Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Antra (NCERT) | 2 – सरोज स्मृति | 2026-27 | 10 of 10 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवि | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (1898–1961), महिषादल (बंगाल); छायावाद के प्रमुख कवि, मुक्त छंद के प्रवर्तक |
सरोज स्मृति | हिंदी का प्रसिद्ध शोकगीत (एलेजी); पुत्री सरोज की असमय मृत्यु पर पिता का करुण उद्गार; पाठ में सरोज के विवाह और मृत्यु का अंश |
प्रमुख प्रसंग | सरोज का नव-वधू रूप (“नत नयनों से आलोक उतर / काँपा अधरों पर थर-थर-थर”); स्वर्गीया पत्नी की याद; बिना आमंत्रण, बिना विवाह-राग का सादा विवाह; माँ की शिक्षा स्वयं देना; ननिहाल में पालन-पोषण और मृत्यु |
अंत | “दुख ही जीवन की कथा रही / क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!”; “कन्ये, गत कर्मों का अर्पण / कर, करता मैं तेरा तर्पण!” |
अभ्यास – सरोज स्मृति
सरोज के नव-वधू रूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
Answer
उत्तर
विवाह के समय सरोज पर शुभ कलश का जल पड़ा। वह पिता (कवि) को देखकर मंद-मंद मुस्कुराई; उसके होठों में मानो बिजली फँसकर स्पंदित हो रही थी। उसके हृदय में प्रिय (पति) की सुंदर छवि झूल रही थी, जो बिना शब्दों के ही उसके श्रृंगार को मुखर कर रही थी। वह एक गहरी साँस (उच्छ्वास) के साथ खिल उठी; उसके अंग-अंग विश्वास से स्तब्ध और बँधे हुए थे। उसकी झुकी हुई आँखों से प्रकाश (आलोक) उतरकर उसके होठों पर थर-थर काँप रहा था। कवि को वह अपने यौवन के पहले गीत (स्वर्गीया पत्नी) की साकार मूर्ति लगी— मानो वह श्रृंगार, जो अब तक निराकार था और कविता में बहता था, साकार होकर धरती पर उतर आया हो।
विवाह में कलश का जल पड़ने पर सरोज पिता को देखकर मंद मुस्कुराई, होठों पर बिजली-सी चमक थी; हृदय में प्रिय की छवि से उसका श्रृंगार बिना शब्दों के मुखर था; वह उच्छ्वास के साथ खिल उठी, अंग-अंग में विश्वास था, झुकी आँखों से उतरा प्रकाश होठों पर काँप रहा था — कवि को वह अपनी स्वर्गीया पत्नी (प्रथम गीत) की साकार मूर्ति लगी।
कवि को अपनी स्वर्गीया पत्नी की याद क्यों आई?
Answer
उत्तर
- सरोज का नव-वधू रूप देखकर कवि को अपनी पत्नी (मनोहरा देवी) का नव-वधू रूप याद आ गया; सरोज का रूप-सौंदर्य, लज्जा और मुस्कान अपनी माँ जैसे थे।
- कवि ने सरोज में “मेरे वसंत की प्रथम गीति”— अपने यौवन के पहले प्रेम-गीत (पत्नी) की छवि देखी।
- पत्नी के साथ जो श्रृंगार कवि ने अपनी कविताओं में गाया था, वही मानो सरोज के रूप में साकार हो गया।
- माँ के न होने के कारण कवि को स्वयं माँ की भूमिका निभानी पड़ी— “माँ की कुल शिक्षा मैंने दी”— इससे भी पत्नी का अभाव खला।
- ऐसे शुभ अवसर पर पत्नी की अनुपस्थिति ने उनकी याद को तीव्र कर दिया।
क्योंकि नव-वधू सरोज के रूप, लज्जा और मुस्कान में कवि को अपनी स्वर्गीया पत्नी का नव-वधू रूप (“मेरे वसंत की प्रथम गीति”) दिखाई दिया; उनके साथ गाया श्रृंगार मानो सरोज में साकार हो गया, और माँ की अनुपस्थिति में स्वयं माँ की भूमिका निभाते हुए पत्नी का अभाव खला।
‘आकाश बदल कर बना मही’ में ‘आकाश’ और ‘मही’ शब्द किनकी ओर संकेत करते हैं?
