Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XI | Hindi | Aroh (NCERT) | 5 – गलता लोहा | 2026-27 | 14 of 14 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | शेखर जोशी (1932–2022) |
विधा | कहानी |
मुख्य पात्र | मोहन (पुरोहित वंशीधर तिवारी का मेधावी बेटा), धनराम (लोहार गंगाराम का बेटा), मास्टर त्रिलोक सिंह, रमेश |
कथानक | मेधावी मोहन पढ़ाई के लिए लखनऊ जाता है, पर रमेश के घर नौकर बनकर रह जाता है; तकनीकी स्कूल के बाद बेरोज़गार होकर गाँव लौटता है और धनराम की भट्टी पर बैठकर कुशलता से लोहे का छल्ला गढ़ता है |
संदेश | जातिगत भेदभाव का टूटना (लोहे की तरह गलना); श्रम और हुनर की गरिमा; शिक्षा-व्यवस्था और सपनों का यथार्थ |
अभ्यास – पाठ के साथ
कहानी के उस प्रसंग का उल्लेख करें, जिसमें किताबों की विद्या और घन चलाने की विद्या का ज़िक्र आया है।
Answer
उत्तर
मास्टर त्रिलोक सिंह ने धनराम को तेरह का पहाड़ा याद करने को दिया था। दिन भर रटने पर भी छुट्टी के समय सुनाते हुए वह तीसरी सीढ़ी पर ही लड़खड़ा गया। इस बार मास्टर जी ने बेंत के बजाय ज़बान का चाबुक चलाया – “तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें?” – और अपने थैले से पाँच-छह दराँतियाँ निकालकर उसे धार लगवाने के लिए दे दीं।
लेखक बताता है कि किताबों की विद्या का ताप लगाने की सामर्थ्य धनराम के पिता गंगाराम में नहीं थी। धनराम हाथ-पैर चलाने लायक हुआ ही था कि पिता ने उसे धौंकनी फूँकने और सान लगाने के कामों में लगा दिया, और धीरे-धीरे हथौड़े से लेकर घन चलाने की विद्या सिखा दी। इस तरह धनराम पढ़ाई छोड़कर पुश्तैनी लोहारी में लग गया।
तेरह का पहाड़ा न सुना पाने पर मास्टर त्रिलोक सिंह ने धनराम से कहा कि उसके दिमाग में लोहा भरा है; गरीब पिता उसे किताबों की विद्या न दिला सके और उसे घन चलाने की विद्या (लोहारी) सिखा दी।
धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी क्यों नहीं समझता था?
Answer
उत्तर
- जातिगत हीनता: बचपन से धनराम के मन में बैठा दी गई जातिगत हीनता के कारण वह मानता था कि मोहन (ब्राह्मण) का आगे रहना उसका अधिकार ही है।
- मोहन कक्षा का सबसे मेधावी छात्र और मास्टर जी का प्रिय था; मास्टर जी कहते थे कि मोहन एक दिन बड़ा आदमी बनकर स्कूल का नाम ऊँचा करेगा।
- मास्टर जी के आदेश पर मोहन के हाथों बेंत खाने पर भी धनराम के मन में मोहन के प्रति थोड़ी ईर्ष्या के साथ स्नेह और आदर ही था।
बचपन से मन में बैठी जातिगत हीनता के कारण वह मोहन की श्रेष्ठता को उसका अधिकार मानता था, और मोहन के प्रति उसके मन में स्नेह व आदर था।
धनराम को मोहन के किस व्यवहार पर आश्चर्य होता है और क्यों?
Answer
उत्तर
मोहन हँसुवे की धार लगवाने धनराम की भट्टी पर आया और काम हो जाने के बाद भी वहीं बैठा रहा। फिर धनराम जब लोहे की मोटी छड़ को गोल नहीं मोड़ पा रहा था, तो मोहन ने संकोच छोड़कर हथौड़ा ले लिया, धौंकनी फूँककर लोहा गरम किया और नपी-तुली चोटों से उसे सुघड़ गोले का रूप दे दिया।
धनराम को मोहन की कारीगरी पर उतना आश्चर्य नहीं हुआ, जितना इस बात पर कि पुरोहित खानदान का युवक शिल्पकार टोले में उसकी भट्टी पर बैठकर लोहार का काम कर रहा है। गाँव में ब्राह्मण टोले के लोग शिल्पकार टोले में उठते-बैठते नहीं थे; खड़े-खड़े बात निपटा लेते थे। मोहन का व्यवहार इस जातिगत मर्यादा के विरुद्ध था, इसलिए धनराम असमंजस और धर्म-संकट में पड़ गया।
ब्राह्मण मोहन का शिल्पकार टोले में उसकी भट्टी पर बैठना और हथौड़ा लेकर लोहे का छल्ला गढ़ना – क्योंकि यह गाँव की जातिगत मर्यादाओं के विरुद्ध था।
मोहन के लखनऊ आने के बाद के समय को लेखक ने उसके जीवन का एक नया अध्याय क्यों कहा है?
