Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
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XII | Hindi | Aroh (NCERT) | 7 – कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप | 2026-27 | 13 of 13 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवि | गोस्वामी तुलसीदास (1532–1623), राजापुर (बाँदा); रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि |
प्रमुख रचनाएँ | रामचरितमानस, विनयपत्रिका, गीतावली, कवितावली, दोहावली, श्रीकृष्ण गीतावली |
कवितावली (कवित्त-सवैया, ब्रजभाषा) | युग की आर्थिक विषमता, बेरोज़गारी और भूख का चित्रण — “आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी”; स्वाभिमानी भक्त का स्वर — “धूत कहौ, अवधूत कहौ…” |
लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप (रामचरितमानस, लंका कांड; अवधी, दोहा-चौपाई-सोरठा) | मूर्च्छित लक्ष्मण को देखकर राम का मानवीय विलाप; हनुमान का संजीवनी लेकर आना — “जिमि करुना मँह बीर रस”; रावण का कुंभकरण को जगाना |
छंद | दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया |
अभ्यास – पाठ के साथ
कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।
Answer
उत्तर
कवितावली के छंदों से स्पष्ट है कि तुलसीदास अपने समय की आर्थिक दशा से भली-भाँति परिचित थे—
- पेट के लिए सब कुछ: मज़दूर, किसान, व्यापारी, भिखारी, भाट, नौकर, नट, चोर, दूत, बाज़ीगर— सभी पेट भरने के लिए पढ़ते हैं, गुण सीखते हैं, पर्वत चढ़ते हैं, दिन भर शिकार के लिए घने जंगलों में भटकते हैं।
- अनैतिक कर्म: लोग पेट के लिए “ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम” करते हैं; यहाँ तक कि अपने बेटे-बेटी को भी बेच देते हैं— “पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी”।
- बेरोज़गारी: “खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि, / बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी”— किसी के पास रोज़गार नहीं।
- चिंता और लाचारी: जीविकाविहीन लोग दुखी होकर एक-दूसरे से पूछते हैं— “कहाँ जाई, का करी?”
- दरिद्रता रूपी रावण: “दारिद-दसानन दबाई दुनी”— गरीबी रूपी रावण ने पूरी दुनिया को दबा रखा है।
तुलसी ने भूख की आग को समुद्र की बड़वाग्नि से भी बड़ा बताया है। यह उनके यथार्थबोध और सामाजिक संवेदना का प्रमाण है।
तुलसी ने दिखाया कि सभी वर्ग पेट के लिए हर तरह के उचित-अनुचित कर्म करते हैं, बेटे-बेटी तक बेच देते हैं; किसान, व्यापारी, नौकर, भिखारी — सब बेरोज़गार और चिंतित हैं (“कहाँ जाई, का करी?”); दरिद्रता रूपी रावण ने दुनिया को दबा रखा है और पेट की आग बड़वाग्नि से भी बड़ी है — यह उनकी आर्थिक विषमता की गहरी समझ का प्रमाण है।
उत्तर
पेट की आग का शमन ईश्वर (राम) भक्ति का मेघ ही कर सकता है— तुलसी का यह काव्य-सत्य क्या इस समय का भी युग-सत्य है? तर्कसंगत उत्तर दीजिए।
Answer
उत्तर
तुलसी कहते हैं— “‘तुलसी’ बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें, / आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी”— पेट की आग को राम रूपी श्याम बादल ही बुझा सकता है।
आज के संदर्भ में: 1. आंशिक रूप से सत्य: भक्ति और आस्था मनुष्य को धैर्य, संतोष, नैतिकता और आत्मबल देती है; वह अनैतिक साधनों से धन कमाने से बचता है और कठिनाइयों में टूटता नहीं। 2. पूर्ण सत्य नहीं: आज पेट की आग केवल भक्ति से नहीं बुझ सकती। इसके लिए परिश्रम, शिक्षा, कौशल, रोज़गार के अवसर और सरकार की उचित आर्थिक नीतियाँ (जैसे खाद्य सुरक्षा, मनरेगा) आवश्यक हैं। 3. यदि ‘राम-भक्ति’ का अर्थ सत्कर्म, ईमानदारी और मानवीय करुणा लिया जाए— जैसे शासक का प्रजा के प्रति न्याय, धनी का निर्धन के प्रति दया— तो यह आज भी युग-सत्य है।
अतः भक्ति के साथ कर्म और सामाजिक न्याय मिलकर ही पेट की आग बुझा सकते हैं।
पूर्णतः नहीं। भक्ति धैर्य, संतोष और नैतिक बल देती है, पर आज पेट की आग परिश्रम, शिक्षा, रोज़गार और न्यायपूर्ण आर्थिक नीतियों से ही बुझ सकती है; यदि राम-भक्ति का अर्थ सत्कर्म, ईमानदारी और करुणा लिया जाए तो यह आज भी प्रासंगिक है।
तुलसी ने यह कहने की ज़रूरत क्यों समझी? धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ / काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ। इस सवैया में काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन आता?
