Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XI | Hindi | Antra (NCERT) | 9 – कबीर | 2026-27 | 11 of 11 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवि | कबीर (1398–1518), निर्गुण भक्ति की ज्ञानमार्गी शाखा |
पद 1 | “अरे इन दोहुन राह न पाई” – हिंदू और मुसलमान दोनों के बाह्याडंबर, पाखंड और कुरीतियों पर प्रहार |
पद 2 | “बालम, आवो हमारे गेह रे” – जीवात्मा का विरहिणी रूप में परमात्मा (प्रियतम) को घर बुलाना; दांपत्य प्रेम का रूपक |
स्रोत | कबीर वाणी (सं. पारसनाथ तिवारी) |
भाषा | सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी); गेय पद-शैली |
1. अरे इन दोहुन राह न पाई।
हिंदू अपनी करै बड़ाई गागर छुवन न देई।
बेस्या के पायन-तर सोवै यह देखो हिंदुआई।
मुसलमान के पीर-औलिया मुर्गी मुर्गा खाई।
खाला केरी बेटी ब्याहै घरहिं में करै सगाई।
बाहर से इक मुर्दा लाए धोय-धाय चढ़वाई।
सब सखियाँ मिलि जेंवन बैठीं घर-भर करै बड़ाई।
हिंदुन की हिंदुवाई देखी तुरकन की तुरकाई।
कहैं कबीर सुनों भाई साधो कौन राह ह्वै जाई।।
2. बालम, आवो हमारे गेह रे। तुम बिन दुखिया देह रे।
सब कोई कहै तुम्हारी नारी, मोकों लगत लाज रे।
दिल से नहीं लगाया, तब लग कैसा सनेह रे।
अन्न न भावै नींद न आवै, गृह-बन धरै न धीर रे।
कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे।
है कोई ऐसा पर-उपकारी, पिवसों कहै सुनाय रे।
अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे।।
प्रश्न-अभ्यास
‘अरे इन दोहुन राह न पाई’ से कबीर का क्या आशय है और वे किस राह की बात कर रहे हैं?
Answer
उत्तर
आशय: ‘इन दोहुन’ अर्थात् हिंदू और मुसलमान – दोनों ने सच्चा मार्ग नहीं पाया। दोनों अपने-अपने धर्म की बड़ाई करते हैं, पर उनका आचरण पाखंड और आडंबर से भरा है – हिंदू छुआछूत करता है (गागर तक नहीं छूने देता) पर वेश्या के चरणों में पड़ा रहता है; मुसलमानों के पीर-औलिया जीव-हिंसा करते हैं और घर में ही मौसी की बेटी से ब्याह कर लेते हैं। इसलिए दोनों भटके हुए हैं।
कौन-सी राह: कबीर सच्चे ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग की बात करते हैं – जो बाह्याडंबर, कर्मकांड, छुआछूत और हिंसा से मुक्त हो; जिसमें आचरण की पवित्रता, प्रेम, दया, समानता और सच्ची भक्ति हो। यह मानवता और सत्य की राह है।
हिंदू और मुसलमान दोनों अपने धर्म की बड़ाई करते हुए भी पाखंड, छुआछूत, हिंसा और कुरीतियों में फँसे हैं, इसलिए दोनों को सच्चा मार्ग नहीं मिला; कबीर आडंबर-रहित, प्रेम, दया, समानता और आचरण की पवित्रता वाली सच्ची ईश्वर-भक्ति की राह की बात करते हैं।
इस देश में अनेक धर्म, जाति, मज़हब और संप्रदाय के लोग रहते थे किंतु कबीर हिंदू और मुसलमान की ही बात क्यों करते हैं?
