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Class 12 Hindi Aroh Chapter 14

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 14: शिरीष के फूल

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XII

Hindi

Aroh (NCERT)

14 – शिरीष के फूल

2026-27

13 of 13

बिंदु

विवरण

लेखक

हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907–1979), आरत दुबे का छपरा, बलिया; ललित निबंधकार, उपन्यासकार, आलोचक

प्रमुख रचनाएँ

अशोक के फूल, कल्पलता, कुटज, आलोक पर्व (निबंध); बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा (उपन्यास); हिंदी साहित्य की भूमिका

विधा

ललित निबंध (‘कल्पलता’ से)

शिरीष

जेठ की प्रचंड गरमी, आँधी, लू में भी फूलता रहता है — “कालजयी अवधूत”; वसंत से भादों तक फूलता है; ऊपर से कोमल, भीतर से कठोर; पुराने फल नए फलों के धकियाने तक डटे रहते हैं

प्रमुख विचार

मनुष्य की अजेय जिजीविषा; कोमलता और कठोरता का संतुलन (गांधी); “जमे कि मरे” — गतिशीलता ही जीवन; सच्चा कवि अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय रखता है (कालिदास); “हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!”

अभ्यास – पाठ के साथ

Q1

लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत (संन्यासी) की तरह क्यों माना है?

Answer

उत्तर

अवधूत वह संन्यासी है जो सुख-दुख, मान-अपमान, गरमी-सरदी से अप्रभावित रहता है। लेखक ने शिरीष को ‘कालजयी अवधूत’ इसलिए माना है क्योंकि— 1. जब जेठ की चिलचिलाती धूप, आँधी और लू से धरती जल रही होती है और अधिकांश पेड़-पौधे सूख जाते हैं, तब भी शिरीष फूलों से लदा रहता है। 2. वह वसंत से आषाढ़ तक और “मन रम गया तो भरे भादों में भी निर्घात फूलता” रहता है— काल (समय) की मार उसे पराजित नहीं कर पाती। 3. वह विषम परिस्थितियों में भी अविचल, शांत और मस्त रहता है; वायुमंडल से रस खींचकर कोमल और कठोर दोनों बना रहता है। 4. संन्यासी की तरह वह निर्लिप्त और अनासक्त है; जीवन के प्रति अदम्य आस्था (जिजीविषा) रखता है।

क्योंकि जेठ की प्रचंड गरमी, आँधी और लू में, जब सब मुरझा जाते हैं, शिरीष संन्यासी की तरह अविचल, निर्लिप्त और मस्त रहकर लंबे समय तक फूलता रहता है — काल की मार उसे पराजित नहीं कर पाती।

Q2

हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी ज़रूरी हो जाती है— प्रस्तुत पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

Answer

उत्तर

  1. शिरीष के फूल अत्यंत कोमल होते हैं, पर उसके फल बहुत कठोर और मज़बूत होते हैं— वे तब तक डटे रहते हैं जब तक नए फल-पत्ते उन्हें धकियाकर बाहर नहीं कर देते। शिरीष “वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है”।
  2. शिरीष की कठोरता ही उसे भीषण गरमी, आँधी और लू में बचाए रखती है, जिससे उसकी कोमलता (फूल) सुरक्षित रहती है।
  3. गांधी जी भी “वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सका था”— उनका हृदय करुणा और प्रेम से भरा था, पर सत्य, अहिंसा और अन्याय के विरोध में वे अडिग और कठोर थे।
  4. जीवन में भी हृदय की संवेदनशीलता को बचाए रखने के लिए कभी-कभी कठोर निर्णय और दृढ़ व्यवहार आवश्यक होता है; अन्यथा दुनिया कोमल हृदय का शोषण करती है या उसे तोड़ देती है।

शिरीष के फूल कोमल हैं, पर फल और तना कठोर — यही कठोरता उसे गरमी-आँधी-लू से बचाकर उसकी कोमलता सुरक्षित रखती है। गांधी जी भी करुणामय हृदय के साथ सत्य-अहिंसा पर अडिग, कठोर थे। जीवन में भी संवेदनशीलता बचाने के लिए दृढ़ और कठोर व्यवहार आवश्यक होता है।

