Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Antra (NCERT) | 14 – लघु कथाएँ (शेर, पहचान, चार हाथ, साझा) | 2026-27 | 22 of 22 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | असगर वजाहत (जन्म 1946), फतेहपुर (उ.प्र.); जामिया मिल्लिया में अध्यापन; ‘जिस लाहौर नई देख्या’ (नाटक), ‘सात आसमान’, ‘कैसी आगि लगाई’ (उपन्यास) |
विधा | प्रतीकात्मक, व्यंग्यात्मक लघुकथाएँ |
शेर | शेर = सत्ता/व्यवस्था; जानवर प्रलोभन (घास, रोज़गार, स्वर्ग) में स्वयं उसके मुँह में जाते हैं; विरोध करने पर ‘अहिंसावादी’ शेर झपट पड़ता है |
पहचान | राजा जनता को अंधी, बहरी, गूँगी बनाकर ‘प्रगति’ करता है; आँखें खोलने पर सामने केवल राजा दिखता है, एक-दूसरे को नहीं |
चार हाथ | पूँजीपति द्वारा मज़दूरों का शोषण; अंत में आधी मज़दूरी पर दुगुने मज़दूर |
साझा | हाथी (धनाढ्य, प्रभुत्वशाली वर्ग) साझे की खेती के नाम पर किसान की पूरी फ़सल हड़प लेता है |
लोमड़ी स्वेच्छा से शेर के मुँह में क्यों चली जा रही थी?
Answer
उत्तर
लोमड़ी को विश्वास था कि शेर के मुँह के अंदर रोज़गार का दफ़्तर है; वहाँ वह दरख्वास्त देगी और उसे नौकरी मिल जाएगी। यह बात उसे स्वयं शेर ने बताई थी। अर्थात सत्ता के झूठे प्रचार और नौकरी के प्रलोभन में आकर वह अपनी इच्छा से शेर के मुँह में चली गई।
लोमड़ी को शेर ने ही बताया था कि उसके मुँह के अंदर रोज़गार का दफ़्तर है; वहाँ दरख्वास्त देकर नौकरी पाने के प्रलोभन में वह स्वेच्छा से शेर के मुँह में चली गई।
कहानी में लेखक ने शेर को किस बात का प्रतीक बताया है?
Answer
उत्तर
शेर सत्ता या व्यवस्था (शासन-तंत्र) का प्रतीक है। 1. वह जनता (जंगल के जानवरों) को झूठे प्रलोभनों— हरी घास का मैदान, रोज़गार का दफ़्तर, स्वर्ग, निर्वाण— से अपने मुँह (पेट) में समा लेता है; यानी जनता का शोषण करता है। 2. वह स्वयं को अहिंसा और सह-अस्तित्ववाद का समर्थक बताता है, गौतम बुद्ध की मुद्रा में बैठता है— यानी सत्ता का दिखावटी, उदार चेहरा। 3. उसका स्टाफ़ (नौकरशाही) प्रचार करता है— “प्रमाण से अधिक महत्वपूर्ण है विश्वास।” 4. जैसे ही लेखक उसकी बात मानने से इनकार करता है, शेर दहाड़कर झपट पड़ता है— अर्थात सत्ता तभी तक शांत रहती है जब तक लोग आज्ञा मानते रहें; विरोध होते ही वह खूँखार होकर विरोधी स्वर को कुचल देती है।
शेर सत्ता/व्यवस्था का प्रतीक है — जो झूठे प्रलोभनों (घास, रोज़गार, स्वर्ग) से जनता को निगलती है, अहिंसा और बुद्ध-मुद्रा का दिखावटी उदार चेहरा रखती है, अपने स्टाफ़ से अंधविश्वास का प्रचार कराती है, और विरोध होते ही खूँखार होकर विरोधी पर झपट पड़ती है।
शेर के मुँह और रोज़गार के दफ़्तर के बीच क्या अंतर है?
