Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Aroh (NCERT) | 13 – पहलवान की ढोलक | 2026-27 | 15 of 15 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ (1921–1977), औराही हिंगना (अररिया, बिहार); आंचलिक कथाकार |
प्रमुख रचनाएँ | मैला आँचल, परती परिकथा (उपन्यास); ठुमरी, अगिनखोर (कहानी-संग्रह); ऋणजल धनजल (संस्मरण) |
विधा | आंचलिक कहानी |
कथानक | अनाथ लुट्टन सिंह, विधवा सास द्वारा पाला गया; श्यामनगर के दंगल में ढोल की ललकार पर ‘शेर के बच्चे’ चाँद सिंह को पछाड़कर राज-पहलवान बना; पंद्रह वर्ष अजेय रहा; राजा की मृत्यु के बाद विलायत से लौटे राजकुमार ने दंगल की जगह घोड़े की रेस शुरू की और पहलवान को निकाल दिया; गाँव लौटकर कुश्ती सिखाने लगा; अनावृष्टि, मलेरिया-हैज़े की महामारी में रात भर ढोलक बजाकर गाँव में “संजीवनी शक्ति” भरता रहा; दोनों बेटों और फिर स्वयं की मृत्यु |
ढोल के बोल | ‘चट्-धा, गिड़-धा’ (आ जा भिड़ जा); ‘चटाक्-चट्-धा’ (उठा पटक दे); ‘ढाक्-ढिना’ (वाह पट्ठे); ‘चट्-गिड़-धा’ (मत डरना); ‘धाक-धिना, तिरकट-तिना’ (दाँव काटो, बाहर हो जा); ‘धिना-धिना, धिक-धिना’ (चित करो); ‘धा-गिड़-गिड़’ (वाह बहादुर) |
संदेश | कला और जिजीविषा मृत्यु-भय को भी पराजित करती है; पुरानी व्यवस्था के टूटने से लोक-कलाओं और कलाकारों की उपेक्षा |
अभ्यास – पाठ के साथ
कुश्ती के समय ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंच में क्या तालमेल था? पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की आवाज़ आपके मन में कैसी ध्वनि पैदा करते हैं, उन्हें शब्द दीजिए।
Answer
उत्तर
तालमेल: लुट्टन ढोल की हर थाप को एक निर्देश की तरह सुनता था और उसी के अनुसार दाँव-पेंच लगाता था। ढोल उसका गुरु था—
ढोल के बोल | लुट्टन ने अर्थ समझा | दाँव-पेंच |
|---|---|---|
चट्-धा, गिड़-धा | आ जा भिड़ जा | भिड़ने की चुनौती |
ढाक्-ढिना, ढाक्-ढिना | वाह पट्ठे! | उत्साह-वर्धन |
चट्-गिड़-धा | मत डरना | चाँद के दबाने पर भी हिम्मत बनाए रखना |
धाक-धिना, तिरकट-तिना | दाँव काटो, बाहर हो जा | चाँद की पकड़ से निकलकर उसकी गर्दन पकड़ ली |
चटाक्-चट्-धा | उठा पटक दे | चाँद को ज़मीन पर दे मारा |
धिना-धिना, धिक-धिना | चित करो | चाँद को चारों खाने चित कर दिया |
धा-गिड़-गिड़ | वाह बहादुर! | विजय का उल्लास |
जब राजमत और बहुमत चाँद के पक्ष में था, तब “लुट्टन के पक्ष में सिर्फ़ ढोल की आवाज़ थी, जिसकी ताल पर वह अपनी शक्ति और दाँव-पेंच की परीक्षा ले रहा था”।
मन में उत्पन्न ध्वनि: ये ध्वन्यात्मक शब्द मन में जोश, उत्साह, वीरता और रोमांच भर देते हैं। ऐसा लगता है मानो ढोल ललकार रहा हो— “उठो, लड़ो, डरो मत, जीतो!” इनसे दंगल का पूरा दृश्य आँखों के सामने साकार हो जाता है और हृदय की धड़कनें ढोल की थाप के साथ तेज़ हो जाती हैं।
लुट्टन ढोल की हर थाप को गुरु का निर्देश मानकर दाँव लगाता था — ‘चट्-धा, गिड़-धा’ (आ जा भिड़ जा), ‘चट्-गिड़-धा’ (मत डरना), ‘धाक-धिना, तिरकट-तिना’ (दाँव काटो, बाहर हो जा), ‘चटाक्-चट्-धा’ (उठा पटक दे), ‘धिना-धिना, धिक-धिना’ (चित करो)। ये ध्वनियाँ मन में जोश, साहस और रोमांच भर देती हैं — मानो ढोल ललकार रहा हो “लड़ो, डरो मत, जीतो!”
कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए?
Answer
उत्तर
- बचपन में अनाथ होना: नौ वर्ष की उम्र में माता-पिता की मृत्यु; विधवा सास ने पाला। सास पर गाँव वालों के अत्याचार का बदला लेने के लिए कसरत की धुन सवार हुई; जवानी में गाँव का सबसे अच्छा पहलवान बना।
- श्यामनगर का दंगल: ढोल की ललकार पर चाँद सिंह (‘शेर के बच्चे’) को चुनौती देकर पछाड़ा; राजा श्यामानंद ने उसे राज-पहलवान बनाया और ‘लुट्टन सिंह’ कहा।
- कीर्ति का शिखर: पौष्टिक भोजन, व्यायाम और राजा की स्नेह-दृष्टि से प्रसिद्धि में “चार चाँद” लगे; काला खाँ सहित सभी पहलवानों को हराया; पंद्रह वर्ष अजेय रहा।
- पत्नी की मृत्यु: पत्नी दो पुत्रों को जन्म देकर मर गई; उसने पुत्रों को ढोलक बजाकर पहलवानी सिखाई।
- राजा की मृत्यु: विलायत से लौटे राजकुमार ने दंगल की जगह घोड़े की रेस शुरू की; पहलवान का भोजन-व्यय सुनकर “टैरिबुल!” कहा; पहलवान को राज-दरबार से निकाल दिया गया।
- गाँव वापसी: गाँव के एक छोर पर झोंपड़ी में रहकर नौजवानों को कुश्ती सिखाने लगा; पर गरीब बच्चे “क्या खाकर कुश्ती सीखते”, स्कूल खाली हो गया।
- महामारी: अनावृष्टि, अन्न-कमी, मलेरिया-हैज़े में रात भर ढोलक बजाकर गाँव में हिम्मत भरता रहा।
- पुत्रों की मृत्यु: दोनों बेटे महामारी में मर गए; वह उन्हें स्वयं नदी में बहा आया, फिर भी रात को ढोलक बजाता रहा।
- स्वयं की मृत्यु: कुछ दिनों बाद ढोलक बंद हो गई; उसकी लाश ‘चित’ पड़ी मिली।
नौ वर्ष में अनाथ होना और सास द्वारा पालन → कसरत से पहलवान बनना → श्यामनगर दंगल में चाँद सिंह को हराकर राज-पहलवान बनना → पंद्रह वर्ष अजेय रहना, पत्नी की मृत्यु → राजा की मृत्यु के बाद राजकुमार द्वारा दरबार से निकाला जाना → गाँव लौटकर कुश्ती सिखाना → महामारी में ढोलक बजाना → दोनों पुत्रों की मृत्यु → स्वयं की मृत्यु।
लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है?
Answer
उत्तर
- लुट्टन ने किसी पहलवान से कुश्ती की विधिवत शिक्षा नहीं ली थी।
- श्यामनगर के दंगल में ढोल की ललकारती आवाज़ ने ही उसकी “नसों में बिजली उत्पन्न कर दी” और उसने चाँद सिंह को चुनौती दे दी।
- कुश्ती के दौरान जब सब चाँद के पक्ष में थे, तब ढोल ही उसका साथी था; उसकी थाप से उसे दाँव-पेंच के निर्देश मिलते रहे— “दाँव काटो, बाहर हो जा”, “उठा पटक दे”, “चित करो”— और वह जीत गया।
- “ढोल की आवाज़ के प्रताप से ही मैं पहलवान हुआ”— इसलिए विजय के बाद उसने सबसे पहले ढोलों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया।
- ढोल ने उसे साहस, प्रेरणा और दिशा दी— जो एक गुरु देता है।
क्योंकि उसने किसी पहलवान से शिक्षा नहीं ली थी; ढोल की आवाज़ ने ही उसे दंगल में उतरने का साहस दिया और कुश्ती के दौरान उसकी थापों से उसे दाँव-पेंच के निर्देश और उत्साह मिला, जिससे वह जीता — इसलिए वह ढोल को ही अपना गुरु मानता था।
गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा?