Answer
उत्तर
- ‘आकाश’— कवि की स्वर्गीया पत्नी की ओर संकेत करता है, जो अब स्वर्ग (आकाश) में हैं; तथा उस निराकार श्रृंगार की ओर, जो अब तक केवल कवि की कल्पना और कविताओं में था।
- ‘मही’ (पृथ्वी)— सरोज की ओर संकेत करता है, जो धरती पर उसी सौंदर्य और श्रृंगार का साकार रूप बनकर उपस्थित है।
आशय: पत्नी का जो रूप-सौंदर्य स्वर्ग चला गया था, वह मानो रूप बदलकर सरोज के रूप में पृथ्वी पर उतर आया।
‘आकाश’ — स्वर्ग में गई कवि की पत्नी और कविता में बसा निराकार श्रृंगार; ‘मही’ — धरती पर उपस्थित सरोज। आशय: पत्नी का सौंदर्य मानो सरोज के रूप में धरती पर साकार हो गया।
सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था?
Answer
उत्तर
- विवाह “आमूल नवल”— पूरी तरह नए ढंग का, परंपराओं से हटकर था।
- कोई आत्मीय स्वजन (रिश्तेदार) उपस्थित नहीं थे; न किसी को आमंत्रण भेजा गया।
- घर में दिन-रात विवाह के गीत (विवाह-राग) नहीं गूँज रहे थे; कोई धूमधाम, शोर-शराबा, दिखावा नहीं था।
- अत्यंत सादगी से, एक “मौन संगीत” के साथ विवाह संपन्न हुआ।
- माँ न होने के कारण पिता ने ही माँ की सारी शिक्षा दी और स्वयं बेटी की पुष्प-सेज सजाई।
- यह आर्थिक तंगी और कवि के क्रांतिकारी, रूढ़ि-विरोधी विचारों का परिणाम था।
सरोज का विवाह पूरी तरह नए ढंग का (आमूल नवल) और अत्यंत सादा था — न रिश्तेदार, न आमंत्रण, न विवाह-गीत, न धूमधाम; मौन संगीत के साथ संपन्न हुआ; माँ के न होने पर पिता ने ही माँ की शिक्षा दी और पुष्प-सेज सजाई।
‘वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली’ पंक्ति के द्वारा किस प्रसंग को उद्घाटित किया गया है?
Answer
उत्तर
इस पंक्ति में सरोज के ननिहाल का प्रसंग है। माँ की मृत्यु के बाद सरोज का पालन-पोषण उसके ननिहाल में नानी, मामा-मामी के स्नेह में हुआ। विवाह के बाद भी वह कुछ दिन ससुराल रहकर फिर प्रसन्नतापूर्वक नानी की स्नेह-गोद में आ गई। मामा-मामी ने उसे ऐसे प्यार दिया जैसे बादल धरती को जल से भर देते हैं; वे उसके सुख-दुख में सदा साथ रहे।
“वह लता वहीं की, जहाँ कली / तू खिली, स्नेह से हिली, पली, / अंत भी उसी गोद में शरण / ली, मूँदे दृग वर महामरण!”— अर्थात सरोज उसी ननिहाल रूपी लता की कली थी, वहीं खिली, पली-बढ़ी और अंत में वहीं (ननिहाल में) उसकी मृत्यु भी हुई।
सरोज के ननिहाल का प्रसंग — माँ की मृत्यु के बाद वह नानी, मामा-मामी के स्नेह में वहीं पली-बढ़ी (कली के रूप में खिली), विवाह के बाद भी वहीं लौटी और अंत में वहीं उसकी मृत्यु भी हुई।
‘मुझ भाग्यहीन की तू संबल’ निराला की यह पंक्ति क्या ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे कार्यक्रम की माँग करती है।
Answer
उत्तर
हाँ, यह पंक्ति आज के ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम की भावना से जुड़ती है। 1. निराला ने बेटी सरोज को अपना संबल (सहारा) कहा है। उस समय समाज में बेटे को ही बुढ़ापे का सहारा माना जाता था; निराला ने बेटी को सहारा कहकर इस रूढ़ि को तोड़ा। 2. यह पंक्ति बेटी के प्रति पिता के गहरे प्रेम और सम्मान को दर्शाती है— बेटी बोझ नहीं, परिवार की शक्ति है। 3. निराला ने स्वयं माँ की तरह सरोज को शिक्षा और संस्कार दिए; यह बेटियों की शिक्षा और पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी का भाव है। 4. सरोज की असमय मृत्यु (कहा जाता है कि उचित इलाज न मिल पाने से) पिता की आर्थिक विवशता और बेटियों के स्वास्थ्य-सुरक्षा के महत्व को भी उजागर करती है।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम का उद्देश्य भी यही है कि बेटियों को बोझ न समझा जाए, उन्हें जीवन, सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा का समान अधिकार मिले ताकि वे परिवार और समाज का संबल बन सकें।
