Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Aroh (NCERT) | 12 – काले मेघा पानी दे | 2026-27 | 15 of 15 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | धर्मवीर भारती (1926–1997), इलाहाबाद; ‘धर्मयुग’ के संपादक; पद्मश्री |
प्रमुख रचनाएँ | कनुप्रिया, ठंडा लोहा (कविता); गुनाहों का देवता, सूरज का सातवाँ घोड़ा (उपन्यास); अंधा युग (गीतिनाट्य); ठेले पर हिमालय (निबंध) |
विधा | संस्मरण |
विषय | सूखे के दिनों में ‘इंदर सेना’ (मेढक-मंडली) — नंग-धड़ंग लड़कों की टोली — घर-घर जाकर पानी माँगती है: “गगरी फूटी बैल पियासा / पानी दे, गुड़धानी दे / काले मेघा पानी दे”; लोग सहेजा हुआ पानी उन पर फेंकते हैं |
द्वंद्व | आर्यसमाजी संस्कार वाला, ‘कुमार-सुधार सभा’ का उपमंत्री लेखक इसे अंधविश्वास मानता है; पर उसे सबसे अधिक प्यार करने वाली जीजी इसे “अर्घ्य”, “दान”, “बुवाई” बताती हैं — “त्याग तो वह होता है…” |
आज का प्रश्न | “हम आज देश के लिए करते क्या हैं?” — माँगें बड़ी, त्याग शून्य; “गगरी फूटी की फूटी रह जाती है” |
अभ्यास – पाठ के साथ
लोगों ने लड़कों की टोली को मेढक-मंडली नाम किस आधार पर दिया? यह टोली अपने आपको इंदर सेना कहकर क्यों बुलाती थी?
Answer
उत्तर
मेढक-मंडली नाम: जो लोग इन लड़कों के नंग-धड़ंग शरीर, उनकी उछल-कूद, शोर-शराबे और उनके कारण गली में होने वाले कीचड़-काँदो से चिढ़ते थे, वे उन्हें ‘मेढक-मंडली’ कहते थे। मेढक की तरह ये लड़के उछलते-कूदते, कीचड़ में लोटते और वर्षा के लिए शोर मचाते थे।
इंदर सेना नाम: वर्षा के बादलों के स्वामी इंद्र देवता हैं। ये लड़के टोली बाँधकर इंद्र से वर्षा की प्रार्थना करते थे, मानो वे इंद्र की सेना हों जो उनके नाम पर लोगों से पानी माँगकर बादलों को बुला रही हो— “पानी दे मैया, इंदर सेना आई है।” इसलिए वे स्वयं को इंदर सेना कहते थे।
उनकी उछल-कूद, नंगे बदन, शोर-शराबे और कीचड़ से चिढ़ने वाले लोग उन्हें मेढक-मंडली कहते थे। वे स्वयं को इंदर सेना कहते थे क्योंकि वे वर्षा के देवता इंद्र की सेना बनकर उनसे पानी की प्रार्थना करते थे।
जीजी ने इंदर सेना पर पानी फेंके जाने को किस तरह सही ठहराया?
Answer
उत्तर
जीजी ने अनेक तर्क दिए— 1. अर्घ्य: “यह पानी का अर्घ्य चढ़ाते हैं”; जो चीज़ मनुष्य पाना चाहता है, उसे पहले देगा नहीं तो पाएगा कैसे? 2. दान और त्याग: ऋषि-मुनियों ने दान को सबसे ऊँचा स्थान दिया है। “त्याग तो वह होता है कि जो चीज़ तेरे पास भी कम है, जिसकी तुझको भी ज़रूरत है तो अपनी ज़रूरत पीछे रख कर दूसरे के कल्याण के लिए उसे दे… उसी का फल मिलता है।” 3. बुवाई का उदाहरण: जैसे किसान तीस-चालीस मन गेहूँ उगाने के लिए पाँच-छह सेर अच्छा गेहूँ ज़मीन में बो देता है, वैसे ही यह पानी “बुवाई” है— गली में पानी बोएँगे तो सारे शहर-गाँव पर पानी वाले बादलों की फसल आ जाएगी। 4. देवता लौटाते हैं: पहले खुद दो, तब देवता चौगुना-अठगुना करके लौटाएँगे। 5. आचरण: “यथा राजा तथा प्रजा सिर्फ़ यही सच नहीं है। सच यह भी है कि यथा प्रजा तथा राजा”— यह गांधी जी भी कहते हैं।
जीजी ने इसे पानी की बरबादी नहीं, बल्कि इंद्र को चढ़ाया गया अर्घ्य, त्यागपूर्ण दान और बुवाई बताया — जैसे किसान थोड़ा अनाज बोकर अधिक फसल पाता है, वैसे ही पानी देने पर बादल चौगुना पानी लौटाएँगे; “पहले खुद दो” और “यथा प्रजा तथा राजा”।
पानी दे, गुड़धानी दे मेघों से पानी के साथ-साथ गुड़धानी की माँग क्यों की जा रही है?
