Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Antra (NCERT) | 4 – बनारस, दिशा | 2026-27 | 13 of 13 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
कवि | केदारनाथ सिंह (1934–2018), चकिया (बलिया); ज्ञानपीठ और साहित्य अकादेमी पुरस्कार (‘अकाल में सारस’) |
बनारस | बनारस (काशी) में वसंत का अचानक आना; प्राचीनता, आध्यात्मिकता, आस्था और मृत्यु-जीवन का सह-अस्तित्व; “धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय”; “आधा जल में है / आधा मंत्र में… आधा शव में” |
दिशा | पतंग उड़ाते बच्चे से हिमालय की दिशा पूछने पर वह “उधर-उधर” कहता है — जिधर उसकी पतंग जा रही है; बाल-मनोविज्ञान और यथार्थ का अपना दृष्टिकोण |
शिल्प | बोलचाल की भाषा, बिंबात्मकता, विरोधाभास, मानवीकरण, मुक्त छंद |
बनारस में वसंत का आगमन कैसे होता है और उसका क्या प्रभाव इस शहर पर पड़ता है?
Answer
उत्तर
आगमन: बनारस में वसंत अचानक आता है। लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से धूल का एक बवंडर उठता है और इस महान पुराने शहर की जीभ किरकिराने लगती है।
प्रभाव: 1. “जो है वह सुगबुगाता है”— शहर में जो जीवित है वह हरकत में आ जाता है, जाग उठता है। 2. “जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ”— जो सूखा/निर्जीव है उसमें भी नए अंकुर (कोंपलें) फूटने लगते हैं। 3. दशाश्वमेध घाट का आखिरी पत्थर कुछ और मुलायम हो जाता है। 4. सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में अजीब-सी नमी आ जाती है। 5. भिखारियों के खाली कटोरों का निचाट खालीपन भी एक अजीब-सी चमक से भर उठता है।
अर्थात वसंत पूरे शहर में नई ऊर्जा, कोमलता, आशा और जीवंतता भर देता है।
बनारस में वसंत अचानक, लहरतारा-मडुवाडीह की ओर से उठे धूल के बवंडर के साथ आता है और शहर की जीभ किरकिराने लगती है। उसके प्रभाव से जो है वह सुगबुगाता है, जो नहीं है उसमें भी कोंपलें फूटती हैं, घाट का पत्थर मुलायम लगता है, बंदरों की आँखों में नमी और भिखारियों के खाली कटोरों में चमक आ जाती है — पूरे शहर में नई ऊर्जा और आशा भर जाती है।
‘खाली कटोरों में वसंत का उतरना’ से क्या आशय है?
Answer
उत्तर
- भिखारियों के कटोरे प्रायः खाली रहते हैं— यह उनकी गरीबी और अभाव का प्रतीक है।
- वसंत ऋतु में बनारस में तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है, त्योहार (होली, शिवरात्रि आदि) आते हैं, लोग उदार होकर दान देते हैं; इससे भिखारियों के कटोरे भरने लगते हैं।
- इससे भिखारियों के मन में भी आशा और प्रसन्नता का संचार होता है; उनके खालीपन में चमक भर उठती है।
आशय: वसंत केवल प्रकृति में ही नहीं, बल्कि सबसे उपेक्षित और अभावग्रस्त लोगों के जीवन में भी आशा, खुशी और समृद्धि का संदेश लेकर आता है। कवि का प्रश्न “तुमने कभी देखा है / खाली कटोरों में वसंत का उतरना!” पाठक को इस अनूठे दृश्य की ओर संवेदनशील बनाता है।
वसंत में श्रद्धालुओं की भीड़ और दान बढ़ने से भिखारियों के खाली कटोरे भरने लगते हैं और उनके मन में आशा-प्रसन्नता आती है — अर्थात वसंत सबसे अभावग्रस्त, उपेक्षित लोगों के जीवन में भी खुशी और आशा भर देता है।
बनारस की पूर्णता और रिक्तता को कवि ने किस प्रकार दिखाया है?
