Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XI | Hindi | Aroh (NCERT) | 14 – अक्क के वचन | 2026-27 | 6 of 6 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवयित्री | अक्कमहादेवी (12वीं सदी), कर्नाटक की वीरशैव संत; अनुवाद – केदारनाथ सिंह |
आराध्य | चन्नमल्लिकार्जुन (शिव) |
पहला वचन | भूख, प्यास, नींद, क्रोध, मोह, लोभ, मद, ईर्ष्या – इंद्रियों और विकारों को प्रेम-भरी मनुहार से नियंत्रण का संदेश; चराचर से अवसर न चूकने का आग्रह |
दूसरा वचन | ‘जूही के फूल जैसे ईश्वर’ से भीख माँगने की स्थिति की कामना – अहंकार और भौतिक मोह का पूर्ण नाश, पूर्ण समर्पण |
विशेष | स्त्री-मुक्ति और भक्ति आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना; संबोधन शैली, सहज भाषा |
अभ्यास – कविता के साथ
‘लक्ष्य प्राप्ति में इंद्रियाँ बाधक होती हैं’ – इसके संदर्भ में अपने तर्क दीजिए।
Answer
उत्तर
- ध्यान भटकाती हैं: इंद्रियाँ मनुष्य को बाहरी सुखों – स्वाद, आराम, मनोरंजन – की ओर खींचती हैं, जिससे वह लक्ष्य से भटक जाता है। जैसे परीक्षा की तैयारी के समय मोबाइल, टीवी या अधिक नींद।
- विकार पैदा करती हैं: इंद्रियों से जुड़े क्रोध, मोह, लोभ, मद और ईर्ष्या मन को अशांत करते हैं; अशांत मन सही निर्णय नहीं ले पाता।
- कभी तृप्त नहीं होतीं: भूख-प्यास और इच्छाएँ बार-बार उठती हैं; उनके पीछे भागने वाला कभी स्थिर होकर साधना नहीं कर सकता।
- आलस्य और प्रमाद: नींद और आराम की चाह परिश्रम से रोकती है।
अक्कमहादेवी इसीलिए इंद्रियों को प्रेम से समझाती हैं कि वे बाधा न बनें। इंद्रियों का दमन नहीं, संयम और नियंत्रण ही लक्ष्य – चाहे ईश्वर-प्राप्ति हो या सांसारिक सफलता – तक पहुँचाता है। (गीता में भी कहा गया है – जिसकी इंद्रियाँ वश में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।)
इंद्रियाँ बाहरी सुखों की ओर खींचकर ध्यान भटकाती हैं, क्रोध-मोह-लोभ जैसे विकार पैदा कर मन अशांत करती हैं, कभी तृप्त नहीं होतीं और आलस्य लाती हैं; इसलिए उनका संयम लक्ष्य-प्राप्ति के लिए आवश्यक है।
‘ओ चराचर! मत चूक अवसर’ – इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
चराचर का अर्थ है – जड़ और चेतन, अर्थात् संपूर्ण सृष्टि के सभी प्राणी। अक्कमहादेवी कहती हैं कि मैं चन्नमल्लिकार्जुन (शिव) का संदेश लेकर आई हूँ। हे संसार के प्राणियो! यह मनुष्य-जीवन और ईश्वर-भक्ति का अवसर बहुत दुर्लभ है। इसे सांसारिक मोह-माया, भूख-प्यास, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या जैसी इंद्रिय-वासनाओं में उलझकर व्यर्थ न गँवाओ। इंद्रियों पर नियंत्रण करके ईश्वर की भक्ति में मन लगाओ और जीवन को सार्थक बनाओ, क्योंकि यह अवसर बार-बार नहीं मिलता।
हे संसार के प्राणियो! इंद्रियों और विकारों में उलझकर मनुष्य-जीवन और ईश्वर-भक्ति के इस दुर्लभ अवसर को व्यर्थ मत गँवाओ – इंद्रियों को वश में कर शिव की भक्ति करो।
ईश्वर के लिए किस दृष्टांत का प्रयोग किया गया है? ईश्वर और उसके साम्य का आधार बताइए।
Answer
उत्तर
ईश्वर के लिए ‘जूही के फूल’ का दृष्टांत (उपमा) प्रयोग किया गया है – “हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर।”
साम्य का आधार
- कोमलता: जूही का फूल अत्यंत कोमल होता है; ईश्वर भी भक्तों के प्रति कोमल हृदय और करुणामय है।
- सुगंध: जूही की सुगंध चारों ओर फैलती है और मन को प्रसन्न करती है; ईश्वर की कृपा भी सर्वत्र व्याप्त है और मन को आनंद देती है।
- शुद्धता और श्वेतता: जूही उज्ज्वल, सफ़ेद और पवित्र होती है; ईश्वर भी निर्मल और पवित्र है।
- सादगी: जूही छोटा, साधारण पर अत्यंत सुंदर फूल है; ईश्वर भी सरल भक्ति से प्रसन्न हो जाता है।
ईश्वर को ‘जूही के फूल’ जैसा कहा गया है; साम्य का आधार है – कोमलता (करुणा), सुगंध (सर्वव्यापी कृपा व आनंद), उज्ज्वलता-पवित्रता और सादगी।
‘अपना घर’ से क्या तात्पर्य है? इसे भूलने की बात क्यों कही गई है?
