Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
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XI | Hindi | Aroh (NCERT) | 9 – कबीर के पद | 2026-27 | 6 of 6 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवि | कबीर (1398–1518), भक्तिकाल की निर्गुण (ज्ञानाश्रयी) धारा |
रचना | पद – “हम तौ एक एक करि जांनां” (कबीर वाङ्मय, खंड 2 – सबद) |
भाव | ईश्वर एक है, ज्योति-रूप है और सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है; द्वैत मानने वाले नरक के भागी हैं |
उदाहरण | एक पवन, एक पानी, एक ज्योति; एक ही मिट्टी से कुम्हार के सब बर्तन; बढ़ई लकड़ी काटता है, आग को नहीं |
संदेश | माया और गर्व का त्याग; ईश्वर को पहचानकर निर्भय होना |
भाषा | सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी) |
हम तौ एक एक करि जांनां।
दोइ कहैं तिनहीं कौं दोजग जिन नाहिंन पहिचांनां ।।
एकै पवन एक ही पानीं एकै जोति समांनां।
एकै खाक गढ़े सब भांडै़ एकै कोंहरा सांनां।।
जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई।
सब घटि अंतरि तूँही व्यापक धरै सरूपै सोई।।
माया देखि के जगत लुभांनां काहे रे नर गरबांनां।
निरभै भया कछू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवांनां।।
भावार्थ: कबीर कहते हैं कि मैंने तो ईश्वर को एक ही जाना है। जो उसे दो कहते हैं, वे उसे पहचान नहीं पाए और नरक के भागी हैं। सबमें एक ही हवा, एक ही पानी और एक ही ज्योति समाई है। एक ही मिट्टी से सारे बर्तन बने हैं और एक ही कुम्हार ने उस मिट्टी को साना है। जैसे बढ़ई लकड़ी को तो काटता है, पर उसके भीतर छिपी आग को कोई नहीं काट सकता, वैसे ही हे प्रभु! तुम सबके हृदय में व्याप्त हो और सब रूपों में तुम ही हो। संसार माया को देखकर लुभा गया है; हे मनुष्य, तू किस बात का गर्व करता है? दीवाना कबीर कहता है कि जो ईश्वर को पहचानकर निर्भय हो गया, उसे कुछ भी नहीं व्यापता।
अभ्यास – पद के साथ
कबीर की दृष्टि में ईश्वर एक है। इसके समर्थन में उन्होंने क्या तर्क दिए हैं?
Answer
उत्तर
- एक ही पवन और पानी: संसार के सब प्राणियों में एक ही हवा बहती है और एक ही पानी है।
- एक ही ज्योति: सबमें एक ही परमात्मा की ज्योति समाई हुई है।
- एक ही मिट्टी और एक कुम्हार: जैसे एक ही मिट्टी से सारे बर्तन बनते हैं और उसे एक ही कुम्हार सानता है, वैसे ही सब प्राणी एक ही तत्त्व से बने हैं और उनका रचयिता एक है।
- लकड़ी और आग: जैसे बढ़ई लकड़ी काटता है, पर उसके भीतर की आग को नहीं काट सकता, वैसे ही शरीर नष्ट होता है, पर उसके भीतर व्याप्त परमात्मा अविनाशी है।
- जो ईश्वर को दो मानते हैं, वे उसे पहचानते नहीं – उन्हें नरक मिलता है।
सबमें एक ही पवन, पानी और ज्योति है; एक ही मिट्टी से एक कुम्हार सब बर्तन गढ़ता है; लकड़ी कटती है पर उसकी आग नहीं – वैसे ही एक ही ईश्वर सबके भीतर व्याप्त है।
मानव शरीर का निर्माण किन पंच तत्वों से हुआ है?
Answer
उत्तर
मानव शरीर पाँच तत्वों से बना है – पृथ्वी (मिट्टी/खाक), जल (पानी), अग्नि (तेज/ज्योति), वायु (पवन) और आकाश। पद में कबीर ने पवन, पानी, ज्योति (अग्नि) और खाक (मिट्टी) का उल्लेख किया है। (तुलसीदास के शब्दों में – “क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अधम सरीरा।”)
पृथ्वी (मिट्टी), जल, अग्नि, वायु और आकाश।
“जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई। सब घटि अंतरि तूँही व्यापक धरै सरूपै सोई।।” – इसके आधार पर बताइए कि कबीर की दृष्टि में ईश्वर का क्या स्वरूप है?
Answer
उत्तर
बढ़ई (बाढ़ी) लकड़ी को काट सकता है, पर लकड़ी के भीतर छिपी अग्नि को कोई नहीं काट सकता। इसी प्रकार शरीर नश्वर है, पर उसके भीतर बसा परमात्मा अविनाशी है। कबीर की दृष्टि में ईश्वर:
- सर्वव्यापक – वह हर घट (शरीर/हृदय) के भीतर व्याप्त है।
- अविनाशी और अजर-अमर – शरीर नष्ट होने पर भी वह नष्ट नहीं होता।
- निर्गुण, निराकार पर सब रूपों में – वही अलग-अलग रूप धारण करता है; सारे रूप उसी के हैं।
- अंतर्यामी – वह बाहर मंदिर-मस्जिद में नहीं, भीतर है।
ईश्वर सर्वव्यापक, अंतर्यामी और अविनाशी है – जैसे लकड़ी में छिपी आग कटती नहीं, वैसे ही वह हर शरीर में व्याप्त होकर भी शरीर के नाश से नष्ट नहीं होता और सब रूपों में वही है।
कबीर ने अपने को दीवाना क्यों कहा है?
