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Class 12 Hindi Antra Chapter 10

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 10: प्रेमघन की छाया-स्मृति

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XII

Hindi

Antra (NCERT)

10 – प्रेमघन की छाया-स्मृति

2026-27

17 of 17

बिंदु

विवरण

लेखक

आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1884–1941), अगोना (बस्ती, उ.प्र.); ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, ‘चिंतामणि’, ‘रस मीमांसा’

विधा

संस्मरणात्मक निबंध

विषय

लेखक के बचपन का साहित्यिक परिवेश, भारतेंदु के प्रति आकर्षण, उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ से परिचय और उनका विलक्षण व्यक्तित्व

प्रमुख प्रसंग

पिता द्वारा रामचरितमानस-रामचंद्रिका पढ़ना; ‘सत्य हरिश्चंद्र’ के नायक और कवि हरिश्चंद्र में भेद न कर पाना; लताओं के बीच प्रेमघन की पहली झलक; भारतेंदु के घर के नीचे पं. केदारनाथ पाठक से मैत्री; ‘निस्संदेह’ मंडली; वामनाचार्यगिरि का कवित्त; लैंप की चिमनी फूटना

प्रेमघन

हिंदुस्तानी रईस; कंधों तक बाल, विलक्षण वक्रता भरी बातचीत, विनोदप्रियता; ‘मीरजापुर’, ‘नागरी भाषा’

Q1

लेखक ने अपने पिता जी की किन-किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?

Answer

उत्तर

  1. वे फ़ारसी के अच्छे ज्ञाता थे।
  2. पुरानी हिंदी कविता के बड़े प्रेमी थे।
  3. फ़ारसी कवियों की उक्तियों को हिंदी कवियों की उक्तियों के साथ मिलाने में उन्हें बड़ा आनंद आता था।
  4. रात को प्रायः घर के सब लोगों को एकत्र करके रामचरितमानस और रामचंद्रिका बड़े चित्ताकर्षक ढंग से पढ़कर सुनाते थे।
  5. आधुनिक हिंदी साहित्य में भारतेंदु जी के नाटक उन्हें बहुत प्रिय थे; उन्हें भी कभी-कभी सुनाते थे।
  6. वे सरकारी नौकरी में थे (राठ तहसील से मिर्जापुर बदली)।
  7. पुत्र की पढ़ाई के प्रति सजग थे— डरते थे कि लेखक का मन स्कूल की पढ़ाई से न हट जाए, इसलिए भारत जीवन प्रेस की पुस्तकें छिपाकर रखने लगे।

पिता फ़ारसी के अच्छे ज्ञाता और पुरानी हिंदी कविता के प्रेमी थे; फ़ारसी और हिंदी कवियों की उक्तियाँ मिलाने में आनंद लेते; रात को परिवार को रामचरितमानस और रामचंद्रिका चित्ताकर्षक ढंग से सुनाते; भारतेंदु के नाटक उन्हें प्रिय थे; और पुत्र की पढ़ाई के प्रति सजग होकर साहित्यिक पुस्तकें छिपाकर रखते थे।

Q2

बचपन में लेखक के मन में भारतेंदु जी के संबंध में कैसी भावना जगी रहती थी?

Answer

उत्तर

बचपन से ही लेखक के मन में भारतेंदु जी के संबंध में एक अपूर्व मधुर भावना जगी रहती थी। पिता जी द्वारा सुनाए गए ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक के नायक राजा हरिश्चंद्र और नाटककार कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र में लेखक की बाल-बुद्धि कोई भेद नहीं कर पाती थी। ‘हरिश्चंद्र’ शब्द से दोनों की एक मिली-जुली भावना उसके मन में अपूर्व माधुर्य का संचार करती थी। यही कारण था कि भारतेंदु-मंडल के किसी भी सजीव व्यक्ति को देखने की उसके मन में तीव्र उत्कंठा रहती थी।

एक अपूर्व मधुर भावना — बाल-बुद्धि ‘सत्य हरिश्चंद्र’ के नायक राजा हरिश्चंद्र और कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र में भेद नहीं कर पाती थी; ‘हरिश्चंद्र’ शब्द से दोनों की मिली-जुली भावना मन में अपूर्व माधुर्य भरती थी, और भारतेंदु-मंडल के लोगों को देखने की उत्कंठा रहती थी।

Q3

उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की पहली झलक लेखक ने किस प्रकार देखी?

