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Class 12 Hindi Antra Chapter 11

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 11: सुमिरिनी के मनके

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XII

Hindi

Antra (NCERT)

11 – सुमिरिनी के मनके

2026-27

24 of 24

बिंदु

विवरण

लेखक

पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी (1883–1920), जयपुर; ‘उसने कहा था’ (कहानी), ‘कछुआ धरम’, ‘मारेसि मोहिं कुठाँव’ (निबंध)

विधा

लघु निबंध (तीन) — ‘सुमिरिनी के मनके’ से

(क) बालक बच गया

शिक्षा ग्रहण की सही उम्र; 8 वर्ष के बालक को रटाए गए उम्र से बड़े प्रश्न; इनाम में ‘लड्डू’ माँगकर बालक की स्वाभाविकता बच जाना

(ख) घड़ी के पुर्ज़े

धर्म के रहस्य पर धर्माचार्यों के एकाधिकार पर घड़ी के दृष्टांत से व्यंग्य

(ग) ढेले चुन लो

वैदिक काल में मिट्टी के ढेलों से वधू-चयन की ‘लाटरी’; ज्योतिष आदि अंधविश्वासों पर चोट

शैली

सरल, बोलचाल की, व्यंग्यपूर्ण पर गंभीर विषय-प्रवर्तन

अभ्यास – (क) बालक बच गया

Q1

बालक से उसकी उम्र और योग्यता से ऊपर के कौन-कौन से प्रश्न पूछे गए?

Answer

उत्तर

आठ वर्ष के बालक से ये प्रश्न पूछे गए— 1. धर्म के दस लक्षण। 2. नौ रसों के उदाहरण। 3. पानी के चार डिग्री के नीचे शीतता में फैल जाने का कारण और उससे मछलियों की प्राणरक्षा। 4. चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान। 5. अभाव को पदार्थ मानने या न मानने का शास्त्रार्थ। 6. इंग्लैंड के राजा आठवें हेनरी की स्त्रियों के नाम। 7. पेशवाओं का कुर्सीनामा (राज की अवधि)। 8. “तू क्या करेगा?”— भविष्य की योजना।

ये सब दर्शन, साहित्य, विज्ञान और इतिहास के गंभीर प्रश्न थे, जो आठ वर्ष के बालक की समझ से बहुत ऊपर थे; उसने इन्हें रटकर उत्तर दिए।

प्रश्न 1

धर्म के दस लक्षण, नौ रसों के उदाहरण, चार डिग्री से नीचे पानी के फैलने का कारण और मछलियों की प्राणरक्षा, चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान, अभाव को पदार्थ मानने का शास्त्रार्थ, आठवें हेनरी की स्त्रियों के नाम, पेशवाओं का कुर्सीनामा और “तू क्या करेगा?” — सब आठ वर्ष की उम्र से बहुत ऊपर के, रटे हुए प्रश्न।

उत्तर

Q2

बालक ने क्यों कहा कि मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा?

Answer

उत्तर

बालक ने यह उत्तर अपनी समझ या इच्छा से नहीं दिया था; यह उसका “सीखा-सिखाया” (रटाया हुआ) उत्तर था। पिता और अध्यापकों ने सभा में प्रशंसा पाने के लिए उसे यह आदर्शवादी वाक्य रटा दिया था। आठ वर्ष का बालक ‘यावज्जन्म लोकसेवा’ जैसे गंभीर शब्दों का अर्थ भी ठीक से नहीं जानता होगा। इससे लेखक दिखाता है कि बड़े लोग बच्चों पर अपने आदर्श और महत्वाकांक्षाएँ लाद देते हैं।

यह बालक का अपना भाव नहीं, पिता-अध्यापकों द्वारा रटाया गया “सीखा-सिखाया” उत्तर था, ताकि सभा में वाहवाही मिले; आठ वर्ष का बालक इन गंभीर शब्दों का अर्थ भी नहीं समझता था।

Q3

बालक द्वारा इनाम में लड्डू माँगने पर लेखक ने सुख की साँस क्यों भरी?

Answer

उत्तर

अब तक बालक रटे हुए, उम्र से बड़े उत्तर दे रहा था। लेखक को लग रहा था कि बालक की स्वाभाविकता और बचपन पूरी तरह कुचल दिया गया है, इसलिए उसका “श्वास घुट रहा था”। जब वृद्ध महाशय ने इनाम माँगने को कहा, तो बालक के मन में कृत्रिम और स्वाभाविक भावों की लड़ाई हुई, और अंत में नकली परदा हटने पर उसने ‘लड्डू’ माँगा— जो एक सच्चे बच्चे की स्वाभाविक इच्छा थी। इससे लेखक को विश्वास हुआ कि बालक का बचपन, उसकी सहज प्रवृत्तियाँ अभी जीवित हैं— “बालक बच गया”— इसलिए उसने सुख की साँस भरी।

रटे हुए उत्तरों से लेखक को लगा था कि बालक का बचपन कुचल दिया गया है (श्वास घुट रहा था); पर इनाम में पुस्तक की जगह ‘लड्डू’ माँगना बालक की स्वाभाविक इच्छा थी, जिससे सिद्ध हुआ कि उसकी सहज प्रवृत्तियाँ जीवित हैं — बालक बच गया, इसलिए लेखक ने सुख की साँस ली।

Q4

बालक की प्रवृत्तियों का गला घोटना अनुचित है, पाठ में ऐसा आभास किन स्थलों पर होता है कि उसकी प्रवृत्तियों का गला घोटा जाता है?

Answer

उत्तर

  1. बालक को “नुमाइश में मिस्टर हादी के कोल्हू की तरह” दिखाया जा रहा था— मानो वह कोई प्रदर्शन की वस्तु हो।
  2. “उसका मुँह पीला था, आँखें सफ़ेद थीं, दृष्टि भूमि से उठती नहीं थी”— अधिक पढ़ाई के बोझ से वह दुर्बल, सहमा हुआ और आत्मविश्वासहीन था।
  3. उससे उम्र से ऊपर के प्रश्न पूछे गए, जिनके रटे हुए उत्तर वह देता गया।
  4. “मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा”— सीखा-सिखाया उत्तर।
  5. पिता और अध्यापक सोच रहे थे कि “यह पढ़ाई का पुतला” कौन-सी पुस्तक माँगता है— बालक को पुतला बना दिया गया था।
  6. ‘लड्डू’ माँगने पर पिता और अध्यापक निराश हो गए।
  7. लेखक का कथन— “उन सबने बालक की प्रवृत्तियों का गला घोंटने में कुछ उठा नहीं रखा था।”