Answer
उत्तर
- गाँव में संजीवनी भरने के लिए: महामारी से अर्धमृत, “औषधि-उपचार-पथ्य-विहीन” गाँव वालों में ढोलक की आवाज़ “संजीवनी शक्ति” भरती थी; उनकी आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता और “स्पंदन-शक्ति-शून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी”। मरते हुए लोगों को मृत्यु का भय नहीं होता था।
- बेटों की अंतिम इच्छा: मरते समय दोनों बेटों ने कहा था— “बाबा! उठा पटक दो वाला ताल बजाओ!”
- हार न मानने का स्वभाव: वह पहलवान था; जीवन में कभी ‘चित’ नहीं हुआ। वह मृत्यु और महामारी को भी ललकारता रहा— “दोनों बहादुर गिर पड़े!”
- अपने दुख को सहने का माध्यम: ढोलक उसके जीवन का सहारा और गुरु थी; उसी से वह अपने दुख को भी सहता रहा।
- लोगों का हौसला बढ़ाना: बेटों की मृत्यु के बाद भी ढोलक बजने से “लोगों की हिम्मत दुगुनी बढ़ गई”।
ढोलक की आवाज़ महामारी से त्रस्त गाँव में संजीवनी शक्ति भरती थी और मरते लोगों का मृत्यु-भय दूर करती थी; बेटों ने भी अंतिम समय ‘उठा पटक दो’ वाला ताल बजाने को कहा था; पहलवान हार न मानने वाला था और ढोलक से अपना दुख सहते हुए लोगों का हौसला बढ़ाता रहा।
ढोलक की आवाज़ का पूरे गाँव पर क्या असर होता था?
Answer
उत्तर
- रात्रि की भीषणता को ढोलक ही “ताल ठोककर, ललकारती रहती थी”; मृत-से गाँव में “संजीवनी शक्ति” भरती थी।
- बूढ़े, बच्चे, जवानों की शक्तिहीन आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता था।
- “स्पंदन-शक्ति-शून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी।”
- ढोलक में बुखार हटाने या महामारी रोकने की शक्ति नहीं थी, “पर इसमें संदेह नहीं कि मरते हुए प्राणियों को आँख मूँदते समय कोई तकलीफ़ नहीं होती थी, मृत्यु से वे डरते नहीं थे।”
- बेटों की मृत्यु के बाद भी ढोलक बजने पर “लोगों की हिम्मत दुगुनी बढ़ गई”— “पहलवान की हिम्मत तो देखो, डेढ़ हाथ का कलेजा है!”
ढोलक की आवाज़ महामारी से त्रस्त, मृतप्राय गाँव में संजीवनी शक्ति भरती थी; लोगों की आँखों में दंगल का दृश्य नाचता, शिथिल नसों में बिजली दौड़ती; मरते हुए लोग मृत्यु से नहीं डरते थे और जीवितों की हिम्मत बढ़ती थी।
महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था?
Answer
उत्तर
सूर्योदय के समय: दिन में कलरव, हाहाकार और हृदय-विदारक रुदन के बावजूद लोगों के चेहरों पर कुछ प्रभा (चमक) दिखाई देती थी। लोग काँखते-कूँखते-कराहते अपने घरों से बाहर निकलकर पड़ोसियों और आत्मीयों को ढाढ़स देते थे— “अरे क्या करोगी रोकर, दुलहिन! जो गया सो तो चला गया…”; “भैया! घर में मुर्दा रखके कब तक रोओगे?”
सूर्यास्त के समय: लोग अपनी झोंपड़ियों में घुस जाते और “चूँ भी नहीं करते”; उनकी बोलने की शक्ति भी जाती रहती थी। माताएँ दम तोड़ते पुत्र को अंतिम बार ‘बेटा!’ कहकर पुकारने की भी हिम्मत नहीं कर पाती थीं। चारों ओर अंधकार, सन्नाटा, सियारों का क्रंदन और उल्लू की डरावनी आवाज़— केवल पहलवान की ढोलक इस विभीषिका को चुनौती देती थी।
सूर्योदय पर रोने-कराहने के बावजूद लोगों के चेहरों पर कुछ चमक होती; वे घरों से निकलकर एक-दूसरे को ढाढ़स बँधाते। सूर्यास्त होते ही लोग झोंपड़ियों में दुबक जाते, चूँ तक न करते; माताएँ मरते बेटे को पुकारने का साहस भी खो देतीं; केवल ढोलक रात की विभीषिका को ललकारती।
कुश्ती या दंगल पहले लोगों और राजाओं का प्रिय शौक हुआ करता था। पहलवानों को राजा एवं लोगों के द्वारा विशेष सम्मान दिया जाता था— (क) ऐसी स्थिति अब क्यों नहीं है? (ख) इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है? (ग) कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या कार्य किए जा सकते हैं?