Answer
उत्तर
- रोज़गार का दफ़्तर वह स्थान है जहाँ लोग नौकरी के लिए आवेदन करते हैं और जहाँ से उन्हें जीविका, सुरक्षा और जीवन मिलता है। यह वास्तविक, बाहर दिखाई देने वाला दफ़्तर है (जिसे शेर का स्टाफ़ “मिथ्या” बताता है)।
- शेर का मुँह मृत्यु, विनाश और शोषण का स्थान है; जो उसमें जाता है, वह कभी लौटता नहीं— उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
लेखक कहता है— “शेर के मुँह और रोज़गार के दफ़्तर का अंतर मुझे मालूम है।” अर्थात सत्ता झूठे वादों से शोषण के स्थान को ही रोज़गार और कल्याण का स्थान बताकर जनता को भ्रमित करती है; जागरूक व्यक्ति इस अंतर को पहचानता है।
रोज़गार का दफ़्तर जीविका और जीवन देने वाला वास्तविक स्थान है, जबकि शेर का मुँह मृत्यु और शोषण का स्थान है जहाँ से कोई नहीं लौटता; सत्ता झूठे प्रचार से शेर के मुँह को ही रोज़गार का दफ़्तर बताती है और असली दफ़्तर को ‘मिथ्या’ — जागरूक लेखक यह अंतर पहचानता है।
‘प्रमाण से अधिक महत्वपूर्ण है विश्वास’ कहानी के आधार पर टिप्पणी कीजिए।
Answer
उत्तर
जब लेखक ने शेर के स्टाफ़ से पूछा कि शेर के पेट में रोज़गार का दफ़्तर होने का क्या प्रमाण है, तो उत्तर मिला— “सब ऐसा ही मानते हैं” और “प्रमाण से अधिक महत्वपूर्ण है विश्वास।”
टिप्पणी: 1. यह सत्ता का वह हथियार है जिससे वह तर्क और प्रश्न को दबाकर अंधविश्वास पैदा करती है। 2. सत्ता प्रचार के बल पर जनता में ऐसा विश्वास बना देती है कि लोग बिना सोचे-समझे, बिना प्रमाण माँगे, उसकी बात मान लेते हैं— जैसे गधा, लोमड़ी, उल्लू, कुत्ते। 3. “सब ऐसा ही मानते हैं”— भेड़चाल की मानसिकता पर व्यंग्य है। 4. विश्वास का अपना महत्व है, पर अंधविश्वास विनाशकारी है। लोकतंत्र में हर दावे की जाँच और प्रमाण माँगना नागरिक का अधिकार और कर्तव्य है। 5. लेखक ने तर्क का सहारा लिया— “तुम लोग मुझे उल्लू नहीं बना सकते”— इसलिए वह बच गया, भले ही सत्ता उस पर झपट पड़ी।
यह सत्ता का हथियार है, जिससे वह तर्क और प्रश्न को दबाकर अंधविश्वास पैदा करती है; प्रचार और भेड़चाल (“सब ऐसा ही मानते हैं”) से लोग बिना प्रमाण उसकी बात मानकर शोषण का शिकार होते हैं। विश्वास ठीक है पर अंधविश्वास विनाशकारी; प्रमाण माँगना नागरिक का अधिकार है — तर्क करने वाला लेखक ही धोखे से बचा।
अभ्यास – पहचान
राजा ने जनता को हुक्म क्यों दिया कि सब लोग अपनी आँखें बंद कर लें?
Answer
उत्तर
ऊपरी कारण (राजा का घोषित तर्क): ताकि लोगों को शांति मिलती रहे।
वास्तविक कारण: राजा चाहता था कि जनता राज्य की वास्तविक स्थिति, अन्याय, शोषण और उसकी करतूतों को न देख सके। आँखें बंद रहने पर जनता न तो सच्चाई जान पाएगी, न प्रश्न करेगी, न विरोध करेगी और चुपचाप काम (उत्पादन) करती रहेगी। अंधी प्रजा पर शासन करना और उसका शोषण करना आसान होता है।
घोषित कारण — ताकि लोगों को शांति मिलती रहे; वास्तविक कारण — जनता राज्य की सच्चाई, अन्याय और राजा की करतूतें न देख सके, प्रश्न-विरोध न करे और चुपचाप उत्पादन करती रहे, ताकि उस पर शासन और उसका शोषण आसान हो।
आँखें बंद रखने और आँखें खोलकर देखने के क्या परिणाम निकले?
Answer
उत्तर
आँखें बंद रखने के परिणाम: 1. जनता आँखें बंद किए-किए सारा काम करती रही, और आश्चर्य की बात यह कि काम पहले से बहुत अधिक और अच्छा होने लगा; उत्पादन बढ़ा। 2. जनता ने आगे के हुक्म भी बिना देखे-सोचे मान लिए— कानों में सीसा, होंठ सिलवाना आदि। 3. “राजा रातदिन प्रगति करता रहा”— प्रगति जनता की नहीं, राजा की हुई।
आँखें खोलकर देखने के परिणाम: खैराती, रामू और छिद्दू ने सोचा कि अब तक राज्य स्वर्ग हो गया होगा; पर आँखें खोलने पर उन्हें अपने सामने केवल राजा दिखाई दिया; वे एक-दूसरे को न देख सके। अर्थात जनता का कोई विकास नहीं हुआ था, सारा लाभ राजा का हुआ; और जनता इतनी बँट और अकेली हो चुकी थी कि आपसी एकता समाप्त हो गई थी।
आँखें बंद रखने से जनता बिना सोचे काम करती रही, उत्पादन बढ़ा, आगे के क्रूर हुक्म भी माने गए और “राजा रातदिन प्रगति करता रहा”। आँखें खोलने पर खैराती, रामू और छिद्दू को सामने केवल राजा दिखा, वे एक-दूसरे को न देख सके — स्वर्ग की जगह सारा लाभ राजा का था और जनता की एकता नष्ट हो चुकी थी।
