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Class 12 Hindi Antra Chapter 17

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 17: कुटज

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XII

Hindi

Antra (NCERT)

17 – कुटज

2026-27

15 of 15

बिंदु

विवरण

लेखक

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907–1979), आरत दुबे का छपरा (बलिया, उ.प्र.); ‘अशोक के फूल’, ‘कुटज’, ‘आलोक पर्व’ (निबंध), ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘पुनर्नवा’ (उपन्यास)

विधा

ललित निबंध

कुटज

हिमालय की शिवालिक शृंखला की सूखी, कठोर शिलाओं के बीच उगने वाला जंगली पौधा, जिसमें फूल लगते हैं

प्रमुख प्रसंग

नाम बड़ा या रूप (“रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य”); कालिदास के यक्ष द्वारा रामगिरि पर कुटज-पुष्पों से मेघ की अभ्यर्थना— “गाढ़े के साथी”; रहीम का “सेंहुड़ कुटज करीर”; कुट, कुटज, कुटनी, अगस्त्य; याज्ञवल्क्य का स्वार्थ-सिद्धांत; “हृदयेनापराजितः”; “दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं”

संदेश

अपराजेय जीवनी-शक्ति, स्वावलंबन, आत्मविश्वास, विषम परिस्थितियों में भी शान से जीना, मन पर विजय

Q1

कुटज को ‘गाढ़े के साथी’ क्यों कहा गया है?

Answer

उत्तर

‘गाढ़े का साथी’ का अर्थ है— संकट या कठिन समय में साथ देने वाला।

कालिदास के ‘मेघदूत’ में शापग्रस्त यक्ष ने आषाढ़ के पहले दिन रामगिरि पर्वत पर मेघ को अपना संदेशवाहक बनाने के लिए उसकी अभ्यर्थना (स्वागत-पूजा) करनी चाही। उस सूखे पर्वत पर उस समय चंपक, बकुल, नीलोत्पल, मल्लिका, अरविंद— कोई फूल नहीं मिला; उसे ताज़े कुटज पुष्पों की अंजलि देकर ही संतोष करना पड़ा। लेखक कल्पना करता है कि शायद स्वयं कालिदास कभी रामगिरि पहुँचे थे और कुटज-पुष्प से ही मेघ की अभ्यर्थना की थी। उस कठिन समय में जब कोई और फूल नहीं था, कुटज ने ही यक्ष (कालिदास) के संतप्त चित्त को सहारा दिया। इसलिए लेखक कहता है— “धन्य हो कुटज, तुम ‘गाढ़े के साथी’ हो।”

‘मेघदूत’ में आषाढ़ के पहले दिन रामगिरि पर यक्ष को मेघ की अभ्यर्थना के लिए जब कोई और फूल (चंपक, बकुल, मल्लिका, अरविंद) नहीं मिला, तब कुटज के ताज़े फूलों ने ही उसके संतप्त चित्त को सहारा दिया — संकट के समय काम आने के कारण कुटज को ‘गाढ़े का साथी’ कहा गया।

Q2

‘नाम’ क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।

Answer

उत्तर

लेखक के सामने कुटज का पौधा (रूप/पदार्थ) था, पर उसका नाम (पद) याद नहीं आ रहा था, इसलिए मन व्याकुल था। ‘नाम में क्या रखा है’ सोचकर वह सौ नाम दे सकता था— सुस्मिता, गिरिकांता, वनप्रभा, अकुतोभय, पहाड़फोड़, पातालभेद— पर मन नहीं माना।

लेखक के अनुसार नाम बड़ा है, क्योंकि— 1. नाम इसलिए बड़ा नहीं कि वह नाम है, बल्कि इसलिए बड़ा है कि उसे सामाजिक स्वीकृति मिली होती है। 2. “रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य।” रूप को व्यक्ति अपनी आँखों से देखता है, पर नाम पर पूरे समाज की मुहर लगी होती है— जिसे आधुनिक लोग ‘सोशल सैंक्शन’ कहते हैं। 3. नाम इतिहास द्वारा प्रमाणित होता है और समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात— अर्थात पीढ़ियों से लोगों की सामूहिक चेतना में बसा होता है। 4. नाम के माध्यम से ही कोई वस्तु समाज में संप्रेषित और पहचानी जाती है; मनमाना नाम इस सामाजिक स्वीकृति के बिना अर्थहीन है।

लेखक के अनुसार नाम इसलिए बड़ा है कि उसे सामाजिक स्वीकृति (सोशल सैंक्शन) मिली होती है — “रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य”; नाम पर समाज की मुहर लगी होती है, वह इतिहास द्वारा प्रमाणित और समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात होता है; मनमाने सौ नाम इस स्वीकृति के बिना अर्थहीन हैं।