Answer
उत्तर
(क) अब ऐसी स्थिति क्यों नहीं: 1. राजा-महाराजाओं का युग समाप्त हो गया; पहलवानों को राज्याश्रय मिलना बंद हो गया। 2. पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिक खेलों का प्रभाव— जैसे पाठ में राजकुमार ने दंगल की जगह घोड़े की रेस शुरू की। 3. पहलवानी के लिए पौष्टिक भोजन और प्रशिक्षण महँगा है; गरीब परिवार यह ख़र्च नहीं उठा सकते। 4. मीडिया और प्रायोजकों का ध्यान क्रिकेट जैसे खेलों पर अधिक है। 5. कुश्ती को देहाती खेल समझा जाने लगा।
(ख) जगह लेने वाले खेल: क्रिकेट, फ़ुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन, टेनिस, शतरंज, कबड्डी (प्रो-लीग), WWE जैसे मनोरंजन-शो, वीडियो/ई-स्पोर्ट्स।
(ग) कुश्ती को फिर प्रिय बनाने के उपाय: 1. सरकार द्वारा अखाड़ों का आधुनिकीकरण, प्रशिक्षण-केंद्र, छात्रवृत्ति और पहलवानों के लिए आहार-भत्ता। 2. विद्यालय-स्तर पर कुश्ती प्रतियोगिताएँ। 3. ‘प्रो रेसलिंग लीग’ जैसी प्रतियोगिताओं और टी.वी. प्रसारण को बढ़ावा; प्रायोजकों को आकर्षित करना। 4. सफल पहलवानों (सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त, साक्षी मलिक, बजरंग पूनिया, विनेश फोगाट) को सम्मान, नौकरी और पुरस्कार। 5. ग्रामीण दंगलों और मेलों को प्रोत्साहन; कुश्ती पर फ़िल्में (दंगल, सुल्तान) से जागरूकता। 6. महिला कुश्ती को बढ़ावा।
(क) राजाश्रय समाप्त होना, पाश्चात्य खेलों का प्रभाव, महँगा भोजन-प्रशिक्षण, मीडिया-प्रायोजकों का अभाव और कुश्ती को देहाती मानना। (ख) क्रिकेट, फ़ुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन, टेनिस, शतरंज, WWE, ई-स्पोर्ट्स। (ग) अखाड़ों का आधुनिकीकरण, छात्रवृत्ति-आहार भत्ता, विद्यालय-स्तरीय प्रतियोगिताएँ, प्रो-लीग और प्रसारण, पहलवानों का सम्मान-नौकरी, ग्रामीण दंगलों और महिला कुश्ती को प्रोत्साहन।
आशय स्पष्ट करें— आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।
Answer
उत्तर
प्रसंग: यह अंश कहानी के आरंभ में अमावस्या की ठंडी, काली रात के वर्णन से है, जब गाँव मलेरिया और हैज़े से पीड़ित था।
आशय: अमावस्या की रात में पृथ्वी पर घोर अंधकार था; आकाश में तारे चमक रहे थे, पर उनका प्रकाश धरती तक नहीं पहुँचता था। लेखक ने टूटते तारे का मानवीकरण किया है— कोई भावुक (संवेदनशील) तारा धरती के दुख से द्रवित होकर उसका अंधकार दूर करने के लिए नीचे आना चाहता, पर उसकी रोशनी और शक्ति रास्ते में ही समाप्त हो जाती (उल्का जलकर बुझ जाती)। अन्य तारे उसकी भावुकता या असफलता पर हँसते थे।
गहरा अर्थ: महामारी-ग्रस्त गाँव का दुख इतना गहरा था कि कोई भी सहायता करने वाला उस तक पहुँच नहीं पाता था। जो संवेदनशील व्यक्ति मदद करना चाहता, वह स्वयं असफल हो जाता और संवेदनहीन लोग उसका उपहास करते। यह गाँव की असहायता और समाज की संवेदनहीनता का प्रतीक है।
अमावस्या की रात में धरती पर घोर अंधकार था; कोई संवेदनशील तारा धरती का दुख दूर करने आना चाहता तो उसकी रोशनी रास्ते में ही बुझ जाती और अन्य तारे उसकी भावुकता/असफलता पर हँसते। आशय — महामारी-पीड़ित गाँव की असहायता इतनी गहरी थी कि कोई सहायता उस तक नहीं पहुँचती थी, और संवेदनहीन लोग मदद करने वालों का उपहास करते थे। (मानवीकरण)
पाठ में अनेक स्थलों पर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। पाठ में से ऐसे अंश चुनिए और उनका आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