Answer
उत्तर
“यह शहर इसी तरह खुलता है / इसी तरह भरता / और खाली होता है यह शहर / इसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शव / ले जाते हैं कंधे / अँधेरी गली से / चमकती हुई गंगा की तरफ़”
- पूर्णता (भरना): बनारस में रोज़ असंख्य श्रद्धालु, तीर्थयात्री आते हैं; घाटों, मंदिरों, गलियों में चहल-पहल रहती है; वसंत में शहर जीवन से भर उठता है; भिखारियों के कटोरे भरते हैं।
- रिक्तता (खाली होना): यहाँ रोज़ अनगिनत शव कंधों पर अँधेरी गलियों से चमकती गंगा की ओर ले जाए जाते हैं (मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र घाट); लोग विदा होते हैं, जीवन समाप्त होता है।
- जीवन-मृत्यु का चक्र: बनारस में जन्म और मृत्यु, आना और जाना, भरना और खाली होना— निरंतर साथ-साथ चलते हैं।
- “आधा है और आधा नहीं है”— शहर की पूर्णता और रिक्तता का एक साथ होना।
बनारस रोज़ श्रद्धालुओं, यात्रियों और चहल-पहल से भरता है (पूर्णता), और रोज़ “अनंत शव” कंधों पर अँधेरी गलियों से गंगा की ओर ले जाए जाते हैं (रिक्तता); इस तरह शहर निरंतर भरता और खाली होता है — जीवन और मृत्यु का चक्र साथ-साथ चलता है; वह “आधा है और आधा नहीं है”।
बनारस में धीरे-धीरे क्या-क्या होता है। ‘धीरे-धीरे’ से कवि इस शहर के बारे में क्या कहना चाहता है?
Answer
उत्तर
धीरे-धीरे होने वाली क्रियाएँ: धूल धीरे-धीरे उड़ती है, लोग धीरे-धीरे चलते हैं, मंदिरों के घंटे धीरे-धीरे बजते हैं, शाम धीरे-धीरे होती है।
कवि का आशय: 1. बनारस में जीवन की गति धीमी, शांत और सहज है; यहाँ आधुनिक महानगरों जैसी भागदौड़ और जल्दबाज़ी नहीं है। 2. शहर में स्थिरता और परंपरा है— सैकड़ों वर्षों से चीज़ें वैसी ही हैं; परिवर्तन बहुत धीमा है। 3. लोग मस्त, निश्चिंत और आध्यात्मिक हैं; उनमें धैर्य और संतोष है। 4. यह धीमापन शहर की सामूहिक लय है, जो उसे बाँधे रखती है और उसकी पहचान है। 5. इसमें हल्का व्यंग्य भी है कि शहर आधुनिक परिवर्तनों से अप्रभावित, जड़-सा है।
धूल, लोग, घंटे और शाम — सब धीरे-धीरे होते हैं। कवि बताना चाहता है कि बनारस में जीवन की गति धीमी, शांत, सहज और आध्यात्मिक है; यहाँ भागदौड़ नहीं, बल्कि परंपरा और स्थिरता है; यही धीमापन शहर की सामूहिक लय और पहचान है (हल्का व्यंग्य भी कि शहर परिवर्तन से अछूता है)।
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय में क्या-क्या बँधा है?
Answer
उत्तर
“यह धीरे-धीरे होना / धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय / दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को”— इस लय में समूचा शहर बँधा है— 1. शहर ऐसे बँधा है कि कुछ भी गिरता नहीं, कुछ भी हिलता नहीं। 2. जो चीज़ जहाँ थी, वहीं पर रखी है। 3. गंगा वहीं है। 4. वहीं पर नाव बँधी है। 5. वहीं पर सैकड़ों बरस से तुलसीदास की खड़ाऊँ रखी है।
अर्थात इस सामूहिक लय ने बनारस की परंपरा, संस्कृति, आस्था, इतिहास और जीवन-शैली को दृढ़ता से सहेजकर रखा है; शहर अपनी पहचान नहीं खोता।
इस सामूहिक लय में समूचा शहर बँधा है — कुछ गिरता या हिलता नहीं, जो चीज़ जहाँ थी वहीं है: गंगा वहीं है, नाव वहीं बँधी है, तुलसीदास की खड़ाऊँ सैकड़ों बरस से वहीं रखी है — अर्थात बनारस की परंपरा, आस्था और संस्कृति दृढ़ता से सुरक्षित है।
‘सई साँझ’ में घुसने पर बनारस की किन-किन विशेषताओं का पता चलता है?