Answer
उत्तर
तुलसी ने ऐसा क्यों कहा: तुलसी के समय में समाज जाति-पाँति और कुल-गोत्र के बंधनों में जकड़ा था। कुछ लोग उनकी जाति और कुल को लेकर उन पर आक्षेप करते थे, उन्हें धूर्त, अवधूत (संन्यासी), राजपूत या जुलाहा कहते थे। तुलसी ने इन आलोचनाओं का उत्तर देते हुए कहा कि मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता; मुझे किसी की बेटी से अपने बेटे का विवाह नहीं करना कि किसी की जाति बिगड़ जाए। मैं तो राम का गुलाम हूँ, माँगकर खाता हूँ और मस्जिद में सो जाता हूँ। इससे उनकी जाति-पाँति के प्रति उदासीनता, स्वाभिमान और फक्कड़पन प्रकट होता है।
‘काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब’ कहने से परिवर्तन: उस समाज में बेटी का विवाह करना पिता के लिए बड़ी सामाजिक समस्या थी; बेटी के पिता को वर पक्ष के सामने झुकना पड़ता था और जाति-बिरादरी के नियमों से बँधना पड़ता था। यदि तुलसी कहते कि “मुझे किसी के बेटे से अपनी बेटी नहीं ब्याहनी”, तो इसका अर्थ होता कि उनकी कोई बेटी है जिसके विवाह की चिंता उन्हें है, और वे बेटी के पिता की तरह समाज के आगे विवश हैं। तब उनका स्वाभिमान और निर्भीकता कमज़ोर पड़ जाती। साथ ही यह स्त्री-पक्ष की हीनता की ओर संकेत करता। वर्तमान कथन से वे पूरी तरह स्वतंत्र और निर्भीक दिखाई देते हैं।
तुलसी पर उनकी जाति-कुल को लेकर आक्षेप लगाए जाते थे; उन्होंने स्वाभिमान के साथ उत्तर दिया कि उन्हें जाति-पाँति से कोई लेना-देना नहीं, वे राम के गुलाम हैं। यदि वे ‘बेटे से बेटी न ब्याहब’ कहते तो लगता कि वे बेटी के पिता के रूप में समाज के आगे विवश हैं — इससे उनका स्वाभिमान और निर्भीकता कमज़ोर पड़ती और कथन का सामाजिक अर्थ बदल जाता।
धूत कहौ… वाले छंद में ऊपर से सरल व निरीह दिखलाई पड़ने वाले तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?
