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Class 12 Hindi Antra Chapter 16

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 16: दूसरा देवदास

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XII

Hindi

Antra (NCERT)

16 – दूसरा देवदास

2026-27

16 of 16

बिंदु

विवरण

लेखिका

ममता कालिया (जन्म 1940), वृंदावन (मथुरा); ‘बेघर’, ‘नरक दर नरक’, ‘दौड़’ (उपन्यास); व्यास सम्मान

विधा

कहानी

स्थान

हरिद्वार— हर की पौड़ी, गंगा आरती, मंसा देवी (रोपवे/केबिल कार); बैसाखी का पर्व

पात्र

संभव (दिल्ली का एम.ए. पास युवक, सिविल सेवा की तैयारी), पारो (लड़की), मन्नू (पारो का भतीजा, रोहतक), नानी, मंगल पंडा, पुजारी

कथा

पुजारी द्वारा ‘हम’ को युगल अर्थ में लेकर आशीर्वाद; संभव का पारो के प्रति आकर्षण; मंसा देवी पर दोनों का मनोकामना की गाँठ बाँधना; केबिल कार में फिर मिलना; “पारो”— “संभव देवदास”

मूल भाव

प्रथम प्रेम की कोमल अनुभूति, आस्था, हरिद्वार का धार्मिक-सांस्कृतिक परिवेश

Q1

पाठ के आधार पर हर की पौड़ी पर होने वाली गंगा जी की आरती का भावपूर्ण वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

Answer

उत्तर

संध्या की गोधूलि बेला में हर की पौड़ी पर अद्भुत दृश्य होता है। गंगा सभा के खाकी वर्दी वाले स्वयंसेवक भक्तों को सीढ़ियों पर शांत बैठने का आग्रह करते हैं। पंडित पीतल की पंचमंज़िली नीलांजलि में घी में भीगी सहस्र बत्तियाँ सजाते हैं। गंगा के साथ चामुंडा, बालकृष्ण, राधाकृष्ण, हनुमान, सीताराम की मूर्तियाँ शृंगारित होती हैं। आरती से पहले भक्त निर्मल, नीले गंगाजल में डुबकी लगाते हैं; औरतें ज़ंजीरें पकड़कर स्नान करती हैं और पंडे माथे पर चंदन-सिंदूर लगाते हैं।

यकायक सहस्र दीप जल उठते हैं, पंडित हाथ में अँगोछा लपेटकर नीलांजलि उठाते हैं, और पुजारियों के भर्राए गले से समवेत स्वर उठता है— “जय गंगे माता…”। घंटे-घड़ियाल बजते हैं; मनौतियों के दीयों वाले फूलों के दोने लहरों पर इठलाते आगे बढ़ते हैं; गंगापुत्र गोता लगाकर दोनों से पैसे उठाते हैं। पुजारियों का स्वर थकने पर लाउडस्पीकर पर लता मंगेशकर की सुरीली आवाज़ में ‘ओम जय जगदीश हरे’ गूँज उठता है और आरती में स्निग्ध सौंदर्य भर जाता है। पानी पर सहस्र दीपों की झिलमिलाती प्रतिच्छवियाँ, अगरु-चंदन की दिव्य सुगंध— पूरा वातावरण भव्य और दिव्य हो जाता है। गीले कपड़ों में खड़ी औरतें, संकल्प-मंत्रोच्चार, खुशी-खुशी दी गई दक्षिणा, गले में डाली गई मालाएँ और जी खोलकर बाँटा गया प्रसाद (मुरमुरे, इलायचीदाना, केले, पुष्प)— “कई खर्च सुखदायी होते हैं।”

गोधूलि बेला में स्वयंसेवक भक्तों को बैठाते हैं, पंडित पंचमंज़िली नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ सजाते हैं, भक्त स्नान करते हैं; फिर सहस्र दीप जल उठते हैं, “जय गंगे माता” का समवेत स्वर, घंटे-घड़ियाल, लहरों पर इठलाते दीयों के दोने, लता मंगेशकर के स्वर में ‘ओम जय जगदीश हरे’, जल पर झिलमिलाती दीप-छवियाँ और अगरु-चंदन की सुगंध — वातावरण भव्य और दिव्य हो जाता है; अंत में संकल्प, दक्षिणा, माला और प्रसाद।

Q2

‘गंगापुत्र के लिए गंगा मैया ही जीविका और जीवन है’—इस कथन के आधार पर गंगा पुत्रों के जीवन-परिवेश की चर्चा कीजिए।

Answer

उत्तर

गंगापुत्र वे गोताखोर हैं, जो हर की पौड़ी पर गंगा में रहकर भक्तों द्वारा तैराए गए दोनों से चढ़ावे के पैसे निकालते हैं। 1. जीविका: वे दोने पकड़कर उनमें रखा पैसा उठाकर मुँह में दबा लेते हैं; एक आरती के दौरान बीस-बीस चक्कर लगाकर मुँह भर-भर रेज़गारी बटोरते हैं। 2. पारिवारिक श्रम: उनकी बीवी और बहन कुशाघाट पर यह रेज़गारी बेचकर नोट कमाती हैं— एक रुपए के पचासी, कभी अस्सी पैसे। 3. जोखिम और कठिनाई: दोने के दीपक से एक गंगापुत्र के लँगोट में आग लग गई; लोग हँसे, पर वह हतप्रभ नहीं हुआ और झट गंगा जी में बैठ गया। 4. गंगा से जुड़ाव: गंगा उनका घर, कार्यस्थल, रक्षक और आस्था— सब कुछ है; उसके बिना उनका अस्तित्व नहीं। 5. गरीबी: उनकी आय अनिश्चित और थोड़ी है— “जैसा दिन हो।”