Q3

द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रह कर जिजीविषु बने रहने की सीख दी है। स्पष्ट करें।

Answer

उत्तर

  1. शिरीष भीषण गरमी, आँधी, लू— जैसी कठोर परिस्थितियों में भी सरस, हरा-भरा और फूलों से लदा रहता है। लेखक पूछता है— “इस चिलकती धूप में इतना सरस वह कैसे बना रहता है?”
  2. लेखक देश में फैले “मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट, खून-खच्चर का बवंडर” की बात करता है और कहता है कि ऐसे में भी “शिरीष रह सका है। अपने देश का एक बूढ़ा (गांधी) रह सका था।”
  3. शिरीष की जड़ें गहरी हैं, वह धरती और वायुमंडल से रस खींचकर जीवित रहता है— अर्थात भीतर की आस्था और आत्मबल से ही संघर्ष में टिका जा सकता है।
  4. सीख: मनुष्य को भी जीवन के कोलाहल, कलह, संघर्ष, दुख और विपत्तियों में घबराना नहीं चाहिए; धैर्य और शांति के साथ अविचल रहकर, जीने की इच्छा (जिजीविषा) बनाए रखते हुए अपने कर्तव्य करते रहना चाहिए।

शिरीष भीषण गरमी-लू-आँधी में भी सरस और फूलों से लदा रहता है, जैसे गांधी देश की मार-काट और हिंसा के बीच भी अविचल रहे। इससे सीख मिलती है कि जीवन के कोलाहल और संघर्ष में घबराए बिना, भीतर के आत्मबल से धैर्यपूर्वक अविचल रहकर जीने की इच्छा और कर्तव्य बनाए रखें।

Q4

हाय, वह अवधूत आज कहाँ है! ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की ओर संकेत किया है। कैसे?

Answer

उत्तर

  1. ‘अवधूत’ से लेखक का संकेत महात्मा गांधी की ओर है, जिन्होंने देह-बल (हिंसा, हथियार, सत्ता) के स्थान पर आत्मबल (सत्य, अहिंसा, प्रेम, त्याग) से अंग्रेज़ों जैसी शक्तिशाली सत्ता का सामना किया।
  2. गांधी शिरीष की तरह कोमल और कठोर दोनों थे; हिंसा, मार-काट और लूटपाट के बवंडर में भी अविचल रहे।
  3. आज की सभ्यता में देह-बल— हिंसा, आतंक, युद्ध, हथियारों की होड़, धन और सत्ता का दुरुपयोग— का बोलबाला है; नैतिक मूल्य, सत्य, अहिंसा और आत्मबल उपेक्षित हो गए हैं।
  4. लेखक को पीड़ा है कि आज गांधी जैसा कोई महापुरुष नहीं है जो आत्मबल से समाज का मार्गदर्शन कर सके। इसलिए जब-जब वह शिरीष को देखता है तो “हूक उठती है— हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!”

यह वर्तमान सभ्यता के नैतिक संकट की ओर संकेत है।

‘अवधूत’ गांधी हैं, जिन्होंने देह-बल के बजाय सत्य-अहिंसा के आत्मबल से संघर्ष किया और हिंसा के बीच अविचल रहे। आज हिंसा, युद्ध, सत्ता और धन (देह-बल) का वर्चस्व है और आत्मबल व नैतिक मूल्य उपेक्षित हैं; गांधी जैसे मार्गदर्शक के अभाव की पीड़ा इस सभ्यता के नैतिक संकट की ओर संकेत करती है।

Q5

कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय— एक साथ आवश्यक है। ऐसा विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य-कर्म के लिए बहुत ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है। विस्तारपूर्वक समझाएँ।

Answer

उत्तर

लेखक कहता है— “कालिदास वज़न ठीक रख सकते थे, क्योंकि वे अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय पा चुके थे।”

