Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Aroh (NCERT) | 10 – भक्तिन | 2026-27 | 14 of 14 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखिका | महादेवी वर्मा (1907–1987), फ़र्रुख़ाबाद; छायावाद की प्रमुख कवयित्री, गद्यकार |
विधा | संस्मरणात्मक रेखाचित्र (‘स्मृति की रेखाएँ’ से) |
भक्तिन | असली नाम लछमिन (लक्ष्मी); झूँसी के एक सूरमा की इकलौती बेटी; पाँच वर्ष में विवाह, नौ वर्ष में गौना; तीन बेटियाँ होने पर सास-जिठानियों की उपेक्षा; 29 वर्ष में विधवा; जेठ-जिठौतों से संपत्ति की रक्षा; बेटी पर पंचायत द्वारा थोपा गया पति; ज़मींदार द्वारा धूप में खड़ा रखे जाने के अपमान के बाद शहर आकर महादेवी की सेविका बनी |
जीवन के चार परिच्छेद | (1) बचपन और विवाह, (2) ससुराल और वैधव्य, (3) विधवा बेटी और पंचायत, (4) महादेवी की सेवा |
व्यक्तित्व | स्वाभिमानी, संघर्षशील, कर्मठ, अक्खड़, तर्कशील; महादेवी के प्रति अगाध स्नेह और समर्पण |
अभ्यास – पाठ के साथ
भक्तिन अपना वास्तविक नाम लोगों से क्यों छुपाती थी? भक्तिन को यह नाम किसने और क्यों दिया होगा?
Answer
उत्तर
नाम छिपाने का कारण: भक्तिन का वास्तविक नाम लछमिन (लक्ष्मी) था। लक्ष्मी धन-समृद्धि की देवी है, पर भक्तिन का जीवन गरीबी, दुख और संघर्ष से भरा था— “लक्ष्मी की समृद्धि भक्तिन के कपाल की कुंचित रेखाओं में नहीं बँध सकी”। नाम और जीवन के इस विरोधाभास के कारण लोग उसका उपहास न करें, इसलिए वह अपना समृद्धि-सूचक नाम किसी को नहीं बताती थी। उसने केवल नौकरी के समय ईमानदारी दिखाने के लिए महादेवी को नाम बताया, पर प्रार्थना की कि वे कभी उसका उपयोग न करें।
‘भक्तिन’ नाम: यह नाम महादेवी वर्मा ने दिया। भक्तिन के गले में कंठी-माला देखकर, उसके घुटे सिर और वैरागी जैसे वेश को देखकर उन्होंने उसका नाम ‘भक्तिन’ रख दिया। वह इस “कवित्वहीन नाम” को पाकर भी गद्गद हो उठी।
उसका नाम लछमिन (लक्ष्मी) था, पर जीवन गरीबी से भरा था; नाम और जीवन के विरोधाभास के कारण उपहास से बचने के लिए वह नाम छिपाती थी। महादेवी वर्मा ने उसके गले की कंठी-माला और वैरागी वेश देखकर उसे ‘भक्तिन’ नाम दिया।
दो कन्या-रत्न पैदा करने पर भक्तिन पुत्र-महिमा में अंधी अपनी जिठानियों द्वारा घृणा व उपेक्षा का शिकार बनी। ऐसी घटनाओं से ही अकसर यह धारणा चलती है कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है। क्या इससे आप सहमत हैं?