Q3

‘कुट’, ‘कुटज’ और ‘कुटनी’ शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. कुट: ‘कुट’ का अर्थ घड़ा भी है और घर भी। (‘कुटिया’, ‘कुटीर’ शब्द भी कदाचित् इसी से संबद्ध हैं।) ‘कूट’ का अर्थ पर्वत-शिखर भी है।
  2. कुटज: कुट + ज = जो कुट से पैदा हुआ हो। घड़े से उत्पन्न होने के कारण प्रतापी अगस्त्य मुनि भी ‘कुटज’ (कुंभज/घटज) कहे जाते हैं। पौधे के संदर्भ में लेखक मानता है कि यदि इसे ‘कूटज’ (पर्वत-शिखर पर उत्पन्न) कहा जाता तो अधिक उपयुक्त होता, क्योंकि यह ‘गिरिकूट-बिहारी’ है।
  3. कुटनी: संस्कृत में घर में काम-काज करने वाली दासी को ‘कुटहारिका’ या ‘कुटकारिका’ कहते हैं। एक ज़रा गलत ढंग की दासी (जो इधर-उधर की बातें लगाए, चुगली करे) ‘कुटनी’ कही जा सकती है; संस्कृत में उसकी गलतियों को अधिक मुखर बनाने के लिए उसे ‘कुट्टनी’ कहा गया।

आपसी संबंध: तीनों शब्दों का मूल ‘कुट’ (घड़ा/घर) है— कुटज = कुट से उत्पन्न; कुटनी = कुट (घर) में काम करने वाली दासी का बिगड़ा रूप। लेखक विनोद में प्रश्न करता है कि क्या अगस्त्य मुनि भी नारद की तरह दासी-पुत्र थे? पर कहता है कि घड़े या घर से इस जंगली फूल का कोई तुक नहीं— कुटज तो जंगल का सैलानी है। अंततः लेखक इसे संभवतः आर्येतर (आग्नेय/ऑस्ट्रो-एशियाटिक) भाषा का शब्द मानता है, जिसे “सर्वग्रासी” संस्कृत ने अपना लिया।

‘कुट’ = घड़ा या घर (कुटिया, कुटीर भी इसी से); ‘कुटज’ = कुट से उत्पन्न (घड़े से उत्पन्न होने के कारण अगस्त्य मुनि भी कुटज कहलाते हैं); घर की दासी ‘कुटहारिका/कुटकारिका’ कहलाती है और गलत ढंग की दासी ‘कुटनी’ (संस्कृत में ‘कुट्टनी’)। तीनों का मूल ‘कुट’ है, पर लेखक मानता है कि जंगल के सैलानी फूल से घड़े-घर का कोई तुक नहीं — संभवतः यह आर्येतर शब्द है जिसे सर्वग्रासी संस्कृत ने अपना लिया।

Q4

कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?

Answer

उत्तर

लेखक के अनुसार कुटज नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है—

नाम में: कितने ही नाम आए और गए, दुनिया उन्हें भूल गई; पर ‘कुटज’ नाम हज़ारों वर्षों से जीता चला आ रहा है— संस्कृत की निरंतर बढ़ती शब्दराशि में “जो जमके बैठा, सो बैठा ही है।”

रूप में: 1. चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में भी वह हरा भी है और भरा भी। 2. दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में बंद अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है। 3. मूर्ख के मस्तिष्क से भी अधिक सूने गिरि-कांतार (पहाड़ी जंगल) में भी इतना मस्त है कि ईर्ष्या होती है। 4. शिवालिक की सूखी, नीरस, कठोर चट्टानों पर आसन मारकर बैठा है; झबरीले सिर को हिलाकर समाधिस्थ महादेव को पुष्प चढ़ाता है और पाताल-भेदी जड़ों से सरिताओं को रस का स्रोत बताता है। 5. उसका संदेश— “भित्त्वा पाषाणपिठरं… कुटजश्चुम्बते नभः”— पत्थर को फोड़कर, आँधी की व्यथा सहकर, पाताल का पानी पीकर कुटज आकाश को चूमता है।

नाम में — हज़ारों वर्षों से ‘कुटज’ नाम संस्कृत की शब्दराशि में जमा बैठा है, जबकि कितने नाम आए और भुला दिए गए। रूप में — यमराज के निःश्वास-सी धधकती लू में भी हरा-भरा है, दुर्जन के चित्त से कठोर पाषाण से रस खींचकर सरस है, सूने गिरि-कांतार में भी मस्त है, पाताल-भेदी जड़ों से रस पाता और आकाश को चूमता है — यही उसकी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा है।

Q5

‘कुटज’ हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।

Answer

उत्तर

कुटज का उपदेश है— “जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; वायुमंडल को चूसकर, झंझा-तूफ़ान को रगड़कर अपना प्राप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो।”

संस्कृत श्लोक में— “भित्त्वा पाषाणपिठरं छित्त्वा प्राभञ्जनीं व्यथाम्। पीत्वा पातालपानीयं कुटजश्चुम्बते नभः॥”