Answer

उत्तर

मिर्जापुर आने पर लेखक को पता चला कि भारतेंदु के मित्र, हिंदी के प्रसिद्ध कवि उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी वहीं रहते हैं। उन्हें देखने की उत्कंठा में एक दिन बालकों की मंडली जोड़ी गई; जो चौधरी साहब का मकान जानते थे, वे अगुआ बने। लगभग डेढ़ मील चलकर वे पत्थर के एक बड़े मकान के सामने पहुँचे। नीचे का बरामदा खाली था; ऊपर का बरामदा सघन लताओं के जाल से ढका था। बच्चों ने सड़क पर कई चक्कर लगाए। कुछ देर बाद एक लड़के ने उँगली से ऊपर इशारा किया— लताओं के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई दी; दोनों कंधों पर बाल बिखरे हुए थे और एक हाथ खंभे पर था। देखते ही देखते वह मूर्ति ओझल हो गई। यही प्रेमघन की पहली झाँकी थी।

बालकों की मंडली के साथ डेढ़ मील चलकर लेखक प्रेमघन के पत्थर के मकान के सामने पहुँचा; सड़क पर कई चक्कर लगाने के बाद एक लड़के के इशारे पर उसने ऊपर लताओं से ढके बरामदे में कंधों पर बाल बिखेरे, खंभे पर हाथ रखे एक मूर्ति देखी, जो देखते ही देखते ओझल हो गई — यही पहली झलक थी।

Q4

लेखक का हिंदी साहित्य के प्रति झुकाव किस तरह बढ़ता गया?

Answer

उत्तर

  1. पारिवारिक वातावरण: पिता जी रात को रामचरितमानस, रामचंद्रिका और भारतेंदु के नाटक सुनाते थे।
  2. भारतेंदु के प्रति आकर्षण: बचपन से भारतेंदु के प्रति मधुर भावना और भारतेंदु-मंडल के लोगों को देखने की उत्कंठा।
  3. प्रेमघन का सान्निध्य: मिर्जापुर में भारतेंदु के मित्र प्रेमघन की झलक और बाद में उनसे परिचय।
  4. पुस्तकें: पिता के सहपाठी बा. रामकृष्ण वर्मा के भारत जीवन प्रेस की पुस्तकें घर आती थीं; पिता के छिपाने पर लेखक पं. केदारनाथ पाठक के हिंदी पुस्तकालय से पुस्तकें ला-लाकर पढ़ने लगा।
  5. पाठक जी से मैत्री: काशी में भारतेंदु के घर के नीचे पं. केदारनाथ पाठक से भेंट, जो गहरी मैत्री में बदल गई।
  6. समवयस्क मंडली: 16 वर्ष की अवस्था तक काशीप्रसाद जायसवाल, भगवानदास हालना, बदरीनाथ गौड़, उमाशंकर द्विवेदी जैसे हिंदी-प्रेमियों की मंडली मिली; हिंदी के नए-पुराने लेखकों की चर्चा होती; लेखक स्वयं को लेखक मानने लगा।
  7. प्रेमघन से लेखक के रूप में संपर्क।

पिता द्वारा मानस, रामचंद्रिका और भारतेंदु के नाटक सुनाने, भारतेंदु के प्रति बचपन की मधुर भावना, प्रेमघन की झलक और सान्निध्य, भारत जीवन प्रेस और केदारनाथ पाठक के पुस्तकालय की पुस्तकें, पाठक जी से मैत्री, और 16 वर्ष तक हिंदी-प्रेमी समवयस्क मंडली में लेखकों की चर्चा — इन सबसे लेखक का हिंदी साहित्य के प्रति झुकाव बढ़ता गया और वह स्वयं को लेखक मानने लगा।

Q5

‘निस्संदेह’ शब्द को लेकर लेखक ने किस प्रसंग का ज़िक्र किया है?

Answer

उत्तर

लेखक और उसकी समवयस्क हिंदी-प्रेमी मंडली आपस में प्रायः लिखने-पढ़ने वाली शुद्ध (साहित्यिक) हिंदी में बातचीत करती थी, जिसमें ‘निस्संदेह’ जैसे तत्सम शब्द आया करते थे। लेखक जिस मुहल्ले में रहता था, वहाँ अधिकतर वकील, मुख्तार, कचहरी के अफ़सर और कर्मचारी (अमला) रहते थे, जो उर्दू बोलते थे। उनके उर्दू-अभ्यस्त कानों को इन लड़कों की हिंदी बोली अनोखी लगती थी। इसलिए उन्होंने इस मंडली का नाम ही ‘निस्संदेह’ लोग रख दिया था।

लेखक की मंडली आपस में ‘निस्संदेह’ जैसे तत्सम शब्दों वाली साहित्यिक हिंदी बोलती थी; मुहल्ले के उर्दू-भाषी वकीलों, मुख्तारों और कचहरी के कर्मचारियों को यह बोली अनोखी लगती थी, इसलिए उन्होंने मंडली का नाम ही ‘निस्संदेह’ लोग रख दिया।

