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Class 12 Hindi Antra Chapter 7

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 7: बारहमासा

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XII

Hindi

Antra (NCERT)

7 – बारहमासा

2026-27

8 of 8

बिंदु

विवरण

कवि

मलिक मुहम्मद जायसी (1492–1542), जायस (अमेठी); सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के प्रमुख कवि

स्रोत

‘पद्मावत’ के ‘नागमती वियोग खंड’ का अंश — बारहमासा

प्रसंग

राजा रत्नसेन पद्मावती की खोज में सिंहल द्वीप चले गए; रानी नागमती अगहन, पूस, माघ, फागुन मास में विरह की पीड़ा झेलती है

विशेषता

प्रकृति के बदलते रूप के साथ विरह-वेदना का उत्कर्ष; अतिशयोक्ति, उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक; ठेठ अवधी; दोहा-चौपाई

रस

विप्रलंभ (वियोग) श्रृंगार

Q1

अगहन मास की विशेषता बताते हुए विरहिणी (नागमती) की व्यथा-कथा का चित्रण अपने शब्दों में कीजिए।

Answer

उत्तर

अगहन मास की विशेषता: अगहन (मार्गशीर्ष) में दिन छोटे और रातें लंबी हो जाती हैं— “अगहन देवस घटा निसि बाढ़ी”; ठंड शुरू हो जाती है; घर-घर लोग जाड़े के लिए नए-नए वस्त्र बनाते हैं।

नागमती की व्यथा: 1. लंबी रातें विरहिणी के लिए दुसह हैं; उसे दिन भी रात जैसा लगता है और वह दीपक की बत्ती की तरह विरह में जलती रहती है— “जरै बिरह ज्यों दीपक बाती”। 2. ठंड से उसका हृदय काँपता है; ठंड तभी जा सकती है जब प्रिय साथ हो। 3. सब लोग घर-घर वस्त्र बनवा रहे हैं, पर उसका रूप-रंग तो पति अपने साथ ले गया है; जो बिछुड़कर गया वह लौटा नहीं— यदि अब भी लौट आए तो उसका रूप-रंग लौट आए। 4. ठंडी अग्नि (विरह) विरहिणी के हृदय को सुलगा-सुलगाकर राख कर रही है; पति इस दुख को नहीं जानता— यौवन और जीवन भस्म हो रहे हैं। 5. वह भौंरे और कौए से संदेश भेजती है कि तुम्हारी प्रिया विरह में जलकर मर गई और उसी के धुएँ से हम काले हो गए।

अगहन में दिन छोटे और रातें लंबी हो जाती हैं, ठंड शुरू होती है और घर-घर नए वस्त्र बनते हैं। नागमती के लिए लंबी रातें दुसह हैं; वह दीपक की बाती की तरह विरह में जलती है; ठंड प्रिय के साथ ही जा सकती है; उसका रूप-रंग पति ले गया; विरह की ठंडी आग उसे सुलगाकर राख कर रही है और वह भौंरे-कौए से संदेश भेजती है कि वह विरह में जल मरी, उसी के धुएँ से वे काले हो गए।

Q2

‘जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा’ पंक्ति के संदर्भ में नायिका की विरह-दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

Answer

उत्तर

“बिरह सचान भँवै तन चाँड़ा। जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा॥”

प्रसंग: पूस मास के वर्णन में। पूस में भयंकर ठंड है; सूर्य भी ठिठुरकर लंका (दक्षिण) की ओर तपने चला गया है।

विरह-दशा: नागमती कहती है कि विरह रूपी बाज (सचान) उसके शरीर के चारों ओर मँडरा रहा है। वह उसे जीते-जी खा रहा है और मरने के बाद भी नहीं छोड़ेगा। अर्थात विरह की पीड़ा इतनी भयंकर है कि वह जीवन भर उसे नोचती रहेगी और मृत्यु के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ेगी।