बालक को नुमाइश में ‘मिस्टर हादी के कोल्हू’ की तरह दिखाना; उसका पीला मुँह, सफ़ेद आँखें, ज़मीन पर टिकी दृष्टि; उम्र से बड़े प्रश्नों के रटे उत्तर; ‘यावज्जन्म लोकसेवा’ का सीखा-सिखाया उत्तर; उसे ‘पढ़ाई का पुतला’ मानकर पुस्तक माँगने की अपेक्षा; ‘लड्डू’ माँगने पर पिता-अध्यापक की निराशा; और लेखक का कथन कि उन्होंने गला घोंटने में कुछ उठा नहीं रखा।

Q5

“बालक बच गया। उसके बचने की आशा है क्योंकि वह ‘लड्डू’ की पुकार जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर था, मरे काठ की अलमारी की सिर दुखानेवाली खड़खड़ाहट नहीं” कथन के आधार पर बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।

Answer

उत्तर

लेखक ने बालक की ‘लड्डू’ की माँग को जीवित वृक्ष के हरे पत्तों की मधुर सरसराहट कहा है— अर्थात यह सहज, स्वाभाविक, जीवंत और सुखद थी। इसके विपरीत रटे हुए उत्तर मरे काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट थे— निर्जीव, यांत्रिक और सिर दुखाने वाले।

बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ— 1. खाने-पीने की, विशेषकर मिठाई की रुचि— बच्चों को लड्डू जैसी मिठाई प्रिय होती है। 2. खेल-कूद, मौज-मस्ती और जिज्ञासा— किताबी बोझ के बजाय आनंद की चाह। 3. सरलता और सच्चाई— बच्चा मन की बात सीधे कह देता है; बनावट उसमें स्वाभाविक नहीं। 4. उम्र के अनुरूप इच्छाएँ— ‘लोकसेवा’ जैसे बड़े आदर्श नहीं, छोटी-छोटी तात्कालिक खुशियाँ।

बालक में ये प्रवृत्तियाँ अभी जीवित थीं, इसलिए उसके “बचने की आशा” है।

‘लड्डू’ की माँग जीवित वृक्ष के हरे पत्तों की मधुर सरसराहट-सी सहज और जीवंत थी, जबकि रटे उत्तर मरे काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट-से निर्जीव। बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ — मिठाई-खाने की रुचि, खेल-कूद और मौज-मस्ती की चाह, सरलता-सच्चाई और उम्र के अनुरूप छोटी-छोटी इच्छाएँ — अभी जीवित थीं, इसलिए उसके बचने की आशा है।

Q6

उम्र के अनुसार बालक में योग्यता का होना आवश्यक है किन्तु उसका ज्ञानी या दार्शनिक होना ज़रूरी नहीं। ‘लर्निंग आउटकम’ के बारे में विचार कीजिए।

Answer

उत्तर

लर्निंग आउटकम (अधिगम प्रतिफल) का अर्थ है— किसी कक्षा या आयु-स्तर पर बच्चे से अपेक्षित वे ज्ञान, कौशल और समझ, जिन्हें वह वास्तव में अर्जित कर सके और प्रयोग में ला सके। 1. आयु-अनुकूलता: लर्निंग आउटकम बच्चे के मानसिक विकास के अनुसार तय होते हैं; आठ वर्ष के बच्चे से पढ़ना-लिखना, सरल गणित, आस-पास के परिवेश की समझ अपेक्षित है, दर्शन या शास्त्रार्थ नहीं। 2. समझ, रटना नहीं: लक्ष्य यह है कि बच्चा अवधारणा समझे और जीवन में लागू करे; पाठ के बालक की तरह रटकर सुनाना वास्तविक अधिगम नहीं है। 3. समग्र विकास: ज्ञान के साथ खेल, कला, सामाजिक-भावनात्मक कौशल, जिज्ञासा और रचनात्मकता का विकास। 4. सहज पके सो मीठा होय: बच्चे में शिक्षा के प्रति रुचि के बीज डाले जाएँ; शिक्षा व्यक्ति के लिए हो, व्यक्ति शिक्षा के लिए नहीं। 5. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी रटने के बजाय अनुभवात्मक, खेल-आधारित, आयु-उपयुक्त अधिगम पर बल देती है।

अतः बालक में उम्र के अनुसार योग्यता होनी चाहिए; उसे समय से पहले ‘ज्ञानी’ या ‘दार्शनिक’ बनाने का प्रयास उसकी स्वाभाविकता को नष्ट करता है।

लर्निंग आउटकम — आयु और कक्षा के अनुसार बच्चे से अपेक्षित ज्ञान, कौशल और समझ। ये बच्चे के मानसिक विकास के अनुरूप हों; लक्ष्य समझ और प्रयोग है, रटना नहीं; ज्ञान के साथ खेल, कला, जिज्ञासा और सामाजिक-भावनात्मक विकास भी हो (“सहज पके सो मीठा होय”, NEP 2020)। समय से पहले बच्चे को ज्ञानी-दार्शनिक बनाने का प्रयास उसकी स्वाभाविकता नष्ट करता है।

अभ्यास – (ख) घड़ी के पुर्ज़े

Q7

लेखक ने धर्म का रहस्य जानने के लिए ‘घड़ी के पुर्ज़े’ का दृष्टांत क्यों दिया है?

Answer

उत्तर

धर्मोपदेशक कहते हैं कि आम आदमी धर्म के रहस्य जानने की इच्छा न करे, जो कहा जाए “कान ढलकाकर” सुन ले। इस मत के समर्थन में वे घड़ी का दृष्टांत देते हैं— घड़ी समय बताती है; समय किसी जानकार से पूछ लो या स्वयं घड़ी देखना सीख लो, पर घड़ी खोलकर पुर्ज़े देखना और सुधारना तुम्हारा काम नहीं; यह वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का काम है।

लेखक ने इसी दृष्टांत को आगे बढ़ाकर धर्माचार्यों के तर्क को उन्हीं पर उलट दिया— (1) घड़ी देखना तो सबको सिखा दो, उसमें जन्म-कर्म की शर्त क्यों? (2) यदि आपकी घड़ी में आधी रात है और पड़ोस की घड़ियों में दोपहर, तो खोलकर देखने दो कि कौन-सा पेच बिगड़ा है; (3) पुर्ज़े सुधारना सीखा-सिखाया जा सकता है; (4) शायद आपको स्वयं परदादा की बंद घड़ी सुधारनी नहीं आती। इस प्रकार लेखक ने धर्म पर कुछ लोगों के एकाधिकार और अंधानुकरण पर व्यंग्य किया और यह बताया कि हर व्यक्ति को धर्म को समझने-परखने का अधिकार है।