- “अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी।” — रात को दुखी स्त्री के रूप में दिखाया गया है; ओस की बूँदें मानो उसके आँसू हैं। आशय: गाँव की करुण दशा पर प्रकृति भी रो रही थी।
- “निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने हृदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी।” — सन्नाटे को एक व्यक्ति की तरह दिखाया गया है जो दुख को भीतर दबा रहा है। आशय: गाँव में चारों ओर दुख था, पर लोग इतने निर्बल थे कि खुलकर रो भी नहीं पाते थे।
- “आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता… अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।” — तारों का मानवीकरण। आशय: सहायता का अभाव और संवेदनहीनता।
- “मलेरिया और हैज़े से पीड़ित गाँव भयार्त्त शिशु की तरह थर-थर काँप रहा था।” — गाँव को डरे हुए बच्चे के रूप में (उपमा + मानवीकरण)। आशय: गाँव की असहाय, भयभीत दशा।
- “रात्रि अपनी भीषणताओं के साथ चलती रहती…” — रात को एक भयानक प्राणी की तरह दिखाया गया है।
- ढोलक का “ललकारना” — ढोलक रात्रि की भीषणता को “ताल ठोककर, ललकारती रहती थी”; ढोल का बोलना (“ढोल कह रहा था—दाँव काटो…”)।
“अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी” (प्रकृति भी गाँव के दुख पर रो रही थी); “निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को… दबाने की चेष्टा कर रही थी” (लोग इतने निर्बल कि रो भी न सकें); “भावुक तारा… अन्य तारे खिलखिलाकर हँस पड़ते” (सहायता का अभाव, संवेदनहीनता); “गाँव भयार्त्त शिशु की तरह थर-थर काँप रहा था” (असहाय, भयभीत गाँव); ढोलक का रात को ललकारना।
अभ्यास – पाठ के आसपास
पाठ में मलेरिया और हैज़े से पीड़ित गाँव की दयनीय स्थिति को चित्रित किया गया है। आप ऐसी किसी अन्य आपद स्थिति की कल्पना करें और लिखें कि आप ऐसी स्थिति का सामना कैसे करेंगे/करेंगी?
Answer
उत्तर
आपद स्थिति की कल्पना — बाढ़: भारी वर्षा के कारण नदी का तटबंध टूट गया और हमारा गाँव/मोहल्ला पानी में डूब गया। घरों में पानी भर गया, बिजली और संपर्क टूट गए, पीने के पानी और भोजन की कमी हो गई, बीमारियाँ फैलने का ख़तरा बढ़ गया।
सामना कैसे करूँगा: 1. धैर्य और शांति: घबराने के बजाय परिवार को सुरक्षित, ऊँचे स्थान (छत/राहत शिविर) पर ले जाऊँगा। 2. आवश्यक सामान: टॉर्च, ज़रूरी दवाइयाँ, सूखा भोजन, पीने का पानी, ज़रूरी दस्तावेज़ वाटरप्रूफ़ थैले में रखूँगा। 3. सूचना: आपदा हेल्पलाइन (112, 1078) और प्रशासन को सूचना दूँगा; रेडियो/मोबाइल से चेतावनियों पर ध्यान दूँगा। 4. स्वच्छता और स्वास्थ्य: पानी उबालकर या क्लोरीन की गोली डालकर पिऊँगा; मच्छरों से बचाव करूँगा ताकि मलेरिया-हैज़ा न फैले। 5. सहायता: बुज़ुर्गों, बच्चों, बीमारों और पशुओं की मदद करूँगा; युवाओं की टोली बनाकर राहत-सामग्री बाँटूँगा। 6. मनोबल: लुट्टन की ढोलक की तरह लोगों का हौसला बढ़ाऊँगा— गीत, कहानियाँ और आशा भरी बातों से। 7. बाद में: सफ़ाई अभियान, टीकाकरण, और भविष्य के लिए आपदा-प्रबंधन की तैयारी।
उदाहरण — बाढ़: धैर्य रखकर परिवार को ऊँचे/सुरक्षित स्थान पर ले जाना, ज़रूरी सामान (दवा, भोजन, पानी, टॉर्च, दस्तावेज़) रखना, हेल्पलाइन व प्रशासन को सूचना, उबला पानी पीना और मच्छरों से बचाव, बुज़ुर्गों-बच्चों-पशुओं की मदद, युवाओं के साथ राहत-कार्य, लुट्टन की ढोलक की तरह लोगों का मनोबल बढ़ाना, और बाद में सफ़ाई-टीकाकरण।
