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Class 11 Hindi Aroh Chapter 16

NCERT Solutions for Class 11 Hindi Aroh Chapter 16: आओ, मिलकर बचाएँ

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XI

Hindi

Aroh (NCERT)

16 – आओ, मिलकर बचाएँ

2026-27

9 of 9

बिंदु

विवरण

कवयित्री

निर्मला पुतुल (जन्म 1972), संथाली कवयित्री, दुमका (झारखंड); अनुवाद – अशोक सिंह

विषय

आदिवासी (संथाल) समाज की संस्कृति, प्रकृति, भाषा, स्वभाव और जीवन-मूल्यों को शहरी प्रभाव और विस्थापन से बचाने का आह्वान

बचाने योग्य

माटी का रंग, झारखंडीपन, भोलापन, अक्खड़पन, जुझारूपन, धनुष-तीर-कुल्हाड़ी, जंगल, नदियाँ, पहाड़, गीत, फ़सलें, बच्चों के मैदान, विश्वास, उम्मीद, सपने

बुराइयाँ

शहरी आबो-हवा, नशा (हड़िया), नग्नता/संस्कृति का क्षरण, अविश्वास का दौर

शिल्प

सरल मुक्त छंद, सूचीबद्ध बिंब, आह्वानपरक स्वर (“आओ, मिलकर बचाएँ”)

अभ्यास – कविता के साथ

Q1

‘माटी का रंग’ प्रयोग करते हुए किस बात की ओर संकेत किया गया है?

Answer

उत्तर

‘अपने चेहरे पर संथाल परगना की माटी का रंग’ – इस प्रयोग से कवयित्री आदिवासियों की मूल पहचान, उनकी सांस्कृतिक अस्मिता और अपनी धरती से जुड़ाव की ओर संकेत करती है। संथाल परगना की माटी का रंग उनके साँवले रंग, मेहनतकश जीवन, प्रकृति से निकटता और अपनी परंपराओं का प्रतीक है। कवयित्री चाहती है कि आदिवासी शहरी चकाचौंध में अपनी इस स्वाभाविक पहचान को न खोएँ, उस पर गर्व करें और उसे बचाकर रखें।

‘माटी का रंग’ आदिवासियों की मूल पहचान, अपनी धरती से जुड़ाव, साँवले रंग और सांस्कृतिक अस्मिता का संकेत है, जिसे शहरी प्रभाव से बचाए रखना है।

Q2

‘भाषा में झारखंडीपन’ से क्या अभिप्राय है?

Answer

उत्तर

‘भाषा में झारखंडीपन’ से अभिप्राय है – झारखंड की स्थानीय बोलियों (संथाली, मुंडारी, हो, खड़िया आदि) की मौलिकता, उनका स्वाभाविक लहजा, उच्चारण, शब्द-भंडार, मुहावरे और मिठास। कवयित्री चाहती है कि शहरीकरण और बाहरी भाषाओं के प्रभाव में आदिवासी अपनी भाषा की यह विशिष्ट पहचान न खोएँ, क्योंकि भाषा ही किसी संस्कृति की आत्मा होती है।

झारखंड की आदिवासी बोलियों का स्वाभाविक लहजा, शब्द, मुहावरे और विशिष्ट पहचान – जिसे बाहरी भाषाई प्रभाव से बचाना है।

Q3

दिल के भोलेपन के साथ-साथ अक्खड़पन और जुझारूपन को भी बचाने की आवश्यकता पर क्यों बल दिया गया है?

Answer

उत्तर

  1. भोलापन आदिवासियों की सरलता, निश्छलता और ईमानदारी का प्रतीक है – यह उनका सहज गुण है।
  2. पर केवल भोलेपन के कारण बाहरी लोग (ठेकेदार, साहूकार, व्यापारी) उनका शोषण करते आए हैं – ज़मीन, जंगल और श्रम छीनते रहे हैं।
  3. इसलिए भोलेपन के साथ अक्खड़पन (अपनी बात पर अड़ जाने, अन्याय के आगे न झुकने का स्वभाव) और जुझारूपन (संघर्ष करने की प्रवृत्ति) भी ज़रूरी है, ताकि वे अपने अधिकारों, ज़मीन, जंगल और संस्कृति की रक्षा कर सकें।
  4. आदिवासियों का इतिहास (बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू का संथाल विद्रोह) इसी जुझारूपन का प्रमाण है।

अर्थात् सरलता के साथ आत्मरक्षा और संघर्ष की क्षमता भी आवश्यक है।

भोलेपन के कारण आदिवासियों का शोषण होता रहा है; अपनी ज़मीन, जंगल, अधिकार और संस्कृति की रक्षा के लिए अन्याय के आगे न झुकने वाला अक्खड़पन और संघर्ष करने का जुझारूपन भी आवश्यक है।

Q4

प्रस्तुत कविता आदिवासी समाज की किन बुराइयों की ओर संकेत करती है?