Answer
उत्तर
कवि कहता है कि कभी सई-साँझ (शाम के समय) बिना किसी सूचना के या आरती के आलोक में अचानक बनारस में घुसकर देखो तो इसकी अद्भुत बनावट का पता चलता है— 1. यह आधा जल में है, आधा मंत्र में— गंगा के जल और मंदिरों के मंत्रोच्चार में डूबा हुआ। 2. आधा फूल में है, आधा शव में— पूजा के फूलों और श्मशान घाट के शवों के बीच। 3. आधा नींद में है, आधा शंख में— कुछ लोग अलसाए, सोए हुए; कहीं आरती के शंख बज रहे हैं। 4. यह आधा है और आधा नहीं है— भौतिक और आध्यात्मिक, यथार्थ और रहस्य का मेल। 5. जो है वह बिना किसी स्तंभ के खड़ा है; जो नहीं है उसे राख, रोशनी, आग, पानी, धुएँ, खुशबू और आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ थामे हुए हैं। 6. शहर सदियों से किसी अलक्षित सूर्य को अर्घ्य देता हुआ गंगा में एक टाँग पर खड़ा है।
अर्थात बनारस में जीवन-मृत्यु, आस्था-यथार्थ, भौतिकता-आध्यात्मिकता का अद्भुत सह-अस्तित्व है।
शाम को या आरती के आलोक में अचानक देखने पर बनारस की अद्भुत बनावट दिखती है — आधा जल में, आधा मंत्र में; आधा फूल में, आधा शव में; आधा नींद में, आधा शंख में; आधा है और आधा नहीं; वह राख-रोशनी, आग-पानी, धुएँ-खुशबू और उठे हाथों के स्तंभों पर टिका, गंगा में एक टाँग पर खड़ा होकर अलक्षित सूर्य को अर्घ्य देता है — जीवन-मृत्यु, आस्था-यथार्थ का सह-अस्तित्व।
बनारस शहर के लिए जो मानवीय क्रियाएँ इस कविता में आई हैं, उनका व्यंजनार्थ स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
- “शहर की जीभ किरकिराने लगती है”— धूल भरे वसंत के आगमन से शहर असहज हो जाता है; व्यंजना— पुराने शहर में परिवर्तन की हल्की-सी हलचल।
- “जो है वह सुगबुगाता है”— शहर जागने लगता है; व्यंजना— नई ऊर्जा का संचार।
- “जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ”— व्यंजना— निर्जीव में भी जीवन के अंकुर फूटना।
- “यह शहर इसी तरह खुलता है / … भरता / और खाली होता है”— व्यंजना— शहर में जीवन-मृत्यु का निरंतर चक्र।
- “आधा नींद में है / आधा शंख में”— व्यंजना— अलसाया पर आस्थावान, जागृत शहर।
- “अर्घ्य देता हुआ”— व्यंजना— शहर की धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपरा।
- “अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर / अपनी दूसरी टाँग से / बिलकुल बेखबर!”— व्यंजना— शहर तपस्वी की तरह एक टाँग पर खड़ा होकर साधना में लीन है (आध्यात्मिकता), पर अपने दूसरे पक्ष— भौतिक यथार्थ, गरीबी, गंदगी, आधुनिक विकास— से बेखबर है; इसमें व्यंग्य भी है।
