Circle of Learning Logo CIRCLE OF LEARNING Excellence in Education
Class 12 Hindi Aroh Chapter 11

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 11: बाज़ार दर्शन

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XII

Hindi

Aroh (NCERT)

11 – बाज़ार दर्शन

2026-27

21 of 21

बिंदु

विवरण

लेखक

जैनेंद्र कुमार (1905–1990), अलीगढ़; पद्मभूषण, साहित्य अकादेमी पुरस्कार

प्रमुख रचनाएँ

परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी (उपन्यास); वातायन, पाज़ेब (कहानी-संग्रह); प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, सोच-विचार (निबंध)

विधा

विचारात्मक निबंध

मुख्य विचार

बाज़ार का जादू “आँख की राह” काम करता है — “जेब भरी हो, और मन खाली हो” तो असर सबसे अधिक; उपाय — मन खाली लेकर बाज़ार न जाओ, पर मन बंद भी न करो

भगत जी

चूरन वाले, जो रोज़ छह आने से अधिक नहीं कमाते, बाकी चूरन बच्चों को मुफ़्त बाँट देते; बाज़ार में ज़रूरत भर जीरा-काला नमक लेते हैं — उन पर बाज़ार का जादू नहीं चलता

निष्कर्ष

“बाज़ार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है”; अन्य लोग ‘बाज़ारूपन’ (कपट) बढ़ाते हैं

अभ्यास – पाठ के साथ

Q1

बाज़ार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?

Answer

उत्तर

जादू चढ़ने पर: 1. मनुष्य को लगता है कि उसके पास काफ़ी नहीं है, “और चाहिए, और चाहिए”। 2. बाज़ार की हर चीज़ ज़रूरी और आराम बढ़ाने वाली लगती है— “यह भी लूँ, वह भी लूँ”। 3. वह अपनी ज़रूरत के बजाय अपनी ‘पर्चेज़िंग पावर’ के अनुपात में ढेर सारा फ़िज़ूल सामान खरीद लेता है। 4. मन असंतोष, तृष्णा और ईर्ष्या से भर जाता है; व्यक्ति कामना से विकल, बल्कि पागल हो जाता है।

जादू उतरने पर: 1. पता चलता है कि फ़ैंसी चीज़ों की बहुतायत आराम में मदद नहीं देती, बल्कि खलल ही डालती है। 2. थोड़ी देर के लिए स्वाभिमान को सेंक मिलती है, पर इससे अभिमान की गिल्टी को ही खुराक मिलती है। 3. व्यक्ति पछताता है कि पैसा व्यर्थ खर्च हो गया— “अब जो रेल-टिकट के लिए भी बचा हो!”

जादू चढ़ने पर मनुष्य को हर चीज़ ज़रूरी लगती है, वह असंतोष-तृष्णा से विकल होकर ज़रूरत के बजाय पर्चेज़िंग पावर के अनुसार फ़िज़ूल सामान खरीद लेता है; जादू उतरने पर पता चलता है कि ये चीज़ें आराम नहीं, खलल देती हैं, केवल अभिमान बढ़ता है और पैसे की बर्बादी पर पछतावा होता है।

Q2

बाज़ार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या आपकी नज़र में उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता है?

Answer

उत्तर

भगत जी के व्यक्तित्व के सशक्त पहलू: 1. संतोष और संयम: वे रोज़ केवल छह आने कमाते हैं, उससे अधिक नहीं; बाकी चूरन बच्चों को मुफ़्त बाँट देते हैं। 2. स्पष्ट लक्ष्य: वे जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए— जीरा और काला नमक; बड़े-बड़े फ़ैंसी स्टोर उन्हें नहीं लुभाते। 3. मन का अडिग रहना: “माल बिछा रहता है, और उसका मन अडिग रहता है”; उन पर बाज़ार का जादू नहीं चलता। 4. बाज़ार के प्रति न विरोध न आसक्ति: वे आँखें खुली रखकर, प्रसन्न भाव से बाज़ार से गुज़रते हैं; सबका अभिवादन करते हैं। 5. लोभ-मुक्ति: पैसा उनसे भीख माँगता है, पर उनके मन में पैसे पर दया नहीं समाती।

समाज में शांति में सहायक: हाँ। आज अधिकांश अशांति लोभ, संचय की तृष्णा, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न होती है। यदि लोग भगत जी की तरह संतोषी और ज़रूरत-भर उपभोग करने वाले बनें, तो शोषण, भ्रष्टाचार, कपट और आपसी संघर्ष कम होगा; परस्पर सद्भाव बढ़ेगा और समाज में शांति स्थापित होगी।

भगत जी में संतोष, संयम, स्पष्ट आवश्यकता-बोध और लोभ-मुक्ति है — वे छह आने से अधिक नहीं कमाते, ज़रूरत भर सामान लेते हैं और बाज़ार का जादू उन पर नहीं चलता। हाँ, ऐसा आचरण लोभ, ईर्ष्या, शोषण और कपट को कम करके समाज में सद्भाव और शांति ला सकता है।

Q3

‘बाज़ारूपन’ से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाज़ार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाज़ार की सार्थकता किसमें है?

Answer

उत्तर

बाज़ारूपन: बाज़ार में दिखावा, कपट, छल और शोषण का बढ़ना। जब लोग अपनी ‘पर्चेज़िंग पावर’ के गर्व में बिना ज़रूरत के खरीदारी करते हैं, तो बाज़ार में कपट बढ़ता है, आपसी सद्भाव घटता है और लोग “कोरे गाहक और बेचक” की तरह एक-दूसरे को ठगने की घात में रहते हैं। इसे ही बाज़ारूपन कहा गया है।

बाज़ार को सार्थकता देने वाले व्यक्ति: “बाज़ार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है।” जो व्यक्ति अपनी आवश्यकता जानकर, संयम से, केवल ज़रूरत की वस्तुएँ खरीदते हैं (जैसे भगत जी), वे बाज़ार को सच्चा लाभ देते हैं।

बाज़ार की सार्थकता: “बाज़ार की असली कृतार्थता है आवश्यकता के समय काम आना”— अर्थात लोगों की वास्तविक ज़रूरतें पूरी करना, न कि उन्हें लुभाकर ठगना।

बाज़ारूपन = दिखावे, कपट और शोषण से भरा बाज़ार, जहाँ सद्भाव घटता है और लोग एक-दूसरे को ठगते हैं। जो व्यक्ति जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए और ज़रूरत भर खरीदते हैं, वे बाज़ार को सार्थकता देते हैं; बाज़ार की सार्थकता आवश्यकता के समय काम आने में है।

Q4

बाज़ार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ़ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?