Q6

पाठ में कुछ रोचक घटनाओं का उल्लेख है। ऐसी तीन घटनाएँ चुनकर उन्हें अपने शब्दों में लिखिए।

Answer

उत्तर

  1. लैंप की चिमनी का फूटना: एक बार गरमी में छत पर बैठे लोगों से चौधरी साहब बात कर रहे थे। पास जलते लैंप की बत्ती भभकने लगी। चौधरी साहब नौकरों को आवाज़ देते रहे— “अरे! जब फूट जाई तबै चलत आवह।” लेखक बत्ती नीचे करना चाहता था, पर साथी लक्ष्मीनारायण ने तमाशा देखने के लिए उसे रोक लिया। अंत में चिमनी ग्लोब सहित चकनाचूर हो गई, पर चौधरी साहब का हाथ लैंप की ओर नहीं बढ़ा।
  2. एकादशी और फलाहार: एक पंडित जी ने बताया कि आज एकादशी है, कुछ जल खाया है और चले आ रहे हैं। चौधरी साहब ने चुटकी ली— “जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है?”
  3. घनचक्कर का अर्थ: चौधरी साहब ने एक पड़ोसी से ‘घनचक्कर’ का अर्थ पूछा। पड़ोसी ने उलटा जवाब दिया— एक दिन सोने से पहले सवेरे से रात तक जो-जो काम किए हों, लिख लीजिए और पढ़ जाइए— अर्थात आप स्वयं घनचक्कर हैं।
  4. (अन्य) वामनाचार्यगिरि का कवित्त: कवि वामनाचार्यगिरि सड़क पर चौधरी साहब पर कविता जोड़ते जा रहे थे; बरामदे में कंधों पर बाल छिटकाए खंभे के सहारे खड़े चौधरी साहब को देखकर उन्होंने अंतिम चरण पूरा किया— “खंभा टेकि खड़ी जैसे नारि मुगलाने की।”
  5. (अन्य) सब-जज का कथन: पिता ने परिचय दिया कि इन्हें हिंदी का शौक है; सब-जज बोले— “मैं तो इनकी सूरत देखते ही इस बात से ‘वाकिफ़’ हो गया।”
  1. लैंप की बत्ती भभकने पर चौधरी साहब नौकरों को पुकारते रहे, स्वयं हाथ नहीं बढ़ाया, और चिमनी चकनाचूर हो गई। (2) एकादशी पर “जल खाया” कहने वाले पंडित से चौधरी साहब ने पूछा — “जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है?” (3) ‘घनचक्कर’ का अर्थ पूछने पर पड़ोसी ने कहा — दिन भर के अपने काम लिखकर पढ़ लीजिए। (अन्य: वामनाचार्यगिरि का “खंभा टेकि खड़ी जैसे नारि मुगलाने की”; सब-जज का “सूरत देखते ही वाकिफ़ हो गया”।)
Q7

“इस पुरातत्व की दृष्टि में प्रेम और कुतूहल का अद्भुत मिश्रण रहता था।” यह कथन किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों? स्पष्ट कीजिए।

Answer

उत्तर

यह कथन उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ के संदर्भ में कहा गया है।

क्यों: लेखक और उसकी युवा मंडली प्रेमघन को “एक पुरानी चीज़” समझती थी— वे भारतेंदु-युग के, पुरानी पीढ़ी के कवि थे, भारतेंदु के मित्र थे; उनकी रईसी अदाएँ, कंधों तक लटकते बाल, पुराने ढंग की जीवन-शैली उन्हें ‘पुरातत्व’ जैसी लगती थी। - प्रेम: वे भारतेंदु-मंडल के सजीव प्रतिनिधि और हिंदी के प्रसिद्ध कवि थे, इसलिए युवाओं के मन में उनके प्रति श्रद्धा और प्रेम था। - कुतूहल: उनकी विलक्षण बातचीत, वक्रता, विनोदप्रियता, रईसी ठाठ और अनोखी अदाओं को देखकर युवाओं में जिज्ञासा और कौतूहल रहता था।

इस प्रकार उन्हें देखने की दृष्टि में प्रेम और कुतूहल दोनों का अद्भुत मेल था।

प्रेमघन के संदर्भ में — युवा मंडली उन्हें भारतेंदु-युग की “पुरानी चीज़” (पुरातत्व) मानती थी; भारतेंदु के मित्र और प्रसिद्ध कवि होने से उनके प्रति प्रेम-श्रद्धा थी, और उनकी विलक्षण बातचीत, रईसी अदाओं और विनोदप्रियता से कुतूहल — इसलिए उनकी दृष्टि में प्रेम और कुतूहल का अद्भुत मिश्रण था।

Q8

प्रस्तुत संस्मरण में लेखक ने चौधरी साहब के व्यक्तित्व के किन-किन पहलुओं को उजागर किया है?