टिप्पणी: 1. संघर्षशीलता: विपरीत परिस्थितियों से हार न मानकर, परिश्रम और संघर्ष से अपना अधिकार प्राप्त करो। 2. स्वावलंबन: किसी के आगे हाथ मत फैलाओ; अपने बल पर जीवन-रस प्राप्त करो। 3. उल्लास: कठिनाइयों के बीच भी प्रसन्न और मस्त रहो। 4. ऊँचे लक्ष्य: जड़ें गहरी हों और दृष्टि आकाश पर— धरती से जुड़े रहकर ऊँचाइयों को छुओ। 5. “जीना भी एक कला है… कला ही नहीं, तपस्या है। जियो तो प्राण ढाल दो ज़िंदगी में।” 6. हृदय से अपराजित रहो: “चाहे सुख हो या दुख, प्रिय हो या अप्रिय, जो मिल जाए उसे शान के साथ, हृदय से अपराजित होकर, सोल्लास ग्रहण करो। हार मत मानो।”

कुटज का उपदेश है — कठोर पाषाण भेदकर, पाताल चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो, तूफ़ानों से अपना प्राप्य वसूलो और आकाश चूमकर उल्लास खींच लो (“भित्त्वा पाषाणपिठरं…”); अर्थात संघर्ष और स्वावलंबन से जियो, कठिनाई में भी मस्त रहो, जड़ें गहरी और लक्ष्य ऊँचे रखो, जीवन में प्राण ढाल दो, और सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय को हृदय से अपराजित रहकर सोल्लास ग्रहण करो — हार मत मानो।

Q6

कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?

Answer

उत्तर

  1. विषम परिस्थितियों में भी जीना: धधकती लू, कठोर पाषाण और सूखे पहाड़ में भी कुटज हरा-भरा और मस्त रहता है— कठिनाइयों से हार न मानना।
  2. अपराजेय जीवनी-शक्ति और संघर्ष: पत्थर फोड़कर, पाताल से रस खींचकर जीवन-निर्वाह।
  3. स्वावलंबन और स्वाभिमान: “वह दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता… अफ़सरों का जूता नहीं चाटता फिरता।”
  4. निर्भयता: “कोई निकट आ गया तो भय के मारे अधमरा नहीं हो जाता”— अकुतोभया वृत्ति।
  5. अंधविश्वास से मुक्ति: ग्रहों की खुशामद नहीं करता, नीलम या अँगूठियों की लड़ी नहीं पहनता।
  6. सुख-दुख में समभाव: “हृदयेनापराजितः”— सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय से विचलित न होना।
  7. मन पर नियंत्रण: “कुटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता।”
  8. परोपकार और निरभिमानता: महादेव को फूल चढ़ाता है, सरिताओं को रस-स्रोत बताता है, यक्ष के काम आया— फिर भी उपकार का अभिमान नहीं।
  9. दिखावे और चाटुकारिता से दूर रहकर शान से जीना।

कुटज से सीख मिलती है — विषम परिस्थितियों में भी हार न मानना, संघर्ष और अपराजेय जीवनी-शक्ति, स्वावलंबन-स्वाभिमान (भीख, चाटुकारिता नहीं), निर्भयता, अंधविश्वास से मुक्ति (ग्रहों की खुशामद, नीलम नहीं), सुख-दुख में समभाव (“हृदयेनापराजितः”), मन पर नियंत्रण, निरभिमान परोपकार और दिखावे से दूर रहकर शान से जीना।

Q7

कुटज क्या केवल जी रहा है—लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?

Answer

उत्तर

लेखक ने यह प्रश्न उठाकर बताया कि कुटज केवल जी नहीं रहा, बल्कि शान से जी रहा है; और उसकी तुलना में मनुष्य की इन कमज़ोरियों पर व्यंग्य किया— 1. भिक्षावृत्ति और परावलंबन: मनुष्य दूसरों के द्वार पर भीख माँगने जाता है; कुटज नहीं। 2. भीरुता: मनुष्य किसी के निकट आते ही भय से अधमरा हो जाता है। 3. पाखंडपूर्ण उपदेश: मनुष्य स्वयं आचरण न करके दूसरों को नीति और धर्म का उपदेश देता फिरता है। 4. चाटुकारिता: अपनी उन्नति के लिए अफ़सरों का जूता चाटता फिरता है। 5. ज्योतिष-अंधविश्वास: दूसरों को अवमानित करने के लिए ग्रहों की खुशामद करता है; आत्मोन्नति के लिए नीलम धारण करता है, अँगूठियों की लड़ी पहनता है। 6. दीनता और दोहरापन: दाँत निपोरता (खीसें निकालता) है, बगलें झाँकता है। 7. स्वार्थपरता: केवल अपने मतलब के लिए जीना। 8. उपकार-अपकार का अभिमान और मन की परवशता— खुशामद, हाँ-हुज़ूरी, मिथ्या आडंबर, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाना।

लेखक ने बताया कि कुटज शान से जीता है, जबकि मनुष्य — दूसरों के द्वार पर भीख माँगता है, किसी के पास आते ही भय से अधमरा हो जाता है, स्वयं आचरण किए बिना नीति-धर्म का उपदेश देता है, उन्नति के लिए अफ़सरों का जूता चाटता है, ग्रहों की खुशामद करता है, नीलम और अँगूठियाँ पहनता है, दाँत निपोरता और बगलें झाँकता है — यानी परावलंबन, भीरुता, पाखंड, चाटुकारिता, अंधविश्वास, दीनता और स्वार्थ जैसी कमज़ोरियों पर व्यंग्य किया है।

