Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XI | Hindi | Aroh (NCERT) | 4 – विदाई-संभाषण | 2026-27 | 12 of 12 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | बालमुकुंद गुप्त (1865–1907), ‘भारतमित्र’ के संपादक |
विधा | व्यंग्य (शिवशंभु के चिट्ठे से) |
संदर्भ | वायसराय लॉर्ड कर्ज़न (1899–1905) की विदाई; बंग-भंग (1905); सेना-सदस्य की नियुक्ति के विवाद पर इस्तीफ़ा |
विषय | कर्ज़न की निरंकुशता, ज़िद और प्रजा की उपेक्षा पर तीखा व्यंग्य; भारतीयों की बेबसी |
शैली | संबोधन शैली (‘माइ लॉर्ड’), व्यंग्य, मुहावरेदार भारतेंदुयुगीन हिंदी |
अभ्यास – पाठ के साथ
शिवशंभु की दो गायों की कहानी के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
Answer
उत्तर
शिवशंभु के पास दो गायें थीं – एक बलवान, जो कमज़ोर गाय को टक्कर मारकर गिरा देती थी। एक दिन बलवान गाय पुरोहित को दे दी गई, तो दुर्बल गाय प्रसन्न होने के बजाय उस दिन भूखी खड़ी रही, उसने चारा तक नहीं छुआ।
इस कहानी से लेखक कहना चाहता है कि भारत में बिछड़ने का दुख पशुओं तक को होता है, तो मनुष्यों का क्या कहना। कर्ज़न ने भारतीयों को बहुत सताया (जैसे बलवान गाय ने कमज़ोर को), फिर भी उनके जाते समय भारतीयों के मन में विषाद और करुणा है। यह भारतीयों की सहृदयता, क्षमाशीलता और भावुकता को दर्शाता है – साथ ही कर्ज़न पर व्यंग्य भी है कि वे सताने वाले थे।
भारत में पशु भी बिछड़ते समय दुखी होते हैं; इसी तरह कर्ज़न के अत्याचारों के बावजूद भारतीय उदार हृदय होने के कारण उनकी विदाई पर दुखी हैं।
‘आठ करोड़ प्रजा के गिड़गिड़ाकर विच्छेद न करने की प्रार्थना पर आपने ज़रा भी ध्यान नहीं दिया’ – यहाँ किस ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया गया है?
Answer
उत्तर
यहाँ बंगाल-विभाजन (बंग-भंग), 1905 की ओर संकेत है। लॉर्ड कर्ज़न ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत बंगाल को दो भागों – पूर्वी बंगाल (असम सहित, मुस्लिम-बहुल) और पश्चिमी बंगाल – में बाँट दिया। बंगाल की लगभग आठ करोड़ जनता ने विभाजन न करने की प्रार्थना की, विरोध-सभाएँ हुईं, पर कर्ज़न ने ज़िद में किसी की नहीं सुनी। इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन चला।
1905 के बंगाल-विभाजन (बंग-भंग) की ओर, जिसे कर्ज़न ने प्रजा की प्रार्थना ठुकराकर लागू किया।
कर्ज़न को इस्तीफ़ा क्यों देना पड़ गया?
Answer
उत्तर
कर्ज़न अपनी पसंद के एक फ़ौजी अफ़सर को कौंसिल में (सैनिक आपूर्ति सदस्य के) पद पर नियुक्त करवाना चाहते थे। इस पर जंगी लाट (सेनाध्यक्ष लॉर्ड किचनर) से उनका विवाद हुआ। इंग्लैंड की सरकार ने कर्ज़न की बात नहीं मानी। कर्ज़न ने बार-बार इस्तीफ़े की धमकी दी, अंत में गुस्से में इस्तीफ़ा दे दिया, जो स्वीकार कर लिया गया। लेखक व्यंग्य करता है – “उनका रखाया एक आदमी नौकर न रखा, उलटा उन्हीं को निकल जाने का हुक्म मिला!”
