Circle of Learning Logo CIRCLE OF LEARNING Excellence in Education
Class 12 Hindi Antra Chapter 12

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 12: संवदिया

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XII

Hindi

Antra (NCERT)

12 – संवदिया

2026-27

15 of 15

बिंदु

विवरण

लेखक

फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (1921–1977), औराही हिंगना (पूर्णिया, बिहार); ‘मैला आँचल’, ‘परती परिकथा’; आंचलिक कथाकार, ‘आत्मा के शिल्पी’

विधा

आंचलिक कहानी

पात्र

हरगोबिन (संवदिया), बड़ी बहुरिया (बड़ी हवेली की विधवा बहू), मोदिआइन, बड़ी बहुरिया की बूढ़ी माता और भाई

स्थान

जलालगढ़ (बड़ी हवेली) → कटिहार → थाना बिंहपुर (मायका); लौटते समय कटिहार से बीस कोस पैदल

कथा

पति की मृत्यु के बाद देवरों ने संपत्ति बाँट ली और शहर चले गए; बथुआ-साग पर जी रही बड़ी बहुरिया माँ को संदेश भेजती है कि उसे ले जाए; हरगोबिन गाँव की लक्ष्मी के अपमान के डर से संवाद नहीं सुना पाता, भूखा-प्यासा लौटता है और बड़ी बहुरिया का ‘बेटा’ बनकर उसकी सेवा का संकल्प लेता है

मूल भाव

मानवीय संवेदना, ग्रामीण आत्मीयता, विधवा स्त्री की असहायता, गाँव का स्वाभिमान

Q1

संवदिया की क्या विशेषताएँ हैं और गाँववालों के मन में संवदिया की क्या अवधारणा है?

Answer

उत्तर

संवदिया की विशेषताएँ (हरगोबिन के अनुसार): 1. “आदमी भगवान के घर से संवदिया बनकर आता है”— संवाद पहुँचाने का काम सभी नहीं कर सकते। 2. संवाद के प्रत्येक शब्द को याद रखना, और जिस सुर और स्वर में संवाद सुनाया गया है, ठीक उसी ढंग से जाकर सुनाना। 3. वातावरण को “सूँघकर” संवाद का अंदाज़ा लगा लेना; गुप्त संवाद को गुप्त रखना— “चाँद-सूरज को भी नहीं मालूम हो, परेवा-पंछी तक न जाने।” 4. बिना मज़दूरी लिए गाँव-गाँव संवाद पहुँचाना। 5. संवेदनशील होना— संदेश भेजने वाले के दुख-सुख को अपना समझना।

गाँववालों की अवधारणा: गाँववालों की राय है कि निठल्ला, कामचोर और पेटू आदमी ही संवदिया का काम करता है— “न आगे नाथ, न पीछे पगहा।” बिना मज़दूरी के संवाद पहुँचाने वाले को वे “औरतों का गुलाम” कहते हैं, जो ज़रा-सी मीठी बोली सुनकर नशे में आ जाए। यह भी माना जाता है कि “संवदिया डटकर खाता है और अफरकर सोता है।” फिर भी गाँव का कोई घर ऐसा नहीं, जिसकी माँ-बहू-बेटी का संवाद हरगोबिन ने न पहुँचाया हो।

विशेषताएँ: संवदिया भगवान के घर से बनकर आता है; संवाद का हर शब्द याद रखकर उसी सुर-स्वर में सुनाता है; वातावरण सूँघकर संवाद भाँपता और गुप्त बात गुप्त रखता है; बिना मज़दूरी के और संवेदना के साथ काम करता है। गाँववालों की अवधारणा: संवदिया निठल्ला, कामचोर, पेटू, “न आगे नाथ न पीछे पगहा”, “औरतों का गुलाम” होता है, जो डटकर खाता और अफरकर सोता है — फिर भी हर घर का संवाद वही पहुँचाता है।

Q2

बड़ी हवेली से बुलावा आने पर हरगोबिन के मन में किस प्रकार की आशंका हुई?

