Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
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XII | Hindi | Antra (NCERT) | 6 – भरत-राम का प्रेम, पद | 2026-27 | 13 of 13 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवि | गोस्वामी तुलसीदास (1532–1623), राजापुर (बाँदा) |
भरत-राम का प्रेम | ‘रामचरितमानस’ (अयोध्या कांड) से; चित्रकूट की सभा में भरत राम के स्वभाव और प्रेम का वर्णन करते हैं, स्वयं को सब अनर्थों का मूल मानकर आत्मग्लानि प्रकट करते हैं; भाषा अवधी, दोहा-चौपाई |
पद (गीतावली से) | (1) “जननी निरखति बान धनुहियाँ” — राम के वनगमन के बाद उनकी वस्तुएँ देखकर कौशल्या का वात्सल्य और वियोग; (2) “राघौ! एक बार फिरि आवौ” — घोड़ों के दुख के बहाने कौशल्या का राम को लौटने का संदेश; भाषा ब्रज |
रस | करुण, वात्सल्य, भक्ति |
अभ्यास – भरत-राम का प्रेम
‘हारेंहु खेल जितावहिं मोही’ भरत के इस कथन का क्या आशय है?
Answer
उत्तर
भरत कहते हैं— “मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेंहूँ खेल जितावहिं मोंही॥” अर्थात मैंने प्रभु (राम) की कृपा की रीति को हृदय में भली-भाँति देखा है; बचपन में खेल में जब मैं हार जाता था, तब भी राम मुझे जिता देते थे।
आशय: 1. राम का भरत के प्रति अगाध स्नेह था; वे छोटे भाई को कभी दुखी नहीं देखना चाहते थे। 2. राम उदार, त्यागी और बड़प्पन वाले थे— स्वयं हारकर भी भाई को खुशी देते थे। 3. राम ने बचपन से ही भरत का मन कभी नहीं तोड़ा— “कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू”। 4. इससे भरत का यह विश्वास भी प्रकट होता है कि राम आज भी उन पर कृपा करेंगे।
भरत कहते हैं कि बचपन में खेल में हारने पर भी राम उन्हें जिता देते थे — इससे राम का भरत के प्रति अगाध स्नेह, उदारता, त्याग और बड़प्पन प्रकट होता है; वे कभी भाई का मन नहीं तोड़ते थे।
‘मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ।’ में राम के स्वभाव की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है?
Answer
उत्तर
भरत कहते हैं कि मैं अपने स्वामी (राम) का स्वभाव जानता हूँ— 1. क्षमाशीलता: “अपराधिहु पर कोह न काऊ”— वे अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते। 2. विशेष कृपा और स्नेह: “मो पर कृपा सनेहु बिसेखी”— मुझ पर उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। 3. धैर्य और सौम्यता: “खेलत खुनिस न कबहूँ देखी”— खेल में भी मैंने उन्हें कभी अप्रसन्न (खीझते) नहीं देखा। 4. सदा साथ देने वाले: “सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू”— बचपन से उन्होंने मेरा साथ नहीं छोड़ा। 5. मन रखने वाले: “कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू”— कभी मेरा मन नहीं तोड़ा। 6. उदारता: “हारेंहूँ खेल जितावहिं मोंही”— हारने पर भी जिता देते।
राम क्षमाशील हैं (अपराधी पर भी क्रोध नहीं करते), भरत पर विशेष कृपा-स्नेह रखते हैं, धैर्यवान-सौम्य हैं (खेल में भी खीझते नहीं), बचपन से साथ निभाते हैं, कभी मन नहीं तोड़ते और उदार हैं (हारने पर भी जिता देते हैं)।
राम के प्रति अपने श्रद्धाभाव को भरत किस प्रकार प्रकट करते हैं, स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