Answer
उत्तर
ऊपरी तौर पर यह धारणा सही लगती है, क्योंकि भक्तिन की सास और जिठानियों ने ही उसकी उपेक्षा की— उनके बेटे मलाई और दूध पाते थे जबकि भक्तिन की बेटियाँ चने-बाजरे की घुघरी चबातीं और गोबर उठातीं।
परंतु मैं इस धारणा से पूर्णतः सहमत नहीं हूँ— 1. इसका मूल कारण पितृसत्तात्मक समाज है, जिसमें पुत्र को वंश चलाने वाला और कमाऊ माना जाता है तथा बेटी को बोझ। स्त्रियाँ स्वयं इसी व्यवस्था की शिकार होकर इसकी मान्यताओं को अपना लेती हैं। 2. समाज में स्त्री का सम्मान बेटों की माँ होने से जुड़ा था— सास “तीन-तीन कमाऊ वीरों की विधात्री” होकर ‘पुरखिन’ के पद पर थी। इसी सोच ने जिठानियों को भक्तिन के विरुद्ध खड़ा किया। 3. अनेक स्त्रियाँ एक-दूसरे का सहारा भी बनती हैं— भक्तिन और उसकी बेटी ने मिलकर संघर्ष किया; भक्तिन और महादेवी का संबंध आत्मीयता का है।
अतः दोष स्त्री का नहीं, बल्कि उस सामाजिक सोच का है जो पुत्र को श्रेष्ठ मानती है।
पूर्णतः नहीं। सास-जिठानियों का व्यवहार पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम है, जो पुत्र को श्रेष्ठ और बेटी को बोझ मानती है; स्त्रियाँ स्वयं इस व्यवस्था की शिकार होकर उसकी मान्यताएँ अपना लेती हैं। अनेक स्त्रियाँ एक-दूसरे का सहारा भी बनती हैं (भक्तिन-बेटी, भक्तिन-महादेवी)।
भक्तिन की बेटी पर पंचायत द्वारा ज़बरन पति थोपा जाना एक दुर्घटना भर नहीं, बल्कि विवाह के संदर्भ में स्त्री के मानवाधिकार (विवाह करें या न करें अथवा किससे करें) इसकी स्वतंत्रता को कुचलते रहने की सदियों से चली आ रही सामाजिक परंपरा का प्रतीक है। कैसे?
Answer
उत्तर
भक्तिन की विधवा बेटी ने अपने जिठौत के तीतरबाज़ साले को वर के रूप में नापसंद कर दिया था। फिर भी वह युवक माँ की अनुपस्थिति में उसकी कोठरी में घुस गया और भीतर से द्वार बंद कर लिया। युवती ने उसकी मरम्मत की, पर पंचायत ने सच्चाई जाने बिना “अपीलहीन फ़ैसला” सुना दिया कि चाहे दोनों में एक सच्चा हो चाहे दोनों झूठे, जब वे एक कोठरी से निकले हैं तो उन्हें पति-पत्नी के रूप में रहना होगा।
यह घटना सदियों से चली आ रही परंपरा का प्रतीक है, क्योंकि— 1. स्त्री की इच्छा और सहमति का कोई महत्व नहीं दिया गया। 2. दोष पुरुष का था, पर दंड स्त्री को मिला। 3. पंचायत जैसी पुरुष-प्रधान संस्थाएँ स्त्री के जीवन के निर्णय लेती रही हैं। 4. ‘कलियुग’ और ‘लोकलाज’ के नाम पर अन्याय को उचित ठहराया गया। 5. संपत्ति हड़पने के लिए स्त्री का उपयोग किया गया।
आज भी ‘खाप पंचायतों’ के फ़ैसलों, ज़बरन विवाह और ऑनर किलिंग में यही मानसिकता दिखती है।
बेटी ने वर को नापसंद किया था, फिर भी पंचायत ने बिना सच जाने, उसकी इच्छा के विरुद्ध, दोषी पुरुष को ही उसका पति बना दिया। स्त्री की सहमति की उपेक्षा, पुरुष-प्रधान पंचायत का निर्णय, लोकलाज/कलियुग के नाम पर अन्याय और संपत्ति का लोभ — ये सब सदियों से स्त्री के विवाह-संबंधी अधिकार को कुचलने वाली परंपरा के प्रतीक हैं।
भक्तिन अच्छी है, यह कहना कठिन होगा, क्योंकि उसमें दुर्गुणों का अभाव नहीं लेखिका ने ऐसा क्यों कहा होगा?