Answer
उत्तर
‘गुड़धानी’ गुड़ और भुने चने/अनाज से बना लड्डू है। यहाँ यह अन्न, भोजन और समृद्धि का प्रतीक है। 1. वर्षा होगी तो खेती होगी, फसल अच्छी होगी, और लोगों को भरपेट भोजन (गुड़धानी) मिलेगा। 2. पानी केवल पीने के लिए नहीं, अन्न उपजाने के लिए भी चाहिए। 3. गुड़धानी मिठास और खुशहाली का भी प्रतीक है— किसान समृद्ध होंगे तो जीवन में मिठास आएगी। 4. बच्चों के लिए यह प्रिय खाद्य है, जो उनके भोलेपन को भी दर्शाता है।
गुड़धानी अन्न और समृद्धि का प्रतीक है; वर्षा से ही खेती होगी, फसल होगी और लोगों को भरपेट भोजन व खुशहाली (मिठास) मिलेगी — इसलिए पानी के साथ गुड़धानी माँगी जाती है।
गगरी फूटी बैल पियासा इंदर सेना के इस खेलगीत में बैलों के प्यासा रहने की बात क्यों मुखरित हुई है?
Answer
उत्तर
- भारत कृषि-प्रधान देश है और खेती में बैल किसान के सबसे बड़े सहायक हैं— हल जोतना, सिंचाई, ढुलाई सब उन्हीं से होता है।
- सूखे के कारण कुएँ सूख गए हैं, गगरी (घड़ा) भी खाली या फूटी है; मनुष्य के पीने को पानी नहीं, तो पशुओं को कहाँ से मिले? “ढोर-ढंगर प्यास के मारे मरने लगते”।
- बैल प्यासे रहेंगे तो खेती नहीं होगी, और खेती नहीं होगी तो सबका जीवन संकट में पड़ जाएगा।
- यह सूखे की भयावहता और ग्रामीण जीवन की पीड़ा को मार्मिक ढंग से व्यक्त करता है।
अंत में लेखक इसे प्रतीक रूप में प्रयोग करता है— आज़ादी के बाद भी “गगरी फूटी की फूटी रह जाती है, बैल पियासे के पियासे रह जाते हैं”— अर्थात आम जनता तक लाभ नहीं पहुँचता।
बैल किसान की खेती के आधार हैं; सूखे में गगरी खाली है और पशु प्यास से मर रहे हैं। बैल प्यासे रहेंगे तो खेती और जीवन संकट में पड़ेगा — यह पंक्ति सूखे की भयावहता और कृषक जीवन की पीड़ा प्रकट करती है।
इंदर सेना सबसे पहले गंगा मैया की जय क्यों बोलती है? नदियों का भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश में क्या महत्व है?