उसकी दशा अत्यंत दयनीय है— वह ठंड से काँप-काँपकर मर रही है; सेज हिमालय में डूबी-सी लगती है; चकई तो रात में बिछुड़कर दिन में मिल जाती है, पर वह दिन-रात विरह की कोयल बनी है; रात में कोई सखी साथ नहीं; उसका रक्त ढल गया, माँस गल गया, हड्डियाँ शंख-सी सफ़ेद हो गई हैं।

पूस की भयंकर ठंड में विरह रूपी बाज नागमती के शरीर पर मँडराता है — वह उसे जीते-जी खा रहा है और मरने पर भी नहीं छोड़ेगा; अर्थात विरह-पीड़ा जीवन भर और मृत्यु के बाद भी पीछा नहीं छोड़ेगी। ठंड से काँपती, अकेली, रक्त-माँस से रहित, शंख-सी हड्डियों वाली नागमती की दशा अत्यंत दयनीय है (रूपक, अतिशयोक्ति)।

Q3

माघ महीने में विरहिणी को क्या अनुभूति होती है?

Answer

उत्तर

  1. माघ में पाला पड़ने लगता है; विरह के कारण जाड़ा मृत्यु (काल) के समान हो गया है— “बिरहा काल भएउ जड़काला”।
  2. शरीर को जितना रुई से ढकती है, हृदय उतना ही अधिक काँपता है।
  3. वह प्रिय से कहती है— हे स्वामी! सूर्य बनकर आओ और तपो; तुम्हारे बिना माघ का जाड़ा नहीं छूटेगा।
  4. इस मास में प्रेम-रस उत्पन्न होता है; प्रिय भौंरा है और उसका यौवन फूल।
  5. उसकी आँखों से ऐसे आँसू बहते हैं जैसे माघ की वर्षा (महावट) का पानी; वह जल बाणों की तरह शरीर में चुभता है।
  6. आँसुओं की बूँदें ओलों की तरह गिरती हैं और विरह पवन बनकर झकझोरता है।
  7. किसके लिए श्रृंगार करे, किसके लिए रेशमी वस्त्र पहने? गले में हार भी नहीं रहा— वह स्वयं धागे-सी पतली हो गई है।
  8. प्रिय के बिना वह इतनी हलकी हो गई है कि शरीर तिनके-सा डोलता है; उस पर विरह उसे जलाकर राख की तरह उड़ा देना चाहता है।

माघ में पाला पड़ता है और विरह से जाड़ा काल-सा लगता है; रुई से ढकने पर भी हृदय काँपता है; वह प्रिय को सूर्य बनकर आने को कहती है; उसके आँसू माघ की वर्षा जैसे बहकर बाण-से चुभते और ओलों-से गिरते हैं; श्रृंगार व्यर्थ लगता है, वह धागे-सी पतली और तिनके-सी हलकी हो गई है, जिसे विरह जलाकर उड़ा देना चाहता है।

Q4

वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें किस माह में गिरते हैं? इससे विरहिणी का क्या संबंध है?

Answer

उत्तर

फागुन मास में वृक्षों से पत्तियाँ और वनों में ढाँख (पलाश) के पत्ते झड़ते हैं— “तरिवर झरै झरै बन ढाँखा। भइ अनपत्त फूल फर साखा॥”— पेड़ पत्ते-रहित हो जाते हैं, फिर उन पर नए फूल-फल आते हैं।

विरहिणी से संबंध: 1. विरहिणी का शरीर भी पीले पत्ते जैसा हो गया है— “तन जस पियर पात भा मोरा”; और विरह पवन बनकर उसे झकझोरता है, जैसे पवन पीले पत्तों को गिरा देता है। 2. पेड़ों पर तो पतझड़ के बाद नए पत्ते, फूल और फल आ जाते हैं, वनस्पति हर्षित है— “करिन्ह बनाफति कीन्ह हुलासू”; पर नागमती के जीवन में प्रिय के बिना वसंत नहीं आता— “मो कहँ भा जग दून उदासू”— उसके लिए संसार दुगुना उदास हो गया है। 3. सब लोग फाग खेल रहे हैं, पर उसका हृदय होली की तरह जल रहा है।

