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Class 12 Hindi Antra Chapter 5

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 5: वसंत आया, तोड़ो

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XII

Hindi

Antra (NCERT)

5 – वसंत आया, तोड़ो

2026-27

14 of 14

बिंदु

विवरण

कवि

रघुवीर सहाय (1929–1990), लखनऊ; ‘दूसरा सप्तक’ के कवि, पत्रकार; साहित्य अकादेमी (‘लोग भूल गए हैं’)

वसंत आया

आधुनिक शहरी मनुष्य प्रकृति से कट गया है; वसंत का पता उसे चिड़िया की कूक, गिरे पीले पत्तों, खिली हवा से संयोग से चलता है — अन्यथा कैलेंडर (मदन महीने की पंचमी), दफ़्तर की छुट्टी और कविताओं से ही जानता था; व्यंग्य

तोड़ो

सृजन के लिए विध्वंस आवश्यक — पत्थर, चट्टान, ऊसर-बंजर, झूठे बंधन तोड़ो; मन की ऊब और खीज भी तोड़ो; “तोड़ो” से आरंभ, “गोड़ो” (निराई-गुड़ाई) से अंत

शिल्प

बोलचाल की भाषा, व्यंग्य, प्रतीक, पुनरुक्ति, उपमा, अनुप्रास

अभ्यास – वसंत आया

Q1

वसंत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली?

Answer

उत्तर

कवि को वसंत के आगमन की सूचना अचानक, फुटपाथ पर चलते-चलते मिली— 1. किसी बँगले के किसी पेड़ (शायद अशोक) पर कोई चिड़िया ऐसे कूकी जैसे बहन ‘दा’ (दादा/भैया) कहकर पुकारती है। 2. सड़क के किनारे लाल बजरी पर पैरों के नीचे ऊँचे पेड़ों से गिरे बड़े-बड़े पीले पत्ते चुरमुरा रहे थे। 3. सुबह छह बजे की ऐसी ताज़ी, खिली हुई हवा आई, मानो गरम पानी से नहाकर आई हो; वह फिरकी-सी आई और चली गई।

इन संकेतों से कवि ने जाना कि वसंत आ गया है। इससे पहले उसे केवल कैलेंडर (मदन महीने की पंचमी), दफ़्तर की छुट्टी और कविताओं से ही वसंत का पता था।

फुटपाथ पर चलते-चलते — पेड़ पर कूकती चिड़िया (जैसे बहन ‘दा’ कहती है), पैरों तले चुरमुराते गिरे हुए बड़े-बड़े पीले पत्ते और गरम पानी से नहाई-सी, फिरकी-सी आकर चली जाने वाली खिली हवा से कवि ने जाना कि वसंत आया; अन्यथा वह केवल कैलेंडर, दफ़्तर की छुट्टी और कविताओं से जानता था।

Q2

‘कोई छह बजे सुबह… फिरकी सी आई, चली गई’—पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।

Answer

उत्तर

“कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो— / खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई।”

भाव: वसंत में सुबह छह बजे की हवा न तो सर्दियों जैसी ठंडी है, न गरमियों जैसी गर्म; वह गुनगुनी, ताज़ी और सुखद है— मानो गरम पानी से नहाकर आई हो। यह हवा खिली हुई (प्रसन्न, ताज़गी भरी) है और फिरकी (चकरी) की तरह घूमती हुई, चंचलता से आई और तुरंत चली गई।

इससे वसंत ऋतु की सुहावनी, गुनगुनी, ताज़गी भरी और चंचल हवा का अनुभव होता है; साथ ही यह भी कि आधुनिक व्यस्त मनुष्य को प्रकृति का यह सुख क्षणभर के लिए ही मिल पाता है।

वसंत में सुबह की हवा गुनगुनी, ताज़ी और सुखद होती है — मानो गरम पानी से नहाकर आई हो; वह खिली हुई, चंचल फिरकी की तरह घूमती आती है और तुरंत चली जाती है — वसंत की सुहावनी, चंचल हवा का क्षणिक अनुभव।

Q3

अलंकार बताइए- (क) बड़े-बड़े पियराए पत्ते (ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो (ग) खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई (घ) कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल

Answer

उत्तर

पंक्ति

अलंकार

(क) बड़े-बड़े पियराए पत्ते

पुनरुक्ति प्रकाश (‘बड़े-बड़े’) और अनुप्रास (‘प’ वर्ण की आवृत्ति — पियराए पत्ते)

(ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो

उत्प्रेक्षा (हवा के गरम पानी से नहाने की संभावना — ‘जैसे’) तथा मानवीकरण

(ग) खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई

उपमा (‘फिरकी-सी’) और मानवीकरण (हवा का खिलना, आना, जाना)

(घ) कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल

पुनरुक्ति प्रकाश (‘दहर-दहर’) और अनुप्रास (‘द’ वर्ण की आवृत्ति)

(क) पुनरुक्ति प्रकाश और अनुप्रास; (ख) उत्प्रेक्षा और मानवीकरण; (ग) उपमा (‘फिरकी-सी’) और मानवीकरण; (घ) पुनरुक्ति प्रकाश (‘दहर-दहर’) और अनुप्रास।

Q4

किन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि आज मनुष्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य की अनुभूति से वंचित है?

Answer

उत्तर

“और यह कैलेंडर से मालूम था / अमुक दिन अमुक बार मदनमहीने की होवेगी पंचमी / दफ़्तर में छुट्टी थी— यह था प्रमाण / और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था / कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल / आम बौर आवेंगे / … / यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा / जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।”

इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि आधुनिक मनुष्य को वसंत का पता प्रकृति के प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं, बल्कि कैलेंडर, दफ़्तर की छुट्टी और किताबों/कविताओं से चलता है। वह प्रकृति के सौंदर्य— ढाक के दहकते जंगल, आम के बौर, कोयल-भौंरों— को स्वयं नहीं देखता; उसका ज्ञान केवल सूचनात्मक और किताबी है।

“यह कैलेंडर से मालूम था / अमुक दिन अमुक बार मदनमहीने की होवेगी पंचमी / दफ़्तर में छुट्टी थी— यह था प्रमाण / और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था…” — आधुनिक मनुष्य वसंत को प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं, कैलेंडर, छुट्टी और कविताओं से जानता है।

Q5

‘प्रकृति मनुष्य की सहचरी है’ इस विषय पर विचार व्यक्त करते हुए आज के संदर्भ में इस कथन की वास्तविकता पर प्रकाश डालिए।

Answer

उत्तर

प्रकृति मनुष्य की सहचरी: 1. मनुष्य का जन्म, पालन-पोषण और अस्तित्व प्रकृति पर निर्भर है— हवा, पानी, भोजन, औषधि, आश्रय सब प्रकृति देती है। 2. प्रकृति ने मनुष्य को सौंदर्य-बोध, आनंद और प्रेरणा दी— कविता, संगीत, कला का स्रोत प्रकृति है। 3. प्राचीन भारतीय संस्कृति में वृक्षों, नदियों, पर्वतों की पूजा होती थी; ऋतुओं के साथ त्योहार मनाए जाते थे। 4. प्रकृति सुख-दुख की साथी रही है— कवियों ने उससे संवाद किया।

आज के संदर्भ में वास्तविकता: 1. शहरीकरण और मशीनी जीवन ने मनुष्य को प्रकृति से दूर कर दिया है; कंक्रीट के जंगल, वातानुकूलित कमरे, स्क्रीन पर बीतता समय। 2. ‘वसंत आया’ कविता की तरह आज का मनुष्य ऋतुओं का अनुभव नहीं करता; उसे कैलेंडर से पता चलता है। 3. मनुष्य प्रकृति का सहचर नहीं, शोषक बन गया है— वनों की कटाई, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन। 4. परिणामस्वरूप तनाव, बीमारियाँ और प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ रही हैं।

निष्कर्ष: प्रकृति आज भी मनुष्य की सहचरी है, पर मनुष्य ने उसका साथ छोड़ दिया है। आवश्यक है कि हम प्रकृति से फिर जुड़ें, उसका संरक्षण करें और उसके सौंदर्य का अनुभव करें।

प्रकृति मनुष्य को जीवन के सभी साधन, सौंदर्य-बोध, आनंद और प्रेरणा देती रही है; भारतीय संस्कृति में उसकी पूजा होती थी। पर आज शहरीकरण और मशीनी जीवन ने मनुष्य को उससे दूर कर दिया है — वह ऋतुओं को कैलेंडर से जानता है और प्रकृति का शोषक बन गया है (वन-कटाई, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन)। प्रकृति आज भी सहचरी है, मनुष्य ने ही उसका साथ छोड़ा है; हमें फिर उससे जुड़कर उसका संरक्षण करना चाहिए।

Q6

‘वसंत आया’ कविता में कवि की चिंता क्या है?