Answer
उत्तर
गंगा मैया की जय: भारत में गंगा को सबसे पवित्र नदी और ‘माँ’ माना जाता है; वह जल और जीवन की दात्री है। जल की देवी गंगा का स्मरण करके इंदर सेना अपने कार्य की शुभ शुरुआत करती है और जल की कामना करती है। यह भारतीय लोक-आस्था का प्रतीक है।
नदियों का महत्व: 1. सांस्कृतिक-धार्मिक: गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी आदि नदियों को देवी मानकर पूजा जाता है; इनके तट पर तीर्थ (हरिद्वार, प्रयाग, काशी), कुंभ मेले, स्नान-पर्व होते हैं। 2. सामाजिक: प्राचीन सभ्यताएँ (सिंधु घाटी) नदियों के किनारे विकसित हुईं; नगर-गाँव नदी-तटों पर बसे। 3. आर्थिक: नदियाँ सिंचाई, पेयजल, मत्स्य-पालन, परिवहन और बिजली का स्रोत हैं; उपजाऊ मैदान बनाती हैं। 4. लोकजीवन: लोकगीतों, कथाओं, संस्कारों (अस्थि-विसर्जन, मुंडन) में नदियों का महत्वपूर्ण स्थान है।
गंगा को पवित्र, जलदायिनी माँ माना जाता है; उसकी जय बोलकर वे शुभारंभ करते और जल की कामना करते हैं। भारतीय जीवन में नदियाँ धार्मिक (देवी, तीर्थ, कुंभ), सामाजिक (सभ्यता और बस्तियों का विकास), आर्थिक (सिंचाई, पेयजल, परिवहन, बिजली) और लोक-सांस्कृतिक (गीत, संस्कार) दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
रिश्तों में हमारी भावना-शक्ति का बँट जाना विश्वासों के जंगल में सत्य की राह खोजती हमारी बुद्धि की शक्ति को कमज़ोर करती है। पाठ में जीजी के प्रति लेखक की भावना के संदर्भ में इस कथन के औचित्य की समीक्षा कीजिए।
Answer
उत्तर
यह कथन पाठ के संदर्भ में उचित है।
- लेखक आर्यसमाजी संस्कारों वाला और ‘कुमार-सुधार सभा’ का उपमंत्री था; उसकी बुद्धि इंदर सेना पर पानी फेंकने को अंधविश्वास, पाखंड और पानी की “निर्मम बरबादी” मानती थी।
- परंतु उसे सबसे अधिक प्यार जीजी से मिला था; उनके प्रति उसकी भावना इतनी प्रबल थी कि वह उनके सभी पूजा-विधानों, तीज-त्योहारों में भाग लेता था— गोवर्धन बनाना, झाँकी सजाना, कुल्हियों में भूजा भरना।
- जब उसने पानी फेंकने से इनकार किया और रूठ गया, तो जीजी के स्नेह और तर्कों के आगे “मेरे तर्कों का किला पस्त होने लगा”।
- इस प्रकार रिश्तों के प्रति भावना ने उसकी तर्क-बुद्धि को कमज़ोर कर दिया; वह जीजी को दुखी नहीं करना चाहता था।
समीक्षा: यह सही है कि भावनात्मक लगाव कभी-कभी हमें तर्क और सत्य से दूर कर देता है। पर पाठ यह भी दिखाता है कि जीजी के विश्वास में त्याग, दान और सामूहिक कल्याण का एक गहरा मानवीय सत्य छिपा था, जिसे लेखक बाद में समझ पाया— “हम आज देश के लिए करते क्या हैं?” अतः भावना ने बुद्धि को केवल कमज़ोर नहीं किया, बल्कि उसे एक नई दृष्टि भी दी।
उचित है: लेखक की बुद्धि इंदर सेना पर पानी फेंकने को अंधविश्वास मानती थी, पर जीजी के प्रति गहरे प्रेम के कारण वह उनके रीति-रिवाज़ों में भाग लेता रहा और उनके तर्कों के आगे उसका “तर्कों का किला पस्त होने लगा”। साथ ही, जीजी के विश्वास में छिपे त्याग और दान के मानवीय सत्य ने लेखक को नई दृष्टि भी दी।
अभ्यास – पाठ के आसपास