Answer

उत्तर

मैं इस कथन से आंशिक रूप से सहमत हूँ।

सहमति: 1. दुकानदार के लिए हर ग्राहक समान है— चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, लिंग या क्षेत्र का हो; जिसके पास पैसा है, उसे सामान मिलता है। 2. इस अर्थ में बाज़ार ने जातिगत छुआछूत और भेदभाव की दीवारें कुछ हद तक तोड़ी हैं।

असहमति: 1. बाज़ार क्रय-शक्ति के आधार पर एक नई असमानता पैदा करता है— अमीर और गरीब के बीच की खाई। जिसके पास पैसा नहीं, उसके लिए बाज़ार का कोई अर्थ नहीं। 2. बाज़ार ‘मॉल संस्कृति’ और ‘ब्रांड’ के माध्यम से वर्ग-भेद और दिखावे को बढ़ाता है। 3. बाज़ार केवल मुनाफ़ा देखता है; वह मानवीय मूल्यों या सामाजिक न्याय की चिंता नहीं करता— लेखक के अनुसार वह कपट बढ़ाता है। 4. समाज में भेदभाव आज भी मौजूद है; बाज़ार ने उसे समाप्त नहीं किया।

अतः बाज़ार जाति-धर्म की समता लाता है, पर आर्थिक असमानता को बढ़ाता है; इसे सच्ची सामाजिक समता नहीं कहा जा सकता।

आंशिक रूप से। बाज़ार ग्राहक की जाति-धर्म-लिंग नहीं देखता, जिससे कुछ भेदभाव टूटे हैं; पर वह क्रय-शक्ति के आधार पर अमीर-गरीब की नई असमानता पैदा करता है, दिखावा और वर्ग-भेद बढ़ाता है और केवल मुनाफ़ा देखता है — इसलिए यह सच्ची सामाजिक समता नहीं है।

Q5

आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें— (क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ। (ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।

Answer

उत्तर

(क) पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में: 1. अस्पताल में एक धनी व्यक्ति को तुरंत निजी कमरा और विशेषज्ञ डॉक्टर मिल गए, जबकि गरीब मरीज़ घंटों लाइन में खड़े रहे। 2. महँगी कार से उतरे व्यक्ति को दुकानदार ने विशेष सम्मान दिया, जबकि साधारण ग्राहक की ओर ध्यान भी नहीं दिया। 3. चुनावों में पैसे के बल पर प्रचार और प्रभाव। 4. लेखक का उदाहरण— धूल उड़ाती मोटर का निकलना पैदल चलने वाले के मन में “व्यंग्य की लीक” छोड़ जाता है।

(ख) पैसे की शक्ति काम नहीं आई: 1. एक धनी व्यवसायी के इकलौते बेटे को गंभीर बीमारी थी; विदेश में इलाज करवाने और करोड़ों खर्च करने पर भी उसे बचाया नहीं जा सका। 2. कोविड-19 महामारी में अनेक धनी लोग भी ऑक्सीजन या अस्पताल का बिस्तर नहीं पा सके। 3. एक ईमानदार अधिकारी ने भारी रिश्वत ठुकरा दी (जैसे ‘नमक का दारोगा’ के वंशीधर)। 4. परीक्षा में अच्छे अंक, सच्चा प्रेम, मित्रता और मन की शांति पैसे से नहीं खरीदे जा सकते। 5. भगत जी पर पैसे की व्यंग्य-शक्ति नहीं चली।

(क) अस्पताल में धनी व्यक्ति को तुरंत विशेष सुविधा मिलना, महँगी कार वाले को दुकान पर विशेष सम्मान, चुनाव में धन का प्रभाव। (ख) अपार धन होने पर भी असाध्य रोग से प्रियजन को न बचा पाना, महामारी में धनवानों को भी बिस्तर-ऑक्सीजन न मिलना, ईमानदार अधिकारी का रिश्वत ठुकराना, प्रेम-मित्रता-शांति का न खरीदा जा सकना।

अभ्यास – पाठ के आसपास

Q6

बाज़ार दर्शन पाठ में बाज़ार जाने या न जाने के संदर्भ में मन की कई स्थितियों का ज़िक्र आया है। आप इन स्थितियों से जुड़े अपने अनुभवों का वर्णन कीजिए। (क) मन खाली हो (ख) मन खाली न हो (ग) मन बंद हो (घ) मन में नकार हो

Answer

उत्तर

(क) मन खाली हो: एक बार मैं बिना किसी उद्देश्य के मॉल घूमने गया। वहाँ की चमक-दमक में मैंने कपड़े, जूते, घड़ी, चॉकलेट— ऐसी बहुत-सी चीज़ें खरीद लीं जिनकी ज़रूरत नहीं थी। घर आकर पता चला कि जेब-खर्च के सारे पैसे समाप्त हो गए और कई चीज़ें बेकार पड़ी रहीं।

(ख) मन खाली न हो: परीक्षा से पहले मुझे केवल ज्योमेट्री बॉक्स और पेन खरीदने थे। मैं सीधा स्टेशनरी की दुकान गया, ज़रूरत की चीज़ें लीं और लौट आया; दूसरी दुकानों के आकर्षक सामान ने मुझे नहीं लुभाया।

(ग) मन बंद हो: एक बार बहुत दुखी और उदास होने पर मैं परिवार के साथ बाज़ार गया, पर किसी भी चीज़ में मेरी रुचि नहीं जगी; न कुछ देखने का मन हुआ, न खरीदने का। सब नीरस लगा।

(घ) मन में नकार हो: एक मित्र हर चीज़ को फ़िज़ूल और बाज़ार को लूट का अड्डा मानता है। वह बाज़ार जाकर हर चीज़ में बुराई निकालता है और ज़रूरत का सामान भी नहीं लेता। इस हठ से उसका ही नुकसान होता है।

(क) खाली मन से मॉल जाने पर अनावश्यक खरीदारी और पैसे की बर्बादी; (ख) निश्चित ज़रूरत लेकर जाने पर केवल आवश्यक सामान लेकर लौट आना; (ग) उदास/बंद मन से जाने पर कोई रुचि न जगना; (घ) नकारात्मक मन से जाने पर हर चीज़ में बुराई देखना और ज़रूरी चीज़ भी न लेना।

Q7

बाज़ार दर्शन पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?

