Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Antra (NCERT) | 8 – पद (विद्यापति) | 2026-27 | 11 of 11 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवि | विद्यापति (लगभग 1380–1460), बिस्पी (मधुबनी, बिहार); ‘मैथिल कोकिल’, ‘अभिनव जयदेव’; राजा शिवसिंह के आश्रित |
रचनाएँ | पदावली (मैथिली), कीर्तिलता, कीर्तिपताका (अवहट्ट), पुरुष परीक्षा (संस्कृत) |
पद (1) | सावन मास में विरहिणी राधा का दुख — “के पतिआ लए जाएत रे मोरा पिअतम पास”; कृष्ण गोकुल छोड़ मथुरा बस गए; कवि आश्वासन देता है कि कार्तिक में प्रिय लौटेंगे |
पद (2) | प्रेम का अनुभव — “तिल तिल नूतन होए”; जन्म भर रूप निहारकर भी नयन तृप्त नहीं हुए; लाखों में एक भी प्राण जुड़ाने वाला नहीं मिला |
पद (3) | कृष्ण-वियोग में राधा की दशा — फूले वन देख आँखें मूँद लेना, कोयल-भौंरों की ध्वनि सुन कान ढक लेना; चतुर्दशी के चाँद-सी क्षीण होती देह |
भाषा | मैथिली, गेय पद, कोमलकांत पदावली |
प्रियतमा के दुख के क्या कारण हैं?
Answer
उत्तर
- प्रियतम का वियोग: उसका प्रियतम (कृष्ण) गोकुल छोड़कर मथुरा (मधुपुर) जा बसा है।
- सावन मास: सावन का महीना प्रेम और मिलन का समय होता है; इस समय प्रिय का दूर होना असह्य दुख देता है— “हिए नहि सहए असह दुख रे भेल साओन मास”।
- अकेलापन: प्रिय के बिना अकेले भवन में रहना कठिन है— “एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए”।
- संदेश भेजने का साधन नहीं: कोई ऐसा नहीं जो उसका पत्र प्रियतम तक ले जाए।
- दूसरों का अविश्वास: दूसरे के दारुण दुख पर संसार विश्वास नहीं करता— “सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पतिआए”।
- मन का हर लिया जाना: कृष्ण उसका मन चुराकर ले गए और अपना मन भी साथ ले गए।
प्रियतम (कृष्ण) का गोकुल छोड़ मथुरा बस जाना, सावन (मिलन) के मास में वियोग, अकेले भवन में रहना, संदेश भेजने वाला कोई न होना, संसार का दूसरों के दुख पर विश्वास न करना और प्रिय का मन चुराकर ले जाना — ये प्रियतमा के दुख के कारण हैं।
कवि ‘नयन न तिरपित भेल’ के माध्यम से विरहिणी नायिका की किस मनोदशा को व्यक्त करना चाहता है?
Answer
उत्तर
“जनम अबधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल”— नायिका कहती है कि जन्म भर मैंने प्रियतम का रूप निहारा, फिर भी मेरी आँखें तृप्त नहीं हुईं।
मनोदशा: 1. नायिका के प्रेम की अतृप्ति और गहनता— प्रेम में प्रिय का रूप कभी पुराना नहीं होता; जितना देखो, उतनी ही देखने की प्यास बढ़ती है। 2. प्रिय के प्रति उसका अनन्य, अटूट आकर्षण और अनुराग। 3. प्रेम का चिर-नवीन होना— “तिल तिल नूतन होए”। 4. विरह में यह अतृप्ति और भी तीव्र हो जाती है; उसे प्रिय का रूप और भी याद आता है।
नायिका के प्रेम की अतृप्ति और गहनता — जन्म भर प्रिय का रूप निहारकर भी आँखें तृप्त नहीं हुईं, क्योंकि प्रेम चिर-नवीन है और प्रिय के प्रति अनन्य आकर्षण कभी कम नहीं होता; विरह में यह प्यास और तीव्र हो जाती है।
नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने का कारण अपने शब्दों में लिखिए।
Answer
उत्तर
- प्रेम की अनंतता: प्रेम हर पल नया होता जाता है— “तिल तिल नूतन होए”; इसलिए उसकी कोई सीमा या पूर्णता नहीं।
- अतृप्त इंद्रियाँ: जन्म भर रूप निहारने पर भी नेत्र तृप्त नहीं हुए; मधुर वचन कानों से सुने, पर वे कर्णपथ से आगे (हृदय तक) नहीं गए; अनेक मधुर रातें आनंद में बिताईं, पर समझ न सकी कि वह कैसी क्रीड़ा थी।
- हृदय की जलन: “लाख लाख जुग हिअ हिअ राखल तइओ हिअ जरनि न गेल”— लाखों युगों तक प्रिय को हृदय से लगाए रखा, फिर भी हृदय की जलन (प्रेम की प्यास) नहीं गई।
- अनुभव का अवर्णनीय होना: अनेक रसिक जन रस की चर्चा करते हैं, पर किसी ने उसका सच्चा अनुभव नहीं देखा।
- दुर्लभता: “प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक”— लाखों में एक भी ऐसा नहीं मिला जो प्राणों को शीतलता दे सके।
प्रेम हर पल नया होता है, इसलिए कभी पूर्ण नहीं होता; जन्म भर रूप निहारने, मधुर वचन सुनने और अनेक रातें साथ बिताने पर भी इंद्रियाँ तृप्त नहीं हुईं; लाखों युग हृदय से लगाए रखने पर भी जलन नहीं गई — प्रेम की प्यास अनंत है और प्राणों को शीतल करने वाला लाखों में एक भी नहीं मिला।
‘सेह पिरित अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए’ से लेखक का क्या आशय है?