Answer
उत्तर
कबीर ने स्वयं को दीवाना इसलिए कहा है क्योंकि:
- वे ईश्वर के प्रेम और भक्ति में मस्त हैं; उन्होंने ईश्वर की एकता और सर्वव्यापकता का रहस्य जान लिया है।
- संसार माया के पीछे भागता है, पर कबीर माया से विरक्त हैं – दुनिया की दृष्टि में ऐसा व्यक्ति दीवाना (पागल) लगता है।
- ईश्वर को पहचान लेने से वे निर्भय हो गए हैं; उन्हें सांसारिक दुख, सुख, भय कुछ भी नहीं व्यापता।
- वे समाज की रूढ़ियों, कर्मकांड और भेदभाव की परवाह नहीं करते और निडर होकर सच कहते हैं।
ईश्वर-प्रेम में मस्त, माया से विरक्त और ईश्वर को पहचानकर निर्भय हो जाने के कारण कबीर स्वयं को दीवाना कहते हैं – सांसारिक लोगों की दृष्टि में ऐसा व्यक्ति दीवाना ही लगता है।
अभ्यास – पद के आस-पास
अन्य संत कवियों नानक, दादू और रैदास आदि के ईश्वर संबंधी विचारों का संग्रह करें और उन पर एक परिचर्चा करें।
Answer
उत्तर
संत कवि | ईश्वर संबंधी विचार | उदाहरण |
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गुरु नानक (1469–1539) | ईश्वर एक, निराकार, सत्य-स्वरूप, सृष्टिकर्ता और सर्वव्यापक है; नाम-स्मरण और सेवा से उसकी प्राप्ति | “इक ओंकार सतिनाम करता पुरखु निरभउ निरवैरु” |
रैदास (रविदास) | ईश्वर और भक्त का अटूट संबंध; बाहरी आडंबर व्यर्थ, मन की पवित्रता ज़रूरी; जाति-भेद का विरोध | “प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी”, “मन चंगा तो कठौती में गंगा” |
दादू दयाल (1544–1603) | ईश्वर घट-घट में व्याप्त, निर्गुण; प्रेम-भक्ति और सद्गुरु का महत्त्व; हिंदू-मुस्लिम एकता | “दादू देख्या दीदार” – ईश्वर को भीतर देखने पर बल |
परिचर्चा के निष्कर्ष: सभी संत कवि (कबीर सहित) ईश्वर को एक, निर्गुण, निराकार और सर्वव्यापक मानते हैं। वे मूर्तिपूजा, तीर्थ, कर्मकांड और जाति-धर्म के भेदभाव का विरोध करते हैं और प्रेम, सच्चे मन की भक्ति, गुरु-महिमा और मानवता पर बल देते हैं। इनका संदेश आज भी सामाजिक समरसता के लिए प्रासंगिक है।
नानक, रैदास और दादू भी कबीर की तरह ईश्वर को एक, निर्गुण और सर्वव्यापक मानते थे; उन्होंने आडंबर व जाति-भेद का विरोध कर प्रेम-भक्ति, नाम-स्मरण, मन की शुद्धता और गुरु-महिमा पर बल दिया।
कबीर के पदों को शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत दोनों में लयबद्ध भी किया गया है, जैसे – कुमार गंधर्व, भारती बंधु और प्रहलाद सिंह टिपानिया आदि द्वारा गाए गए पद। इनके कैसेट्स (रिकॉर्डिंग) अपने पुस्तकालय के लिए मँगवाएँ और पाठ्यपुस्तक के पदों को भी लयबद्ध करने का प्रयास करें।
Answer
उत्तर
रिकॉर्डिंग जुटाने की योजना
- कुमार गंधर्व – निर्गुण भजन जैसे “उड़ जाएगा हंस अकेला”, “सुनता है गुरु ज्ञानी” (शास्त्रीय शैली)।
- प्रहलाद सिंह टिपानिया – मालवा की लोक-शैली में तंबूरा, मंजीरा, ढोलक के साथ कबीर-भजन।
- भारती बंधु – सूफ़ियाना और लोक अंदाज़ में कबीर के पद।
- इन्हें आज ऑनलाइन (आकाशवाणी/प्रसार भारती अभिलेखागार, ‘कबीर प्रोजेक्ट’, यूट्यूब, संगीत ऐप) से पुस्तकालय के लिए डाउनलोड/क्रय किया जा सकता है।
पद को लयबद्ध करने का प्रयास
- पद “हम तौ एक एक करि जांनां” की टेक (स्थायी) पहली पंक्ति रहेगी, जो हर अंतरे के बाद दोहराई जाएगी।
- बाकी तीन युग्म अंतरे के रूप में गाए जाएँगे।
- राग भैरवी या यमन में, कहरवा ताल (8 मात्रा) पर; वाद्य – हारमोनियम, तबला/ढोलक, मंजीरा, एकतारा।
- सामूहिक गायन में एक समूह टेक और दूसरा अंतरे गा सकता है; प्रातःकालीन सभा में प्रस्तुति दी जा सकती है।
कुमार गंधर्व, प्रहलाद सिंह टिपानिया और भारती बंधु की कबीर-भजन रिकॉर्डिंग ऑनलाइन अभिलेखागारों से पुस्तकालय के लिए जुटाई जा सकती है; पाठ के पद को टेक-अंतरा रूप में राग भैरवी/यमन और कहरवा ताल में लयबद्ध कर सामूहिक रूप से गाया जा सकता है।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ ईश्वर की एकता के तर्क (प्रश्न 1)
- ☒ पंच तत्व और ईश्वर का स्वरूप (प्रश्न 2, 3)
- ☒ कबीर का दीवानापन (प्रश्न 4)
- ☒ संत परंपरा और संगीत (प्रश्न 5, 6)