Answer

उत्तर

  1. नशाखोरी: ‘पूरी की पूरी बस्ती को हड़िया में डूबने से बचाएँ’ – हड़िया (चावल से बनी शराब) की लत से पूरी बस्ती बर्बाद हो रही है।
  2. शहरी अपसंस्कृति का अंधानुकरण: ‘बस्तियों को नंगी होने से बचाएँ’ – शहरी आबो-हवा के प्रभाव में अपनी संस्कृति, मर्यादा और पहचान खोना; बाहरी दिखावा और नग्नता।
  3. अपनी भाषा और पहचान से विमुखता – झारखंडीपन और माटी का रंग खोना।
  4. जीवन में उत्साह की कमी: ‘ठंडी होती दिनचर्या’ – निराशा और उदासीनता।
  5. अविश्वास का बढ़ना – आपसी भरोसे का टूटना।
  6. प्रकृति से दूरी – जंगल, नदियों और पहाड़ों का विनाश (बाहरी कारणों के साथ)।

हड़िया (शराब) की लत, शहरी अपसंस्कृति का अंधानुकरण और नग्नता, अपनी भाषा-पहचान से विमुखता, जीवन में उदासीनता, अविश्वास और प्रकृति से दूरी।

Q5

‘इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है’ – से क्या आशय है?

Answer

उत्तर

आज का दौर शहरीकरण, औद्योगीकरण, विस्थापन, नशे और अविश्वास का है, जिसमें आदिवासी समाज की बहुत-सी चीज़ें नष्ट हो चुकी हैं। फिर भी कवयित्री निराश नहीं है। उसका आशय है कि:

  1. आज भी आदिवासी समाज के पास उसकी भाषा, संस्कृति, गीत, नृत्य, भोलापन, जुझारूपन, प्रकृति (जंगल, नदी, पहाड़) और जीवन-मूल्य शेष हैं।
  2. सबसे बढ़कर – थोड़ा-सा विश्वास, थोड़ी-सी उम्मीद और थोड़े-से सपने अभी बचे हैं।
  3. यदि सब मिलकर प्रयास करें, तो इन्हें बचाया जा सकता है और समाज का पुनर्निर्माण किया जा सकता है।

यह पंक्ति आशा, आत्मविश्वास और सामूहिक प्रयास का संदेश देती है।

संकट और अविश्वास के इस दौर में भी आदिवासी समाज की संस्कृति, प्रकृति, मूल्य और थोड़ा-सा विश्वास, उम्मीद व सपने बचे हैं; मिलकर प्रयास करें तो इन्हें बचाया जा सकता है – यह आशा और सामूहिकता का संदेश है।

Q6

निम्नलिखित पंक्तियों के काव्य-सौंदर्य को उद्घाटित कीजिए –
(क) ठंडी होती दिनचर्या में / जीवन की गर्माहट
(ख) थोड़ा-सा विश्वास / थोड़ी-सी उम्मीद / थोड़े-से सपने / आओ, मिलकर बचाएँ।

Answer

उत्तर

(क) भाव-सौंदर्य: आधुनिक जीवन की भागदौड़, गरीबी और निराशा के कारण आदिवासियों की दिनचर्या नीरस, उत्साहहीन (‘ठंडी’) होती जा रही है। कवयित्री चाहती है कि उसमें जीवन का उत्साह, उमंग और जीवंतता (‘गर्माहट’) बची रहे।

शिल्प-सौंदर्य

  • ‘ठंडी’ और ‘गर्माहट’ में विरोधाभास/विरोध का सुंदर प्रयोग।
  • लाक्षणिकता – ‘ठंडी दिनचर्या’ (नीरसता), ‘गर्माहट’ (उत्साह)।
  • स्पर्श बिंब।
  • सरल, सहज खड़ी बोली; मुक्त छंद।

(ख) भाव-सौंदर्य: आज के अविश्वास भरे दौर में कवयित्री सबसे मूल्यवान चीज़ों – विश्वास, उम्मीद और सपनों – को बचाने का आह्वान करती है। ये भले ‘थोड़े-से’ बचे हों, पर इन्हीं से भविष्य का निर्माण संभव है।

शिल्प-सौंदर्य

  • ‘थोड़ा-सा’, ‘थोड़ी-सी’, ‘थोड़े-से’ की आवृत्ति (पुनरुक्ति) से लय और बल।
  • अमूर्त भावों (विश्वास, उम्मीद, सपने) को मूर्त वस्तुओं की तरह बचाने की बात – मानवीकरण/मूर्तीकरण।
  • ‘आओ, मिलकर बचाएँ’ – आह्वानपरक, संबोधन शैली; सामूहिकता का भाव।
  • सरल भाषा, मुक्त छंद।

(क) नीरस होती दिनचर्या में उत्साह बचाने का भाव; ठंडी-गर्माहट का विरोधाभास, लाक्षणिकता, स्पर्श बिंब। (ख) विश्वास, उम्मीद और सपनों को बचाने का आह्वान; ‘थोड़ा’ की आवृत्ति, अमूर्त का मूर्तीकरण, संबोधन शैली और सामूहिकता।

Q7

बस्तियों को शहर की किस आबो-हवा से बचाने की आवश्यकता है?