इस प्रकार गंगापुत्रों का जीवन गरीबी, कठोर परिश्रम और जोखिम से भरा है, और पूरी तरह गंगा पर निर्भर है।

गंगापुत्र गोताखोर आरती के समय गंगा में बीस-बीस चक्कर लगाकर दोनों से चढ़ावे के सिक्के मुँह में भर-भरकर बटोरते हैं; उनकी बीवी-बहन कुशाघाट पर रेज़गारी बेचकर (एक रुपए के 80–85 पैसे) नोट कमाती हैं; लँगोट में आग लगने पर भी वे गंगा में बैठकर बच जाते हैं — उनका जीवन गरीबी, जोखिम और अनिश्चित आय से भरा है और पूरी तरह गंगा पर निर्भर है।

Q3

पुजारी ने लड़की के ‘हम’ को युगल अर्थ में लेकर क्या आशीर्वाद दिया और पुजारी द्वारा आशीर्वाद देने के बाद लड़के और लड़की के व्यवहार में अटपटापन क्यों आया?

Answer

उत्तर

आशीर्वाद: लड़की ने कहा— “नहीं, हम कल आरती की बेला आएँगे।” पुजारी ने ‘हम’ को युगल (लड़का-लड़की दोनों) के अर्थ में लिया, क्योंकि वे बिलकुल बराबर खड़े थे, और आशीर्वाद दिया— “सुखी रहो, फूलो-फलो, जब भी आओ साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरे करें।”

अटपटापन क्यों: दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह अनजान थे; पुजारी ने उन्हें पति-पत्नी या प्रेमी-युगल समझ लिया था। इससे— 1. दोनों अकबका गए; लड़की छिटककर दूर खड़ी हो गई, लड़के को तुरंत वहाँ से चल देने की जल्दी हो गई। 2. चप्पलें लेते समय निगाहें टकराईं; संभव कहना चाहता था कि इसमें उसकी गलती नहीं, लड़की कहना चाहती थी कि उसे इतना पास नहीं खड़ा होना चाहिए था— पर फिर उसे लगा कि भूल उसी की थी, वही बाद में आकर पास खड़ी हुई थी। 3. लज्जा और संकोच के कारण दोनों बात नहीं कर सके; लड़की घबराहट में ठीक से चप्पल भी नहीं पहन पाई।

पुजारी ने आशीर्वाद दिया — “सुखी रहो, फूलो-फलो, जब भी आओ साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरे करें।” दोनों अनजान थे और पुजारी ने उन्हें युगल समझ लिया था, इसलिए लज्जा और संकोच से वे अकबका गए — लड़की छिटककर दूर हो गई और घबराहट में ठीक से चप्पल भी न पहन सकी, लड़के को तुरंत चल देने की जल्दी हो गई; दोनों अपनी सफ़ाई देना चाहते थे पर कुछ बोल न सके।

Q4

उस छोटी सी मुलाकात ने संभव के मन में क्या हलचल उत्पन्न कर दी, इसका सूक्ष्म विवेचन कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. खोज की बेचैनी: संभव लड़की के पीछे भीड़ काटता सब्ज़ीमंडी तक गया, घुमावदार गलियों में चक्कर लगाता रहा, चूड़ी की दुकानों पर “एक भीगी, गुलाबी आकृति” ढूँढ़ता रहा; अंत में हारकर पस्त कदमों से घर लौटा।
  2. खोयापन: नानी की बातों का जवाब नहीं दिया, “मुझे भूख नहीं है” कहकर करवट बदल ली।
  3. स्मृतियों का घूमना: नींद और स्वप्न के बीच लड़की का आँख मूँदकर अर्चना करना, भीगे बालों की लट, कुरते को छूता गुलाबी आँचल, “हम कल आएँगे” का सौम्य स्वर याद आता रहा।
  4. आशा और निराशा का उतार-चढ़ाव: याद आया कि वह कल आएगी— तो उत्साह से उठकर खाना माँगा और नानी के खाने की तारीफ़ करने लगा; फिर याद आया कि आशीर्वाद वाली “दुर्घटना” बाद में हुई थी और लड़की घबराकर चली गई थी— तो कौर हाथ में लिए बैठा रह गया, “मुझे भूख नाँय।”
  5. नई अनुभूति: अब तक कोई लड़की उसके जीवन में अहम भूमिका में नहीं आई थी; यह “एक नयी निराली अनुभूति थी जिसमें उसे कुछ सुख और ज़्यादा बेचैनी” लग रही थी।
  6. योजना: उसने तय किया कि कल शाम पाँच बजे से घाट पर ऐसी जगह बैठेगा, जहाँ से पुजारी का देवालय सीधा दिखे; पछतावा कि नाम भी नहीं पूछा; विश्वास कि हज़ारों की भीड़ में भी उसे पहचान लेगा।
  7. रंग-बोध का बदलना: “कल से उसे गुलाबी के सिवा और कोई रंग सुहा ही नहीं रहा था”; बिंदियाँ आकर्षक लगने लगीं; मन ही मन उसने “उस अज्ञातयौवना” के माथे पर बिंदी सजा दी।

यह सब प्रथम प्रेम के आकर्षण की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक हलचल है।

संभव के मन में प्रथम प्रेम की हलचल जागी — लड़की को गलियों और चूड़ी की दुकानों में ढूँढ़ता रहा, घर लौटकर खोया-खोया रहा और भूख मर गई; स्वप्न में उसका अर्चन, भीगी लट, गुलाबी आँचल, “हम कल आएँगे” घूमते रहे; कल आने की याद से उत्साह और आशीर्वाद-प्रसंग की याद से निराशा; सुख से अधिक बेचैनी वाली नई अनुभूति; कल पाँच बजे से घाट पर बैठने की योजना, नाम न पूछने का पछतावा; और अब गुलाबी के सिवा कोई रंग न सुहाना।