Answer

उत्तर

पाठ में वर्णित ग्राहक: 1. अपव्ययी ग्राहक (पहले मित्र)— जो पत्नी के साथ जाकर बहुत-से बंडल ले आए; पर्चेज़िंग पावर का प्रदर्शन करने वाले। 2. असमंजस वाले ग्राहक (दूसरे मित्र)— दिन भर बाज़ार देखते रहे, पर सब कुछ लेने की इच्छा के कारण कुछ नहीं ले सके। 3. संयमी, संचयी ग्राहक— जो फ़िज़ूल खर्च नहीं करते, पैसा जोड़ते जाते हैं और उसके गर्व में फूले रहते हैं। 4. खाली मन वाले ग्राहक— जिन पर बाज़ार का जादू खूब चलता है। 5. बंद मन/नकार वाले ग्राहक— हठपूर्वक इच्छाओं को दबाने वाले। 6. संतुष्ट, विवेकी ग्राहक (भगत जी)— जो जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए और ज़रूरत भर लेते हैं।

मैं स्वयं: मैं प्रयास करता हूँ कि भगत जी की तरह विवेकी ग्राहक बनूँ— सूची बनाकर, ज़रूरत की चीज़ें ही खरीदूँ; हालाँकि कभी-कभी आकर्षक विज्ञापनों और छूट (सेल) के कारण अनावश्यक खरीदारी भी कर लेता हूँ।

अपव्ययी (पर्चेज़िंग पावर का प्रदर्शन करने वाले), असमंजस वाले (सब लेने की चाह में कुछ न ले पाने वाले), संचयी (केवल पैसा जोड़ने वाले), खाली मन वाले, बंद मन/नकार वाले और विवेकी-संतुष्ट (भगत जी) ग्राहक। मैं स्वयं को विवेकी ग्राहक बनने का प्रयास करने वाला मानता हूँ, यद्यपि कभी-कभी आकर्षण में अनावश्यक खरीदारी हो जाती है।

Q8

आप बाज़ार की भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति से अवश्य परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति और सामान्य बाज़ार और हाट की संस्कृति में आप क्या अंतर पाते हैं? पर्चेज़िंग पावर आपको किस तरह के बाज़ार में नज़र आती है?

Answer

उत्तर

मॉल संस्कृति

सामान्य बाज़ार / हाट संस्कृति

वातानुकूलित, चमक-दमक, सजावट

खुले में, साधारण व्यवस्था

ब्रांडेड, महँगी वस्तुएँ; निश्चित मूल्य

स्थानीय, सस्ती वस्तुएँ; मोल-भाव संभव

मनोरंजन, फ़ूड कोर्ट, मल्टीप्लेक्स— खरीदारी के साथ घूमना-फिरना

केवल ज़रूरत की खरीदारी

ग्राहक-विक्रेता में औपचारिक, यांत्रिक संबंध

आत्मीयता, जान-पहचान, उधार की सुविधा

उच्च और मध्य वर्ग के लिए

सभी वर्गों, विशेषकर निम्न-मध्य और ग्रामीण वर्ग के लिए

विज्ञापन, ऑफ़र, सेल द्वारा अनावश्यक खरीद को बढ़ावा

आवश्यकता-आधारित खरीद; हाट सप्ताह में एक-दो बार लगते हैं

पर्चेज़िंग पावर: पर्चेज़िंग पावर का प्रदर्शन सबसे अधिक मॉल में दिखाई देता है, जहाँ लोग ब्रांड, स्टेटस और दिखावे के लिए महँगी चीज़ें खरीदते हैं। हाट में लोग अपनी ज़रूरत और सीमित आय के अनुसार खरीदारी करते हैं।

मॉल में चमक-दमक, ब्रांडेड महँगी वस्तुएँ, निश्चित मूल्य, मनोरंजन और औपचारिक संबंध होते हैं; सामान्य बाज़ार/हाट में साधारण व्यवस्था, सस्ती स्थानीय वस्तुएँ, मोल-भाव, आत्मीयता और आवश्यकता-आधारित खरीद होती है। पर्चेज़िंग पावर का प्रदर्शन सबसे अधिक मॉल में दिखता है।

Q9

लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाज़ार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

Answer

उत्तर

हाँ, मैं इस विचार से सहमत हूँ। लेखक कहता है कि जब बाज़ार में कपट बढ़ता है तो “लोगों में आवश्यकताओं का आदान-प्रदान नहीं होता; बल्कि शोषण होने लगता है”।

तर्क और उदाहरण: 1. अभाव के समय मूल्य-वृद्धि: बाढ़, सूखा या महामारी के समय दवाइयाँ, ऑक्सीजन, अनाज, पानी आदि ज़रूरी वस्तुओं की कालाबाज़ारी होती है; मजबूर ग्राहक मनमाने दाम चुकाता है। 2. जमाखोरी: व्यापारी प्याज़, दाल जैसी वस्तुएँ जमा करके कृत्रिम कमी पैदा करते हैं और दाम बढ़ाते हैं। 3. स्वास्थ्य और शिक्षा: निजी अस्पताल और कोचिंग संस्थान लोगों की मजबूरी का फ़ायदा उठाकर भारी फ़ीस वसूलते हैं। 4. गाँवों में नकली/पुराना सामान: अज्ञान का फ़ायदा उठाकर कंपनियाँ नकली या एक्सपायरी डेट वाला सामान बेचती हैं (पाठ में दिया लेख)। 5. विज्ञापन द्वारा कृत्रिम आवश्यकता: बाज़ार झूठी ज़रूरतें पैदा कर लोगों की जेब खाली करता है।

अतः जब ज़रूरत मजबूरी बन जाती है, तो बाज़ार उसका शोषण करता है।

हाँ। आपदा/महामारी में दवा, ऑक्सीजन, अनाज की कालाबाज़ारी, जमाखोरी से कृत्रिम कमी, निजी अस्पतालों-संस्थानों की भारी फ़ीस, गाँवों में नकली/पुराना सामान बेचना और विज्ञापनों से झूठी ज़रूरतें पैदा करना — इन सबमें मनुष्य की आवश्यकता ही उसके शोषण का साधन बन जाती है।

Q10

स्त्री माया न जोड़े यहाँ माया शब्द किस ओर संकेत कर रहा है? स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, बल्कि परिस्थितिवश है। वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं?