Answer
उत्तर
तात्पर्य: ‘अपना घर’ से तात्पर्य है – सांसारिक मोह-माया, घर-परिवार का बंधन, भौतिक सुख-सुविधाएँ, और सबसे बढ़कर ‘मैं’ का भाव (अहंकार)। यह व्यक्ति की सुरक्षा, पहचान और आसक्ति का प्रतीक है।
भूलने की बात क्यों: अक्कमहादेवी मानती हैं कि जब तक व्यक्ति घर और उससे जुड़े मोह, अहंकार तथा सांसारिक सुरक्षा से बँधा रहता है, तब तक वह ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण नहीं कर सकता। ईश्वर-प्राप्ति के लिए अहं का पूर्ण विसर्जन और सांसारिक बंधनों से मुक्ति आवश्यक है। इसलिए वे चाहती हैं कि ईश्वर ऐसा कुछ करें कि वे अपना घर पूरी तरह भूल जाएँ और केवल ईश्वर की होकर रहें। (उन्होंने स्वयं भी राजमहल और विवाह का त्याग किया था।)
‘अपना घर’ सांसारिक मोह, भौतिक सुख, परिवार के बंधन और अहंकार का प्रतीक है; इन्हें भूले बिना ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण संभव नहीं, इसलिए उसे भूलने की बात कही गई है।
दूसरे वचन में ईश्वर से क्या कामना की गई है और क्यों?
Answer
उत्तर
कामना: अक्कमहादेवी ईश्वर से प्रार्थना करती हैं कि –
- वे उनसे भीख मँगवाएँ – अर्थात् उन्हें पूरी तरह साधनहीन बना दें।
- वे अपना घर पूरी तरह भूल जाएँ।
- झोली फैलाएँ, पर भीख न मिले।
- कोई कुछ देने को हाथ बढ़ाए तो वह नीचे गिर जाए।
- और यदि वे उसे उठाने झुकें तो कोई कुत्ता झपटकर छीन ले जाए।
क्यों: वे ऐसी स्थिति चाहती हैं जिसमें उनका अहंकार (स्व) पूरी तरह नष्ट हो जाए। भीख माँगने से स्वाभिमान और ‘मैं’ का भाव मिटता है; भीख न मिलने से भौतिक वस्तुओं पर निर्भरता और लोभ समाप्त होता है। जब संसार की हर वस्तु से झोली खाली होगी, तभी वह ईश्वर की कृपा से भर सकेगी। यह पूर्ण वैराग्य, निस्पृहता और ईश्वर के प्रति संपूर्ण समर्पण की कामना है।
वे चाहती हैं कि ईश्वर उनसे भीख मँगवाएँ, घर भुला दें, भीख न मिले, मिले तो गिर जाए और कुत्ता छीन ले – ताकि उनका अहंकार और भौतिक मोह पूरी तरह नष्ट हो जाए और वे निस्पृह होकर पूर्णतः ईश्वर को समर्पित हो सकें।
अभ्यास – कविता के आस-पास
क्या अक्कमहादेवी को कन्नड़ की मीरा कहा जा सकता है? चर्चा करें।
Answer
उत्तर
हाँ, अक्कमहादेवी को ‘कन्नड़ की मीरा’ कहा जा सकता है, क्योंकि दोनों में अनेक समानताएँ हैं:
बिंदु | अक्कमहादेवी | मीराबाई |
|---|---|---|
आराध्य | चन्नमल्लिकार्जुन (शिव) को पति माना | गिरधर गोपाल (कृष्ण) को पति माना – “मेरो पति सोई” |
त्याग | राजा कौशिक से विवाह और राजमहल का त्याग | राजघराने और कुल-मर्यादा का त्याग |
सामाजिक बंधनों से विद्रोह | वस्त्र तक त्यागकर समाज की मान्यताओं को चुनौती दी | पर्दा प्रथा तोड़ी, संतों के साथ बैठीं, मंदिरों में नाचीं-गाईं |
भक्ति का स्वरूप | माधुर्य भाव, अनन्य समर्पण | माधुर्य भाव, अनन्य समर्पण |
स्त्री-चेतना | स्त्री-मुक्ति की प्रथम सर्जनात्मक आवाज़ | रूढ़ियों के विरुद्ध स्त्री-मुक्ति की आवाज़ |
अंत | श्रीशैलम में ईश्वर में लीन | द्वारका में कृष्ण में समाहित |
अंतर: अक्कमहादेवी मीरा से लगभग चार सौ वर्ष पहले (12वीं सदी) हुईं; वे वीरशैव (शिव) भक्त थीं और ‘वचन’ लिखे, जबकि मीरा कृष्ण-भक्त थीं और ‘पद’ गाए। अक्क का वैराग्य अधिक कठोर था।
इसलिए अधिक सटीक तो यह होगा कि मीरा को ‘हिंदी की अक्कमहादेवी’ कहा जाए, पर समानताओं के आधार पर अक्क को ‘कन्नड़ की मीरा’ कहना उचित है।
हाँ – दोनों ने ईश्वर को पति मानकर माधुर्य भक्ति की, राजसी जीवन और सामाजिक बंधनों का त्याग किया और स्त्री-मुक्ति की आवाज़ बनीं; अंतर केवल काल (अक्क 12वीं सदी), आराध्य (शिव/कृष्ण) और विधा (वचन/पद) का है।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ इंद्रिय-संयम (प्रश्न 1, 2)
- ☒ ईश्वर का दृष्टांत और समर्पण (प्रश्न 3, 4, 5)
- ☒ अक्कमहादेवी और मीरा (प्रश्न 6)