Answer

उत्तर

हरगोबिन को पहले अचरज हुआ कि आज, जब गाँव-गाँव में डाकघर खुल गए हैं और आदमी घर बैठे “लंका तक खबर” भेज सकता है, तब भी किसी को संवदिया की ज़रूरत क्यों पड़ी? बड़ी हवेली की टूटी ड्योढ़ी पार करते हुए उसने सदा की भाँति वातावरण सूँघकर अंदाज़ा लगाया कि निश्चय ही कोई गुप्त समाचार ले जाना है— ऐसा, जो “चाँद-सूरज को भी नहीं मालूम हो, परेवा-पंछी तक न जाने।” उसे आशंका हुई कि बड़ी बहुरिया किसी बहुत निजी, दुखभरे या गोपनीय संकट में है, जिसे वह डाक से नहीं भेज सकती।

डाकघरों के ज़माने में संवदिया बुलाए जाने पर हरगोबिन को अचरज हुआ और उसने वातावरण सूँघकर आशंका की कि अवश्य कोई गुप्त, निजी और दुखभरा समाचार ले जाना है — ऐसा जो “चाँद-सूरज को भी न मालूम हो, परेवा-पंछी तक न जाने”, इसलिए डाक से नहीं भेजा जा सकता।

Q3

बड़ी बहुरिया अपने मायके संदेश क्यों भेजना चाहती थी?

Answer

उत्तर

  1. पति (बड़े भैया) की एक घंटे की बीमारी में मृत्यु के बाद तीनों देवरों ने लड़-झगड़कर बँटवारा किया; उसकी देह से ज़ेवर तक छीन लिए गए और बनारसी साड़ी के तीन टुकड़े कर बाँट ली गई।
  2. रैयतों ने ज़मीन पर दखल कर लिया; देवर गाँव छोड़कर शहर जा बसे और उसकी खोज-खबर नहीं लेते— केवल अगहनी धान और आम के मौसम में आकर अनाज-आम ले जाते हैं।
  3. वह अकेली रह गई— एक नौकर था, वह भी भाग गया; गाय भूखी-प्यासी हिकर रही है।
  4. घोर गरीबी— कर्ज़-उधार कोई नहीं देता; मोदिआइन उधार का दाम माँगने आँगन में बैठी बड़बड़ाती है; वह बथुआ-साग खाकर गुज़ारा कर रही है।
  5. वह हताश थी— “किसके लिए इतना दुख झेलूँ?”

इसलिए वह माँ से कहलवाना चाहती थी कि उसे यहाँ से ले जाए— वह भाई-भाभियों की नौकरी करके, बच्चों की जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहेगी, पर यहाँ नहीं रहेगी; नहीं तो गले में घड़ा बाँधकर पोखरे में डूब मरेगी।

पति की मृत्यु के बाद देवरों ने ज़ेवर-साड़ी तक बाँटकर संपत्ति छीन ली और शहर जा बसे, रैयतों ने ज़मीन दबा ली, नौकर भाग गया, कर्ज़ मिलना बंद हो गया और वह बथुआ-साग पर जी रही थी; अकेलेपन और गरीबी से हताश होकर वह माँ से कहलवाना चाहती थी कि उसे ले जाए — वह भाई-भाभियों की नौकरी कर लेगी, नहीं तो पोखरे में डूब मरेगी।

Q4

हरगोबिन बड़ी हवेली में पहुँचकर अतीत की किन स्मृतियों में खो जाता है?

Answer

उत्तर

  1. बड़ी हवेली का वैभव: कभी वहाँ दिन-रात नौकर-नौकरानियों और जन-मज़दूरों की भीड़ लगी रहती थी; आज वही बड़ी बहुरिया अपने हाथ से सूप में अनाज फटक रही है। “इन हाथों में सिर्फ़ मेहँदी लगाकर ही गाँव की नाइन परिवार पालती थी।” अब हवेली नाममात्र को बड़ी रह गई है।
  2. बड़े भैया की मृत्यु: एक घंटे की बीमारी में बड़े भैया चल बसे, और जैसे सब खेल खत्म हो गया।
  3. भाइयों का झगड़ा और बँटवारा: तीनों भाइयों में लड़ाई, रैयतों का ज़मीन पर दखल, भाइयों का शहर जा बसना।
  4. ‘द्रौपदी चीर-हरण लीला’: बड़ी बहुरिया की देह से ज़ेवर खींच-छीनकर बँटवारा, बनारसी साड़ी के तीन टुकड़े— हरगोबिन ने यह सब अपनी आँखों से देखा था।

“कहाँ गए वे दिन?”— सोचकर हरगोबिन ने लंबी साँस ली।

हवेली का पुराना वैभव (नौकरों-मज़दूरों की भीड़, बड़ी बहुरिया के हाथों में मेहँदी लगाकर नाइन का परिवार पालना) जो अब नाममात्र का रह गया; बड़े भैया की एक घंटे की बीमारी में मृत्यु; भाइयों का झगड़ा, रैयतों का दखल और शहर जा बसना; और बड़ी बहुरिया के ज़ेवर छीनने, बनारसी साड़ी के तीन टुकड़े करने वाली ‘द्रौपदी चीर-हरण लीला’।

Q5

संवाद कहते वक्त बड़ी बहुरिया की आँखें क्यों छलछला आईं?