फागुन में पेड़ों के पत्ते और वनों के ढाँख (पलाश) झड़ते हैं। विरहिणी का शरीर भी पीले पत्ते जैसा हो गया है जिसे विरह-पवन झकझोरता है; पेड़ों पर तो पतझड़ के बाद नए फूल-फल आ जाते हैं और वनस्पति हर्षित है, पर प्रिय के बिना नागमती के लिए संसार दुगुना उदास है और उसका हृदय होली-सा जलता है।

Q5

निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए— (क) पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग। सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग। (ख) रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख। धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख।। (ग) तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल। तेहि पर बिरह जराई कै, चहै उड़ावा झोल।। (घ) यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ। मकु तेहि मारग होइ परौं, कंत धरैं जहँ पाउ।

Answer

उत्तर

(क) नागमती भौंरे और कौए से कहती है— तुम मेरे प्रियतम से यह संदेश कहना कि तुम्हारी प्रिया विरह की आग में जलकर मर गई; उसी आग के धुएँ से हम (भौंरा और कौआ) काले हो गए हैं। विशेष: भौंरे और कौए के काले रंग का कारण विरह का धुआँ बताया गया है— हेतूत्प्रेक्षा/अतिशयोक्ति; संदेश-शैली; ठेठ अवधी; दोहा छंद।

(ख) विरह में नागमती का रक्त बह गया (सूख गया), माँस गल गया और हड्डियाँ शंख के समान सफ़ेद हो गई हैं। वह सारस पक्षी की तरह प्रिय-प्रिय रटती हुई मर गई है; हे प्रियतम! अब आकर उसके पंख (अवशेष) समेट लो। विशेष: अतिशयोक्ति; ‘हाड़ भए सब संख’ में उपमा; सारस के जोड़े के प्रेम की लोक-मान्यता (एक के मरने पर दूसरा भी प्राण त्याग देता है); करुण दृश्य।

(ग) हे स्वामी! तुम्हारे बिना तुम्हारी प्रिया इतनी हलकी (दुर्बल) हो गई है कि उसका शरीर तिनके की तरह डोलता है। उस पर विरह उसे जलाकर राख की तरह उड़ा देना चाहता है। विशेष: ‘तन तिनुवर भा डोल’ में उपमा; विरह का मानवीकरण; अतिशयोक्ति; दोहा।

(घ) नागमती कहती है— मैं अपने शरीर को जलाकर राख कर दूँ और पवन से कहूँ कि उसे उड़ा ले जाए; शायद उसी मार्ग पर जाकर गिरूँ, जहाँ मेरे प्रियतम अपने पैर रखते हैं। विशेष: प्रेम में आत्म-बलिदान और समर्पण की चरम भावना; सूफ़ी प्रेम की ऊँचाई; ‘मकु’ (शायद) में आशा; अवधी, दोहा।

(क) नागमती भौंरे-कौए से कहती है कि प्रिय को संदेश देना — तुम्हारी प्रिया विरह में जल मरी, उसी के धुएँ से हम काले हो गए (हेतूत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति)। (ख) विरह में उसका रक्त सूख गया, माँस गल गया, हड्डियाँ शंख-सी सफ़ेद हो गईं; वह सारस की तरह रटती मर गई — प्रिय, आकर पंख समेट लो (अतिशयोक्ति, उपमा)। (ग) प्रिय के बिना वह तिनके-सी हलकी होकर डोलती है, उस पर विरह उसे जलाकर उड़ा देना चाहता है (उपमा, मानवीकरण)। (घ) वह शरीर जलाकर राख करने और पवन से उसे उड़ाने को कहती है, ताकि शायद प्रिय के पैरों के मार्ग पर जा गिरे — प्रेम में चरम समर्पण।

Q6

प्रथम दो छंदों में से अलंकार छाँटकर लिखिए और उनसे उत्पन्न काव्य-सौंदर्य पर टिप्पणी कीजिए।

