Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
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XI | Hindi | Aroh (NCERT) | 13 – गज़ल | 2026-27 | 6 of 6 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवि | दुष्यंत कुमार (1933–1975) |
स्रोत | गज़ल-संग्रह साये में धूप |
विषय | आज़ादी के बाद के सपनों का टूटना; राजनीति और व्यवस्था से मोहभंग; शोषित जनता की सहनशीलता पर व्यंग्य; बदलाव की बेचैनी |
प्रमुख शेर | “कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए”; “न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे”; “तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की” |
शिल्प | हिंदी-उर्दू मिश्रित सहज भाषा; मतला, काफ़िया (‘घर’, ‘शहर’, ‘उम्र भर’), रदीफ़ (‘के लिए’); प्रतीकात्मकता और व्यंग्य |
अभ्यास – गज़ल के साथ
आखिरी शेर में गुलमोहर की चर्चा हुई है। क्या उसका आशय एक खास तरह के फूलदार वृक्ष से है या उसमें कोई सांकेतिक अर्थ निहित है? समझाकर लिखें।
Answer
उत्तर
शेर: “जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले, / मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।”
यहाँ गुलमोहर केवल एक फूलदार वृक्ष नहीं है; इसका सांकेतिक अर्थ है। गुलमोहर सुख, सम्मान, सौंदर्य, स्वाभिमान और आदर्शपूर्ण जीवन (मानवीय मूल्यों) का प्रतीक है। कवि कहता है कि हम जिएँ तो अपने घर-देश में स्वाभिमान और सुकून से, अपने मूल्यों की छाया में; और यदि मरना पड़े तो दूसरों के लिए भी इन्हीं मूल्यों (न्याय, सुंदरता, सुख) की रक्षा करते हुए मरें। अर्थात् जीवन अपने आदर्शों के अनुसार हो और मृत्यु भी किसी ऊँचे उद्देश्य, परोपकार या बलिदान के लिए हो।
गुलमोहर यहाँ सांकेतिक है – सुख, स्वाभिमान, सौंदर्य और मानवीय आदर्शों का प्रतीक; कवि चाहता है कि जीवन अपने आदर्शों की छाया में बीते और मृत्यु भी दूसरों के लिए इन्हीं मूल्यों की रक्षा में हो।
पहले शेर में ‘चिराग’ शब्द एक बार बहुवचन में आया है और दूसरी बार एकवचन में। अर्थ एवं काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से इसका क्या महत्व है?
Answer
उत्तर
शेर: “कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए, / कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।”
अर्थ: आज़ादी के समय नेताओं ने वादा किया था (तय था) कि हर घर को अनेक चिराग (चिरागाँ – बहुवचन) अर्थात् भरपूर सुख-सुविधाएँ, रोशनी और समृद्धि मिलेगी। पर आज हाल यह है कि पूरे शहर के लिए एक चिराग (एकवचन) भी उपलब्ध नहीं है – यानी बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं मिल रहीं।
काव्य-सौंदर्य
- बहुवचन और एकवचन के विरोधाभास से वादों और वास्तविकता के बीच की गहरी खाई प्रभावशाली ढंग से उभरती है।
- ‘हरेक घर’ और ‘शहर’ का विरोध भी इसी अंतर को और तीखा करता है।
- चिराग सुख-सुविधा, विकास और आशा का प्रतीक है।
- इसमें व्यवस्था और राजनीति पर तीखा व्यंग्य है।
‘चिरागाँ’ (बहुवचन) हर घर के लिए भरपूर सुख-सुविधा के वादे का और ‘चिराग’ (एकवचन) पूरे शहर के लिए एक दीपक भी न मिलने की हकीकत का सूचक है; यह विरोधाभास वादों और यथार्थ की खाई तथा व्यवस्था पर व्यंग्य को प्रभावशाली बनाता है।
गज़ल के तीसरे शेर को गौर से पढ़ें। यहाँ दुष्यंत का इशारा किस तरह के लोगों की ओर है?