  1. अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता: योगी सांसारिक मोह-माया, स्वार्थ, यश-लाभ से मुक्त होता है; उसकी बुद्धि स्थिर और निष्पक्ष होती है। साहित्यकार को भी निजी स्वार्थ, पक्षपात और भावावेग से ऊपर उठकर संतुलित, तटस्थ दृष्टि से सत्य को देखना चाहिए।
  2. विदग्ध प्रेमी का हृदय: प्रेमी का हृदय संवेदनशील, रसिक और भावनाओं से परिपूर्ण होता है; वह सौंदर्य और पीड़ा को गहराई से अनुभव करता है। साहित्यकार में भी गहरी संवेदना और सौंदर्य-बोध होना चाहिए, तभी वह पाठक के हृदय को छू सकता है।
  3. दोनों का संतुलन: केवल अनासक्ति से रचना शुष्क और दार्शनिक हो जाएगी; केवल प्रेम-भाव से वह भावुक और असंतुलित हो जाएगी। दोनों के मेल से ही श्रेष्ठ साहित्य बनता है— जैसे कालिदास, जिन्होंने शकुंतला के सौंदर्य का सरस वर्णन किया पर संतुलन नहीं खोया।
  4. फक्कड़पन: “जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका… वह भी क्या कवि है?”— कबीर और कालिदास ऐसे ही कवि थे।
  5. ऊँचा मानदंड: केवल छंद बनाना या तुक जोड़ना कवि होना नहीं— “मैं भी छंद बना लेता हूँ, तुक जोड़ लेता हूँ और कालिदास भी… इसलिए हम दोनों एक श्रेणी के नहीं हो जाते।” सच्चा साहित्यकार बनने के लिए साधना, संतुलन और संवेदना तीनों आवश्यक हैं— यही ऊँचा मानदंड है।

लेखक के अनुसार सच्चे साहित्यकार में योगी जैसी अनासक्त, स्थिर, निष्पक्ष बुद्धि (स्वार्थ और भावावेग से मुक्त) और प्रेमी जैसा संवेदनशील, रसिक हृदय — दोनों एक साथ होने चाहिए; केवल एक से रचना शुष्क या भावुक-असंतुलित हो जाएगी। कालिदास और कबीर ऐसे फक्कड़, संतुलित कवि थे; केवल छंद-तुक जोड़ना कवि होना नहीं — यह साहित्य-कर्म का ऊँचा मानदंड है।

Q6

सर्वग्रासी काल की मार से बचते हुए वही दीर्घजीवी हो सकता है, जिसने अपने व्यवहार में जड़ता छोड़कर नित बदल रही स्थितियों में निरंतर अपनी गतिशीलता बनाए रखी है। पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

Answer

उत्तर

  1. लेखक कहता है— “महाकालदेवता सपासप कोड़े चला रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं, जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिक जाते हैं।”
  2. “दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा जाएँगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे।”
  3. शिरीष के पुराने फल जड़ता के प्रतीक हैं— वे नए फलों के धकेलने तक डटे रहते हैं और खड़खड़ाते हैं; लेखक को उन नेताओं की याद आती है जो “ज़माने का रुख नहीं पहचानते” और “नयी पौध” के धक्का देने तक जमे रहते हैं।
  4. “जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना”— जो फलता है वह झड़ता है; परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
  5. निष्कर्ष: जो व्यक्ति, समाज या विचार समय के साथ बदलता है, नई परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालता है और आगे की ओर देखता है, वही टिकता है; जड़ता मृत्यु है।

काल (समय) निरंतर कोड़े चलाकर जीर्ण-दुर्बल को झाड़ देता है; जो जड़ होकर एक जगह जमे रहते हैं (शिरीष के पुराने फल, ज़माने का रुख न पहचानने वाले नेता) वे नष्ट होते हैं — “जमे कि मरे”। जो हिलते-डुलते, स्थान बदलते, आगे की ओर मुँह किए रहते हैं, अर्थात बदलती परिस्थितियों के अनुसार गतिशील रहते हैं, वही दीर्घजीवी होते हैं।