धर्मोपदेशक घड़ी के दृष्टांत से कहते हैं कि समय पूछ लो पर पुर्ज़े खोलना धर्माचार्यों का काम है; लेखक ने इसी दृष्टांत को बढ़ाकर उनका तर्क उलट दिया — घड़ी देखना सबको सिखाओ, बिगड़ी घड़ी खोलकर देखने दो, घड़ीसाज़ी सीखी जा सकती है, और शायद आप स्वयं परदादा की बंद घड़ी लिए फिरते हैं — ताकि धर्म पर एकाधिकार और अंधानुकरण पर व्यंग्य हो और हर व्यक्ति के धर्म को समझने के अधिकार की बात रखी जा सके।

Q8

‘धर्म का रहस्य जानना वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है।’ आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? धर्म संबंधी अपने विचार व्यक्त कीजिए।

Answer

उत्तर

मैं इस कथन से सहमत नहीं हूँ। 1. धर्म किसी एक वर्ग की संपत्ति नहीं; वह जीवन जीने की पद्धति है, जो हर व्यक्ति के आचरण से जुड़ी है। इसलिए उसे समझने का अधिकार सबको है। 2. धर्मग्रंथों के विद्वान मार्गदर्शन कर सकते हैं, पर अंतिम निर्णय व्यक्ति के विवेक का होना चाहिए। 3. एकाधिकार से अंधविश्वास, पाखंड और शोषण बढ़ता है। 4. कबीर, नानक, रैदास, विवेकानंद, गांधी जैसे लोग पारंपरिक ‘धर्माचार्य’ न होकर भी धर्म के सच्चे मर्म तक पहुँचे।

धर्म संबंधी मेरे विचार: धर्म का वास्तविक अर्थ है— सत्य, अहिंसा, करुणा, ईमानदारी, परोपकार और कर्तव्यपालन (“धारयति इति धर्मः”)। धर्म मनुष्य को जोड़ता है, बाँटता नहीं। कर्मकांड से अधिक महत्व आचरण का है। हर व्यक्ति को धर्म को तर्क और विवेक से समझना चाहिए और समय के अनुसार उसकी रूढ़ियों को बदलने का साहस रखना चाहिए।

असहमत — धर्म जीवन-पद्धति है, किसी वर्ग की संपत्ति नहीं; विद्वान मार्गदर्शन करें पर निर्णय व्यक्ति के विवेक का हो; एकाधिकार से अंधविश्वास-शोषण बढ़ता है; कबीर, नानक, गांधी आदि ने बिना ‘धर्माचार्य’ हुए धर्म का मर्म समझा। मेरे लिए धर्म सत्य, अहिंसा, करुणा, ईमानदारी और कर्तव्यपालन है; वह जोड़ता है, आचरण कर्मकांड से बड़ा है, और उसे तर्क-विवेक से समझना चाहिए।

Q9

घड़ी समय का ज्ञान कराती है। क्या धर्म संबंधी मान्यताएँ या विचार अपने समय का बोध नहीं कराते?

Answer

उत्तर

हाँ, धर्म संबंधी मान्यताएँ और विचार भी अपने समय का बोध कराते हैं। 1. हर धार्मिक मान्यता अपने युग की सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों में जन्म लेती है— जैसे वैदिक काल में यज्ञ, मध्यकाल में भक्ति आंदोलन द्वारा जाति-पाँति और कर्मकांड का विरोध, आधुनिक काल में आर्य समाज, ब्रह्म समाज द्वारा समाज-सुधार। 2. धार्मिक मान्यताओं से पता चलता है कि उस समय समाज की सोच, स्त्रियों की स्थिति, वर्ण-व्यवस्था आदि कैसी थी— जैसे पाठ (ग) में ढेलों द्वारा वधू-चयन से वैदिक काल की सोच का पता चलता है। 3. जैसे बंद घड़ी गलत समय बताती है, वैसे ही समय के साथ न बदलने वाली मान्यताएँ (सती, बाल-विवाह, छुआछूत) आज के समय से मेल नहीं खातीं।

अतः धर्म भी घड़ी की तरह अपने समय का सूचक है; उसे समय के साथ “चाबी देना” और “पुर्ज़े सुधारना” आवश्यक है, तभी वह सही समय बताएगा।

हाँ — धार्मिक मान्यताएँ अपने युग की परिस्थितियों से जन्म लेती हैं (वैदिक यज्ञ, मध्यकालीन भक्ति आंदोलन, आधुनिक सुधार आंदोलन) और उस समय की सामाजिक सोच का बोध कराती हैं; पर बंद घड़ी की तरह न बदलने वाली रूढ़ियाँ (सती, बाल-विवाह, छुआछूत) गलत समय बताती हैं, इसलिए धर्म को भी समय के साथ सुधारते रहना आवश्यक है।

Q10

धर्म अगर कुछ विशेष लोगों वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों, मठाधीशों, पंडे-पुजारियों की मुट्ठी में है तो आम आदमी और समाज का उससे क्या संबंध होगा? अपनी राय लिखिए।

Answer

उत्तर

यदि धर्म कुछ विशेष लोगों की मुट्ठी में रहेगा तो— 1. आम आदमी केवल अनुयायी बनकर रह जाएगा— वह बिना समझे, “कान ढलकाकर” आदेश मानेगा; उसकी जिज्ञासा और विवेक कुंठित होंगे। 2. अंधविश्वास और पाखंड बढ़ेंगे— धर्म के नाम पर कर्मकांड, दान-दक्षिणा, ढोंग का बोलबाला होगा। 3. शोषण— धर्माचार्य अपने स्वार्थ के लिए आम लोगों का आर्थिक और मानसिक शोषण कर सकते हैं। 4. सामाजिक भेदभाव— जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव को धर्म का नाम देकर बनाए रखा जाएगा। 5. धर्म और जीवन में दूरी— धर्म आम आदमी के दैनिक जीवन और नैतिकता से कटकर केवल रस्म बन जाएगा। 6. धर्म का विकास रुक जाएगा— समय के अनुसार सुधार नहीं होगा।

मेरी राय: धर्म का संबंध हर व्यक्ति से है। आम आदमी को धर्म को स्वयं समझना चाहिए; धर्म को जनसाधारण की भाषा में, तर्क और मानवता के आधार पर समझाया जाना चाहिए, जैसा कबीर, तुलसी, गांधी ने किया।

तब आम आदमी केवल आँख मूँदकर मानने वाला अनुयायी रह जाएगा; अंधविश्वास, पाखंड और कर्मकांड बढ़ेंगे; धर्म के नाम पर आर्थिक-मानसिक शोषण और जाति-लिंग भेदभाव होगा; धर्म जीवन से कटकर रस्म बन जाएगा और उसका विकास रुक जाएगा। मेरी राय में धर्म हर व्यक्ति का है — उसे जनभाषा में, तर्क और मानवता के आधार पर सबको समझने का अवसर मिलना चाहिए।