Q5

मंसा देवी जाने के लिए केबिलकार में बैठे हुए संभव के मन में जो कल्पनाएँ उठ रही थीं, उनका वर्णन कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. गुलाबी रंग का आकर्षण: संभव गुलाबी केबिल कार में बैठा, क्योंकि कल से उसे गुलाबी के सिवा कोई रंग सुहा ही नहीं रहा था— लड़की की गुलाबी साड़ी की याद।
  2. बिंदी की कल्पना: कतार में खड़े हुए उसने बच्चों की हथेलियों पर बनी बिंदियाँ देखीं और मन ही मन एक बिंदी “उस अज्ञातयौवना” के माथे पर सजा दी; “माँग में तारे भर देने” जैसे आधे-अधूरे फ़िल्मी गीत याद आए।
  3. चढ़ावे का अफ़सोस: नवविवाहित दंपति के हाथ में चढ़ावे की थैली देखकर उसे अफ़सोस हुआ कि वह चढ़ावा नहीं लाया।
  4. स्वप्नलोक-सी अनुभूति: नीचे कतारबद्ध खिले फूल— लगता था रंग-बिरंगी वादियों से कोई हिंडोला उड़ा जा रहा है; विहंगम दृश्य में मन रम गया— मंदिरों के बुर्ज, गंगा की धवल धार, सड़कों के घुमाव— फ़ौलाद के खंभे और केबिल नज़र ही नहीं आए।
  5. (मंदिर पहुँचकर उसने पूरी श्रद्धा से मनोकामना की गाँठ बाँधी— निश्चय ही उसी लड़की से मिलने की।)

संभव लड़की की गुलाबी साड़ी की याद में गुलाबी केबिल कार में बैठा; कतार में बिंदियाँ देखकर मन ही मन उस अज्ञातयौवना के माथे पर बिंदी सजाई और “माँग में तारे भरने” जैसे गीत याद आए; नवविवाहित दंपति को देखकर चढ़ावा न लाने का अफ़सोस हुआ; नीचे खिले फूलों के ऊपर उसे लगा जैसे रंग-बिरंगी वादियों से कोई हिंडोला उड़ा जा रहा हो — पूरा दृश्य स्वप्नलोक-सा लगा।

Q6

“पारो बुआ, पारो बुआ इनका नाम है… उसे भी मनोकामना का पीला-लाल धागा और उसमें पड़ी गिठान का मधुर स्मरण हो आया।” कथन के आधार पर कहानी के संकेतपूर्ण आशय पर टिप्पणी लिखिए।

Answer

उत्तर

  1. ‘पारो’ और ‘देवदास’ का संकेत: शरतचंद्र के प्रसिद्ध उपन्यास ‘देवदास’ के नायक-नायिका देवदास और पारो अमर प्रेमी हैं। जब मन्नू ने बुआ का नाम ‘पारो’ बताया, तो संभव ने अपना परिचय हँसते हुए “संभव देवदास” के रूप में दिया— अर्थात वह स्वयं को पारो का देवदास मानता है। यह प्रेम की स्वीकृति का संकेत है।
  2. मनोकामना की पूर्ति: संभव ने मंसा देवी पर लड़की से मिलने की मनोकामना की गाँठ बाँधी थी; वह तुरंत पूरी हो गई— इसलिए उसे धागे और गिठान (गाँठ) का मधुर स्मरण हुआ।
  3. ‘भी’ शब्द का संकेत: ‘उसे भी’— अर्थात पारो ने भी वहाँ मनोकामना की गाँठ बाँधी थी (वह मंसा देवी पर एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प ले रही थी— “इधर बाँधो उधर लग जाती है”)। दोनों की मनोकामना एक ही थी— एक-दूसरे से मिलना। यह परस्पर प्रेम का संकेत है।
  4. सुखद अंत का संकेत: ‘दूसरा देवदास’ मूल देवदास की तरह दुखांत नहीं होगा— यहाँ प्रेम की शुरुआत आस्था और शुभ संयोग से हुई है; पुजारी का आशीर्वाद “जब भी आओ साथ ही आना” फलित होता दिखता है।

‘पारो’ नाम सुनते ही संभव का स्वयं को “संभव देवदास” कहना शरत के ‘देवदास’ के अमर प्रेमी युगल का संकेत है — प्रेम की स्वीकृति। मंसा देवी पर बाँधी गाँठ का मधुर स्मरण बताता है कि उसकी मनोकामना (लड़की से मिलना) पूरी हो गई; ‘भी’ से संकेत है कि पारो ने भी वही मनोकामना की थी — यानी प्रेम परस्पर है; और पुजारी का “साथ ही आना” वाला आशीर्वाद फलित होकर सुखद अंत की ओर इशारा करता है।

Q7

‘मनोकामना की गाँठ भी अद्भुत, अनूठी है, इधर बाँधो उधर लग जाती है।’ कथन के आधार पर पारो की मनोदशा का वर्णन कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. प्रेम का अंकुर: हर की पौड़ी पर हुई घटना के बाद पारो के मन में भी संभव के प्रति आकर्षण जाग गया था; उसने मंसा देवी पर उससे फिर मिलने की मनोकामना की गाँठ बाँधी थी।
  2. आश्चर्य और प्रसन्नता: लौटते समय ही संभव का सामने आ जाना उसे चमत्कार-सा लगा— गाँठ बाँधते ही मनोकामना पूरी हो गई (“इधर बाँधो उधर लग जाती है”)।
  3. लज्जा: वह “सफ़ेद साड़ी में लाज से गुलाबी” हो रही थी— संकोच और लज्जा का भाव।
  4. आस्था और कृतज्ञता: उसने मंसा देवी पर एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प लिया— देवी के प्रति आभार।
  5. चंचल उलाहना: “ऐसे कैसे दोस्त हैं तुम्हारे, तुम्हें उनका नाम भी नहीं पता?”— इसमें छिपी उत्सुकता कि वह संभव का नाम जानना चाहती है।