Answer
उत्तर
- कबीर के समय (15वीं सदी) उत्तर भारत में हिंदू और मुसलमान ही दो प्रमुख और बड़े धार्मिक समुदाय थे; समाज मुख्यतः इन्हीं में बँटा था।
- इन्हीं दोनों के बीच सबसे अधिक धार्मिक कट्टरता, टकराव और भेदभाव था; दोनों अपने धर्म को श्रेष्ठ बताते थे।
- कबीर स्वयं इन दोनों परंपराओं के बीच पले – मुसलमान जुलाहा परिवार में पालन-पोषण, रामानंद जैसे हिंदू गुरु – इसलिए दोनों के आडंबरों को निकट से जानते थे।
- उनका उद्देश्य राम-रहीम की एकता स्थापित करना था; इन दो समुदायों को समझाकर वे पूरे समाज को एकता और मानवता का संदेश देना चाहते थे।
- हिंदू-मुसलमान यहाँ सभी धर्मों के प्रतिनिधि हैं – पाखंड की आलोचना हर धर्म पर लागू होती है।
कबीर के समय उत्तर भारत में हिंदू और मुसलमान ही दो प्रमुख समुदाय थे, जिनके बीच सबसे अधिक कट्टरता और टकराव था; कबीर स्वयं दोनों परंपराओं से जुड़े थे और राम-रहीम की एकता स्थापित करना चाहते थे – ये दोनों सभी धर्मों के पाखंड के प्रतिनिधि भी हैं।
‘हिंदुन की हिंदुवाई देखी तुरकन की तुरकाई’ के माध्यम से कबीर क्या कहना चाहते हैं? वे उनकी किन विशेषताओं की बात करते हैं?
Answer
उत्तर
कबीर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि मैंने हिंदुओं का ‘हिंदूपन’ भी देख लिया और मुसलमानों (तुर्कों) का ‘तुर्कपन’ भी – दोनों ही पाखंडी हैं, सच्चे धर्म से दूर हैं।
हिंदुओं की ‘विशेषताएँ’
- अपनी बड़ाई करते हैं और छुआछूत मानते हैं – किसी को अपनी गागर (पानी का घड़ा) छूने नहीं देते।
- पर वेश्या के चरणों में पड़े रहते हैं – यानी आचरण में भ्रष्ट हैं; पवित्रता केवल दिखावा है।
मुसलमानों की ‘विशेषताएँ’
- उनके पीर-औलिया भी मुर्गी-मुर्गा खाते हैं – जीव-हिंसा करते हैं।
- मौसी (खाला) की बेटी से घर में ही ब्याह कर लेते हैं।
- बाहर से मुर्दा (मारा हुआ जानवर) लाकर, धो-धाकर पकाते हैं और सब मिलकर खाते हुए घर भर उसकी बड़ाई करता है।
अर्थात् दोनों के धर्म में दिखावा, आडंबर और अनैतिकता है – सच्ची धार्मिकता नहीं।
कबीर व्यंग्य करते हैं कि उन्होंने दोनों के धर्म का खोखलापन देख लिया – हिंदू छुआछूत करते हुए भी वेश्या के चरणों में पड़े रहते हैं; मुसलमानों के पीर-औलिया मांस खाते हैं, घर में ही मौसी की बेटी से ब्याह करते हैं और मारे हुए जानवर को पकाकर उसकी बड़ाई करते हैं – दोनों में आडंबर और अनैतिकता है।
‘कौन राह ह्वै जाई’ का प्रश्न कबीर के सामने भी था। क्या इस तरह का प्रश्न आज समाज में मौजूद है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
हाँ, यह प्रश्न आज भी मौजूद है।
- धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिकता: आज भी धर्म के नाम पर दंगे, नफ़रत, सोशल मीडिया पर भड़काऊ प्रचार होता है; आम आदमी उलझ जाता है कि किसकी बात सही मानें।
- पाखंडी गुरु और अंधविश्वास: धर्म के नाम पर कई बाबा लोगों को ठगते हैं; चमत्कार और कर्मकांड के आडंबर बढ़े हैं।
- जातिगत भेदभाव: छुआछूत कानूनन समाप्त है, पर कई जगह आज भी अलग बर्तन, मंदिर-प्रवेश पर रोक, अंतर्जातीय विवाह पर हिंसा जैसी घटनाएँ होती हैं।
- दिखावे की धार्मिकता: पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों पर भारी खर्च, पर भ्रष्टाचार, बेईमानी और दूसरों के प्रति संवेदनहीनता।
- राजनीति में धर्म का उपयोग: धर्म-जाति के आधार पर वोट माँगना।
इसलिए आज भी व्यक्ति सोचता है – किस राह जाएँ? कबीर का उत्तर आज भी प्रासंगिक है – आडंबर छोड़कर प्रेम, सत्य, समानता और मानवता की राह।
हाँ – आज भी धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिक दंगे, पाखंडी बाबा, जातिगत भेदभाव, दिखावे की धार्मिकता और राजनीति में धर्म के उपयोग से आम आदमी उलझा है कि किस राह जाए; कबीर की प्रेम, सत्य और मानवता की राह आज भी उत्तर है।
‘बालम आवो हमारे गेह रे’ में कवि किसका आह्वान कर रहा है और क्यों?
