Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Aroh (NCERT) | 8 – रुबाइयाँ | 2026-27 | 6 of 6 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
शायर | फ़िराक गोरखपुरी (मूल नाम रघुपति सहाय ‘फ़िराक’), 1896–1983, गोरखपुर; ज्ञानपीठ और साहित्य अकादेमी पुरस्कार (‘गुले-नग्मा’) |
विधा | रुबाई — चार पंक्तियों का उर्दू-फ़ारसी छंद; पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक (काफ़िया), तीसरी स्वच्छंद |
विषय | वात्सल्य — माँ और बच्चे के स्नेह के घरेलू चित्र; दीवाली, रक्षाबंधन जैसे पर्व |
चित्र | चाँद के टुकड़े-से बच्चे को हवा में लोका देना; नहलाकर कंघी करना, कपड़े पहनाना; दीवाली पर घरौंदे में दिए; चाँद के लिए ज़िद पर दर्पण दिखाना; रक्षाबंधन पर बिजली-से चमकते लच्छे |
भाषा | हिंदी, उर्दू और लोकभाषा का मेल; सूरदास के वात्सल्य वर्णन की सादगी |
अभ्यास – पाठ के साथ
शायर राखी के लच्छे को बिजली की चमक की तरह कहकर क्या भाव व्यंजित करना चाहता है?
Answer
उत्तर
- रक्षाबंधन सावन में आता है, जब आकाश में हलकी-हलकी घटाएँ छाई होती हैं और बिजली चमकती है। राखी के चमकीले लच्छे उसी बिजली की तरह चमक रहे हैं— यह प्राकृतिक और सांस्कृतिक दृश्य का सुंदर मेल है।
- बिजली की चमक बहन के मन के उल्लास, उमंग और प्रसन्नता का प्रतीक है; “रस की पुतली” बहन बड़े प्रेम और उत्साह से भाई को राखी बाँधती है।
- जैसे घटा और बिजली का अटूट संबंध है, वैसे ही भाई-बहन का संबंध भी अटूट और पवित्र है।
- पर्व के अवसर पर बच्चों की “नन्हीं फ़रमाइशें” पूरी होना— चमकीली राखी उसी का संकेत है।
सावन की घटा में चमकती बिजली की तरह राखी के लच्छों की चमक से रक्षाबंधन की उमंग, बहन के मन का उल्लास और भाई-बहन के अटूट, पवित्र संबंध (जैसे घटा और बिजली का) का भाव व्यंजित होता है।
खुद का परदा खोलने से क्या आशय है?
Answer
उत्तर
यह प्रश्न फ़िराक की गज़ल के इस शेर से संबंधित है— “जो मुझको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें / मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं”।
आशय: जो लोग दूसरों की निंदा करते हैं, उनकी बुराइयाँ उजागर करते हैं, वे वास्तव में अपनी ही असलियत (परदा) खोल देते हैं। दूसरों की निंदा करने से निंदक के ओछे स्वभाव, ईर्ष्या, संकीर्ण मानसिकता और कमज़ोरियों का पता चल जाता है। अर्थात परनिंदा से दूसरे का नहीं, अपना ही चरित्र प्रकट होता है।
दूसरों की निंदा करने वाला वास्तव में अपनी ही असलियत उजागर करता है; परनिंदा से उसकी ईर्ष्या, ओछापन और संकीर्ण मानसिकता प्रकट हो जाती है — “मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं”।
अभ्यास – टिप्पणी करें
टिप्पणी करें— (क) गोदी के चाँद और गगन के चाँद का रिश्ता।
Answer
उत्तर
माँ की गोद में खेलता बच्चा माँ के लिए “चाँद का टुकड़ा” है— सुंदर, प्यारा और अनमोल। रुबाई में बच्चा आकाश के चाँद को पाने की ज़िद करता है— “आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है / बालक तो हई चाँद पै ललचाया है”। माँ उसे दर्पण देकर कहती है— “देख आईने में चाँद उतर आया है”। दर्पण में बच्चे को अपना ही चेहरा दिखाई देता है। इस प्रकार गोदी का चाँद (बच्चा) और गगन का चाँद एक हो जाते हैं— दोनों सुंदर, शीतल और मनोहर हैं; बच्चा ही माँ का चाँद है। यह सूरदास के “मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों” की याद दिलाता है।
माँ के लिए बच्चा ही गोदी का चाँद है; जब बच्चा आकाश के चाँद की ज़िद करता है, माँ दर्पण में उसे उसका ही चेहरा दिखाकर कहती है कि चाँद उतर आया है — इस प्रकार दोनों चाँद एक हो जाते हैं; यह वात्सल्य का सुंदर चित्र है।
टिप्पणी करें— (ख) सावन की घटाएँ व रक्षाबंधन का पर्व।
Answer
उत्तर
रक्षाबंधन श्रावण (सावन) मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस समय आकाश में हलकी-हलकी घटाएँ छाई रहती हैं और बिजली चमकती है। रुबाई में— “रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली / छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी / बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे / भाई के है बाँधती चमकती राखी”। सावन का घटा से, घटा का बिजली से जो संबंध है, वही भाई का बहन से है। घटाओं का सौंदर्य और ठंडक पर्व के उल्लास को बढ़ा देते हैं। इस प्रकार प्रकृति और पर्व का गहरा संबंध दिखाया गया है।