उसकी मनोदशा प्रेम, प्रसन्नता, लज्जा, आश्चर्य और आस्था का मधुर मिश्रण है।

प्रश्न 1

पारो के मन में भी संभव के प्रति आकर्षण था और उसने उससे मिलने की मनोकामना की गाँठ बाँधी थी; तुरंत मिलन से वह आश्चर्यचकित और प्रसन्न थी, सफ़ेद साड़ी में लाज से गुलाबी हो रही थी, देवी पर एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प लेकर कृतज्ञ थी, और “नाम भी नहीं पता?” के उलाहने में संभव का नाम जानने की उत्सुकता थी — प्रेम, लज्जा, आश्चर्य और आस्था का मधुर मिश्रण।

उत्तर

Q8

निम्नलिखित वाक्यों का आशय स्पष्ट कीजिए— (क) ‘तुझे तो तैरना भी न आवे। कहीं पैर फिसल जाता तो मैं तेरी माँ को कौन मुँह दिखाती।’ (ख) ‘उसके चेहरे पर इतना विभोर विनीत भाव था मानो उसने अपना सारा अहम त्याग दिया है, उसके अंदर स्व से जनित कोई कुंठा शेष नहीं है, वह शुद्ध रूप से चेतनस्वरूप, आत्माराम और निर्मलानंद है।’ (ग) ‘एकदम अंदर के प्रकोष्ठ में चामुंडा रूप धारिणी मंसादेवी स्थापित थी। व्यापार यहाँ भी था।’

Answer

उत्तर

(क) संभव देर से घर लौटा तो नानी ने चिंता और स्नेह से यह कहा। संभव को तैरना नहीं आता था; नानी डर रही थीं कि भीड़भाड़ वाले घाट पर कहीं वह फिसलकर गंगा में न डूब जाए। धेवता उनकी ज़िम्मेदारी पर था; कुछ हो जाता तो वे अपनी बेटी (संभव की माँ सविता) के सामने लज्जित होतीं, उसे क्या जवाब देतीं। इसमें नानी का वात्सल्य, चिंता और उत्तरदायित्व-बोध प्रकट होता है।

(ख) बैसाखी की सुबह संभव ने गंगा की धारा के बीच सूर्य की ओर हाथ जोड़े खड़े एक व्यक्ति को देखा। उसके चेहरे पर भक्ति में डूबा, विनम्र भाव था— मानो उसने अपना पूरा अहंकार त्याग दिया हो, उसमें ‘मैं’ से उपजी कोई कुंठा या ग्रंथि न बची हो। वह ईश्वर में लीन, शुद्ध चेतना-स्वरूप, अपनी आत्मा में रमा हुआ (आत्माराम) और निर्मल आनंद में मग्न था। यह सच्ची भक्ति और आध्यात्मिक तल्लीनता का चित्र है, जो उस भीड़ की एकसूत्रता और कल्याण-भावना को भी दिखाता है।

(ग) मंसा देवी के मंदिर के सबसे भीतरी कक्ष में चामुंडा का रूप धारण करने वाली मंसा देवी की मूर्ति स्थापित थी। लेखिका व्यंग्य करती हैं कि धर्मस्थल होने के बावजूद यहाँ भी व्यापार चल रहा था— मनोकामना के लाल-पीले धागे सवा रुपए में बिक रहे थे, चुनरी-प्रसाद की थैलियाँ, ‘असली रुद्राक्ष’ की मालाएँ बिक रही थीं। अर्थात आस्था का भी व्यवसायीकरण हो गया है (जैसे हर की पौड़ी पर ‘स्पेशल आरती’, रेज़गारी का धंधा)।

(क) तैरना न जानने वाले धेवते के देर से लौटने पर नानी की चिंता — कुछ हो जाता तो बेटी को क्या मुँह दिखातीं; इसमें वात्सल्य और ज़िम्मेदारी का भाव है। (ख) गंगा की धारा में सूर्य को हाथ जोड़े खड़ा व्यक्ति भक्ति में इतना लीन था मानो उसका अहंकार और ‘स्व’ की हर कुंठा मिट गई हो — वह शुद्ध चेतना, आत्मा में रमा और निर्मल आनंद में मग्न था; सच्ची आध्यात्मिक तल्लीनता का चित्र। (ग) मंदिर के भीतरी कक्ष में चामुंडा-रूपी मंसा देवी थीं, पर वहाँ भी मनोकामना के धागे, चुनरी, रुद्राक्ष बिक रहे थे — आस्था के व्यवसायीकरण पर व्यंग्य।

Q9

‘दूसरा देवदास’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. ‘देवदास’ का संदर्भ: शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘देवदास’ में देवदास और पारो प्रेमी हैं; ‘देवदास’ प्रेम में डूबे, प्रेमिका के लिए व्याकुल प्रेमी का प्रतीक बन गया है।
  2. संभव— दूसरा देवदास: संभव भी पहली ही मुलाकात में लड़की के प्रेम में पड़ जाता है; उसे खोजता है, खाना-पीना-नींद भूल जाता है, बेचैन रहता है— देवदास जैसी दशा।
  3. नायिका का नाम पारो: संयोग से लड़की का नाम भी ‘पारो’ है। नाम सुनते ही संभव स्वयं को “संभव देवदास” कहता है— कहानी का चरम बिंदु और शीर्षक का सीधा आधार।
  4. ‘दूसरा’ शब्द की सार्थकता: यह देवदास मूल देवदास से भिन्न है— मूल कथा दुखांत है (देवदास विरह में मरता है), जबकि यहाँ प्रेम मनोकामना की गाँठ और पुजारी के आशीर्वाद से शुभ, सुखद दिशा में बढ़ता है; यह आधुनिक, आशावादी देवदास है।
  5. शीर्षक जिज्ञासा जगाने वाला, सांकेतिक और कथा के केंद्रीय भाव (प्रथम प्रेम) को व्यक्त करने वाला है।