Q11

‘जहाँ धर्म पर कुछ मुट्ठीभर लोगों का एकाधिकार धर्म को संकुचित अर्थ प्रदान करता है वहीं धर्म का आम आदमी से संबंध उसके विकास एवं विस्तार का द्योतक है।’ तर्क सहित व्याख्या कीजिए।

Answer

उत्तर

एकाधिकार से संकुचन: 1. मुट्ठीभर लोग धर्म की व्याख्या अपने स्वार्थ और रूढ़ दृष्टि से करते हैं; धर्म कुछ नियमों, कर्मकांडों और वर्जनाओं तक सिमट जाता है। 2. प्रश्न पूछने और परखने की मनाही से धर्म जड़ हो जाता है— “परदादा की बंद घड़ी” की तरह। 3. धर्म का लाभ कुछ लोगों तक सीमित रहता है; शेष समाज उससे कटा रहता है।

आम आदमी से जुड़ाव से विकास और विस्तार: 1. जब आम लोग धर्म को समझते और जीते हैं, तो उसमें नए विचार, अनुभव और सुधार आते हैं— भक्ति आंदोलन में कबीर, रैदास, मीरा, तुकाराम जैसे आम जन-कवियों ने धर्म को जाति-कर्मकांड से मुक्त कर सरल, प्रेममय बनाया। 2. जनभाषा में धर्म (तुलसी का ‘रामचरितमानस’, गुरु नानक की वाणी) ने उसे घर-घर तक पहुँचाया। 3. आम आदमी के प्रश्न धर्म को समय के अनुसार ढालते हैं— छुआछूत, सती, बाल-विवाह जैसी कुरीतियाँ जन-चेतना से ही समाप्त हुईं। 4. धर्म का मूल उद्देश्य— मानव-कल्याण— तभी पूरा होता है जब वह सबके लिए खुला हो।

अतः धर्म का लोकतंत्रीकरण उसके विस्तार और जीवंतता का प्रतीक है, जबकि एकाधिकार उसे संकीर्ण और जड़ बनाता है।

एकाधिकार में मुट्ठीभर लोग धर्म को स्वार्थ और रूढ़ि से व्याख्यायित कर कर्मकांड-वर्जनाओं तक सीमित, प्रश्नहीन और जड़ बना देते हैं। आम आदमी से जुड़ने पर धर्म में नए विचार और सुधार आते हैं — भक्ति आंदोलन (कबीर, रैदास, मीरा), जनभाषा में मानस और गुरुवाणी, कुरीतियों का अंत — और वह मानव-कल्याण के अपने मूल उद्देश्य तक फैलता है; इसलिए जन-जुड़ाव धर्म के विकास-विस्तार का द्योतक है।

Q12

निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए— (क) ‘वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है कि घड़ी के पुर्ज़े जानें, तुम्हें इससे क्या?’ (ख) ‘अनाड़ी के हाथ में चाहे घड़ी मत दो पर जो घड़ीसाज़ी का इम्तहान पास कर आया है, उसे तो देखने दो।’ (ग) ‘हमें तो धोखा होता है कि परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो, वह बंद हो गई है, तुम्हें न चाबी देना आता है न पुर्ज़े सुधारना, तो भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते।’

Answer

उत्तर

(क) यह धर्मोपदेशकों का कथन है। उनके अनुसार धर्म के गूढ़ रहस्य (घड़ी के पुर्ज़े) जानना केवल वेद-शास्त्रों के ज्ञाता धर्माचार्यों का अधिकार है; आम आदमी को केवल उनके बताए अनुसार चलना चाहिए, प्रश्न नहीं करना चाहिए। लेखक इसमें धर्म पर एकाधिकार की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करता है।

(ख) लेखक कहता है कि यदि आम अज्ञानी (अनाड़ी) को धर्म की व्याख्या का अधिकार नहीं देना चाहते तो न दो, पर जिसने अध्ययन और साधना से धर्म को समझने की योग्यता प्राप्त कर ली है (घड़ीसाज़ी का इम्तहान पास), उसे तो धर्म के रहस्यों को परखने दो। योग्यता के आधार पर अधिकार मिलना चाहिए, जन्म या पद के आधार पर नहीं।

(ग) लेखक धर्माचार्यों पर तीखा व्यंग्य करता है— उन्हें संदेह है कि ये धर्माचार्य पूर्वजों से मिली रूढ़ परंपराएँ (परदादा की घड़ी) ढो रहे हैं, जो समय के साथ निष्क्रिय और अप्रासंगिक (बंद) हो चुकी हैं। इन्हें स्वयं न धर्म को जीवंत बनाना (चाबी देना) आता है, न उसकी बुराइयाँ सुधारना (पुर्ज़े सुधारना); फिर भी ये किसी और को धर्म की व्याख्या या सुधार नहीं करने देते।

(क) धर्मोपदेशकों का दावा कि धर्म के रहस्य जानना केवल धर्माचार्यों का अधिकार है, आम आदमी बस आज्ञा माने — धर्म पर एकाधिकार पर व्यंग्य। (ख) अज्ञानी को अधिकार न दो, पर जिसने अध्ययन से धर्म समझने की योग्यता पा ली है उसे परखने दो — अधिकार योग्यता से मिले, जन्म या पद से नहीं। (ग) धर्माचार्य पूर्वजों की रूढ़, निष्क्रिय परंपराएँ ढो रहे हैं; न उन्हें जीवंत बनाना जानते हैं, न सुधारना, फिर भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते।

अभ्यास – (ग) ढेले चुन लो

Q13

वैदिककाल में हिंदुओं में कैसी लाटरी चलती थी जिसका ज़िक्र लेखक ने किया है।

Answer

उत्तर

वैदिक काल में वधू-चयन की एक ‘ढेलों की लाटरी’ चलती थी, जिसमें “नर पूछता था, नारी को बूझना पड़ता था”। 1. स्नातक विद्या पढ़कर, नहा-धोकर, माला पहनकर किसी कन्या के पिता के यहाँ पहुँचता और उसे गौ भेंट करता। 2. फिर कन्या के सामने कुछ (कहीं सात, कहीं कम-ज़्यादा) मिट्टी के ढेले रखकर एक उठाने को कहता। 3. ढेले अलग-अलग जगहों की मिट्टी से बने होते— वेदि, गौशाला, खेत, चौराहा, मसान। नर जानता था कि कौन-सा ढेला कहाँ का है, कन्या नहीं। 4. फल: वेदि का ढेला उठाए तो संतान वैदिक पंडित; गोबर (गौशाला) चुने तो पशुओं का धनी; खेत की मिट्टी छुए तो ज़मींदार पुत्र; मसान की मिट्टी छूना बड़ा अशुभ— ब्याही जाए तो घर मसान हो जाए। 5. मसान का ढेला उठाने वाली कन्या दूसरे नर के सामने वेदि का ढेला उठाकर ब्याही जा सकती थी। 6. आश्वलायन, गोभिल, भारद्वाज आदि गृह्यसूत्रों में इसका उल्लेख है।