Answer

उत्तर

संवाद कहते समय बड़ी बहुरिया को अपनी पूरी दुर्दशा याद आ गई— कभी वह बड़ी हवेली की “लक्ष्मी” थी, आज बथुआ-साग खाकर जी रही है; पति की असमय मृत्यु, देवरों की निर्दयता, अकेलापन, कर्ज़ और अपमान (मोदिआइन की कड़वी बातें)। उसे अपना ससुराल और गाँव छोड़कर मायके में भाई-भाभियों पर आश्रित होकर रहने की विवशता और लज्जा भी पीड़ा दे रही थी— “मैं भाई-भाभियों की नौकरी करके पेट पालूँगी, बच्चों की जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहूँगी।” आत्महत्या तक की बात कहते हुए उसका दुख आँसुओं में फूट पड़ा। हरगोबिन ने बड़ी हवेली की लक्ष्मी को पहली बार इस तरह सिसकते देखा।

संवाद कहते समय उसे अपनी दुर्दशा — हवेली की लक्ष्मी से बथुआ-साग पर जीने तक का पतन, पति की मृत्यु, देवरों की निर्दयता, अकेलापन, कर्ज़ और अपमान — याद आ गई; साथ ही ससुराल छोड़कर मायके में भाई-भाभियों की नौकरानी बनकर रहने की विवशता और लज्जा ने उसे रुला दिया।

Q6

गाड़ी पर सवार होने के बाद संवदिया के मन में काँटे की चुभन का अनुभव क्यों हो रहा था। उससे छुटकारा पाने के लिए उसने क्या उपाय सोचा?

Answer

उत्तर

काँटे की चुभन: गाँव में उसने सबके संवाद पहुँचाए थे, पर ऐसा संवाद वह पहली बार ले जा रहा था। बड़ी बहुरिया के संवाद का प्रत्येक शब्द उसके मन में काँटे की तरह चुभ रहा था— “किसके भरोसे यहाँ रहूँगी? एक नौकर था, वह भी कल भाग गया। गाय खूँटे से बँधी भूखी-प्यासी हिकर रही है। मैं किसके लिए इतना दुख झेलूँ?” गाँव की लक्ष्मी की यह दुर्दशा और उसका गाँव छोड़ने का निर्णय हरगोबिन के लिए असहनीय था।

छुटकारे का उपाय: मन बहलाने के लिए उसने पास बैठे एक यात्री से बातचीत शुरू करने की कोशिश की— “क्यों भाईसाहेब, थाना बिंहपुर में डाकगाड़ी रुकती है या नहीं?” पर यात्री ने कुढ़कर उत्तर दिया; हरगोबिन ने भाँप लिया कि यह चिड़चिड़ा आदमी है और इससे बातचीत नहीं जमेगी। तब वह फिर संवाद को मन-ही-मन दुहराने लगा।

प्रश्न 1

ऐसा दुखभरा संवाद वह पहली बार ले जा रहा था; बड़ी बहुरिया के शब्द — “किसके भरोसे यहाँ रहूँगी?… नौकर भाग गया, गाय भूखी हिकर रही है, किसके लिए दुख झेलूँ?” — काँटे की तरह चुभ रहे थे। छुटकारे के लिए उसने पास बैठे यात्री से बातचीत करके मन बहलाना चाहा (“थाना बिंहपुर में डाकगाड़ी रुकती है?”), पर यात्री चिड़चिड़ा निकला, तो वह फिर संवाद मन-ही-मन दुहराने लगा।

उत्तर

Q7

बड़ी बहुरिया का संवाद हरगोबिन क्यों नहीं सुना सका?

Answer

उत्तर

  1. गाँव का स्वाभिमान: हरगोबिन बड़ी बहुरिया को गाँव की लक्ष्मी मानता था। उसे लगा कि यह संवाद सुनाने पर सुनने वाले उसके गाँव का नाम लेकर थूकेंगे— “कैसा गाँव है, जहाँ लक्ष्मी जैसी बहुरिया दुख भोग रही है!”
  2. “किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा?”— बड़ी बहुरिया का बथुआ-साग खाकर गुज़ारा करना बताना उसे गाँव और हवेली का अपमान लगा।
  3. गाँव की लक्ष्मी का गाँव छोड़ना: वह नहीं चाहता था कि बड़ी बहुरिया गाँव छोड़कर हमेशा के लिए चली जाए— “तब गाँव में क्या रह जाएगा?”
  4. भावनात्मक लगाव: बड़ी बहुरिया की छलछलाई आँखें और सिसकियाँ याद आते ही वह काँपने लगा; उसका कलेजा धड़कने लगा।
  5. उसने बूढ़ी माता से झूठ कह दिया कि कोई संवाद नहीं है; रात को निश्चय किया कि सुबह सही संवाद सुना देगा, पर सुबह भी नहीं कह सका।
प्रश्न 1