अपनी पसंद के फ़ौजी अफ़सर को इच्छित पद पर नियुक्त न करा पाने (जंगी लाट से विवाद में हार) से क्षुब्ध होकर उन्होंने इस्तीफ़ा दिया, जो मंज़ूर हो गया।
‘विचारिए तो, क्या शान आपकी इस देश में थी और अब क्या हो गई! कितने ऊँचे होकर आप कितने नीचे गिरे!’ – आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
ऊँचाई: दिल्ली-दरबार में कर्ज़न की शान अलिफ़ लैला के अलहदीन और अबुल हसन से भी बढ़कर थी। उनकी और उनकी पत्नी की कुर्सी सोने की थी, जबकि सम्राट के भाई की चाँदी की। सब रईसों ने पहले उन्हें सलाम किया; जुलूस में उनका हाथी सबसे आगे और ऊँचा था। ईश्वर और सम्राट एडवर्ड के बाद देश में उन्हीं का दर्जा था। राजा-महाराजा उनके इशारे पर नाचते थे।
पतन: पर अंत में जंगी लाट से विवाद में उन्हें पटखनी खानी पड़ी; अपनी पसंद का एक अफ़सर तक नियुक्त न करा सके; इस्तीफ़े की धमकी बेकार गई और उन्हें इस्तीफ़ा देकर अपमानित होकर जाना पड़ा।
आशय: लेखक व्यंग्य करता है कि घमंड और ज़िद के कारण कर्ज़न शक्ति और सम्मान के शिखर से गिरकर अपमान की गहराई में पहुँच गए। सत्ता स्थायी नहीं होती।
दिल्ली-दरबार में सर्वोच्च शान-शौकत वाले कर्ज़न अपनी ज़िद और अहंकार के कारण एक अफ़सर की नियुक्ति तक न करा सके और अपमानित होकर इस्तीफ़ा देना पड़ा – यह उनके उत्कर्ष से पतन पर व्यंग्य है।
‘आपके और यहाँ के निवासियों के बीच में कोई तीसरी शक्ति और भी है’ – यहाँ तीसरी शक्ति किसे कहा गया है?
Answer
उत्तर
कर्ज़न स्वयं को भारत का चिरस्थायी वायसराय समझते थे; भारतवासी भी नहीं सोचते थे कि उनका शासन इतनी जल्दी खत्म होगा। फिर भी वह अचानक समाप्त हो गया। इससे लेखक मानता है कि दोनों के ऊपर कोई तीसरी शक्ति – ईश्वर, नियति या विधाता – है, जिस पर न भारतवासियों का वश है, न कर्ज़न का। पाठ में आगे भी कहा गया है कि “परदे के पीछे एक और ही लीलामय की लीला हो रही है।”
(व्यंग्यार्थ में इसका संकेत इंग्लैंड की ब्रिटिश सरकार की ओर भी माना जाता है, जिसने कर्ज़न की बात न मानकर उनका इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया।)
तीसरी शक्ति ईश्वर/नियति है, जिस पर न कर्ज़न का वश है न प्रजा का (व्यंग्य में इंग्लैंड की ब्रिटिश सरकार का भी संकेत)।
अभ्यास – पाठ के आस-पास
पाठ का यह अंश शिवशंभु के चिट्ठे से लिया गया है। शिवशंभु नाम की चर्चा पाठ में भी हुई है। बालमुकुंद गुप्त ने इस नाम का उपयोग क्यों किया होगा?