Answer
उत्तर
कबीर स्वयं को विरहिणी स्त्री (जीवात्मा) और परमात्मा (ईश्वर) को अपना बालम (प्रियतम/पति) मानकर उसका आह्वान कर रहे हैं कि वह उनके घर (हृदय) में आए।
क्यों
- प्रियतम (ईश्वर) के बिना उनका शरीर दुखी है – “तुम बिन दुखिया देह रे।”
- सब लोग उन्हें प्रियतम की पत्नी कहते हैं, पर मिलन न होने से उन्हें लाज आती है – जब तक प्रियतम ने हृदय से नहीं लगाया, तब तक कैसा प्रेम?
- विरह में न अन्न अच्छा लगता है, न नींद आती है; घर-वन कहीं धैर्य नहीं।
- जैसे प्यासे को पानी प्रिय है, वैसे ही विरहिणी को प्रियतम प्रिय है; बिना देखे प्राण निकलने को हैं।
अर्थात् जीवात्मा परमात्मा से मिलन के लिए व्याकुल है – यह रहस्यवादी प्रेम-भक्ति है।
कबीर विरहिणी जीवात्मा बनकर परमात्मा रूपी प्रियतम (बालम) को अपने घर (हृदय) में बुला रहे हैं, क्योंकि उसके बिना वे दुखी, व्याकुल और अधूरे हैं – न अन्न भाता है, न नींद आती है, बिना दर्शन प्राण निकल रहे हैं; यह परमात्मा से मिलन की तड़प है।
‘अन्न न भावै नींद न आवै’ का क्या कारण है? ऐसी स्थिति क्यों हो गई है?
Answer
उत्तर
कारण: यह विरह की वेदना है। विरहिणी (कबीर की आत्मा) अपने प्रियतम (परमात्मा) से बिछुड़ी हुई है। प्रियतम के वियोग में उसका मन इतना व्याकुल है कि उसे भोजन अच्छा नहीं लगता और नींद नहीं आती; घर में हो या वन में, कहीं भी धैर्य नहीं मिलता।
ऐसी स्थिति क्यों
- उसका प्रेम सच्चा और अनन्य है – प्रियतम के बिना उसका जीवन अधूरा है।
- सब लोग उसे प्रियतम की पत्नी कहते हैं, पर मिलन नहीं हुआ – यह अधूरापन और लाज भी उसे पीड़ा देती है।
- आध्यात्मिक अर्थ में – जब जीवात्मा को परमात्मा से मिलने की तीव्र प्यास जागती है, तब सांसारिक सुख (भोजन, नींद) उसे फीके लगने लगते हैं; उसका मन केवल ईश्वर में लगा रहता है।
यह प्रियतम (परमात्मा) से वियोग की वेदना है – सच्चे, अनन्य प्रेम के कारण विरहिणी आत्मा मिलन के लिए इतनी व्याकुल है कि उसे भोजन-नींद और सांसारिक सुख फीके लगते हैं और कहीं धैर्य नहीं मिलता।
‘कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे’ से कवि का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
कवि कहता है कि जैसे प्यासे व्यक्ति के लिए पानी सबसे प्रिय और अत्यावश्यक होता है – पानी के बिना उसकी प्यास नहीं बुझती और प्राण संकट में पड़ जाते हैं – वैसे ही प्रेमिका (कामिनी) के लिए उसका प्रियतम सबसे प्रिय होता है; उसके बिना उसे शांति नहीं मिलती।
आध्यात्मिक अर्थ में – जीवात्मा के लिए परमात्मा का मिलन उतना ही आवश्यक है जितना प्यासे के लिए पानी। ईश्वर के बिना आत्मा तृप्त नहीं हो सकती। यह अनन्य प्रेम और व्याकुलता का भाव है।
शिल्प: उपमा/दृष्टांत अलंकार (‘ज्यों प्यासे को नीर’); सरल, मार्मिक, लोक-जीवन से लिया गया उदाहरण।
जैसे प्यासे को पानी सबसे प्रिय और जीवन के लिए अनिवार्य है, वैसे ही प्रेमिका को प्रियतम – आध्यात्मिक अर्थ में आत्मा के लिए परमात्मा का मिलन उतना ही आवश्यक है; इसमें अनन्य प्रेम और व्याकुलता है (उपमा/दृष्टांत अलंकार)।
