Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
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XII | Hindi | Aroh (NCERT) | 15 – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श-समाज | 2026-27 | 8 of 8 |
बिंदु | विवरण |
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लेखक | बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर (1891–1956), महू (मध्य प्रदेश); संविधान-निर्माता, समाज-सुधारक |
प्रमुख रचनाएँ | द कास्ट्स इन इंडिया (1917), एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट (1936), हू आर द शूद्राज़ (1946), द अनटचेबल्स (1948), बुद्धा एंड हिज़ धम्मा (1957) |
स्रोत | ‘जाति-भेद का उच्छेद’ (एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट) से |
श्रम विभाजन और जाति-प्रथा | जाति-प्रथा श्रम-विभाजन के साथ-साथ “श्रमिक-विभाजन” है; यह अस्वाभाविक, ऊँच-नीच पर आधारित, रुचि-विरोधी, जन्म से पेशा तय करने वाली है; बेरोज़गारी और अकुशलता का कारण |
आदर्श-समाज | स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित; भ्रातृता का दूसरा नाम लोकतंत्र — “सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति”; ‘दासता’ की व्यापक परिभाषा; समता एक “व्यवहार्य सिद्धांत” |
अभ्यास – पाठ के साथ
जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?
Answer
उत्तर
- श्रमिक-विभाजन: “जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है।” सभ्य समाज में श्रम-विभाजन होता है, पर श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं होता।
- ऊँच-नीच: जाति-प्रथा विभाजित वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है, जो विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता।
- रुचि पर आधारित नहीं: यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है।
- जन्म से पेशे का निर्धारण: मनुष्य के प्रशिक्षण या निजी क्षमता का विचार किए बिना, माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, गर्भधारण के समय से ही उसका पेशा निर्धारित कर दिया जाता है।
- पेशा बदलने की स्वतंत्रता नहीं: जाति-प्रथा मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध देती है, भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए।
- अकुशलता: लोग निर्धारित कार्य को अरुचि के साथ केवल विवशतावश करते हैं, जिससे “टालू काम” होता है और कुशलता नहीं आती।
जाति-प्रथा श्रम-विभाजन के साथ श्रमिक-विभाजन भी है; वह वर्गों को ऊँच-नीच बनाती है; रुचि और क्षमता की उपेक्षा कर जन्म से पेशा तय करती है; जीवन भर एक पेशे में बाँध देती है, पेशा बदलने नहीं देती; और अरुचि से काम कराकर अकुशलता बढ़ाती है — इसलिए वह स्वाभाविक श्रम-विभाजन नहीं है।
जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?
Answer
उत्तर
कारण कैसे बनी: 1. जाति-प्रथा जन्म से ही पेशा निर्धारित कर देती है और किसी को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो। 2. उद्योग-धंधों की प्रक्रिया और तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अचानक परिवर्तन हो जाता है; पुराने पेशे अनुपयोगी हो जाते हैं। ऐसे में पेशा बदलने की स्वतंत्रता न होने पर मनुष्य के पास “भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है?” 3. इस प्रकार “पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।”
आज की स्थिति: - संविधान ने सभी को अपनी पसंद का व्यवसाय चुनने का अधिकार (अनुच्छेद 19) दिया है; शिक्षा, आरक्षण, शहरीकरण और औद्योगीकरण से जाति-आधारित पेशों का बंधन बहुत कम हुआ है। - फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ समुदाय आज भी परंपरागत पेशों (जैसे सफ़ाई, चर्म-कार्य) से बँधे हैं; सामाजिक भेदभाव के कारण उन्हें अन्य व्यवसायों में अवसर कम मिलते हैं। कुछ जातियाँ ‘श्रम की गरिमा’ न होने के कारण कुछ कामों को हीन मानकर नहीं करतीं।
अतः स्थिति पहले से सुधरी है, पर पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
जाति-प्रथा जन्म से पेशा तय करके पैतृक पेशे के अलावा कोई काम चुनने नहीं देती; तकनीक बदलने से पुराने पेशे अनुपयोगी होने पर भी पेशा न बदल पाने से लोग बेरोज़गार होकर भूखों मरते हैं। आज संविधान, शिक्षा और औद्योगीकरण से स्थिति काफ़ी सुधरी है, पर ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ समुदाय अब भी परंपरागत पेशों और भेदभाव से बँधे हैं।
लेखक के मत से ‘दासता’ की व्यापक परिभाषा क्या है?