Answer
उत्तर
- उस समय अंग्रेज़ी सरकार ने प्रेस पर कड़ी पाबंदियाँ लगा रखी थीं। सीधे अपने नाम से वायसराय की आलोचना करना ख़तरनाक था। इसलिए गुप्त जी ने ‘शिवशंभु शर्मा’ नामक एक भंगड़, मस्तमौला ब्राह्मण का कल्पित पात्र (छद्मनाम) गढ़ा।
- इस पात्र के माध्यम से वे व्यंग्य, हास्य और भोलेपन की आड़ में शासन की कड़ी आलोचना कर सकते थे।
- ‘शिवशंभु’ नाम भारतीय जनमानस के निकट था, जिससे आम पाठक स्वयं को उससे जोड़ सके और वह आम भारतीय की आवाज़ बन गया।
प्रेस पर पाबंदी के दौर में सीधी आलोचना के ख़तरे से बचने और एक आम भारतीय की आवाज़ में व्यंग्यपूर्वक शासन की आलोचना करने के लिए गुप्त जी ने ‘शिवशंभु’ नामक कल्पित पात्र का उपयोग किया।
‘नादिर से भी बढ़कर आपकी जिद्द है’ – कर्ज़न के संदर्भ में क्या आपको यह बात सही लगती है? पक्ष या विपक्ष में तर्क दीजिए।
Answer
उत्तर
पक्ष में (सही है)
- क्रूर नादिरशाह ने दिल्ली में कत्लेआम करवाया, पर आसिफ़जाह के तलवार गले में डालकर प्रार्थना करने पर उसने तुरंत कत्लेआम रोक दिया।
- कर्ज़न से आठ करोड़ लोगों ने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की कि बंगाल का विभाजन न करें, पर उन्होंने ज़रा भी ध्यान नहीं दिया; कार्यकाल पूरा होने पर भी बंग-भंग किए बिना जाना उन्हें मंज़ूर नहीं था।
- उन्होंने कभी प्रजा की बात नहीं सुनी – प्रेस पर पाबंदी, शिक्षा-नीति, कौंसिल में ‘बेकानूनी कानून’ पास करना।
इसलिए कर्ज़न की ज़िद नादिरशाह से भी बढ़कर थी – यह कथन उचित है।
विपक्ष में (कुछ अतिशयोक्ति): नादिरशाह ने हज़ारों निर्दोषों का खून बहाया, जबकि कर्ज़न ने प्रत्यक्ष कत्लेआम नहीं किया; उनके समय में कुछ प्रशासनिक सुधार और पुरातत्व-संरक्षण भी हुआ। अतः तुलना व्यंग्यात्मक अतिशयोक्ति है।
निष्कर्ष: फिर भी ‘ज़िद’ के मामले में – प्रजा की प्रार्थना ठुकराने में – कर्ज़न सचमुच नादिरशाह से आगे थे।
हाँ, यह सही लगता है – नादिरशाह ने प्रार्थना पर कत्लेआम रोक दिया था, पर कर्ज़न ने आठ करोड़ प्रजा की प्रार्थना ठुकराकर बंग-भंग किया; यद्यपि क्रूरता में तुलना अतिशयोक्तिपूर्ण है, ज़िद में कर्ज़न आगे थे।
‘क्या आँख बंद करके मनमाने हुक्म चलाना और किसी की कुछ न सुनने का नाम ही शासन है?’ – इन पंक्तियों को ध्यान में रखते हुए शासन क्या है? इस पर चर्चा कीजिए।
Answer
उत्तर
शासन का अर्थ केवल हुक्म चलाना नहीं, बल्कि प्रजा के हित में व्यवस्था चलाना है। अच्छे शासन की विशेषताएँ:
- जनहित: प्रजा की भलाई, सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार शासन का लक्ष्य हो।
- जनता की सुनवाई: शासक प्रजा की शिकायतें और सुझाव सुने; निर्णयों में उनकी राय शामिल हो।
- कानून का राज और न्याय: सबके लिए समान कानून, निष्पक्ष न्याय।
- पारदर्शिता और जवाबदेही: शासक अपने कार्यों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी हो।
- स्वतंत्रता: अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी।
- विनम्रता और लचीलापन: ग़लत निर्णय को ज़िद छोड़कर बदलने की क्षमता।
कर्ज़न का शासन इसके उलट निरंकुश, ज़िद्दी और प्रजा-विरोधी था। लोकतंत्र में शासन “जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा” होता है – यही सच्चा शासन है।
सच्चा शासन मनमाने हुक्म नहीं, बल्कि प्रजा की बात सुनकर, न्याय, पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित के साथ व्यवस्था चलाना है; कर्ज़न का निरंकुश शासन इसके विपरीत था।