राजा ने कौन-कौन से हुक्म निकाले? सूची बनाइए और इनके निहितार्थ लिखिए।
Answer
उत्तर
हुक्म | निहितार्थ |
|---|---|
सब लोग अपनी आँखें बंद रखें, ताकि शांति मिलती रहे | जनता अन्याय और सच्चाई न देखे; अंधानुकरण करे |
कानों में पिघला हुआ सीसा डलवा लें, क्योंकि सुनना जीवित रहने के लिए ज़रूरी नहीं | जनता कोई विरोधी विचार, सच्ची खबर या दूसरों की पीड़ा न सुने |
होंठ सिलवा लें, क्योंकि बोलना उत्पादन में बाधक है | जनता बोल न सके— अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनना, प्रश्न और विरोध पर रोक |
(होंठ सिलने से खाना भी बंद) — खाना भी काम के लिए आवश्यक नहीं माना गया | जनता की मूलभूत ज़रूरतों की उपेक्षा; उसे केवल उत्पादन की मशीन समझना |
कई तरह की चीज़ें कटवाने और जुड़वाने के हुक्म | जनता को अपनी इच्छानुसार ढालना, उसकी पहचान और अस्मिता को नष्ट करना |
समग्र निहितार्थ: राजा जनता को अंधी, बहरी और गूँगी बनाकर, ‘प्रगति’ और ‘उत्पादन’ के नाम पर, अपना हित साधता है और जनता को सोचने, समझने और संगठित होने से रोकता है।
हुक्म और निहितार्थ: - आँखें बंद रखो: जनता सच और अन्याय न देखे। - कानों में पिघला सीसा डलवाओ: विरोधी विचार और सच्ची खबर न सुने। - होंठ सिलवाओ: अभिव्यक्ति और विरोध पर रोक। - खाना भी ज़रूरी नहीं: मूलभूत ज़रूरतों की उपेक्षा, जनता केवल उत्पादन की मशीन। - चीज़ें कटवाओ-जुड़वाओ: जनता की पहचान और अस्मिता का नाश।
कुल मिलाकर, राजा ‘प्रगति’ के नाम पर जनता को अंधी, बहरी, गूँगी बनाकर अपना हित साधता है।
जनता राज्य की स्थिति की ओर से आँखें बंद कर ले तो उसका राज्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा? स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
- तानाशाही का उदय: शासक निरंकुश हो जाएगा, क्योंकि उस पर नज़र रखने वाला कोई नहीं होगा; लोकतंत्र कमज़ोर होगा।
- भ्रष्टाचार और शोषण: शासक और अधिकारी बिना डर के भ्रष्टाचार और जनता का शोषण करेंगे।
- ‘छद्म प्रगति’: विकास केवल शासक-वर्ग का होगा (राजा प्रगति करता रहा), जनता गरीब और वंचित रहेगी।
- अधिकारों का हनन: अभिव्यक्ति, समानता आदि अधिकार धीरे-धीरे छिनते जाएँगे और जनता को पता भी नहीं चलेगा।
- जनता की एकता का अंत: लोग एक-दूसरे की समस्याएँ नहीं देख पाएँगे; संगठित होकर विरोध नहीं कर सकेंगे।
- अंततः राज्य का पतन: जागरूक नागरिकों के बिना राज्य खोखला हो जाता है।
अतः लोकतंत्र में जनता का जागरूक रहना, प्रश्न करना और शासन पर निगरानी रखना अनिवार्य है।
शासक निरंकुश और तानाशाह हो जाएगा, भ्रष्टाचार और शोषण बढ़ेंगे, विकास केवल शासक-वर्ग का होगा, जनता के अधिकार चुपचाप छिनते जाएँगे, जनता की एकता टूटेगी और अंततः राज्य खोखला हो जाएगा — इसलिए जनता का जागरूक रहना और प्रश्न करना अनिवार्य है।
खैराती, रामू और छिद्दू ने जब आँखें खोलीं तो उन्हें सामने राजा ही क्यों दिखाई दिया?
Answer
उत्तर
- राजा का सर्वव्यापी प्रभुत्व: राजा ने जनता के जीवन के हर क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा कर लिया था; हर जगह उसी की सत्ता, उसी का प्रचार, उसी का लाभ था। इसलिए आँख खोलते ही सामने केवल राजा था।
- ‘प्रगति’ केवल राजा की: जनता सोच रही थी कि राज्य स्वर्ग बन गया होगा, पर विकास केवल राजा का हुआ था; जनता की स्थिति वहीं की वहीं (या बदतर) थी।
- जनता की एकता का विनाश: “वे एक-दूसरे को न देख सके”— राजा ने जनता को इतना बाँट और अकेला कर दिया था कि वे एक-दूसरे का दुख-दर्द नहीं देख सकते थे, संगठित नहीं हो सकते थे।
- व्यक्ति-पूजा: जनता के मन-मस्तिष्क पर राजा इस तरह छा गया था कि उसके सिवा कुछ और दिखाई ही नहीं देता था।
इससे लेखक ने दिखाया कि निरंकुश सत्ता जनता को किस प्रकार अपने सिवा कुछ और देखने ही नहीं देती।
राजा ने जनता के जीवन के हर क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था और सारी ‘प्रगति’ केवल उसी की हुई थी; वह जनता के मन-मस्तिष्क पर इस तरह छा गया था कि उसके सिवा कुछ नहीं दिखता; और उसने जनता को इतना बाँट दिया था कि वे एक-दूसरे को देख भी न सके, यानी संगठित होने की संभावना ही खत्म हो गई।
अभ्यास – चार हाथ
मज़दूरों को चार हाथ देने के लिए मिल मालिक ने क्या किया और उसका क्या परिणाम निकला?