Q8

लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।

Answer

उत्तर

पृष्ठभूमि: याज्ञवल्क्य ने पत्नी मैत्रेयी से कहा था कि सब कुछ स्वार्थ के लिए है— “आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति” (पुत्र, पत्नी सब अपने मतलब के लिए प्रिय हैं)। पश्चिम के हॉब्स और हेल्वेशियस ने भी यही कहा। यदि केवल स्वार्थ और जिजीविषा (जीते रहने की प्रचंड इच्छा) ही सत्य हो, तो देशोद्धार, साहित्य-कला की महिमा, त्याग, प्रेम, परमार्थ— सब झूठ ठहरेंगे।

लेखक का मत: लेखक का अंतर्मन कहता है कि ऐसा सोचना गलत है— 1. याज्ञवल्क्य की बात अंतिम नहीं थी; वे ‘आत्मनः’ का अर्थ व्यापक करना चाहते थे— व्यक्ति की आत्मा केवल उस तक सीमित नहीं, वह सबमें व्याप्त है। 2. “अपने में सब और सबमें आप”— जब तक यह समष्टि-बुद्धि नहीं आती, तब तक पूर्ण सुख नहीं मिलता। 3. जब तक व्यक्ति स्वयं को “दलित द्राक्षा (निचोड़े गए अंगूर) की भाँति निचोड़कर ‘सर्व’ के लिए निछावर” नहीं कर देता, तब तक स्वार्थ खंड-सत्य है— वह मोह, तृष्णा और कृपणता को बढ़ाता है। 4. यह बड़ी शक्ति है— त्याग, प्रेम, परमार्थ, सबके कल्याण की भावना।

उदाहरण: - कुटज शान से जीता है, महादेव को फूल चढ़ाता है, सरिताओं को रस-स्रोत बताता है— “स्वार्थ के दायरे से बाहर की बात है।” - भीष्म पितामह का उपदेश— “सुखं वा यदि वा दुःखं… हृदयेनापराजितः”। - राजा जनक— संसार के भोग भोगते हुए भी मुक्त। - इतिहास में भगत सिंह, गांधी जी जैसे लोगों ने देश के लिए प्राण न्योछावर किए; माँ संतान के लिए त्याग करती है; सैनिक देश के लिए जान देते हैं— ये केवल स्वार्थ से संभव नहीं।

याज्ञवल्क्य, हॉब्स, हेल्वेशियस के अनुसार सब कुछ स्वार्थ के लिए है, पर तब त्याग, प्रेम, देशोद्धार सब झूठ ठहरेंगे। लेखक मानता है कि याज्ञवल्क्य ‘आत्मनः’ को व्यापक अर्थ देना चाहते थे — “अपने में सब और सबमें आप” की समष्टि-बुद्धि; जब तक व्यक्ति स्वयं को दलित द्राक्षा की तरह ‘सर्व’ के लिए निछावर नहीं करता, स्वार्थ खंड-सत्य है। उदाहरण: शान से जीने वाला और महादेव को फूल चढ़ाने वाला कुटज, भीष्म का “हृदयेनापराजितः”, राजा जनक, और देश के लिए प्राण देने वाले भगत सिंह व माँ का त्याग — यही स्वार्थ और जिजीविषा से बड़ी शक्ति है।

Q9

‘कुटज’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि ‘दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।’

Answer

उत्तर

लेखक कहता है— “दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं। सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश है।” 1. परवश मन = दुख: परवश होने का अर्थ है खुशामद करना, दाँत निपोरना, चाटुकारिता, हाँ-हुज़ूरी। जिसका मन अपने वश में नहीं, वही दूसरों के मन के अनुसार चलता है, अपने को छिपाने के लिए मिथ्या आडंबर रचता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है— ऐसा व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता। 2. वश में मन = सुख: कुटज इन मिथ्याचारों से मुक्त है; वह वशी और वैरागी है। राजा जनक की तरह संसार में रहकर, सब भोग भोगकर भी उनसे मुक्त है। वह घोषणा करता है— “मैं स्वार्थ के लिए अपने मन को सदा दूसरे के मन में घुसाता नहीं फिरता, इसलिए मैं मन को जीत सका हूँ।” 3. बाहरी परिस्थितियाँ सुख-दुख तय नहीं करतीं: कुटज धधकती लू, कठोर पाषाण और सूखे पहाड़ में है— बाहरी दृष्टि से दुखद परिस्थिति— फिर भी वह हरा-भरा, मस्त और प्रसन्न है, क्योंकि उसका मन उसके वश में है। 4. “कुटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता।” 5. हृदयेनापराजितः: सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय को समभाव से ग्रहण करने वाला ही वास्तव में सुखी है।

अतः सुख-दुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, मन की स्थिति में हैं।

लेखक के अनुसार सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुखी वह जिसका मन परवश है — परवश व्यक्ति खुशामद, चाटुकारिता, मिथ्या आडंबर में फँसकर दुखी रहता है। कुटज वशी और वैरागी है, जनक की तरह भोगों में रहकर भी मुक्त; धधकती लू और कठोर पत्थरों जैसी दुखद परिस्थितियों में भी हरा-भरा और मस्त है, क्योंकि “वह मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता” — इसलिए सुख-दुख बाहरी परिस्थितियों में नहीं, मन के विकल्प हैं।

Q10

निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए— (क) ‘कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्वर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।’ (ख) ‘रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ’सोशल सैंक्शन’ कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात!’ (ग) ‘रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।’ (घ) ‘हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिली है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!’