Answer
उत्तर
लेखिका ने भक्तिन के व्यक्तित्व का ईमानदारी से चित्रण किया है, इसलिए उसके दुर्गुण भी बताए— 1. पैसे छिपाना: इधर-उधर पड़े पैसे-रुपये वह भंडार-घर की किसी मटकी में छिपा देती थी और इसे चोरी नहीं मानती थी— “यह उसका अपना घर ठहरा”। 2. झूठ बोलना: लेखिका को क्रोध दिलाने वाली बात को बदलकर बताना उसे झूठ नहीं लगता था। 3. तर्क-कुतर्क: वह शास्त्र के प्रश्न अपनी सुविधा से सुलझा लेती थी— “तीरथ गए मुँडाए सिद्ध”। 4. हठी स्वभाव: वह दूसरों को अपने अनुसार बदलना चाहती थी, पर स्वयं नहीं बदलती थी; साफ़ धोती पहनना या ‘जी’ कहना नहीं सीखा। 5. कंजूसी, अक्खड़पन, कवियों के प्रति अवज्ञा।
परंतु इन दुर्गुणों के बावजूद उसमें सेवा-भाव, समर्पण, स्नेह, ईमानदारी (नाम बताना), स्वाभिमान और कर्मठता भी थी। इसलिए लेखिका ने कहा कि उसे पूरी तरह ‘अच्छी’ कहना कठिन है— वह गुण-दोषों से भरी एक सजीव मनुष्य है।
क्योंकि भक्तिन में पैसे छिपाना (जिसे वह चोरी नहीं मानती), बात बदलकर बताना, अपनी सुविधा से शास्त्र की व्याख्या करना, हठ, कंजूसी और अक्खड़पन जैसे दुर्गुण थे; पर साथ ही वह सेवा-भाव, समर्पण और स्नेह से भरी थी — वह गुण-दोषों वाली एक सजीव मनुष्य थी।
भक्तिन द्वारा शास्त्र के प्रश्न को सुविधा से सुलझा लेने का क्या उदाहरण लेखिका ने दिया है?
Answer
उत्तर
लेखिका को स्त्रियों का सिर घुटाना (मुंडन) अच्छा नहीं लगता था, इसलिए उन्होंने भक्तिन को सिर मुँडाने से रोका। भक्तिन ने तुरंत उत्तर दिया कि शास्त्र में लिखा है। जब लेखिका ने पूछा कि क्या लिखा है, तो उसने कहा— “तीरथ गए मुँडाए सिद्ध।” यह कौन-से शास्त्र का सूत्र है, लेखिका नहीं जान सकीं और हारकर मौन हो गईं। भक्तिन का चूड़ाकर्म हर बृहस्पतिवार को एक नाई के गंगाजल से धुले उस्तरे से होता रहा। इस प्रकार भक्तिन ने लोक-कहावत को शास्त्र बताकर अपनी सुविधा के अनुसार प्रश्न सुलझा लिया।
लेखिका ने सिर मुँडाने से रोका तो भक्तिन ने कहा कि शास्त्र में लिखा है — “तीरथ गए मुँडाए सिद्ध”; लेखिका निरुत्तर हो गईं और भक्तिन हर बृहस्पतिवार सिर मुँडाती रही।
भक्तिन के आ जाने से महादेवी अधिक देहाती कैसे हो गईं?
Answer
उत्तर
भक्तिन का स्वभाव ऐसा था कि वह दूसरों को अपने अनुसार बदल देना चाहती थी, पर स्वयं नहीं बदलती थी। इसी कारण— 1. भक्तिन ग्रामीण ढंग से खाना बनाती थी— मोटी, काली चित्तीदार रोटियाँ और गाढ़ी दाल; लेखिका को वही खाना पड़ा। 2. उसने लेखिका को मकई का दलिया, बाजरे के तिल वाले पुए, ज्वार के भुट्टे की खिचड़ी, सफ़ेद महुए की लपसी जैसे देहाती व्यंजनों का स्वाद लगा दिया। 3. उसने लेखिका को अपनी भाषा की अनेक दंतकथाएँ कंठस्थ करा दीं। 4. उसने लेखिका को जीवन की सरलता के प्रति इतना जाग्रत कर दिया कि वे अपनी असुविधाएँ छिपाने लगीं।
इस प्रकार लेखिका कहती हैं— “आज मैं अधिक देहाती हूँ; पर उसे शहर की हवा नहीं लग पाई।”
भक्तिन ने स्वयं न बदलकर लेखिका को अपने अनुसार ढाल दिया — उन्हें देहाती खाना (मोटी रोटी, गाढ़ी दाल, मकई का दलिया, महुए की लपसी) खाने की आदत डाल दी, अपनी भाषा की दंतकथाएँ सिखा दीं और सरल जीवन के प्रति जाग्रत कर दिया; इसलिए लेखिका अधिक देहाती हो गईं।
अभ्यास – पाठ के आसपास
आलो आँधारि की नायिका और लेखिका बेबी हालदार और भक्तिन के व्यक्तित्व में आप क्या समानता देखते हैं?