Answer
उत्तर
शेर: “न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे, / ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।”
यहाँ दुष्यंत का इशारा देश के उन गरीब, शोषित, अभावग्रस्त और सहनशील (संतोषी) लोगों की ओर है, जो तन ढकने को कमीज़ न होने पर भी शिकायत नहीं करते, बल्कि पाँव मोड़कर पेट ढक लेते हैं। वे हर अभाव और अन्याय को चुपचाप सह लेते हैं, विरोध नहीं करते।
कवि व्यंग्य करता है कि ऐसे लोग शासकों के ‘इस सफ़र’ (शोषण की राजनीति) के लिए बिलकुल उपयुक्त (मुनासिब) हैं – क्योंकि वे सवाल नहीं पूछते। इसमें जनता की निष्क्रियता पर दुख भी है और व्यवस्था की संवेदनहीनता पर चोट भी।
इशारा उन गरीब, अभावग्रस्त, सहनशील लोगों की ओर है जो कमीज़ न होने पर पाँवों से पेट ढक लेते हैं पर शिकायत या विरोध नहीं करते – व्यंग्य है कि ऐसे लोग शासकों की शोषक व्यवस्था के लिए बिलकुल ‘उपयुक्त’ हैं।
आशय स्पष्ट करें: “तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की, / ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।”
Answer
उत्तर
आशय: कवि सत्ता (शासक) को संबोधित करते हुए व्यंग्य करता है – “यह तेरा राज (निज़ाम) है, तू चाहे तो शायर की ज़ुबान सिल दे (उसकी अभिव्यक्ति पर रोक लगा दे)।” शासक को ऐसी ‘सावधानी’ (एहतियात) ज़रूरी लगती है, क्योंकि शायर की गज़ल (बहर – छंद) में व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठती है, जो जनता को जगा सकती है।
- इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाली सत्ता पर तीखा व्यंग्य है।
- ‘बहर’ का अर्थ छंद है, और व्यंजना से वह कविता/विद्रोह की लय भी है – सत्ता को डर है कि कवि की यह लय जनता में क्रांति की लहर पैदा कर देगी।
- यह आपातकाल जैसे दौर में कवियों-लेखकों पर लगी पाबंदियों की ओर भी संकेत है।
- साथ ही यह कवि की निडरता भी दिखाता है – वह जानता है कि उसकी ज़ुबान सिली जा सकती है, फिर भी सच कहता है।
कवि शासक पर व्यंग्य करता है कि तेरा राज है, तू शायर की ज़ुबान सिल दे – क्योंकि उसकी कविता (बहर) सत्ता के विरुद्ध जनता को जगाती है; यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाली सत्ता पर चोट और कवि की निडरता का परिचय है।
अभ्यास – गज़ल के आस-पास
दुष्यंत की इस गज़ल का मिज़ाज बदलाव के पक्ष में है। इस कथन पर विचार करें।
Answer
उत्तर
यह कथन पूरी तरह सही है। गज़ल का हर शेर व्यवस्था से असंतोष और बदलाव की बेचैनी व्यक्त करता है:
- पहला शेर – वादों (हर घर में चिरागाँ) और हकीकत (शहर में एक चिराग भी नहीं) का अंतर बताकर व्यवस्था की विफलता उजागर करता है।
- दूसरा शेर – “दरख्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहाँ से चलें” – जहाँ रक्षक ही कष्ट दें, उस व्यवस्था को छोड़ नई राह खोजने का आह्वान।
- तीसरा शेर – चुपचाप सहने वाली जनता पर व्यंग्य कर उसे जगाने का प्रयास।
- पाँचवाँ शेर – “वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए” – कवि सत्ता के पत्थर-दिल को पिघलाने और अपनी आवाज़ को प्रभावी बनाने के लिए बेचैन है।
- छठा शेर – शायर की ज़ुबान सिलने वाली सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध।
- अंतिम शेर – आदर्शों के लिए जीने-मरने का संकल्प।
इस प्रकार गज़ल यथास्थिति के विरुद्ध और परिवर्तन के पक्ष में खड़ी है; यही कारण है कि दुष्यंत की गज़लें आंदोलनों में नारों की तरह गाई गईं।
सही है – गज़ल वादाखिलाफ़ी, शोषक व्यवस्था, जनता की चुप्पी और अभिव्यक्ति पर पाबंदी पर चोट करती है और “मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए” जैसे शेरों से परिवर्तन की बेचैनी व्यक्त करती है।
“हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन / दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है” – दुष्यंत की गज़ल का चौथा शेर पढ़ें और बताएँ कि ग़ालिब के उपर्युक्त शेर से वह किस तरह जुड़ता है?
Answer
उत्तर
दुष्यंत का चौथा शेर: “खुदा नहीं, न सही, आदमी का ख्वाब सही, / कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।”
समानता
- दोनों शेरों में यथार्थ जानते हुए भी कल्पना/सपने को मन बहलाने का साधन माना गया है।
- ग़ालिब जानते हैं कि जन्नत (स्वर्ग) की हकीकत कुछ नहीं, फिर भी उसका खयाल दिल को खुश रखने के लिए अच्छा है।
- दुष्यंत कहते हैं कि खुदा (ईश्वर) न सही, पर आदमी का कोई सुंदर सपना ही सही – कम-से-कम आँखों को देखने के लिए कोई हसीन नज़ारा तो है।
- दोनों में जीवन की कठोर वास्तविकता के बीच आशा और कल्पना का सहारा है।
अंतर: ग़ालिब का खयाल धार्मिक-आध्यात्मिक (जन्नत) है, जबकि दुष्यंत का ख्वाब मानवीय और सामाजिक (बेहतर दुनिया का सपना) है – जो बदलाव की प्रेरणा भी देता है।
दोनों शेर यथार्थ जानते हुए भी सपने/कल्पना को मन को सुख देने वाला मानते हैं – ग़ालिब के लिए जन्नत का खयाल और दुष्यंत के लिए खुदा न सही, आदमी का सुंदर ख्वाब; अंतर यह है कि दुष्यंत का सपना मानवीय और परिवर्तनकारी है।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ प्रतीक और सांकेतिक अर्थ (प्रश्न 1, 2)
- ☒ शोषित जनता और सत्ता पर व्यंग्य (प्रश्न 3, 4)
- ☒ बदलाव का मिज़ाज और ग़ालिब से तुलना (प्रश्न 5, 6)