स्नातक कन्या के पिता को गौ भेंट कर कन्या के सामने वेदि, गौशाला, खेत, चौराहे और मसान की मिट्टी के कुछ ढेले रखता और एक उठाने को कहता; वेदि का ढेला = वैदिक पंडित संतान, गोबर = पशुधन, खेत = ज़मींदार पुत्र, मसान = अशुभ (उस नर से विवाह नहीं)। इस ‘लाटरी’ का उल्लेख आश्वलायन, गोभिल, भारद्वाज गृह्यसूत्रों में है।

Q14

‘दुर्लभ बंधु’ की पेटियों की कथा लिखिए।

Answer

उत्तर

‘दुर्लभ बंधु’ भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा शेक्सपीयर के नाटक ‘मर्चेंट ऑफ़ वेनिस’ का हिंदी रूपांतर है (मूल में नायिका पोर्शिया, रूपांतर में पुरश्री)। पुरश्री के सामने तीन पेटियाँ रखी हैं— सोने की, चाँदी की और लोहे की। इनमें से एक में पुरश्री की प्रतिमूर्ति (चित्र) है। स्वयंवर के लिए आने वाले हर व्यक्ति से एक पेटी चुनने को कहा जाता है— - अकड़बाज़ (घमंडी) सोने की पेटी चुनता है और उलटे पैरों लौट जाता है। - लोभी को चाँदी की पेटी अँगूठा दिखा देती है (वह भी असफल होता है)। - सच्चा प्रेमी लोहे की पेटी छूता है, उसमें पुरश्री की प्रतिमूर्ति पाता है और “घुड़दौड़ का पहला इनाम”— पुरश्री— प्राप्त करता है।

यह कथा बताती है कि बाहरी चमक-दमक नहीं, सच्चे गुण ही विजयी होते हैं।

भारतेंदु के ‘दुर्लभ बंधु’ (‘मर्चेंट ऑफ़ वेनिस’ का रूपांतर) में पुरश्री के सामने सोने, चाँदी और लोहे की तीन पेटियाँ हैं, जिनमें से एक में उसकी प्रतिमूर्ति है; अकड़बाज़ सोने की पेटी चुनकर लौटता है, लोभी को चाँदी की पेटी अँगूठा दिखाती है, और सच्चा प्रेमी लोहे की पेटी छूकर पुरश्री को पाता है।

Q15

‘जीवन साथी’ का चुनाव मिट्टी के ढेलों पर छोड़ने के कौन-कौन से फल प्राप्त होते हैं।

Answer

उत्तर

पाठ के अनुसार मान्यता थी कि कन्या जो ढेला उठाए, उसी से उसकी भावी संतान और गृहस्थी का भविष्य तय होता है— 1. वेदि का ढेला— संतान वैदिक पंडित होगी। 2. गौशाला का ढेला (गोबर)— संतान पशुओं की धनी होगी। 3. खेत की मिट्टी— संतान ज़मींदार होगी। 4. मसान की मिट्टी— बड़ा अशुभ; ऐसी कन्या ब्याही जाए तो घर मसान हो जाए, “जनमभर जलाती रहेगी”; इसलिए उस नर से विवाह नहीं होता था।

वास्तविक फल (लेखक का व्यंग्य): जीवनभर के साथी का चुनाव संयोग पर छोड़ना बुद्धिमानी नहीं; इससे योग्य कन्या भी अशुभ ठहराकर अस्वीकार हो सकती थी और कन्या के गुण, स्वभाव, शिक्षा की उपेक्षा होती थी। यह अंधविश्वास था।

मान्यता के अनुसार — वेदि का ढेला: वैदिक पंडित संतान; गौशाला का गोबर: पशुधन वाली संतान; खेत की मिट्टी: ज़मींदार संतान; मसान की मिट्टी: अशुभ, घर मसान बन जाने का डर, इसलिए उस नर से विवाह नहीं। वास्तव में यह अंधविश्वास था, जिसमें कन्या के गुणों की उपेक्षा होती थी और योग्य कन्या भी अस्वीकार हो सकती थी।

Q16

मिट्टी के ढेलों के संदर्भ में कबीर की साखी की व्याख्या कीजिए— पत्थर पूजे हरि मिलें तो तू पूज पहार। इससे तो चक्की भली, पीस खाय संसार।।

Answer

उत्तर

साखी का अर्थ: कबीर मूर्तिपूजा पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं— यदि पत्थर (की मूर्ति) पूजने से ईश्वर मिलता हो तो मैं पूरा पहाड़ पूजने को तैयार हूँ। इससे तो घर की चक्की (जो स्वयं पत्थर की है) अच्छी है, जिससे पिसा आटा खाकर सारा संसार पेट भरता है।

ढेलों के संदर्भ में व्याख्या: जैसे कबीर निर्जीव पत्थर में ईश्वर खोजने को अंधविश्वास मानते हैं, वैसे ही लेखक मिट्टी के निर्जीव ढेलों से जीवन-साथी का भाग्य तय करने को अंधविश्वास मानते हैं। लेखक व्यंग्य करता है कि यदि ढेलों पर भरोसा बुरा है तो लाखों कोस दूर मंगल, शनि, बृहस्पति जैसे “मिट्टी और आग के ढेलों” (ग्रहों) की कल्पित चाल पर भरोसा करना (ज्योतिष, कुंडली-मिलान) कैसे अच्छा हो सकता है? दोनों ही तर्कहीन हैं। कबीर की तरह लेखक भी कहता है कि उपयोगी, व्यावहारिक चीज़ (चक्की, आँखों देखा) निर्जीव प्रतीकों की पूजा से श्रेष्ठ है— निर्णय विवेक और प्रत्यक्ष अनुभव से होना चाहिए।

कबीर कहते हैं — पत्थर पूजने से हरि मिलते तो पहाड़ पूज लेता; उससे तो चक्की भली जिससे संसार आटा पीसकर खाता है। इसी तरह लेखक मिट्टी के निर्जीव ढेलों या दूर के ग्रहों (‘मिट्टी और आग के ढेलों’) की कल्पित चाल से जीवन-साथी का भाग्य तय करने को अंधविश्वास मानता है; निर्णय उपयोगिता, विवेक और प्रत्यक्ष अनुभव से होना चाहिए।

