख जाते हैं। माँ घर की धुरी हैं; सुबह सबसे पहले उठकर रात को सबसे बाद में सोती हैं, फिर भी उनके चेहरे पर थकान नहीं, मुसकान रहती है। छोटी बहन से नोकझोंक भी होती है और गहरी दोस्ती भी।

हमारे परिवार की सबसे अच्छी आदत है – रात का खाना साथ बैठकर खाना। उस समय कोई मोबाइल नहीं, बस दिन भर की बातें, हँसी-मज़ाक और कभी-कभी गंभीर चर्चाएँ। कठिन समय भी आए – जब पिताजी की नौकरी कुछ महीनों के लिए छूटी थी, तब माँ ने सिलाई का काम शुरू किया, दादी ने अपनी पेंशन से मदद की और हम दोनों भाई-बहन ने फ़िज़ूलखर्ची छोड़ दी। उस समय समझ आया कि परिवार केवल सुख में साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि दुख में एक-दूसरे का हाथ थामने का नाम है।

धूमिल की कविता पढ़कर मैंने सोचा कि हम भी कई बार अपने रिश्तों को ‘खोल’ नहीं पाते – माँ-पिताजी को धन्यवाद या ‘मैं आपसे प्यार करता हूँ’ कहने में झिझकते हैं। अब मैंने तय किया है कि मैं अपने प्रेम और आभार को शब्दों में भी व्यक्त करूँगा, क्योंकि रिश्तों को भी प्रेम और संवाद की खाद-पानी चाहिए।

सच कहूँ तो मेरा परिवार ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है।

‘मेरा परिवार: मेरी सबसे बड़ी पूँजी’ शीर्षक निबंध ऊपर दिया गया है – सदस्यों का परिचय, साथ भोजन की आदत, कठिन समय में एकजुटता और रिश्तों में प्रेम-आभार व्यक्त करने का संकल्प।

Q8

‘यह मेरा घर है’ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि आपका अपना घर है।

Answer

उत्तर

‘यह मेरा घर है’ कहने का अर्थ केवल किसी मकान का मालिक होना नहीं, बल्कि उस स्थान से भावनात्मक जुड़ाव, अपनापन और ज़िम्मेदारी महसूस करना है। मेरा घर सचमुच मेरा अपना है, क्योंकि:

  1. अपनापन: यहाँ मेरे माता-पिता, दादी और बहन हैं, जिनके साथ मैं बिना किसी झिझक के अपने मन की बात कह सकता हूँ; यहाँ मुझे जैसा मैं हूँ, वैसा ही स्वीकार किया जाता है।
  2. सुरक्षा और सुकून: बाहर कितनी भी परेशानी हो, घर लौटते ही मन को शांति मिलती है; माँ की गोद और पिता का साथ हर डर दूर कर देता है।
  3. यादें: घर की हर दीवार, आँगन, छत से मेरी बचपन की यादें जुड़ी हैं – दीवार पर बने मेरे बचपन के चित्र, आँगन का तुलसी का पौधा, छत पर पतंगबाज़ी।
  4. साझा ज़िम्मेदारी: मैं घर के कामों में हाथ बँटाता हूँ, उसकी सफ़ाई और देखभाल करता हूँ – जिसे हम सँवारते हैं, वही अपना लगता है।
  5. संवाद और प्रेम: हम साथ बैठकर भोजन करते हैं, सुख-दुख बाँटते हैं; रिश्ते ‘खुले’ हैं – यही धूमिल की कविता की आकांक्षा थी।
  6. मेरे सपनों की जगह: यहीं मैं पढ़ता हूँ, सपने देखता हूँ और भविष्य की योजनाएँ बनाता हूँ।

इसलिए मैं गर्व से दीवार पर हाथ रखकर कह सकता हूँ – “यह मेरा घर है।”

मेरा घर इसलिए मेरा है क्योंकि वहाँ अपनापन, सुरक्षा और सुकून है, बचपन की यादें जुड़ी हैं, मैं उसकी ज़िम्मेदारी साझा करता हूँ, रिश्तों में खुला संवाद और प्रेम है और वहीं मेरे सपने पलते हैं – इसलिए मैं दीवार पर हाथ रखकर कह सकता हूँ, ‘यह मेरा घर है’।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ पाँच जोड़ी आँखें और उनके प्रतीक (प्रश्न 1, 2, 5)
  • ☒ गरीबी की दीवार और न खुलते रिश्ते (प्रश्न 3, 4, 6)
  • ☒ परिवार और घर पर निबंध (प्रश्न 7, 8)

Total questions answered: 8 of 8

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 11 Hindi Antra Chapter 16 (घर में वापसी) cover?

All 8 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

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How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

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