Answer
उत्तर
मिल मालिक ने सोचा कि मज़दूरों के चार हाथ हों तो काम तेज़ी से होगा और मुनाफ़ा ज़्यादा। 1. उसने बड़े वैज्ञानिकों को मोटी तनख्वाहों पर नौकर रखा। कई साल के शोध के बाद उन्होंने कहा कि आदमी के चार हाथ होना असंभव है। नाराज़ होकर मालिक ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया और स्वयं जुट गया। 2. उसने कटे हुए हाथ मँगवाकर मज़दूरों के फिट करवाने चाहे— ऐसा नहीं हो सका। 3. फिर लकड़ी के हाथ लगवाए— उनसे काम नहीं हो सका। 4. फिर लोहे के हाथ फिट करवा दिए— मज़दूर मर गए।
परिणाम: उसके सभी प्रयास असफल रहे और अमानवीय प्रयोगों में मज़दूरों की जान चली गई। अंत में उसने मज़दूरी आधी करके दुगुने मज़दूर रख लिए।
उसने वैज्ञानिकों को मोटी तनख्वाह पर रखा, उनके असंभव बताने पर उन्हें निकाल दिया; फिर स्वयं मज़दूरों के कटे हुए हाथ (नहीं जुड़े), लकड़ी के हाथ (काम नहीं हुआ) और लोहे के हाथ (मज़दूर मर गए) लगवाए। सारे प्रयास असफल और अमानवीय रहे; अंत में उसने मज़दूरी आधी करके दुगुने मज़दूर रख लिए।
चार हाथ न लग पाने पर मिल मालिक की समझ में क्या बात आई?
Answer
उत्तर
मिल मालिक की समझ में आया कि चार हाथ लगाने की ज़रूरत ही नहीं है; वही परिणाम (दुगुना काम, कम लागत) मज़दूरों के शोषण से आसानी से पाया जा सकता है। उसने मज़दूरी आधी कर दी और दुगुने मज़दूर नौकर रख लिए। इस तरह उतनी ही मज़दूरी में उसे दुगुने हाथ मिल गए।
यह पूँजीवादी व्यवस्था पर व्यंग्य है— बेरोज़गारी और लाचारी के कारण मज़दूर आधी मज़दूरी पर भी काम करने को तैयार हैं; पूँजीपति इसी लाचारी का लाभ उठाकर अपना मुनाफ़ा बढ़ाता है।
उसे समझ आया कि चार हाथों की ज़रूरत नहीं — मज़दूरी आधी करके दुगुने मज़दूर रख लेने से उतने ही खर्च में दुगुने हाथ मिल जाएँगे। यह मज़दूरों की लाचारी का लाभ उठाने वाली पूँजीवादी शोषण-व्यवस्था पर व्यंग्य है।
अभ्यास – साझा
साझे की खेती के बारे में हाथी ने किसान को क्या बताया?
Answer
उत्तर
किसान पहले शेर, चीते और मगरमच्छ के साथ साझे की खेती कर चुका था और उसका कभी गुज़ारा नहीं हुआ; अकेले खेती करने का साहस वह डरा दिए जाने के कारण नहीं जुटा पाता था, इसलिए उसने खेती न करने का निश्चय किया। तब हाथी ने उसे बहुत देर तक पट्टी पढ़ाई (बहलाया-फुसलाया) और बताया कि उसके साथ साझे की खेती करने से यह लाभ होगा कि जंगल के छोटे-मोटे जानवर खेतों को नुकसान नहीं पहुँचा सकेंगे और खेती की अच्छी रखवाली हो जाएगी।
हाथी ने किसान को बहुत देर तक पट्टी पढ़ाई और बताया कि उसके साथ साझे की खेती करने से जंगल के छोटे-मोटे जानवर खेत को नुकसान नहीं पहुँचा सकेंगे और खेती की अच्छी रखवाली हो जाएगी।
हाथी ने खेत की रखवाली के लिए क्या घोषणा की?
Answer
उत्तर
हाथी पूरे जंगल में घूमकर डुग्गी पीट आया (ढोल बजाकर घोषणा की) कि गन्ने में उसका साझा है, इसलिए कोई जानवर खेत को नुकसान न पहुँचाए, नहीं तो अच्छा न होगा।
हाथी ने पूरे जंगल में डुग्गी पीटकर घोषणा की कि गन्ने में उसका साझा है, इसलिए कोई जानवर खेत को नुकसान न पहुँचाए, नहीं तो अच्छा न होगा।
आधी-आधी फसल हाथी ने किस तरह बाँटी?