इस पाठ में आए अलिफ़ लैला, अलहदीन, अबुल हसन और बगदाद के खलीफ़ा के बारे में सूचना एकत्रित कर कक्षा में चर्चा कीजिए।
Answer
उत्तर
नाम | जानकारी |
|---|---|
अलिफ़ लैला | अरबी कथा-संग्रह ‘अलिफ़ लैला व लैला’ (एक हज़ार एक रातें / अरेबियन नाइट्स)। रानी शहरज़ाद बादशाह शहरयार को हर रात एक कहानी सुनाकर अपनी जान बचाती है। |
अलहदीन (अलादीन) | अलिफ़ लैला की प्रसिद्ध कहानी का नायक, जिसे जादुई चिराग़ मिलता है; चिराग़ रगड़ने पर जिन्न प्रकट होकर उसकी हर इच्छा पूरी करता है और वह अपार धन-वैभव पाता है। |
अबुल हसन | अलिफ़ लैला की कहानी का पात्र – एक साधारण व्यक्ति जिसे खलीफ़ा हारून-अल-रशीद ने मज़ाक में बेहोश करवाकर एक दिन के लिए खलीफ़ा की गद्दी पर बैठा दिया; आँख खुलने पर उसने स्वयं को खलीफ़ा के वैभव में पाया। |
बगदाद का खलीफ़ा | अब्बासी वंश का शासक हारून-अल-रशीद (8वीं–9वीं सदी), जिसके दरबार की शान-शौकत और न्यायप्रियता की अनेक कथाएँ अलिफ़ लैला में हैं। |
लेखक ने इनका उल्लेख कर व्यंग्य किया है कि कर्ज़न ने दिल्ली-दरबार में जो शान देखी, वह इन कथाओं के पात्रों ने भी नहीं देखी थी।
अलिफ़ लैला अरबी कथा-संग्रह है; अलहदीन जादुई चिराग़ वाला नायक; अबुल हसन एक दिन के लिए खलीफ़ा बना साधारण व्यक्ति; बगदाद का खलीफ़ा हारून-अल-रशीद – इनसे कर्ज़न के दिल्ली-दरबार की अतुलनीय शान पर व्यंग्य किया गया है।
गौर करने की बात – निम्नलिखित अंशों का आशय स्पष्ट कीजिए:
क. इससे आपका जाना भी परंपरा की चाल से कुछ अलग नहीं है, तथापि आपके शासनकाल का नाटक घोर दुखांत है, और अधिक आश्चर्य की बात यह है कि दर्शक तो क्या, स्वयं सूत्रधार भी नहीं जानता था कि उसने जो खेल सुखांत समझकर खेलना आरंभ किया था, वह दुखांत हो जावेगा।
ख. यहाँ की प्रजा ने आपकी जिद्द का फल यहीं देख लिया। उसने देख लिया कि आपकी जिस जिद्द ने इस देश की प्रजा को पीड़ित किया, आपको भी उसने कम पीड़ा न दी, यहाँ तक कि आप स्वयं उसका शिकार हुए।
Answer
उत्तर
क. भारत में पहले भी अनेक वायसराय आए और कार्यकाल पूरा होने पर चले गए; कर्ज़न का जाना भी उसी परंपरा जैसा है। पर उनके शासन को लेखक नाटक के रूपक से समझाता है – यह नाटक दुखांत (दुखद अंत वाला) रहा। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नाटक के सूत्रधार (स्वयं कर्ज़न) ने इसे सुखांत (सफलता और यश) समझकर शुरू किया था – उन्होंने सोचा था कि भारत को ऐसा कर जाएँगे कि बाद के वायसरायों को कुछ न करना पड़े – पर अंत अपमानजनक इस्तीफ़े और प्रजा में अशांति के साथ हुआ। मनुष्य अपनी योजना बनाता है, पर परिणाम उसके वश में नहीं।
ख. कर्ज़न की ज़िद (बंग-भंग, प्रजा की उपेक्षा) ने भारतीयों को बहुत पीड़ा दी। पर वही ज़िद अंततः उनके अपने लिए भी घातक सिद्ध हुई – जंगी लाट से विवाद में ज़िद करने के कारण उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा। प्रजा ने देख लिया कि बुरे कर्मों का फल यहीं मिल जाता है; ज़िद करने वाला स्वयं अपनी ज़िद का शिकार हो जाता है।
क. कर्ज़न का शासन ऐसा नाटक है जिसे उन्होंने सुखांत समझकर शुरू किया, पर अंत अपमान और अशांति वाला दुखांत हुआ। ख. जिस ज़िद से उन्होंने प्रजा को सताया, उसी ज़िद के कारण उन्हें स्वयं इस्तीफ़ा देकर अपमानित होना पड़ा।
अभ्यास – भाषा की बात
‘वे दिन-रात यही मनाते थे कि जल्द श्रीमान् यहाँ से पधारें।’ सामान्य तौर पर आने के लिए ‘पधारें’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ ‘पधारें’ शब्द का क्या अर्थ है?