Q7

आशय स्पष्ट कीजिए— (क) दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा पाएँगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे। (ख) जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है?…..मैं कहता हूँ कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो। (ग) फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है।

Answer

उत्तर

(क) जीवन की अदम्य शक्ति (प्राणधारा) और सब कुछ नष्ट कर देने वाली काल (मृत्यु/समय) की अग्नि के बीच निरंतर संघर्ष चल रहा है। जो लोग सोचते हैं कि एक ही स्थान, स्थिति या विचार पर जमे रहकर वे काल से बच जाएँगे, वे भोले और मूर्ख हैं। काल से बचने का उपाय है— गतिशील रहना, परिवर्तन को स्वीकार करना, समय के साथ बदलना और प्रगति की ओर बढ़ते रहना। जो जड़ हो जाता है, वह नष्ट हो जाता है— “जमे कि मरे”।

(ख) सच्चा कवि वही है जो सांसारिक मोह-माया, लाभ-हानि और यश की चिंता से मुक्त (अनासक्त) हो और मस्तमौला (फक्कड़) हो। जो कवि अपनी रचनाओं के बदले मिलने वाले लाभ, प्रशंसा या पुरस्कार का हिसाब-किताब करता रहता है, वह सच्चा कवि नहीं है। लेखक कहता है कि कवि बनना है तो शिरीष और कबीर की तरह फक्कड़ बनो।

(ग) फूल या पेड़ केवल अपने आप में पूर्ण नहीं हैं; उनका अस्तित्व किसी बड़े सत्य की ओर संकेत करता है। जैसे उठी हुई अँगुली किसी वस्तु की ओर इशारा करती है, वैसे ही प्रकृति का हर रूप जीवन के किसी गहरे सत्य, सौंदर्य, जिजीविषा या परमात्मा की ओर संकेत करता है। शिरीष भी कठिन परिस्थितियों में अविचल रहने और अजेय जिजीविषा का इशारा करता है।

(क) जीवन-शक्ति और काल का संघर्ष निरंतर है; जड़ होकर जमे रहने वाले नष्ट होते हैं, जबकि परिवर्तन स्वीकारकर गतिशील, प्रगतिशील रहने वाले बच सकते हैं — “जमे कि मरे”। (ख) सच्चा कवि लाभ-हानि-यश से अनासक्त, फक्कड़ होता है; जो लेखा-जोखा में उलझा, वह कवि नहीं। (ग) फूल-पेड़ अपने में पूर्ण नहीं, वे किसी बड़े सत्य (सौंदर्य, जिजीविषा, परमात्मा) की ओर उठी अँगुली/इशारा हैं।

अभ्यास – पाठ के आसपास

Q8

शिरीष के पुष्प को शीतपुष्प भी कहा जाता है। ज्येष्ठ माह की प्रचंड गरमी में फूलने वाले फूल को शीतपुष्प संज्ञा किस आधार पर दी गई होगी?

Answer

उत्तर

  1. ज्येष्ठ की प्रचंड गरमी में जब चारों ओर तपन होती है, तब शिरीष के कोमल, हलके, रेशे जैसे फूल आँखों और मन को शीतलता और ठंडक देते हैं।
  2. उसकी घनी छाया और हरियाली राहगीरों को गरमी से राहत देती है।
  3. शिरीष के फूल अत्यंत कोमल होते हैं— इतने कि भ्रमरों के पैर का दबाव भी सह सकें, पक्षियों का नहीं; उनकी कोमलता शीतलता का भाव जगाती है।
  4. आयुर्वेद में शिरीष को शीतल प्रकृति का माना गया है; यह गरमी और विष के प्रभाव को शांत करने वाला है।
  5. वह स्वयं गरमी से अप्रभावित रहकर शीतल बना रहता है— अवधूत की तरह शांत।

प्रचंड गरमी में भी शिरीष के कोमल, हलके फूल और घनी छाया आँखों-मन को शीतलता और राहत देते हैं; वह स्वयं गरमी से अप्रभावित शांत रहता है और आयुर्वेद में भी शीतल प्रकृति का माना गया है — इसलिए उसे शीतपुष्प कहा गया होगा।