Answer
उत्तर
नायिका सखी से कहती है कि तुम मेरे प्रेम के अनुभव के बारे में क्या पूछती हो; उस प्रीति और अनुराग का वर्णन कैसे करूँ, वह तो प्रतिक्षण (तिल-तिल) नया होता जाता है।
आशय: 1. सच्चा प्रेम कभी पुराना या बासी नहीं होता; वह हर क्षण नवीन, ताज़ा और बढ़ता हुआ अनुभव होता है। 2. इसलिए उसका वर्णन करना कठिन है— जो हर क्षण बदलता हो, उसे शब्दों में बाँधना असंभव है। 3. प्रेम की अनुभूति अवर्णनीय, अनंत और चिर-नवीन है।
प्रेम और अनुराग प्रतिक्षण (तिल-तिल) नया होता जाता है; सच्चा प्रेम कभी पुराना नहीं होता, हर पल बढ़ता और नवीन रहता है — इसलिए उसका वर्णन करना असंभव है; प्रेम अवर्णनीय और चिर-नवीन है।
कोयल और भौंरों के कलरव का नायिका पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer
उत्तर
वसंत में कोयल की कूक और भौंरों की गुंजार मिलन-काल में सुखद लगती है, पर विरहिणी नायिका (राधा) के लिए ये दुखदायी हैं। ये ध्वनियाँ उसे प्रियतम की याद दिलाकर उसकी विरह-वेदना को और तीव्र कर देती हैं। इसलिए कोयल का कलरव और भौंरों की ध्वनि सुनकर वह अपने हाथों से कान ढक लेती है— “कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, / कर देइ झाँपइ कान”। इसी प्रकार फूलों से भरे वन (कुसुमित कानन) को देखकर वह आँखें मूँद लेती है।
मिलन में सुखद लगने वाली कोयल की कूक और भौंरों की गुंजार विरहिणी को प्रिय की याद दिलाकर और दुख देती है, इसलिए वह हाथों से कान ढक लेती है (और फूले वन को देखकर आँखें मूँद लेती है)।
कातर दृष्टि से चारों तरफ़ प्रियतम को ढूँढ़ने की मनोदशा को कवि ने किन शब्दों में व्यक्त किया है?