Answer
उत्तर
मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ।
- ऊपर से सरल और निरीह: तुलसी कहते हैं कि लोग उन्हें कुछ भी कहें, वे सब स्वीकार करते हैं; वे “माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो”— माँगकर खाते हैं, मस्जिद में सो जाते हैं। वे अत्यंत सरल, विनम्र और साधनहीन लगते हैं।
- भीतर से स्वाभिमानी: परंतु वे किसी के आगे झुकते नहीं— “लैबोको एकु न दैबको दोऊ”— न किसी से एक लेना है, न दो देने हैं। उन्हें समाज की निंदा-प्रशंसा की परवाह नहीं— “जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ”।
- भक्त हृदय: वे स्वयं को गर्व से “सरनाम गुलामु है राम को” (राम का प्रसिद्ध दास) कहते हैं। उनकी निर्भरता केवल राम पर है, समाज या किसी व्यक्ति पर नहीं।
इस प्रकार तुलसी की विनम्रता के भीतर एक स्वाभिमानी, निर्भीक और आत्मनिर्भर भक्त का हृदय है।
पूर्णतः सहमत। वे माँगकर खाने और मस्जिद में सोने की बात कहकर सरल-निरीह लगते हैं, पर “लैबोको एकु न दैबको दोऊ” और “जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ” कहकर समाज की परवाह न करने वाले स्वाभिमानी और केवल राम पर निर्भर भक्त (“सरनाम गुलामु है राम को”) के रूप में सामने आते हैं।
व्याख्या करें— (क) मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता। / जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओहू।। (ख) जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना। / अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।। (ग) माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।। (घ) ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।।
Answer
उत्तर
(क) प्रसंग: ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप’ (रामचरितमानस, लंका कांड)। मूर्च्छित लक्ष्मण को देखकर राम विलाप करते हैं। व्याख्या: राम कहते हैं— हे भाई! तुमने मेरे लिए माता-पिता को त्याग दिया और वन में सर्दी, धूप और आँधी-तूफ़ान सहे। यदि मैं जानता कि वन में आकर मुझे भाई से बिछुड़ना पड़ेगा, तो मैं पिता का वचन (वनवास की आज्ञा) भी न मानता। विशेष: लक्ष्मण के त्याग और राम के भ्रातृप्रेम का मार्मिक चित्रण; अवधी भाषा, चौपाई छंद, करुण रस।
(ख) प्रसंग: वही। व्याख्या: राम कहते हैं— जिस प्रकार पंखों के बिना पक्षी, मणि के बिना साँप और सूँड़ के बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यंत दीन-हीन हो जाते हैं, उसी प्रकार हे भाई! तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी दीन-हीन हो जाएगा, यदि जड़ भाग्य मुझे जीवित रखे। विशेष: उदाहरण/उपमा अलंकार (मालोपमा); करुण रस; अवधी; राम का मानवीय रूप।
(ग) प्रसंग: ‘कवितावली’ (उत्तर कांड) का सवैया। व्याख्या: तुलसी कहते हैं— मैं माँगकर खा लेता हूँ और मस्जिद में सो जाता हूँ; मुझे न किसी से एक लेना है, न किसी को दो देना। अर्थात मेरा किसी से कोई लेन-देन, स्वार्थ या संबंध नहीं; मैं संसार की परवाह किए बिना राम की भक्ति में मस्त हूँ। विशेष: तुलसी का फक्कड़पन, स्वाभिमान और धार्मिक सहिष्णुता (मसीत में सोना); ब्रजभाषा, सवैया छंद, अनुप्रास।
(घ) प्रसंग: ‘कवितावली’ का कवित्त, जिसमें युग की आर्थिक दशा का चित्रण है। व्याख्या: लोग पेट की भूख मिटाने के लिए ऊँचे-नीचे (अच्छे-बुरे) कर्म करते हैं, धर्म-अधर्म का विचार नहीं करते। पेट के लिए वे अपने बेटे-बेटियों तक को बेच देते हैं। विशेष: गरीबी और भूख की भयावहता का यथार्थ चित्रण; अनुप्रास (बेचत बेटा-बेटकी), ब्रजभाषा, कवित्त।