Answer
उत्तर
बेबी हालदार की आत्मकथा ‘आलो आँधारि’ (अंधेरा-उजाला) में वह घरेलू नौकरानी के रूप में अपने संघर्ष का वर्णन करती हैं (कक्षा 11 वितान में पढ़ी)। दोनों में ये समानताएँ हैं—
- बचपन में विवाह और कष्ट: भक्तिन का पाँच वर्ष में और बेबी का बारह-तेरह वर्ष में विवाह हुआ; दोनों का बचपन विमाता/कठिन परिस्थितियों में बीता।
- पारिवारिक उपेक्षा और अत्याचार: भक्तिन को बेटियाँ होने पर ससुराल में उपेक्षा मिली; बेबी को पति के अत्याचार सहने पड़े।
- स्वाभिमान और साहस: दोनों ने अन्याय के आगे सिर नहीं झुकाया— भक्तिन ने संपत्ति नहीं छोड़ी, बेबी ने अत्याचारी पति को छोड़ दिया।
- आत्मनिर्भरता: दोनों शहर आकर घरेलू सेविका बनीं और अपने बल पर जीवन चलाया।
- संवेदनशील मालिक/संरक्षक: भक्तिन को महादेवी का और बेबी को तातुश (प्रबोध कुमार) का सहारा मिला।
- संघर्षशील स्त्री-अस्मिता: दोनों पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के संघर्ष की प्रतीक हैं।
अंतर यह है कि बेबी ने पढ़-लिखकर लेखिका बनकर अपनी पहचान बनाई, जबकि भक्तिन ने पढ़ने से इनकार कर दिया।
दोनों का बचपन कष्टमय रहा, कम उम्र में विवाह हुआ, ससुराल/पति से उपेक्षा-अत्याचार मिला; दोनों स्वाभिमानी, साहसी और संघर्षशील थीं, शहर आकर घरेलू सेविका बनकर आत्मनिर्भर हुईं और संवेदनशील संरक्षक (महादेवी, तातुश) पाए। अंतर: बेबी पढ़-लिखकर लेखिका बनी, भक्तिन ने पढ़ाई से इनकार किया।
भक्तिन की बेटी के मामले में जिस तरह का फ़ैसला पंचायत ने सुनाया, वह आज भी कोई हैरतअंगेज़ बात नहीं है। अखबारों या टी. वी. समाचारों में आनेवाली किसी ऐसी ही घटना को भक्तिन के उस प्रसंग के साथ रखकर उस पर चर्चा करें।
Answer
उत्तर
समाचार-आधारित उदाहरण (सामान्य स्वरूप): समय-समय पर समाचारों में आता है कि हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि के कुछ गाँवों में खाप पंचायतों ने— - अपनी पसंद से अंतर्जातीय या सगोत्र विवाह करने वाले युवक-युवती का विवाह ‘अवैध’ घोषित कर उन्हें भाई-बहन की तरह रहने का आदेश दिया; - प्रेमी जोड़ों के परिवारों का सामाजिक बहिष्कार किया या उन पर जुर्माना लगाया; - कई मामलों में ‘ऑनर किलिंग’ (सम्मान के नाम पर हत्या) जैसी घटनाएँ हुईं; - बलात्कार-पीड़िता का विवाह आरोपी से करवाने का फ़ैसला सुनाया।
भक्तिन के प्रसंग से तुलना: 1. दोनों में स्त्री की इच्छा और सहमति की उपेक्षा है। 2. दोनों में पंचायत ने कानून और न्याय के बजाय ‘परंपरा’, ‘लोकलाज’ या ‘कलियुग’ के नाम पर फ़ैसला किया। 3. दोनों में दंड पीड़ित स्त्री को मिला।
चर्चा का निष्कर्ष: सर्वोच्च न्यायालय ने खाप पंचायतों के ऐसे फ़ैसलों को अवैध घोषित किया है और वयस्कों को अपनी पसंद से विवाह का अधिकार दिया है। आवश्यकता है शिक्षा, कानूनी जागरूकता और स्त्री-सशक्तीकरण की।