Answer

उत्तर

कवि की चिंता यह है कि आधुनिक, शहरी, व्यस्त मनुष्य प्रकृति से कट गया है और उसके नैसर्गिक सौंदर्य का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर पाता। 1. मनुष्य को वसंत जैसी ऋतु के आगमन का पता कैलेंडर, दफ़्तर की छुट्टी और कविताओं से चलता है— प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं। 2. प्रकृति के प्रति उसकी संवेदना मर रही है; वह यांत्रिक, औपचारिक जीवन जी रहा है। 3. कवि को भी वसंत का अनुभव संयोग से, फुटपाथ पर चलते-चलते हुआ— यह आधुनिक जीवन की विडंबना है। 4. कवि कविताओं की पारंपरिक वसंत-वर्णन शैली (“मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व / अभ्यास करके दिखावेंगे”) पर भी व्यंग्य करता है— वसंत अब केवल साहित्यिक रूढ़ि बनकर रह गया है।

कवि की चिंता है कि आधुनिक शहरी मनुष्य प्रकृति से कट गया है; वह वसंत को प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं, कैलेंडर, छुट्टी और कविताओं से जानता है; उसकी प्रकृति-संवेदना मर रही है और वसंत केवल औपचारिकता या साहित्यिक रूढ़ि बनकर रह गया है।

अभ्यास – तोड़ो

Q7

‘पत्थर’ और ‘चट्टान’ शब्द किसके प्रतीक हैं?

Answer

उत्तर

‘पत्थर’ और ‘चट्टान’ बाधाओं, रुकावटों, जड़ता, कठोरता और रूढ़ियों के प्रतीक हैं— 1. बाहरी बाधाएँ: समाज की रूढ़ियाँ, अंधविश्वास, जड़ परंपराएँ, शोषण और अन्याय की व्यवस्था, जो विकास में रुकावट हैं। 2. आंतरिक बाधाएँ: मन की जड़ता, निराशा, ऊब, नकारात्मकता, आलस्य और संकीर्णता, जो सृजन को रोकती हैं।

जैसे खेत बनाने के लिए धरती से पत्थर-चट्टानें तोड़कर हटानी पड़ती हैं, वैसे ही नए समाज और नए सृजन के लिए इन बाधाओं को तोड़ना आवश्यक है।

पत्थर और चट्टान सृजन और विकास की बाधाओं के प्रतीक हैं — बाहरी (रूढ़ियाँ, अंधविश्वास, जड़ परंपराएँ, शोषण) और आंतरिक (मन की जड़ता, ऊब, निराशा, संकीर्णता); इन्हें तोड़कर ही नया सृजन संभव है।

Q8

भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए- मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को / हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को? / गोड़ो गोड़ो गोड़ो

Answer

उत्तर

भाव-सौंदर्य: कवि कहता है कि मिट्टी में उर्वरता (रस) अवश्य होगी, तभी तो वह बीज का पोषण करेगी और उससे अंकुर फूटेंगे। परंतु हम अपने मन की खीज (झुँझलाहट, ऊब, निराशा) का क्या करें? उसका समाधान है— गोड़ो (निराई-गुड़ाई करो)। जैसे खेत की मिट्टी को गोड़कर उसे उपजाऊ बनाया जाता है, खरपतवार हटाई जाती है, वैसे ही मन की खीज और नकारात्मकता को भी गोड़कर (परिश्रम, चिंतन और सकारात्मक प्रयास से) हटाना होगा, ताकि मन में सृजन के बीज अंकुरित हो सकें।

शिल्प-सौंदर्य: 1. मिट्टी-बीज और मन का सुंदर रूपक/प्रतीक। 2. प्रश्न शैली (“क्या कर डालें…?”)। 3. ‘गोड़ो गोड़ो गोड़ो’ में पुनरुक्ति; आह्वान और लय। 4. सरल, बोलचाल की भाषा; खेती से जुड़े शब्द।