(क) राम: तुमने मेरे लिए माता-पिता छोड़े, वन के कष्ट सहे; यदि जानता कि वन में भाई बिछुड़ेगा तो पिता का वचन न मानता। (ख) जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प, सूँड़ बिना हाथी दीन हो जाते हैं, वैसे ही तुम्हारे बिना मेरा जीवन होगा (उपमा, करुण रस)। (ग) तुलसी: मैं माँगकर खाता, मस्जिद में सोता हूँ; किसी से कोई लेन-देन नहीं (स्वाभिमान, फक्कड़पन)। (घ) लोग पेट के लिए अच्छे-बुरे कर्म करते और बेटे-बेटी तक बेच देते हैं (भूख का यथार्थ)।
भ्रातृशोक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में रचा है। क्या आप इससे सहमत हैं? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
Answer
उत्तर
हाँ, मैं इससे सहमत हूँ। यद्यपि तुलसी कहते हैं— “उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई”— अर्थात राम अखंड ईश्वर हैं और भक्तों के लिए मनुष्य की तरह लीला कर रहे हैं, फिर भी राम का विलाप एक साधारण मनुष्य की सच्ची वेदना जैसा है—
- राम आधी रात तक हनुमान के न लौटने पर व्याकुल होकर लक्ष्मण को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं।
- वे लक्ष्मण के त्याग को याद करते हैं— माता-पिता छोड़ना, वन के कष्ट सहना।
- वे कहते हैं कि यदि जानते तो पिता का वचन न मानते— यह ईश्वर का नहीं, दुखी भाई का वचन है।
- “सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा” और “मिलइ न जगत सहोदर भ्राता”— भाई को सर्वोपरि मानते हैं।
- वे सोचते हैं कि अवध किस मुँह से जाएँगे, सुमित्रा को क्या उत्तर देंगे— यह सामाजिक लोकलाज और उत्तरदायित्व की मानवीय चिंता है।
- उनकी कमल जैसी आँखों से आँसू बहते हैं।
यह सब सच्ची मानवीय अनुभूति है, जिससे पाठक का हृदय द्रवित हो जाता है।
हाँ। राम का लक्ष्मण को हृदय से लगाना, उसके त्याग को याद करना, पिता का वचन न मानने की बात कहना, भाई को सबसे बड़ा मानना, अवध लौटने और सुमित्रा को उत्तर देने की चिंता करना और आँसू बहाना — ये सब ईश्वर की लीला से अधिक एक दुखी मनुष्य की सच्ची वेदना लगते हैं।
शोकग्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण को करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव क्यों कहा गया है?
Answer
उत्तर
लक्ष्मण की मूर्च्छा और राम के विलाप से पूरा वातावरण शोक में डूबा था; राम का प्रलाप सुनकर वानर-समूह भी व्याकुल था— यह करुण रस की स्थिति थी। उसी समय हनुमान संजीवनी बूटी लेकर आ गए। उनके आने से सबमें उत्साह, आशा और साहस का संचार हो गया; लक्ष्मण के प्राण बचने की आशा जगी। हनुमान का साहसिक कार्य वीरता का प्रतीक है और उत्साह वीर रस का स्थायी भाव है। इसलिए तुलसी ने कहा— “आइ गयउ हनुमान जिमि करुना मँह बीर रस”। यह उपमा शोक के वातावरण को आशा और मंगल की ओर मोड़ देती है।
लक्ष्मण-मूर्च्छा से शोक (करुण रस) छाया था; हनुमान के संजीवनी लेकर आने से सबमें उत्साह, आशा और साहस (वीर रस का स्थायी भाव) का संचार हुआ — इसलिए उनका आना करुण रस के बीच वीर रस के प्रकट होने जैसा है।
जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।। / बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।। भाई के शोक में डूबे राम के इस प्रलाप-वचन में स्त्री के प्रति कैसा सामाजिक दृष्टिकोण संभावित है?