Answer

उत्तर

  1. हिंदुस्तानी रईस: वे खासे रईस थे; वसंत पंचमी, होली आदि पर उनके यहाँ खूब नाच-रंग और उत्सव होते थे; उनकी हर अदा से रियासत और तबीयतदारी टपकती थी।
  2. आकर्षक वेशभूषा: कंधों तक लटकते बाल; टहलते हुए पीछे पान की तश्तरी लिए एक छोटा लड़का।
  3. वाक्-चातुर्य और वक्रता: उनकी बातों में विलक्षण वक्रता (टेढ़ापन, चतुराई) रहती थी; बातचीत का ढंग उनके लेखों से निराला था।
  4. विनोदप्रियता: वे लोगों को प्रायः ‘बनाया’ करते थे (मज़ाक करते थे)— जैसे पंडित जी से “फलाहार भी पिया है?”; पड़ोसी से ‘घनचक्कर’ का अर्थ पूछना।
  5. नौकरों से संवाद: नौकर के हाथ से गिलास गिरने पर कहते— “कारे बचा त नाहीं”; उनके प्रश्नों से पहले अक्सर “क्यों साहब” लगा रहता।
  6. आलस्य/रईसी ठसक: लैंप की बत्ती भभकने पर स्वयं हाथ न बढ़ाकर नौकरों को पुकारते रहे।
  7. भाषा-संबंधी विशिष्ट मान्यताएँ: वे ‘नागरी’ को भाषा मानते और नागरी भाषा लिखते थे; ‘मिर्जापुर’ को ‘मीरजापुर’ (लक्ष्मीपुर) लिखते थे।
  8. साहित्यिक व्यक्तित्व: भारतेंदु के मित्र, प्रसिद्ध कवि, युवाओं के प्रेरणा-स्रोत।

प्रेमघन खासे हिंदुस्तानी रईस थे (उत्सव, नाच-रंग, रियासती अदाएँ), कंधों तक बाल और पान की तश्तरी लिए लड़के के साथ टहलते; उनकी बातचीत में विलक्षण वक्रता थी; वे विनोदप्रिय थे और लोगों को ‘बनाते’ थे; नौकरों से अनोखा संवाद (“कारे बचा त नाहीं”), “क्यों साहब” की आदत; रईसी ठसक (लैंप वाली घटना); ‘नागरी भाषा’ और ‘मीरजापुर’ जैसी भाषा-संबंधी विशिष्ट मान्यताएँ; और भारतेंदु के मित्र, प्रेरक कवि।

Q9

समवयस्क हिंदी प्रेमियों की मंडली में कौन-कौन से लेखक मुख्य थे?

Answer

उत्तर

16 वर्ष की अवस्था तक लेखक को समवयस्क हिंदी-प्रेमियों की एक खासी मंडली मिल गई थी, जिसमें मुख्य थे— 1. श्रीयुत काशीप्रसाद जायसवाल (बाद में प्रसिद्ध इतिहासकार) 2. बा. भगवानदास हालना 3. पं. बदरीनाथ गौड़ 4. पं. उमाशंकर द्विवेदी

(इसके अतिरिक्त सहपाठी पं. लक्ष्मीनारायण चौबे और बा. भगवानदास मास्टर का भी उल्लेख है, जिन्होंने ‘उर्दू बेगम’ नामक विनोदपूर्ण पुस्तक लिखी थी।)

काशीप्रसाद जायसवाल, भगवानदास हालना, बदरीनाथ गौड़ और उमाशंकर द्विवेदी (साथ ही सहपाठी लक्ष्मीनारायण चौबे और ‘उर्दू बेगम’ के लेखक भगवानदास मास्टर)।

Q10

‘भारतेंदु जी के मकान के नीचे का यह हृदय-परिचय बहुत शीघ्र गहरी मैत्री में परिणत हो गया।’ कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

Answer

उत्तर

एक बार लेखक एक बारात में काशी गया और घूमता हुआ चौखंभा की ओर निकल गया। वहाँ एक घर से पं. केदारनाथ पाठक निकलते दिखे, जो लेखक को अपने पुस्तकालय में प्रायः देखा करते थे। उन्होंने बताया कि वह भारतेंदु जी का घर है। लेखक बड़ी चाह और कुतूहल से, न जाने किन-किन भावनाओं में लीन होकर उस मकान को देखता रहा। पाठक जी लेखक की यह भावुकता देखकर बड़े प्रसन्न हुए और बहुत दूर तक उसके साथ बातचीत करते हुए गए।

आशय: भारतेंदु के मकान के नीचे हुई यह भेंट दो हृदयों का परिचय थी— दोनों में भारतेंदु और हिंदी के प्रति समान प्रेम और श्रद्धा थी। इसी समान भावना के कारण यह साधारण परिचय बहुत जल्दी गहरी, आत्मीय मित्रता में बदल गया।