Answer

उत्तर

‘माया’ का संकेत: यहाँ ‘माया’ का अर्थ है धन-संपत्ति, घर-गृहस्थी का सामान और वस्तुओं का संचय। लेखक व्यंग्य करता है कि बाज़ार में अधिक खरीदारी के लिए पत्नी की ओट ली जाती है।

स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश करने वाली परिस्थितियाँ: 1. आर्थिक असुरक्षा: पारंपरिक समाज में स्त्री की स्वतंत्र आय नहीं होती थी; वह पति या परिवार पर निर्भर रहती थी। भविष्य की असुरक्षा से बचने के लिए वह धन-गहने संचित करती है। 2. घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारी: घर चलाने, बच्चों की पढ़ाई, विवाह, बीमारी आदि की ज़िम्मेदारी के लिए बचत करनी पड़ती है। 3. संपत्ति में अधिकार न मिलना: पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार न मिलने से ‘स्त्रीधन’ ही उसका सहारा होता है। 4. वैधव्य या परित्याग का भय: पति की मृत्यु या परित्याग की स्थिति में जीवन-यापन के लिए (जैसे भक्तिन ने पाँच बीसी और पाँच रुपए गाड़कर रखे थे)। 5. दहेज-प्रथा: बेटियों के विवाह के लिए धन-सामान जोड़ना। 6. सामाजिक प्रतिष्ठा: घर की सजावट और गहने परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़े जाते हैं।

‘माया’ = धन-संपत्ति और घरेलू सामान का संचय। स्त्री को आर्थिक निर्भरता और असुरक्षा, घर-परिवार की ज़िम्मेदारियाँ, संपत्ति में अधिकार न मिलना, वैधव्य/परित्याग का भय, दहेज-प्रथा और सामाजिक प्रतिष्ठा जैसी परिस्थितियाँ माया जोड़ने के लिए विवश करती हैं।

अभ्यास – आपसदारी

Q11

ज़रूरत-भर जीरा वहाँ से ले लिया कि फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं के बराबर हो जाता है— भगत जी की इस संतुष्ट निस्पृहता की कबीर की इस सूक्ति से तुलना कीजिए— चाह गई चिंता गई मनुआँ बेपरवाह / जाके कछु न चाहिए सोइ सहंसाह।

Answer

उत्तर

कबीर कहते हैं कि जिसकी इच्छाएँ समाप्त हो गईं, उसकी चिंताएँ भी समाप्त हो जाती हैं और मन बेपरवाह (निश्चिंत) हो जाता है; जिसे कुछ नहीं चाहिए, वही सच्चा शहंशाह है।

भगत जी का जीवन इसी सूक्ति का व्यावहारिक रूप है— 1. उन्हें केवल ज़रूरत भर जीरा और काला नमक चाहिए; बाकी चौक-बाज़ार की चमक उनके लिए “नहीं के बराबर” हो जाती है। 2. वे रोज़ केवल छह आने कमाते हैं; अधिक धन की चाह नहीं। 3. इसलिए वे चिंतामुक्त, प्रसन्न और “तुष्ट और मग्न” होकर बाज़ार से गुज़रते हैं। 4. पैसे की व्यंग्य-शक्ति भी उनके आगे “चूर-चूर”, बल्कि “पानी-पानी” हो जाती है— वे सच्चे अर्थों में शहंशाह हैं।

दोनों में संतोष और निस्पृहता को सच्चा सुख और सच्ची समृद्धि माना गया है।

कबीर के अनुसार इच्छा मिटने पर चिंता मिटती है और जिसे कुछ नहीं चाहिए वही शहंशाह है; भगत जी भी ज़रूरत भर लेकर बाज़ार की चमक से निर्लिप्त, चिंतामुक्त और प्रसन्न रहते हैं — दोनों में संतोष और निस्पृहता ही सच्ची समृद्धि है।

Q12

विजयदान देथा की कहानी ‘दुविधा’ (जिस पर ‘पहेली’ फ़िल्म बनी है) के अंश को पढ़ कर आप देखेंगे/देखेंगी कि भगत जी की संतुष्ट जीवन-दृष्टि की तरह ही गड़रिए की जीवन-दृष्टि है, इससे आपके भीतर क्या भाव जगते हैं?

Answer

उत्तर

गड़रिया न्याय करने के बदले मिली सोने की अँगूठी लेने से इनकार कर देता है और कहता है— “मैं कोई राजा नहीं हूँ जो न्याय की कीमत वसूल करूँ… मेरी भेड़ें भी मेरी तरह गँवार हैं। घास तो खाती हैं, पर सोना सूँघती तक नहीं। बेकार की वस्तुएँ तुम अमीरों को ही शोभा देती हैं।”

मन में जगने वाले भाव: 1. श्रद्धा और सम्मान: साधारण, अनपढ़ गड़रिए की निःस्वार्थता और नैतिकता के प्रति गहरा सम्मान। 2. संतोष का महत्व: सच्चा सुख धन-संपत्ति में नहीं, संतोष और सादगी में है। 3. आत्मचिंतन: हम शिक्षित और ‘सभ्य’ लोग छोटी-छोटी चीज़ों के लिए लालच करते हैं, जबकि ये सरल लोग धन को तुच्छ समझते हैं। 4. व्यंग्य की अनुभूति: अमीरों के दिखावे और बेकार वस्तुओं के मोह पर करारा व्यंग्य। 5. प्रेरणा: ज़रूरत भर में संतुष्ट रहकर, निःस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करनी चाहिए।