Answer
उत्तर
राम कहते हैं कि मैं किस मुँह से अवध जाऊँगा कि पत्नी के लिए प्रिय भाई को खो दिया। मैं संसार में अपयश सह लेता, क्योंकि पत्नी की हानि कोई विशेष क्षति नहीं है।
इस कथन में उस समय के समाज का पुरुष-प्रधान दृष्टिकोण झलकता है— 1. स्त्री को पुरुष (भाई) की तुलना में कम महत्वपूर्ण माना जाता था। 2. यह धारणा थी कि पत्नी फिर मिल सकती है, पर सहोदर भाई नहीं— “सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा”। 3. स्त्री को संपत्ति या वस्तु के समान समझने की प्रवृत्ति।
परंतु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह शोक में डूबे राम का प्रलाप (तर्कहीन वचन) है, जिसमें भाई के प्रति अगाध प्रेम के कारण वे ऐसा कह रहे हैं; राम सीता के लिए ही तो इतना बड़ा युद्ध कर रहे हैं। फिर भी यह कथन तत्कालीन समाज में स्त्री की निम्न स्थिति को दर्शाता है, जो आज स्वीकार्य नहीं है।
इसमें पुरुष-प्रधान समाज का दृष्टिकोण संभावित है, जहाँ स्त्री को भाई (पुरुष) से कम महत्वपूर्ण और ‘फिर से मिल सकने वाली’ माना जाता था। यद्यपि यह शोकग्रस्त राम का प्रलाप है (वे सीता के लिए ही युद्ध कर रहे हैं), फिर भी यह तत्कालीन समाज में स्त्री की निम्न स्थिति को दर्शाता है।
अभ्यास – पाठ के आसपास
कालिदास के रघुवंश महाकाव्य में पत्नी (इंदुमती) के मृत्यु-शोक पर अज तथा निराला की सरोज-स्मृति में पुत्री (सरोज) के मृत्यु-शोक पर पिता के करुण उद्गार निकले हैं। उनसे भ्रातृशोक में डूबे राम के इस विलाप की तुलना करें।
Answer
उत्तर
अज-विलाप (रघुवंश) | सरोज-स्मृति (निराला) | राम-विलाप (मानस) | |
शोक का कारण | पत्नी इंदुमती की आकस्मिक मृत्यु (आकाश से गिरी पुष्पमाला से) | पुत्री सरोज की असमय मृत्यु | भाई लक्ष्मण की मूर्च्छा |
भाव | दांपत्य प्रेम का विरह; अज इंदुमती को गृहिणी, सचिव, सखी, ललित कलाओं की प्रिय शिष्या कहकर रोते हैं और अंततः शोक में प्राण त्याग देते हैं | पिता का आत्मग्लानि-भरा शोक; गरीबी के कारण बेटी के लिए कुछ न कर पाने का दुख — “दुख ही जीवन की कथा रही” | भ्रातृप्रेम; भाई के त्याग की स्मृति, अवध लौटने और सुमित्रा को उत्तर देने की चिंता |
परिणति | शोक मृत्यु तक | स्थायी वेदना और कवि का आत्ममंथन | हनुमान के आगमन से शोक का अंत, आशा का संचार |
समानता: तीनों में प्रिय व्यक्ति के वियोग की गहरी करुणा, उसके गुणों का स्मरण और अपने जीवन को व्यर्थ मानने का भाव है। अंतर: अज और निराला का शोक मृत्यु पर है, जबकि राम का शोक मूर्च्छा पर; राम-विलाप में मर्यादा, कर्तव्य और लोकलाज की चिंता अधिक है, निराला में आत्मग्लानि और सामाजिक विषमता का दर्द है, अज में दांपत्य-प्रेम की तन्मयता।
तीनों में प्रिय के वियोग की गहरी करुणा और उसके गुणों का स्मरण है। अज का विलाप दांपत्य प्रेम का है और मृत्यु तक जाता है; निराला का शोक पिता की आत्मग्लानि और गरीबी के दर्द से भरा है; राम का विलाप भ्रातृप्रेम, कर्तव्य और लोकलाज से जुड़ा है और हनुमान के आगमन से आशा में बदल जाता है।