हाँ। निराला ने बेटी को अपना “संबल” (सहारा) कहकर उस रूढ़ि को तोड़ा कि केवल बेटा ही सहारा होता है; उन्होंने स्वयं उसे शिक्षा-संस्कार दिए, और उसकी असमय मृत्यु बेटियों के स्वास्थ्य-सुरक्षा का महत्व दिखाती है — यही ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की भावना है कि बेटियाँ बोझ नहीं, परिवार का संबल हैं।
निम्नलिखित पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए— (क) नत नयनों से आलोक उतर (ख) शृंगार रहा जो निराकार (ग) पर पाठ अन्य यह, अन्य कला (घ) यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
Answer
उत्तर
(क) “नत नयनों से आलोक उतर / काँपा अधरों पर थर-थर-थर”— नव-वधू सरोज की लज्जा से झुकी आँखों से प्रेम और प्रसन्नता की ज्योति (आलोक) उतरकर उसके होठों पर काँप रही थी। अर्थात उसकी आँखों का भाव मुस्कान बनकर होठों पर थिरक रहा था; लज्जा और उल्लास का मिला-जुला भाव।
(ख) “शृंगार, रहा जो निराकार, / रस कविता में उच्छ्वसित-धार”— जो श्रृंगार (सौंदर्य और प्रेम का भाव) अब तक निराकार था, केवल कवि की कविताओं में रस की धारा बनकर बहता था (स्वर्गीया पत्नी के साथ गाया गया), वही अब सरोज के रूप में साकार हो उठा।
(ग) “सोचा मन में, ‘वह शकुंतला, / पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।’”— कवि ने बेटी की विदाई के समय सोचा कि सरोज शकुंतला जैसी है (जिसे कण्व ऋषि ने पाला था और माँ के बिना विदा किया था), पर उसकी परिस्थिति, पाठ और कला भिन्न है। शकुंतला को आश्रम की सखियाँ और प्रकृति का साथ था, जबकि सरोज की विदाई और जीवन-कथा अलग है— कवि (पिता) ने स्वयं माँ की भूमिका निभाई; उसका विवाह भी सादा था।
(घ) “हो इसी कर्म पर वज्रपात / यदि धर्म, रहे नत सदा माथ”— कवि कहता है कि यदि मेरे इस कर्म (परंपराओं को तोड़कर सादगी से बेटी का विवाह करना, या सामाजिक नियमों का पालन न करना) पर वज्रपात भी हो, तो भी मैं धर्म (कर्तव्य) के आगे सदा सिर झुकाए रहूँगा। अर्थात चाहे मेरे सारे कार्य शीत से मुरझाए कमलों की तरह नष्ट हो जाएँ, मैं अपने कर्तव्य-पथ से नहीं हटूँगा।
(क) नव-वधू सरोज की लज्जा से झुकी आँखों का प्रेम-प्रकाश होठों पर मुस्कान बनकर काँप रहा था। (ख) जो श्रृंगार अब तक निराकार था और केवल कविता में बहता था, वह सरोज के रूप में साकार हो गया। (ग) सरोज शकुंतला जैसी है (माँ के बिना पली, विदा हुई), पर उसकी कथा और परिस्थिति भिन्न है — पिता ने ही माँ की भूमिका निभाई। (घ) मेरे कर्मों पर वज्रपात हो जाए, सब नष्ट हो जाए, तब भी मैं धर्म (कर्तव्य) के आगे सिर झुकाए रहूँगा।
अभ्यास – योग्यता-विस्तार
निराला के जीवन से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए रामविलास शर्मा की पुस्तक ‘महाकवि निराला’ पढ़िए।
Answer
उत्तर
(पठन-गतिविधि)
रामविलास शर्मा ने निराला पर विस्तृत कार्य किया है— ‘निराला की साहित्य साधना’ (तीन खंड, साहित्य अकादेमी पुरस्कार) उनकी प्रसिद्ध कृति है। इनसे निराला के जीवन के प्रमुख तथ्य मिलते हैं— 1. बंगाल के महिषादल में जन्म; बचपन में माँ की मृत्यु। 2. कम उम्र में मनोहरा देवी से विवाह; पत्नी की प्रेरणा से हिंदी में रुचि। 3. 1918 की महामारी (इन्फ़्लुएंज़ा) में पत्नी, भाई-भाभी सहित परिवार के अनेक सदस्यों की मृत्यु। 4. आर्थिक संघर्ष, ‘मतवाला’ पत्रिका का संपादन, साहित्यिक विरोध। 5. 1935 में पुत्री सरोज की मृत्यु और ‘सरोज स्मृति’ की रचना। 6. फक्कड़, स्वाभिमानी और दानी स्वभाव; जीवन के अंत में मानसिक अस्वस्थता; 1961 में इलाहाबाद में निधन।