खाप पंचायतों द्वारा प्रेम/अंतर्जातीय विवाह को अवैध ठहराना, बहिष्कार, ऑनर किलिंग या पीड़िता का विवाह आरोपी से कराने जैसे समाचार भक्तिन की बेटी के प्रसंग जैसे ही हैं — दोनों में स्त्री की इच्छा की उपेक्षा, परंपरा के नाम पर अन्याय और पीड़िता को दंड है। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे फ़ैसलों को अवैध माना है; शिक्षा और जागरूकता आवश्यक है।
पाँच वर्ष की वय में ब्याही जानेवाली लड़कियों में सिर्फ़ भक्तिन नहीं है, बल्कि आज भी हज़ारों अभागिनियाँ हैं। बाल-विवाह और उम्र के अनमेलपन वाले विवाह की अपने आस-पास हो रही घटनाओं पर दोस्तों के साथ परिचर्चा करें।
Answer
उत्तर
परिचर्चा के बिंदु
- वर्तमान स्थिति: कानून (बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006) के बावजूद देश के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में अक्षय तृतीया जैसे अवसरों पर बाल-विवाह होते हैं। कहीं-कहीं गरीबी के कारण कम उम्र की लड़की का विवाह अधिक उम्र के पुरुष से कर दिया जाता है (अनमेल विवाह)।
- कारण: गरीबी, अशिक्षा, दहेज की चिंता, लड़कियों की सुरक्षा का भय, सामाजिक रूढ़ियाँ, लड़की को ‘पराया धन’ मानना।
- दुष्परिणाम: लड़की की शिक्षा छूट जाती है; कम उम्र में गर्भधारण से माँ और शिशु के स्वास्थ्य को ख़तरा; घरेलू हिंसा; आर्थिक निर्भरता; मानसिक विकास रुक जाता है; अनमेल विवाह में जल्दी वैधव्य (जैसे भक्तिन 29 वर्ष में विधवा हुई)।
- समाधान: लड़कियों की शिक्षा; कानून का सख्ती से पालन; जागरूकता अभियान (बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ); हेल्पलाइन 1098; पंचायतों और समाज की भागीदारी; लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाना।
- हमारी भूमिका: आस-पास बाल-विवाह की सूचना प्रशासन को देना, परिवारों को समझाना।
परिचर्चा: कानून के बावजूद गरीबी, अशिक्षा, दहेज और रूढ़ियों के कारण बाल-विवाह और अनमेल विवाह होते हैं; इनसे शिक्षा छूटती है, स्वास्थ्य-जोखिम, घरेलू हिंसा और जल्दी वैधव्य जैसी समस्याएँ होती हैं। समाधान — लड़कियों की शिक्षा, कानून का सख्त पालन, जागरूकता, हेल्पलाइन 1098 और सामाजिक भागीदारी।
महादेवी जी इस पाठ में हिरनी सोना, कुत्ता बसंत, बिल्ली गोधूलि आदि के माध्यम से पशु-पक्षी को मानवीय संवेदना से उकेरने वाली लेखिका के रूप में उभरती हैं। उन्होंने अपने घर में और भी कई पशु-पक्षी पाल रखे थे तथा उन पर रेखाचित्र भी लिखे हैं। शिक्षक की सहायता से उन्हें ढूँढ़कर पढ़ें। जो मेरा परिवार नाम से प्रकाशित है।
Answer
उत्तर
(पठन-गतिविधि)
महादेवी वर्मा की पुस्तक ‘मेरा परिवार’ (1972) में उनके पाले हुए पशु-पक्षियों पर संस्मरणात्मक रेखाचित्र हैं, जैसे— - गिल्लू (गिलहरी) — जो लेखिका के पास सोता, खाता और उनकी बीमारी में सिरहाने बैठा रहता। - सोना (हिरनी) — जिसकी मृत्यु ने लेखिका को गहरा दुख दिया। - नीलकंठ (मोर) और राधा (मोरनी)। - गौरा (गाय) — जिसे किसी ने गुड़ में सुई खिलाकर मार डाला। - दुर्मुख (खरगोश), नीलू (कुत्ता), सोनजुही में लगी पीली कली, निक्की, रोज़ी और रानी आदि।