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी तुलसी के युग का ही नहीं आज के युग का भी सत्य है। भुखमरी में किसानों की आत्महत्या और संतानों (खासकर बेटियों) को भी बेच डालने की हृदय-विदारक घटनाएँ हमारे देश में घटती रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों और तुलसी के युग की तुलना करें।
Answer
उत्तर
समानताएँ: 1. तुलसी के युग में अकाल, बेरोज़गारी और गरीबी के कारण लोग बेटे-बेटियाँ बेच देते थे; आज भी कुछ क्षेत्रों में गरीबी के कारण बच्चों (विशेषकर बेटियों) की तस्करी, बाल-विवाह और बाल-मज़दूरी की घटनाएँ होती हैं। 2. तब किसानों के पास खेती नहीं थी; आज कर्ज़, फसल की बर्बादी और उचित मूल्य न मिलने के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं। 3. तब भी और आज भी बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या है।
अंतर: 1. आज सरकार की अनेक कल्याणकारी योजनाएँ हैं— सार्वजनिक वितरण प्रणाली, खाद्य सुरक्षा कानून, मनरेगा, किसान सम्मान निधि, फसल बीमा। 2. शिक्षा, संचार और जागरूकता बढ़ी है; बाल-तस्करी और बाल-श्रम के विरुद्ध कानून हैं। 3. फिर भी विषमता बनी हुई है— एक ओर अमीरी बढ़ रही है, दूसरी ओर गरीब और भी गरीब हो रहे हैं।
निष्कर्ष: तुलसी का वर्णन आज भी आंशिक रूप से सत्य है; भूख और गरीबी आज भी मनुष्य को अमानवीय कदम उठाने पर विवश करती है।
तुलसी के युग की तरह आज भी गरीबी, बेरोज़गारी और कर्ज़ के कारण किसान आत्महत्याएँ, बच्चों की तस्करी और बाल-श्रम जैसी घटनाएँ होती हैं। अंतर यह है कि आज कल्याणकारी योजनाएँ, कानून और जागरूकता हैं, फिर भी आर्थिक विषमता बनी हुई है।
तुलसी के युग की बेकारी के क्या कारण हो सकते हैं? आज की बेकारी की समस्या के कारणों के साथ उसे मिलाकर कक्षा में परिचर्चा करें।
Answer
उत्तर
तुलसी के युग (16वीं-17वीं सदी) की बेकारी के कारण: 1. बार-बार पड़ने वाले अकाल और सूखा; खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर। 2. शासकों और जागीरदारों का शोषण, भारी लगान। 3. युद्धों और राजनीतिक अस्थिरता से व्यापार और कृषि पर असर। 4. जाति-आधारित परंपरागत पेशों की सीमाएँ। 5. शिक्षा और नए अवसरों का अभाव।
आज की बेकारी के कारण: 1. तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या। 2. शिक्षा का व्यावहारिक और कौशल-आधारित न होना। 3. मशीनीकरण, स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के कारण नौकरियों में कमी। 4. कृषि में छिपी बेरोज़गारी; ग्रामीण उद्योगों का पतन। 5. शहरों की ओर पलायन; असंगठित क्षेत्र में अस्थायी काम। 6. आर्थिक मंदी, भ्रष्टाचार।
समानता: दोनों युगों में कृषि पर निर्भरता, प्राकृतिक आपदाएँ और शासन की नीतियाँ बेकारी के मूल में हैं। अंतर: आज जनसंख्या-वृद्धि, तकनीकी परिवर्तन और शिक्षा-रोज़गार के बीच असंतुलन नए कारण हैं।
समाधान: कौशल-आधारित शिक्षा, लघु और कुटीर उद्योग, स्वरोज़गार, कृषि का आधुनिकीकरण, जनसंख्या नियंत्रण।