काशी में भारतेंदु के घर के नीचे लेखक की भावुकता देखकर पं. केदारनाथ पाठक प्रसन्न हुए और दूर तक उससे बातें करते गए; भारतेंदु और हिंदी के प्रति दोनों के समान प्रेम के कारण यह हृदय-परिचय शीघ्र ही गहरी, आत्मीय मित्रता में बदल गया।

अभ्यास – भाषा-शिल्प

Q11

हिंदी-उर्दू के विषय में लेखक के विचारों को देखिए। आप इन दोनों को एक ही भाषा की दो शैलियाँ मानते हैं या भिन्न भाषाएँ?

Answer

उत्तर

पाठ में लेखक के संकेत: लेखक की मंडली शुद्ध साहित्यिक हिंदी (‘निस्संदेह’ जैसे शब्दों वाली) बोलती थी, जो उर्दू-भाषी कचहरी के लोगों को अनोखी लगती थी; पिता फ़ारसी के ज्ञाता होकर भी हिंदी कविता के प्रेमी थे; ‘उर्दू बेगम’ पुस्तक में उर्दू की उत्पत्ति का विनोदपूर्ण वर्णन है।

मेरा मत: मैं हिंदी और उर्दू को एक ही भाषा (हिंदुस्तानी/खड़ी बोली) की दो शैलियाँ मानता हूँ— 1. दोनों का व्याकरण, क्रियाएँ, सर्वनाम, वाक्य-संरचना लगभग समान है। 2. बोलचाल में दोनों में बहुत कम अंतर है; आम लोग दोनों को समझते हैं (फ़िल्मी गीत, बोलचाल)। 3. अंतर मुख्यतः लिपि (देवनागरी बनाम फ़ारसी-अरबी/नस्तालीक) और शब्दावली (हिंदी में संस्कृत तत्सम, उर्दू में अरबी-फ़ारसी) में है। 4. साहित्यिक स्तर पर, जब हिंदी में संस्कृतनिष्ठ और उर्दू में फ़ारसीनिष्ठ शब्द अधिक हों, तो दोनों भिन्न भाषाएँ प्रतीत होती हैं— इसलिए औपचारिक, साहित्यिक रूप में इन्हें अलग भाषाएँ भी माना जाता है (संविधान की आठवीं अनुसूची में दोनों अलग-अलग)।

अतः मूल रूप से दोनों एक ही भाषा की दो शैलियाँ हैं, जो लिपि, शब्दावली और साहित्यिक परंपरा के कारण भिन्न भाषाओं के रूप में विकसित हुईं।

पाठ में लेखक की मंडली की तत्सम-युक्त हिंदी उर्दू-भाषी कचहरी वालों को अनोखी लगती थी। मेरा मत: हिंदी-उर्दू मूलतः एक ही भाषा (खड़ी बोली/हिंदुस्तानी) की दो शैलियाँ हैं — व्याकरण और बोलचाल लगभग समान; अंतर लिपि (देवनागरी/फ़ारसी) और शब्दावली (संस्कृत/अरबी-फ़ारसी) का है; साहित्यिक-औपचारिक स्तर पर ये भिन्न भाषाओं के रूप में विकसित हुई हैं (आठवीं अनुसूची में अलग-अलग)।

Q12

चौधरी जी के व्यक्तित्व को बताने के लिए पाठ में कुछ मज़ेदार वाक्य आए हैं—उन्हें छाँटकर उनका संदर्भ लिखिए।

Answer

उत्तर

वाक्य

संदर्भ

“कारे बचा त नाहीं”

नौकर के हाथ से गिलास आदि गिरने पर चौधरी साहब यही कहते थे— उनकी विनोदपूर्ण बोली

“क्यों साहब”

उनके प्रश्नों के पहले अक्सर लगा रहता था— उनकी तकिया-कलाम

“जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है?”

एकादशी पर “कुछ जल खाया है” कहने वाले पंडित जी पर चुटकी

“क्यों साहब, एक लफ़्ज़ मैं अकसर सुना करता हूँ… आखिर घनचक्कर के क्या मानी है।”

पड़ोसी को ‘बनाने’ के लिए पूछा गया प्रश्न, जिसका पड़ोसी ने उलटा उत्तर दिया

“अरे! जब फूट जाई तबै चलत आवह।”

लैंप की बत्ती भभकने पर नौकरों को पुकारते हुए; चिमनी फूट गई पर हाथ नहीं बढ़ाया

“खंभा टेकि खड़ी जैसे नारि मुगलाने की।”

कवि वामनाचार्यगिरि ने बरामदे में खंभे के सहारे बाल छिटकाए खड़े चौधरी साहब पर यह कवित्त ललकारा