Answer
उत्तर
गन्ने तैयार होने पर किसान ने फ़सल आधी-आधी बाँटने की बात कही तो हाथी बिगड़ गया— “अपने और पराए की बात मत करो। यह छोटी बात है। हम दोनों ने मिलकर मेहनत की थी, हम दोनों उसके स्वामी हैं। आओ, हम मिलकर गन्ने खाएँ।” उसने सूँड से एक गन्ना तोड़ा; गन्ने का एक छोर हाथी की सूँड में था और दूसरा आदमी के मुँह में। हाथी गन्ना खींचने लगा तो आदमी भी साथ-साथ हाथी के मुँह की ओर खिंचने लगा, इसलिए उसने गन्ना छोड़ दिया। हाथी बोला— “देखो, हमने एक गन्ना खा लिया।” इसी तरह हाथी ने पूरी फ़सल खा ली और किसान को कुछ नहीं मिला।
यह ताकतवर, प्रभुत्वशाली वर्ग द्वारा ‘साझेदारी’ के नाम पर किसान की मेहनत हड़पने पर व्यंग्य है।
हाथी ने बँटवारे को “छोटी बात” कहकर मिलकर खाने का प्रस्ताव रखा; गन्ने का एक छोर सूँड में और दूसरा किसान के मुँह में देकर खींचा, तो किसान को भी खिंचने के डर से गन्ना छोड़ना पड़ा; हाथी बोला “हमने एक गन्ना खा लिया” — इसी तरह पूरी फ़सल हाथी खा गया और किसान को कुछ नहीं मिला।
योग्यता-विस्तार
(शेर) इस कहानी में हमारी व्यवस्था पर जो व्यंग्य किया गया है, उसे स्पष्ट कीजिए।
Answer
उत्तर
- सत्ता का दिखावटी चेहरा: शेर (सत्ता) अहिंसा, सह-अस्तित्ववाद और बुद्ध-मुद्रा का ढोंग करता है, पर वास्तव में सबको निगल जाता है।
- झूठे वादे और प्रलोभन: व्यवस्था जनता को हरी घास (सुख-सुविधा), रोज़गार और स्वर्ग (धर्म/आध्यात्मिक मुक्ति) के झूठे सपने दिखाकर अपने वश में करती है।
- जनता की अंधभक्ति: गधा (मूर्ख, सुविधाभोगी), लोमड़ी (चालाक नौकरी-चाहने वाले), उल्लू (तथाकथित ज्ञानी/धार्मिक) सब बिना सोचे सत्ता के मुँह में चले जाते हैं।
- छद्म क्रांतिकारी: कुत्तों का जुलूस— कभी हँसते-गाते, कभी विरोध में चीखते, पर “सब दुम दबाए”— अंततः वे भी सत्ता में समा जाते हैं। यह दिखावटी विरोध करने वाले नेताओं/संगठनों पर व्यंग्य है।
- नौकरशाही: शेर आँखें बंद किए पड़ा है और स्टाफ़ दफ़्तर का काम निपटा रहा है, प्रचार करता है कि बाहर का रोज़गार दफ़्तर “मिथ्या” है।
- तर्क का दमन: “प्रमाण से अधिक महत्वपूर्ण है विश्वास।”
- विरोध का दमन: इनकार करते ही शेर दहाड़कर झपटता है— व्यवस्था असहमति सहन नहीं करती।
व्यंग्य: सत्ता अहिंसा और बुद्ध-मुद्रा का ढोंग करते हुए जनता को निगलती है; झूठे प्रलोभनों (सुविधा, रोज़गार, स्वर्ग) से वश में करती है; गधे, लोमड़ी, उल्लू जैसी अंधभक्त जनता और दुम दबाए ‘विरोधी’ कुत्ते (छद्म क्रांतिकारी) उसमें समा जाते हैं; नौकरशाही प्रचार करती है और तर्क को दबाती है; और असहमति होते ही सत्ता खूँखार होकर दमन करती है।
(शेर) यदि आपके भी सींग निकल आते तो आप क्या करते?