क्या इंदर सेना आज के युवा वर्ग का प्रेरणास्रोत हो सकती है? क्या आपके स्मृति-कोश में ऐसा कोई अनुभव है जब युवाओं ने संगठित होकर समाजोपयोगी रचनात्मक कार्य किया हो, उल्लेख करें।
Answer
उत्तर
हाँ, इंदर सेना आज के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हो सकती है— 1. वह संगठित होकर समाज की समस्या (सूखा) के समाधान के लिए आगे आती है। 2. उसमें सामूहिकता, उत्साह और निःस्वार्थ भाव है— वह पूरे गाँव-मुहल्ले के लिए पानी माँगती है। 3. आज युवाओं को अंधविश्वास के बजाय वैज्ञानिक तरीकों से— जल-संरक्षण, वर्षा-जल संचयन, वृक्षारोपण— इसी उत्साह के साथ काम करना चाहिए।
अनुभव: हमारे मोहल्ले में पिछली गर्मियों में पानी का भारी संकट था। कॉलोनी के युवाओं ने मिलकर एक ‘जल मित्र’ समूह बनाया। उन्होंने पुराने तालाब की सफ़ाई की, घरों की छतों पर वर्षा-जल संचयन की व्यवस्था करवाई, टपकते नलों की मरम्मत करवाई और घर-घर जाकर पानी बचाने के लिए जागरूक किया। अगली वर्षा में तालाब भर गया और भूजल-स्तर में सुधार हुआ। कोविड महामारी के समय भी युवाओं ने संगठित होकर भोजन, दवाइयाँ और ऑक्सीजन पहुँचाने का कार्य किया था।
हाँ — इंदर सेना संगठित होकर, उत्साह और निःस्वार्थ भाव से समाज की समस्या के लिए आगे आती है; युवा यही भावना वैज्ञानिक कार्यों (जल-संरक्षण, वृक्षारोपण) में लगा सकते हैं। उदाहरण: मोहल्ले के युवाओं द्वारा तालाब की सफ़ाई और वर्षा-जल संचयन, या महामारी में भोजन-दवा पहुँचाना।
तकनीकी विकास के दौर में भी भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। कृषि-समाज में चैत्र, वैशाख सभी माह बहुत महत्वपूर्ण हैं पर आषाढ़ का चढ़ना उनमें उल्लास क्यों भर देता है?
Answer
उत्तर
- वर्षा का आगमन: आषाढ़ मास से वर्षा ऋतु (मानसून) प्रारंभ होती है। जेठ की भीषण गर्मी, लू और सूखे के बाद आषाढ़ में बादल घिरते हैं और पहली बारिश होती है।
- खरीफ़ की बुवाई: भारत में अधिकांश खेती वर्षा पर निर्भर है। आषाढ़ में धान, मक्का, बाजरा, ज्वार आदि की बुवाई होती है; किसानों के लिए नई आशाओं का समय।
- जीवन का संचार: सूखे खेत, कुएँ, तालाब, नदियाँ भर जाते हैं; पशुओं को चारा-पानी मिलता है; प्रकृति हरी-भरी हो जाती है।
- आर्थिक समृद्धि की आशा: अच्छी वर्षा का अर्थ है अच्छी फसल, अधिक आय और खुशहाली।
- सांस्कृतिक उत्सव: आषाढ़-सावन में लोकगीत (कजरी, आल्हा), झूले, तीज जैसे त्योहार आते हैं।
चैत्र-वैशाख फसल कटाई के महीने हैं, पर आषाढ़ नई फसल और नए जीवन की शुरुआत है, इसलिए वह विशेष उल्लास भरता है।
आषाढ़ में मानसून की वर्षा आती है, जो जेठ की गर्मी और सूखे के बाद खेतों, कुओं, तालाबों को जीवन देती है; खरीफ़ की बुवाई शुरू होती है, अच्छी फसल और समृद्धि की आशा जगती है, प्रकृति हरी-भरी होती है और लोकगीत-त्योहार आते हैं — इसलिए कृषि-समाज में आषाढ़ का चढ़ना उल्लास भर देता है।
पाठ के संदर्भ में इसी पुस्तक में दी गई निराला की कविता बादल-राग पर विचार कीजिए और बताइए कि आपके जीवन में बादलों की क्या भूमिका है?