गड़रिए का अँगूठी ठुकराना और सोने को “बेकार की वस्तु” कहना मन में उसके प्रति श्रद्धा जगाता है; यह सिखाता है कि सच्चा सुख संतोष और सादगी में है, हमें अपने लालच पर आत्मचिंतन के लिए विवश करता है और निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देता है — भगत जी की तरह।

Q13

बाज़ार पर आधारित लेख ‘नकली सामान पर नकेल ज़रूरी’ का अंश पढ़िए और नीचे दिए गए बिंदुओं पर कक्षा में चर्चा कीजिए। (क) नकली सामान के खिलाफ़ जागरूकता के लिए आप क्या कर सकते हैं? (ख) उपभोक्ताओं के हित को मद्देनज़र रखते हुए सामान बनाने वाली कंपनियों का क्या नैतिक दायित्व हैं? (ग) ब्रांडेड वस्तु को खरीदने के पीछे छिपी मानसिकता को उजागर कीजिए?

Answer

उत्तर

(क) जागरूकता के लिए हम क्या कर सकते हैं: 1. स्कूल-कॉलेज में उपभोक्ता क्लब बनाकर नुक्कड़ नाटक, पोस्टर, रैली के माध्यम से जागरूकता फैलाना (लेख में भी विद्यार्थियों की भूमिका पर बल दिया गया है)। 2. लोगों को ISI, AGMARK, FSSAI, BIS हॉलमार्क जैसे गुणवत्ता चिह्न, निर्माण तिथि, एक्सपायरी डेट और MRP देखना सिखाना। 3. पक्का बिल लेने की आदत डालना। 4. उपभोक्ता अधिकारों और उपभोक्ता फ़ोरम/हेल्पलाइन (1915) के बारे में बताना। 5. सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करना।

(ख) कंपनियों के नैतिक दायित्व: 1. गुणवत्तापूर्ण, सुरक्षित उत्पाद बनाना। 2. पैकेट पर सही जानकारी— सामग्री, निर्माण व समाप्ति तिथि, मूल्य। 3. गाँव और शहर के उपभोक्ताओं के लिए एक-सा मानक रखना; पुराना/नकली माल न खपाना। 4. भ्रामक विज्ञापन न देना। 5. उपभोक्ता-जागरूकता पर भी ख़र्च करना और शिकायत-निवारण की व्यवस्था रखना।

(ग) ब्रांडेड वस्तु खरीदने की मानसिकता: 1. सामाजिक प्रतिष्ठा और दिखावा— ब्रांड को स्टेटस सिंबल मानना। 2. गुणवत्ता और टिकाऊपन पर भरोसा। 3. विज्ञापनों और सेलिब्रिटी के प्रभाव में आना। 4. दूसरों की नकल और हीनता-ग्रंथि से बचना। 5. कभी-कभी केवल नाम के लिए अधिक मूल्य चुकाना— लेखक के शब्दों में ‘पर्चेज़िंग पावर’ का प्रदर्शन।

(क) उपभोक्ता क्लब, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर द्वारा गुणवत्ता-चिह्न, एक्सपायरी डेट, बिल और उपभोक्ता अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना। (ख) कंपनियाँ गुणवत्तापूर्ण, सुरक्षित उत्पाद, सही लेबलिंग, सभी के लिए समान मानक, भ्रामक विज्ञापन से परहेज़ और शिकायत-निवारण सुनिश्चित करें। (ग) ब्रांडेड वस्तु खरीदने के पीछे प्रतिष्ठा-प्रदर्शन, गुणवत्ता पर भरोसा, विज्ञापन/सेलिब्रिटी का प्रभाव और नकल की मानसिकता होती है।

Q14

प्रेमचंद की कहानी ईदगाह के हामिद और उसके दोस्तों का बाज़ार से क्या संबंध बनता है? विचार करें।

Answer

उत्तर

‘ईदगाह’ में ईद के मेले में हामिद और उसके दोस्त महमूद, मोहसिन, नूरे, सम्मी बाज़ार जाते हैं।

  1. दोस्त — खाली मन से गए थे; बाज़ार के जादू में फँसकर उन्होंने खिलौने (सिपाही, भिश्ती, वकील, धोबिन), मिठाइयाँ (रेवड़ियाँ, गुलाब-जामुन) और झूले पर पैसे खर्च कर दिए। खिलौने जल्दी टूट गए और मिठाइयाँ ख़त्म हो गईं— यह ‘पर्चेज़िंग पावर’ का क्षणिक आनंद था, जादू उतरते ही कुछ नहीं बचा।
  2. हामिद — उसके पास केवल तीन पैसे थे, पर उसका मन खाली नहीं था। उसे याद था कि दादी अमीना की उँगलियाँ रोटी सेंकते समय जल जाती हैं। उसने खिलौनों और मिठाइयों के आकर्षण को रोककर दादी के लिए चिमटा खरीदा— एक उपयोगी, टिकाऊ वस्तु।

संबंध: हामिद भगत जी की तरह जानता था कि उसे क्या चाहिए; इसलिए बाज़ार का जादू उस पर नहीं चला और उसने बाज़ार को सार्थकता दी। उसके दोस्त खाली मन वाले ग्राहक थे जिन पर जादू चल गया। हामिद का निर्णय प्रेम, त्याग, विवेक और संयम का प्रतीक है।

हामिद के दोस्त खाली मन से गए और बाज़ार के जादू में खिलौने-मिठाइयों पर पैसे उड़ा दिए, जो जल्दी ख़त्म/टूट गए; हामिद ने भगत जी की तरह अपनी असली ज़रूरत (दादी की जलती उँगलियाँ) जानकर तीन पैसे में चिमटा खरीदा — उस पर बाज़ार का जादू नहीं चला और उसने बाज़ार को सार्थकता दी।