Answer
उत्तर
कहानी में ‘सींग निकलना’ प्रतीक है— व्यक्ति में विरोध, स्वतंत्र सोच, अलग पहचान या प्रश्न करने की क्षमता का विकसित होना, जिससे वह व्यवस्था (कसाई) की नज़र में खटकने लगता है।
यदि मेरे भी सींग निकल आते (यानी मुझमें स्वतंत्र सोच और विरोध की क्षमता आ जाती) तो— 1. मैं डरकर भागने के बजाय अपनी अलग पहचान और विचारों को साहस से स्वीकार करता। 2. लेखक की तरह मैं किसी प्रलोभन या झूठे प्रचार में नहीं आता; हर बात का प्रमाण माँगता। 3. मैं दूसरों को भी (जैसे लेखक ने गधे और कुत्तों को रोकने की कोशिश की) जागरूक करने का प्रयास करता। 4. अकेले न लड़कर समान विचार वाले लोगों को संगठित करता, क्योंकि संगठित जनता को सत्ता आसानी से नहीं कुचल सकती। 5. अपनी बात शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और कानूनी तरीकों से रखता।
‘सींग निकलना’ स्वतंत्र सोच और विरोध की क्षमता का प्रतीक है। मेरे सींग निकलते तो मैं डरकर भागने के बजाय अपनी पहचान और विचारों को साहस से स्वीकारता, प्रलोभनों और झूठे प्रचार से बचकर प्रमाण माँगता, दूसरों को जागरूक करता, समान विचार वालों को संगठित करता और शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी बात रखता।
(पहचान) गांधी जी के तीनों बंदर आँख, कान, मुँह बंद करते थे किंतु उनका उद्देश्य अलग था कि वे बुरा न देखेंगे, न सुनेंगे, न बोलेंगे। यहाँ राजा ने अपने लाभ के लिए या राज्य की प्रगति के लिए ऐसा किया। दोनों की तुलना कीजिए।
Answer
उत्तर
आधार | गांधी जी के तीन बंदर | ‘पहचान’ का राजा |
|---|---|---|
उद्देश्य | नैतिक आत्म-सुधार— बुरा न देखो, बुरा न सुनो, बुरा न कहो | शासक का स्वार्थ— जनता सच न देखे, न सुने, न बोले |
प्रेरणा | स्वेच्छा से, अंतरात्मा की प्रेरणा से अपनाया गया नियम | राजा के हुक्म से, ज़बरदस्ती थोपा गया |
किससे बचाव | बुराई से | सच्चाई, अन्याय की जानकारी और विरोध से |
परिणाम | व्यक्ति का चरित्र उज्ज्वल, समाज में सद्भाव | जनता अंधी-बहरी-गूँगी, शोषित, बिखरी; केवल राजा की ‘प्रगति’ |
प्रकृति | सकारात्मक, नैतिक, व्यक्ति-कल्याणकारी | नकारात्मक, दमनकारी, निरंकुश |
व्यापकता | केवल बुराई के प्रति इंद्रियाँ बंद; अच्छाई देखने-सुनने-बोलने की स्वतंत्रता | पूरी तरह इंद्रियाँ बंद— अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं |
निष्कर्ष: बाहरी रूप समान होते हुए भी दोनों में मूल अंतर उद्देश्य का है— गांधी जी के बंदर आत्म-संयम और नैतिकता का संदेश देते हैं, जबकि राजा का हुक्म जनता की चेतना को नष्ट कर सत्ता का स्वार्थ साधने का षड्यंत्र है।
गांधी जी के बंदर स्वेच्छा से, नैतिक आत्म-सुधार के लिए केवल बुराई के प्रति आँख-कान-मुँह बंद करते हैं, जिससे चरित्र उज्ज्वल होता है; ‘पहचान’ का राजा अपने स्वार्थ के लिए ज़बरदस्ती जनता की इंद्रियाँ पूरी तरह बंद कराता है, ताकि वह सच और अन्याय न जान सके — परिणाम शोषित, बिखरी जनता और केवल राजा की ‘प्रगति’। रूप समान है, उद्देश्य विपरीत।
(पहचान) भारतेंदु हरिश्चंद्र का ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ नाटक देखिए और उस राजा से ‘पहचान’ के राजा की तुलना कीजिए।
Answer
उत्तर
‘अंधेर नगरी’ का राजा (चौपट राजा): उसकी नगरी में “टके सेर भाजी, टके सेर खाजा”— हर चीज़ एक भाव। वह मूर्ख, विवेकहीन और सनकी है। बकरी के मरने पर न्याय करते हुए दोष कल्लू बनिया, कारीगर, चूनेवाले, भिश्ती, कसाई, गड़रिए से होता हुआ कोतवाल पर आता है, और अंत में फाँसी का फंदा जिसके गले में फिट हो, उस मोटे गोवर्धनदास को फाँसी देने का आदेश देता है। अंत में गुरु की चतुराई से राजा स्वयं फाँसी पर चढ़ जाता है।
तुलना
आधार | अंधेर नगरी का राजा | पहचान का राजा |
|---|---|---|
स्वभाव | मूर्ख, सनकी, विवेकहीन | चतुर, षड्यंत्रकारी, स्वार्थी |
शासन | अराजक, अन्यायपूर्ण, बिना सोचे फ़ैसले | योजनाबद्ध दमन, ‘प्रगति’ और ‘उत्पादन’ के नाम पर |
जनता | भ्रष्ट, अव्यवस्थित तंत्र का शिकार | अंधी, बहरी, गूँगी बना दी गई |
अंत | अपनी मूर्खता से स्वयं फाँसी चढ़ता है | सफल रहता है, “रातदिन प्रगति” करता है |
समानता: दोनों निरंकुश, अन्यायी शासक हैं; दोनों में जनता की भलाई की चिंता नहीं; दोनों व्यवस्था पर व्यंग्य हैं।
अंतर: अंधेर नगरी का राजा मूर्खता से नष्ट होता है, जबकि ‘पहचान’ का राजा आधुनिक, चालाक तानाशाह है, जो जनता की चेतना को ही नष्ट कर देता है, इसलिए अधिक खतरनाक है।
‘अंधेर नगरी’ का चौपट राजा मूर्ख और सनकी है (“टके सेर भाजी टके सेर खाजा”; बकरी-प्रसंग में फंदे के नाप से गोवर्धनदास को फाँसी), अराजक शासन करता है और अपनी मूर्खता से स्वयं फाँसी चढ़ता है। ‘पहचान’ का राजा चतुर, योजनाबद्ध तानाशाह है, जो ‘प्रगति’ के नाम पर जनता को अंधी-बहरी-गूँगी बनाकर सफल रहता है। दोनों निरंकुश और अन्यायी हैं, पर ‘पहचान’ का राजा अधिक खतरनाक है।
(चार हाथ) आप यदि मिल मालिक होते तो उत्पादन दो गुना करने के लिए क्या करते?