ढोलक की थाप मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति भरती रहती थी— कला से जीवन के संबंध को ध्यान में रखते हुए चर्चा कीजिए।
Answer
उत्तर
कला और जीवन का संबंध: 1. कला जीवन को ऊर्जा देती है: पाठ में ढोलक की थाप में बुखार ठीक करने या महामारी रोकने की शक्ति नहीं थी, फिर भी उसने निराश, मरणासन्न लोगों में जीने का साहस भरा और मृत्यु का भय दूर किया। 2. कला दुख में सहारा: संगीत, नृत्य, चित्रकला, साहित्य मनुष्य के दुख, तनाव और अकेलेपन को कम करते हैं— आज संगीत-चिकित्सा (म्यूज़िक थेरेपी) इसका प्रमाण है। 3. सामूहिकता और एकता: लोक-कलाएँ (ढोल, लोकगीत, नृत्य) पूरे समुदाय को जोड़ती हैं। 4. प्रेरणा और जोश: युद्ध में रणभेरी, खेलों में ढोल-नगाड़े, स्वतंत्रता आंदोलन में देशभक्ति गीत— कला मनुष्य में उत्साह भरती है। 5. उदाहरण: कोविड-19 लॉकडाउन में लोगों ने बालकनी से गीत गाकर, ताली-थाली बजाकर एक-दूसरे का हौसला बढ़ाया; युद्धग्रस्त क्षेत्रों में संगीतकार लोगों में आशा जगाते हैं। 6. जीवन से कला का जन्म: कला जीवन के अनुभवों से ही उपजती है और जीवन को सुंदर व सार्थक बनाती है।
निष्कर्ष: कला जीवन की संजीवनी है; वह शरीर का नहीं, आत्मा का उपचार करती है।
कला जीवन को ऊर्जा, साहस और आशा देती है — ढोलक ने रोग नहीं मिटाया, पर मरणासन्न लोगों का मृत्यु-भय दूर कर उनमें जीने का साहस भरा। कला दुख में सहारा देती है (संगीत-चिकित्सा), समुदाय को जोड़ती है, जोश भरती है (रणभेरी, देशभक्ति गीत, लॉकडाउन में बालकनी-गीत); वह आत्मा की संजीवनी है।
चर्चा करें— कलाओं का अस्तित्व व्यवस्था का मोहताज नहीं है।
Answer
उत्तर
पक्ष में तर्क (कला व्यवस्था की मोहताज नहीं): 1. लुट्टन को राज-दरबार से निकाल दिया गया, पर उसकी कला (ढोलक और पहलवानी) समाप्त नहीं हुई; गाँव में भी वह ढोलक बजाता और कुश्ती सिखाता रहा। अंतिम समय तक उसकी ढोलक ने गाँव में जीवन भरा। 2. लोक-कलाएँ— लोकगीत, लोकनृत्य, कठपुतली, मधुबनी चित्रकला— सदियों से बिना राज्याश्रय के जनता के बीच जीवित रही हैं। 3. कबीर, सूर, मीरा जैसे संत-कवियों ने बिना किसी राज्याश्रय के अमर कविता रची। 4. कला कलाकार की आंतरिक प्रेरणा और जन-समर्थन से जीवित रहती है।
विपक्ष में तर्क (व्यवस्था का प्रभाव पड़ता है): 1. राज्याश्रय छिनने के बाद लुट्टन का स्कूल खाली हो गया— “गाँव के किसान और खेतिहर-मज़दूर के बच्चे भला क्या खाकर कुश्ती सीखते!” अर्थात संसाधनों के अभाव में कला का विकास रुक जाता है। 2. आज भी अनेक लोक-कलाएँ और कलाकार आर्थिक सहयोग के अभाव में लुप्त हो रहे हैं। 3. सरकारी संरक्षण, अकादमियाँ और पुरस्कार कलाओं के प्रसार में सहायक होते हैं।
निष्कर्ष: कला का अस्तित्व व्यवस्था पर निर्भर नहीं, क्योंकि वह मनुष्य की आत्मा से जुड़ी है; परंतु उसके विकास, प्रसार और कलाकारों के जीवन-यापन के लिए व्यवस्था का सहयोग आवश्यक है।
पक्ष: लुट्टन की ढोलक राजाश्रय छिनने पर भी गाँव में बजती रही; लोक-कलाएँ और कबीर-मीरा जैसे कवि बिना राजाश्रय के जीवित रहे — कला कलाकार की आंतरिक प्रेरणा और जनता से जीती है। विपक्ष: राजाश्रय के बिना लुट्टन का स्कूल खाली हो गया; संसाधनों के अभाव में कलाएँ लुप्त होती हैं। निष्कर्ष — कला का अस्तित्व व्यवस्था का मोहताज नहीं, पर उसके विकास और कलाकारों के जीवन के लिए व्यवस्था का सहयोग आवश्यक है।