हरगोबिन बड़ी बहुरिया को गाँव की लक्ष्मी मानता था; उसे डर था कि सुनने वाले उसके गाँव पर थूकेंगे जहाँ लक्ष्मी-सी बहू बथुआ-साग खाकर जी रही है; वह नहीं चाहता था कि गाँव की लक्ष्मी गाँव छोड़ दे; और बड़ी बहुरिया की सिसकियाँ याद आते ही उसका कलेजा काँपने लगता था — “किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा?”

उत्तर

Q8

‘संवदिया डटकर खाता है और अफर कर सोता है’ से क्या आशय है?

Answer

उत्तर

आशय: गाँववालों की धारणा है कि संवदिया पेटू और निश्चिंत होता है; वह जहाँ संवाद लेकर जाता है, वहाँ मेहमान बनकर पेट भरकर (डटकर) खाता है और भरे पेट (अफरकर) बेफ़िक्र होकर सोता है। उसे संवाद के सुख-दुख से कोई मतलब नहीं होता।

पाठ में व्यंग्य/विरोधाभास: हरगोबिन के साथ ठीक उलटा हुआ। बूढ़ी माता की थाली में दाल-भात, तीन किस्म की भाजी, घी, पापड़, अचार था, पर उसे बड़ी बहुरिया याद आई जो बथुआ-साग उबालकर खा रही होगी— उससे खाया नहीं गया। रातभर उसे नींद भी नहीं आई; वह पछताता रहा कि उसने झूठ क्यों बोला। इस वाक्य से लेखक हरगोबिन की संवेदनशीलता को उभारता है— वह साधारण संवदिया नहीं, बड़ी बहुरिया के दुख को अपना दुख मानने वाला व्यक्ति है।

गाँव की धारणा है कि संवदिया पेटू और निश्चिंत होता है — मेहमानी में पेट भरकर खाता और बेफ़िक्र सोता है। पर हरगोबिन बड़ी बहुरिया के बथुआ-साग की याद में न भरी थाली खा सका, न रातभर सो सका — यह वाक्य उसकी गहरी संवेदनशीलता को उभारने वाला विरोधाभास है।

Q9

जलालगढ़ पहुँचने के बाद बड़ी बहुरिया के सामने हरगोबिन ने क्या संकल्प लिया?

Answer

उत्तर

कटिहार से बीस कोस भूखा-प्यासा पैदल चलकर हरगोबिन जलालगढ़ पहुँचा और बेहोश हो गया। होश आने पर बड़ी बहुरिया उसे दूध पिला रही थी। उसने बड़ी बहुरिया के पैर पकड़कर कहा— “बड़ी बहुरिया!… मुझे माफ़ करो। मैं तुम्हारा संवाद नहीं कह सका।… तुम गाँव छोड़कर मत जाओ। तुमको कोई कष्ट नहीं होने दूँगा। मैं तुम्हारा बेटा! बड़ी बहुरिया, तुम मेरी माँ, सारे गाँव की माँ हो! मैं अब निठल्ला बैठा नहीं रहूँगा। तुम्हारा सब काम करूँगा।”

अर्थात उसने संकल्प लिया कि वह बड़ी बहुरिया का बेटा बनकर उसकी सेवा करेगा, उसका सब काम करेगा, उसे कोई कष्ट नहीं होने देगा, ताकि वह गाँव छोड़कर न जाए।

उसने बड़ी बहुरिया के पैर पकड़कर माफ़ी माँगी और संकल्प लिया — “मैं तुम्हारा बेटा! तुम मेरी माँ, सारे गाँव की माँ हो! मैं अब निठल्ला नहीं बैठूँगा, तुम्हारा सब काम करूँगा, तुम्हें कोई कष्ट नहीं होने दूँगा” — ताकि वह गाँव छोड़कर न जाए।

Q10

‘डिजिटल इंडिया’ के दौर में संवदिया की क्या कोई भूमिका हो सकती है?