तुलसी के युग में अकाल, वर्षा पर निर्भर खेती, शासकों का शोषण, भारी लगान, युद्ध और जाति-आधारित पेशे बेकारी के कारण थे; आज जनसंख्या-वृद्धि, कौशलहीन शिक्षा, मशीनीकरण/AI, कृषि का पिछड़ापन और मंदी मुख्य कारण हैं। दोनों में कृषि-निर्भरता और नीतिगत कमियाँ समान हैं।
राम कौशल्या के पुत्र थे और लक्ष्मण सुमित्रा के। इस प्रकार वे परस्पर सहोदर (एक ही माँ के पेट से जन्मे) नहीं थे। फिर, राम ने उन्हें लक्ष्य कर ऐसा क्यों कहा— “मिलइ न जगत सहोदर भ्राता”? इस पर विचार करें।
Answer
उत्तर
- राम और लक्ष्मण के बीच सगे भाई से भी अधिक प्रेम था। लक्ष्मण ने राम के लिए माता-पिता और सुख-सुविधाएँ त्यागकर वन के कष्ट सहे। इसलिए राम उन्हें सहोदर से कम नहीं मानते थे।
- कथा के अनुसार, पुत्रेष्टि यज्ञ की खीर से चारों भाइयों का जन्म हुआ; सुमित्रा को कौशल्या और कैकेयी दोनों के भाग मिले, अतः एक ही खीर से उत्पन्न होने के कारण भी वे सहोदर जैसे थे।
- एक ही पिता (दशरथ) की संतान होने के कारण भी सामान्य बोलचाल में उन्हें सगा भाई माना जाता है।
- शोक की अवस्था में व्यक्ति शब्दों के शाब्दिक अर्थ पर विचार नहीं करता; ‘सहोदर’ यहाँ आत्मीयता और अभिन्नता का सूचक है।
अतः राम ने लक्ष्मण को अपने हृदय के सबसे निकट, अभिन्न भाई मानकर ‘सहोदर’ कहा।
क्योंकि राम-लक्ष्मण का प्रेम सगे भाइयों से भी बढ़कर था; लक्ष्मण ने राम के लिए सब कुछ त्याग दिया था। एक ही पिता की संतान और एक ही यज्ञ-खीर से जन्म के कारण भी वे सहोदर जैसे थे; यहाँ ‘सहोदर’ आत्मीयता और अभिन्नता का सूचक है।
यहाँ कवि तुलसी के दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया—ये पाँच छंद प्रयुक्त हैं। इसी प्रकार तुलसी साहित्य में और छंद तथा काव्य-रूप आए हैं। ऐसे छंदों व काव्य-रूपों की सूची बनाएँ।
Answer
उत्तर
तुलसी साहित्य में प्रयुक्त छंद: दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त (मनहरण), सवैया, छप्पय, हरिगीतिका, तोमर, त्रिभंगी, बरवै, कुंडलिया, झूलना, चौपैया, भुजंगप्रयात, नाराच, पद (गेय पद, राग-रागिनियों में), सोहर, अनुष्टुप (संस्कृत श्लोक)।
काव्य-रूप: 1. प्रबंध काव्य / महाकाव्य — रामचरितमानस 2. मुक्तक काव्य — कवितावली, दोहावली 3. गीतिकाव्य (पद-शैली) — विनयपत्रिका, गीतावली, श्रीकृष्ण गीतावली 4. लोकगीत शैली — रामलला नहछू (सोहर), जानकी मंगल, पार्वती मंगल (मंगल काव्य) 5. बरवै रामायण — बरवै छंद में 6. रामाज्ञा-प्रश्न — शकुन-विचार ग्रंथ (दोहे) 7. वैराग्य संदीपनी, हनुमान बाहुक
छंद: दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया, छप्पय, हरिगीतिका, तोमर, त्रिभंगी, बरवै, कुंडलिया, झूलना, सोहर, गेय पद आदि। काव्य-रूप: प्रबंध/महाकाव्य (रामचरितमानस), मुक्तक (कवितावली, दोहावली), गीतिकाव्य (विनयपत्रिका, गीतावली), लोकगीत/मंगल काव्य (रामलला नहछू, जानकी मंगल, पार्वती मंगल), बरवै रामायण।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ कवितावली — आर्थिक विषमता, पेट की आग, स्वाभिमान (प्रश्न 1–4)
- ☒ व्याख्या (प्रश्न 5)
- ☒ राम का विलाप, हनुमान का आगमन, स्त्री-दृष्टिकोण (प्रश्न 6–8)
- ☒ तुलना, बेकारी, सहोदर, छंद (प्रश्न 9–13)