- भावुकता: सभा में बोलने के लिए खड़े होते ही उनका शरीर पुलकित हो जाता है और कमल जैसे नेत्रों में प्रेम के आँसू भर आते हैं— “पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥”
- राम के गुणों का गान: वे राम के क्षमाशील, स्नेही, उदार स्वभाव और बचपन से उनके प्रेम का वर्णन करते हैं।
- संकोच और विनम्रता: “महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन”— प्रेम और संकोच के कारण वे राम के सामने कभी कुछ न कह सके।
- अतृप्त दर्शन-प्यास: “दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन”— आज तक उनके प्रेम-प्यासे नेत्र राम के दर्शन से तृप्त नहीं हुए।
- आत्मग्लानि: स्वयं को सारे अनर्थों का मूल मानते हैं; माता की कुटिलता के कारण स्वयं को दोषी ठहराते हैं।
- समर्पण: “गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू॥”— गुरु वसिष्ठ और स्वामी सीता-राम हैं, इसलिए उन्हें परिणाम अच्छा ही लगता है।
भरत सभा में पुलकित होकर आँखों में प्रेम-आँसू भरकर बोलते हैं; राम के क्षमाशील, स्नेही, उदार स्वभाव का गान करते हैं; संकोचवश कभी सामने कुछ न कह पाने और प्रेम-प्यासे नेत्रों के अतृप्त रहने की बात कहते हैं; स्वयं को अनर्थों का मूल मानकर आत्मग्लानि प्रकट करते हैं और गुरु तथा सीता-राम के प्रति पूर्ण समर्पण दिखाते हैं।
‘महीं सकल अनरथ कर मूला’ पंक्ति द्वारा भरत के विचारों-भावों का स्पष्टीकरण कीजिए।
Answer
उत्तर
भरत कहते हैं— “महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला॥”— मैं ही सारे अनर्थों की जड़ हूँ; यह सुनकर और समझकर मैंने सब दुख (शूल) सहे हैं।
भरत के विचार-भाव: 1. आत्मग्लानि: भरत मानते हैं कि उनके कारण ही (माता कैकेयी ने उनके लिए राज्य माँगा) राम को वनवास हुआ, पिता दशरथ की मृत्यु हुई, माताएँ व्याकुल हैं और अयोध्या के नर-नारी दुसह दुख में जल रहे हैं। 2. निर्दोष होकर भी दोष स्वीकारना: यद्यपि भरत निर्दोष थे, फिर भी वे सारा दोष अपने ऊपर लेते हैं— यह उनकी महानता और विनम्रता है। 3. गहरी पीड़ा: “कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू”— वे कहते हैं कि राम को बिना जूतों के पैदल वन जाते सुनकर भी उनका वज्र-सा कठोर हृदय नहीं फटा। 4. राम के प्रति प्रेम: उनका दुख राम के कष्टों के कारण है, राज्य के कारण नहीं।
भरत स्वयं को राम-वनवास, पिता की मृत्यु, माताओं और प्रजा के दुख — सब अनर्थों का मूल मानते हैं, क्योंकि यह सब उनके कारण (कैकेयी की माँग से) हुआ; निर्दोष होकर भी दोष स्वीकारना उनकी आत्मग्लानि, विनम्रता, महानता और राम के प्रति गहरे प्रेम को प्रकट करता है।
‘फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली’। पंक्ति में छिपे भाव और शिल्प सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
प्रसंग: भरत कहते हैं— “मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली॥ फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली॥”