अभ्यास – विज्ञापन की दुनिया

Q15

आपने समाचारपत्रों, टी.वी. आदि पर अनेक प्रकार के विज्ञापन देखे होंगे जिनमें ग्राहकों को हर तरीके से लुभाने का प्रयास किया जाता है। नीचे लिखे बिंदुओं के संदर्भ में किसी एक विज्ञापन की समीक्षा कीजिए और यह भी लिखिए कि आपको विज्ञापन की किस बात ने सामान खरीदने के लिए प्रेरित किया। 1. विज्ञापन में सम्मिलित चित्र और विषय-वस्तु 2. विज्ञापन में आए पात्र व उनका औचित्य 3. विज्ञापन की भाषा

Answer

उत्तर

विज्ञापन: एक ऊर्जा-पेय (हेल्थ ड्रिंक) का टी.वी. विज्ञापन (नमूना समीक्षा)

  1. चित्र और विषय-वस्तु: एक दुबला-पतला बच्चा खेल के मैदान में हार जाता है। माँ उसे रोज़ दूध में हेल्थ ड्रिंक मिलाकर देती है। कुछ हफ़्तों बाद वह दौड़ प्रतियोगिता जीत जाता है। अंत में पैकेट, “विटामिन और प्रोटीन से भरपूर” और लंबाई-ताकत बढ़ने के ग्राफ़ दिखाए जाते हैं। विषय-वस्तु— बच्चे की सेहत और सफलता।
  2. पात्र व औचित्य: बच्चा (लक्ष्य-उपभोक्ता), माँ (ख़रीदने का निर्णय लेने वाली), एक प्रसिद्ध खिलाड़ी (विश्वसनीयता और प्रेरणा)। पात्र भावनात्मक जुड़ाव पैदा करते हैं।
  3. भाषा: सरल, आकर्षक, छोटे वाक्य, नारा— “हर घूँट में ताकत!”, “अब जीत होगी तुम्हारी!”; हिंदी-अंग्रेज़ी मिश्रित (कोड-मिक्सिंग); संगीतमय जिंगल।

खरीदने की प्रेरणा: खिलाड़ी की सिफ़ारिश और “दौड़ में जीत” का भावनात्मक संदेश।

समीक्षा: विज्ञापन आकर्षक है, पर यह दावा अतिरंजित है कि केवल पेय से बच्चा जीत जाएगा; संतुलित आहार और व्यायाम भी ज़रूरी हैं। उपभोक्ता को विज्ञापन के दावों की जाँच करनी चाहिए।

किसी एक विज्ञापन (जैसे हेल्थ ड्रिंक) की समीक्षा: चित्र/विषय-वस्तु (कमज़ोर बच्चे का पेय पीकर जीतना), पात्र और उनका औचित्य (बच्चा, माँ, प्रसिद्ध खिलाड़ी — विश्वसनीयता व भावनात्मक जुड़ाव), भाषा (सरल, नारे, जिंगल, कोड-मिक्सिंग); प्रेरणा — खिलाड़ी की सिफ़ारिश; साथ ही अतिरंजित दावों की आलोचना।

Q16

अपने सामान की बिक्री को बढ़ाने के लिए आज किन-किन तरीकों का प्रयोग किया जा रहा है? उदाहरण सहित उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए। आप स्वयं किस तकनीक या तौर-तरीके का प्रयोग करना चाहेंगे जिससे बिक्री भी अच्छी हो और उपभोक्ता गुमराह भी न हो।

Answer

उत्तर

बिक्री बढ़ाने के तरीके: 1. विज्ञापन: टी.वी., अख़बार, होर्डिंग, सोशल मीडिया, यूट्यूब पर विज्ञापन; प्रसिद्ध हस्तियों (सेलिब्रिटी) द्वारा प्रचार। 2. छूट और ऑफ़र: “एक के साथ एक मुफ़्त”, “50% सेल”, “फ़ेस्टिव ऑफ़र”, कैशबैक। 3. उपहार योजनाएँ: सामान के साथ मुफ़्त गिफ़्ट, लकी ड्रॉ, स्क्रैच कार्ड। 4. ऑनलाइन बिक्री: ई-कॉमर्स (घर बैठे डिलीवरी, आसान वापसी)। 5. किस्तों पर ख़रीद (EMI) और ‘अभी ख़रीदो, बाद में भुगतान करो’। 6. सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर द्वारा प्रचार। 7. लॉयल्टी कार्ड, रिवॉर्ड पॉइंट्स। 8. मुफ़्त सैंपल, डेमो, एक्सचेंज ऑफ़र। 9. आकर्षक पैकेजिंग और दुकान की सजावट।

मेरा तरीका: मैं ईमानदार विज्ञापन करूँगा जिसमें उत्पाद की सही जानकारी, सामग्री, मूल्य और सीमाएँ स्पष्ट हों। गुणवत्ता पर ध्यान, उचित मूल्य, अच्छी बिक्री-उपरांत सेवा, ग्राहकों की समीक्षाओं को महत्व, मुफ़्त सैंपल द्वारा उत्पाद आज़माने का अवसर और ‘मनी-बैक गारंटी’ देकर ग्राहकों का विश्वास जीतूँगा। संतुष्ट ग्राहक ही सबसे अच्छा विज्ञापन है।

तरीके: विज्ञापन व सेलिब्रिटी प्रचार, छूट-सेल-कैशबैक, मुफ़्त उपहार/लकी ड्रॉ, ऑनलाइन बिक्री, EMI, इन्फ़्लुएंसर, लॉयल्टी कार्ड, सैंपल/डेमो, आकर्षक पैकेजिंग। मैं ईमानदार और सही जानकारी वाले विज्ञापन, गुणवत्ता, उचित मूल्य, अच्छी सेवा, सैंपल और मनी-बैक गारंटी से ग्राहकों का विश्वास जीतना चाहूँगा।

अभ्यास – भाषा की बात

Q17

विभिन्न परिस्थितियों में भाषा का प्रयोग भी अपना रूप बदलता रहता है कभी औपचारिक रूप में आती है तो कभी अनौपचारिक रूप में। पाठ में से दोनों प्रकार के तीन-तीन उदाहरण छाँटकर लिखिए।

Answer

उत्तर

औपचारिक भाषा के उदाहरण: 1. “बाज़ार की असली कृतार्थता है आवश्यकता के समय काम आना।” 2. “संचय की तृष्णा और वैभव की चाह में व्यक्ति की निर्बलता ही प्रमाणित होती है।” 3. “शून्य होने का अधिकार बस परमात्मा का है जो सनातन भाव से संपूर्ण है।”

अनौपचारिक भाषा के उदाहरण: 1. “मित्र बोले—कुछ न पूछो। बाज़ार है कि शैतान का जाल है?” 2. “मैंने कहा—यह क्या? बोले—यह जो साथ थीं।” 3. “लेकिन ठहरिए।” / “मैंने कहा—खूब!”