“उनकी हर एक अदा से रियासत और तबीयतदारी टपकती थी।”

लेखक द्वारा उनके रईसी व्यक्तित्व का वर्णन

प्रश्न 1

“कारे बचा त नाहीं” (नौकर से गिलास गिरने पर), “क्यों साहब” (प्रश्नों का तकिया-कलाम), “जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है?” (एकादशी वाले पंडित पर चुटकी), “घनचक्कर के क्या मानी है?” (पड़ोसी को बनाना), “अरे! जब फूट जाई तबै चलत आवह” (लैंप की बत्ती भभकने पर), “खंभा टेकि खड़ी जैसे नारि मुगलाने की” (वामनाचार्यगिरि का कवित्त), “हर एक अदा से रियासत और तबीयतदारी टपकती थी” (रईसी व्यक्तित्व)।

उत्तर

Q13

पाठ की शैली की रोचकता पर टिप्पणी कीजिए।

Answer

उत्तर

  1. संस्मरणात्मक, आत्मकथात्मक शैली: लेखक अपने बचपन और किशोरावस्था के अनुभवों को ‘मैं’ के रूप में आत्मीयता से सुनाता है, जिससे पाठक सीधे जुड़ जाता है।
  2. घटना-प्रधानता: छोटी-छोटी रोचक घटनाओं (प्रेमघन की पहली झलक, लैंप फूटना, ‘निस्संदेह’ मंडली, घनचक्कर) से पाठ सजीव बन गया है।
  3. हास्य-विनोद: चौधरी साहब के विनोदपूर्ण संवाद और प्रसंग पाठ को मनोरंजक बनाते हैं।
  4. चित्रात्मकता: “लता-प्रतान के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई पड़ी। दोनों कंधों पर बाल बिखरे हुए थे”— दृश्य आँखों के सामने साकार हो जाता है।
  5. भाषा-वैविध्य: तत्सम हिंदी (उत्कंठा, आवृत, परिणत) के साथ उर्दू (वाकिफ़, मुख्तार, अमला, लफ़्ज़) और लोकभाषा (कारे बचा त नाहीं) का प्रयोग।
  6. व्यंग्य और सूक्ष्म निरीक्षण: सब-जज का कथन, ‘पुरातत्व की दृष्टि’ जैसे प्रयोग।
  7. प्रवाह और सरलता: आचार्य शुक्ल की गंभीर आलोचनात्मक शैली से भिन्न, यह शैली सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय है।

पाठ की शैली रोचक है — आत्मीय संस्मरणात्मक (‘मैं’) शैली, छोटी-छोटी रोचक घटनाओं की प्रधानता, चौधरी साहब के हास्य-विनोदपूर्ण संवाद, चित्रात्मक वर्णन (लताओं के बीच बाल बिखेरे मूर्ति), तत्सम-उर्दू-लोकभाषा का मिश्रण, सूक्ष्म निरीक्षण और हलका व्यंग्य, तथा सहज-प्रवाहपूर्ण भाषा।

अभ्यास – योग्यता-विस्तार

Q14

भारतेंदु मंडल के प्रमुख लेखकों के नाम और उनकी प्रमुख रचनाओं की सूची बनाकर स्पष्ट कीजिए कि आधुनिक हिंदी गद्य के विकास में इन लेखकों का क्या योगदान रहा?

Answer

उत्तर

लेखक

प्रमुख रचनाएँ

भारतेंदु हरिश्चंद्र

अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (नाटक); ‘कविवचन सुधा’, ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन’ (पत्रिकाएँ)

बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’

भारत सौभाग्य (नाटक), प्रेमघन सर्वस्व; ‘आनंद कादंबिनी’, ‘नागरी नीरद’ (पत्रिकाएँ)

प्रतापनारायण मिश्र

‘बात’, ‘भौं’, ‘धोखा’ (निबंध); ‘ब्राह्मण’ पत्रिका; कलि कौतुक (नाटक)

बालकृष्ण भट्ट

‘हिंदी प्रदीप’ पत्रिका; नूतन ब्रह्मचारी, सौ अजान एक सुजान (उपन्यास); निबंध

लाला श्रीनिवास दास

परीक्षा गुरु (हिंदी का प्रथम मौलिक उपन्यास माना जाता है), रणधीर प्रेममोहिनी (नाटक)

राधाचरण गोस्वामी

‘भारतेंदु’ पत्रिका, नाटक और निबंध

ठाकुर जगमोहन सिंह

श्यामा स्वप्न (उपन्यास)

अंबिकादत्त व्यास

शिवराज विजय (संस्कृत उपन्यास), नाटक

राधाकृष्ण दास

महाराणा प्रताप (नाटक), निस्सहाय हिंदू (उपन्यास)