अभ्यास – भाषा की बात
हर विषय, क्षेत्र, परिवेश आदि के कुछ विशिष्ट शब्द होते हैं। पाठ में कुश्ती से जुड़ी शब्दावली का बहुतायत प्रयोग हुआ है। उन शब्दों की सूची बनाइए। साथ ही नीचे दिए गए क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले कोई पाँच-पाँच शब्द बताइए- चिकित्सा, क्रिकेट, न्यायालय, या अपनी पसंद का कोई क्षेत्र।
Answer
उत्तर
कुश्ती से जुड़े शब्द (पाठ से): दंगल, पहलवान, अखाड़ा, कुश्ती, दाँव-पेंच, दाँव काटना, पैंतरा, लँगोट, जाँघिया, चित करना, चारों खाने चित, उठा पटकना, ताल ठोकना, कसरत, पट्ठा, जोड़ी, प्रतिद्वंद्वी, गर्दन पकड़ना, केहुनी डालना, मिट्टी सुँघाना, आसमान दिखाना, राज-पहलवान, शेर का बच्चा।
चिकित्सा | क्रिकेट | न्यायालय | अपनी पसंद — कंप्यूटर |
|---|---|---|---|
ऑपरेशन | विकेट | न्यायाधीश | माउस |
इंजेक्शन | बल्लेबाज़ | वकील | कीबोर्ड |
नुस्ख़ा (प्रिस्क्रिप्शन) | गेंदबाज़ | मुकदमा | सॉफ़्टवेयर |
निदान (डायग्नोसिस) | छक्का/चौका | गवाह | इंटरनेट |
टीकाकरण | रन आउट | फ़ैसला / ज़मानत | डाउनलोड |
कुश्ती: दंगल, अखाड़ा, दाँव-पेंच, पैंतरा, लँगोट, चित करना, उठा पटकना, ताल ठोकना, कसरत, पट्ठा, जोड़ी, प्रतिद्वंद्वी, मिट्टी सुँघाना। चिकित्सा: ऑपरेशन, इंजेक्शन, नुस्ख़ा, निदान, टीकाकरण। क्रिकेट: विकेट, बल्लेबाज़, गेंदबाज़, छक्का, रन आउट। न्यायालय: न्यायाधीश, वकील, मुकदमा, गवाह, ज़मानत। कंप्यूटर: माउस, कीबोर्ड, सॉफ़्टवेयर, इंटरनेट, डाउनलोड।
पाठ में अनेक अंश ऐसे हैं जो भाषा के विशिष्ट प्रयोगों की बानगी प्रस्तुत करते हैं। कुछ प्रयोग इस प्रकार हैं— फिर बाज़ की तरह उस पर टूट पड़ा। राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए। पहलवान की स्त्री भी दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थी। इन विशिष्ट भाषा-प्रयोगों का प्रयोग करते हुए एक अनुच्छेद लिखिए।
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अनुच्छेद: हमारे विद्यालय की कबड्डी टीम की कप्तान रीना बहुत साहसी खिलाड़ी है। अंतर-विद्यालय प्रतियोगिता के फ़ाइनल में जैसे ही विरोधी टीम की खिलाड़ी रेड करने आई, रीना बाज़ की तरह उस पर टूट पड़ी और उसे पकड़कर बाहर कर दिया। अंतिम क्षणों में उसकी शानदार रेड से हमारी टीम जीत गई। प्रधानाचार्य जी ने उसे मंच पर बुलाकर सम्मानित किया; उनकी स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए। रीना बताती है कि उसकी दादी भी अपने ज़माने की अच्छी खिलाड़ी थीं, जो दो खिलाड़ियों— उसके पिता और चाचा— को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थीं। आज रीना उन्हीं की परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
एक अनुच्छेद जिसमें तीनों प्रयोग हों — जैसे कबड्डी कप्तान का विरोधी पर “बाज़ की तरह टूट पड़ना”, प्रधानाचार्य की “स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए”, और दादी का “दो खिलाड़ियों को पैदा करके स्वर्ग सिधार जाना”।
जैसे क्रिकेट की कमेंट्री की जाती है वैसे ही इसमें कुश्ती की कमेंट्री की गई है? आपको दोनों में क्या समानता और अंतर दिखाई पड़ता है?