प्रश्न 1

औपचारिक: “बाज़ार की असली कृतार्थता है आवश्यकता के समय काम आना”, “संचय की तृष्णा और वैभव की चाह में व्यक्ति की निर्बलता ही प्रमाणित होती है”, “शून्य होने का अधिकार बस परमात्मा का है…”। अनौपचारिक: “कुछ न पूछो। बाज़ार है कि शैतान का जाल है?”, “यह क्या? बोले—यह जो साथ थीं”, “लेकिन ठहरिए।”

उत्तर

Q18

पाठ में अनेक वाक्य ऐसे हैं, जहाँ लेखक अपनी बात कहता है कुछ वाक्य ऐसे हैं जहाँ वह पाठक-वर्ग को संबोधित करता है। सीधे तौर पर पाठक को संबोधित करने वाले पाँच वाक्यों को छाँटिए और सोचिए कि ऐसे संबोधन पाठक से रचना पढ़वा लेने में मददगार होते हैं?

Answer

उत्तर

पाठक को संबोधित करने वाले वाक्य: 1. “पैसे को देखने के लिए बैंक-हिसाब देखिए, पर माल-असबाब मकान-कोठी तो अनदेखे भी दीखते हैं।” 2. “लेकिन ठहरिए। इस सिलसिले में एक और भी महत्व का तत्व है, जिसे नहीं भूलना चाहिए।” 3. “कहीं आप भूल न कर बैठिएगा। इन पंक्तियों को लिखने वाला मैं चूरन नहीं बेचता हूँ।” 4. “जी नहीं, ऐसी हलकी बात भी न सोचिएगा।” 5. “पैसे की व्यंग्य-शक्ति की सुनिए। वह दारुण है।” 6. “बाज़ार जाओ तो खाली मन न हो। मन खाली हो, तब बाज़ार न जाओ।”

मददगार हैं: हाँ। ऐसे संबोधन से लेखक और पाठक के बीच संवाद और आत्मीयता स्थापित होती है; पाठक को लगता है कि लेखक उससे सीधे बात कर रहा है। इससे रचना रोचक बनती है, पाठक का ध्यान बना रहता है और वह विचारों से जुड़कर अंत तक पढ़ता है।

“बैंक-हिसाब देखिए…”, “लेकिन ठहरिए…”, “कहीं आप भूल न कर बैठिएगा…”, “जी नहीं, ऐसी हलकी बात भी न सोचिएगा”, “पैसे की व्यंग्य-शक्ति की सुनिए”, “बाज़ार जाओ तो खाली मन न हो”। हाँ, ऐसे संबोधन लेखक-पाठक में संवाद और आत्मीयता बनाकर रचना को रोचक बनाते हैं और पाठक को अंत तक जोड़े रखते हैं।

Q19

नीचे दिए गए वाक्यों को पढ़िए। (क) पैसा पावर है। (ख) पैसे की उस पर्चेज़िंग पावर के प्रयोग में ही पावर का रस है। (ग) मित्र ने सामने मनीबैग फैला दिया। (घ) पेशगी ऑर्डर कोई नहीं लेते। ऊपर दिए गए इन वाक्यों की संरचना तो हिंदी भाषा की है लेकिन वाक्यों में एकाध शब्द अंग्रेज़ी भाषा के आए हैं। इस तरह के प्रयोग को कोड मिक्सिंग कहते हैं। एक भाषा के शब्दों के साथ दूसरी भाषा के शब्दों का मेलजोल! अब तक आपने जो पाठ पढ़े उसमें से ऐसे कोई पाँच उदाहरण चुनकर लिखिए। यह भी बताइए कि आगत शब्दों की जगह उनके हिंदी पर्यायों का ही प्रयोग किया जाए तो संप्रेषणीयता पर क्या प्रभाव पड़ता है।

Answer

उत्तर

कोड-मिक्सिंग के उदाहरण (पढ़े गए पाठों से): 1. “आप जानते हैं कि कार्यक्रम रोचक बनाने के वास्ते…” / “(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा बड़ा)” — कैमरे में बंद अपाहिज 2. “मेरी किसी पुस्तक के प्रकाशित होने पर उसके मुख पर प्रसन्नता की आभा वैसे ही उद्भासित हो उठती है जैसे स्विच दबाने से बल्ब में छिपा आलोक।” — भक्तिन 3. “बड़े-बड़े फ़ैंसी स्टोर पड़ते हैं, पर पड़े रह जाते हैं।” — बाज़ार दर्शन 4. “उदारता के डाइनामाइट ने क्षण भर में उन्हें उड़ा दिया।” — भक्तिन 5. “लोग स्पिरिचुअल कहते हैं; आत्मिक, धार्मिक, नैतिक कहते हैं।” — बाज़ार दर्शन 6. “अपने सिस्टम में जाता है उसे हैंग कर देता है।” — भक्तिन (भाषा की बात)

हिंदी पर्यायों के प्रयोग का प्रभाव: - ‘पावर’ की जगह ‘शक्ति’, ‘मनीबैग’ की जगह ‘बटुआ’, ‘पर्चेज़िंग पावर’ की जगह ‘क्रय-शक्ति’ लिखने से भाषा शुद्ध तो होगी, पर कई बार स्वाभाविकता, सहजता और प्रभाव कम हो सकता है, क्योंकि ये अंग्रेज़ी शब्द बोलचाल में प्रचलित हैं। - कुछ शब्दों (कैमरा, बल्ब, स्विच) के हिंदी पर्याय प्रचलित नहीं हैं; उनका प्रयोग संप्रेषण को कठिन बना सकता है। - संतुलित कोड-मिक्सिंग भाषा को जीवंत और आधुनिक बनाती है, पर अत्यधिक प्रयोग से भाषा की पहचान प्रभावित होती है।