Q17

जन्मभर के साथी का चुनाव मिट्टी के ढेले पर छोड़ना बुद्धिमानी नहीं है। इसलिए बेटी का शिक्षित होना अनिवार्य है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के संदर्भ में विचार कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. अंधविश्वास से मुक्ति: शिक्षित बेटी ढेलों, कुंडली या अन्य अंधविश्वासों के आधार पर अपने जीवन का निर्णय नहीं होने देगी; वह तर्क और विवेक से सोचेगी।
  2. निर्णय का अधिकार: पाठ की लाटरी में “नर पूछता था, नारी को बूझना पड़ता था”— स्त्री निष्क्रिय थी। शिक्षा उसे अपने जीवन-साथी और भविष्य के बारे में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास देती है।
  3. आर्थिक आत्मनिर्भरता: शिक्षित बेटी आत्मनिर्भर होकर दहेज, शोषण और अन्याय का विरोध कर सकती है।
  4. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान (2015): इसका उद्देश्य कन्या भ्रूण-हत्या रोकना, गिरते लिंगानुपात को सुधारना, और बेटियों की शिक्षा व सशक्तीकरण सुनिश्चित करना है।
  5. परिवार और समाज का विकास: “एक लड़की को पढ़ाना, पूरे परिवार को पढ़ाना है”— शिक्षित माँ अगली पीढ़ी को भी शिक्षित और वैज्ञानिक सोच वाला बनाती है।
  6. बाल-विवाह पर रोक: पढ़ाई बेटियों के जल्दी विवाह को रोकती है।

अतः बेटी को बचाना और पढ़ाना ही वह उपाय है जिससे विवाह जैसे जीवन-निर्णय अंधविश्वास के बजाय विवेक पर आधारित होंगे।

शिक्षित बेटी अंधविश्वास (ढेले, कुंडली) के बजाय विवेक से सोचती है; पाठ में जहाँ “नारी को बूझना पड़ता था”, शिक्षा उसे जीवन-साथी और भविष्य के बारे में स्वयं निर्णय का आत्मविश्वास देती है; आर्थिक आत्मनिर्भरता से दहेज-शोषण का विरोध और बाल-विवाह पर रोक संभव होती है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ (2015) कन्या भ्रूण-हत्या रोकने, लिंगानुपात सुधारने और बेटियों की शिक्षा-सशक्तीकरण का अभियान है — शिक्षित बेटी पूरे परिवार और समाज को आगे बढ़ाती है।

Q18

निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए— (क) ‘अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुने हुए मिट्टी के डगलों पर भरोसा करना क्यों बुरा है और लाखों करोड़ों कोस दूर बैठे बड़े-बड़े मिट्टी और आग के ढेलों—मंगल, शनिश्चर और बृहस्पति की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब का भरोसा करना क्यों अच्छा है।’ (ख) ‘आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से, आज का पैसा अच्छा है कल की मोहर से। आँखों देखा ढेला अच्छा ही होना चाहिए लाखों कोस के तेज पिंड से।’

Answer

उत्तर

(क) लेखक ज्योतिष और कुंडली-मिलान पर व्यंग्य करता है। लोग वैदिक काल की ढेलों वाली प्रथा को मूर्खता कहते हैं, पर स्वयं विवाह के लिए लाखों-करोड़ों कोस दूर स्थित ग्रहों— मंगल, शनि, बृहस्पति (जो स्वयं मिट्टी और आग के विशाल ढेले हैं)— की कल्पित चाल और उसके कल्पित गणित पर भरोसा करते हैं। कम से कम ढेले वाला नर अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथों से ढेले चुनता था। लेखक पूछता है कि यदि वह बुरा था तो यह अच्छा कैसे? वास्तव में दोनों अंधविश्वास हैं।

(ख) वात्स्यायन के कथन के माध्यम से लेखक कहता है कि वर्तमान की निश्चित, प्रत्यक्ष वस्तु भविष्य की अनिश्चित, बड़ी वस्तु से अच्छी है— आज हाथ में आया कबूतर कल मिलने वाले मोर से, और आज का पैसा कल मिलने वाली मोहर (सोने का सिक्का) से अच्छा है। इसी तर्क से आँखों के सामने का, स्वयं चुना हुआ मिट्टी का ढेला, लाखों कोस दूर चमकने वाले ग्रह-पिंडों (ज्योतिषीय गणना) से अच्छा होना चाहिए। अर्थात प्रत्यक्ष और व्यावहारिक को महत्व देना चाहिए, न कि दूरस्थ कल्पनाओं को। (यहाँ भी व्यंग्य है— दोनों ही आधार अवैज्ञानिक हैं।)

प्रश्न 1

(क) ज्योतिष पर व्यंग्य — लोग ढेलों वाली प्रथा को मूर्खता मानते हैं, पर विवाह के लिए करोड़ों कोस दूर के मंगल, शनि, बृहस्पति (‘मिट्टी और आग के ढेले’) की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब पर भरोसा करते हैं; आँखों देखे, हाथ से चुने ढेले बुरे तो वह अच्छा कैसे? दोनों अंधविश्वास हैं। (ख) वात्स्यायन के अनुसार आज की निश्चित वस्तु (कबूतर, पैसा) कल की अनिश्चित बड़ी वस्तु (मोर, मोहर) से अच्छी; इसी तरह आँखों देखा ढेला दूर के ग्रह-पिंडों से अच्छा होना चाहिए — प्रत्यक्ष को महत्व दें, दूरस्थ कल्पनाओं को नहीं।

उत्तर

योग्यता-विस्तार

Q19

(क) बालक बच गया — बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों के विकास में ‘रटना’ बाधक है— कक्षा में संवाद कीजिए।

Answer

उत्तर

(कक्षा-संवाद का नमूना)

शिक्षक: आज हम चर्चा करेंगे कि क्या रटना बच्चों के स्वाभाविक विकास में बाधक है।

रिया: जी हाँ। पाठ का बालक धर्म के दस लक्षण, नौ रस सब सुना गया, पर उसका मुँह पीला था और दृष्टि ज़मीन पर थी। रटने ने उसकी खुशी और आत्मविश्वास छीन लिया।

अमन: रटने से हम बिना समझे याद करते हैं, इसलिए जिज्ञासा, प्रश्न पूछने की आदत और रचनात्मकता खत्म हो जाती है।

सना: पर कुछ चीज़ें— जैसे पहाड़े, सूत्र, कविताएँ— याद रखनी पड़ती हैं।

शिक्षक: ठीक कहा। समझकर याद करना और बिना समझे रटना अलग हैं। समझकर याद की गई बात लंबे समय तक रहती है और प्रयोग में आती है।

कबीर: खेल, प्रयोग और प्रश्नों से सीखने पर बच्चे का स्वाभाविक विकास होता है— जैसे वह बालक ‘लड्डू’ माँगकर अपने बचपन में लौट आया।

निष्कर्ष: अंधा रटना बच्चे की जिज्ञासा, रचनात्मकता, खेल-प्रवृत्ति और आत्मविश्वास को दबाता है; समझ-आधारित, अनुभवात्मक शिक्षा ही स्वाभाविक विकास करती है।