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समानताएँ: 1. दोनों में खेल का क्षण-प्रतिक्षण, सजीव वर्णन होता है— कौन क्या कर रहा है। 2. दोनों में रोमांच, उत्तेजना और नाटकीयता होती है; दर्शकों की प्रतिक्रियाएँ (“अरे गया-गया!!”, “वाह रे मिट्टी के शेर!”) भी शामिल होती हैं। 3. दोनों में खिलाड़ियों की तकनीक, दाँव/शॉट और स्थिति में बदलाव (जनमत बदलना) बताया जाता है। 4. दोनों में श्रोता/पाठक को ऐसा लगता है मानो वह स्वयं मैदान में हो। 5. दोनों में खेल की विशिष्ट शब्दावली का प्रयोग होता है।
अंतर: 1. क्रिकेट की कमेंट्री रेडियो/टी.वी. पर कमेंटेटर करता है; पाठ में कुश्ती की कमेंट्री ढोल की आवाज़ों, दर्शकों के शोर और लेखक के वर्णन के माध्यम से होती है। 2. क्रिकेट कमेंट्री में आँकड़े, स्कोर, रन-रेट, रिकॉर्ड आदि की चर्चा होती है; कुश्ती की कमेंट्री में दाँव-पेंच और भावनाओं पर बल है। 3. क्रिकेट कमेंट्री अधिकतर अंग्रेज़ी-हिंदी मिश्रित तकनीकी भाषा में होती है; पाठ की कमेंट्री में ध्वन्यात्मक शब्द (चट्-धा, गिड़-धा) और देशज भाषा है। 4. क्रिकेट मैच घंटों/दिनों चलता है, इसलिए कमेंट्री लंबी और विश्लेषणात्मक होती है; कुश्ती कुछ ही मिनटों की होती है, इसलिए कमेंट्री तीव्र और संक्षिप्त है। 5. पाठ में ढोल स्वयं ‘कमेंटेटर’ और ‘कोच’ दोनों है।
समानता: दोनों में खेल का सजीव, क्षण-प्रतिक्षण वर्णन, रोमांच, दर्शकों की प्रतिक्रिया, तकनीक का वर्णन और विशिष्ट शब्दावली होती है। अंतर: क्रिकेट कमेंट्री कमेंटेटर करता है, आँकड़ों-स्कोर पर आधारित, तकनीकी/मिश्रित भाषा में लंबी होती है; पाठ की कुश्ती-कमेंट्री ढोल की ध्वन्यात्मक आवाज़ों और दर्शकों के शोर से, देशज भाषा में, संक्षिप्त और भावनात्मक है — जहाँ ढोल ही कमेंटेटर और कोच है।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ ढोल और दाँव-पेंच, लुट्टन के जीवन के मोड़, ढोल गुरु (प्रश्न 1–3)
- ☒ महामारी में ढोलक, सूर्योदय-सूर्यास्त, कुश्ती की स्थिति (प्रश्न 4–7)
- ☒ आशय, मानवीकरण (प्रश्न 8–9)
- ☒ आपदा, कला और जीवन, कला और व्यवस्था (प्रश्न 10–12)
- ☒ शब्दावली, विशिष्ट प्रयोग, कमेंट्री (प्रश्न 13–15)