अतः शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।

शरत के ‘देवदास’ का नायक प्रेम में व्याकुल प्रेमी का प्रतीक है; संभव भी पहली मुलाकात में प्रेम में पड़कर बेचैन, खोया-खोया रहता है; लड़की का नाम भी ‘पारो’ निकलता है और संभव स्वयं को “संभव देवदास” कहता है। ‘दूसरा’ इसलिए कि यह मूल दुखांत देवदास से भिन्न, आस्था और शुभ संयोग से सुखद दिशा में बढ़ता आधुनिक देवदास है — इसलिए शीर्षक सांकेतिक, जिज्ञासापूर्ण और पूर्णतः सार्थक है।

Q10

‘हे ईश्वर! उसने कब सोचा था कि मनोकामना का मौन उद्गार इतनी शीघ्र शुभ परिणाम दिखाएगा’—आशय स्पष्ट कीजिए।

Answer

उत्तर

संभव टोटकों को नहीं मानता था, फिर भी उसने मंसा देवी के मंदिर में पूरी श्रद्धा से मनोकामना की गाँठ बाँधी थी— मन ही मन (मौन उद्गार) प्रार्थना की थी कि वह लड़की उसे फिर मिले। लौटते समय ही उसने लड़की को पीली केबिल कार में देखा, और नीचे पहुँचकर मन्नू के माध्यम से उससे मुलाकात हो गई; वही कंठ, वही उलाहना, वही अंदाज़ पहचानकर उसका रोम-रोम पुलक उठा। उसे आश्चर्य और अपार प्रसन्नता हुई कि मन में चुपचाप माँगी गई इच्छा इतनी जल्दी पूरी हो गई— उसने कल्पना भी नहीं की थी। ‘हे ईश्वर!’ में उसका विस्मय, आनंद और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त हुई है; इससे उसकी आस्था भी दृढ़ होती है।

संभव ने मंसा देवी पर मन ही मन (मौन उद्गार) लड़की से फिर मिलने की मनोकामना की गाँठ बाँधी थी; लौटते ही उसी लड़की से मुलाकात हो गई — वही कंठ, वही अंदाज़ पहचानकर उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा। इतनी जल्दी इच्छा पूरी होने पर उसके मन में विस्मय, अपार आनंद और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव है।

अभ्यास – भाषा-शिल्प

Q11

इस पाठ का शिल्प आख्याता (नैरेटर-लेखक) की ओर से लिखते हुए बना है—पाठ से कुछ उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए।

Answer

उत्तर

कहानी अन्य पुरुष (तृतीय पुरुष) शैली में है; एक सर्वज्ञ आख्याता (लेखिका) बाहर खड़े होकर घटनाओं, दृश्यों और पात्रों के मन की बातें बताती हैं— 1. दृश्य-वर्णन: “गंगा सभा के स्वयंसेवक खाकी वरदी में मुस्तैदी से घूम रहे हैं… यकायक सहस्र दीप जल उठते हैं…”— वर्तमान काल में आँखों देखा वर्णन। 2. आख्याता की टिप्पणियाँ: “जो भी आपका आराध्य हो, चुन लें।”, “सबने देशी घी के डब्बे अपनी ईमानदारी के प्रतीकस्वरूप सजा रखे हैं।”, “कई खर्च सुखदायी होते हैं।”, “व्यापार यहाँ भी था।”— लेखिका का व्यंग्य और विचार। 3. पात्रों के मन का ज्ञान: “संभव आगे बढ़कर कहना चाहता था, ‘देखिए इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी।’ लड़की कहना चाहती थी, ‘आपको इतना पास नहीं खड़ा होना चाहिए था।’”— आख्याता दोनों पात्रों के मन की बात जानती है। 4. पात्र-परिचय: “उसकी ज़्यादा उम्र नहीं थी। इसी साल एम.ए. पूरा किया था। अब वह सिविल सर्विसेज़ प्रतियोगिताओं में बैठने वाला था।” 5. मनोभावों का विश्लेषण: “सब मिलाकर एक नयी निराली अनुभूति थी जिसमें उसे कुछ सुख और ज़्यादा बेचैनी लग रही थी।” 6. पारो के मन की बात: “उसने मंसा देवी पर एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प लेते हुए सोचा…” 7. ‘वह’, ‘संभव’, ‘लड़का’, ‘लड़की’ जैसे अन्य पुरुष सर्वनामों और संज्ञाओं का प्रयोग।

कहानी अन्य पुरुष शैली में सर्वज्ञ आख्याता द्वारा कही गई है — आरती का दृश्य-वर्णन (“यकायक सहस्र दीप जल उठते हैं”), आख्याता की व्यंग्यपूर्ण टिप्पणियाँ (“जो भी आपका आराध्य हो, चुन लें”, “व्यापार यहाँ भी था”, “कई खर्च सुखदायी होते हैं”), दोनों पात्रों के मन की बात (“संभव कहना चाहता था… लड़की कहना चाहती थी…”), संभव का परिचय (एम.ए., सिविल सेवा), मनोविश्लेषण (“कुछ सुख और ज़्यादा बेचैनी”), पारो का मन (“चुनरी चढ़ाने का संकल्प लेते हुए सोचा”), और ‘वह’, ‘लड़का’, ‘लड़की’ जैसे प्रयोग।