Answer

उत्तर

छंद (1) — अगहन: 1. “जरै बिरह ज्यों दीपक बाती”— उपमा (विरहिणी की दीपक की बत्ती से तुलना); निरंतर, धीरे-धीरे जलने का चित्र। 2. “सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा”— विरोधाभास (ठंडी आग जलाती है)। 3. “सुलगि सुलगि दगधै भै छारा”— पुनरुक्ति प्रकाश; जलने की प्रक्रिया की तीव्रता। 4. “पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा… तेहिक धुआँ हम लाग”— हेतूत्प्रेक्षा / अतिशयोक्ति। 5. “घर घर चीर रचा”— पुनरुक्ति।

छंद (2) — पूस: 1. “थरथर तन काँपा”, “कँपि कँपि मरौं”— पुनरुक्ति प्रकाश। 2. “जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी”— उत्प्रेक्षा (सेज मानो हिमालय में डूबी हो)। 3. “हौं निसि बासर बिरह कोकिला”— रूपक। 4. “बिरह सचान भँवै तन चाँड़ा”— रूपक (विरह = बाज)। 5. “हाड़ भए सब संख”— उपमा; “रकत ढरा माँसू गरा”— अतिशयोक्ति। 6. “धनि सारस होइ ररि मुई”— उपमा/रूपक। 7. “सुरुज जड़ाइ लंक दिसि तापा”— उत्प्रेक्षा/मानवीकरण (सूर्य भी ठिठुरकर दक्षिण की ओर तपने चला गया)।

काव्य-सौंदर्य: इन अलंकारों से विरह-वेदना अत्यंत मार्मिक, सजीव और चित्रात्मक हो गई है; प्रकृति के बदलते रूपों के साथ विरहिणी की दशा का उत्कर्ष दिखता है; अतिशयोक्ति से भाव की तीव्रता बढ़ी है; लोक-जीवन के उपमान (दीपक-बाती, बाज, सारस, चकई, शंख) काव्य को लोकग्राही बनाते हैं।

छंद 1: “जरै बिरह ज्यों दीपक बाती” (उपमा), “सियरि अगिनि… हिय जारा” (विरोधाभास), “सुलगि सुलगि” (पुनरुक्ति), “तेहिक धुआँ हम लाग” (हेतूत्प्रेक्षा/अतिशयोक्ति)। छंद 2: “थरथर”, “कँपि कँपि” (पुनरुक्ति), “जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी” (उत्प्रेक्षा), “बिरह कोकिला”, “बिरह सचान” (रूपक), “हाड़ भए सब संख” (उपमा), “रकत ढरा माँसू गरा” (अतिशयोक्ति), “सुरुज जड़ाइ लंक दिसि तापा” (उत्प्रेक्षा/मानवीकरण)। इनसे विरह-वेदना मार्मिक, सजीव और चित्रात्मक बनी है; लोक-उपमानों से काव्य लोकग्राही हुआ है।

अभ्यास – योग्यता-विस्तार

Q7

किसी अन्य कवि द्वारा रचित विरह वर्णन की दो कविताएँ चुनकर लिखिए और अपने अध्यापक को दिखाइए।

Answer

उत्तर

1. सूरदास (भ्रमरगीत) — “निसिदिन बरसत नैन हमारे। सदा रहति पावस ऋतु हम पै, जब तें स्याम सिधारे॥ अंजन थिर न रहत अँखियन में, कर कपोल भए कारे। कंचुकि-पट सूखत नहिं कबहूँ, उर बिच बहत पनारे॥” (कृष्ण के मथुरा जाने पर गोपियों की विरह-दशा— आँखें सदा बरसती रहती हैं।)

2. मीराबाई — “हे री मैं तो प्रेम-दिवानी, मेरो दरद न जाणै कोय। घायल की गति घायल जाणै, जो कोइ घायल होय॥ … दरद की मारी बन-बन डोलूँ, बैद मिल्या नहिं कोय। मीरा की प्रभु पीर मिटैगी, जद बैद साँवलिया होय॥”