Q9

कोमल और कठोर दोनों भाव किस प्रकार गांधीजी के व्यक्तित्व की विशेषता बन गए।

Answer

उत्तर

कोमलता: 1. गांधी जी का हृदय करुणा, प्रेम और दया से भरा था; वे गरीबों, दलितों (हरिजनों), किसानों और पीड़ितों के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे। 2. वे अपने विरोधियों से भी घृणा नहीं करते थे; अहिंसा और क्षमा उनके स्वभाव में थी। 3. उनकी सादगी, विनम्रता और सेवा-भाव उनकी कोमलता के प्रमाण हैं।

कठोरता: 1. सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर वे अडिग थे; किसी भी स्थिति में समझौता नहीं करते थे— चौरी-चौरा की हिंसा पर उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। 2. अंग्रेज़ी सत्ता के अन्याय के विरुद्ध वे दृढ़ता से डटे रहे— जेल गए, लंबे अनशन किए। 3. स्वयं के प्रति कठोर अनुशासन— उपवास, ब्रह्मचर्य, सादा भोजन, श्रम।

निष्कर्ष: जैसे शिरीष “वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर” है, वैसे ही गांधी जी भी अपने परिवेश और जनता से शक्ति लेकर हृदय से कोमल और सिद्धांतों में कठोर बने। इसी संतुलन ने उन्हें “अवधूत” बनाया।

गांधी जी हृदय से कोमल थे — गरीबों, दलितों और विरोधियों के प्रति भी करुणा, प्रेम, क्षमा और सेवा-भाव रखते थे; पर सत्य-अहिंसा के सिद्धांतों, अन्याय के विरोध और आत्म-अनुशासन में अत्यंत कठोर और अडिग थे (चौरी-चौरा पर आंदोलन वापसी, अनशन, जेल)। शिरीष की तरह यही कोमलता-कठोरता का संतुलन उनकी विशेषता थी।

Q10

आजकल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय फूलों की बहुत माँग है। बहुत से किसान साग-सब्ज़ी व अन्न उत्पादन छोड़ फूलों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी मुद्दे को विषय बनाते हुए वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन करें।

Answer

उत्तर

विषय: “किसानों का अन्न-उत्पादन छोड़कर फूलों की खेती अपनाना उचित है।”

पक्ष में तर्क: 1. फूलों की खेती (पुष्प-कृषि) में कम भूमि में अधिक आय होती है; अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गुलाब, गेंदा, रजनीगंधा, ऑर्किड की भारी माँग है। 2. निर्यात से विदेशी मुद्रा आती है; किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरती है। 3. ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर बढ़ते हैं— तुड़ाई, पैकेजिंग, परिवहन। 4. सरकार भी बागवानी और पुष्प-कृषि को प्रोत्साहन दे रही है; ग्रीनहाउस तकनीक से साल भर खेती संभव। 5. फूल इत्र, दवा, सौंदर्य-प्रसाधन उद्योगों के लिए कच्चा माल हैं।

विपक्ष में तर्क: 1. भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में खाद्य सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है; अन्न-उत्पादन घटा तो खाद्यान्न की कमी और महँगाई बढ़ेगी। 2. फूल जल्दी ख़राब होने वाली फसल है; भंडारण, शीत-गृह और परिवहन की कमी से नुकसान का ख़तरा। 3. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की माँग और मूल्य अस्थिर होते हैं; छोटे किसान बाज़ार के उतार-चढ़ाव में बर्बाद हो सकते हैं। 4. फूलों की खेती में अधिक पानी, रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। 5. बिचौलियों और बड़ी कंपनियों का लाभ अधिक, किसान का कम।

निष्कर्ष (संचालक): संतुलन आवश्यक है— किसान अपनी भूमि के एक भाग में फूलों की खेती करें और शेष में अन्न-सब्ज़ी उगाएँ; सरकार शीत-गृह, सहकारी समितियाँ और न्यूनतम मूल्य जैसी सुविधाएँ दे।