Answer
उत्तर
लेखक के अनुसार “‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। ‘दासता’ में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है।” यह स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी पाई जा सकती है— जैसे जाति-प्रथा में कुछ लोगों को अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं। अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता न होना भी दासता है।
दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं; वह स्थिति भी दासता है जिसमें व्यक्ति को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्य निभाने के लिए विवश होना पड़े — जैसे जाति-प्रथा में अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशा अपनाना।
शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर ‘समता’ को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?
Answer
उत्तर
आंबेडकर मानते हैं कि मनुष्य की क्षमता तीन बातों पर निर्भर है— (1) शारीरिक वंश-परंपरा, (2) सामाजिक उत्तराधिकार (माता-पिता की कल्याण-कामना, शिक्षा, ज्ञानार्जन), (3) मनुष्य के अपने प्रयत्न। इन तीनों दृष्टियों से मनुष्य समान नहीं होते, फिर भी वे समता का आग्रह करते हैं—
तर्क: 1. पहली दो बातें मनुष्य के वश में नहीं: वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार मनुष्य के अपने वश की बात नहीं हैं; इनके आधार पर असमान व्यवहार “नितांत अनुचित” है। केवल तीसरे आधार (प्रयत्न) पर असमान व्यवहार उचित हो सकता है। 2. सुविधा-संपन्नों का पक्षपात: यदि इन आधारों पर व्यवहार हो तो उत्तम कुल, शिक्षा, पारिवारिक ख्याति, पैतृक संपदा वाले ही बाज़ी मार ले जाएँगे— यह निष्पक्ष निर्णय नहीं होगा। 3. समाज की अधिकतम उपयोगिता: समाज को अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता तभी मिल सकती है जब सभी को आरंभ से ही समान अवसर एवं समान व्यवहार उपलब्ध कराए जाएँ। 4. राजनीतिज्ञ के लिए व्यवहार्य: राजनीतिज्ञ के पास इतना समय या जानकारी नहीं होती कि वह हर व्यक्ति की अलग-अलग आवश्यकताओं और क्षमताओं के अनुसार व्यवहार करे; अतः सबके साथ समान व्यवहार ही एकमात्र व्यावहारिक कसौटी है। 5. मानवता: मानवता के दृष्टिकोण से समाज को दो वर्गों में नहीं बाँटा जा सकता।
इसलिए “शाब्दिक अर्थ में ‘समता’ असंभव होते हुए भी यह नियामक सिद्धांत है”।
क्योंकि वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार मनुष्य के वश में नहीं, इनके आधार पर असमान व्यवहार अनुचित है और यह सुविधा-संपन्नों का पक्षपात होगा; समाज को अधिकतम उपयोगिता तभी मिलेगी जब सबको आरंभ से समान अवसर और व्यवहार मिले; राजनीतिज्ञ के लिए हर व्यक्ति की अलग क्षमता के अनुसार व्यवहार असंभव है, अतः समान व्यवहार ही एकमात्र व्यावहारिक कसौटी है; मानवता भी समाज-विभाजन की अनुमति नहीं देती।
सही में आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?
Answer
उत्तर
हाँ, मैं इससे सहमत हूँ।
- आंबेडकर का मूल उद्देश्य मानवीय गरिमा और भावनात्मक समत्व है— वे चाहते हैं कि समाज में सब एक-दूसरे को भाई की तरह समझें, सबके प्रति “श्रद्धा व सम्मान का भाव” हो, और “दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारा” हो।
- परंतु वे जानते थे कि केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं; जब तक भौतिक स्थितियाँ और जीवन-सुविधाएँ— पेशा चुनने की स्वतंत्रता, जीविकोपार्जन के साधन, संपत्ति का अधिकार, शिक्षा, समान अवसर— नहीं मिलतीं, तब तक समता संभव नहीं।
- इसलिए उन्होंने आर्थिक तर्क दिए— जाति-प्रथा बेरोज़गारी, भुखमरी और अकुशलता का कारण है; यह “आर्थिक पहलू से भी हानिकारक” है।
- यह दृष्टि व्यावहारिक है— भूखे और शोषित व्यक्ति के लिए केवल भाईचारे का उपदेश निरर्थक है; पहले उसकी भौतिक आवश्यकताएँ पूरी होनी चाहिए, तभी वह सम्मान और समता का अनुभव कर सकता है।
अतः आंबेडकर ने मानवीय दृष्टि और भौतिक यथार्थ दोनों को जोड़कर जातिवाद के उन्मूलन का मार्ग सुझाया।
हाँ। आंबेडकर का लक्ष्य भाईचारे और सम्मान पर आधारित भावनात्मक समत्व है, पर वे जानते थे कि पेशा चुनने की स्वतंत्रता, जीविका के साधन, शिक्षा और समान अवसर जैसी भौतिक सुविधाओं के बिना समता संभव नहीं; इसलिए उन्होंने जाति-प्रथा को आर्थिक रूप से भी हानिकारक सिद्ध किया — यह मानवीय और व्यावहारिक दोनों दृष्टि है।
आदर्श समाज के तीन तत्वों में से एक ‘भ्रातृता’ को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है अथवा नहीं? आप इस ‘भ्रातृता’ शब्द से कहाँ तक सहमत हैं? यदि नहीं तो आप क्या शब्द उचित समझेंगे/समझेंगी?