प्रश्न 1

भाव: मिट्टी में उर्वरता है, तभी वह बीज पोसेगी; पर मन की खीज (ऊब, निराशा) का क्या करें? — उसे भी खेत की तरह ‘गोड़ना’ (निराई-गुड़ाई) होगा, ताकि नकारात्मकता हटे और मन में सृजन के बीज उगें। शिल्प: मिट्टी-बीज और मन का प्रतीक, प्रश्न शैली, ‘गोड़ो’ की पुनरुक्ति से आह्वान और लय, सरल भाषा।

उत्तर

Q9

कविता का आरंभ ‘तोड़ो तोड़ो तोड़ो’ से हुआ है और अंत ‘गोड़ो गोड़ो गोड़ो’ से। विचार कीजिए कि कवि ने ऐसा क्यों किया?

Answer

उत्तर

  1. सृजन की प्रक्रिया: खेती में पहले कठोर ज़मीन, पत्थर-चट्टानें, ऊसर-बंजर को तोड़ा जाता है; फिर उसे गोड़ा (निराई-गुड़ाई) जाता है ताकि बीज बोया जा सके और फसल उगे। कवि ने इसी क्रम को अपनाया है।
  2. विध्वंस से निर्माण: ‘तोड़ो’ विध्वंस (पुरानी बाधाओं, रूढ़ियों, झूठे बंधनों को नष्ट करना) का प्रतीक है और ‘गोड़ो’ निर्माण, पोषण और सृजन का। अर्थात कवि केवल तोड़-फोड़ नहीं चाहता; तोड़ने का उद्देश्य नया सृजन है।
  3. बाहरी से आंतरिक: आरंभ में बाहरी बाधाओं (पत्थर, चट्टान) को तोड़ने की बात है और अंत में मन की खीज को गोड़ने की— यानी परिवर्तन बाहर और भीतर दोनों जगह होना चाहिए।
  4. लय और आह्वान: दोनों शब्दों की तीन बार आवृत्ति से कविता में जोश, लय और आह्वान का भाव आता है।

खेती की तरह पहले कठोर ज़मीन और बाधाएँ तोड़ी जाती हैं, फिर गोड़कर बीज बोने योग्य बनाया जाता है — ‘तोड़ो’ विध्वंस (रूढ़ियाँ, झूठे बंधन) और ‘गोड़ो’ निर्माण-पोषण-सृजन का प्रतीक है; तोड़ने का उद्देश्य नया सृजन है, और परिवर्तन बाहर (पत्थर) से भीतर (मन की खीज) तक हो; आवृत्ति से जोश और आह्वान भी आता है।

Q10

ये झूठे बंधन टूटें / तो धरती को हम जानें — यहाँ पर झूठे बंधनों और धरती को जानने से क्या अभिप्राय है?

Answer

उत्तर

झूठे बंधन: वे सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक बंधन जो मनुष्य को जकड़कर रखते हैं, पर जिनका कोई वास्तविक आधार नहीं— जैसे रूढ़ियाँ, अंधविश्वास, जाति-पाँति, ऊँच-नीच, दिखावा, संकीर्ण सोच, मन की जड़ता और भय। इन्हें ‘झूठा’ इसलिए कहा गया क्योंकि ये मनुष्य की प्रगति में बाधक हैं और उसकी स्वाभाविक क्षमता को दबाते हैं।

धरती को जानना: धरती की वास्तविक उर्वरता और संभावनाओं को पहचानना; अर्थात जीवन के यथार्थ, अपनी सृजनात्मक क्षमता, प्रकृति और मानवता के सत्य को जानना। जब बंधन टूटेंगे, तभी मनुष्य स्वतंत्र होकर सृजन कर सकेगा और धरती (जीवन) के रस का अनुभव कर पाएगा।

झूठे बंधन — रूढ़ियाँ, अंधविश्वास, जाति-पाँति, संकीर्ण सोच, मन की जड़ता और भय, जो प्रगति में बाधक हैं; धरती को जानना — धरती (जीवन) की वास्तविक उर्वरता, अपनी सृजन-क्षमता और जीवन के यथार्थ को पहचानना, जो बंधन टूटने पर ही संभव है।

Q11

‘आधे-आधे गाने’ के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?