Q12

पाठ में आए पूजा-अर्चना के शब्दों तथा इनसे संबंधित वाक्यों को छाँटकर लिखिए।

Answer

उत्तर

शब्द: आरती, स्पेशल आरती, नीलांजलि, सहस्र बत्तियाँ, देशी घी, मूर्ति, स्नान, डुबकी, पंडा, जजमान/यजमान, चंदन, सिंदूर, तिलक, टीका, मनौती, दीये, दोने, चढ़ावा, घंटे-घड़ियाल, संकल्प, मंत्रोच्चार, दक्षिणा, ब्राह्मण-भोज, दान, माला, प्रसाद, दर्शन, चरणामृत, कलावा, अर्चन, आशीर्वाद/आशीष, कल्याण-मंत्र, मनोरथ, नैवेद्य, चुनरी, मनोकामना, धागा, गाँठ, शीश नवाना, रुद्राक्ष, ध्यान, भजन, नारियल, फूल।

वाक्य: 1. “पीतल की नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ घी में भिगोकर रखी हुई हैं।” 2. “मर्दों के माथे पर चंदन तिलक और औरतों के माथे पर सिंदूर का टीका लगा देते हैं पंडे।” 3. “मनौतियों के दिये लिए हुए फूलों की छोटी-छोटी किश्तियाँ गंगा की लहरों पर इठलाती हुई आगे बढ़ती हैं।” 4. “आरती के बाद बारी है संकल्प और मंत्रोच्चार की। भक्त आरती लेते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं।” 5. “पंडित जी प्रसन्न होकर भगवान के गले से माला उतार-उतारकर यजमान के गले में डालते हैं।” 6. “चंदन तिलक के बगैर अस्नान अधूरा होता है बेटा।” 7. “पुजारी जी ने चरणामृत दिया और लाल रंग का कलावा बाँधने के लिए हाथ बढ़ाया।” 8. “का कराना है संकल्प, कल्याण-मंत्र, आरती जो कहो?” 9. “सुखी रहो, फूलो-फलो, जब भी आओ साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरे करें।” 10. “मनोकामना के हेतुक लाल-पीले धागे सवा रुपए में बिक रहे थे। लोग पहले धागा बाँधते, फिर देवी के आगे शीश नवाते।” 11. “संभव ने भी पूरी श्रद्धा के साथ मनोकामना की, गाँठ लगाई, सिर झुकाया, नैवेद्य चढ़ाया।”

शब्द: आरती, नीलांजलि, सहस्र बत्तियाँ, स्नान, डुबकी, पंडा, यजमान, चंदन-तिलक, सिंदूर-टीका, मनौती, दोने, चढ़ावा, घंटे-घड़ियाल, संकल्प, मंत्रोच्चार, दक्षिणा, माला, प्रसाद, दर्शन, चरणामृत, कलावा, अर्चन, आशीष, मनोरथ, नैवेद्य, चुनरी, मनोकामना की गाँठ, शीश नवाना, रुद्राक्ष, भजन। वाक्य: “पीतल की नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ घी में भिगोकर रखी हुई हैं”; “आरती के बाद बारी है संकल्प और मंत्रोच्चार की”; “चंदन तिलक के बगैर अस्नान अधूरा होता है”; “पुजारी जी ने चरणामृत दिया और कलावा बाँधने के लिए हाथ बढ़ाया”; “संभव ने मनोकामना की, गाँठ लगाई, सिर झुकाया, नैवेद्य चढ़ाया”।

अभ्यास – योग्यता-विस्तार

Q13

चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ कहानी पढ़िए और उस पर बनी फ़िल्म देखिए।

Answer

उत्तर

(पठन हेतु परिचय)

‘उसने कहा था’ (1915) चंद्रधर शर्मा गुलेरी की प्रसिद्ध कहानी है, जिसे हिंदी की पहली श्रेष्ठ आधुनिक कहानियों में गिना जाता है।

कथा: अमृतसर के बाज़ार में बारह वर्ष का लड़का लहना सिंह और आठ वर्ष की एक लड़की मिलते हैं। लड़का बार-बार पूछता है— “तेरी कुड़माई (सगाई) हो गई?” लड़की “धत्” कहकर भाग जाती है; एक दिन वह कहती है— “हाँ, हो गई… देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।” लहना उदास हो जाता है। पच्चीस वर्ष बाद, प्रथम विश्वयुद्ध के समय, जमादार लहना सिंह सूबेदार हज़ारा सिंह के घर जाता है, तो सूबेदारनी वही लड़की निकलती है। वह लहना से कहती है कि मेरे पति और इकलौते बेटे बोधा सिंह की युद्ध में रक्षा करना— “उसने कहा था।” फ़्रांस के मोर्चे पर लहना जर्मन जासूस (नकली लपटन साहब) की चाल पकड़ता है, बोधा सिंह को अपना कंबल-जर्सी देकर बचाता है, सूबेदार और बोधा की रक्षा करते हुए स्वयं घायल होकर प्राण त्याग देता है। मरते समय उसे बचपन की स्मृतियाँ आती हैं— “उसने कहा था।”

विशेषताएँ: निःस्वार्थ, त्यागमय प्रेम; कर्तव्यनिष्ठा; फ़्लैशबैक-शिल्प; पंजाबी परिवेश और युद्ध का यथार्थ चित्रण।

फ़िल्म: इस कहानी पर 1960 में ‘उसने कहा था’ नामक फ़िल्म बनी (निर्देशक मोनी भट्टाचार्य; सुनील दत्त और नंदा)।

‘दूसरा देवदास’ से तुलना: दोनों में किशोर/युवा प्रेम की कोमल शुरुआत है; ‘उसने कहा था’ त्यागपूर्ण दुखांत है, जबकि ‘दूसरा देवदास’ आशापूर्ण।