भाव: यदि मैं यह सोचूँ कि माता (कैकेयी) बुरी है और मैं सज्जन व सदाचारी हूँ, तो ऐसा विचार हृदय में लाना ही करोड़ों दुराचारों के समान है। क्या कोदो (एक घटिया अनाज) की बाली में उत्तम धान (साली) फल सकता है? क्या काली घोंघी (सीपी) मोती उत्पन्न कर सकती है? अर्थात बुरी माता की संतान अच्छी कैसे हो सकती है? भरत स्वयं को भी दोषी मानते हैं और माँ से अलग अपनी सज्जनता का दावा नहीं करते। यह उनकी विनम्रता और आत्मग्लानि है।
शिल्प-सौंदर्य: 1. दृष्टांत अलंकार— कोदो-धान और सीपी-मोती के उदाहरणों से बात स्पष्ट की गई। 2. प्रश्न शैली / वक्रोक्ति— प्रश्न के माध्यम से निषेध व्यक्त। 3. अनुप्रास— ‘कि कोदव’, ‘संबुक काली’। 4. अवधी भाषा, चौपाई छंद; लोक-जीवन से लिए उपमान।
भाव: भरत कहते हैं कि माँ को बुरा और स्वयं को सज्जन मानना करोड़ों कुकर्मों जैसा है — क्या कोदो की बाली में उत्तम धान फल सकता है, या काली सीपी मोती दे सकती है? अर्थात बुरी माँ की संतान भी दोषी है — उनकी विनम्रता और आत्मग्लानि। शिल्प: दृष्टांत अलंकार, प्रश्न शैली, अनुप्रास, लोक-जीवन के उपमान, अवधी, चौपाई।
उत्तर
अभ्यास – पद
राम के वन-गमन के बाद उनकी वस्तुओं को देखकर माँ कौशल्या कैसा अनुभव करती हैं? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
Answer
उत्तर
राम के वन चले जाने के बाद माँ कौशल्या उनके बचपन के छोटे-छोटे धनुष-बाण (बान धनुहियाँ) को निहारती रहती हैं। वे बार-बार राम की सुंदर जूतियों (ललित पनहियाँ) को हृदय और आँखों से लगाती हैं। 1. कभी वे पहले की तरह राम के कमरे में जाकर उन्हें प्रिय वचनों से जगाती हैं— “उठो बेटा! माँ तुम्हारे मुख पर बलिहारी जाए, छोटे भाई और सखा सब द्वार पर खड़े हैं।” 2. कभी कहती हैं— “बहुत देर हो गई, राजा (पिता) के पास जाओ; भाइयों को बुलाकर जो अच्छा लगे वह खा लो, माँ तुम पर न्योछावर।” 3. फिर अचानक जब उन्हें याद आता है कि राम तो वन चले गए हैं, तो वे चकित होकर चित्र में लिखी-सी (स्तब्ध, निश्चल) रह जाती हैं।
इस प्रकार कौशल्या वात्सल्य, स्मृति, भ्रम और वियोग की पीड़ा में डूबी रहती हैं।
कौशल्या राम के छोटे धनुष-बाण निहारती हैं, उनकी जूतियों को बार-बार हृदय और आँखों से लगाती हैं; कभी भ्रमवश पहले की तरह उन्हें जगाने और भोजन के लिए बुलाने जाती हैं, फिर याद आने पर कि राम वन गए हैं, चकित होकर चित्र-सी स्तब्ध रह जाती हैं — वात्सल्य और वियोग की गहरी पीड़ा।
‘रहि चकि चित्रलिखी सी’ पंक्ति का मर्म अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
मर्म: माँ कौशल्या राम के प्रेम में डूबी हुई भूल जाती हैं कि राम वन चले गए हैं; वे पहले की तरह उन्हें जगाने, भोजन कराने जाती हैं। पर जैसे ही उन्हें स्मरण होता है कि राम तो वन में हैं, वे चकित (हक्की-बक्की) होकर चित्र में बनी आकृति की तरह स्तब्ध और निश्चल रह जाती हैं— न हिलती हैं, न बोलती हैं।
इस पंक्ति में माँ के गहरे वात्सल्य, पुत्र-वियोग की असह्य पीड़ा, भ्रम और यथार्थ के टकराव का अत्यंत मार्मिक चित्र है। तुलसी कहते हैं कि उस समय का वर्णन करते हुए ऐसा लगता है मानो प्रेम ने भी उन्हीं से सीखा हो। ‘चित्रलिखी सी’ में उपमा अलंकार है।
भ्रमवश राम को पुकारती कौशल्या को जब याद आता है कि राम तो वन गए हैं, तो वे चकित होकर चित्र में बनी आकृति की तरह स्तब्ध, निश्चल रह जाती हैं — इसमें माँ के गहरे वात्सल्य, वियोग की असह्य पीड़ा और भ्रम-यथार्थ के टकराव का मार्मिक चित्र है (उपमा अलंकार)।