Answer

उत्तर

संदेश पहुँचाने के रूप में: आज मोबाइल, व्हाट्सऐप, ईमेल, वीडियो कॉल से पल भर में संदेश कहीं भी पहुँच जाता है, इसलिए पारंपरिक संवदिया की आवश्यकता बहुत कम हो गई है।

फिर भी संवदिया की भूमिका हो सकती है— 1. मानवीय संवेदना: मशीन शब्द पहुँचाती है, भाव नहीं; हरगोबिन जैसा संवदिया संदेश के साथ सहानुभूति, सांत्वना और समाधान भी देता है। 2. डिजिटल खाई: दूरदराज़ के गाँवों में, बुज़ुर्गों और अशिक्षित लोगों के पास आज भी स्मार्टफ़ोन या इंटरनेट की सुविधा या जानकारी नहीं है; वहाँ संदेशवाहक या ‘डिजिटल साथी’ की भूमिका महत्वपूर्ण है। 3. गोपनीय और नाज़ुक संदेश: पारिवारिक कलह, दुख-मृत्यु, विवाह-संबंध जैसे संवेदनशील मामलों में व्यक्तिगत रूप से संदेश पहुँचाना और मध्यस्थता करना अधिक प्रभावी होता है। 4. नए रूप: आशा कार्यकर्ता, कॉमन सर्विस सेंटर संचालक, डाकिया, सामाजिक कार्यकर्ता— ये आज के ‘संवदिया’ हैं, जो सरकारी योजनाओं और सूचनाओं को लोगों तक पहुँचाते हैं। 5. भरोसा: फ़र्ज़ी संदेशों और अफ़वाहों के युग में विश्वसनीय व्यक्ति द्वारा पहुँचाया संदेश अधिक भरोसेमंद होता है।

तकनीक ने पारंपरिक संवदिया की ज़रूरत घटा दी है, फिर भी उसकी भूमिका है — मशीन शब्द पहुँचाती है, संवदिया भाव और सांत्वना भी; डिजिटल खाई वाले गाँवों, बुज़ुर्गों और अशिक्षितों तक सूचना पहुँचाना; नाज़ुक पारिवारिक संदेशों में मध्यस्थता; आशा कार्यकर्ता, डाकिया, CSC संचालक जैसे आधुनिक ‘संवदिया’; और फ़र्ज़ी संदेशों के दौर में भरोसेमंद माध्यम।

अभ्यास – भाषा-शिल्प

Q11

इन शब्दों का अर्थ समझिए— काबुली-कायदा, रोम-रोम कलपने लगा, अगहनी धान

Answer

उत्तर

शब्द

अर्थ और संदर्भ

काबुली-कायदा

काबुली (अफ़गानी) सूदखोरों का तरीका— उधार देकर ज़बरदस्ती, धमकाकर, अड़कर वसूली करना। हरगोबिन ने मोदिआइन के उधार-वसूली के अड़ियल ढंग पर व्यंग्य किया, “वसूलने का यह काबुली-कायदा तो तुमने खूब सीखा है।”

रोम-रोम कलपने लगा

अत्यधिक दुखी होना, शरीर के हर रोएँ तक पीड़ा अनुभव करना। बड़ी बहुरिया का संवाद सुनकर हरगोबिन का रोम-रोम कलपने लगा।

अगहनी धान

अगहन (मार्गशीर्ष, नवंबर-दिसंबर) महीने में पककर कटने वाली धान की फ़सल। देवर-देवरानियाँ अगहनी धान के समय आकर चावल-चूड़ा ले जाते थे।

काबुली-कायदा — काबुली सूदखोरों की तरह अड़कर, धमकाकर उधार वसूलने का ढंग (मोदिआइन पर व्यंग्य); रोम-रोम कलपने लगा — अत्यंत दुखी होना, हर रोएँ तक पीड़ा; अगहनी धान — अगहन (नवंबर-दिसंबर) में पकने वाली धान की फ़सल।

Q12

पाठ से प्रश्नवाचक वाक्यों को छाँटिए और संदर्भ के साथ उन पर टिप्पणी लिखिए।

Answer

उत्तर

प्रश्नवाचक वाक्य

संदर्भ/टिप्पणी

“संवदिया के मारफ़त संवाद क्यों भेजेगा कोई?… फिर उसकी बुलाहट क्यों हुई?”

डाकघरों के ज़माने में बुलावा आने पर हरगोबिन का अचरज और जिज्ञासा।

“कहाँ गए वे दिन?”

हवेली के बीते वैभव की याद में हरगोबिन की लंबी साँस— अतीत के प्रति करुणा।

“नहीं तो एक घंटे की बीमारी में बड़े भैया क्यों मरते?”