Answer
उत्तर
यदि मैं मिल मालिक होता तो मज़दूरों का शोषण नहीं, बल्कि उनका सहयोग लेकर उत्पादन बढ़ाता— 1. आधुनिक तकनीक और मशीनें लगाता, जिससे कम श्रम में अधिक उत्पादन हो। 2. मज़दूरों को प्रशिक्षण देकर उनकी कुशलता बढ़ाता। 3. उचित वेतन, बोनस और प्रोत्साहन देता— अधिक उत्पादन पर लाभ में हिस्सा। 4. अच्छी कार्य-परिस्थितियाँ— सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ, निर्धारित काम के घंटे, आराम का समय। 5. शिफ़्टों में काम कराकर मशीनों का पूरा उपयोग। 6. मज़दूरों की भागीदारी— उनके सुझाव लेना, प्रबंधन में प्रतिनिधित्व। 7. बेहतर प्रबंधन— कच्चे माल की समय पर आपूर्ति, बर्बादी पर रोक, गुणवत्ता नियंत्रण।
संतुष्ट और कुशल मज़दूर ही अधिक उत्पादन का सबसे बड़ा साधन हैं।
मज़दूरों का शोषण नहीं, सहयोग — आधुनिक तकनीक और मशीनें, मज़दूरों का प्रशिक्षण, उचित वेतन-बोनस और लाभ में हिस्सा, सुरक्षित और स्वस्थ कार्य-परिस्थितियाँ, शिफ़्टों में काम, मज़दूरों की भागीदारी, और बर्बादी रोकने वाला बेहतर प्रबंधन; संतुष्ट और कुशल मज़दूर ही अधिक उत्पादन का आधार हैं।
(साझा) ‘पंचतंत्र की कथाएँ’ भी पढ़िए।
Answer
उत्तर
(पठन हेतु परिचय)
पंचतंत्र की रचना लगभग तीसरी शताब्दी ई.पू. में पंडित विष्णु शर्मा ने संस्कृत में की थी। कथा के अनुसार उन्होंने राजा अमरशक्ति के तीन मूर्ख राजकुमारों को छह महीने में नीति-निपुण बनाने के लिए पशु-पक्षियों की कहानियों के माध्यम से राजनीति, व्यवहार-कुशलता और जीवन-मूल्य सिखाए।
पाँच तंत्र (भाग): 1. मित्रभेद— मित्रों में फूट डालना (शेर और बैल संजीवक, सियार करटक-दमनक) 2. मित्रसंप्राप्ति— मित्र-लाभ (कौआ, चूहा, कछुआ, हिरण) 3. काकोलूकीयम्— कौओं और उल्लुओं की कथा (युद्ध और संधि) 4. लब्धप्रणाश— प्राप्त वस्तु का नाश (बंदर और मगरमच्छ) 5. अपरीक्षितकारकम्— बिना विचारे काम करना (ब्राह्मणी और नेवला)
प्रसिद्ध कथाएँ: बंदर और मगरमच्छ, शेर और चतुर खरगोश, बातूनी कछुआ, नीले सियार की कहानी।
‘साझा’ से संबंध: असगर वजाहत ने भी पंचतंत्र की तरह पशु-पात्रों (हाथी, शेर) के प्रतीक से आधुनिक सामाजिक-आर्थिक शोषण पर व्यंग्य किया है।
पंचतंत्र — पंडित विष्णु शर्मा द्वारा संस्कृत में रचित, राजकुमारों को पशु-पक्षी कथाओं से नीति सिखाने वाला ग्रंथ; पाँच तंत्र: मित्रभेद, मित्रसंप्राप्ति, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाश, अपरीक्षितकारकम्; प्रसिद्ध कथाएँ: बंदर-मगरमच्छ, शेर और खरगोश, बातूनी कछुआ, नीला सियार। ‘साझा’ भी पंचतंत्र की तरह पशु-प्रतीकों से आधुनिक शोषण पर व्यंग्य करती है।
(साझा) ‘भेड़ और भेड़िए’ हरिशंकर परसाई की रचना पढ़िए।
Answer
उत्तर
(पठन हेतु सारांश)