‘जीभ किरकिराना’ (परिवर्तन की असहज हलचल), ‘सुगबुगाना’ (नई ऊर्जा), ‘पचखियाँ फेंकना’ (निर्जीव में जीवन), ‘खुलना-भरना-खाली होना’ (जीवन-मृत्यु का चक्र), ‘आधा नींद में, आधा शंख में’ (अलसाया पर आस्थावान), ‘अर्घ्य देना’ (धार्मिक आस्था), ‘एक टाँग पर खड़ा, दूसरी से बेखबर’ (तपस्वी-सी साधना में लीन, पर भौतिक यथार्थ और विकास से बेखबर — व्यंग्य)।
शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए— (क) ‘यह धीरे-धीरे होना ……….. समूचे शहर को’ (ख) ‘अगर ध्यान से देखो ……….. और आधा नहीं है’ (ग) ‘अपनी एक टाँग पर ……….. बेखबर’
Answer
उत्तर
(क) “यह धीरे-धीरे होना / धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय / दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को” 1. ‘धीरे-धीरे’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार; बार-बार आवृत्ति से धीमी गति का बिंब और लय। 2. ‘सामूहिक लय’ में लाक्षणिकता— पूरे शहर की एक-सी जीवन-शैली। 3. सरल, बोलचाल की खड़ी बोली; मुक्त छंद। 4. ‘लय’ का शहर को ‘बाँधना’— मानवीकरण।
(ख) “अगर ध्यान से देखो / तो यह आधा है / और आधा नहीं है” 1. विरोधाभास अलंकार— ‘है’ और ‘नहीं है’ एक साथ। 2. ‘आधा’ शब्द की आवृत्ति; पूरे अंश में “आधा जल में… आधा मंत्र में…” की श्रृंखला का निष्कर्ष। 3. दार्शनिक गहराई— भौतिक-आध्यात्मिक, दृश्य-अदृश्य का द्वैत। 4. सरल भाषा में गूढ़ भाव; संबोधन शैली (“अगर ध्यान से देखो”)।
(ग) “अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर / अपनी दूसरी टाँग से / बिलकुल बेखबर!” 1. मानवीकरण— शहर को एक टाँग पर खड़े तपस्वी/बगुले के रूप में। 2. दृश्य बिंब; व्यंग्य— आध्यात्मिकता में लीन, पर यथार्थ से बेखबर। 3. ‘बिलकुल बेखबर!’ में विस्मयादिबोधक से व्यंग्य की तीव्रता। 4. बोलचाल की भाषा (बेखबर— उर्दू शब्द), मुक्त छंद।
(क) ‘धीरे-धीरे’ की पुनरुक्ति से धीमी गति का बिंब और लय, ‘सामूहिक लय’ में लाक्षणिकता, लय का शहर को बाँधना (मानवीकरण), सरल खड़ी बोली। (ख) ‘है’ और ‘नहीं है’ में विरोधाभास, ‘आधा’ की आवृत्ति, भौतिक-आध्यात्मिक द्वैत की दार्शनिक गहराई, संबोधन शैली। (ग) शहर का एक टाँग पर खड़े तपस्वी के रूप में मानवीकरण, दृश्य बिंब, आध्यात्मिकता और यथार्थ-विमुखता पर व्यंग्य, विस्मयादिबोधक, बोलचाल की भाषा।
अभ्यास – दिशा
बच्चे का उधर-उधर कहना क्या प्रकट करता है?