Answer

उत्तर

“अपने मन के मैदानों पर व्यापी कैसी ऊब है / आधे आधे गाने”— कवि कहना चाहता है कि मन में व्याप्त ऊब, निराशा और उदासीनता के कारण मनुष्य कोई भी काम पूरे मन, उत्साह और समर्पण से नहीं कर पाता। 1. उसके गीत (सृजन, कार्य, सपने) अधूरे रह जाते हैं— वह गाना शुरू करता है पर पूरा नहीं कर पाता। 2. मन के बंजर होने से उसकी रचनात्मकता अधूरी रहती है। 3. यह आधुनिक मनुष्य की अधूरी, खंडित और असंतुष्ट मनःस्थिति का प्रतीक है।

इसलिए कवि मन की ऊब और खीज को भी तोड़ने-गोड़ने का आह्वान करता है, ताकि मनुष्य पूरे गीत गा सके— पूर्ण सृजन कर सके।

मन में व्याप्त ऊब और निराशा के कारण मनुष्य का कोई भी सृजन या कार्य पूरे उत्साह से नहीं होता — उसके गीत (प्रयास, सपने) अधूरे रह जाते हैं; यह आधुनिक मनुष्य की खंडित, अधूरी मनःस्थिति है, जिसे बदलने के लिए मन की ऊब को तोड़ना आवश्यक है।

अभ्यास – योग्यता-विस्तार

Q12

वसंत ऋतु पर किन्हीं दो कवियों की कविताएँ खोजिए और इस कविता से उनका मिलान कीजिए?

Answer

उत्तर

  1. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ — “सखि, वसंत आया”: “सखि वसंत आया। / भरा हर्ष वन के मन, / नवोत्कर्ष छाया।… किसलय-वसना नव-वय-लतिका / मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका, / मधुप-वृंद बंदी— / पिक-स्वर नभ सरसाया।”
  2. सुभद्रा कुमारी चौहान — “वीरों का कैसा हो वसंत”: “आ रही हिमालय से पुकार / है उदधि गरजता बार-बार / प्राची पश्चिम भू नभ अपार / सब पूछ रहे हैं दिग्-दिगंत / वीरों का कैसा हो वसंत?”
  3. (अन्य: केदारनाथ अग्रवाल की “बसंती हवा”— “हवा हूँ, हवा मैं / बसंती हवा हूँ।”)

मिलान

‘वसंत आया’ (रघुवीर सहाय)

‘सखि, वसंत आया’ (निराला)

‘वीरों का कैसा हो वसंत’ (सुभद्रा)

दृष्टि

आधुनिक शहरी मनुष्य का प्रकृति से कटाव; व्यंग्य

प्रकृति के उल्लास का पारंपरिक, सरस चित्रण

वसंत को राष्ट्रीय चेतना और वीरता से जोड़ा

भाषा

बोलचाल की, सरल

तत्सम-प्रधान, छायावादी

ओजपूर्ण

भाव

विडंबना, चिंता

हर्ष, सौंदर्य

देशभक्ति, ओज

‘वसंत आया’ में पारंपरिक वसंत-वर्णन (पिक, भौंरे, ढाक, आम के बौर) पर व्यंग्य है, जबकि अन्य कविताओं में वसंत का सीधा, उल्लासपूर्ण या ओजपूर्ण वर्णन है।

उदाहरण: निराला की “सखि, वसंत आया” (प्रकृति के उल्लास का तत्सम-प्रधान, छायावादी सरस चित्रण) और सुभद्रा कुमारी चौहान की “वीरों का कैसा हो वसंत” (वसंत को वीरता-देशभक्ति से जोड़ना, ओजपूर्ण)। ‘वसंत आया’ इनसे भिन्न है — बोलचाल की भाषा में आधुनिक मनुष्य के प्रकृति से कटाव और पारंपरिक वसंत-वर्णन पर व्यंग्य करती है।

Q13

भारत में ऋतुओं का चक्र बताइए और उनके लक्षण लिखिए।

Answer

उत्तर

भारत में छह ऋतुएँ मानी जाती हैं—

ऋतु

मास (हिंदू)

लगभग अंग्रेज़ी मास

लक्षण

वसंत

चैत्र–वैशाख

मार्च–अप्रैल

सुहावना मौसम, नए पत्ते-फूल, आम के बौर, ढाक-पलाश, कोयल की कूक; ‘ऋतुराज’