उदाहरण: “(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा बड़ा)”, “जैसे स्विच दबाने से बल्ब में छिपा आलोक”, “बड़े-बड़े फ़ैंसी स्टोर”, “उदारता के डाइनामाइट ने”, “लोग स्पिरिचुअल कहते हैं”। हिंदी पर्याय लगाने से भाषा शुद्ध होगी, पर प्रचलित अंग्रेज़ी शब्दों के कारण स्वाभाविकता और प्रभाव घट सकता है; कुछ पर्याय अप्रचलित होने से संप्रेषण कठिन हो सकता है — संतुलन आवश्यक है।

Q20

नीचे दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश पर ध्यान देते हुए उन्हें पढ़िए— (क) निर्बल ही धन की ओर झुकता है। (ख) लोग संयमी भी होते हैं। (ग) सभी कुछ तो लेने को जी होता था। ऊपर दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश ‘ही’, ‘भी’, ‘तो’ निपात हैं जो अर्थ पर बल देने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। वाक्य में इनके होने-न-होने और स्थान क्रम बदल देने से वाक्य के अर्थ पर प्रभाव पड़ता है। आप निपात (ही, भी, तो) का प्रयोग करते हुए तीन-तीन वाक्य बनाइए। साथ ही ऐसे दो वाक्यों का भी निर्माण कीजिए जिसमें ये तीनों निपात एक साथ आते हों।

Answer

उत्तर

‘ही’ निपात: 1. राम ही यह काम कर सकता है। 2. मुझे आज ही दिल्ली जाना है। 3. वह पढ़ाई में ही लगा रहता है।

‘भी’ निपात: 1. सीता भी हमारे साथ चलेगी। 2. मुझे किताब के साथ पेन भी चाहिए। 3. वह गाता भी है और नाचता भी है।

‘तो’ निपात: 1. तुम तो बहुत होशियार निकले। 2. आप आइए तो सही, फिर बात करेंगे। 3. मैंने तो पहले ही मना किया था।

तीनों निपात एक साथ: 1. तुम तो आज भी देर से ही आए। 2. मैंने तो उसे कल ही समझा दिया था, फिर भी वह नहीं माना।

‘ही’: राम ही यह काम कर सकता है; मुझे आज ही जाना है; वह पढ़ाई में ही लगा रहता है। ‘भी’: सीता भी चलेगी; पेन भी चाहिए; वह गाता भी है। ‘तो’: तुम तो होशियार निकले; आइए तो सही; मैंने तो मना किया था। तीनों एक साथ: “तुम तो आज भी देर से ही आए”; “मैंने तो उसे कल ही समझा दिया था, फिर भी वह नहीं माना।”

अभ्यास – चर्चा करें

Q21

पर्चेज़िंग पावर से क्या अभिप्राय है? बाज़ार की चकाचौंध से दूर पर्चेज़िंग पावर का सकारात्मक उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है? (क) सामाजिक विकास के कार्यों में। (ख) ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में…।

Answer

उत्तर

पर्चेज़िंग पावर (क्रय-शक्ति): किसी व्यक्ति के पास उपलब्ध धन के आधार पर वस्तुएँ और सेवाएँ खरीदने की क्षमता। लेखक के अनुसार लोग इसका प्रदर्शन अनावश्यक वस्तुएँ खरीदकर करते हैं।

सकारात्मक उपयोग

(क) सामाजिक विकास के कार्यों में: 1. गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति, किताबें, स्कूल-भवन। 2. अस्पताल, दवाइयाँ, रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य-सेवाएँ। 3. वृद्धाश्रम, अनाथालय, दिव्यांगजनों की सहायता। 4. स्वच्छता, पेयजल, वृक्षारोपण, पर्यावरण-संरक्षण। 5. आपदा-राहत कोष में दान।

(ख) ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में: 1. स्थानीय और ग्रामीण उत्पादों, हस्तशिल्प, खादी, कुटीर उद्योगों की वस्तुएँ खरीदना (“वोकल फ़ॉर लोकल”)। 2. किसानों से सीधे जैविक उत्पाद ख़रीदना। 3. ग्रामीण स्वयं-सहायता समूहों और लघु उद्योगों में निवेश। 4. ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देना। 5. ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल-प्रशिक्षण और रोज़गार के लिए सहायता।

पर्चेज़िंग पावर = धन के आधार पर ख़रीदने की क्षमता। इसका सकारात्मक उपयोग (क) शिक्षा, स्वास्थ्य, अनाथालय-वृद्धाश्रम, पर्यावरण और आपदा-राहत जैसे सामाजिक कार्यों में, तथा (ख) स्थानीय/ग्रामीण उत्पाद, हस्तशिल्प, खादी ख़रीदकर, किसानों से सीधे ख़रीद, स्वयं-सहायता समूहों और लघु उद्योगों में निवेश द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था मज़बूत करने में किया जा सकता है।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ बाज़ार का जादू, भगत जी, बाज़ारूपन, सामाजिक समता, पैसे की शक्ति (प्रश्न 1–5)
  • ☒ मन की स्थितियाँ, ग्राहक, मॉल-हाट, शोषण, माया (प्रश्न 6–10)
  • ☒ कबीर, गड़रिया, नकली सामान, ईदगाह (प्रश्न 11–14)
  • ☒ विज्ञापन (प्रश्न 15–16)
  • ☒ भाषा — औपचारिक/अनौपचारिक, संबोधन, कोड-मिक्सिंग, निपात (प्रश्न 17–20)
  • ☒ पर्चेज़िंग पावर का सकारात्मक उपयोग (प्रश्न 21)

Total questions answered: 21 of 21

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 11 (बाज़ार दर्शन) cover?

All 22 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – पाठ के साथ, अभ्यास – पाठ के आसपास, अभ्यास – आपसदारी, अभ्यास – विज्ञापन की दुनिया, अभ्यास – भाषा की बात and अभ्यास – चर्चा करें.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

Yes. The answers follow the current NCERT textbook for Class 12 Hindi Aroh and the latest CBSE syllabus, so the question numbers and wording match the book you use in class.

How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

Are the NCERT solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 11 (बाज़ार दर्शन) free?

Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.