संवाद का निष्कर्ष: बिना समझे रटना बच्चे की जिज्ञासा, प्रश्न पूछने की आदत, रचनात्मकता, खेल-प्रवृत्ति और आत्मविश्वास को दबाता है (पाठ का पीले मुँह वाला बालक); पहाड़े-सूत्र जैसी चीज़ें समझकर याद करना उचित है; खेल, प्रयोग और प्रश्नों से सीखने वाली समझ-आधारित शिक्षा ही स्वाभाविक विकास करती है।

Q20

(क) बालक बच गया — ज्ञान के क्षेत्र में ‘रटने’ का निषेध है किंतु क्या आप रटने में विश्वास करते हैं। अपने विचार प्रकट कीजिए।

Answer

उत्तर

मैं अंधे रटने में विश्वास नहीं करता, पर समझकर याद करने को आवश्यक मानता हूँ। 1. रटने की सीमाएँ: बिना समझे रटा गया ज्ञान जल्दी भूल जाता है, नई परिस्थिति में प्रयोग नहीं हो पाता, और सोचने-विचारने की क्षमता को कुंठित करता है। परीक्षा में अंक मिल सकते हैं, पर वास्तविक ज्ञान नहीं। 2. स्मरण की उपयोगिता: कुछ आधारभूत तथ्य— पहाड़े, वर्णमाला, सूत्र, परिभाषाएँ, तिथियाँ, कविताएँ, श्लोक— याद रखने ही पड़ते हैं; ये आगे की समझ की नींव हैं। भारतीय परंपरा में वेद मौखिक स्मरण से ही सुरक्षित रहे। 3. सही तरीका: पहले समझें, फिर दोहराएँ (पुनरावृत्ति), उदाहरण और प्रयोग से जोड़ें, अपने शब्दों में लिखें।

निष्कर्ष: रटना साधन हो सकता है, साध्य नहीं। समझ के साथ किया गया स्मरण ज्ञान को स्थायी बनाता है; बिना समझ का रटना पाठ के बालक जैसा “पढ़ाई का पुतला” बना देता है।

अंधे रटने में नहीं, समझकर याद करने में विश्वास — बिना समझे रटा ज्ञान जल्दी भूलता है, प्रयोग नहीं हो पाता और सोचने की क्षमता कुंठित करता है; पर पहाड़े, सूत्र, परिभाषाएँ, कविताएँ जैसी आधारभूत बातें याद रखना ज़रूरी है। सही तरीका: समझो, दोहराओ, उदाहरणों से जोड़ो। रटना साधन हो सकता है, साध्य नहीं।

Q21

(ख) घड़ी के पुर्ज़े — धर्म संबंधी अपनी मान्यता पर लेख / निबंध लिखिए।

Answer

उत्तर

धर्म: मेरी दृष्टि में

‘धर्म’ शब्द ‘धृ’ धातु से बना है— जिसका अर्थ है धारण करना। “धारयति इति धर्मः”— जो समाज और जीवन को धारण करे, संभाले, वही धर्म है। मेरी मान्यता में धर्म का संबंध मंदिर-मस्जिद, कर्मकांड या बाहरी चिह्नों से कम, और मनुष्य के आचरण से अधिक है।

महर्षि मनु ने धर्म के दस लक्षण बताए— धैर्य, क्षमा, दम (संयम), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इंद्रिय-निग्रह, धी (बुद्धि), विद्या, सत्य और अक्रोध। ये सभी गुण किसी एक संप्रदाय के नहीं, पूरी मानवता के हैं। तुलसीदास ने कहा— “परहित सरिस धर्म नहिं भाई।” अर्थात दूसरों की भलाई ही सबसे बड़ा धर्म है।

आज धर्म के नाम पर पाखंड, अंधविश्वास, भेदभाव और हिंसा देखकर दुख होता है। यह धर्म का विकृत रूप है। सच्चा धर्म मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। सभी धर्मों का सार एक है— प्रेम, करुणा, सत्य और सेवा।

मेरा मानना है कि धर्म को तर्क और विवेक से समझना चाहिए, जैसा गुलेरी जी कहते हैं— घड़ी के पुर्ज़े खोलकर देखने का अधिकार सबको हो। जो रूढ़ियाँ समय के साथ अप्रासंगिक हो गई हैं, उन्हें बदलने का साहस होना चाहिए। अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करना— विद्यार्थी का पढ़ना, शिक्षक का पढ़ाना, नागरिक का नियम मानना— यही मेरे लिए धर्म है।

निबंध के मुख्य बिंदु: धर्म = ‘धारयति इति धर्मः’ — जो जीवन और समाज को धारण करे; आचरण कर्मकांड से बड़ा; मनु के दस लक्षण और “परहित सरिस धर्म नहिं भाई”; पाखंड-भेदभाव धर्म का विकृत रूप; सभी धर्मों का सार प्रेम, करुणा, सत्य, सेवा; धर्म को विवेक से समझना और रूढ़ियाँ बदलना; ईमानदारी से कर्तव्यपालन ही सच्चा धर्म।

Q22

(ख) घड़ी के पुर्ज़े — ‘धर्म का रहस्य जानना सिर्फ़ धर्माचार्यों का काम नहीं, कोई भी व्यक्ति अपने स्तर पर उस रहस्य को जानने की कोशिश कर सकता है, अपनी राय दे सकता है’—टिप्पणी कीजिए।

Answer

उत्तर

यह कथन पूर्णतः उचित है। 1. धर्म सबका है: धर्म हर व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करता है, इसलिए हर व्यक्ति को उसे समझने और उस पर राय देने का अधिकार है। 2. जिज्ञासा स्वाभाविक है: उपनिषदों की परंपरा ही प्रश्नोत्तर (नचिकेता-यम, गार्गी-याज्ञवल्क्य) की है; प्रश्न पूछना धर्म का अंग रहा है। 3. ऐतिहासिक उदाहरण: कबीर (जुलाहा), रैदास (चर्मकार), गुरु नानक, मीरा जैसे संतों ने बिना ‘धर्माचार्य’ पद के धर्म का सच्चा मर्म समझाया। 4. संविधान: अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता देता है; अनुच्छेद 51क(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जिज्ञासा विकसित करना नागरिक का कर्तव्य बताता है। 5. सावधानी: राय देना अध्ययन, विनम्रता और दूसरों की आस्था के सम्मान के साथ होना चाहिए— गुलेरी जी के शब्दों में “अनाड़ी” नहीं, “घड़ीसाज़ी का इम्तहान पास” करके।

अतः धर्म के रहस्य पर धर्माचार्यों का एकाधिकार नहीं होना चाहिए; हर व्यक्ति अपने विवेक, अध्ययन और अनुभव से धर्म को समझने का प्रयास कर सकता है।