प्रश्न 1

‘उसने कहा था’ (1915) — अमृतसर के बाज़ार में बालक लहना सिंह और एक लड़की की भेंट (“तेरी कुड़माई हो गई?”); पच्चीस वर्ष बाद वही लड़की सूबेदारनी बनकर लहना से युद्ध में अपने पति और बेटे बोधा सिंह की रक्षा का वचन लेती है; लहना फ़्रांस के मोर्चे पर दोनों को बचाते हुए प्राण त्याग देता है — निःस्वार्थ प्रेम, कर्तव्य और फ़्लैशबैक-शिल्प की कहानी; इस पर 1960 में फ़िल्म बनी (सुनील दत्त, नंदा)।

उत्तर

Q14

हरिद्वार और उसके आसपास के स्थानों की जानकारी प्राप्त कीजिए।

Answer

उत्तर

हरिद्वार (उत्तराखंड): ‘हरि का द्वार’ या ‘हर का द्वार’— जहाँ गंगा पहाड़ों से मैदान में उतरती है; हिंदुओं के सात पवित्र नगरों (सप्तपुरी) में एक; हर 12 वर्ष में कुंभ और 6 वर्ष में अर्धकुंभ मेला।

हरिद्वार के प्रमुख स्थल: 1. हर की पौड़ी (ब्रह्मकुंड): सबसे पवित्र घाट; संध्या की गंगा आरती प्रसिद्ध; मान्यता है कि यहाँ विष्णु के चरण-चिह्न हैं। 2. मंसा देवी मंदिर: बिल्व पर्वत पर; रोपवे (उड़न खटोला) से पहुँचते हैं; मनोकामना के धागे बाँधने की परंपरा। 3. चंडी देवी मंदिर: नील पर्वत पर; यहाँ भी रोपवे। 4. माया देवी मंदिर: प्राचीन शक्तिपीठ; हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी। 5. कुशावर्त घाट (कुशाघाट), भारत माता मंदिर, सप्तऋषि आश्रम, शांतिकुंज (गायत्री परिवार), पतंजलि योगपीठ। 6. दक्ष प्रजापति मंदिर (कनखल)।

आसपास: 1. ऋषिकेश (लगभग 25 किमी): योग नगरी; लक्ष्मण झूला, राम झूला, त्रिवेणी घाट, परमार्थ निकेतन की आरती, रिवर राफ़्टिंग। 2. राजाजी राष्ट्रीय उद्यान: हाथी, बाघ, तेंदुए। 3. देहरादून और मसूरी: राजधानी और पहाड़ों की रानी। 4. नीलकंठ महादेव मंदिर (ऋषिकेश के पास)। 5. हरिद्वार-ऋषिकेश से ही चार धाम यात्रा (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ) का मार्ग शुरू होता है।

हरिद्वार — गंगा के मैदान में उतरने का स्थान, सप्तपुरियों में एक, कुंभ मेले का स्थल। प्रमुख स्थल: हर की पौड़ी (गंगा आरती), मंसा देवी (बिल्व पर्वत, रोपवे), चंडी देवी, माया देवी, कुशावर्त घाट, भारत माता मंदिर, शांतिकुंज, दक्ष मंदिर (कनखल)। आसपास: ऋषिकेश (लक्ष्मण-राम झूला, योग, राफ़्टिंग), राजाजी राष्ट्रीय उद्यान, देहरादून-मसूरी, नीलकंठ महादेव; चार धाम यात्रा का प्रवेश द्वार।

Q15

गंगा नदी पर एक निबंध लिखिए।

Answer

उत्तर

गंगा: भारत की जीवनरेखा

गंगा केवल एक नदी नहीं, भारत की आस्था, संस्कृति और सभ्यता की जीवनरेखा है। भारतीय इसे ‘माँ’ कहते हैं।

उद्गम और प्रवाह: गंगा उत्तराखंड में गंगोत्री हिमनद (गोमुख) से भागीरथी के रूप में निकलती है। देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर ‘गंगा’ कहलाती है। ऋषिकेश, हरिद्वार, कानपुर, प्रयागराज (यमुना-सरस्वती से संगम), वाराणसी, पटना होती हुई लगभग 2525 किमी बहकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है, जहाँ विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा सुंदरबन बनता है।

धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व: पौराणिक कथा के अनुसार राजा भगीरथ के तप से गंगा पृथ्वी पर आई और शिव ने उसे अपनी जटाओं में धारण किया। इसके तट पर हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी जैसे तीर्थ हैं; कुंभ मेला लगता है। गंगाजल को पवित्र माना जाता है। कबीर, तुलसी, रैदास जैसे संतों की वाणी इसके तट पर गूँजी।

आर्थिक महत्व: गंगा का मैदान विश्व के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में है; यह भारत की लगभग 40% आबादी का भरण-पोषण करता है। इससे सिंचाई, पेयजल, मत्स्य-पालन, जल-परिवहन और पर्यटन से करोड़ों लोगों की जीविका चलती है— जैसे पाठ के गंगापुत्र।

प्रदूषण की समस्या: औद्योगिक कचरा, शहरों का सीवर, प्लास्टिक, शवों और पूजन-सामग्री का विसर्जन, और बाँधों से कम होता प्रवाह गंगा को प्रदूषित कर रहे हैं।

संरक्षण के प्रयास: गंगा एक्शन प्लान (1986) और नमामि गंगे (2014) कार्यक्रम के अंतर्गत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, घाटों का विकास, औद्योगिक कचरे पर रोक जैसे प्रयास चल रहे हैं। गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया है और गंगा डॉल्फ़िन राष्ट्रीय जलीय जीव है।

उपसंहार: गंगा की स्वच्छता केवल सरकार का नहीं, हर नागरिक का कर्तव्य है। हमें प्रदूषण न फैलाने और गंगा को निर्मल-अविरल बनाए रखने का संकल्प लेना चाहिए— तभी “हर-हर बहता गंगाजल, निर्मल, नीला, निष्पाप” बना रहेगा।