वाद-विवाद: पक्ष — कम भूमि में अधिक आय, निर्यात और विदेशी मुद्रा, रोज़गार, सरकारी प्रोत्साहन, उद्योगों के लिए कच्चा माल। विपक्ष — खाद्य सुरक्षा पर संकट, जल्दी ख़राब होने वाली फसल और भंडारण की कमी, बाज़ार की अस्थिरता, अधिक पानी-रसायन, बिचौलियों का लाभ। निष्कर्ष — संतुलन: भूमि के एक भाग में फूल, शेष में अन्न-सब्ज़ी, साथ में सरकारी सहायता।

Q11

हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने इस पाठ की तरह ही वनस्पतियों के संदर्भ में कई व्यक्तित्व व्यंजक ललित निबंध और भी लिखे हैं—कुटज, आम फिर बौरा गए, अशोक के फूल, देवदारु आदि। शिक्षक की सहायता से इन्हें ढूँढ़िए और पढ़िए।

Answer

उत्तर

(पठन-गतिविधि)

द्विवेदी जी के वनस्पति-संबंधी प्रमुख ललित निबंध— 1. कुटज — हिमालय की कठोर, सूखी चट्टानों पर उगने वाला कुटज विपरीत परिस्थितियों में भी जीने की अदम्य इच्छा का प्रतीक है; “जीना भी एक कला है”। 2. अशोक के फूल — कभी भारतीय साहित्य और संस्कृति में अत्यंत प्रतिष्ठित अशोक के फूल का धीरे-धीरे विस्मृत हो जाना; संस्कृति के परिवर्तनशील स्वरूप पर चिंतन। 3. आम फिर बौरा गए — वसंत में आम के बौर के माध्यम से जीवन के उल्लास, परंपरा और प्रकृति के चक्र का चित्रण। 4. देवदारु — हिमालय के ऊँचे, सीधे, अडिग देवदारु के माध्यम से दृढ़ता और गरिमा का संदेश।

इन निबंधों में वनस्पतियों के बहाने मानवीय मूल्यों, भारतीय संस्कृति और जीवन-दर्शन की व्याख्या की गई है। विद्यार्थी ‘कल्पलता’, ‘अशोक के फूल’ और ‘कुटज’ संग्रहों से इन्हें पढ़ें।

पठन-गतिविधि: ‘कुटज’ (कठोर चट्टानों पर जिजीविषा), ‘अशोक के फूल’ (विस्मृत होती सांस्कृतिक प्रतिष्ठा), ‘आम फिर बौरा गए’ (वसंत, जीवन का उल्लास), ‘देवदारु’ (दृढ़ता और गरिमा) — इनमें वनस्पतियों के बहाने मानवीय मूल्यों और भारतीय संस्कृति का चिंतन है; इन्हें ‘कल्पलता’, ‘अशोक के फूल’, ‘कुटज’ संग्रहों में पढ़ें।

Q12

द्विवेदी जी की वनस्पतियों में ऐसी रुचि का क्या कारण हो सकता है? आज साहित्यिक रचना-फलक पर प्रकृति की उपस्थिति न्यून से न्यून होती जा रही है। तब ऐसी रचनाओं का महत्व बढ़ गया है। प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण रुचिपूर्ण है या उपेक्षामय? इसका मूल्यांकन करें।

Answer

उत्तर

द्विवेदी जी की वनस्पतियों में रुचि के कारण: 1. उनका जन्म और बचपन गाँव (बलिया) में प्रकृति की गोद में बीता। 2. वे शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर के संपर्क में रहे, जहाँ प्रकृति-प्रेम और प्रकृति के बीच शिक्षा का वातावरण था। 3. संस्कृत साहित्य (कालिदास आदि) के गहरे अध्येता थे, जिसमें प्रकृति का अत्यंत सुंदर चित्रण है। 4. भारतीय संस्कृति में वृक्षों-पुष्पों का धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व है। 5. वे वनस्पतियों में मानवीय गुण और जीवन-दर्शन देखते थे।