Answer
उत्तर
बादल-राग और ‘काले मेघा पानी दे’ का संबंध: दोनों में बादल जीवनदाता और आशा के प्रतीक हैं। ‘काले मेघा पानी दे’ में सूखे से त्रस्त लोग, विशेषकर किसान, बादलों को पुकारते हैं; ‘बादल राग’ में “जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर, / तुझे बुलाता कृषक अधीर”— शोषित किसान बादल (क्रांति) को बुलाता है। निराला के बादल धरती के सोए अंकुरों को जगाते हैं और छोटे पौधों को खुशहाली देते हैं; भारती के पाठ में भी बादल गगरी भरने और बैलों की प्यास बुझाने की आशा हैं।
मेरे जीवन में बादलों की भूमिका: 1. बादल गर्मी से राहत देते हैं; मौसम सुहावना बनाते हैं। 2. वर्षा से पेयजल, खेती और हमारे भोजन की व्यवस्था होती है। 3. नदियाँ, तालाब और भूजल भरते हैं; बिजली उत्पादन भी होता है। 4. बादल मन में उल्लास, रचनात्मकता और प्रेरणा जगाते हैं— कविता, संगीत, चित्रकला। 5. बादल यह भी सिखाते हैं कि देना (बरसना) ही जीवन की सार्थकता है।
दोनों पाठों में बादल जीवनदाता और आशा के प्रतीक हैं — किसान अधीर होकर उन्हें बुलाता है; निराला में वे क्रांति भी हैं। मेरे जीवन में बादल गर्मी से राहत, पेयजल, खेती और भोजन, जल-स्रोतों का भरना, सुहावना मौसम और रचनात्मक प्रेरणा देते हैं।
त्याग तो वह होता… उसी का फल मिलता है। अपने जीवन के किसी प्रसंग से इस सूक्ति की सार्थकता समझाइए।
Answer
उत्तर
जीजी कहती हैं— “त्याग तो वह होता है कि जो चीज़ तेरे पास भी कम है, जिसकी तुझको भी ज़रूरत है तो अपनी ज़रूरत पीछे रख कर दूसरे के कल्याण के लिए उसे दे तो त्याग तो वह होता है, दान तो वह होता है, उसी का फल मिलता है।”
प्रसंग: पिछले वर्ष बोर्ड परीक्षा से पहले मेरे पास गणित की एक अच्छी सहायक पुस्तक थी, जिससे मैं अभ्यास कर रहा था। मेरे सहपाठी के पिता बीमार थे और उसके पास पुस्तक ख़रीदने के पैसे नहीं थे। मुझे भी पुस्तक की ज़रूरत थी, फिर भी मैंने उसे पुस्तक दे दी और स्वयं पुस्तकालय से तथा पुराने प्रश्न-पत्रों से अभ्यास किया। मेरे मित्र ने बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए और मुझे भी उम्मीद से अधिक अंक मिले। सबसे बड़ा फल यह था कि मुझे गहरा आत्म-संतोष मिला और हमारी मित्रता और भी मज़बूत हो गई।
इससे सिद्ध होता है कि अपनी ज़रूरत को पीछे रखकर किया गया त्याग ही सच्चा दान है, और उसका फल आत्म-संतोष तथा दूसरों के प्रेम के रूप में अवश्य मिलता है।
अपनी ज़रूरत को पीछे रखकर दूसरे के कल्याण के लिए दी गई वस्तु ही सच्चा त्याग है — जैसे परीक्षा से पहले अपनी ज़रूरी सहायक पुस्तक ज़रूरतमंद मित्र को दे देना; मित्र को अच्छे अंक मिले, मुझे आत्म-संतोष और गहरी मित्रता मिली — यही त्याग का फल है।
पानी का संकट वर्तमान स्थिति में भी बहुत गहराया हुआ है। इसी तरह के पर्यावरण से संबद्ध अन्य संकटों के बारे में लिखिए।
Answer
उत्तर
- वायु प्रदूषण: वाहनों, कारख़ानों, पराली जलाने से दिल्ली जैसे शहरों में हवा ज़हरीली; साँस और हृदय रोग बढ़ रहे हैं।
- जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग: ग्रीनहाउस गैसों से तापमान बढ़ रहा है; हिमनद पिघल रहे हैं, समुद्र-स्तर बढ़ रहा है; बाढ़, सूखा, चक्रवात और लू की घटनाएँ बढ़ी हैं।
- वनों की कटाई: वन्य जीवों का आवास नष्ट, जैव-विविधता में कमी, मिट्टी का कटाव और वर्षा में कमी।
- प्लास्टिक प्रदूषण: नदियों, समुद्रों और ज़मीन में प्लास्टिक कचरा; पशु-पक्षियों और समुद्री जीवों की मृत्यु।
- ध्वनि प्रदूषण: शहरों में शोर से तनाव और बहरापन।
- मृदा प्रदूषण और बंजरपन: रासायनिक खाद-कीटनाशकों से मिट्टी की उर्वरता कम।
- ओज़ोन परत का क्षरण: पराबैंगनी किरणों से त्वचा रोग।
- ई-कचरा (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) और नदियों का प्रदूषण।
उपाय: वृक्षारोपण, नवीकरणीय ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन, प्लास्टिक का कम प्रयोग, जैविक खेती, जल-संरक्षण, जन-जागरूकता।
वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन/ग्लोबल वार्मिंग (बाढ़, सूखा, हिमनदों का पिघलना), वनों की कटाई और जैव-विविधता में कमी, प्लास्टिक प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ओज़ोन क्षरण और ई-कचरा; उपाय — वृक्षारोपण, नवीकरणीय ऊर्जा, प्लास्टिक कम करना, जैविक खेती, जल-संरक्षण और जागरूकता।
आपकी दादी-नानी किस तरह के विश्वासों की बात करती हैं? ऐसी स्थिति में उनके प्रति आपका रवैया क्या होता है? लिखिए।
Answer
उत्तर
दादी-नानी के विश्वास: 1. घर से निकलते समय छींक आना या बिल्ली का रास्ता काटना अशुभ है। 2. नज़र न लगे, इसके लिए काला टीका लगाना या नींबू-मिर्च टाँगना। 3. मंगलवार-शनिवार को बाल-नाख़ून न काटना; गुरुवार को कपड़े न धोना। 4. शाम के समय झाड़ू न लगाना, नहीं तो लक्ष्मी चली जाती है। 5. परीक्षा से पहले दही-चीनी खाना शुभ। 6. तुलसी, पीपल की पूजा; व्रत-उपवास।
मेरा रवैया: - मैं उनका सम्मान करता हूँ और उनसे बहस करके उन्हें दुखी नहीं करता— जैसे लेखक जीजी को दुखी नहीं करना चाहता था। - जो विश्वास हानिकारक नहीं और भावनात्मक जुड़ाव देते हैं (जैसे दही-चीनी, तुलसी-पूजा), उन्हें प्रेम से मान लेता हूँ। - कुछ विश्वासों के पीछे वैज्ञानिक या व्यावहारिक कारण भी होते हैं (जैसे शाम को झाड़ू न लगाना— पहले रोशनी कम होने से छोटी-कीमती चीज़ें खो जाने का डर), उन्हें समझने का प्रयास करता हूँ। - जो विश्वास नुकसानदेह या भेदभावपूर्ण हैं, उनके बारे में धैर्य और प्यार से, तर्क देकर उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ।
दादी-नानी बिल्ली का रास्ता काटना, छींक, नज़र उतारना, कुछ दिनों में बाल न कटवाना, शाम को झाड़ू न लगाना, दही-चीनी खाना जैसे विश्वासों की बात करती हैं। मैं उनका सम्मान करता हूँ, हानिरहित विश्वासों को प्रेम से मान लेता हूँ, उनके पीछे के कारण समझने का प्रयास करता हूँ और हानिकारक विश्वासों के बारे में प्यार से तर्क देकर समझाता हूँ।