Answer
उत्तर
- बाल-मनोविज्ञान: बच्चे का पूरा ध्यान अपनी पतंग पर है; उसके लिए वही दिशा महत्वपूर्ण है जिधर उसकी पतंग जा रही है। बच्चा अपने अनुभव और रुचि के आधार पर संसार को देखता है।
- भोलापन और सहजता: उसे भूगोल का ज्ञान नहीं, पर वह बिना संकोच, सहजता से उत्तर देता है।
- आकांक्षा की दिशा: पतंग ऊँचाई की ओर उड़ रही है, और हिमालय भी ऊँचाई का प्रतीक है; बच्चे के लिए उसकी आकांक्षाओं और सपनों की दिशा ही हिमालय (ऊँचाई/लक्ष्य) की दिशा है।
- दृष्टिकोण की सापेक्षता: हर व्यक्ति का यथार्थ उसके अपने दृष्टिकोण से बनता है।
यह बाल-मनोविज्ञान प्रकट करता है — बच्चे का ध्यान पतंग पर है, इसलिए उसके लिए वही दिशा हिमालय की है जिधर पतंग उड़ रही है; इसमें उसका भोलापन, सहजता और यह भाव भी है कि उसकी ऊँची उड़ती आकांक्षाओं की दिशा ही उसका ‘हिमालय’ (लक्ष्य) है; हर व्यक्ति का यथार्थ उसके दृष्टिकोण से बनता है।
‘मैं स्वीकार करूँ मैंने पहली बार जाना हिमालय किधर है’—प्रस्तुत पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
कवि बच्चे के उत्तर से एक नई अनुभूति प्राप्त करता है। 1. भौगोलिक रूप से कवि जानता था कि हिमालय उत्तर दिशा में है, पर बच्चे के उत्तर ने उसे हिमालय का एक नया अर्थ समझाया। 2. हिमालय ऊँचाई, आदर्श और लक्ष्य का प्रतीक है; बच्चे के लिए उसकी पतंग— उसकी आकांक्षा, कल्पना और उमंग— ही उसका हिमालय है। अर्थात जिधर व्यक्ति की आकांक्षाएँ उड़ान भरती हैं, वही उसके हिमालय की दिशा है। 3. कवि विनम्रता से स्वीकार करता है कि बच्चे की सहज, भोली दृष्टि ने उसे वह ज्ञान दिया जो किताबी ज्ञान नहीं दे सका। 4. भाव यह भी है कि बड़ों को बच्चों से सीखना चाहिए; सत्य अनेक दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है।
कवि जानता था कि भौगोलिक रूप से हिमालय उत्तर में है, पर बच्चे के उत्तर से उसने पहली बार जाना कि हिमालय (ऊँचाई, लक्ष्य) वहीं है जिधर व्यक्ति की आकांक्षाएँ उड़ान भरती हैं; वह विनम्रता से स्वीकार करता है कि बच्चे की सहज दृष्टि ने उसे नया ज्ञान दिया — बड़ों को बच्चों से भी सीखना चाहिए।
अभ्यास – योग्यता-विस्तार
आप बनारस के बारे में क्या जानते हैं? लिखिए।
Answer
उत्तर
बनारस (वाराणसी/काशी) उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के किनारे बसा विश्व के सबसे प्राचीन जीवित नगरों में से एक है। 1. धार्मिक महत्व: भगवान शिव की नगरी; काशी विश्वनाथ मंदिर (बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक); हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ; मान्यता है कि यहाँ मृत्यु से मोक्ष मिलता है। 2. घाट: लगभग 84 घाट— दशाश्वमेध (गंगा आरती), मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र (श्मशान घाट), अस्सी, पंचगंगा आदि। 3. सारनाथ: पास में, जहाँ गौतम बुद्ध ने पहला उपदेश दिया; जैन तीर्थंकरों से भी संबंधित। 4. शिक्षा और साहित्य: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU); कबीर, तुलसीदास (यहीं रामचरितमानस का अंश रचा), रैदास, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद की नगरी। 5. संगीत-कला: बनारस घराना; उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ (शहनाई), पं. रविशंकर, गिरिजा देवी। 6. विशेषताएँ: बनारसी साड़ी, बनारसी पान, गलियाँ, मस्ती भरी जीवन-शैली (“रांड, सांड, सीढ़ी, संन्यासी…”), देव दीपावली।