Answer

उत्तर

प्रसंग (सभी के लिए): प्रस्तुत गद्यांश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंध ‘कुटज’ से लिए गए हैं, जो हमारी पाठ्यपुस्तक ‘अंतरा’ भाग-2 में संकलित है।

(क) संदर्भ: शिवालिक की सूखी पहाड़ियों पर उगे झाड़-झंखाड़ और कुटज जैसे वृक्षों के बारे में। व्याख्या: लेखक कहता है कि नीरस, सूखी पहाड़ियों पर भी ये पेड़ हँसते हुए खड़े हैं, मानो ‘बेहया’ (निर्लज्ज) हों या मस्तमौला। पर जो लोग ऊपर से बेशर्म या लापरवाह दिखते हैं, उनकी जड़ें प्रायः गहरी होती हैं— अर्थात उनमें भीतर से गहरी दृढ़ता, आत्मविश्वास और जीवनी-शक्ति होती है। ये पेड़ भी पत्थर की छाती फाड़कर, न जाने किस गहरी गुफा (अतल गह्वर) से अपना भोजन-जल खींच लाते हैं। विशेष: मानवीकरण; मनुष्य के संदर्भ में भी यह सत्य— बाहरी रूप से व्यक्ति का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए; तत्सम शब्दावली (पाषाण, अतल, गह्वर, भोग्य)।

(ख) संदर्भ: कुटज का नाम याद न आने पर लेखक ‘नाम बड़ा या रूप’ पर विचार करता है। व्याख्या: रूप को व्यक्ति अपनी आँखों से देखकर अनुभव करता है, इसलिए वह व्यक्तिगत सत्य है; पर नाम को पूरा समाज स्वीकार करता है, इसलिए वह सामाजिक सत्य है। नाम वह पद (शब्द) है, जिस पर समाज की स्वीकृति की मुहर लगी हो— जिसे आज ‘सोशल सैंक्शन’ कहा जाता है। लेखक ऐसे नाम के लिए व्याकुल है, जो समाज द्वारा स्वीकृत हो, इतिहास द्वारा प्रमाणित हो और पीढ़ियों से मानव-समुदाय की सामूहिक चेतना रूपी पवित्र गंगा में स्नान करके पवित्र हुआ हो। विशेष: ‘समष्टि-मानव की चित्त-गंगा’ में रूपक; अंग्रेज़ी शब्द ‘सोशल सैंक्शन’ का सहज प्रयोग; दार्शनिक, विचारप्रधान शैली।

(ग) संदर्भ: कुटज की अपराजेय जीवनी-शक्ति का रूप-वर्णन। व्याख्या: लेखक कुटज की सुंदरता पर न्योछावर है। चारों ओर ऐसी भीषण लू चल रही है मानो क्रोधित यमराज की भयंकर साँसें हों, फिर भी कुटज हरा-भरा है। पत्थर इतने कठोर हैं, जितना दुष्ट व्यक्ति का हृदय भी नहीं होता; उस पत्थर रूपी कारागार में बंद किसी अज्ञात जलस्रोत से वह ज़बरदस्ती रस खींचकर सरस बना हुआ है। विशेष: उपमा (“कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान”), व्यतिरेक (“दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर”), रूपक (“पाषाण की कारा”), अनुप्रास (“हरा भी है और भरा भी”); ओजपूर्ण, तत्सम-प्रधान भाषा।

(घ) संदर्भ: कुटज के ‘हृदय से अपराजित’ स्वभाव पर लेखक की मुग्धता; महाभारत के शांतिपर्व के श्लोक “सुखं वा यदि वा दुःखं… हृदयेनापराजितः” के संदर्भ में। व्याख्या: ‘हृदयेनापराजितः’— हृदय से कभी पराजित न होने वाला। लेखक सोचता है कि वह हृदय कितना विशाल होगा, जो सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय— किसी से भी विचलित नहीं होता। कुटज में यही गुण देखकर लेखक रोमांचित हो उठता है और आश्चर्य करता है कि कुटज को यह निर्भय वृत्ति (अकुतोभया— किसी से भय न मानने वाली), कभी न हारने वाला स्वभाव और स्थिर, अडिग जीवन-दृष्टि कहाँ से मिली। विशेष: संस्कृत सूक्ति का प्रयोग; गीता के स्थितप्रज्ञ भाव की झलक; विस्मयादिबोधक शैली; तत्सम शब्दावली।