गीतावली से संकलित पद ‘राघौ एक बार फिरि आवौ’ में निहित करुणा और संदेश को अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
करुणा: माँ कौशल्या राम से विनती करती हैं— हे राघव! एक बार फिर लौट आओ। अपने इन श्रेष्ठ घोड़ों को देखकर फिर वन चले जाना। जिन घोड़ों को तुमने अपने कमल जैसे हाथों से दूध पिलाकर पाला और बार-बार पुचकारा, वे तुम्हारे बिना कैसे जीवित रहें, मेरे लाडले राम! तुमने उन्हें पूरी तरह भुला दिया। भरत तुम्हारा प्रिय जानकर उनकी सौ गुना देखभाल करते हैं, फिर भी वे दिन-प्रतिदिन ऐसे मुरझा (झाँवरे) रहे हैं, मानो पाले से मारे हुए कमल हों।
संदेश: कौशल्या पथिक से कहती हैं— “यदि वन में राम मिलें तो उन्हें माँ का संदेश कहना— तुलसी कहते हैं, मुझे और सबसे अधिक इन (घोड़ों) की चिंता है।”
निहित भाव: घोड़ों के बहाने कौशल्या वास्तव में अपनी ही वियोग-पीड़ा व्यक्त कर रही हैं; वे सीधे-सीधे अपने दुख की बात कहकर राम को दुखी नहीं करना चाहतीं। इसमें माँ का त्याग, मर्यादा और करुण वात्सल्य है। साथ ही यह संदेश भी है कि पशु-पक्षी भी प्रेम के भूखे होते हैं और प्रिय के वियोग में दुखी होते हैं।
कौशल्या राम से एक बार लौटकर उन घोड़ों को देखने की विनती करती हैं, जिन्हें राम ने स्वयं पाला था; भरत की सौ गुनी देखभाल के बावजूद वे पाले से मारे कमलों की तरह मुरझा रहे हैं; वह पथिक से संदेश भेजती हैं कि उन्हें सबसे अधिक इन घोड़ों की चिंता है। करुणा: घोड़ों के बहाने माँ अपनी वियोग-पीड़ा व्यक्त करती है, ताकि राम को सीधे दुखी न करे; संदेश: प्रेम और वियोग पशुओं तक को प्रभावित करता है।
(क) उपमा अलंकार के दो उदाहरण छाँटिए। (ख) उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग कहाँ और क्यों किया गया है? उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।
Answer
उत्तर
(क) उपमा अलंकार के उदाहरण: 1. “कबहुँ समुझि वनगमन राम को रहि चकि चित्रलिखी सी”— कौशल्या की तुलना चित्र में लिखी आकृति से। 2. “कर-पंकज” (कमल जैसे हाथ) और “नीरज नयन” (कमल जैसे नेत्र)— (रूपक/उपमा)। 3. “तुलसीदास वह समय कहे तें लागति प्रीति सिखी सी”— प्रीति की तुलना सीखी हुई-सी।
(ख) उत्प्रेक्षा अलंकार: “तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे।” - कहाँ: ‘राघौ! एक बार फिरि आवौ’ पद में, घोड़ों की दशा के वर्णन में। - क्यों: राम के वियोग में घोड़े दिन-प्रतिदिन मुरझाते (झाँवरे) जा रहे हैं; उनकी इस दशा की संभावना पाले (हिम) से मारे हुए कमलों के रूप में की गई है (‘मनहुँ’ वाचक शब्द)। इससे घोड़ों की दुर्दशा और राम-वियोग की पीड़ा अधिक मार्मिक और चित्रात्मक बन गई है।
(क) उपमा: “रहि चकि चित्रलिखी सी”, “लागति प्रीति सिखी सी” (साथ ही ‘कर-पंकज’, ‘नीरज नयन’)। (ख) उत्प्रेक्षा: “तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे” — ‘राघौ! एक बार फिरि आवौ’ में घोड़ों के मुरझाने की संभावना पाले से मारे कमलों के रूप में की गई है, जिससे वियोग की पीड़ा मार्मिक और चित्रात्मक बनती है।
पठित पदों के आधार पर सिद्ध कीजिए कि तुलसीदास का भाषा पर पूरा अधिकार था?