आज ऐसी रचनाओं का महत्व: शहरीकरण, उपभोक्तावाद और तकनीक के युग में मनुष्य प्रकृति से दूर हो रहा है; पर्यावरण-संकट गहरा रहा है। ऐसी रचनाएँ प्रकृति के प्रति संवेदना, सम्मान और संरक्षण की भावना जगाती हैं।

मेरा दृष्टिकोण (आत्म-मूल्यांकन): मेरा दृष्टिकोण रुचिपूर्ण है, यद्यपि व्यस्तता के कारण कभी-कभी उपेक्षा भी हो जाती है। - मुझे बगीचे में समय बिताना, पेड़ लगाना, पक्षियों को देखना और सूर्योदय-सूर्यास्त निहारना अच्छा लगता है। - मैंने अपने घर में गमलों में तुलसी, गुलाब और मनी-प्लांट लगाए हैं; जन्मदिन पर पौधा लगाता हूँ। - मैं पानी और बिजली बचाने, प्लास्टिक कम करने का प्रयास करता हूँ। - परंतु मोबाइल और पढ़ाई में व्यस्त रहने के कारण कभी-कभी प्रकृति के साथ समय नहीं बिता पाता— इसमें सुधार की आवश्यकता है।

कारण: ग्रामीण बचपन, शांतिनिकेतन और टैगोर का प्रभाव, संस्कृत साहित्य (कालिदास) का अध्ययन, भारतीय संस्कृति में वृक्षों का महत्व और वनस्पतियों में मानवीय गुण देखने की दृष्टि। आज प्रकृति से बढ़ती दूरी और पर्यावरण-संकट में ऐसी रचनाएँ प्रकृति के प्रति संवेदना जगाती हैं। आत्म-मूल्यांकन: मेरा दृष्टिकोण रुचिपूर्ण है (पौधे लगाना, पानी-बिजली बचाना, प्रकृति निहारना), पर व्यस्तता में कभी-कभी उपेक्षा भी होती है।

अभ्यास – भाषा की बात

Q13

दस दिन फूले और फिर खंखड़-खंखड़ इस लोकोक्ति से मिलते-जुलते कई वाक्यांश पाठ में हैं। उन्हें छाँट कर लिखें।

Answer

उत्तर

पाठ में आए मिलते-जुलते वाक्यांश/लोकोक्तियाँ— 1. “दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलास!” (कबीर) 2. “ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे भले।” 3. “धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!” (तुलसी) 4. “जमे कि मरे।” 5. “हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो”। 6. “क्यों नहीं फलते ही समझ लेते बाबा कि झड़ना निश्चित है!” 7. “जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं”।

इन सबमें जीवन और वैभव की क्षणभंगुरता का भाव है।

“दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलास!”, “ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे भले”, “जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना”, “जमे कि मरे”, “फलते ही समझ लेते बाबा कि झड़ना निश्चित है”, “जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं” — इनमें क्षणभंगुरता का भाव है।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ कालजयी अवधूत, कोमलता-कठोरता, जिजीविषा (प्रश्न 1–3)
  • ☒ गांधी और वर्तमान सभ्यता, कवि का मानदंड, गतिशीलता (प्रश्न 4–6)
  • ☒ आशय (प्रश्न 7)
  • ☒ शीतपुष्प, गांधी, फूलों की खेती, ललित निबंध, प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण (प्रश्न 8–12)
  • ☒ लोकोक्तियाँ (प्रश्न 13)

Total questions answered: 13 of 13

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 14 (शिरीष के फूल) cover?

All 13 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – पाठ के साथ, अभ्यास – पाठ के आसपास and अभ्यास – भाषा की बात.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

Yes. The answers follow the current NCERT textbook for Class 12 Hindi Aroh and the latest CBSE syllabus, so the question numbers and wording match the book you use in class.

How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

Are the NCERT solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 14 (शिरीष के फूल) free?

Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.