इन रेखाचित्रों में लेखिका ने पशु-पक्षियों के स्वभाव, उनकी भावनाओं और मनुष्य के प्रति उनके प्रेम को मानवीय संवेदना के साथ चित्रित किया है। विद्यार्थी पुस्तकालय से ‘मेरा परिवार’ लेकर इन्हें पढ़ें और कक्षा में चर्चा करें।
पठन-गतिविधि: महादेवी वर्मा की ‘मेरा परिवार’ में गिल्लू (गिलहरी), सोना (हिरनी), नीलकंठ (मोर), गौरा (गाय), दुर्मुख (खरगोश), नीलू (कुत्ता) आदि पर संवेदनशील रेखाचित्र हैं; इन्हें पढ़कर कक्षा में चर्चा करें।
अभ्यास – भाषा की बात
नीचे दिए गए विशिष्ट भाषा-प्रयोगों के उदाहरणों को ध्यान से पढ़िए और इनकी अर्थ-छवि स्पष्ट कीजिए- (क) पहली कन्या के दो संस्करण और कर डाले (ख) खोटे सिक्कों की टकसाल जैसी पत्नी (ग) अस्पष्ट पुनरावृत्तियाँ और स्पष्ट सहानुभूतिपूर्ण
Answer
उत्तर
(क) पहली कन्या के दो संस्करण और कर डाले: ‘संस्करण’ शब्द पुस्तकों के लिए प्रयुक्त होता है। भक्तिन ने पहली बेटी के बाद दो और बेटियों को जन्म दिया— जैसे एक पुस्तक के दो और संस्करण छप जाएँ। इस प्रयोग में व्यंग्य है कि समाज की दृष्टि में बेटियाँ एक जैसी, अनचाही ‘प्रतियाँ’ थीं। लेखिका ने हलके हास्य-व्यंग्य से पुत्र-मोह पर चोट की है।
(ख) खोटे सिक्कों की टकसाल जैसी पत्नी: टकसाल में सिक्के ढाले जाते हैं; खोटा सिक्का बेकार माना जाता है। उस समाज में बेटियों को ‘खोटा सिक्का’ (मूल्यहीन) समझा जाता था और भक्तिन, जिसने केवल बेटियाँ पैदा कीं, ‘खोटे सिक्कों की टकसाल’ मानी गई। यह पुरुषप्रधान समाज की बेटियों के प्रति हीन दृष्टि पर व्यंग्य है।
(ग) अस्पष्ट पुनरावृत्तियाँ और स्पष्ट सहानुभूतिपूर्ण (दृष्टियाँ): जब भक्तिन पिता की मृत्यु के बाद मायके पहुँची, तो गाँव वाले “हाय लछमिन अब आई” बार-बार धीमे, अस्पष्ट स्वर में कह रहे थे (अस्पष्ट पुनरावृत्तियाँ), पर उनकी आँखों में सहानुभूति साफ़ झलक रही थी (स्पष्ट सहानुभूतिपूर्ण दृष्टियाँ)। इससे भक्तिन को बिना बताए ही अनहोनी का आभास हो गया। ‘अस्पष्ट’ और ‘स्पष्ट’ के विरोध से भाव सजीव हो उठा है।
(क) पुस्तक के संस्करण की तरह दो और बेटियाँ पैदा कीं — पुत्र-मोही समाज पर व्यंग्य। (ख) बेटियों को ‘खोटा सिक्का’ मानने वाले समाज में केवल बेटियाँ जनने वाली पत्नी ‘खोटे सिक्कों की टकसाल’ — बेटियों के प्रति हीन दृष्टि पर व्यंग्य। (ग) गाँववालों का “हाय लछमिन अब आई” धीमे स्वर में बार-बार कहना और उनकी आँखों में साफ़ झलकती सहानुभूति — जिससे भक्तिन को अनहोनी का आभास हुआ।
‘बहनोई’ शब्द ‘बहन (स्त्री.)+ओई’ से बना है। इस शब्द में हिंदी भाषा की एक अनन्य विशेषता प्रकट हुई है। पुंलिंग शब्दों में कुछ स्त्री-प्रत्यय जोड़ने से स्त्रीलिंग शब्द बनने की एक समान प्रक्रिया कई भाषाओं में दिखती है, पर स्त्रीलिंग शब्द में कुछ पुं. प्रत्यय जोड़कर पुंलिंग शब्द बनाने की घटना प्रायः अन्य भाषाओं में दिखलाई नहीं पड़ती। यहाँ पुं. प्रत्यय ‘ओई’ हिंदी की अपनी विशेषता है। ऐसे कुछ और शब्द और उनमें लगे पुं. प्रत्ययों की हिंदी तथा और भाषाओं में खोज करें।