विद्यार्थी पुस्तकालय से पुस्तक लेकर पढ़ें और निराला के जीवन-संघर्ष और उनकी कविता के संबंध पर चर्चा करें।
पठन-गतिविधि: रामविलास शर्मा की पुस्तकों (‘निराला की साहित्य साधना’ आदि) से निराला के जीवन — बचपन में माँ की मृत्यु, पत्नी मनोहरा देवी और महामारी में परिवार का विनाश, आर्थिक-साहित्यिक संघर्ष, सरोज की मृत्यु, फक्कड़-स्वाभिमानी स्वभाव — को जानें और उनकी कविता से संबंध पर चर्चा करें।
अपने बचपन की स्मृतियों को आधार बनाकर एक छोटी सी कविता लिखने का प्रयास कीजिए।
Answer
उत्तर
बचपन
वो कागज़ की नावें, वो बारिश का पानी, वो दादी की गोदी, परियों की कहानी। वो आँगन का झूला, वो पीपल की छाँव, वो नंगे पाँव दौड़ना, वो मिट्टी का गाँव।
वो माँ की थपकी, वो लोरी के बोल, वो पापा के कंधे, वो मेले के ढोल। न चिंता थी कल की, न बीते का ग़म, बचपन के दिन थे, खुशियों के मौसम।
अब बस्ते हैं भारी, समय की है दौड़, पर यादें बुलातीं, उसी गली के मोड़।
बचपन की स्मृतियों पर आधारित एक छोटी कविता — कागज़ की नाव, दादी की कहानियाँ, आँगन का झूला, माँ की लोरी, पापा के कंधे, मेले; चिंतामुक्त दिनों की याद और आज की भागदौड़ से तुलना।
‘सरोज स्मृति’ पूरी पढ़कर आम आदमी के जीवन-संघर्षों पर चर्चा कीजिए।
Answer
उत्तर
‘सरोज स्मृति’ में आम आदमी के जीवन-संघर्ष: 1. आर्थिक संघर्ष: निराला एक साहित्यकार होते हुए भी आर्थिक तंगी से जूझते रहे; बेटी के विवाह में धूमधाम नहीं कर सके, उसका उचित इलाज भी नहीं करा सके— “धन्ये, मैं पिता निरर्थक था, / कुछ भी तेरे हित न कर सका!” (पूरी कविता में)। 2. पारिवारिक दुख: पत्नी की असमय मृत्यु, बेटी का पालन-पोषण ननिहाल में; अंत में बेटी की मृत्यु। 3. सामाजिक रूढ़ियाँ: विवाह में दहेज, जाति-बिरादरी, कुंडली मिलान जैसी रूढ़ियों का विरोध करने पर समाज की आलोचना। 4. स्वाभिमान और संघर्ष: कवि ने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया; साहित्यिक जगत के विरोध और उपेक्षा का सामना किया। 5. निष्कर्ष-पंक्ति: “दुख ही जीवन की कथा रही / क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!”— यह केवल निराला की नहीं, हर आम आदमी की कथा है।
आज के संदर्भ में चर्चा: आज भी आम आदमी महँगाई, बेरोज़गारी, बच्चों की शिक्षा-विवाह के ख़र्च, महँगे इलाज और सामाजिक दबावों से जूझता है। कविता हमें संवेदनशील बनाती है और सिखाती है कि दुखों के बीच भी स्वाभिमान और कर्तव्य-निष्ठा बनाए रखनी चाहिए; साथ ही समाज और सरकार को आम आदमी के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
‘सरोज स्मृति’ में आर्थिक तंगी (बेटी के लिए कुछ न कर पाने की पीड़ा), पारिवारिक दुख (पत्नी और बेटी की मृत्यु), सामाजिक रूढ़ियों से संघर्ष और स्वाभिमान का चित्रण है — “दुख ही जीवन की कथा रही”। आज भी आम आदमी महँगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा-विवाह-इलाज के ख़र्च और सामाजिक दबाव से जूझता है; कविता संवेदना, स्वाभिमान और सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता पर बल देती है।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ सरोज का नव-वधू रूप, पत्नी की याद, आकाश-मही (प्रश्न 1–3)
- ☒ भिन्न विवाह, ननिहाल का प्रसंग, बेटी संबल (प्रश्न 4–6)
- ☒ अर्थ स्पष्ट (प्रश्न 7)
- ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 8–10)