निबंध के बिंदु: - उद्गम-प्रवाह: गंगोत्री (गोमुख) से भागीरथी के रूप में निकलकर देवप्रयाग में ‘गंगा’ बनती है और लगभग 2525 किमी बहकर बंगाल की खाड़ी में सुंदरबन डेल्टा बनाती है। - धार्मिक महत्व: भगीरथ-कथा, हरिद्वार-प्रयागराज-वाराणसी जैसे तीर्थ और कुंभ। - आर्थिक महत्व: उपजाऊ मैदान, सिंचाई, पेयजल और जीविका। - प्रदूषण: औद्योगिक कचरा, सीवर और प्लास्टिक। - संरक्षण: गंगा एक्शन प्लान, नमामि गंगे; गंगा राष्ट्रीय नदी है। - उपसंहार: स्वच्छता हर नागरिक का कर्तव्य है।

Q16

आपके नगर / गाँव में नदी-तालाब-मंदिर के आसपास जो कर्मकांड होते हैं उनका रेखाचित्र के रूप में लेखन कीजिए।

Answer

उत्तर

रेखाचित्र: गाँव के तालाब वाला शिव मंदिर

(नमूना)

गाँव के पूरब में पुराना पोखर है— किनारों पर सीढ़ियाँ, एक ओर बरगद का विशाल पेड़ और उसके नीचे छोटा-सा शिव मंदिर। भोर होते ही यहाँ जीवन जाग उठता है।

सबसे पहले पहुँचते हैं पुजारी रामदीन बाबा— दुबली देह, माथे पर त्रिपुंड, कंधे पर गमछा। वे तालाब में डुबकी लगाकर “हर-हर महादेव” का उद्घोष करते हैं, मंदिर का कपाट खोलते हैं और घंटा बजाते हैं। उसकी गूँज पूरे गाँव में सुबह की घोषणा कर देती है।

फिर आती हैं गाँव की औरतें— पीतल के लोटों में जल, थाली में फूल, अक्षत, बेलपत्र, धतूरा। वे शिवलिंग पर जल चढ़ाती हैं, बरगद के चारों ओर कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं और मन्नत माँगती हैं। सोमवार और सावन में भीड़ बढ़ जाती है; कांवड़िए गंगाजल लेकर आते हैं।

तालाब के घाट पर छठ पर्व का दृश्य अनोखा होता है— महिलाएँ घुटनों तक पानी में खड़ी होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देती हैं, सूप में ठेकुआ, फल, गन्ना सजा होता है, गीत गूँजते हैं— “काँच ही बाँस के बहँगिया…”। कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान होता है— तालाब का जल सैकड़ों दीयों से झिलमिला उठता है। किसी के घर बच्चा होने पर मुंडन, विवाह से पहले मटकोड़, और किसी की मृत्यु पर दसवाँ-तेरहवीं के स्नान भी यहीं होते हैं।

मंदिर के बाहर फूल वाली काकी बैठी रहती हैं— एक टोकरी गेंदे, दूसरी बेलपत्र की। “पाँच रुपए की माला, बिटिया!” उनकी पोपली मुस्कान सबको जानी-पहचानी है।

पर इस आस्था के साथ कुछ चिंताएँ भी हैं— पूजा के फूल, प्लास्टिक की थैलियाँ और मूर्तियाँ तालाब में डाल दी जाती हैं, जिससे पानी गंदा होने लगा है। पिछले वर्ष गाँव के युवाओं ने तालाब की सफ़ाई की और फूलों से खाद बनाने का गड्ढा खोदा— आस्था और स्वच्छता का सुंदर मेल।

साँझ को फिर घंटा बजता है, आरती के दीये जलते हैं और तालाब के जल पर उनकी परछाइयाँ काँपने लगती हैं— ठीक वैसे ही, जैसे हर की पौड़ी पर सहस्र दीपों की प्रतिच्छवियाँ।

रेखाचित्र का नमूना — गाँव के पोखर किनारे बरगद तले शिव मंदिर: - सुबह: भोर में पुजारी रामदीन बाबा का स्नान, “हर-हर महादेव” और घंटा; औरतों का जल, बेलपत्र और धतूरा चढ़ाना, बरगद की परिक्रमा और मन्नत। - पर्व-संस्कार: सावन-सोमवार की भीड़, छठ पर सूर्य को अर्घ्य, कार्तिक पूर्णिमा का दीपदान, और मुंडन, मटकोड़, तेरहवीं जैसे संस्कार। - पात्र और चिंता: फूल वाली काकी; पूजा-सामग्री और प्लास्टिक से तालाब का प्रदूषण, जिसे युवाओं ने सफ़ाई और खाद-गड्ढे से सुधारा। - संध्या: आरती के दीयों की जल पर काँपती परछाइयाँ।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ गंगा आरती, गंगापुत्र, आशीर्वाद-प्रसंग, संभव की हलचल, केबिल कार की कल्पनाएँ (प्रश्न 1–5)
  • ☒ पारो-देवदास संकेत, पारो की मनोदशा, आशय, शीर्षक, मनोकामना (प्रश्न 6–10)
  • ☒ भाषा-शिल्प (प्रश्न 11–12)
  • ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 13–16)

Total questions answered: 16 of 16

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 16 (दूसरा देवदास) cover?

All 18 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – भाषा-शिल्प and अभ्यास – योग्यता-विस्तार.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

Yes. The answers follow the current NCERT textbook for Class 12 Hindi Antra and the latest CBSE syllabus, so the question numbers and wording match the book you use in class.

How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

Are the NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 16 (दूसरा देवदास) free?

Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.