(क) सूखी पहाड़ियों पर हँसते पेड़ ‘बेहया’ दिखते हैं, पर उनकी जड़ें गहरी हैं — वे पत्थर फाड़कर अतल गह्वर से भोग्य खींच लाते हैं; ऊपर से लापरवाह दिखने वालों में भीतर गहरी दृढ़ता होती है (मानवीकरण)। (ख) रूप व्यक्तिगत अनुभव का सत्य है, नाम समाज-स्वीकृत सत्य (‘सोशल सैंक्शन’); लेखक समाज-स्वीकृत, इतिहास-प्रमाणित, सामूहिक चेतना की गंगा में स्नात नाम के लिए व्याकुल है (रूपक)। (ग) यमराज की साँसों-सी लू में भी कुटज हरा-भरा है और दुर्जन के हृदय से कठोर पत्थर की कारा से रस खींचकर सरस है (उपमा, व्यतिरेक, रूपक)। (घ) ‘हृदयेनापराजितः’ — सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय से विचलित न होने वाला विशाल हृदय; कुटज की निर्भय वृत्ति, अपराजित स्वभाव और अविचल दृष्टि देखकर लेखक रोमांचित है (शांतिपर्व का श्लोक, स्थितप्रज्ञ भाव)।

अभ्यास – योग्यता-विस्तार

Q11

‘कुटज’ की तर्ज पर किसी जंगली फूल पर लेख अथवा कविता लिखने का प्रयास कीजिए।

Answer

उत्तर

कविता: पलाश

(नमूना)

जब पतझर ने छीन लिए सब पत्ते,
सूनी हो गईं जंगल की डालें,
तब तुम जागे, ओ पलाश!
अंगारों-से फूल लिए उजालें।

न माली ने सींचा, न किसी ने बोया,
पथरीली धरती, सूखी नदी के तीर,
फिर भी तुमने रंग न खोया,
सह ली हर लू, हर पीर।

‘जंगल की आग’ कहे जग तुमको,
पर तुम तो जीवन की ज्वाला हो,
होली के रंगों में घुलकर
तुम ही वसंत का प्याला हो।

सिखाते हो तुम— जब सब छूटे,
तब भी मन का दीप जलाना,
बिना शिकायत, बिना सहारे,
मुस्काकर सबको रंग लुटाना।

भाव: कुटज की तरह पलाश भी विषम परिस्थितियों (पतझड़, सूखी धरती) में खिलता है, किसी की देखभाल पर निर्भर नहीं, और दूसरों को रंग (होली के प्राकृतिक रंग) और सौंदर्य देता है— अपराजेय जीवनी-शक्ति और परोपकार का प्रतीक।

नमूना कविता ‘पलाश’ — पतझड़ में जब डालें सूनी हो जाती हैं, तब अंगारों-से फूल लेकर पलाश जागता है; न किसी ने बोया, न सींचा, पथरीली धरती पर भी उसने रंग नहीं खोया; ‘जंगल की आग’ कहलाकर भी वह जीवन की ज्वाला और होली के रंगों का स्रोत है; सिखाता है कि सब छूट जाने पर भी बिना शिकायत, बिना सहारे मुस्काकर रंग लुटाओ — कुटज जैसी अपराजेय जीवनी-शक्ति और परोपकार।

Q12

लेखक ने ‘कुटज’ को ही क्यों चुना? उसको अपनी रचना के लिए जंगल में पेड़-पौधे तथा फूलों-वनस्पतियों की कोई कमी नहीं थी।

Answer

उत्तर

  1. विषम परिस्थितियों में जीवन: कुटज हिमालय की शिवालिक शृंखला की सूखी, नीरस, कठोर चट्टानों पर, धधकती लू में भी हरा-भरा और फूलों से लदा रहता है— जहाँ अन्य पौधे नहीं पनपते। लेखक को इसमें अपराजेय जीवनी-शक्ति का सर्वोत्तम प्रतीक मिला।
  2. उपेक्षित का गौरव: कुटज “संस्कृत साहित्य का बहुत परिचित किंतु कवियों द्वारा अवमानित” वृक्ष है; रहीम ने भी उसे “सेंहुड़ कुटज करीर” कहकर चपत लगा दी। लेखक उपेक्षित को सम्मान देना चाहता था— न विशेष सौंदर्य, न सुगंध, फिर भी महान संदेश।
  3. ‘गाढ़े का साथी’: कालिदास के यक्ष के कठिन समय में जब कोई फूल नहीं मिला, तब कुटज ही काम आया।
  4. मानवीय मूल्यों का प्रतीक: स्वावलंबन, स्वाभिमान, निर्भयता, चाटुकारिता से दूरी, सुख-दुख में समभाव, मन पर विजय— ये सब मूल्य लेखक कुटज के माध्यम से सहज रूप से व्यक्त कर सका।
  5. व्यक्तिगत आत्मीयता: लेखक उसे “मेरे चिरपरिचित दोस्त कुटज” कहता है; सामने लहराता कुटज उसके मन में नाम-रूप, स्वार्थ-परमार्थ जैसे गहरे चिंतन का माध्यम बना।
  6. ललित निबंध की प्रकृति: ललित निबंध में साधारण वस्तु से असाधारण चिंतन की ओर जाना होता है; जैसे ‘अशोक के फूल’ और ‘शिरीष के फूल’ में, वैसे ही ‘कुटज’ में।