Answer
उत्तर
- गाँव में मोहन एक मेधावी छात्र था, जिसके उज्ज्वल भविष्य के सपने पिता और मास्टर देखते थे। लखनऊ में रमेश ने उसे भाई-बिरादर बताने के बजाय घरेलू नौकर जैसा बना दिया।
- वह घर की चाची-भाभी ही नहीं, पूरे मुहल्ले के काम-काज – दही लाना, धोबी को कपड़े देना, आलू लाना – का साधन बन गया।
- हीला-हवाली के बाद एक साधारण स्कूल में नाम लिखाया गया; काम के बोझ और नए वातावरण में वह अपनी पहचान नहीं बना सका।
- छुट्टियों में भी गाँव जाना रमेश की सुविधा पर निर्भर था; आठवीं के बाद आगे पढ़ाने के बजाय तकनीकी स्कूल में डाल दिया गया, और फिर वह कारख़ानों के चक्कर लगाने लगा।
इस प्रकार उसका जीवन पूरी तरह बदल गया – सपनों से भरे गाँव के जीवन से अलग, संघर्ष, उपेक्षा और समझौते का नया अध्याय शुरू हुआ।
लखनऊ में मेधावी मोहन घरेलू नौकर बनकर रह गया, उसकी पढ़ाई और पहचान खो गई और उसके जीवन में उपेक्षा, संघर्ष और समझौते का बिल्कुल नया दौर शुरू हुआ।
मास्टर त्रिलोक सिंह के किस कथन को लेखक ने ज़बान के चाबुक कहा है और क्यों?
Answer
उत्तर
कथन: “तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें?”
तेरह का पहाड़ा न सुना पाने पर मास्टर जी ने धनराम को बेंत से मारने के बजाय यह कहा। लेखक ने इसे ज़बान का चाबुक इसलिए कहा क्योंकि:
- यह कथन शारीरिक दंड से भी अधिक चोट पहुँचाने वाला था – इसने धनराम के आत्मविश्वास को तोड़ दिया।
- इसमें उसकी जाति (लोहार) पर व्यंग्य था, मानो लोहार का बेटा पढ़ाई के लायक नहीं।
- इसके बाद मास्टर जी ने उसे दराँतियों पर धार लगाने भेज दिया – यानी उसे उसके पुश्तैनी काम की ओर धकेल दिया। इस वाक्य ने धनराम की पढ़ाई का रास्ता ही बंद कर दिया।
“तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें?” – यह जाति पर व्यंग्य करने वाला अपमानजनक कथन बेंत से अधिक चोट पहुँचाने वाला था और इसने धनराम की पढ़ाई का रास्ता बंद कर दिया।
उत्तर
- ‘बिरादरी का यही सहारा होता है।’ – क. किसने किससे कहा? ख. किस प्रसंग में कहा? ग. किस आशय से कहा? घ. क्या कहानी में यह आशय स्पष्ट हुआ है?
- ‘उसकी आँखों में एक सर्जक की चमक थी’ – कहानी का यह वाक्य – क. किसके लिए कहा गया है? ख. किस प्रसंग में कहा गया है? ग. यह पात्र-विशेष के किन चारित्रिक पहलुओं को उजागर करता है?