Answer

उत्तर

शहर की आबो-हवा (वातावरण) से तात्पर्य है:

  1. भौतिकवाद और उपभोक्तावाद – धन और दिखावे की होड़।
  2. स्वार्थ और अविश्वास – आपसी संबंधों में बनावट, छल-कपट।
  3. अपसंस्कृति – पश्चिमी अंधानुकरण, अपनी परंपरा, पहनावे और मर्यादा का त्याग (‘नंगी होना’)।
  4. नशा, अपराध और भ्रष्टाचार।
  5. प्रदूषण और प्रकृति का विनाश – कंक्रीट के जंगल, कटते पेड़।
  6. यांत्रिक, नीरस जीवन – सामूहिकता, गीत-नृत्य और उत्सवों का अभाव।

कवयित्री चाहती है कि आदिवासी बस्तियाँ इन प्रभावों से बचें और अपनी सरलता, सामूहिकता, प्रकृति-प्रेम और संस्कृति को बनाए रखें।

भौतिकवाद, स्वार्थ, अविश्वास, अपसंस्कृति और अंधानुकरण, नशा-अपराध, प्रदूषण और यांत्रिक नीरस जीवन वाली शहरी आबो-हवा से।

अभ्यास – कविता के आस-पास

Q8

आप अपने शहर या बस्ती की किन चीज़ों को बचाना चाहेंगे?

Answer

उत्तर

  1. हरियाली – पुराने पेड़, पार्क और खेत।
  2. तालाब, नदी और कुएँ – साफ़ और जीवित जल-स्रोत।
  3. ऐतिहासिक इमारतें और धरोहर – पुराने मंदिर, मस्जिद, किले, बावड़ियाँ।
  4. स्थानीय भाषा/बोली, लोकगीत, लोकनृत्य और त्योहार मनाने की सामूहिक परंपरा।
  5. हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यवसाय – कुम्हारी, बुनकरी।
  6. मोहल्ले का भाईचारा – पड़ोसियों से मेलजोल, एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ।
  7. बच्चों के खेल के मैदान और बुज़ुर्गों के बैठने की चौपाल।
  8. स्वच्छ हवा और शांत वातावरण।

हरियाली, जल-स्रोत, ऐतिहासिक धरोहर, स्थानीय भाषा-लोकसंस्कृति-त्योहार, हस्तशिल्प, मोहल्ले का भाईचारा, खेल के मैदान और स्वच्छ हवा।

Q9

आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करें।

Answer

उत्तर

सकारात्मक बदलाव

  1. संविधान की पाँचवीं-छठी अनुसूची, आरक्षण, वन अधिकार अधिनियम (2006), पेसा कानून जैसे संरक्षण।
  2. शिक्षा और सरकारी नौकरियों में भागीदारी बढ़ी; एकलव्य विद्यालय, छात्रवृत्तियाँ।
  3. झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों का गठन; राजनीतिक प्रतिनिधित्व – देश की राष्ट्रपति भी आदिवासी समुदाय से बनीं।
  4. आदिवासी कला, संगीत और साहित्य को पहचान मिल रही है।

चुनौतियाँ

  1. विस्थापन – खनन, बाँध, उद्योगों के लिए ज़मीन-जंगल से बेदखली।
  2. गरीबी, कुपोषण और स्वास्थ्य-सेवाओं का अभाव।
  3. शिक्षा में पिछड़ापन और ड्रॉप-आउट।
  4. संस्कृति और भाषा का क्षरण, शहरी प्रभाव, पलायन।
  5. नशाखोरी और शोषण (साहूकार, ठेकेदार, मानव-तस्करी)।
  6. नक्सलवाद और हिंसा से प्रभावित क्षेत्र।

निष्कर्ष: आदिवासी समाज प्रगति कर रहा है, पर विकास ऐसा होना चाहिए जो उनकी ज़मीन, जंगल, संस्कृति और पहचान को बचाते हुए उन्हें सशक्त बनाए – यही ‘आओ, मिलकर बचाएँ’ का संदेश है।

संवैधानिक संरक्षण, शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी से आदिवासी समाज आगे बढ़ा है, पर विस्थापन, गरीबी, कुपोषण, शिक्षा की कमी, संस्कृति का क्षरण, नशा और शोषण अब भी बड़ी चुनौतियाँ हैं; विकास उनकी पहचान बचाते हुए होना चाहिए।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ आदिवासी पहचान – माटी, भाषा, स्वभाव (प्रश्न 1, 2, 3)
  • ☒ बुराइयाँ और शहरी आबो-हवा (प्रश्न 4, 7)
  • ☒ आशा का स्वर और काव्य-सौंदर्य (प्रश्न 5, 6)
  • ☒ अपनी बस्ती और आदिवासी समाज (प्रश्न 8, 9)

Total questions answered: 9 of 9

Frequently Asked Questions

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All 9 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – कविता के साथ and अभ्यास – कविता के आस-पास.

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How should I use these solutions to prepare for exams?

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