3. (वैकल्पिक) महादेवी वर्मा — “मैं नीर भरी दुख की बदली…”

तुलना: इन सबमें प्रिय-वियोग की गहरी वेदना है; सूर और मीरा में भक्ति-परक विरह है, जायसी में सूफ़ी प्रेम का विरह, जो लौकिक होकर भी अलौकिक की ओर संकेत करता है।

उदाहरण: सूरदास का “निसिदिन बरसत नैन हमारे…” (गोपियों का कृष्ण-विरह) और मीराबाई का “हे री मैं तो प्रेम-दिवानी, मेरो दरद न जाणै कोय…” (या महादेवी वर्मा का “मैं नीर भरी दुख की बदली”)। इन्हें लिखकर अध्यापक को दिखाएँ और जायसी के सूफ़ी विरह से तुलना करें।

Q8

‘नागमती वियोग खंड’ पूरा पढ़िए और जायसी के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।

Answer

उत्तर

(पठन-गतिविधि)

‘नागमती वियोग खंड’: ‘पद्मावत’ का प्रसिद्ध अंश, जिसमें राजा रत्नसेन के पद्मावती की खोज में सिंहलद्वीप चले जाने पर रानी नागमती की बारह महीनों की विरह-वेदना (बारहमासा— आषाढ़ से जेठ तक) का वर्णन है। प्रत्येक मास के प्राकृतिक परिवर्तनों के साथ नागमती की पीड़ा बढ़ती जाती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे हिंदी साहित्य का अद्वितीय विरह-वर्णन माना है, जिसमें रानी नागमती एक साधारण भारतीय नारी के रूप में चित्रित है।

जायसी के बारे में: 1. जन्म लगभग 1492 ई., जायस (अमेठी, उत्तर प्रदेश) में; इसी से ‘जायसी’ कहलाए। 2. सूफ़ी संत; गुरु— शेख मोहिदी और सैयद अशरफ़ जहाँगीर (चिश्ती परंपरा)। 3. बचपन में चेचक से एक आँख चली गई थी। 4. प्रमुख रचनाएँ: पद्मावत (1540, प्रेमाख्यान महाकाव्य), अखरावट, आख़िरी कलाम, कन्हावत। 5. ‘पद्मावत’ में चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहल की राजकुमारी पद्मावती की प्रेम-कथा तथा अलाउद्दीन ख़िलजी के आक्रमण का वर्णन; लौकिक कथा के माध्यम से आत्मा-परमात्मा के मिलन का सूफ़ी दर्शन। 6. भाषा— ठेठ अवधी; छंद— दोहा-चौपाई। 7. हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय के कवि; निधन लगभग 1542 ई.।

पठन-गतिविधि: ‘नागमती वियोग खंड’ में रत्नसेन के सिंहल जाने पर नागमती की बारह महीनों की विरह-वेदना का अद्वितीय वर्णन है। जायसी (लगभग 1492–1542), जायस के सूफ़ी संत-कवि; प्रमुख रचनाएँ — पद्मावत, अखरावट, आख़िरी कलाम; ठेठ अवधी, दोहा-चौपाई; लौकिक प्रेम-कथा से आत्मा-परमात्मा मिलन का सूफ़ी दर्शन और हिंदू-मुस्लिम समन्वय।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ अगहन, पूस, माघ, फागुन में विरह-दशा (प्रश्न 1–4)
  • ☒ व्याख्या (प्रश्न 5)
  • ☒ अलंकार और काव्य-सौंदर्य (प्रश्न 6)
  • ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 7–8)

Total questions answered: 8 of 8

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 7 (बारहमासा) cover?

All 8 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – योग्यता-विस्तार.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

Yes. The answers follow the current NCERT textbook for Class 12 Hindi Antra and the latest CBSE syllabus, so the question numbers and wording match the book you use in class.

How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

Are the NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 7 (बारहमासा) free?

Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.