Answer
उत्तर
“धरनी धरि धनि कत बेरि बइसइ, / पुनि तहि उठइ न पारा। / कातर दिठि करि, चौदिस हेरि-हेरि / नयन गरए जल-धारा।”
अर्थात नायिका (राधा) विरह के कारण इतनी दुर्बल हो गई है कि धरती को पकड़-पकड़कर कई बार बैठती है, फिर उठ नहीं पाती। वह व्याकुल (कातर) दृष्टि से चारों दिशाओं में प्रियतम को ढूँढ़ती है— बार-बार देखती है (हेरि-हेरि)— और प्रिय को न पाकर उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगती है।
इसमें नायिका की व्याकुलता, असहायता, दुर्बलता, आशा और निराशा की मनोदशा का मार्मिक चित्रण है।
“धरनी धरि धनि कत बेरि बइसइ, पुनि तहि उठइ न पारा। कातर दिठि करि, चौदिस हेरि-हेरि नयन गरए जल-धारा” — दुर्बल नायिका धरती पकड़कर बैठती है, उठ नहीं पाती, व्याकुल दृष्टि से चारों ओर बार-बार प्रिय को ढूँढ़ती है और न पाकर आँसू बहाती है।
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए— तिरपित, छन, बिदगध, निहारल, पिरित, साओन, अपजस, छिन, तोहारा, कातिक
Answer
उत्तर
तद्भव/देशज | तत्सम |
|---|---|
तिरपित | तृप्त |
छन | क्षण |
बिदगध | विदग्ध |
निहारल | निहारना / निरीक्षण (निहार < निभालय) |
पिरित | प्रीति |
साओन | श्रावण |
अपजस | अपयश |
छिन | क्षीण |
तोहारा | तव / तुम्हारा (युष्मद्) |
कातिक | कार्तिक |
तिरपित — तृप्त; छन — क्षण; बिदगध — विदग्ध; निहारल — निहारना/निरीक्षण; पिरित — प्रीति; साओन — श्रावण; अपजस — अपयश; छिन — क्षीण; तोहारा — तव (तुम्हारा); कातिक — कार्तिक।
निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए— (क) एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए। सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पतिआए।। (ख) जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।। सेहो मधुर बोल स्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल।। (ग) कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मूदि रहए दु नयान। कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर देइ झाँपइ कान।।
Answer
उत्तर
(क) नायिका कहती है— प्रियतम के बिना इस भवन में अकेले मुझसे रहा नहीं जाता। हे सखी! दूसरे के कठोर दुख पर संसार में कौन विश्वास करता है? अर्थात मेरी विरह-वेदना को कोई नहीं समझ सकता; जो स्वयं भोगता है वही जानता है।
(ख) नायिका कहती है— जन्म भर मैंने प्रियतम का रूप निहारा, फिर भी आँखें तृप्त नहीं हुईं। उनके मधुर वचन कानों से सुने, फिर भी ऐसा लगता है कि वे कानों के मार्ग को छू भी न सके— अर्थात उन्हें और सुनने की इच्छा बनी रही। आशय— प्रेम की अतृप्ति और चिर-नवीनता।
(ग) कमल-मुख वाली नायिका (राधा) फूलों से लदे वन को देखकर अपनी दोनों आँखें मूँद लेती है और कोयल की कूक तथा भौंरों की गुंजार सुनकर हाथों से कान ढक लेती है। आशय— वसंत की सुंदरता और मधुर ध्वनियाँ, जो मिलन में सुखद होती हैं, विरह में उसे प्रिय की याद दिलाकर पीड़ा देती हैं।
(क) प्रिय के बिना अकेले भवन में रहना असह्य है; संसार दूसरे के कठोर दुख पर विश्वास नहीं करता — अपनी पीड़ा स्वयं ही जानी जाती है। (ख) जन्म भर प्रिय का रूप निहारकर भी आँखें तृप्त नहीं हुईं, मधुर वचन सुनकर भी लगता है जैसे कानों तक पहुँचे ही नहीं — प्रेम की अतृप्ति। (ग) कमलमुखी राधा फूले वन को देख आँखें मूँद लेती है और कोयल-भौंरों की ध्वनि सुन कान ढक लेती है — वसंत की शोभा विरह में पीड़ा देती है।
अभ्यास – योग्यता-विस्तार
पठित पाठ के आधार पर विद्यापति के काव्य में प्रयुक्त भाषा की पाँच विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।
Answer
उत्तर
- मैथिली भाषा: पद मैथिली में हैं— “के पतिआ लए जाएत रे मोरा पिअतम पास”, “मोहि रहलो न जाए”।
- गेयता और संगीतात्मकता: पद गाने योग्य हैं; ‘रे’ जैसे टेक-शब्द, लय— “हिए नहि सहए असह दुख रे भेल साओन मास”।
- तद्भव शब्दों की प्रधानता: तिरपित (तृप्त), पिरित (प्रीति), साओन (श्रावण), अपजस (अपयश), कातिक (कार्तिक)।