उचित कथन — धर्म हर व्यक्ति के जीवन से जुड़ा है; प्रश्न पूछना उपनिषदों की परंपरा है (नचिकेता, गार्गी); कबीर, रैदास, नानक, मीरा ने बिना पद के धर्म का मर्म समझाया; संविधान धर्म-स्वतंत्रता (अनु. 25) और वैज्ञानिक दृष्टिकोण (51क) देता है। बस राय अध्ययन, विनम्रता और दूसरों की आस्था के सम्मान के साथ हो।

Q23

(ग) ढेले चुन लो — समाज में धर्म संबंधी अंधविश्वास पूरी तरह व्याप्त है। वैज्ञानिक प्रगति के संदर्भ में धर्म, विश्वास और आस्था पर निबंध लिखिए।

Answer

उत्तर

विज्ञान के युग में धर्म, विश्वास और आस्था

आज मनुष्य चाँद और मंगल तक पहुँच गया है, कंप्यूटर और इंटरनेट ने दुनिया को एक गाँव बना दिया है। फिर भी समाज में धर्म के नाम पर अनेक अंधविश्वास व्याप्त हैं— बिल्ली के रास्ता काटने को अशुभ मानना, ग्रहण में भोजन न करना, कुंडली के ‘मांगलिक दोष’ के कारण विवाह रोकना, बीमारी में डॉक्टर के बजाय झाड़-फूँक, नरबलि जैसी अमानवीय घटनाएँ तक।

आस्था और अंधविश्वास में अंतर: आस्था मन को शक्ति, शांति और नैतिक दिशा देती है; यह जीवन के लिए आवश्यक है। अंधविश्वास वह है जो बिना तर्क और प्रमाण के डर या लालच से माना जाए, और जो व्यक्ति व समाज को हानि पहुँचाए।

विज्ञान और धर्म: विज्ञान ‘कैसे’ का उत्तर देता है, धर्म ‘क्यों’ और ‘कैसे जिएँ’ का। दोनों विरोधी नहीं, पूरक हो सकते हैं। आइंस्टाइन ने कहा था— “धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है, विज्ञान के बिना धर्म अंधा।” विज्ञान धर्म को अंधविश्वास से मुक्त करता है, और धर्म विज्ञान को नैतिक दिशा देता है।

समाधान: शिक्षा का प्रसार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास (संविधान का अनुच्छेद 51क), मीडिया द्वारा जागरूकता, अंधविश्वास-विरोधी कानून (जैसे महाराष्ट्र का जादू-टोना विरोधी अधिनियम)।

निष्कर्ष: गुलेरी जी की तरह हमें भी “आँखों देखे ढेले” यानी प्रत्यक्ष और तर्कसंगत को महत्व देना चाहिए। आस्था रहे, पर विवेक के साथ।

निबंध के मुख्य बिंदु: विज्ञान की प्रगति के बावजूद अंधविश्वास (बिल्ली का रास्ता काटना, मांगलिक दोष, झाड़-फूँक, नरबलि); आस्था शक्ति और नैतिक दिशा देती है, अंधविश्वास बिना तर्क के, डर से माना जाता है और हानि करता है; विज्ञान और धर्म पूरक हैं (आइंस्टाइन); समाधान — शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण (51क), जागरूकता, कानून; आस्था रहे पर विवेक के साथ।

Q24

(ग) ढेले चुन लो — अपने घर में या आस-पास दिखाई देने वाले किसी रिवाज या अंधविश्वास पर एक लेख लिखिए।

Answer

उत्तर

नज़र उतारना और नींबू-मिर्च: एक अंधविश्वास

मेरे आस-पास लगभग हर दुकान, नए घर और गाड़ी पर धागे में पिरोए एक नींबू और सात हरी मिर्चें लटकी दिखाई देती हैं। लोगों का विश्वास है कि इससे ‘बुरी नज़र’ नहीं लगती और व्यापार में घाटा नहीं होता। हर शनिवार इन्हें बदला जाता है और पुराने नींबू-मिर्च सड़क पर फेंक दिए जाते हैं। कई लोग सड़क पर पड़े नींबू-मिर्च पर पैर रखने से भी डरते हैं। इसी प्रकार बच्चे के बीमार होने पर दादी उसकी नज़र उतारती हैं— सिर के चारों ओर नमक-मिर्च घुमाकर आग में डालती हैं।

कारण: यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। कुछ लोग इसके पीछे तर्क देते हैं कि नींबू-मिर्च की गंध कीड़ों को दूर रखती थी, पर आज इसका वह उद्देश्य नहीं रहा; यह केवल डर से निभाया जाता है।

हानियाँ: खाद्य-पदार्थों की बर्बादी; सड़क पर गंदगी; बीमारी में नज़र उतारने के कारण इलाज में देरी, जो खतरनाक हो सकती है; और सबसे बढ़कर, डर और तर्कहीनता की मानसिकता।

मेरा मत: हमें परंपराओं का सम्मान करना चाहिए, पर उन्हें विवेक से परखना भी चाहिए। व्यापार में सफलता ईमानदारी और परिश्रम से मिलती है, नींबू-मिर्च से नहीं; बीमारी का इलाज डॉक्टर से होता है, नज़र उतारने से नहीं। जैसे गुलेरी जी ने ढेलों की लाटरी पर प्रश्न उठाया, वैसे ही हमें भी ऐसे रिवाजों पर प्रश्न उठाना चाहिए।

लेख का नमूना — ‘नींबू-मिर्च और नज़र उतारना’: दुकानों-गाड़ियों पर बुरी नज़र से बचने के लिए नींबू-मिर्च लटकाना और बीमार बच्चे की नज़र उतारना; कारण — पीढ़ियों की परंपरा और डर; हानियाँ — खाद्य की बर्बादी, गंदगी, इलाज में देरी, तर्कहीन मानसिकता; मत — परंपरा का सम्मान हो पर विवेक से परख भी; सफलता परिश्रम से और इलाज डॉक्टर से मिलता है।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ (क) बालक बच गया (प्रश्न 1–6)
  • ☒ (ख) घड़ी के पुर्ज़े (प्रश्न 7–12)
  • ☒ (ग) ढेले चुन लो (प्रश्न 13–18)
  • ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 19–24)

Total questions answered: 24 of 24

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 11 (सुमिरिनी के मनके) cover?

All 26 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – (क) बालक बच गया, अभ्यास – (ख) घड़ी के पुर्ज़े and अभ्यास – (ग) ढेले चुन लो.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

Yes. The answers follow the current NCERT textbook for Class 12 Hindi Antra and the latest CBSE syllabus, so the question numbers and wording match the book you use in class.

How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

Are the NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 11 (सुमिरिनी के मनके) free?

Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.