भाग्य के प्रति शिकायत— “भगवान भले आदमी को ही कष्ट देते हैं।”

“हरगोबिन भाई, तुमको एक संवाद ले जाना है। आज ही। बोलो, जाओगे न?”

बड़ी बहुरिया का आग्रह— उसकी व्याकुलता।

“और कितना कड़ा करूँ दिल?”

बड़ी बहुरिया की असहनीय पीड़ा और हताशा।

“बथुआ-साग खाकर कब तक जीऊँ? किसलिए… किसके लिए?”

उसकी गरीबी, अकेलेपन और जीवन की निरर्थकता का भाव।

“किसके भरोसे यहाँ रहूँगी?… मैं किसके लिए इतना दुख झेलूँ?”

गाड़ी में हरगोबिन के मन में काँटे की तरह चुभते शब्द।

“क्यों भाईसाहेब, थाना बिंहपुर में डाकगाड़ी रुकती है या नहीं?”

मन बहलाने के लिए यात्री से बातचीत का प्रयास।

“किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा?”

गाँव के स्वाभिमान और लज्जा से उपजा हरगोबिन का द्वंद्व।

“कहो बेटा, क्या समाचार है?”; “कोई संवाद?”; “तो तुम कोई संवाद लेकर नहीं आए हो?”

बूढ़ी माता की बेटी के प्रति चिंता और उदासी।

“यह उसने क्या किया? क्या कर दिया? वह किसलिए आया था? वह झूठ क्यों बोला?”

झूठ बोलने के बाद हरगोबिन का आत्म-मंथन और पछतावा।

“बड़ी बहुरिया को क्या जवाब देगा?”

लौटते समय हरगोबिन की चिंता।

“बीस कोस की मंज़िल भी कोई दूर की मंज़िल है?”

पैदल चलने का दृढ़ निश्चय— उसकी निष्ठा।

“बोलो, बड़ी माँ, तुम… तुम गाँव छोड़कर चली तो नहीं जाओगी?”

हरगोबिन की अंतिम विनती— गाँव के प्रति प्रेम और बड़ी बहुरिया के प्रति पुत्रवत् स्नेह।

टिप्पणी: प्रश्नवाचक वाक्य कहानी में पात्रों के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, जिज्ञासा और भावुकता को व्यक्त करते हैं और कथा को नाटकीय तथा मार्मिक बनाते हैं।

प्रश्न 1

प्रमुख प्रश्नवाचक वाक्य: “फिर उसकी बुलाहट क्यों हुई?” (अचरज), “कहाँ गए वे दिन?” (अतीत की करुणा), “और कितना कड़ा करूँ दिल?”, “बथुआ-साग खाकर कब तक जीऊँ? किसके लिए?” (बड़ी बहुरिया की हताशा), “किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा?” (हरगोबिन का द्वंद्व), “कोई संवाद?” (माँ की चिंता), “वह झूठ क्यों बोला?” (पछतावा), “बीस कोस की मंज़िल भी कोई दूर है?” (निश्चय), “गाँव छोड़कर चली तो नहीं जाओगी?” (अंतिम विनती) — ये पात्रों के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा और भावुकता को व्यक्त कर कहानी को मार्मिक बनाते हैं।

उत्तर

Q13

इन पंक्तियों की व्याख्या कीजिए— (क) बड़ी हवेली अब नाममात्र को ही बड़ी हवेली है। (ख) हरगोबिन ने देखी अपनी आँखों से द्रौपदी की चीरहरण लीला। (ग) बथुआ साग खाकर कब तक जीऊँ? (घ) किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा।

Answer

उत्तर

(क) कभी बड़ी हवेली में दिन-रात नौकर-नौकरानियों और मज़दूरों की भीड़ रहती थी, बड़ी बहुरिया के हाथों में मेहँदी लगाकर नाइन का परिवार पलता था। बड़े भैया की मृत्यु, भाइयों के बँटवारे और रैयतों के दखल के बाद सब वैभव समाप्त हो गया; ड्योढ़ी टूट गई और बड़ी बहुरिया स्वयं सूप से अनाज फटकती है। अब हवेली केवल नाम से ‘बड़ी’ है, वास्तव में उसकी शान, संपन्नता और प्रतिष्ठा नष्ट हो चुकी है।

(ख) महाभारत में भरी सभा में द्रौपदी का चीर-हरण उसके अपमान का चरम था। इसी तरह बँटवारे के समय निर्दय देवरों ने विधवा बड़ी बहुरिया की देह से ज़ेवर खींच-छीन लिए और उसकी बनारसी साड़ी के तीन टुकड़े करके बाँट लिए। हरगोबिन इस अमानवीय, अपमानजनक दृश्य का प्रत्यक्षदर्शी था। यह उपमा परिवार की लोभवृत्ति और स्त्री के अपमान को मार्मिक रूप से व्यक्त करती है।