Answer
उत्तर
हिंदी में स्त्रीलिंग से पुंलिंग बनने वाले शब्द
स्त्रीलिंग | पुं. प्रत्यय | पुंलिंग |
|---|---|---|
बहन | -ओई | बहनोई |
ननद | -ओई | ननदोई |
भैंस | -आ | भैंसा |
भेड़ | -आ | भेड़ा |
जीजी | -आ | जीजा |
मौसी | -आ | मौसा |
बुआ/फूफी | -आ | फूफा |
राँड़ | -उआ | रँडुआ |
बिल्ली | -आव | बिलाव |
अन्य भाषाओं में: - अंग्रेज़ी: widow → widower (-er प्रत्यय), bride → bridegroom (-groom)। - संस्कृत में भी सामान्यतः पुंलिंग से स्त्रीलिंग बनते हैं (देव→देवी), उलटी प्रक्रिया बहुत कम है।
अतः स्त्रीलिंग से पुंलिंग बनाने की प्रक्रिया हिंदी की विशेषता है।
हिंदी: बहन→बहनोई, ननद→ननदोई (-ओई), भैंस→भैंसा, भेड़→भेड़ा, जीजी→जीजा, मौसी→मौसा, फूफी→फूफा (-आ), राँड़→रँडुआ, बिल्ली→बिलाव। अन्य भाषाएँ: अंग्रेज़ी widow→widower, bride→bridegroom।
पाठ में आए लोकभाषा के इन संवादों को समझ कर इन्हें खड़ी बोली हिंदी में ढाल कर प्रस्तुत कीजिए। (क) ई कउन बड़ी बात आय। रोटी बनाय जानित है, दाल राँध लेइत है, साग-भाजी छँउक सकित है, अउर बाकी का रहा। (ख) हमारे मालकिन तौ रात-दिन कितबियन माँ गड़ी रहती हैं। अब हमहूँ पढ़ै लागब तो घर-गिरिस्ती कउन देखी-सुनी। (ग) ऊ बिचरिअउ तौ रात-दिन काम माँ झुकी रहती हैं, अउर तुम पचै घूमती-फिरती हौ, चलौ तनिक हाथ बटाय लेउ। (घ) तब ऊ कुच्छौ करिहैं-धरिहैं ना—बस गली-गली गाउत-बजाउत फिरिहैं। (ङ) तुम पचै का का बताईयहै पचास बरिस से संग रहित है। (च) हम कुकुरी बिलारी न होयँ, हमार मन पुसाई तौ हम दूसरा के जाब नाहिं त तुम्हार पचै की छाती पै होरहा भूँजब और राज करब, समुझे रहौ।
Answer
उत्तर
(क) यह कौन-सी बड़ी बात है! मैं रोटी बनाना जानती हूँ, दाल पका लेती हूँ, साग-सब्ज़ी छौंक सकती हूँ, और बाकी क्या रहा?
(ख) हमारी मालकिन तो रात-दिन किताबों में डूबी रहती हैं। अब अगर मैं भी पढ़ने लगूँगी तो घर-गृहस्थी कौन देखेगा-सँभालेगा?
(ग) वे बेचारी तो रात-दिन काम में झुकी रहती हैं, और तुम लोग घूमती-फिरती रहती हो! चलो, थोड़ा हाथ बँटा दो।
(घ) तब वे कुछ भी करेंगे-धरेंगे नहीं, बस गली-गली गाते-बजाते फिरेंगे।
(ङ) तुम लोगों को क्या-क्या बताऊँ— यही पचास वर्ष से साथ रह रही हूँ।
(च) हम कुतिया-बिल्ली नहीं हैं। हमारा मन चाहेगा तो हम दूसरे के घर जाएँगी, नहीं तो तुम लोगों की छाती पर होरहा भूनेंगी (तुम्हें जलाएँगी) और राज करेंगी, समझ लो।
(क) यह कौन-सी बड़ी बात है! रोटी बनाना जानती हूँ, दाल पका लेती हूँ, सब्ज़ी छौंक सकती हूँ, और बाकी क्या रहा? (ख) हमारी मालकिन रात-दिन किताबों में डूबी रहती हैं; अब मैं भी पढ़ने लगूँ तो घर-गृहस्थी कौन सँभालेगा? (ग) वे बेचारी रात-दिन काम में लगी रहती हैं और तुम लोग घूमती हो; चलो थोड़ा हाथ बँटाओ। (घ) तब वे कुछ नहीं करेंगे, बस गली-गली गाते-बजाते फिरेंगे। (ङ) तुम लोगों को क्या बताऊँ, पचास वर्ष से साथ रह रही हूँ। (च) हम कुतिया-बिल्ली नहीं; मन होगा तो दूसरे के घर जाएँगी, नहीं तो तुम्हारी छाती पर होरहा भूनकर राज करेंगी, समझ लो।