अभ्यास – चर्चा करें
बादलों से संबंधित अपने-अपने क्षेत्र में प्रचलित गीतों का संकलन करें तथा कक्षा में चर्चा करें।
Answer
उत्तर
बादलों/वर्षा से संबंधित प्रचलित गीत (संकलन के उदाहरण): 1. लोकगीत (उत्तर प्रदेश/बिहार — कजरी): “बरसे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की” (मीराबाई का पद, लोक में प्रचलित)। 2. राजस्थानी लोकगीत: “म्हारो गोरबंद नखरालो…”, “बादली ओ बादली, कठे बरसैगी”— वर्षा की कामना। 3. पंजाबी: “सावन आया, बादल छाए…” 4. इंदर सेना का खेलगीत: “गगरी फूटी बैल पियासा / पानी दे, गुड़धानी दे / काले मेघा पानी दे।” 5. बच्चों का गीत: “आओ बादल, आओ बादल, पानी बरसाओ बादल।” 6. फ़िल्मी गीत: “काले मेघा काले मेघा पानी तो बरसाओ” (लगान), “घनन घनन घिर घिर आए बदरा” (लगान), “रिमझिम गिरे सावन” (मंज़िल), “अल्लाह मेघ दे पानी दे” (गाइड)।
चर्चा के बिंदु: इन गीतों में वर्षा के प्रति किसानों की आशा, सूखे की पीड़ा, विरह (सावन में प्रिय की याद), प्रकृति का उल्लास और सामूहिकता का भाव मिलता है। ये गीत हमारी कृषि-संस्कृति और लोकजीवन से गहराई से जुड़े हैं।
संकलन: कजरी (“बरसे बदरिया सावन की”), राजस्थानी वर्षा-गीत, इंदर सेना का “गगरी फूटी बैल पियासा…”, बच्चों का “आओ बादल”, फ़िल्मी गीत (“घनन घनन घिर घिर आए बदरा”, “अल्लाह मेघ दे पानी दे”)। चर्चा — इनमें किसानों की आशा, सूखे की पीड़ा, विरह, उल्लास और कृषि-संस्कृति का भाव है।
पिछले 15-20 सालों में पर्यावरण से छेड़-छाड़ के कारण भी प्रकृति-चक्र में बदलाव आया है, जिसका परिणाम मौसम का असंतुलन है। वर्तमान बाड़मेर (राजस्थान) में आई बाढ़, मुंबई की बाढ़ तथा महाराष्ट्र का भूकंप या फिर सुनामी भी इसी का नतीजा है। इस प्रकार की घटनाओं से जुड़ी सूचनाओं, चित्रों का संकलन कीजिए और एक प्रदर्शनी का आयोजन कीजिए, जिसमें बाज़ार दर्शन पाठ में बनाए गए विज्ञापनों को भी शामिल कर सकते हैं। और हाँ ऐसी स्थितियों से बचाव के उपाय पर पर्यावरण विशेषज्ञों की राय को प्रदर्शनी में मुख्य स्थान देना न भूलें।
Answer
उत्तर
प्रदर्शनी की रूपरेखा— “बदलता मौसम, बिगड़ता संतुलन”
खंड 1 — प्रमुख घटनाएँ (चित्र, समाचार-कतरनें, आँकड़े): - बाड़मेर (राजस्थान) की बाढ़ (2006) — मरुस्थल में असामान्य वर्षा। - मुंबई की बाढ़ (26 जुलाई 2005) — एक दिन में लगभग 94 सेमी वर्षा। - लातूर (महाराष्ट्र) भूकंप (1993)। - हिंद महासागर की सुनामी (26 दिसंबर 2004)। - केदारनाथ आपदा (2013), केरल बाढ़ (2018), चेन्नई बाढ़ (2015), जोशीमठ भू-धँसाव (2023)।
खंड 2 — कारण: वनों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण, नदियों-नालों पर अतिक्रमण, जलवायु परिवर्तन, पहाड़ों पर अंधाधुंध निर्माण। (टिप्पणी: भूकंप और सुनामी मुख्यतः भूगर्भीय कारणों से होते हैं, पर अनियोजित निर्माण और तटीय वनों— मैंग्रोव— के विनाश से उनकी क्षति बढ़ जाती है।)