Answer
उत्तर
- अवधी और ब्रज दोनों पर अधिकार: ‘भरत-राम का प्रेम’ (रामचरितमानस) अवधी में और ‘पद’ (गीतावली) ब्रजभाषा में हैं; दोनों में समान सहजता और माधुर्य है।
- छंद-विधान: मानस में दोहा-चौपाई और गीतावली में गेय पद— दोनों में छंद, लय और संगीतात्मकता का पूरा निर्वाह।
- अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग: उपमा (“चित्रलिखी सी”), उत्प्रेक्षा (“मनहुँ कमल हिममारे”), दृष्टांत (“फरइ कि कोदव बालि सुसाली”), रूपक (“कर-पंकज”, “अभाग उदधि”), अनुप्रास।
- भावानुकूल भाषा: भरत की आत्मग्लानि, कौशल्या का वात्सल्य और वियोग— प्रत्येक भाव के अनुरूप कोमल, करुण शब्दावली।
- तत्सम-तद्भव-लोक शब्दों का संतुलन: ‘नीरज’, ‘मुनिनाथ’, ‘परिनाम’ के साथ ‘पनहियाँ’, ‘धनुहियाँ’, ‘झाँवरे’, ‘चुचुकारे’ जैसे लोक-शब्द।
- मुहावरे और लोकोक्तियाँ: “फरइ कि कोदव बालि सुसाली”, “मुकता प्रसव कि संबुक काली”।
- संवाद और नाटकीयता: “उठहु तात! बलि मातु बदन पर…” जैसे सजीव संवाद।
अतः तुलसीदास भाषा के सिद्धहस्त कवि थे।
तुलसी ने अवधी (मानस) और ब्रज (गीतावली) दोनों में समान सहजता से लिखा; दोहा-चौपाई और गेय पदों में छंद-लय का पूर्ण निर्वाह किया; उपमा, उत्प्रेक्षा, दृष्टांत, रूपक, अनुप्रास का स्वाभाविक प्रयोग किया; भावानुकूल करुण-कोमल शब्दावली, तत्सम-तद्भव-लोक शब्दों का संतुलन, लोकोक्तियाँ और सजीव संवाद — ये सब उनके भाषा-अधिकार को सिद्ध करते हैं।
अभ्यास – योग्यता-विस्तार
‘महानता लाभलोभ से मुक्ति तथा समर्पण त्याग से हासिल होता है’ को केंद्र में रखकर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
Answer
उत्तर
भरत के उदाहरण से पुष्टि: 1. लाभ-लोभ से मुक्ति: भरत को बिना माँगे अयोध्या का राज्य मिल रहा था, पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया; उन्हें सत्ता और वैभव का कोई लोभ नहीं था। 2. त्याग: उन्होंने राजसी सुख त्यागकर राम को लौटाने के लिए नंगे पैर चित्रकूट तक यात्रा की; राम के न लौटने पर उनकी खड़ाऊँ (पादुका) सिंहासन पर रखकर स्वयं नंदीग्राम में तपस्वी की तरह रहकर चौदह वर्ष राज्य-संचालन किया। 3. समर्पण: वे स्वयं को राम का सेवक मानते रहे— “गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू”।
इसी त्याग और समर्पण ने भरत को महान बनाया; तुलसी कहते हैं कि यदि भरत न होते तो राम-प्रेम का आदर्श कौन स्थापित करता।
अन्य उदाहरण: राम (राज्य त्यागकर वनवास), महात्मा गांधी (वैभव त्यागकर सादगी और देश-सेवा), भगत सिंह (प्राणों का बलिदान), मदर टेरेसा (जीवन सेवा में समर्पित), राजा हरिश्चंद्र, कर्ण, दधीचि।
निष्कर्ष: स्वार्थ और लालच व्यक्ति को छोटा बनाते हैं; जो व्यक्ति निजी लाभ छोड़कर दूसरों के लिए त्याग और समर्पण करता है, वही इतिहास में महान कहलाता है।
भरत ने बिना माँगे मिले राज्य को ठुकराया (लोभ से मुक्ति), नंगे पैर चित्रकूट गए और राम की पादुका रखकर नंदीग्राम में तपस्वी-जीवन बिताते हुए राज्य चलाया (त्याग-समर्पण) — इसी से वे महान बने। राम, गांधी, भगत सिंह, मदर टेरेसा, दधीचि आदि भी इसके उदाहरण हैं; स्वार्थ छोटा बनाता है, त्याग-समर्पण महान।
भरत के त्याग और समर्पण के अन्य प्रसंगों को भी जानिए।
Answer
उत्तर
- ननिहाल से लौटने पर: कैकेयी ने भरत के लिए राज्य माँगा था; भरत ने माता को धिक्कारा और राज्य लेने से इनकार कर दिया।