योगदान: 1. खड़ी बोली गद्य की स्थापना: इन लेखकों ने ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली को गद्य की भाषा के रूप में स्थापित और परिष्कृत किया। 2. विविध विधाओं का विकास: नाटक, निबंध, उपन्यास, आलोचना, यात्रा-वृत्त आदि गद्य-विधाओं की नींव रखी। 3. पत्रकारिता: अनेक पत्र-पत्रिकाएँ निकालकर हिंदी गद्य को जन-जन तक पहुँचाया। 4. राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना: देशभक्ति, समाज-सुधार, अंग्रेज़ी शासन के शोषण पर व्यंग्य— जनजागरण। 5. हास्य-व्यंग्य और जीवंत शैली: सरल, रोचक भाषा से गद्य को लोकप्रिय बनाया।

प्रमुख लेखक: भारतेंदु (अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, कविवचन सुधा), प्रेमघन (आनंद कादंबिनी), प्रतापनारायण मिश्र (‘ब्राह्मण’, ‘बात’ निबंध), बालकृष्ण भट्ट (‘हिंदी प्रदीप’), लाला श्रीनिवास दास (परीक्षा गुरु), ठाकुर जगमोहन सिंह (श्यामा स्वप्न), राधाचरण गोस्वामी, राधाकृष्ण दास आदि। योगदान: खड़ी बोली गद्य की स्थापना, नाटक-निबंध-उपन्यास जैसी विधाओं की नींव, पत्रकारिता से प्रसार, राष्ट्रीय-सामाजिक जागरण और रोचक हास्य-व्यंग्यपूर्ण शैली।

Q15

आपको जिस व्यक्ति ने सर्वाधिक प्रभावित किया है, उसके व्यक्तित्व की विशेषताओं को लिखिए।

Answer

उत्तर

(नमूना उत्तर — डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम)

मुझे सबसे अधिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने प्रभावित किया है। 1. साधारण पृष्ठभूमि से असाधारण उपलब्धि: रामेश्वरम के एक गरीब परिवार में जन्मे; अख़बार बेचकर पढ़ाई की और ‘मिसाइल मैन’ व भारत के राष्ट्रपति बने। 2. वैज्ञानिक दृष्टि: अग्नि, पृथ्वी मिसाइलों और पोखरण परमाणु परीक्षण में प्रमुख भूमिका। 3. सादगी और विनम्रता: राष्ट्रपति होकर भी अत्यंत सादा जीवन; कोई निजी संपत्ति नहीं। 4. बच्चों और युवाओं से प्रेम: विद्यार्थियों को सपने देखने और मेहनत करने की प्रेरणा देते रहे— “सपने वो नहीं जो सोते हुए देखें, सपने वो हैं जो सोने न दें।” 5. कर्मठता: अंतिम क्षण तक (शिलांग में व्याख्यान देते हुए) कार्यरत रहे। 6. धार्मिक सद्भाव और देशभक्ति। 7. लेखक: ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’, ‘इग्नाइटेड माइंड्स’।

उनके जीवन से मैंने सीखा कि लगन, ईमानदारी और परिश्रम से कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

नमूना — डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम: गरीब पृष्ठभूमि से ‘मिसाइल मैन’ और राष्ट्रपति बनना, वैज्ञानिक उपलब्धियाँ, सादगी-विनम्रता, युवाओं को सपने देखने और परिश्रम की प्रेरणा, अंतिम क्षण तक कर्मठता, धार्मिक सद्भाव, देशभक्ति और लेखन (‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’)।

Q16

यदि आपको किसी साहित्यकार से मिलने का अवसर मिले तो आप उनसे क्या-क्या पूछना चाहेंगे और क्यों?

Answer

उत्तर

(नमूना — यदि किसी समकालीन साहित्यकार, जैसे गुलज़ार या किसी प्रिय कवि से भेंट हो)

  1. आपको लिखने की प्रेरणा कहाँ से और कब मिली? — यह जानने के लिए कि रचनात्मकता की शुरुआत कैसे होती है।
  2. आप किसे अपना साहित्यिक गुरु या आदर्श मानते हैं? — उनके साहित्यिक संस्कारों को समझने के लिए (जैसे शुक्ल जी के लिए भारतेंदु-प्रेमघन)।
  3. आपकी लेखन-प्रक्रिया क्या है— क्या आप रोज़ लिखते हैं, विचार कैसे आते हैं? — लेखन की आदतें सीखने के लिए।
  4. आपकी सबसे प्रिय रचना कौन-सी है और क्यों?
  5. आज के युवा पाठकों और सोशल मीडिया युग में साहित्य की क्या भूमिका है? — साहित्य के भविष्य पर उनका दृष्टिकोण जानने के लिए।
  6. नए लेखकों को आप क्या सलाह देंगे? — स्वयं लिखने की प्रेरणा पाने के लिए।
  7. जीवन के किन अनुभवों ने आपकी रचनाओं को सबसे अधिक प्रभावित किया?