खंड 3 — ‘बाज़ार दर्शन’ के विज्ञापन: उपभोक्तावाद, प्लास्टिक और अत्यधिक उपभोग से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाते पोस्टर/विज्ञापन।
खंड 4 — विशेषज्ञों की राय (मुख्य स्थान): - वृक्षारोपण और वनों का संरक्षण; तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वन। - वर्षा-जल संचयन, जल-निकासी की उचित व्यवस्था। - भूकंपरोधी भवन-निर्माण; आपदा-प्रबंधन और पूर्व-चेतावनी प्रणाली। - नदी-तटों और पहाड़ों पर अनियोजित निर्माण पर रोक। - नवीकरणीय ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन में कमी। - जन-जागरूकता और आपदा के समय क्या करें-क्या न करें।
प्रदर्शनी “बदलता मौसम, बिगड़ता संतुलन” — खंड 1: बाड़मेर व मुंबई बाढ़, लातूर भूकंप, सुनामी, केदारनाथ/केरल आपदाओं के चित्र-समाचार; खंड 2: कारण (वन-कटाई, अनियोजित शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन); खंड 3: ‘बाज़ार दर्शन’ के उपभोक्तावाद-विरोधी विज्ञापन; खंड 4 (मुख्य): विशेषज्ञों के बचाव-उपाय — वृक्षारोपण, मैंग्रोव, जल-संचयन, भूकंपरोधी निर्माण, पूर्व-चेतावनी, नवीकरणीय ऊर्जा, जागरूकता।
अभ्यास – विज्ञापन की दुनिया
‘पानी बचाओ’ से जुड़े विज्ञापनों को एकत्र कीजिए। इस संकट के प्रति चेतावनी बरतने के लिए आप किस प्रकार का विज्ञापन बनाना चाहेंगे?
Answer
उत्तर
प्रचलित विज्ञापनों/नारों के उदाहरण: “जल है तो कल है”, “बूँद-बूँद से घड़ा भरता है”, “पानी बचाओ, जीवन बचाओ”, “जल शक्ति अभियान— कैच द रेन”, “हर बूँद अनमोल”।
मेरा विज्ञापन (पोस्टर/टी.वी.)
दृश्य: एक बच्चा सूखी, फटी धरती पर खाली गगरी लिए खड़ा है; पीछे एक प्यासा बैल। ऊपर बड़े अक्षरों में— “गगरी फूटी, बैल पियासा… क्या यही है हमारा कल?”
बीच में: एक टपकता नल, जिसकी हर बूँद के नीचे लिखा है— “एक टपकता नल = साल भर में हज़ारों लीटर पानी बरबाद।”
नीचे पाँच संकल्प (चित्रों सहित): 1. ब्रश करते समय नल बंद रखें। 2. बाल्टी से नहाएँ, शॉवर से नहीं। 3. टपकते नल तुरंत ठीक कराएँ। 4. छत पर वर्षा-जल संचयन करें। 5. आर.ओ. के बचे पानी से पौधे सींचें, पोछा लगाएँ।
टैगलाइन: “आज बचाओगे बूँद, तभी कल पाओगे समुंद।” संदेश: “पानी बनाया नहीं जा सकता, केवल बचाया जा सकता है।”
प्रचलित नारे: “जल है तो कल है”, “बूँद-बूँद से घड़ा भरता है”, “कैच द रेन”। मेरा विज्ञापन: सूखी धरती पर खाली गगरी लिए बच्चा और प्यासा बैल — “गगरी फूटी, बैल पियासा… क्या यही है हमारा कल?”; टपकते नल से बरबादी का आँकड़ा; पानी बचाने के पाँच संकल्प; टैगलाइन — “आज बचाओगे बूँद, तभी कल पाओगे समुंद।”
उत्तर
विषय-सूची की जाँच
- ☒ मेढक-मंडली/इंदर सेना, जीजी के तर्क, गुड़धानी, प्यासे बैल, गंगा मैया (प्रश्न 1–5)
- ☒ भावना और बुद्धि (प्रश्न 6)
- ☒ युवा, आषाढ़, बादल-राग, त्याग, पर्यावरण-संकट, विश्वास (प्रश्न 7–12)
- ☒ गीत-संकलन, प्रदर्शनी, विज्ञापन (प्रश्न 13–15)