Answer
उत्तर
(1)
- क. मोहन के पिता वंशीधर तिवारी ने बिरादरी के संपन्न युवक रमेश से कहा।
- ख. मोहन को रोज़ नदी पार कर दूर के स्कूल जाना पड़ता था; एक दुर्घटना के बाद वंशीधर उसके भविष्य को लेकर चिंतित थे। लखनऊ से छुट्टियों में आए रमेश ने सहानुभूति जताकर सुझाव दिया कि मोहन को उसके साथ लखनऊ भेज दें, वहाँ वह अच्छी तरह पढ़-लिख सकेगा। तब भावुक होकर भरे गले से वंशीधर ने यह कहा।
- ग. कृतज्ञता के भाव से – कि अपनी जाति-बिरादरी के लोग ही संकट में सहारा देते हैं; रमेश उन्हें साक्षात् भगवान जैसे लगे।
- घ. नहीं। कहानी में यह आशय उलटा सिद्ध हुआ। रमेश ने मोहन को घरेलू नौकर बना दिया, उसे भाई-बिरादर बताने में अपना अपमान समझा, उसकी पढ़ाई की उपेक्षा की और आठवीं के बाद तकनीकी स्कूल में डालकर उसके सपने तोड़ दिए। बिरादरी का ‘सहारा’ स्वार्थ निकला।
(2)
- क. यह वाक्य मोहन के लिए कहा गया है।
- ख. धनराम लोहे की मोटी छड़ को गोल नहीं मोड़ पा रहा था; मोहन ने हथौड़ा लेकर, धौंकनी फूँककर उसे त्रुटिहीन गोल छल्ले का रूप दे दिया और धनराम की ओर अपनी कारीगरी की स्वीकृति पाने की मुद्रा में देखा – तब।
- ग. यह मोहन के इन पहलुओं को उजागर करता है:
- सृजनशीलता और कुशलता – तकनीकी शिक्षा से पाया हुनर; काम पूरा करने का संतोष।
- जातिगत भेदभाव से मुक्ति – ब्राह्मण होकर भी लोहार का काम करने में कोई संकोच नहीं।
- स्पर्धा-रहित, निश्छल स्वभाव – उसकी आँखों में न होड़ थी, न हार-जीत का भाव; केवल रचना का आनंद।
- श्रम के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना।
- वंशीधर ने रमेश से कृतज्ञतावश कहा जब रमेश मोहन को लखनऊ ले जाने को तैयार हुआ; पर कहानी में आशय उलटा सिद्ध हुआ, रमेश ने मोहन को नौकर बना दिया। (2) मोहन के लिए, जब उसने लोहे का त्रुटिहीन छल्ला गढ़ा; यह उसकी सृजनशीलता, कुशलता, जाति-भेद से मुक्ति और स्पर्धा-रहित स्वभाव को दिखाता है।
अभ्यास – पाठ के आस-पास
गाँव और शहर, दोनों जगहों पर चलने वाले मोहन के जीवन-संघर्ष में क्या फ़र्क है? चर्चा करें और लिखें।
Answer
उत्तर
गाँव का संघर्ष | शहर का संघर्ष |
|---|---|
गरीबी और भौतिक कठिनाई: पिता दान-दक्षिणा पर आधा पेट भर पाते थे; आगे की पढ़ाई के लिए रोज़ कई मील पैदल चलकर, नदी पार करके स्कूल जाना पड़ता था। | उपेक्षा और मानसिक पीड़ा: रमेश के घर नौकर जैसा व्यवहार, मुहल्ले भर का काम, आत्मसम्मान को ठेस। |
वह मेधावी छात्र था, मास्टर का प्रिय, पिता के सपनों का केंद्र; उसकी पहचान थी। | साधारण स्कूल में पहचान खो गई; काम के बोझ से पढ़ाई पिछड़ गई। |
संघर्ष में परिवार का स्नेह और आशा साथ थी। | अकेलापन; परिस्थितियों से समझौता; घरवालों से सच छिपाना। |
बाधाएँ बाहरी (दूरी, नदी, गरीबी) थीं। | बाधाएँ सामाजिक-आर्थिक (हैसियत, स्वार्थ, बेरोज़गारी) थीं; तकनीकी शिक्षा के बाद भी नौकरी के लिए कारख़ानों के चक्कर। |
गाँव का संघर्ष आशा से भरा था, जबकि शहर का संघर्ष सपनों के टूटने और आत्मसम्मान के आहत होने का था।
गाँव में संघर्ष गरीबी और दूरी जैसी बाहरी कठिनाइयों का था, पर पहचान, स्नेह और आशा साथ थे; शहर में संघर्ष उपेक्षा, नौकर जैसी स्थिति, पहचान खोने और बेरोज़गारी का था, जिसने उसके सपने तोड़ दिए।