कबीर निर्गुण संत परंपरा के कवि हैं और यह पद (बालम आवो हमारे गेह रे) साकार प्रेम की ओर संकेत करता है। इस संबंध में आप अपने विचार लिखिए।
Answer
उत्तर
- कबीर निर्गुण, निराकार ईश्वर के उपासक हैं; वे मूर्ति, अवतार और सगुण रूप को नहीं मानते।
- पर निराकार ईश्वर के प्रति प्रेम को व्यक्त करना कठिन है; इसलिए कबीर दांपत्य प्रेम (पति-पत्नी) का रूपक अपनाते हैं – आत्मा प्रेमिका और परमात्मा प्रियतम। यह रहस्यवाद है।
- यहाँ ‘बालम’ कोई शरीरधारी, साकार प्रियतम नहीं, बल्कि निर्गुण परमात्मा का प्रतीक है। ‘गेह’ (घर) शरीर या हृदय का प्रतीक है। विरह, लाज, अन्न-नींद न भाना – ये सब मानवीय भावों के माध्यम से आध्यात्मिक अनुभूति को सजीव बनाते हैं।
- इस पर सूफ़ी प्रेम-परंपरा का भी प्रभाव है, जिसमें ईश्वर को प्रियतम मानकर प्रेम की पीड़ा व्यक्त की जाती है।
- अतः यह पद साकार-उपासना नहीं, बल्कि निर्गुण ईश्वर के प्रति प्रेम की साकार (मानवीय) अभिव्यक्ति है – भाव साकार हैं, आराध्य निराकार। इससे कबीर की भक्ति में ज्ञान के साथ प्रेम और माधुर्य भी दिखता है।
यह पद साकार उपासना नहीं, बल्कि निर्गुण ईश्वर के प्रति प्रेम को दांपत्य रूपक (आत्मा-प्रेमिका, परमात्मा-प्रियतम) के माध्यम से व्यक्त करने वाला रहस्यवाद है, जिस पर सूफ़ी प्रभाव भी है – भाव मानवीय और साकार हैं, पर आराध्य निराकार है।
उदाहरण देते हुए दोनों पदों का भाव-सौंदर्य और शिल्प-सौंदर्य लिखिए।
Answer
उत्तर
पद 1 – “अरे इन दोहुन राह न पाई”
भाव-सौंदर्य: हिंदू और मुसलमान दोनों के धार्मिक पाखंड, छुआछूत, जीव-हिंसा और कुरीतियों पर तीखा प्रहार; सच्चे धर्म और मानवता की खोज; सामाजिक सुधार और धार्मिक एकता का संदेश।
शिल्प-सौंदर्य:
- व्यंग्यात्मक शैली – “यह देखो हिंदुआई”, “हिंदुन की हिंदुवाई देखी तुरकन की तुरकाई”।
- विरोधाभास – गागर न छूने देना और वेश्या के चरणों में पड़े रहना।
- सधुक्कड़ी भाषा – खाला, पीर-औलिया, गागर, जेंवन जैसे लोक-शब्द।
- अनुप्रास – “धोय-धाय”, “घरहिं में करै”।
- गेयता, टेक (“अरे इन दोहुन राह न पाई”), संबोधन – “कहैं कबीर सुनों भाई साधो”।
पद 2 – “बालम, आवो हमारे गेह रे”
भाव-सौंदर्य: जीवात्मा की परमात्मा से मिलन की तीव्र व्याकुलता; विरह-वेदना (वियोग शृंगार); अनन्य प्रेम और समर्पण; रहस्यवादी भक्ति।
शिल्प-सौंदर्य:
- दांपत्य रूपक – आत्मा विरहिणी, परमात्मा बालम।
- उपमा/दृष्टांत – “ज्यों प्यासे को नीर रे”।
- विरह की दशाओं का चित्रण – “अन्न न भावै नींद न आवै”।
- अनुप्रास – “बिन देखे जिव जाय”, “गृह-बन धरै न धीर”।
- हर पंक्ति के अंत में ‘रे’ की आवृत्ति से गेयता और लय; सरल, मधुर सधुक्कड़ी भाषा; संबोधन शैली।
पद 1: भाव – दोनों धर्मों के पाखंड पर प्रहार और सच्चे धर्म की खोज; शिल्प – व्यंग्य, विरोधाभास, लोक-शब्दों वाली सधुक्कड़ी, अनुप्रास, गेयता। पद 2: भाव – आत्मा की परमात्मा-मिलन की विरह-व्याकुलता, रहस्यवाद; शिल्प – दांपत्य रूपक, ‘ज्यों प्यासे को नीर’ की उपमा, अनुप्रास, ‘रे’ की आवृत्ति से लय और माधुर्य।