- पिता का अंतिम संस्कार: उन्होंने शोक में डूबकर पिता दशरथ का अंतिम संस्कार किया।
- चित्रकूट यात्रा: गुरु वसिष्ठ, माताओं और अयोध्यावासियों सहित राम को मनाने नंगे पैर चित्रकूट गए; रास्ते में निषादराज गुह और भरद्वाज मुनि से भेंट।
- पादुका-राज्य: राम के न लौटने पर उनकी खड़ाऊँ लेकर लौटे, उन्हें सिंहासन पर रखा और “राम के प्रतिनिधि” के रूप में राज्य चलाया।
- नंदीग्राम में तपस्वी-जीवन: अयोध्या के राजमहल के बजाय नंदीग्राम में कुटिया बनाकर, जटा बढ़ाकर, वल्कल वस्त्र पहनकर, भूमि पर सोकर और कंद-मूल खाकर चौदह वर्ष बिताए।
- प्रतिज्ञा: उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि यदि चौदह वर्ष पूरे होते ही राम न लौटे तो वे अग्नि में प्रवेश कर लेंगे।
- हनुमान से भेंट: लक्ष्मण-मूर्च्छा के समय संजीवनी ले जाते हनुमान को उन्होंने बाण से गिरा दिया था, फिर पता चलने पर अपने बाण पर बैठाकर भेजने का प्रस्ताव किया।
- राम के लौटने पर राज्य उन्हें सौंप दिया।
भरत ने कैकेयी द्वारा माँगे राज्य को ठुकराया; नंगे पैर चित्रकूट जाकर राम को मनाया; उनकी पादुका सिंहासन पर रखकर प्रतिनिधि के रूप में राज्य चलाया; नंदीग्राम में जटा-वल्कल धारण कर तपस्वी-जीवन बिताया; चौदह वर्ष पूरे होते ही राम न लौटने पर अग्नि-प्रवेश की प्रतिज्ञा की; और राम के लौटने पर राज्य सौंप दिया।
आज के संदर्भ में राम और भरत जैसा भ्रातृप्रेम क्या संभव है? अपनी राय लिखिए।
Answer
उत्तर
मेरी राय: आज राम-भरत जैसा आदर्श भ्रातृप्रेम कठिन है, पर असंभव नहीं।
कठिनाइयाँ: 1. भौतिकवाद और स्वार्थ: आज धन-संपत्ति को अधिक महत्व दिया जाता है; पैतृक संपत्ति के बँटवारे को लेकर भाइयों में झगड़े, मुकदमे और कभी-कभी हिंसा तक हो जाती है। 2. एकल परिवार और दूरी: नौकरी के लिए भाई अलग-अलग शहरों/देशों में रहते हैं; आपसी संपर्क और भावनात्मक जुड़ाव कम हो गया है। 3. व्यक्तिवाद और प्रतिस्पर्धा: हर व्यक्ति अपने करियर और परिवार तक सीमित है। 4. बाहरी प्रभाव: परिवार के अन्य सदस्यों या रिश्तेदारों का हस्तक्षेप (जैसे मंथरा-कैकेयी) संबंधों में दरार डालता है।
संभावनाएँ: 1. आज भी अनेक परिवारों में भाई एक-दूसरे के लिए त्याग करते हैं— बड़ा भाई छोटे की पढ़ाई के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ देता है, कोई भाई बीमार भाई को किडनी तक दान कर देता है। 2. संकट के समय भाई ही सबसे बड़ा सहारा बनते हैं। 3. अच्छे संस्कार, आपसी विश्वास, संवाद और त्याग की भावना से ऐसा प्रेम संभव है।
निष्कर्ष: राम-भरत का प्रेम एक आदर्श है जो हमें स्वार्थ छोड़कर त्याग, सम्मान और विश्वास पर आधारित संबंध बनाने की प्रेरणा देता है; यदि हम इन मूल्यों को अपनाएँ तो आज भी ऐसा भ्रातृप्रेम संभव है।
कठिन है पर असंभव नहीं: भौतिकवाद, संपत्ति-विवाद, एकल परिवार, दूरी, व्यक्तिवाद और बाहरी हस्तक्षेप बाधाएँ हैं; पर आज भी भाई एक-दूसरे की पढ़ाई, इलाज और संकट में त्याग करते हैं। अच्छे संस्कार, विश्वास, संवाद और त्याग-भावना से राम-भरत जैसा भ्रातृप्रेम आज भी संभव है।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ भरत-राम का प्रेम — खेल में जिताना, राम का स्वभाव, श्रद्धाभाव, आत्मग्लानि, कोदो-सीपी (प्रश्न 1–5)
- ☒ पद — कौशल्या का वात्सल्य, चित्रलिखी, राघौ फिरि आवौ, अलंकार, भाषा-अधिकार (प्रश्न 6–10)
- ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 11–13)