रक्षाबंधन सावन में आता है जब हलकी घटाएँ छाई होती हैं और बिजली चमकती है; राखी के लच्छे बिजली-से चमकते हैं। सावन-घटा-बिजली के संबंध की तरह ही भाई-बहन का संबंध है — प्रकृति और पर्व का सुंदर मेल।
अभ्यास – कविता के आसपास
इन रुबाइयों से हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के मिले-जुले प्रयोगों को छाँटिए।
Answer
उत्तर
हिंदी (तत्सम/तद्भव) | उर्दू | लोकभाषा |
|---|---|---|
आँगन, चाँद, निर्मल जल, दीवाली, रूपवती, दर्पण, रक्षाबंधन, गगन, बिजली, राखी, घटा | गेसुओं, ज़िदयाया (ज़िद), आईने, नर्म, दमक, मुखड़े | लोका देना, पिन्हाती, घुटनियों, ठुनक रहा, हई, पै, लावे, घरौंदे, रस की पुतली |
उदाहरण पंक्तियाँ: - “उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके” — उर्दू - “जब घुटनियों में ले के है पिन्हाती कपड़े” — लोकभाषा - “रह-रह के हवा में जो लोका देती है” — लोकभाषा - “देख आईने में चाँद उतर आया है” — उर्दू - “दर्पण उसे दे के कह रही है माँ” — हिंदी (तत्सम) - “बालक तो हई चाँद पै ललचाया है” — लोकभाषा
हिंदी: आँगन, निर्मल जल, रूपवती, दर्पण, गगन, रक्षाबंधन, राखी; उर्दू: गेसुओं, ज़िदयाया, आईने, नर्म, मुखड़े; लोकभाषा: लोका देना, पिन्हाती, घुटनियों, ठुनक, हई, पै, लावे, घरौंदे।
अभ्यास – आपसदारी
कविता में एक भाव, एक विचार होते हुए भी उसका अंदाज़े बयाँ या भाषा के साथ उसका बर्ताव अलग-अलग रूप में अभिव्यक्ति पाता है। इस बात को ध्यान रखते हुए नीचे दी गई कविताओं को पढ़िए और दी गई रुबाई में से समानार्थी पंक्तियाँ ढूँढ़िए। (क) मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों। —सूरदास (ख) वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान / उमड़ कर आँखों से चुपचाप / बही होगी कविता अनजान —सुमित्रानंदन पंत (ग) सीस उतारे भुईं धरे तब मिलिहैं करतार —कबीर
Answer
उत्तर
(क) सूरदास — “मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों।” समानार्थी रुबाई: “आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है / बालक तो हई चाँद पै ललचाया है / दर्पण उसे दे के कह रही है माँ / देख आईने में चाँद उतर आया है”। दोनों में बच्चे की चाँद पाने की ज़िद का वात्सल्यपूर्ण चित्र है।
(ख) पंत — “वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान…” यह भाव फ़िराक की गज़ल के इस शेर से मेल खाता है— “शायर की नवा, नग्मा, उसका / आँसू है सिसकियाँ भरते हैं” (या गज़ल का भाव — दुख और पीड़ा से ही शायरी का जन्म)। दोनों में यह विचार है कि कविता वेदना और दुख से उपजती है। (टिप्पणी: वर्तमान पाठ में गज़ल नहीं दी गई है; विद्यार्थी फ़िराक की गज़ल “नौरस गुंचे पंखड़ियों की नाज़ुक गिरहें खोले हैं” पढ़कर समानार्थी शेर ढूँढ़ें।)
(ग) कबीर — “सीस उतारे भुईं धरे तब मिलिहैं करतार” यह भाव भी फ़िराक की गज़ल के शेर से जुड़ता है— “फ़ितरत का कायम है तवाज़ुन आलमे-हुस्नो-इश्क में भी / उसको उतना ही पाते हैं ख़ुद को जितना खो ले हैं”। दोनों में यह विचार है कि अहंकार (स्वयं) को मिटाकर, पूर्ण समर्पण से ही ईश्वर या प्रेम की प्राप्ति होती है।
(क) सूरदास की पंक्ति का समानार्थी — “आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है / बालक तो हई चाँद पै ललचाया है…” (चाँद के लिए बच्चे की ज़िद)। (ख) पंत का भाव (कविता वेदना से उपजती है) फ़िराक की गज़ल के दर्द-भरे शेरों से मेल खाता है। (ग) कबीर का भाव (अहंकार मिटाकर ही प्राप्ति) — “उसको उतना ही पाते हैं ख़ुद को जितना खो ले हैं”।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ राखी के लच्छे, परदा खोलना (प्रश्न 1–2)
- ☒ गोदी का चाँद, सावन और रक्षाबंधन (प्रश्न 3–4)
- ☒ भाषा के मिले-जुले प्रयोग (प्रश्न 5)
- ☒ समानार्थी पंक्तियाँ (प्रश्न 6)