- अलंकारों का सहज प्रयोग:
- उपमा— “तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिन— चौदसि-चाँद-समान”, “कमलमुखि”।
- पुनरुक्ति प्रकाश— “तिल तिल”, “लाख लाख”, “हेरि-हेरि”, “छन-छन”, “गुनि-गुनि”।
- अनुप्रास— “मोर मन हरि हर लए गेल” (यमक/श्लेष— ‘हरि’ = कृष्ण, ‘हर’ = हरण)।
- कोमलकांत पदावली और माधुर्य गुण: “कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि”, “कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि”।
- भणिता (कवि-छाप): “विद्यापति कवि गाओल”, “भनइ विद्यापति”।
- मैथिली भाषा (“के पतिआ लए जाएत रे…”); (2) गेयता-संगीतात्मकता (‘रे’ टेक, लय); (3) तद्भव शब्दों की प्रधानता (तिरपित, पिरित, साओन, कातिक); (4) अलंकार — उपमा (“चौदसि-चाँद-समान”), पुनरुक्ति (“तिल तिल”, “हेरि-हेरि”), यमक/श्लेष (“मन हरि हर लए गेल”); (5) कोमलकांत पदावली और माधुर्य (“कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि”); साथ ही भणिता (“भनइ विद्यापति”)।
विद्यापति के गीतों का आडियो रिकार्ड बाज़ार में उपलब्ध है, उसको सुनिए।
Answer
उत्तर
(श्रवण-गतिविधि)
विद्यापति के पद आज भी मिथिला क्षेत्र (बिहार, नेपाल का तराई क्षेत्र) में विवाह, पर्व-त्योहार और भक्ति-अवसरों पर गाए जाते हैं। उनके ‘नचारी’ (शिव-भक्ति गीत) और ‘महेशवाणी’ भी प्रसिद्ध हैं। प्रसिद्ध गायिका शारदा सिन्हा और अन्य मैथिली लोक-गायकों के गाए विद्यापति-गीत, जैसे “जय जय भैरवि असुर-भयाउनि”, “उगना रे मोर कतय गेलाह”, “के पतिआ लए जाएत रे” आदि, ऑडियो रिकॉर्ड, सीडी और यूट्यूब/संगीत ऐप्स पर उपलब्ध हैं। विद्यार्थी इन्हें सुनकर पदों की गेयता, लय और भाव का अनुभव करें तथा कक्षा में चर्चा करें।
श्रवण-गतिविधि: शारदा सिन्हा आदि मैथिली गायकों के गाए विद्यापति-गीत (“जय जय भैरवि”, “उगना रे मोर कतय गेलाह”, “के पतिआ लए जाएत रे”) ऑडियो रिकॉर्ड, यूट्यूब और संगीत ऐप्स पर सुनें और उनकी गेयता, लय, भाव पर चर्चा करें।
विद्यापति और जायसी प्रेम के कवि हैं। दोनों की तुलना कीजिए।
Answer
उत्तर
आधार | विद्यापति | जायसी |
|---|---|---|
काल | 14वीं–15वीं सदी (आदिकाल/भक्तिकाल का संधि-काल) | 15वीं–16वीं सदी (भक्तिकाल) |
धारा | श्रृंगार और भक्ति (राधा-कृष्ण) | सूफ़ी प्रेममार्गी (निर्गुण) |
प्रेम का स्वरूप | लौकिक-श्रृंगारिक प्रेम, जिसे भक्त भक्ति-भाव से भी देखते हैं | लौकिक प्रेम-कथा के माध्यम से आत्मा-परमात्मा (इश्क़-ए-हक़ीक़ी) का प्रेम |
नायक-नायिका | राधा-कृष्ण | रत्नसेन-पद्मावती, नागमती |
भाषा | मैथिली (पदावली) | ठेठ अवधी |
शैली | गेय पद, मुक्तक | प्रबंध काव्य (पद्मावत), दोहा-चौपाई |
विरह-वर्णन | राधा का कोमल, मनोवैज्ञानिक विरह (“नयन न तिरपित भेल”) | नागमती का बारहमासा— प्रकृति के साथ विरह का उत्कर्ष, अतिशयोक्ति |
विशेषता | माधुर्य, कोमलता, संगीतात्मकता; ‘मैथिल कोकिल’ | लोक-जीवन के उपमान, सूफ़ी दर्शन, हिंदू-मुस्लिम समन्वय |
समानता: दोनों ने प्रेम और विशेषकर विरह का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है; दोनों में प्रकृति विरह को उद्दीप्त करती है; दोनों में नारी-हृदय की संवेदना का सूक्ष्म चित्रण है।
समानता: दोनों प्रेम और विरह के मार्मिक कवि हैं, प्रकृति विरह को उद्दीप्त करती है और नारी-हृदय का सूक्ष्म चित्रण है। अंतर: विद्यापति (मैथिली, गेय मुक्तक पद, राधा-कृष्ण का श्रृंगारिक-भक्तिपरक प्रेम, कोमल-मनोवैज्ञानिक विरह, माधुर्य) बनाम जायसी (ठेठ अवधी, प्रबंध काव्य पद्मावत, सूफ़ी प्रेम — लौकिक कथा से आत्मा-परमात्मा मिलन, नागमती का बारहमासा, अतिशयोक्ति, लोक-उपमान)।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ प्रियतमा का दुख, अतृप्त नयन, अतृप्त प्राण, चिर-नवीन प्रेम (प्रश्न 1–4)
- ☒ कोयल-भौंरे, कातर दृष्टि, तत्सम रूप, आशय (प्रश्न 5–8)
- ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 9–11)