Answer
उत्तर
स्त्रियों का समावेश: लेखक ने ‘भ्रातृता’ (भाईचारा) शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया है— उनका आशय समाज के सभी सदस्यों के बीच परस्पर प्रेम, सम्मान, सहयोग और “अबाध संपर्क” से है। आंबेडकर स्त्री-पुरुष समानता के प्रबल समर्थक थे (हिंदू कोड बिल), इसलिए उनके आदर्श समाज में स्त्रियाँ निश्चित रूप से सम्मिलित हैं।
शब्द से सहमति: परंतु शाब्दिक रूप से ‘भ्रातृता’ (भ्राता = भाई) पुरुष-केंद्रित शब्द है; इससे स्त्रियों का स्पष्ट प्रतिनिधित्व नहीं होता। आज के लैंगिक-समानता के युग में यह शब्द पूरी तरह उपयुक्त नहीं लगता।
उचित शब्द: ‘भ्रातृता’ के स्थान पर ‘बंधुता’ (संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त), ‘सहोदरता’, ‘मानवता’, ‘आत्मीयता’ या ‘भाईचारा-बहनापा’ जैसे लिंग-निरपेक्ष शब्द अधिक उचित होंगे। ‘बंधुता’ सबसे उपयुक्त है क्योंकि वह सभी मनुष्यों के बीच समान संबंध दर्शाती है।
लेखक ने ‘भ्रातृता’ को व्यापक अर्थ (सभी सदस्यों में प्रेम-सम्मान, लोकतंत्र) में प्रयोग किया है और वे स्त्री-समानता के समर्थक थे, अतः स्त्रियाँ सम्मिलित हैं। पर शाब्दिक रूप से ‘भ्रातृता’ (भाई) पुरुष-केंद्रित है; इसके स्थान पर लिंग-निरपेक्ष शब्द ‘बंधुता’ (संविधान में प्रयुक्त), ‘मानवता’ या ‘आत्मीयता’ अधिक उचित है।
अभ्यास – पाठ के आसपास
आंबेडकर ने जाति प्रथा के भीतर पेशे के मामले में लचीलापन न होने की जो बात की है—उस संदर्भ में शेखर जोशी की कहानी ‘गलता लोहा’ पर पुनर्विचार कीजिए।
Answer
उत्तर
‘गलता लोहा’ (कक्षा 11, आरोह) में मोहन एक मेधावी ब्राह्मण बालक है, जिसके पिता वंशीधर पुरोहिती करते हैं। गरीबी के कारण वह पढ़ाई के लिए लखनऊ जाता है, पर वहाँ घरेलू नौकर बनकर रह जाता है और आगे नहीं पढ़ पाता। गाँव लौटकर वह अपने बचपन के मित्र धनराम लोहार की भट्ठी पर जाता है और एक दिन स्वयं हथौड़ा उठाकर लोहे की छड़ को सुघड़ गोल आकार दे देता है। धनराम चकित रह जाता है कि एक ब्राह्मण का बेटा लोहार का काम कर रहा है।
आंबेडकर के विचारों से संबंध: 1. जाति-प्रथा के अनुसार मोहन को पुरोहिती ही करनी चाहिए थी और धनराम को लोहार का काम; पेशे में कोई लचीलापन नहीं। 2. पर मोहन ने जाति की सीमा तोड़कर अपनी रुचि और कुशलता के अनुसार लोहार का काम किया— यही आंबेडकर का आदर्श है कि व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार पेशा चुन सके। 3. धनराम भी पढ़ाई में अच्छा था, पर जातिगत मानसिकता के कारण उसे पैतृक पेशा अपनाना पड़ा— यह आंबेडकर द्वारा बताई गई ‘दासता’ का उदाहरण है। 4. कहानी का शीर्षक ‘गलता लोहा’ प्रतीकात्मक है— जाति-भेद की कठोरता का लोहा पिघल रहा है।