(ग) यह बड़ी बहुरिया की हताशा का कथन है। संपत्ति छिन जाने, कर्ज़ न मिलने और अकेलेपन के कारण वह केवल बथुआ (एक साधारण जंगली साग) उबालकर खाने को विवश है। वह पूछती है कि इस तरह अभाव में कब तक जिए— “किसलिए… किसके लिए?” इसमें गरीबी, असहायता और जीवन की निरर्थकता का भाव है।

(घ) हरगोबिन बड़ी बहुरिया के मायके पहुँचकर द्वंद्व में पड़ जाता है। वह सोचता है कि गाँव की लक्ष्मी के बथुआ-साग खाने और गाँव छोड़ने का संवाद सुनाकर वह अपने गाँव का अपमान कैसे कराएगा; सुनने वाले कहेंगे— “कैसा गाँव है, जहाँ लक्ष्मी जैसी बहुरिया दुख भोग रही है!” लज्जा और गाँव के स्वाभिमान के कारण उसमें संवाद सुनाने का साहस नहीं रहता।

प्रश्न 1

(क) बड़े भैया की मृत्यु, बँटवारे और रैयतों के दखल से हवेली का वैभव नष्ट हो गया; बड़ी बहुरिया स्वयं अनाज फटकती है — अब वह केवल नाम की ‘बड़ी’ है। (ख) देवरों ने विधवा बड़ी बहुरिया के ज़ेवर छीने और बनारसी साड़ी के तीन टुकड़े कर बाँटे — द्रौपदी चीर-हरण-सा अपमान, जिसका हरगोबिन प्रत्यक्षदर्शी था। (ग) गरीबी और अकेलेपन में बथुआ-साग पर जीने को विवश बड़ी बहुरिया की हताशा — “किसके लिए जीऊँ?” (घ) गाँव की लक्ष्मी की दुर्दशा बताकर गाँव का अपमान कराने की लज्जा से हरगोबिन संवाद सुनाने का साहस नहीं जुटा पाता।

उत्तर

अभ्यास – योग्यता-विस्तार

Q14

संवदिया की भूमिका आपको मिले तो आप क्या करेंगे? संवदिया बनने के लिए किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है?

Answer

उत्तर

मैं क्या करूँगा: यदि मुझे संवदिया की भूमिका मिले तो मैं संदेश को पूरी ईमानदारी से, बिना घटाए-बढ़ाए, सही व्यक्ति तक पहुँचाऊँगा। यदि संदेश दुखभरा हो तो उसे संवेदनशीलता से सुनाऊँगा और संदेश भेजने वाले की समस्या के समाधान में भी मदद करने का प्रयास करूँगा— जैसे हरगोबिन ने अंत में किया।

ध्यान रखने योग्य बातें: 1. स्मरण-शक्ति: संदेश का हर शब्द याद रखना। 2. सत्यनिष्ठा: संदेश को ज्यों-का-त्यों पहुँचाना; अपनी ओर से कुछ न जोड़ना-घटाना। 3. सुर और स्वर: जिस भाव से संदेश दिया गया, उसी भाव से सुनाना। 4. गोपनीयता: गुप्त संदेश को किसी और को न बताना। 5. संवेदनशीलता और विवेक: समय, स्थान और सुनने वाले की स्थिति देखकर बात कहना। 6. विश्वसनीयता और समयबद्धता: संदेश समय पर पहुँचाना। 7. धैर्य और शारीरिक क्षमता: लंबी यात्राएँ और कठिनाइयाँ सहने की शक्ति।

मैं संदेश ईमानदारी से, बिना घटाए-बढ़ाए, संवेदनशीलता के साथ पहुँचाऊँगा और संभव हो तो समस्या के समाधान में मदद करूँगा। ध्यान रखने योग्य बातें: हर शब्द याद रखना, सत्यनिष्ठा, उसी सुर-स्वर और भाव में कहना, गोपनीयता, संवेदनशीलता और विवेक, समय पर पहुँचाना, धैर्य और यात्रा सहने की क्षमता।

Q15

इस कहानी का नाट्य रूपांतरण कर विद्यालय के मंच पर प्रस्तुत कीजिए।

Answer

उत्तर

(नाट्य रूपांतरण की रूपरेखा और एक दृश्य का नमूना)