योग्यता-विस्तार
कबीर तथा अन्य निर्गुण संतों के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।
Answer
उत्तर
संत | जीवन-काल | प्रमुख विचार/रचनाएँ |
|---|---|---|
कबीर | 1398–1518, काशी | निर्गुण राम, आडंबर-विरोध, हिंदू-मुस्लिम एकता; साखी, सबद, रमैनी – बीजक, कबीर ग्रंथावली |
रैदास (रविदास) | 15वीं सदी, काशी | जाति-भेद का विरोध, मन की पवित्रता – “मन चंगा तो कठौती में गंगा”; कुछ पद गुरु ग्रंथ साहिब में |
गुरु नानक | 1469–1539, तलवंडी | सिख धर्म के संस्थापक; एक ओंकार, नाम-स्मरण, सेवा, समानता; जपुजी |
दादू दयाल | 1544–1603, राजस्थान | निर्गुण भक्ति, सद्गुरु-महिमा, सांप्रदायिक सद्भाव; दादू पंथ, दादू वाणी |
सुंदरदास | 1596–1689 | दादू के शिष्य; शास्त्रज्ञ संत कवि; सुंदर विलास |
मलूकदास | 1574–1682 | “अजगर करै न चाकरी…” दोहा प्रसिद्ध |
धर्मदास | 15वीं–16वीं सदी | कबीर के शिष्य; कबीर-पंथ का प्रसार |
सामान्य विशेषताएँ: निर्गुण-निराकार ईश्वर, गुरु की महिमा, मूर्तिपूजा-कर्मकांड-जाति-भेद का विरोध, नाम-स्मरण, प्रेम-भक्ति, सधुक्कड़ी भाषा, सामाजिक समरसता।
कबीर, रैदास, गुरु नानक, दादू दयाल, सुंदरदास, मलूकदास आदि निर्गुण संतों ने निराकार ईश्वर, गुरु-महिमा, नाम-स्मरण और प्रेम-भक्ति का संदेश देकर कर्मकांड, मूर्तिपूजा और जाति-भेद का विरोध किया और सधुक्कड़ी भाषा में रचनाएँ कीं।
कबीर के पद लोकगीत और शास्त्रीय परंपरा में समान रूप से लोकप्रिय हैं और गाए जाते हैं। कुमार गंधर्व, प्रहलाद सिंह टिपानिया, भारती बंधु जैसे गायकों के कैसेट्स अपने विद्यालय में मँगवाकर सुनिए और सुनाइए।
Answer
उत्तर
(यह गतिविधि है।)
- कुमार गंधर्व – शास्त्रीय शैली में निर्गुणी भजन: “उड़ जाएगा हंस अकेला”, “सुनता है गुरु ज्ञानी”, “झीनी झीनी बीनी चदरिया”।
- प्रहलाद सिंह टिपानिया – मालवा की लोक-शैली में तंबूरा, मंजीरा, ढोलक, करताल के साथ कबीर-भजन।
- भारती बंधु – रायपुर के, सूफ़ियाना और लोक अंदाज़ में कबीर-गायन।
कैसे करें: इन गायकों की रिकॉर्डिंग आज आकाशवाणी/प्रसार भारती अभिलेखागार, ‘कबीर प्रोजेक्ट’ (शबनम विरमानी), यूट्यूब और संगीत ऐप पर उपलब्ध हैं; विद्यालय के पुस्तकालय/स्मार्ट क्लास में इन्हें सुनाकर प्रातःकालीन सभा में पाठ्यपुस्तक के पदों का सामूहिक गायन भी करवाया जा सकता है। CIET-NCERT का कबीर पर बना श्रव्य-दृश्य कार्यक्रम भी देखें।
कुमार गंधर्व (शास्त्रीय निर्गुणी), प्रहलाद सिंह टिपानिया (मालवी लोक) और भारती बंधु (सूफ़ियाना) की कबीर-भजन रिकॉर्डिंग ऑनलाइन अभिलेखागारों से मँगवाकर विद्यालय में सुनें-सुनाएँ और पाठ के पदों का सामूहिक गायन करें।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ हिंदू-मुसलमान दोनों के पाखंड पर प्रहार (प्रश्न 1, 2, 3, 4)
- ☒ विरह और रहस्यवाद (प्रश्न 5, 6, 7, 8)
- ☒ भाव-शिल्प सौंदर्य (प्रश्न 9)
- ☒ निर्गुण संत और गायन-परंपरा (प्रश्न 10, 11)