एक अध्यापक के रूप में त्रिलोक सिंह का व्यक्तित्व आपको कैसा लगता है? अपनी समझ में उनकी खूबियों और खामियों पर विचार करें।
Answer
उत्तर
खूबियाँ
- वे अनुशासनप्रिय और कर्तव्यनिष्ठ थे; अकेले ही पूरी पाठशाला चलाते थे।
- प्रतिभा को पहचानते थे – मोहन की मेधा पहचानकर उसे प्रोत्साहित किया और कक्षा का मॉनीटर बनाया।
- विद्यार्थियों को आगे बढ़ते देखने की इच्छा रखते थे।
खामियाँ
- कठोर शारीरिक दंड – बेंत मारना, और सज़ा पाने वाले से ही टहनी मँगवाना।
- जातिगत भेदभाव और पक्षपात – धनराम के बारे में “दिमाग में लोहा भरा है” जैसी अपमानजनक टिप्पणी; मोहन से धनराम को पिटवाना।
- कमज़ोर विद्यार्थी को सहारा देने के बजाय उसे उसके पुश्तैनी काम (दराँती पर धार) की ओर धकेल दिया।
- मनोविज्ञान की समझ का अभाव – डर से बच्चे का आत्मविश्वास टूटता है।
निष्कर्ष: वे अपने समय के अनुशासनप्रिय पर पूर्वाग्रह से ग्रस्त अध्यापक थे। एक आदर्श अध्यापक को सभी विद्यार्थियों के साथ समान, स्नेहपूर्ण और प्रेरक व्यवहार करना चाहिए।
त्रिलोक सिंह अनुशासनप्रिय, कर्तव्यनिष्ठ और प्रतिभा पहचानने वाले थे, पर कठोर दंड, पक्षपात और जातिगत पूर्वाग्रह उनकी बड़ी खामियाँ थीं।
गलता लोहा कहानी का अंत एक खास तरीके से होता है। क्या इस कहानी का कोई अन्य अंत हो सकता है? चर्चा करें।
Answer
उत्तर
वर्तमान अंत: मोहन धनराम की भट्टी पर लोहे का त्रुटिहीन छल्ला गढ़ता है; उसकी आँखों में सर्जक की चमक है। कहानी यहीं, बिना कुछ कहे, एक सांकेतिक मोड़ पर खत्म होती है – जाति का अहंकार और भेद लोहे की तरह गल रहा है; श्रम दोनों को जोड़ रहा है।
संभावित अन्य अंत
- साझेदारी का अंत: मोहन और धनराम मिलकर गाँव में आधुनिक औज़ारों की कार्यशाला खोलते हैं। मोहन अपनी तकनीकी शिक्षा और धनराम अपना पुश्तैनी हुनर लगाता है; दोनों आत्मनिर्भर बनते हैं और गाँव की जातिगत दीवार टूटती है।
- सामाजिक विरोध का अंत: ब्राह्मण टोले के लोग मोहन के लोहार की भट्टी पर बैठने का विरोध करते हैं; वंशीधर दुखी होते हैं, पर मोहन दृढ़ता से कहता है कि श्रम में कोई छोटा-बड़ा नहीं।
- शहर लौटने का अंत: मोहन को किसी कारख़ाने से नौकरी का बुलावा आता है और वह शहर लौट जाता है, पर धनराम के साथ बिताया पल उसे जीवन का नया अर्थ दे जाता है।
फिर भी लेखक का खुला, सांकेतिक अंत अधिक प्रभावशाली है, क्योंकि वह पाठक को सोचने के लिए छोड़ देता है।
हाँ – जैसे मोहन-धनराम की साझी कार्यशाला, समाज का विरोध और मोहन की दृढ़ता, या मोहन का शहर लौटना; पर लेखक का सांकेतिक अंत (जाति-भेद का गलना) सबसे प्रभावी है।
अभ्यास – भाषा की बात
पाठ में निम्नलिखित शब्द लौहकर्म से संबंधित हैं। किसका क्या प्रयोजन है? शब्द के सामने लिखिए – 1. धौंकनी 2. दराँती 3. सँड़सी 4. आफर 5. हथौड़ा
Answer
उत्तर
शब्द | प्रयोजन |
|---|---|
1. धौंकनी | भट्टी की आग तेज़ करने के लिए हवा फूँकने का यंत्र |
2. दराँती | फ़सल, घास या झाड़ियाँ काटने का अर्धचंद्राकार धारदार औज़ार |
3. सँड़सी | गरम लोहे को पकड़ने/उठाने का चिमटे जैसा औज़ार |
4. आफर | लोहार की भट्टी, जिसमें लोहा तपाया जाता है |
5. हथौड़ा | गरम लोहे को पीटकर आकार देने का औज़ार |