क्यों: इन प्रश्नों से साहित्यकार के व्यक्तित्व, रचना-प्रक्रिया और जीवन-दृष्टि को समझने में मदद मिलेगी, जिससे मेरे पढ़ने और लिखने में रुचि और समझ बढ़ेगी।

प्रश्न: लिखने की प्रेरणा कब और कैसे मिली; साहित्यिक आदर्श कौन; लेखन-प्रक्रिया क्या है; सबसे प्रिय रचना कौन-सी; सोशल मीडिया युग में साहित्य की भूमिका; नए लेखकों को सलाह; किन जीवन-अनुभवों ने रचनाओं को प्रभावित किया — इनसे उनके व्यक्तित्व, रचना-प्रक्रिया और जीवन-दृष्टि को समझकर अपनी पढ़ने-लिखने की रुचि बढ़ेगी।

Q17

संस्मरण साहित्य क्या है? इसके बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।

Answer

उत्तर

संस्मरण: ‘सम्’ + ‘स्मरण’— अर्थात सम्यक् (भली-भाँति) स्मरण। संस्मरण वह गद्य-विधा है जिसमें लेखक अपने जीवन में आए किसी व्यक्ति, घटना, स्थान या वस्तु से जुड़ी स्मृतियों को आत्मीयता, भावुकता और सजीवता से प्रस्तुत करता है। इसमें लेखक स्वयं भी उपस्थित रहता है, पर केंद्र में वह व्यक्ति या घटना होती है जिसकी स्मृति लिखी जा रही है।

विशेषताएँ: 1. यथार्थता: घटनाएँ सच्ची और लेखक के प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित होती हैं। 2. आत्मीयता और भावुकता। 3. व्यक्ति-चित्रण: जिस व्यक्ति पर संस्मरण है, उसके व्यक्तित्व के विविध पहलू उभरते हैं। 4. रोचकता: छोटी-छोटी घटनाओं से सजीवता। 5. संक्षिप्तता और चित्रात्मकता।

आत्मकथा से अंतर: आत्मकथा में लेखक अपने पूरे जीवन की कथा कहता है; संस्मरण में केंद्र में कोई अन्य व्यक्ति/घटना होती है। रेखाचित्र से अंतर: रेखाचित्र में व्यक्ति का शब्द-चित्र प्रधान होता है; संस्मरण में स्मृति और घटनाएँ।

प्रमुख संस्मरण-लेखक और रचनाएँ: महादेवी वर्मा (स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी, अतीत के चलचित्र), बनारसीदास चतुर्वेदी (संस्मरण), रामवृक्ष बेनीपुरी (माटी की मूरतें), कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ (भूले हुए चेहरे), हरिवंश राय बच्चन, रामचंद्र शुक्ल (प्रेमघन की छाया-स्मृति), विष्णु प्रभाकर, कांतिकुमार जैन।

संस्मरण वह गद्य-विधा है जिसमें लेखक किसी व्यक्ति, घटना या स्थान से जुड़ी अपनी सच्ची स्मृतियों को आत्मीयता और सजीवता से प्रस्तुत करता है; इसकी विशेषताएँ — यथार्थता, आत्मीयता, व्यक्ति-चित्रण, रोचकता, चित्रात्मकता। आत्मकथा (पूरा अपना जीवन) और रेखाचित्र (शब्द-चित्र) से भिन्न। प्रमुख लेखक: महादेवी वर्मा (पथ के साथी, अतीत के चलचित्र), बनारसीदास चतुर्वेदी, रामवृक्ष बेनीपुरी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, रामचंद्र शुक्ल।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ पिता, भारतेंदु के प्रति भावना, प्रेमघन की पहली झलक, हिंदी की ओर झुकाव (प्रश्न 1–4)
  • ☒ निस्संदेह, रोचक घटनाएँ, पुरातत्व की दृष्टि, प्रेमघन का व्यक्तित्व, मंडली, मैत्री (प्रश्न 5–10)
  • ☒ भाषा-शिल्प (प्रश्न 11–13)
  • ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 14–17)

Total questions answered: 17 of 17

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 10 (प्रेमघन की छाया-स्मृति) cover?

All 18 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – भाषा-शिल्प and अभ्यास – योग्यता-विस्तार.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

Yes. The answers follow the current NCERT textbook for Class 12 Hindi Antra and the latest CBSE syllabus, so the question numbers and wording match the book you use in class.

How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

Are the NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 10 (प्रेमघन की छाया-स्मृति) free?

Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.