कुटज सूखी कठोर चट्टानों और धधकती लू में भी हरा-भरा रहता है, जहाँ और पौधे नहीं पनपते — अपराजेय जीवनी-शक्ति का सर्वोत्तम प्रतीक; वह कवियों द्वारा अवमानित है (रहीम का “सेंहुड़ कुटज करीर”), और लेखक उपेक्षित को गौरव देना चाहता था; वह यक्ष का ‘गाढ़े का साथी’ रहा; उसमें स्वावलंबन, निर्भयता, समभाव और मन पर विजय जैसे मानवीय मूल्य दिखते हैं; वह लेखक का ‘चिरपरिचित दोस्त’ है; और ललित निबंध साधारण वस्तु से असाधारण चिंतन की ओर ले जाता है।

Q13

कुटज के बारे में उसकी विशेषताओं को बताने वाले दस वाक्य पाठ से छाँटिए और उनकी मानवीय संदर्भ में विवेचना कीजिए।

Answer

उत्तर

क्र.

पाठ का वाक्य

मानवीय संदर्भ में विवेचना

1

“धन्य हो कुटज, तुम ‘गाढ़े के साथी’ हो।”

सच्चा मित्र वही, जो संकट में साथ दे।

2

“वह नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी शक्ति की घोषणा कर रहा है।”

मनुष्य को अपने कर्म और व्यक्तित्व से अमिट पहचान बनानी चाहिए।

3

“धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है।”

विपत्ति में भी प्रसन्न और सक्रिय रहना।

4

“पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।”

कठिन परिस्थितियों में भी परिश्रम से साधन जुटा लेना।

5

“मूर्ख के मस्तिष्क से भी अधिक सूने गिरि कांतार में भी ऐसा मस्त बना है कि ईर्ष्या होती है।”

अकेलेपन और अभावों में भी मस्ती और आत्मविश्वास बनाए रखना।

6

“वह दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता।”

स्वावलंबन और स्वाभिमान।

7

“कोई निकट आ गया तो भय के मारे अधमरा नहीं हो जाता।”

निर्भयता और आत्मबल।

8

“अपनी उन्नति के लिए अफ़सरों का जूता नहीं चाटता फिरता।”

चाटुकारिता से दूर रहकर अपनी योग्यता से आगे बढ़ना।

9

“आत्मोन्नति हेतु नीलम नहीं धारण करता, अँगूठियों की लड़ी नहीं पहनता।”

अंधविश्वास छोड़कर कर्म पर विश्वास।

10

“जीता है और शान से जीता है।”

गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीना।

11

“कुटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता।”

आत्म-संयम; इच्छाओं का दास न बनना।

12

“वह वशी है। वह वैरागी है।”

संसार में रहकर भी आसक्ति से मुक्त रहना (जनक की तरह)।

वाक्य और विवेचना: 1. “धन्य हो कुटज, तुम ‘गाढ़े के साथी’ हो” — संकट में साथ देने वाला ही सच्चा मित्र है। 2. “नाम और रूप दोनों में अपराजेय जीवनी शक्ति” — कर्म और व्यक्तित्व से अमिट पहचान बनाना। 3. “धधकती लू में हरा भी है और भरा भी” — विपत्ति में भी प्रसन्न रहना। 4. “पाषाण की कारा से रस खींचकर सरस” — परिश्रम से साधन जुटाना। 5. “सूने गिरि-कांतार में भी मस्त” — अभाव में भी आत्मविश्वास बनाए रखना। 6. “दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता” — स्वावलंबन। 7. “भय के मारे अधमरा नहीं हो जाता” — निर्भयता। 8. “अफ़सरों का जूता नहीं चाटता” — चाटुकारिता से दूरी। 9. “नीलम, अँगूठियाँ नहीं पहनता” — अंधविश्वास छोड़कर कर्म पर विश्वास। 10. “शान से जीता है” — गरिमा के साथ जीना। (साथ ही: “मन पर सवारी करता है” से आत्म-संयम, और “वशी, वैरागी” से अनासक्ति।)

Q14

‘जीना भी एक कला है’—कुटज के आधार पर सिद्ध कीजिए।

Answer

उत्तर

लेखक कहता है— “जीना भी एक कला है। लेकिन कला ही नहीं, तपस्या है। जियो तो प्राण ढाल दो ज़िंदगी में, मन ढाल दो जीवनरस के उपकरणों में!” कुटज इस कला का सर्वोत्तम उदाहरण है— 1. परिस्थितियों से तालमेल: कुटज ने सूखी चट्टानों, धधकती लू और पानी के अभाव में भी जीने का मार्ग खोज लिया— पाताल-भेदी जड़ों से रस खींचकर। जीने की कला है— परिस्थितियों को कोसने के बजाय उनमें रास्ता निकालना। 2. संघर्ष के साथ उल्लास: वह केवल जीवित नहीं, “हँस भी रहा है”, “मस्त” है, “झूमकर उल्लास खींच” रहा है। कठिनाइयों में भी प्रसन्नता बनाए रखना कला है। 3. गरिमा और स्वाभिमान: “जीता है और शान से जीता है”— भीख, चाटुकारिता, दीनता के बिना। 4. संतुलन: एक ओर महादेव को पुष्प चढ़ाता है (ऊपर, आध्यात्मिकता), दूसरी ओर जड़ों से सरिताओं को रस-स्रोत बताता है (नीचे, परोपकार)— धरती और आकाश के बीच संतुलन। 5. समभाव: “चाहे सुख हो या दुख, प्रिय हो या अप्रिय, जो मिल जाए उसे शान के साथ, हृदय से अपराजित होकर, सोल्लास ग्रहण करो।” 6. मन पर नियंत्रण: “कुटज अपने मन पर सवारी करता है”— इच्छाओं का दास न होना। 7. निरभिमानता: उपकार का अभिमान नहीं, अपकार का गिला नहीं।