बनारस (वाराणसी/काशी) गंगा किनारे बसा विश्व का प्राचीनतम जीवित नगर, शिव की नगरी है — काशी विश्वनाथ, लगभग 84 घाट (दशाश्वमेध की आरती, मणिकर्णिका श्मशान), पास में सारनाथ; BHU; कबीर, तुलसी, रैदास, प्रेमचंद, प्रसाद की नगरी; बनारस घराना, बिस्मिल्लाह ख़ाँ; बनारसी साड़ी, पान, गलियाँ और देव दीपावली प्रसिद्ध हैं।
बनारस के चित्र इकट्ठे कीजिए।
Answer
उत्तर
(परियोजना-कार्य)
बनारस के चित्र समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, पर्यटन विभाग की पुस्तिकाओं और इंटरनेट से एकत्र करें। सुझाए गए विषय— 1. दशाश्वमेध घाट पर संध्या की गंगा आरती। 2. काशी विश्वनाथ मंदिर और नया काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर। 3. सुबह के समय नावों से भरी गंगा और घाटों की सीढ़ियाँ। 4. मणिकर्णिका घाट। 5. देव दीपावली पर दीपों से जगमगाते घाट। 6. सारनाथ का धमेख स्तूप। 7. काशी हिंदू विश्वविद्यालय। 8. बनारसी साड़ी बुनते कारीगर, पान की दुकानें, संकरी गलियाँ।
चित्रों को स्क्रैपबुक या चार्ट पर क्रम से लगाएँ, प्रत्येक के नीचे संक्षिप्त विवरण लिखें और कविता की संबंधित पंक्तियाँ भी जोड़ें (जैसे आरती के चित्र के साथ “कभी आरती के आलोक में / इसे अचानक देखो”)।
परियोजना: समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, पर्यटन पुस्तिकाओं और इंटरनेट से गंगा आरती, काशी विश्वनाथ, घाट और नावें, मणिकर्णिका, देव दीपावली, सारनाथ, BHU, बनारसी साड़ी-पान-गलियों के चित्र एकत्र कर स्क्रैपबुक/चार्ट पर विवरण और कविता की पंक्तियों सहित लगाएँ।
बनारस शहर की विशेषताएँ जानिए।
Answer
उत्तर
- प्राचीनता: लगभग तीन हज़ार वर्ष से अधिक पुराना निरंतर बसा नगर; मार्क ट्वेन ने लिखा— “बनारस इतिहास से भी पुराना है।”
- आध्यात्मिकता: शिव की नगरी, मोक्षदायिनी; हिंदू, बौद्ध, जैन धर्मों का केंद्र।
- गंगा और घाट: गंगा का अर्धचंद्राकार तट, घाटों की श्रृंखला।
- जीवन-मृत्यु का सह-अस्तित्व: एक ओर जीवन का उत्सव, दूसरी ओर श्मशान घाट— ‘महाश्मशान’।
- ज्ञान और शिक्षा: प्राचीन काल से विद्या का केंद्र; संस्कृत पाठशालाएँ, BHU, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय।
- कला-संस्कृति: संगीत (बनारस घराना), साहित्य, बनारसी साड़ी, लकड़ी के खिलौने।
- खान-पान: बनारसी पान, कचौड़ी-जलेबी, ठंडाई, लस्सी, मलइयो।
- मस्ती और बेफ़िक्री: ‘बनारसीपन’— धीमी, मस्त जीवन-शैली (कविता का “धीरे-धीरे”)।
- त्योहार: देव दीपावली, महाशिवरात्रि, गंगा महोत्सव, भरत मिलाप, नाग नथैया।
- गलियाँ: संकरी, भूलभुलैया जैसी गलियाँ।
बनारस की विशेषताएँ: अत्यंत प्राचीनता; आध्यात्मिकता (शिव की नगरी, मोक्षदायिनी, हिंदू-बौद्ध-जैन केंद्र); गंगा और घाट; जीवन-मृत्यु का सह-अस्तित्व (महाश्मशान); विद्या का केंद्र (BHU, संस्कृत विश्वविद्यालय); संगीत-साहित्य, बनारसी साड़ी; पान और खान-पान; धीमी, मस्त ‘बनारसी’ जीवन-शैली; देव दीपावली जैसे त्योहार; संकरी गलियाँ।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ बनारस — वसंत, खाली कटोरे, पूर्णता-रिक्तता, धीरे-धीरे, सामूहिक लय (प्रश्न 1–5)
- ☒ सई साँझ, मानवीय क्रियाएँ, शिल्प-सौंदर्य (प्रश्न 6–8)
- ☒ दिशा (प्रश्न 9–10)
- ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 11–13)