ग्रीष्म

ज्येष्ठ–आषाढ़

मई–जून

तेज़ गरमी, लू, सूखे जलाशय, दिन लंबे

वर्षा

श्रावण–भाद्रपद

जुलाई–अगस्त

मानसून की वर्षा, हरियाली, नदियों में बाढ़, मोर-नृत्य

शरद

आश्विन–कार्तिक

सितंबर–अक्तूबर

स्वच्छ आकाश, चाँदनी रातें, सुहावना मौसम, काँस-हरसिंगार; दशहरा-दीपावली

हेमंत

मार्गशीर्ष–पौष

नवंबर–दिसंबर

ठंड की शुरुआत, ओस, कोहरा

शिशिर

माघ–फाल्गुन

जनवरी–फ़रवरी

कड़ी ठंड, पतझड़, पाला; अंत में वसंत पंचमी, होली

भारत की छह ऋतुएँ: वसंत (चैत्र-वैशाख; नए पत्ते-फूल, आम के बौर, कोयल), ग्रीष्म (ज्येष्ठ-आषाढ़; गरमी, लू), वर्षा (श्रावण-भाद्रपद; मानसून, हरियाली, बाढ़), शरद (आश्विन-कार्तिक; स्वच्छ आकाश, चाँदनी, त्योहार), हेमंत (मार्गशीर्ष-पौष; ठंड की शुरुआत, ओस-कोहरा), शिशिर (माघ-फाल्गुन; कड़ी ठंड, पतझड़, पाला)।

Q14

मिट्टी और बीज से संबंधित और भी कविताएँ हैं, जैसे सुमित्रानंदन पंत की ‘बीज’। अन्य कवियों की ऐसी कविताओं का संकलन कीजिए और भित्ति पत्रिका में उनका उपयोग कीजिए।

Answer

उत्तर

(संकलन-गतिविधि)

मिट्टी और बीज से संबंधित कविताएँ (सुझाव): 1. सुमित्रानंदन पंत — ‘बीज’ और “मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोए थे” (‘आः धरती कितना देती है’)— धरती की उदारता और बोने-काटने का भाव। 2. सुमित्रानंदन पंत — “आः धरती कितना देती है!” 3. माखनलाल चतुर्वेदी — ‘पुष्प की अभिलाषा’ (मातृभूमि की मिट्टी के प्रति समर्पण)। 4. उमाशंकर जोशी — ‘छोटा मेरा खेत’ (आरोह)— कविता की खेती, बीज-अंकुर का रूपक। 5. रामधारी सिंह दिनकर — “मिट्टी की ओर” (निबंध/कविताएँ) और “हम मिट्टी के पुतले”। 6. केदारनाथ अग्रवाल की किसान-जीवन संबंधी कविताएँ— “धरती”, “बसंती हवा”। 7. नागार्जुन — ‘अकाल और उसके बाद’ (अन्न और धरती)। 8. सुभद्रा कुमारी चौहान / सोहनलाल द्विवेदी की धरती-माता संबंधी कविताएँ।

भित्ति पत्रिका: शीर्षक— “मिट्टी और बीज: सृजन के गीत”; प्रत्येक कविता के अंश, कवि का नाम-चित्र और भाव-सार; बीच में ‘तोड़ो’ कविता की पंक्तियाँ “मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को”; खेत, अंकुर, किसान के चित्र।

संकलन: पंत की ‘बीज’ और “आः धरती कितना देती है”, उमाशंकर जोशी की ‘छोटा मेरा खेत’, माखनलाल चतुर्वेदी की ‘पुष्प की अभिलाषा’, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की धरती-अन्न संबंधी कविताएँ आदि; इन्हें “मिट्टी और बीज: सृजन के गीत” शीर्षक से कवि-परिचय, भाव-सार और चित्रों सहित भित्ति पत्रिका पर लगाएँ।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ वसंत आया — सूचना, हवा का भाव, अलंकार, प्रकृति से दूरी, सहचरी, चिंता (प्रश्न 1–6)
  • ☒ तोड़ो — प्रतीक, भाव-सौंदर्य, तोड़ो-गोड़ो, झूठे बंधन, आधे गाने (प्रश्न 7–11)
  • ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 12–14)

Total questions answered: 14 of 14

Frequently Asked Questions

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All 15 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – वसंत आया, अभ्यास – तोड़ो and अभ्यास – योग्यता-विस्तार.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

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How should I use these solutions to prepare for exams?

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