अतः ‘गलता लोहा’ कहानी आंबेडकर के विचारों का समर्थन करती है कि पेशा जाति से नहीं, रुचि और योग्यता से तय होना चाहिए।
‘गलता लोहा’ में ब्राह्मण मोहन जाति की सीमा तोड़कर लोहार धनराम की भट्ठी पर कुशलता से लोहे को आकार देता है — यह आंबेडकर के आदर्श (रुचि-योग्यता से पेशा चुनना) का उदाहरण है; जबकि धनराम का पढ़ाई छोड़कर पैतृक पेशा अपनाना जाति-प्रथा की जकड़न (‘दासता’) दिखाता है। शीर्षक जाति-भेद के कठोर लोहे के पिघलने का प्रतीक है।
कार्य कुशलता पर जाति प्रथा का प्रभाव विषय पर समूह में चर्चा कीजिए। चर्चा के दौरान उभरने वाले बिंदुओं को लिपिबद्ध कीजिए।
Answer
उत्तर
चर्चा के प्रमुख बिंदु
नकारात्मक प्रभाव: 1. रुचि के विरुद्ध कार्य: जाति-प्रथा में व्यक्ति को अपनी रुचि के बजाय पैतृक पेशा अपनाना पड़ता है; अरुचि से किया गया कार्य “टालू” और अकुशल होता है (आंबेडकर)। 2. प्रतिभा की बर्बादी: योग्य व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कार्य नहीं कर पाता; समाज को उसकी प्रतिभा का लाभ नहीं मिलता। 3. नवाचार में बाधा: एक ही पेशे में बँधे रहने से नई तकनीक और नए कौशल सीखने की प्रेरणा नहीं रहती। 4. हीनता और कुंठा: कुछ पेशों को ‘नीच’ मानने से उन्हें करने वालों में हीनता और असंतोष रहता है, जिससे कार्य की गुणवत्ता घटती है। 5. श्रम की गरिमा का अभाव: उच्च जातियाँ शारीरिक श्रम को हीन मानती हैं, जिससे सामाजिक उत्पादकता घटती है। 6. बेरोज़गारी: पेशा न बदल पाने से तकनीकी परिवर्तन के समय लोग बेरोज़गार हो जाते हैं।
कुछ तर्क (विरोधी पक्ष): 1. पारिवारिक पेशे में बचपन से प्रशिक्षण मिलने से कुछ पारंपरिक कलाओं (बुनकरी, कुम्हारी, धातु-कला) में विशेष कुशलता विकसित हुई। 2. पर यह कुशलता स्वेच्छा और प्रशिक्षण से भी आ सकती है, जाति-बंधन आवश्यक नहीं।
निष्कर्ष: जाति-प्रथा कार्य-कुशलता के लिए हानिकारक है; कुशल समाज के लिए व्यक्ति को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार पेशा चुनने की स्वतंत्रता, समान अवसर, कौशल-प्रशिक्षण और श्रम की गरिमा आवश्यक है।
चर्चा-बिंदु: रुचि के विरुद्ध पैतृक पेशा अपनाने से अकुशल “टालू” काम, प्रतिभा की बर्बादी, नवाचार में बाधा, हीनता-कुंठा, श्रम की गरिमा का अभाव और बेरोज़गारी; विरोधी तर्क — पारिवारिक प्रशिक्षण से कुछ पारंपरिक कलाओं में कुशलता, पर वह स्वेच्छा से भी संभव। निष्कर्ष — कुशल समाज के लिए पेशा चुनने की स्वतंत्रता, समान अवसर और श्रम की गरिमा आवश्यक है।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ जाति-प्रथा और श्रम-विभाजन, बेरोज़गारी (प्रश्न 1–2)
- ☒ दासता, समता, भावनात्मक समत्व, भ्रातृता (प्रश्न 3–6)
- ☒ गलता लोहा, कार्य-कुशलता पर चर्चा (प्रश्न 7–8)