Answer
उत्तर
यहाँ ‘पधारें’ का अर्थ है चले जाएँ / विदा हो जाएँ / प्रस्थान करें। सामान्यतः ‘पधारना’ आदरपूर्वक आने के अर्थ में आता है, पर यहाँ ‘यहाँ से पधारें’ कहकर लेखक ने व्यंग्य किया है – भारतवासी आदर के शब्दों में ही यह चाहते थे कि कर्ज़न जल्दी-से-जल्दी भारत छोड़कर चले जाएँ।
यहाँ ‘पधारें’ का अर्थ ‘चले जाएँ/विदा हों’ है – यह व्यंग्यपूर्ण प्रयोग है।
पाठ में से कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं, जिनमें भाषा का विशिष्ट प्रयोग (भारतेंदु युगीन हिंदी) हुआ है। उन्हें सामान्य हिंदी में लिखिए –
क. आगे भी इस देश में जो प्रधान शासक आए, अंत को उनको जाना पड़ा।
ख. आप किस को आए थे और क्या कर चले?
ग. उनका रखाया एक आदमी नौकर न रखा।
घ. पर आशीर्वाद करता हूँ कि तू फिर उठे और अपने प्राचीन गौरव और यश को फिर से लाभ करे।
Answer
उत्तर
भारतेंदुयुगीन प्रयोग | सामान्य हिंदी |
|---|---|
क. आगे भी इस देश में जो प्रधान शासक आए, अंत को उनको जाना पड़ा। | पहले भी इस देश में जो प्रधान शासक आए, अंत में उन्हें जाना पड़ा। |
ख. आप किस को आए थे और क्या कर चले? | आप किसलिए आए थे और क्या करके जा रहे हैं? |
ग. उनका रखाया एक आदमी नौकर न रखा। | उनके द्वारा सुझाए गए एक आदमी को भी नौकरी पर नहीं रखा गया। |
घ. पर आशीर्वाद करता हूँ कि तू फिर उठे और अपने प्राचीन गौरव और यश को फिर से लाभ करे। | पर मैं आशीर्वाद देता हूँ कि तू फिर उठे और अपने प्राचीन गौरव और यश को फिर से प्राप्त करे। |
क. पहले भी… अंत में उन्हें जाना पड़ा। ख. आप किसलिए आए थे और क्या करके जा रहे हैं? ग. उनके कहे एक आदमी को भी नौकरी पर नहीं रखा गया। घ. …आशीर्वाद देता हूँ कि तू… गौरव और यश फिर से प्राप्त करे।
उत्तर
विषय-सूची की जाँच
- ☒ कर्ज़न का शासन, बंग-भंग और इस्तीफ़ा (प्रश्न 2, 3, 4, 7)
- ☒ बिछड़न, गायों की कहानी और तीसरी शक्ति (प्रश्न 1, 5, 10)
- ☒ शिवशंभु, शासन पर विचार, संदर्भ (प्रश्न 6, 8, 9)
- ☒ भाषा की बात (प्रश्न 11, 12)