धौंकनी – आग में हवा देना; दराँती – काटना; सँड़सी – गरम लोहा पकड़ना; आफर – भट्टी; हथौड़ा – लोहे को पीटकर आकार देना।
पाठ में ‘काट-छाँटकर’ जैसे कई संयुक्त क्रिया शब्दों का प्रयोग हुआ है। कोई पाँच शब्द पाठ में से चुनकर लिखिए और अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
Answer
उत्तर
- काट-छाँटकर – माली ने पौधों को काट-छाँटकर सुंदर आकार दे दिया।
- पढ़-लिखकर – पढ़-लिखकर वह गाँव का पहला डॉक्टर बना।
- ठोकते-पीटते – लोहार ने लोहे को ठोकते-पीटते हँसिया बना दिया।
- उठना-बैठना – अच्छे लोगों के साथ उठना-बैठना चाहिए।
- घूम-फिरकर – बात घूम-फिरकर फिर उसी विषय पर आ गई।
- (अतिरिक्त) हाथ बँटाना – बच्चे घर के काम में माँ का हाथ बँटाते हैं।
काट-छाँटकर, पढ़-लिखकर, ठोकते-पीटते, उठना-बैठना, घूम-फिरकर – इनका वाक्य-प्रयोग ऊपर दिया गया है।
‘बूते’ का प्रयोग पाठ में तीन स्थानों पर हुआ है, उन्हें छाँटकर लिखिए और जिन संदर्भों में उनका प्रयोग है, उन संदर्भों में उन्हें स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
- “बूढ़े वंशीधर जी के बूते का अब यह सब काम नहीं रहा।” – संदर्भ: खेतों की झाड़ियाँ काटने का काम; अर्थ – बुढ़ापे के कारण अब उनमें इतनी शक्ति/सामर्थ्य नहीं रही।
- “जन्म भर जिस पुरोहिताई के बूते पर उन्होंने घर-संसार चलाया था…” – संदर्भ: वंशीधर की आजीविका; अर्थ – पुरोहिताई के सहारे/बल पर उन्होंने घर चलाया।
- “यह दो मील की सीधी चढ़ाई अब अपने बूते की नहीं।” – संदर्भ: गणनाथ जाकर रुद्रीपाठ करना; अर्थ – अब इतनी चढ़ाई चढ़ना उनकी क्षमता में नहीं।
(पाठ में “दान-दक्षिणा के बूते पर वे किसी तरह परिवार का आधा पेट भर पाते थे” – यहाँ भी ‘बूते’ का अर्थ ‘सहारे’ है।)
‘बूते’ का अर्थ शक्ति/सामर्थ्य/सहारा है: (1) झाड़ी काटना वंशीधर के बूते का नहीं, (2) पुरोहिताई के बूते घर चलाया, (3) दो मील की चढ़ाई अब अपने बूते की नहीं।
‘मोहन! थोड़ा दही तो ला दे बाज़ार से।’ ‘मोहन! ये कपड़े धोबी को दे तो आ।’ ‘मोहन! एक किलो आलू तो ला दे।’ – ऊपर के वाक्यों में मोहन को आदेश दिए गए हैं। इन वाक्यों में आप सर्वनाम का इस्तेमाल करते हुए उन्हें दुबारा लिखिए।
Answer
उत्तर
- तुम बाज़ार से थोड़ा दही तो ला दो। / आप बाज़ार से थोड़ा दही ला दीजिए।
- तुम ये कपड़े धोबी को दे आओ। / आप ये कपड़े धोबी को दे आइए।
- तुम एक किलो आलू तो ला दो। / आप एक किलो आलू ला दीजिए।
(सर्वनाम ‘तुम’ या ‘आप’ के प्रयोग से आदेश अधिक शिष्ट और आदरपूर्ण हो जाता है।)
तुम/आप बाज़ार से थोड़ा दही ला दो/दीजिए; तुम/आप ये कपड़े धोबी को दे आओ/आइए; तुम/आप एक किलो आलू ला दो/दीजिए।
विज्ञापन की दुनिया – विभिन्न व्यापारी अपने उत्पाद की बिक्री के लिए अनेक तरह के विज्ञापन बनाते हैं। आप भी हाथ से बनी किसी वस्तु की बिक्री के लिए एक ऐसा विज्ञापन बनाइए जिससे हस्तकला का कारोबार चले।
Answer
उत्तर
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विषय-सूची की जाँच
- ☒ मोहन और धनराम – शिक्षा, जाति और मित्रता (प्रश्न 1, 2, 3, 6)
- ☒ लखनऊ का जीवन और संघर्ष (प्रश्न 4, 7)
- ☒ मास्टर त्रिलोक सिंह (प्रश्न 5, 8)
- ☒ कहानी का अंत (प्रश्न 9)
- ☒ भाषा की बात और विज्ञापन (प्रश्न 10 – 14)