‘भेड़ें और भेड़िए’ हरिशंकर परसाई की प्रसिद्ध व्यंग्य रचना है। जंगल में पशुओं ने तय किया कि अब वहाँ प्रजातंत्र होगा और चुनाव द्वारा प्रतिनिधि चुने जाएँगे। भेड़ें बहुसंख्यक थीं, इसलिए खुश थीं कि अब उनके हित में कानून बनेंगे। भेड़िए चिंतित हुए। तब बूढ़े सियार ने भेड़ियों को सलाह दी— उन्हें संत का रूप दिया, गले में कंठी, माथे पर तिलक, हाथ में माला। सियारों ने प्रचार किया कि भेड़िए अब शाकाहारी और भेड़ों के सच्चे हितैषी हो गए हैं। भोली भेड़ों ने भेड़ियों को ही अपना प्रतिनिधि चुन लिया। पंचायत में भेड़ियों ने पहला कानून बनाया— “हर भेड़िए को सवेरे नाश्ते के लिए भेड़ का एक मुलायम बच्चा दिया जाए, दोपहर को एक पूरी भेड़…”
संदेश: लोकतंत्र में जनता (भेड़ें) यदि भोली और अजागरूक हो, तो चालाक, शोषक नेता (भेड़िए) धूर्त प्रचारकों (सियार) की मदद से वेश बदलकर सत्ता पा लेते हैं और उसी जनता का शोषण करते हैं।
‘साझा’ से समानता: दोनों में ताकतवर (हाथी/भेड़िए) मीठी बातों और धोखे से कमज़ोर (किसान/भेड़ें) का शोषण करते हैं।
परसाई की ‘भेड़ें और भेड़िए’ में जंगल में प्रजातंत्र आने पर भेड़िए, बूढ़े सियार की सलाह से संत का वेश धरकर और प्रचार कराकर, भोली भेड़ों के वोट से प्रतिनिधि बन जाते हैं और पहला कानून बनाते हैं कि उन्हें नाश्ते-भोजन में भेड़ें दी जाएँ। संदेश: अजागरूक जनता धूर्त नेताओं से ठगी जाती है — ‘साझा’ की तरह ताकतवर मीठी बातों से कमज़ोर का शोषण करता है।
(साझा) कहानी और लघुकथा में अंतर जानिए।
Answer
उत्तर
आधार | कहानी | लघुकथा |
|---|---|---|
आकार | अपेक्षाकृत बड़ी (कुछ पृष्ठों से लेकर लंबी कहानी तक) | बहुत छोटी (कुछ पंक्तियों से एक-दो पृष्ठ) |
कथानक | विस्तृत, अनेक घटनाएँ और उतार-चढ़ाव | एक ही घटना, एक ही क्षण या स्थिति पर केंद्रित |
पात्र | अनेक पात्र, उनका विस्तृत चरित्र-चित्रण | बहुत कम पात्र, चरित्र-चित्रण संकेत भर |
वातावरण | देश-काल-वातावरण का विस्तृत वर्णन | वातावरण-वर्णन न्यूनतम |
संवाद | अधिक और विस्तृत | बहुत कम, चुटीले |
प्रभाव | धीरे-धीरे बनता है, चरम सीमा और अंत | तीव्र, अंत में चौंकाने वाला (पंच) प्रभाव |
शैली | वर्णनात्मक, विविध | सांकेतिक, प्रतीकात्मक, प्रायः व्यंग्यात्मक |
उदाहरण | प्रेमचंद की ‘ईदगाह’, रेणु की ‘संवदिया’ | असगर वजाहत की ‘शेर’, ‘साझा’; खलील जिब्रान, विष्णु प्रभाकर की लघुकथाएँ |
कहानी आकार में बड़ी होती है; उसमें अनेक घटनाएँ, पात्र, विस्तृत चरित्र-चित्रण, वातावरण और संवाद होते हैं और प्रभाव धीरे-धीरे बनता है (जैसे ‘ईदगाह’, ‘संवदिया’)। लघुकथा बहुत छोटी होती है; एक घटना या क्षण, कम पात्र, न्यूनतम वर्णन, चुटीले संवाद, सांकेतिक-व्यंग्यात्मक शैली और अंत में तीव्र, चौंकाने वाला प्रभाव (जैसे ‘शेर’, ‘साझा’)।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ शेर (प्रश्न 1–4)
- ☒ पहचान (प्रश्न 5–9)
- ☒ चार हाथ (प्रश्न 10–11)
- ☒ साझा (प्रश्न 12–14)
- ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 15–22)