पात्र: हरगोबिन, बड़ी बहुरिया, मोदिआइन, बूढ़ी माता, बड़ी बहुरिया का भाई, चिड़चिड़ा यात्री, सूरदास (गायक)।

दृश्य-योजना: 1. दृश्य 1— बड़ी हवेली का आँगन: टूटी ड्योढ़ी; बड़ी बहुरिया सूप से अनाज फटक रही है; मोदिआइन उधार माँग रही है; हरगोबिन का ‘काबुली-कायदा’ वाला संवाद; बड़ी बहुरिया का सिसकते हुए संवाद देना। 2. दृश्य 2— रेलगाड़ी: हरगोबिन का स्वगत कथन, यात्री से बातचीत, ‘हमारो संवाद ले ले जाहु रे संवदिया’ गीत की गूँज। 3. दृश्य 3— थाना बिंहपुर, मायका: बूढ़ी माता से भेंट; हरगोबिन का झूठ; भरी थाली छोड़ना; रात का अंतर्द्वंद्व (प्रकाश-व्यवस्था से)। 4. दृश्य 4— वापसी: गाड़ी में सूरदास का निर्गुण; कटिहार से बीस कोस पैदल यात्रा (मंच पर चलता हुआ हरगोबिन, पृष्ठभूमि में कोस गिनती की आवाज़)। 5. दृश्य 5— हवेली का दालान: बेहोश हरगोबिन, बड़ी बहुरिया दूध पिलाती है; हरगोबिन का संकल्प; बड़ी बहुरिया का पछतावा।

दृश्य 5 का नमूना संवाद

बड़ी बहुरिया: (दूध का कटोरा लिए) हरगोबिन भाई, अब जी कैसा है? लो, एक घूँट और पी लो।

हरगोबिन: (होश में आकर पैर पकड़ते हुए) बड़ी बहुरिया! मुझे माफ़ करो। मैं तुम्हारा संवाद नहीं कह सका।

बड़ी बहुरिया: (आश्चर्य से) क्यों भाई?

हरगोबिन: किस मुँह से कहता? तुम गाँव छोड़कर मत जाओ। मैं तुम्हारा बेटा! तुम मेरी माँ, सारे गाँव की माँ हो! मैं अब निठल्ला नहीं बैठूँगा, तुम्हारा सब काम करूँगा। बोलो बड़ी माँ, तुम गाँव छोड़कर चली तो नहीं जाओगी?

बड़ी बहुरिया: (आँसू पोंछते हुए, दूध में बासमती चूड़ा मसकते हुए) नहीं रे… मैं कहीं नहीं जाऊँगी। संवाद भेजकर तो मैं खुद पछता रही थी।

(मंच पर धीमे-धीमे प्रकाश मंद होता है; पृष्ठभूमि में लोकगीत।)

मंचन-सुझाव: ग्रामीण वेशभूषा (धोती, साड़ी, गमछा), लोकगीतों का प्रयोग, आंचलिक बोली के शब्द, रेल की ध्वनि, प्रकाश से समय-परिवर्तन।

रूपांतरण पाँच दृश्यों में — (1) हवेली का आँगन: मोदिआइन, बड़ी बहुरिया का संवाद; (2) रेलगाड़ी: हरगोबिन का स्वगत, यात्री, संवदिया-गीत; (3) मायका: बूढ़ी माता से झूठ, भरी थाली छोड़ना, रात का द्वंद्व; (4) वापसी: सूरदास का निर्गुण, बीस कोस पैदल; (5) दालान: दूध पिलाती बड़ी बहुरिया, हरगोबिन का “मैं तुम्हारा बेटा” संकल्प। ग्रामीण वेशभूषा, लोकगीत, आंचलिक बोली, रेल-ध्वनि और प्रकाश-व्यवस्था का प्रयोग करें।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ संवदिया, आशंका, संदेश का कारण, अतीत-स्मृतियाँ, छलछलाई आँखें (प्रश्न 1–5)
  • ☒ काँटे की चुभन, संवाद न सुना पाना, ‘अफर कर सोना’, संकल्प, डिजिटल इंडिया (प्रश्न 6–10)
  • ☒ भाषा-शिल्प (प्रश्न 11–13)
  • ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 14–15)

Total questions answered: 15 of 15

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 12 (संवदिया) cover?

All 19 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – भाषा-शिल्प and अभ्यास – योग्यता-विस्तार.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

Yes. The answers follow the current NCERT textbook for Class 12 Hindi Antra and the latest CBSE syllabus, so the question numbers and wording match the book you use in class.

How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

Are the NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 12 (संवदिया) free?

Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.