अतः कुटज सिखाता है कि जीना केवल साँस लेना नहीं, बल्कि साहस, उल्लास, गरिमा, संतुलन और आत्म-संयम के साथ जीवन को सार्थक बनाना है— यही जीने की कला है।

लेखक कहता है — “जीना भी एक कला है… कला ही नहीं, तपस्या है; जियो तो प्राण ढाल दो ज़िंदगी में।” कुटज परिस्थितियों को कोसे बिना पाताल से रस खींचकर रास्ता निकालता है, संघर्ष में भी हँसता-झूमता है, भीख-चाटुकारिता के बिना शान से जीता है, महादेव को फूल चढ़ाने और सरिताओं को रस बताने में धरती-आकाश का संतुलन रखता है, सुख-दुख को अपराजित हृदय से ग्रहण करता है और मन पर सवारी करता है — यही जीने की कला है।

Q15

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बनाई फिल्म देखिए।

Answer

उत्तर

(गतिविधि-निर्देश)

यह एक अवलोकन-गतिविधि है। NCERT (CIET) ने हिंदी के प्रमुख साहित्यकारों पर शैक्षिक वृत्तचित्र बनाए हैं; हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बनी फ़िल्म NCERT के यूट्यूब चैनल, ई-पाठशाला या दीक्षा (DIKSHA) पोर्टल पर उपलब्ध हो सकती है।

फ़िल्म देखते समय इन बिंदुओं पर ध्यान दें और टिप्पणी लिखें: 1. जीवन-परिचय: जन्म 1907, आरत दुबे का छपरा (बलिया); काशी में संस्कृत-ज्योतिष की शिक्षा; शांतिनिकेतन में लगभग बीस वर्ष अध्यापन— रवींद्रनाथ टैगोर और आचार्य क्षितिमोहन सेन का प्रभाव; काशी हिंदू विश्वविद्यालय, पंजाब विश्वविद्यालय (चंडीगढ़) में हिंदी विभागाध्यक्ष। 2. सम्मान: ‘आलोक पर्व’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (1973), पद्मभूषण (1957)। 3. रचनाएँ: - निबंध— ‘अशोक के फूल’, ‘कुटज’, ‘कल्पलता’, ‘विचार और वितर्क’। - उपन्यास— ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारुचंद्रलेख’, ‘पुनर्नवा’, ‘अनामदास का पोथा’। - आलोचना— ‘कबीर’, ‘सूर-साहित्य’, ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’, ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’। 4. विचार और योगदान: इतिहास और परंपरा की मानवतावादी व्याख्या; कबीर का पुनर्मूल्यांकन; ललित निबंध को नई ऊँचाई दी; संस्कृत, बंगला और हिंदी की परंपराओं का समन्वय। 5. व्यक्तित्व: सरल, विनोदी, प्रकृति-प्रेमी— जैसा ‘कुटज’ में झलकता है।

यह अवलोकन-गतिविधि है। NCERT की फ़िल्म ई-पाठशाला, दीक्षा या NCERT के यूट्यूब चैनल पर देखी जा सकती है।

फ़िल्म देखते समय इन बिंदुओं पर ध्यान दें: - जीवन: 1907, बलिया; शांतिनिकेतन में टैगोर का सान्निध्य; BHU और पंजाब विश्वविद्यालय में अध्यापन। - सम्मान: पद्मभूषण और ‘आलोक पर्व’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार। - रचनाएँ: ‘अशोक के फूल’, ‘कुटज’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘कबीर’, ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’। - योगदान: मानवतावादी इतिहास-दृष्टि और ललित निबंध का उत्कर्ष। - व्यक्तित्व: सरल, विनोदी और प्रकृति-प्रेमी।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ गाढ़े के साथी, नाम बड़ा, कुट-कुटज-कुटनी, जीवनी-शक्ति, उपदेश, सीख (प्रश्न 1–6)
  • ☒ ‘केवल जी रहा है’, स्वार्थ से बड़ी शक्ति, सुख-दुख मन के विकल्प, सप्रसंग व्याख्या (प्रश्न 7–10)
  • ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 11–15)

Total questions answered: 15 of 15

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 17 (कुटज) cover?

All 15 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – योग्यता-विस्तार.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

Yes. The answers follow the current NCERT textbook for Class 12 Hindi Antra and the latest CBSE syllabus, so the question numbers and wording match the book you use in class.

How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

Are the NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 17 (कुटज) free?

Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.