उत्तर
भक्तिन पाठ में पहली कन्या के दो संस्करण जैसे प्रयोग लेखिका के खास भाषाई संस्कार की पहचान कराता है, साथ ही ये प्रयोग कथ्य को संप्रेषणीय बनाने में भी मददगार हैं। वर्तमान हिंदी में भी कुछ अन्य प्रकार की शब्दावली समाहित हुई है। नीचे दिए वाक्य पढ़कर बताएँ कि इनमें किन तीन विशेष प्रकार की शब्दावली का प्रयोग हुआ है? इन शब्दावलियों या अन्य विशेष शब्दावलियों का प्रयोग करते हुए आप भी कुछ वाक्य बनाएँ और चर्चा करें कि ऐसे प्रयोग भाषा की समृद्धि में कहाँ तक सहायक हैं? — अरे! उससे सावधान रहना! वह नीचे से ऊपर तक वायरस से भरा हुआ है। जिस सिस्टम में जाता है उसे हैंग कर देता है। — घबरा मत! मेरी इनस्वींगर के सामने उसके सारे वायरस घुटने टेकेंगे। अगर ज़्यादा फ़ाउल मारा तो रेड कार्ड दिखा के हमेशा के लिए पवेलियन भेज दूँगा। — जानी टेंसन नई लेने का वो जिस स्कूल में पढ़ता है अपुन उसका हैडमास्टर है।
Answer
उत्तर
तीन प्रकार की शब्दावली: 1. कंप्यूटर/तकनीकी शब्दावली — वायरस, सिस्टम, हैंग। 2. खेल शब्दावली — इनस्वींगर, फ़ाउल, रेड कार्ड, पवेलियन (क्रिकेट-फ़ुटबॉल)। 3. मुंबइया/फ़िल्मी (टपोरी) बोली — जानी, टेंसन नई लेने का, अपुन।
स्वयं बनाए वाक्य: - (तकनीकी) “आजकल उसका दिमाग़ लो बैटरी पर चल रहा है, थोड़ा रिचार्ज होने दो।” - (खेल) “परीक्षा में उसने ऐसा छक्का मारा कि सब क्लीन बोल्ड हो गए।” - (फ़िल्मी) “बोले तो एकदम झकास काम किया है भिड़ू!” - (बैंकिंग/व्यापार) “दोस्ती में उसका बैलेंस हमेशा माइनस में रहता है।” - (चिकित्सा) “इस समस्या का ऑपरेशन करना ही पड़ेगा, मरहम-पट्टी से काम नहीं चलेगा।”
चर्चा— भाषा की समृद्धि में सहायक: - ऐसे प्रयोग भाषा को जीवंत, रोचक और समयानुकूल बनाते हैं; नए अनुभवों को व्यक्त करने के लिए नए मुहावरे मिलते हैं। - विभिन्न क्षेत्रों के शब्द आने से शब्द-भंडार बढ़ता है। - परंतु अत्यधिक या अनुचित प्रयोग से भाषा की शुद्धता और गंभीरता प्रभावित होती है; औपचारिक लेखन में संतुलन आवश्यक है।
तीन शब्दावलियाँ: कंप्यूटर/तकनीकी (वायरस, सिस्टम, हैंग), खेल (इनस्वींगर, फ़ाउल, रेड कार्ड, पवेलियन) और मुंबइया/फ़िल्मी बोली (जानी, टेंसन नई लेने का, अपुन)। अपने वाक्य — जैसे “उसका दिमाग़ लो बैटरी पर है”, “परीक्षा में छक्का मारा”। ऐसे प्रयोग भाषा को जीवंत, रोचक और समृद्ध बनाते हैं, पर औपचारिक संदर्भों में संतुलन ज़रूरी है।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ नाम, जिठानियाँ, पंचायत, दुर्गुण, शास्त्र, देहाती (प्रश्न 1–6)
- ☒ बेबी हालदार, पंचायत के फ़ैसले, बाल-विवाह, मेरा परिवार (प्रश्न 7–10)
- ☒ भाषा-प्रयोग, पुं. प्रत्यय, लोकभाषा, विशेष शब्दावली (प्रश्न 11–14)